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Tuesday, July 1, 2025

ग्वालियर में बनी इस सुरंग को कैसे देखें?

 मेरे कुछ एक मित्र आलोचक को आलूचक कहते हैं। ऐसा वे इसलिए कहते हैं क्योंकि आलोचक नाम की संस्था का हाल अब कुछ आलू की चाट की तरह है। फिर चाहे आलूचक हिंदी साहित्य में हों, या राजनीति में। अब जैसे इसी मीम को जिसने बनाया, अगर उसका दिमाग पढ़ें तो उसे सिर्फ सड़कें दिख रही हैं, बल्कि नहीं भी दिख रही हैं। ऐसे ही सड़क पर बना गड्ढा दिख रहा है, मगर सड़क के नीचे की सुरंग नहीं दिख रही है। आलोचक का काम है गहरे से गहरे देखना, जैसा कि इन दिनों हिंदी साहित्य के गैंगेस्टर्स दो कमरों में गहरे से गहरे घुसकर देख रहे हैं। जबकि हिंदी साहित्य के वे गैंगेस्टर्स, जो आलूचक हैं, वे बस दरवाजे पर बिना दस्तक दिए लौट आ रहे हैं, और अपने पड़ोसी से पूछ रहे हैं कि- अरे मगर हुआ क्या था? बहरहाल, हम हिंदी साहित्य के इन गैंगेस्टरों पर बात नहीं कर रहे हैं, हम तो बस एक सुरंग की बात कर रहे हैं। एक सुरंग, जो आकाशीय चमत्कार से हमारे सामने आई। यह ईश्वर की कृपा है, जो वह हमें यह लीला दिखा रहे हैं। 


आलूचक इसे सड़क में बना गड्ढा मानता है, लेकिन आलोचक इसे सुरंग मानते हैं। और आप जरा सुरंग के किनारों को देखिए। यह बिल्कुल नई सुरंग है। और सुंरग जब भी बनती है, तो जाहिर है कि उसमें सिर्फ दो सवालों के उत्तर होते हैं। सुरंग आ कहां से रही है, और सुरंग जा कहां को रही है। सीमित सूचनाओं के प्रतिमानी पुरुषों का ऐसा मानना है कि यह सुरंग सीजफायर के बाद इमरजेंसी में सरेंडर करने के लिए बनाई है। ऐसी अपुष्ट खबरें भी हैं कि सुरंग का नक्शा बक्से में बंद करके परिधानमंत्री निवास में मोर की रक्षा में रखा गया है। कोई पूछ सकता है कि परिधानमंत्री तो दिल्ली में, सुरंग ग्वालियर में ही क्यों? गुजरात में क्यों नहीं? ऐसे सवाल नादान ही पूछ सकते हैं। इतिहास के गंभीर अध्येता के उंगली दिल्ली से गुजरात कभी नहीं उठेगी। उसकी उंगली ग्वालियर की ओर ही उठेगी। ग्वालियर का सरेंडर का अपना सुनहरा अतीत रहा है। एक पूरी परंपरा रही है, जो गदर से लेकर अब तक दिल्ली आती-जाती रही है। 

आलूचकों की दिक्कत यह होती है कि वे सही समय पर सही इतिहास नहीं याद कर सकते। पहले कुछ याद भी रखते थे, मगर अब हमारी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के कोर्स ज्यादा याद रखते हैं। मसलन, इन दिनों हिंदी साहित्य के गैंगेस्टरों के बीच एक से बढ़कर एक सूचनाएं फर्राटा भर रही हैं, जिनकी सत्यता का प्रमाण स्वयं उसका लेखक है। हिंदी साहित्य के इन लेखकों से क्या ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि हम जीवन में उस सुरंग के बारे में जानें, जो पहले अपनी रियासत, और अब हमारे मुल्क के सरेंडर के लिए बनाई गई है? इस सुरंग को ध्यान से देखेंगे तो आपको दो जोड़ी कदमों के निशान भी दिखेंगे। यानी यह सुरंग न सिर्फ नई है, बल्कि यह हाल ही में प्रयोग में भी लाई गई है। आलोचक ने इस सुरंग को सेटेलाइट से भी देखा। यह सैटेलाइट से भी सुरंग ही दिखती है, गड्ढा नहीं दिखती। बड़ी बात यह कि नासा के सुरंग खोजी सैटेलाइट ने भी इसे सैटलाइट पर मार्क कर रखा है, जिसका नंबर है- SM014IN56. इतने सारे सबूतों को ध्यान में रखते हुए आलोचक आलूचकों से प्रार्थना करता है कि वे इस तस्वीर को वैसे ना देखें, जैसा इस मीम को बनाने वाला दिखाना चाह रहा है। इसे नासा की नजर से देखें।

Sunday, October 2, 2022

वैष्णव की नई फिसलन

वैष्णव का होटल चल निकला था। शहर भर में धूम थी। बाहर से जो भी आता, स्टेशन पर ही उसे होटल का शानदार विज्ञापन दिखता। विज्ञापन तो और भी थे, लेकिन वैष्णव के होटल जितना बड़ा विज्ञापन और कोई नहीं था। फिर बत्ती भी उसी विज्ञापन पर जलती। वैष्णव ने बिजली विभाग से मिलकर जुगाड़ गांठ रखा था कि किसी और के बोर्ड पर बत्ती जले, तो तुरंत उसे नोटिस पहुंचा दिया जाए। 

वैष्णव ने सारे सवालों को उठने से पहले ही समाप्त कर दिया था। वह खुश था। पहले प्रभु की आरती में कड़वे तेल की बत्ती जलाता था, अब देसी घी की बत्तियां जल रही थीं। सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन होटल का मुख्य रसोइया भाग गया। 

ऐसा नहीं था कि वैष्णव उसे अच्छी तनख्वाह नहीं दे रहा था। मगर रसोइए को प्रेम हो गया था और वैष्णव उसे छुट्टी नहीं दे रहा था। छुट्टी के अलावा वैष्णव ने उसे ढेरों कसमें दीं, मगर जिन्होंने प्रेम किया है, वे जानते हैं कि प्रेम तो प्रेम ही होता है। चींटी की तरह प्रेमियों के भी पर निकल आते हैं। 

यह भीषण आपदा थी, जिसके बारे में प्रभु ने वैष्णव को सपने में भी नहीं बताया था। वैष्णव ने प्रभु को उलाहना दी। माथा प्रभु की चौखट से टेक दिया। प्रभु ने सुन ली। वैष्णव आकर गल्ले पर बैठा तो देखा कि रसाइयों की कतार लगी है। सभी रसोइयों की विधिपूर्वक परीक्षा हुई। सबने एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन बनाकर दिखाए। 

मगर एक रसोइया था, जिसने कुछ भी बनाकर नहीं दिखाया। बल्कि वह परीक्षा देने वाले रसोइयों की लाइन में भी खड़ा नहीं हुआ। वह फूड इंस्पेक्टर का भतीजा था और लाइसेंस कमिश्नर का साला भी। वैष्णव ने उससे पूछा, ‘क्या बनाते हो?’ रसोइया बोला, ‘मैं किसी भी तरह का लाइसेंस बनाता हूं।’ 

वैष्णव संतुष्ट हुआ। फिर उसने पूछा, ‘और अगर किसी ग्राहक को तुम्हारा लाइसेंस पसंद न आया तो?’ रसोइया बोला, ‘सीएमओ मेरे चाचा लगते हैं, ग्राहक का इलाज हो जाएगा।’ और अगर तुमको भर्ती करने पर बाकियों ने शोर मचाया तो? वैष्णव ने पूछा। ‘लेबर कमिश्नर मेरे जीजा हैं।’ 

यह सुनते ही वैष्णव ने बाकी रसोइयों को यह बोलकर वापस किया कि परिणाम रजिस्टर्ड डाक से आपके घर भेज दिए जाएंगे, और उस रसोइए को रख लिया। जब बाकी रसोइयों को इसका पता चला तो उन्होंने हंगामा कर दिया, धरने पर बैठ गए। कहने लगे कि हमारी योग्यता प्रमाणित है, फिर भी हमें नहीं रखा गया। 

वैष्णव डर गया। फिर से प्रभु के पास पहुंचा। प्रभु ने पूछा, ‘तुम वैष्णव हो?’ हां प्रभु। ‘फिर तुम झूठ कैसे बोल सकते हो?’ वैष्णव की बत्ती जल गई। उसने तुरंत बयान जारी किया कि नियुक्ति पूरे पारदर्शी तरीके से हुई है। प्रभु के अलावा हम और किसी की भी सिफारिश नहीं मानते। 

बात प्रभु की थी। सारे असंतुष्ट वापस चले गए। फिर वैष्णव ने होटल के बगल एक जमीन खरीद ली, और सीएमओ की मदद से उस पर तुरंत एक अस्पताल बनवा लिया। अब वैष्णव लाइसेंसी खाने के साथ लाइसेंसी इलाज भी करने लगा।

Thursday, March 23, 2017

काले वाले ठाकुर साहब की कहानी

ठाकुर साहब जब दरभंगा से दिल्‍ली की ट्रेन में बैठे तो उनके मन में बस एक ही विचार रह-रह कर कौंध रहा था और वो ये कि 'जमीन खोद दूंगा-मकान पोत दूंगा।' दिल्‍ली जाकर नाम कमाकर किसी न किसी तरह से दरभंगा को दन्‍न न कर दि‍या तो वह खुद अपने नाम के आगे और पीछे से ठाकुर हटाकर खुद का नाम तिमि‍र कुमार रख देंगे। दरभंगा पुलिस उनको तीसरी बार लड़की छेड़ने में धरी तो बड़ी मुश्‍किल से छूटे थे और नाम वाकई तिमिर कुमार ही होने जा रहा था। एक बार तो मोहल्‍ले के पप्‍पन की नौ साल की बच्‍ची के साथ लबर सबर करते धराए थे। पकड़े गए तो बोले नारीवाद सिखा रहे थे। बहरहाल, राम-राम करते किसी तरह से दिल्‍ली पहुंचे और अपने एक दोस्‍त के कमरे में ढेर हुए। दोस्‍त उनका सीधा सादा कि मकान पोत देने जैसा ख्‍याल उसके सपनों में भी न आए तो वहीं ठाकुर साहब हर दूसरे डायलॉग में डब्‍बा कूची लेकर खुद उसी का मकान पोतने को तैयार रहते।

मोरी गेट से लेकर लक्ष्‍मी नगर और पंजाबी बाग तक चक्‍कर लगा लेने के कई दिनों बाद जब ठाकुर साहब को नौकरी मिली, तब भी उनके मुंह से वही डायलॉग निकला। लेकिन नौकरी ऐसी चीज होती नहीं और कैसी चीज होती है, ये ठाकुर साहब नहीं जानते थे। नौकरी में क्‍या-क्‍या काम करने होते हैं, ये भी उन्‍हें नहीं पता होता। नतीजा ये निकला कि कुछ दि‍न ठाकुर साहब ने कूड़ा नाली खड़ंजा विभाग में काम कि‍या तो विभाग वालों ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दि‍ए कि भई, ठाकुर साहब रहेंगे तो उन लोगों से कुछ न हो पाएगा। दोष ठाकुर साहब का नहीं, पुराने काम करने वालों का ही है, जिनके काम करने के लच्‍छन ही नहीं हैं।

असल में हुआ यह कि जब ठाकुर साहब को कूड़े का खाता दि‍या गया तो उसमें वह खड़ंजा बिछाने लगे और जब नाली वि‍भाग पकड़ाया गया तो उसमें वह कूड़ा भरने लगे। साथ के लोग जब उनसे कहते कि नाली को नाली की ही तरह लो तो वह धमकी देते कि जो कुछ भी वह कर रहे हैं, वह 220 फीसद सही कर रहे हैं। अगर कि‍सी ने बार बार उन्‍हें गलत कहा तो वह मैनेजमेंट से शि‍कायत करेंगे कि उनके साथ रंगभेद कि‍या जा रहा है। उनके बिहार से होने की वजह से उनसे गलत व्‍यवहार किया जा रहा है। अब बाकी के लोगों को अपनी इज्‍जत बचानी थी सो सभी ने समवेत यही कहा कि उन सभी को एकदम काम नहीं आता। खैर, मैनेजमेंट समझदार था सो ठाकुर साहब को दूसरे विभाग में भेजा गया।

इधर ठाकुर साहब बुरी तरह से फुंके हुए थे। 'काम उन्‍हें नहीं आता तो तबादला मेरा क्‍यों' का सवाल उन्‍हें लगातार जलाए जा रहा था। उनका काला रंग दिनों दिन और सुर्ख होता जा रहा था। 'सोफी और उसके संसार' के बारे में उन्‍होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था और 'स्‍लीमेन की अवध डायरी' के बारे में सुना तक नहीं था। फैज और फिराक को वह एक ही मानते थे। बावजूद इसके, उनका पढ़ने लिखने वाले विभाग में तबादला कि‍या गया जो पढ़-पढ़कर अपनी रिपोर्ट ऊपर दि‍या करता था जिससे कंपनी की नीतियां बनती और बि‍गड़ती थीं। पढ़ने लिखने से सख्‍त दुश्‍मनी रखने वाले ठाकुर साहब ने जब देखा कि यहां तो उनकी दाल नहीं गलनी है तो बड़े परेशान हुए। जब उन्‍हें कुछ पढ़ने को दिया जाता तो उनके पेट में दर्द होने लगता और जब लिखने को कहा जाता तो उनकी नाक बहने लगती।

मीटिंग वगैरह में भी जब लोग क्‍या पढ़ें-क्‍यों पढ़ें और क्‍या लिखें-क्‍यों लिखे के सवालों से जूझ रहे होते तो वह व्‍हाट्सएप्‍प पर दरभंगा में सरसों के तेल का भाव पूछ रहे होते। कई दफे तो चप्‍पल के टूटे फीते और लौंग का भी भाव पूछते पकड़े जाते तो बताते कि लौंग को वह रात में अपने बारह दांतों के बीच बनी जगह में फंसाकर सोते हैं। शायद ये रात में दांतों में लौंग फंसाकर सोने का ही नतीजा निकला कि विभाग में उन्‍होंने सभी से सीधे मुंह बात करना बंद कर दी। जि‍ससे भी बात करते, मुंह टेढ़ा करके ही बात करते। इसके चलते कोई भी बात करते, टेढ़ी ही करते। सीधी बात और सीधी चाल उन्‍होंने दरभंगा स्‍थित अपने घर की दुछत्‍ती पर रखकर बंद करके रख दी और भूल गए। आखिरकार यह लोग भी कब तक बर्दाश्‍त करते, सो उन्‍होंने भी मैनेजमेंट को बोल दि‍या कि भई, हमीं लोग नाकाबिल हैं, हमें न तो पढ़ना आता है, न लिखना। इसलि‍ए हमारा ट्रांसफर साफ सफाई विभाग में कर दि‍या जाए।

मैनेजमेंट समझदार था सो चुपचाप ठाकुर साहब को उठाकर डाक-तार विभाग में बैठा दि‍या। वहां बैठकर ठाकुर साहब प्रतिदिन चिट्ठियां पढ़ते। पढ़ते-पढ़ते और भी कुढ़ते जाते। मन ही मन बुदबुदाते कि उनके जैसा महान, हर वाद का वादी, राष्‍ट्रीय रंग से लैस क्‍या दुनि‍या में ये दो कौड़ी की चिट्ठियां पढ़ने आया है। अपनी इसी सुपति‍त कुढ़न के चलते इस बार तो उन्‍होंने नए विभाग में पहुंचते ही सभी काम करने वालों पर रंगभेद का आरोप लगा दि‍या। फि‍र क्‍या था, एक के बाद एक, सभी की पेशियां मैनेजमेंट के सामने होने लगीं। सभी लोग सहम गए क्‍योंकि जहां वह काम करते थे, वहां भले ही झूठ-मूठ ही क्‍यों न लगाया जाए, लेकिन ऐसा आरोप बर्दाश्‍त नहीं कि‍या जाता था। सभी ने अपनी सफाई में अपनी बात रखी। पिछले विभागों में काम करने वालों के बयान भी दर्ज हुए।

मैनेजमेंट समझदार था। सभी लोगों के बयान सुनने और सारे सबूतों को देखने के बाद उसने अपना फैसला खुद ही मुल्‍तवी कर लि‍या। डाक-तार विभाग में काम करने वालों को एक दूसरे कमरे में ले जाया गया और उनसे प्रार्थना की गई कि वह कि‍सी तरह से भी अपना काम चलाएं, लेकिन ठाकुर साहब को बि‍लकुल डिस्‍टर्ब न करें। विभाग वाले भी समझदार थे, मैनेजमेंट का इशारा उन्‍होंने हाथो-हाथ लि‍या। एक वो दिन था और एक आज का दिन है, लगभग सारे विभाग ठाकुर साहब नाम का नाम पूरी तरह से भूल चुके हैं। वह अब इशारों इशारों में उन्‍हें तिमिर कुमार ही बुलाते हैं। एक तो थोड़ा दिमाग का तेज निकला तो उसने तिमि‍र कुमार के नाम से ठाकुर साहब के दरभंगा वाले पते पर तिहत्‍तर चिट्ठियां भेज दीं। बच इसलि‍ए गया क्‍योंकि उनपर कहीं भी उसका नाम नहीं था।

हालांकि वो तो बच गया, लेकिन ठाकुर साहब के कुंठित कोप के भागी आए दि‍न डाक बाबू और तार बाबू बनने लगे। कुछ दिन पहले डाक बाबू ने ठाकुर साहब से सिर्फ यह पूछने की हिमाकत कर दी कि छतरपुर वाली चिट्ठियां कहां रखी हैं, तो हाल ये हुआ कि जैसे पूरे दफ्तर में कोई तीन बैल जोतकर हेंगा चला दे। तार बाबू बड़ी-बड़ी आंख लि‍ए टपर-टपर कभी इधर ताकें, कभी गहरी सांस छोड़ें तो कभी उधर ताकें। बीच-बीच में नाक और कान में उंगली भी करते रहें। उस दिन की बात बताते हुए आज भी तार बाबू बोलते हैं कि 'क्‍या बोलें, बोलती ही बंद हो गई थी भैया। भगवान किसी को कैसा भी दिन दि‍खाए लेकिन ऐसे आदमी के बगल बैठने का दुर्भाग्‍य न दे जैसा कि डाक बाबू को दे रहा है। हमको भी दे ही रहा है, लेकिन अब है तो काट रहे हैं।'

कुछ दिन पहले डाक बाबू ने दफ्तर में बाकायदा घोषणा की कि उनकी आवाज चली गई है। पूछा गया कि कहां चली गई है तो उनका कहना था कि कहां चली गई है पूछने से पहले पता करना होगा कि आ कहां से रही है और आती कहां से है। एक वो दिन है और एक आज का दिन है, क्‍या दिन और क्‍या रात, किसी को नहीं पता कि डाक बाबू की आवाज आती कहां से है। चली जाने का सबको पता है।

वैसे ठाकुर साहब जैसे लोग हर कहीं हर किसी को मिल ही जाते हैं। उनके बारे में बताने से पहले मेरे सामने सवाल था कि उनके बारे में कुछ बताया जाए या न बताया जाए। उनके बारे में कुछ भी बताना उनको चंद चीकट शब्‍दों में ही सही, लेकिन अमर कर देगा। उनके बारे में न बताया तो जाने कितनों की आवाज मर जाएगी या मरी रहेगी। इसलि‍ए मैंने तय किया कि उनके बारे में बता ही दि‍या जाए। इसबीच ठाकुर साहब की तहकीकात में मुझे कुछ एक ऐसी खबरें और पता चलीं, जिनसे यह साबित हुआ कि ठाकुर साहब के दिल पर भी वही रंग चढ़ा है जो उनके अगवाड़े और पि‍छवाड़े चढ़ा हुआ है।

उनके पहले के एक दोस्‍त ने मुझे बताया कि दिल्‍ली आने के तुरंत बाद से ही उनकी नौकरी सेट नहीं हुई। अलबत्‍ता वह कुछ और ही सेट करने लगे। पहले जहां वह काम करते थे, वहां पर उनकी एक बूढ़ी मालकिन हुआ करती थी। साल दो साल तो ठाकुर साहब मालकिन की गोद में ऐसा खेले कि हर आता जाता इंसान मालकिन को इतनी अजीब नजरों से देखना शुरू कर दि‍या। आखिर मालकिन कब तक सहती। वह भी उम्र के इस ढलान पर आकर सहने सुनने की क्षमताएं वैसे भी कम ही होती जा रही हैं। किसी तरह खुदा-खुदा करते हुए उनकी मालकिन ने उनकी नौकरी दूसरी जगह सेट की।

दूसरी जगह आने के बाद ठाकुर साहब ने क्‍या क्‍या किया, उसकी एक भरी पूरी लंबी लिस्‍ट है। काफी कुछ तो पहले बता ही दि‍या, ठाकुर साहब के जो कर्म हैं और जिन कर्मों के चलते वह अब पूरी तरह से तिमि‍र कुमार बनकर प्रसिद्ध हो चुके हैं, वह आइंदा भी बताने पर मजबूर करते ही रहेंगे। तिमि‍र वि‍ल बैक। तिमि‍र इज ऑन।

Saturday, June 20, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 12

औरत अंधेरे की नहीं थी। औरत पूरी तरह से उजाले की भी नहीं हो पाई थी। औरत शाम में वि‍चरती, सुबह के धुंधलके में कुछ खोजती थी। दोपहर में छुप जाती थी और रात में न सोते हुए भी सो जाती थी। जगह जगह से नि‍कलते तार उसे कि‍सी भी जगह नहीं जोड़ते थे। जगह जगह से लगी चोटें उसे कहीं से भी नहीं तोड़ती थीं। ढहने को तैयार अपनी ढलान पर वो समझौता करना तो चाहती थी लेकि‍न हर बार डरकर पहाड़ की दूसरी चोटी पर दूसरे के साथ बैठने की इच्‍छा लि‍ए अकेली अपनी इच्‍छाओं को दमि‍त करती, शायद कुंठि‍त भी करती रहती थी। दमि‍त इच्‍छाओं की कुंठा वो आदमी पर नि‍कालती थी, उसके कसकर पकड़कर दबाती थी, मर्दाना आवाज लगाती थी, मर्द की तरह हाथ या शायद अक्‍सर आदमी की उंगली ही पकड़कर उसे सड़क पार कराती थी। आदमी नहीं समझ पाता था कि असल में हि‍ल कौन रहा है या हि‍ला हुआ कौन है। सड़क की गाड़ि‍यां हि‍ल रही हैं या लोगों के हाथ के झंडे या गोलचक्‍कर के चक्‍कर या जेब्रा क्रॉसिंग या नीचे तहखाने को जाती सीढ़ि‍यां या तहखाने से ऊपर आती सीढ़ि‍यां। इस सुस्‍थि‍र हि‍लन को अपनी उंगलि‍यों में उतारकर आदमी उस औरत की मजबूत पकड़ में जकड़ा घि‍सटता चला जाता था।
* लाओ रे, तनी चावल पछोर दी।
न जाने कहां से ये बात आदमी में गूंज जाती और आदमी पछोरे जाने पछोरे जाने के बाद सूप से उलट भूसी के साथ सुलगने से डर औरत से गुहार लगाता कि एक बार फि‍र से वो उसे पकड़ ले। औरत बीच की चीजें हटा देती और उसे पकड़ती तो दोनों चुपचाप एक दूसरे में जकड़े कुछ भी न करते, सि‍वाय कभी कभी हि‍लने के... 

Friday, June 19, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 11

आदमी कुछ इधर से जोड़ लेता था तो कुछ थोड़ी दूर जाकर उधर से जोड़ लेता था। दमि‍त इच्‍छाओं और अवश्‍यंभावी आकांक्षाओं के दोहरे बोझ पर दो जोड़ों का बोझ था कि लगातार उसकी कमर की हड्डि‍यों में वो वि‍चलन अनचाही चि‍लकन के साथ कुछ यूं उभारता था, आदमी सब जोड़ा हुआ तोड़कर चिंदी-चिंदी बि‍खेर देता था। कुछ था, कहीं कुछ जरूर था जो टूटने को तैयार नहीं था, जो फूटने को और फूटकर बहने को भी तैयार नहीं होता था। आदमी सवार था रेत के उस वक्‍ती घोड़े पर जो अपनी पहली हि‍नहि‍नाहट पर ही बि‍खर जाने का आदती और कि‍स्‍मती, दोनों ही था। हाथ में दबी पेन हो या कान में लगा हेडफोन या फि‍र एक पैर का सही सलामत बच गया जूता, सबके मुंह नि‍कल आए थे, जीभ और दांत भी। आदमी डरता था, फि‍र भी इनके साथ ही रहता था, फि‍र डरता था और फि‍र साथ रहता था। अंदर के तय बेकार के समय में वो न तो फि‍सलता था, न घि‍सटता था, बस उन सबको अपने आसपास बि‍खेरकर यूं ही खि‍ड़की से झांका करता, झांका करता कि शायद वो बंद खि‍ड़की कभी खुल जाए और उसके वो अरमान पूरी तरह से पूरे हो जाएं जो बंद खि‍ड़की को देख देख उसने मजबूरी में अधूरे छोड़ दि‍ए या अधूरे छोड़ने को मजबूर कर दि‍या गया। ये कोई सवाल नहीं कि क्‍यों मजबूर कर दि‍या गया और ये कोई जवाब भी नहीं कि मजबूर कर दि‍या गया। बंद खि‍ड़की बड़ी हद सवाल ही पैदा कर सकती है, जवाब तो नहीं ही दे सकती। खि‍ड़की बंद है। आदमी भी और संगीत तो पूरी तरह से। 

Monday, March 30, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 10 (फुटकर नोट्स)


1-
हमने नशा नहीं कि‍या था, पर नशे में थे। उनने नशा भी कि‍या था और ज्‍यादा नशा करने के उनके पास ज्‍यादा कारण थे। वो शोर मचा रहे थे, संगीत बजा रहे थे। शोर और संगीत हममें भी खूब मच और बज रहा था। वो दि‍ल्‍ली जीत लेने पर आह्लादि‍त थे, हम खुद को हार जाने पर... हमारे सामने ये ति‍रंगा मंद हवा में अलट पलट रहा था। और भी बहुत कुछ अलट पलट रहा था। शोर था, संगीत था, नशा था और ति‍रंगा भी था। बस ये हवा ही कुछ धीमी हो चली थी...। अब शायद कई लोगों के लि‍ए सांसों को लंबा करके छोड़ने का वक्‍त आ गया है।
2-
कॉफी लेंगे सर। पानीदार प्‍लास्‍टि‍क की ट्रे में थर्माकोल के ग्‍लास में फूली हुई कॉफी दि‍खाकर उसने पूछा। हमने कहा नहीं। उसने कहा केजरीवाल की कॉफी है। हमने कहा नहीं, हम चाय पीते हैं। उसने कहा चाय का जमाना गया, अब आपका वक्‍त है। हमने फि‍र भी कहा कि नहीं, हमने चाय ही पीनी है। वो हमारे बीच कॉफी का ट्रे ढक्‍कन लगवाकर रखकर चाय लाने चला गया। हमने कॉफी के कपों के साथ दूरि‍यां बरतकर रखीं। ति‍रंगा अब भी लहराकर फैलने की पुरजोर कोशि‍श कर रहा था। कॉफी के पानीदार प्‍लास्‍टि‍क के ढक्‍कन पर पांच साल केजरीवाल का स्‍टीकर लगा था। हम आज शाम ही आइंदा के सालों का वायदा ले लेना चाह रहे थे... वहां साल लि‍मि‍टेड थे, यहां अनलि‍मि‍टेड। पॉलि‍टि‍क्‍स अभी भी लि‍मि‍टेशंस तोड़ देती है।
3-
हम दया करते हैं तो प्रेम नहीं कर सकते। उसने कहा। हम प्रेम करते होंगे तो शायद दया नहीं कर सकते। मैने सोचा। इस बार हवा जरा सी तेज चली और तिरंगा उड़कर आधा हो गया। उसने कहा- यू सक्‍स। उधर संगीत और नारों का शोर दोबाला हो गया। इधर संगीत का वॉल्‍यूम धीमा होता गया और शोर बढ़ता गया। थककर कई सारे चरसी मैदान में औंधे पड़े थे और हम एक बाउंड़ी वॉल पर। हम सब थके थे। हम सब सीमाओं में बंधे थे। हम सब बंधन तोड़ने की लंबे अर्से से कोशि‍श कर रहे थे। हम सब बंधन तोड़ चुके थे... या फि‍र हमें बस लग रहा था कि हम सबकुछ तोड़ चुके हैं।
4-
हम जीत चुके हैं, इसलि‍ए बाद में बात करेंगे। आप ने कहा। हम हारकर थक चुके हैं, इसलि‍ए बात नहीं करेंगे। उसने कहा। हमारे पास बहुत सारे अधूरे काम हैं। आप ने कहा। हमारे पास बहुत से अधूरे काम हैं। उसने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍ए। आप ने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍एं। उसने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। आप ने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। उसने कहा। पालि‍का बाजार की उन अचानक तंग होती सीढ़ि‍यां में अपना पैर कि‍सी की एड़ि‍यों तले दबवाते मैं सोचता रहा... मैं कहां कि‍सके तले इस वक्‍त होउंगा।
5-
कल खुशी की रात थी। कि‍सी को नींद नहीं आई। आज वि‍जय की रात है, जीतने वाले चैन की नींद सोएंगे। हारने वालों की बैटरी बार बार लो होगी, फि‍र भी वो उसे चार्ज नहीं करेंगे। बैटरी चार्ज करने के बावजूद हारने वालों को जीतने में कोई मदद नहीं मि‍लने की, भले ही बैटरी फुल चार्ज हो। एफबी पर फोटो मैसेज दि‍खा- जीत हार में बस हार जीत जि‍तना ही फर्क होता है।

Sunday, March 29, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-9

तुम परेशान होगे, बार बार तुम्‍हारा मन कभी कुछ करने को तो कभी कुछ कहने को कचोटेगा, लेकि‍न कह नहीं पाओगे। सांसें अंदर जाएंगी तो सवाल के साथ जाएंगी कि जा क्‍यों रहीं हैं और जाने से पहले रुक क्‍यों न गईं, इन दो सवालों के साथ-साथ तुम्‍हारी सांसें ही तुम्‍हारी सजा होंगी। हर सुबह तुमसे अपना हि‍साब लि‍खवाएगी, पलक का हर झपकना तुमसे पानी की दरख्‍वास्‍त करेगा, लेकि‍न न तो तुम अपना हि‍साब पूरा कर पाओगे और न ही पानी की कोई दरख्‍वास्‍त। तुम अपना सबकुछ मुझे बताना चाहोगे, फि‍र भी न बता पाओगे और अगर बताओगे, तो भी मैं उनमें से कोई भी बात नहीं सुनने वाली, समझना तो उतनी दूर की बात है जि‍तना तुम्‍हारा हि‍साब और दरख्‍वास्‍त के नजदीक जाकर उन्‍हें वैसे सहलाने की हि‍म्‍मत करना। तुम अक्‍सर चौंकोगे, अपने चौंकने को अपनी नि‍यति न मानने की जि‍द में बार बार फि‍र से वैसे ही चौंकना चाहोगे और कभी कभार शायद तुम्‍हारा चाहना पूरा हो भी जाए, लेकि‍न याद रखना, तुम्‍हारा चाहने की हद सिर्फ तुम्‍हारे चौंकने तक ही खुदी हुई है। और हां, ये दरार इतनी चौड़ी है कि इ‍समें मैं अपने उसी मुखौटे के साथ अंदर तक पैवस्‍त हूं, जि‍से पार करने की हि‍म्‍मत तुम्‍हारे अंदर के मैं में तो नहीं है, नहीं ही है।

मुझे पता है कि मेरा मन कचोटेगा, लेकि‍न आखि‍र है तो मेरा ही मन। सीधी सच्‍ची बात ये है कि मेरे मन में क्‍या चल रहा है, इससे वाकई दुनि‍या को या फि‍र तुम्‍हें भी कोई खास मतलब नहीं है, अगर होगा भी तो मैं ये अच्‍छी तरह से जानता हूं कि तुम तो मुझे कभी नहीं बताओगी और दुनि‍या अव्‍वल तो आदतन नहीं बताएगी और अक्‍सर इरादतन नहीं। सांसों का सवाल भी कोई नया नहीं है और नया न होने के बावजूद बस इस सजा को कुछ देर के लि‍ए भूलने की कोशि‍श करने में न तो कोई बेजा बात है और न कोई बेइमानी, इसलि‍ए सजा को अगर कुछ देर के लि‍ए भी भूला रह गया तो ये मेरी अपनी सांसों के साथ कुछ गनीमत होगी, जि‍सका शायद सि‍वाय मेरे और कि‍सी से कुछ लेना देना नहीं है। मुझे ये भी पता है कि दुश्‍वारि‍यों की दरख्‍वास्‍त बड़े ही कमजोर पन्‍नों और बड़ी ही फीकी स्‍याही से लि‍खी होती है। पन्‍ना हाथ में लेते ही चि‍टककर टूट जाता है और हर्फ बेपढ़े ही उसी पन्‍ने में गीले होकर जज्‍ब हो जाते हैं। मैं ये भी जानता हूं कि मेरे चौंकने से न तो दुनि‍या चौंकती है, न तुम चौंकती हो और तुम्‍हारा वो मुखौटा तो बि‍लकुल भी नहीं चौंकता जो चौंकने से लेकर ऊपर से नीचे तक की सारी दरख्‍वास्‍तों को सांसों से जुड़ी एक तफरीह मानता है। 

Saturday, March 14, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-8

और फि‍र ऐसा वक्‍त आया जब हर गलत पर दोनों एक दूसरे की दाद देने लगे। आदमी ने सबसे पहले गलत बोलना शुरू कि‍या और औरत ने सबसे पहले उस गलत पर वाह की दाद दी। आदमी मुसलसल गलत बयान करता जाता था। भाषा और उसकी खूबसूरती को पूरी दुर्दांतता से नष्‍ट करता जाता था और जब जब जि‍तना भी क्रूर हुआ, हर क्रूरता के स्‍वागत में एक दाद बड़ी खामोशी से कि‍सी पुल से उसे नि‍हारते सबसे ऊंचे सुर में सराहती सहलाती हुई मि‍ली। दोनों के हाथों में बस औरत की ही पकड़ मजबूत थी जो पूरे जोर के साथ हथेलि‍यों को पकड़ती थी, दबाती थी और तफरीहन एक अंगूठे से दो उंगलि‍यों के बीच सहलाती थी। मुख्‍तसर में अगर इसे समेट दें तो दोनों एक दूसरे के साथ बेहद क्रूर होने की कोशि‍श करने की जद्दोजहद में हर गलत को दाद देते देते कुछ इस कदर मुलायम होते जा रहे थे कि उनका आने वाला वक्‍त चि‍ल्‍ला चि‍ल्‍लाकर उनके न हो पाने की बात बता रहा था, पर दाद के शोर में और अंगूठे के जोर में न तो वो सुनाई दे पा रहा था और न ही उसका अहसास हो पा रहा था। ये वो वक्‍त था जब दोनों उस हरी बेंच पर बैठकर हवाओं के चलने और सामने लगे झंडे का लहराकर और बलखाकर भी उड़ने का इंतजार करते हुए एक दूसरे से हवाओं के न चलने की शि‍कायत कि‍या करते थे, लेकि‍न उनकी लाख शि‍कायतों के बीच गलति‍यों का एक बीज फूटकर अपनी हरी पत्‍ति‍यां बाहर फेंक चुका था और हर पत्‍ती के साथ एक मनमोहना फूल जानबूझकर नजरअंदाज की जाने वाली गलति‍यों के साथ खि‍ल रहा था। उन्‍हें बि‍लकुल भी इसकी परवाह नहीं थी और जो होनी भी नहीं थी क्‍योंकि जो हो रहा था वो सबकुछ अपने आप बस होता ही जा रहा था। उसे होने से रोकना चाहते हुए भी, जि‍समें कि‍सी को कुछ साबि‍त नहीं करना था या कि‍सी को उसे होने के बारे में सोचना भी नहीं था, वो दोनों कुछ ऐसे लम्‍हों की बुनावट में लगे थे, जि‍नकी सलाइयों ने पहले के आठ फंदे ही इस कदर उलझा दि‍ए कि उन्‍हें सुलझाते सुलझाते दोनों को कब ये लगने लगा कि दोनों पुराने हो गए हैं, पता नही नहीं चला। इस पता न चलने या पता न चलने देने की जबरदस्‍ती ने दोनों को कब उस बेंच से उठाकर हरे मैदान में बैठा दि‍या, कब दोनों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जि‍द में बाजार ने उन्‍हें हाथोहाथ लि‍या, इसका जि‍क्र बेकार है। बल्‍कि बेकार वो सबकुछ ही है, जो है और जो होने से बचा हुआ है, वो भी। 

Thursday, March 12, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 7

आखि‍रकार उसकी जिंदगी में एक ऐसा वक्‍त आया, जब उसे लगने लगा कि इस दुनि‍या में जो कुछ भी बाकी बचा रह गया है, वह सबकुछ एकसाथ मि‍लकर उसके सि‍र पर एक दि‍न कुछ यूं गि‍रेगा कि उसकी और उस जहाज की तबाही में कोई खास अंतर न रह जाएगा, जो एक दि‍न कहीं जाने को तो नि‍कला था, लेकि‍न उसका आखि‍री पुर्जा भी कि‍नारों तक पहुंचने में सि‍रे से नाकामयाब रहा। उसे लगने लगा कि सारा दोष उसकी शक्‍ल का है, उसे यकीन होने लगा कि उसके बालों से सि‍तारे बार बार उलझ जाते हैं और उसे ये भी लगने लगा कि अगर इस शक्‍ल को जल्‍द हटाया न गया तो दुनि‍या के उस बोझ से उसे मुक्‍ति नहीं मि‍लने वाली। मुक्‍ति की उसने नई नई परि‍भाषाएं गढ़नी शुरू कर दीं जि‍समें से एक उस मासूम के चेहरे से भी होकर गुजरती थी जि‍सकी मासूमि‍यत को वो ढाल बनाकर दुनि‍या के आगे आकर खड़ी होती थी, बगैर ये सोचे कि मासूम चीजें ढाल नहीं हुआ करतीं। कुछ ऐसी भी परि‍भाषाएं बनीं जो अपनी जगह ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थीं पर इतनी लि‍जलि‍जी थीं कि दूसरों पर वो रोज ब रोज चि‍पकाई जाने लगीं। वो सोचना चाहती थी या नहीं, ये बात ज्‍यादा सोचने की नहीं, असल बात ये है कि वो करती क्‍या थी और उसका दुनि‍या पर फर्क क्‍या पड़ता था। खुद को छुपाने और बेखुद को दि‍खाने के अलावा भी दुनि‍या थी कि बहुत कुछ देखना चाहती थी और कमोबेश देख भी लेती थी। औरत के मन की रातें तक दुनि‍या के सामने कुछ यूं उजली बि‍खरी पड़ी थीं ज्‍यूं कि खुले काले आसमान में सारे सि‍तारे छि‍तराए रहते हैं। उसके भीतर का आदमी जि‍स रास्‍ते पर जा रहा था, गि‍रते पड़ते और अक्‍सर तो लड़ते लड़ते वो भी उसी रास्‍ते पर कदम बढ़ा रही थी जो आगे से बंद था, जि‍स रास्‍ते से आगे जाने का सि‍लसि‍ला शुरू होने के साथ ही अपने अंत की भवि‍ष्‍यवाणी लेकर उस औरत की मुट्ठी में बंद था। लेकि‍न ये औरत ही थी जो मुट्ठी खोलने को तैयार नहीं थी। आदमी था कि आगे बंद रास्‍ते की तरफ बढ़ा जा रहा था। औरत दूर से आदमी का पीछा कर रही थी, बड़बड़ाते, गालि‍यां देते और बार बार मुखौटे बदल बदलकर।  

Tuesday, March 3, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-6

आदमी का मन है कि मन से बाहर बस यूं ही नि‍कल जाता है, पर मन सी बात कहीं पाता है-नहीं पाता है इसकी खबर लि‍ए बगैर ही मन से बाहर नि‍कलता और अक्‍सर तो बहता चला जाता है। औरत का मन है कि मन ही मन सि‍मटा और बगलों में चि‍पका कभी कभी सड़कों पर बेतरतीब घि‍सटता चला जाता है। आदमी फूटना चाहता है और औरत महसूस करना चाहती है। आदमी मन में बात करते करते बीत जाना चाहता है, औरत एक मजबूत जकड़न में जकड़े जकड़े रीतती जाती है। आदमी सामने लगे झंडे की बात करता है, औरत उसे उड़ाने वाली हवा की। आदमी को भूख भी लगी है, औरत को चाय की इच्‍छा है। आदमी रोना चाहकर भी नहीं रो सकता, औरत न चाहते हुए भी बार बार रो देती है। आदमी का मन, मन से जैसे ही बाहर आना चाहता है, औरत का मन झट से कहीं छुप जाता है। इस बीच हवा थोड़ी सी तेज चलती है, आदमी जैकेट पहन लेता है। औरत एक और वादा चाहती है, आदमी मन ही मन मुस्‍कुरा देता है। आदमी सपने देखता है, औरत कहती है कि वो सपनों से घबराती है क्‍योंकि उसे अकेले मरने के सपने आते हैं और यकीनन ये एक सार्वभौम सपना होगा जो ति‍रछी नजरों से नहीं देखा जाता होगा, जो बेइमानी के साथ कभी न बरता गया होगा। एक दिन आदमी ने औरत को एक सपना बताया। इसमें न आप था, न तुम था। जो था वो बस एक शायद था। ठीक दूसरे दि‍न औरत ने भी वही सपना देखा। दोनों अपने अपने सपनों में घि‍सट रहे थे, लोग दोनों को दोनों तरफ से खींच खींचकर आधा कर देना चाहते थे। पहले से ही दोनों की आधी जान और पूरा मन सपनों में ही जज्‍ब हो रहे थे, उसपर ये शायद के बाद की दुनि‍या, जि‍से कोई भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहा था। सपनों में घसीटे जाने से ऊबकर दोनों ने एक दूसरे पर शर्तें लादने का नया दौर शुरू कर दि‍या। असल में ये दौर नहीं बल्‍कि शुरुआती मुफलि‍सी का मन में दायर वो मुकदमा था जि‍समें न तो मुद्दई था और न गवाह। न वकील था और न ही कोई मुंशी। दोनों जज थे और वो भी दोनों की तरफ पीठ कि‍ए हुए। कैसी अजीब पीठ थी उस मुकदमे की जि‍सके जज ही शायद की दुनि‍या में आकर एक दूसरे पर शर्त दर शर्त दुश्‍मन बने जाते थे। आदमी हंसता है कि वि‍दा का गीत दोनों ने शुरुआत से ही पढ़ा था। आंगन में बच्‍चा खि‍ला लेने की ख्‍वाहि‍श से लेकर जांघों की मछलि‍यों को एक साथ बरता था।
(जारी...)

मि‍लेगा तो देखेंगे-इंट्रो- विपुमेले में हि‍ले हुए को कैसे देखें

हि‍लते-हि‍लते शुरू होता है। क्‍या मजाल दि‍न कि‍सी भी दि‍न चैन से शुरू हो। कैसी उम्‍मीद भरी नजरों से देखता हूं, मायूसि‍यों के डूबे समंदर में बेहयाई से इस हि‍लन को थामकर सुस्‍थि‍रता की तरकीब हासि‍ल करने को हाथ पैर पटकता हूं, मगर दि‍न की तो कोई क्‍या कहे, हरामखोर डोंगल तक जो अपनी जगह सुस्‍थि‍र रहे, कनेक्‍ट होता नहीं कि डि‍स्‍कनेक्‍ट होता हूं। ओह... कैसा हिलता हुआ डोंगल है और कैसे हि‍ले हुए दि‍न। बेवकूफ लोग क्‍या जानें, क्‍या हमारी हसरत थी, खूब थी कि हम भी तीन नई कि‍ताबों के कवर के साथ फोटो खिंचाएं। मगर क्‍या मजाल कि फोटो चैन से खिंच जाए, वह भी साली मि‍ली, तो हि‍ली हि‍ली। एक प्रेम था ठहरा हुआ, चल रहा सा, मगर आज खबर हुई कि वह भी अपनी जगह था हि‍ला-हि‍ला सा। सन्‍न हूं... यह कैसा दौर है? कैसा समय है? कैसे लोग हैं? और कैसा मैं हूं? इतने हैं फोटो लहरा रहे, क्‍या क्‍या हि‍ला रहे, फि‍र ऐसा क्‍यों है कि मैं ही हि‍ला हि‍ला हुआ हूं? दि‍खता हूं कभी कभी पुस्‍तक मेलों में खुद को, मगर वह सुस्‍थि‍र मैं नहीं, 'मेरा मैं' हि‍ला हुआ है।

मेरे महबूब तुम्‍हारा शुक्रि‍या कि तुमने ऐसा हि‍लाया।

Monday, March 2, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 5

जब भी आदमी अपने मन को माशूक कर थोड़ा सा भी मुलायम होने की सोचता, मन के सारे कोने कमरे की हर ओर से नि‍कलकर एक साथ आ खड़े होते और शोर करने लगते। ये लालसा भी आदमी को उस शोर से बाहर न नि‍काल पाती जो कोने दर कोने उसके मन में पैवस्‍त हुए जाते थे। औरत बार बार भरोसा दि‍लाती थी, आंखों में मन को उतारती थी, हवाओं को बि‍छा देती थी, पहाड़ों में लहलहा उठती थी और टटोलने पर फूटकर बहने भी लगती थी। आदमी कुछ और कमजोर होकर कहता था कि वो यूं ही फूटकर बह जाएगी और उसके लब एक एक कतरा आब को यूं ही तरसते रहेंगे, बजाय इसके भी मन उस आब का माशूक है और आइंदा भी बना रहेगा। पहाड़ी नदी ने पत्‍थर पर कई कतरे बना डाले थे जि‍नमें से बूंद बूंद पानी पत्‍थर और उस नदी के होने तक रि‍सता रहेगा। ये एक सोची समझी नि‍यति थी जो लाख मुफलि‍स वक्‍तों के होते हुए तय हो चुकी थी। आदमी को गुमान था कि वो होनी को टाल सकता है, औरत को यकीन था कि वो होनी को पलट सकती है। दोनों के मन का शोर उस मैदान में होते शोर के साथ बढ़ता जा रहा था, जो कई तारीखों का नया गवाह हुआ होना चाहता था। उस तनहा झंडे के साथ फैलता जा रहा था जो खुद ब खुद चमकने में नाकामयाब था, जि‍स दि‍न में दि‍न की तो रात में बि‍जली सी रोशनी की हर वक्‍त जरूरत थी, जो खुद लहराने या फहरने में भी कि‍सी काम का न था अगर हवा न चले। कोने थे कि चुपके से कैसे आकर कमरे में खड़े हो जाते थे, शोर की उस डूब में पता ही न चलता था, लेकि‍न जब झिंझोड़ते थे तो दोनों उठ-उठकर अलग अलग या एक ही दि‍शा में बगैर एक दूसरे को देखे भागने लगते थे। इन सब के बीच कठोर हाथों में जो हाथ था, वो अपनी मुलायमि‍यत न खोने के लि‍ए दूसरे हाथ से लड़ रहा था, पर बार बार हारकर मायूस बैठ जाता था या कान में कुछ बुदबुदाने लगता था। कहीं भी न जाने का ये वक्‍त दोनों को बेंच से लगातार उठने को मजबूर कर रहा था और दोनों ने खुद भी कहीं न पहुंचने का शाप अपनी अपनी मर्जी से चुना। दोनों भागने के लि‍ए बैठे रहे। इस बीच हाथ उन सारी खुशबुओं को याद करने के लि‍ए उनके कोनों में दुबका रहा, जो अभी तक नि‍कलकर कमरे में आने की हि‍म्‍मत नहीं कर पाए हैं, पर जि‍नका आना होना है और होना ही आ जाना।

Sunday, March 1, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 4

कि‍तनी बार तो उसने औरत से कहा कि वो उसके मन सी नहीं थी और उसका मन भी उसके मन सा नहीं था, इसीलि‍ए जो था, वो मन नहीं था और जो नहीं था, वो अरगनी पर लटकी आस्‍था की मानिंद चि‍ढ़ा रही थी। जाने कैसा वो वक्‍त था, जाने कैसी वो हवा थी, जाने कैसा वो खोल था और जाने कैसे वो आदमी-औरत थे जो बार बार अपने मन मुताबि‍क मरने का वादा लेकर अपनी बेहूदी आस्‍थानुमा मायूसि‍यों को थोड़ा और पुख्‍ता कर लेना चाहते थे। ये पत्‍थर पर जबरदस्‍ती उगती काई जैसी को अनचाही इच्‍छा ही रही होगी जि‍सपर फि‍सल कर जबरस्‍ती की आस्‍थाएं और मायूसि‍यां अपने पूरी होने की ताकत के साथ आत्‍मा पर गि‍रती हैं और अपने आने को ही खोते हुए एक दरार पैदा करके आगे बढ़ जाती हैं। आदमी बार बार उससे कहकर बगैर नाप का एक और गड्ढा खोदता था कि तुम जिंदा रहना ताकि मुझे मरते हुए देख सको या मेरे मरने की खबर तो पा सको। औरत फि‍र से डर जाती थी कि मरने पर, मन से मरने की एकाधि‍कृत आस्‍था उसी की है, जो गड्ढा उसने खुद बाकायदा नाप के साथ खोदा है, वो कि‍सी और का कैसे हो सकता है। अगर मायूसि‍यों की प्रमेय हर कोई सिद्ध करने लगे तो वो पाइथागोरस का नंगा बदन जली कोठी के कूड़ेदान में ही फेंक दि‍ए जाने काबि‍ल है। बाद में भले ही कोई जेसीबी उसे कूड़े के साथ उठाकर डंपिंग ग्राउंड में फेंक आए, जहां वो टनों कूड़े के नीचे अनगि‍नत सालों तक के लि‍ए दबा रहे और दबा दबा एकदि‍न यूं ही खाद बनकर मि‍ट्टी में मि‍ल जाए। पर उससे भी मुसीबत का अंत न होना था क्‍योंकि डंपिंग ग्राउंड में भी गाहे बगाहे हरी दूब उग ही आती है। कभी कि‍सी से भी खफा न होने वाली दूब, कभी कि‍सी का भी अहि‍त न करने वाली दूब, हमेशा दूसरों का पेट भरने वाली आत्‍मा पर उगी वो दूब आत्‍मा के डंपिग ग्राउंड में हमेशा खाकर खत्‍म कर दी जाती है, लेकि‍न कभी मरती नहीं, हरी होकर उग ही आती है। इंसान की मुसीबतें हरी दूब की तरह हर कहीं उग आने को बेताब हैं। मायूसि‍यों की फि‍सलन हर काठ पर फंफूद की तरह फूटती रहती हैं। आस्‍थाओं की काई हर पत्‍थर पर जमी पसरी है और इनमें से कोई भी ऐसा सुचालक नहीं, जो एक रात को कि‍सी एक दि‍न से भी जोड़े या जो हवाओं का मन बताकर आत्‍मा में एक बि‍जली कौंधा सके। ये सब तो बस एक मुफलि‍सी थी जो दोनों के मन में बराबरी में दायर थी। जज दो थे, अदालत एक थी।  
(जारी...)

Saturday, February 28, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-3

अभी कुछ दि‍न पहले ही तो, आदमी फि‍र से उसी लंबोतरी बेंच के पास गया, जहां कभी उसका मन बैठा था। उस कुर्सी पर उजाला तामीर था जि‍से देखकर आदमी बुरी तरह से घबरा गया और तुरंत दूर का वो कोना तलाश कि‍या, जहां अंधेरा बरस रहा था। उस बरसते अंधेरे में लेटकर आदमी बहुत देर तक उस कुर्सी और उसपर तामीर होता उजाला टुकुर टुकुर ताकता रहा, मरघि‍ल्‍ले मन के कुपोषि‍त पि‍ल्‍ले को दि‍लासा देता रहा कि शायद कि‍सी दि‍न उस कुर्सी से उजाला दूर हो जाएगा और वो दोबारा उस कुर्सी पर जाकर बैठ पाएगा, लेकि‍न देर रात तक अंधेरे में ताकते ताकते जब भीड़ भगाई जाने लगी, तब उसे वि‍श्‍वास हुआ कि वो तो अभी भी उसी भीड़ का ही एक हि‍स्‍सा है जो रात दि‍न अभि‍शप्‍त है कड़वा खाने और खि‍लाने के लि‍ए। बेवजह की सर्दी से ठि‍ठुरते हुए आधी बांह की शर्ट में अपनी दोनों बाहों को खुद ही रगड़कर गर्म करने की कवायद में आदमी अभी तक नहीं भूला कि मन का लगना कुछ दि‍नों में भूल जाने की वो सलाह क्‍या सच में सलाह थी या कोई सोची समझी बेइमानी, जो पूरी तरह से प्रोग्राम करके बरती गई। आदमी का मन कड़वा होकर कहीं थूक आने का भी नहीं हो रहा था, बल्‍कि बेइमानी को बरतते हुए उसे कुछ देर और चूसने और उसका सारा रस नि‍कालकर उसी लंबोतरी बेंच के पास फेंक आने का हो रहा था, जहां उसने अपने मन को कुछ दि‍न पहले बैठा देखा था। हवा उस दि‍न भी बेइमान थी, औरत के बालों से बरबस ही खेलकर उसे वो नकाब दे रही थी जि‍समें हर कि‍सी के पीछे मन भर उजाला दि‍खता है, हवा उस दि‍न भी बेइमान ही थी जब आदमी दोबारा उस बेंच पर गया। इस बार आदमी ने पाया कि लोग बेइमान या ईमानदार नहीं होते, हवाएं उन्‍हें ऐसा दि‍खाती हैं।
(जारी...)

Thursday, February 26, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-1

पूरी रात अंधेरा बरस रहा है, लेकि‍न क्‍या मजाल जो उठकर आदमी खि‍ड़की की चिटखनी खोल दे या बि‍जली का बल्‍ब दबाकर उजाला फैलाकर उस उजाले के फैलाव में मन को तनि‍क भी समेट ले। अंधेरा बरस बरस के पूरे कमरे को तर करता जा रहा है और आदमी है कि मन की मायूसि‍यों से उतनी ही बदतमीजी से चि‍पका हुआ है, जि‍तना कि वो औरत कभी उसे जबरदस्‍ती घसीटकर खुद से इतनी जोर से चि‍पकाती थी कि आदमी को ही डर लगने लगता था कि वो जिंदा रहेगा या इसी पल अल्‍ला मियां का दरवाजा खटखटा रहा होगा। उठकर बैठना या बैठकर खड़ा होना या खड़ा होकर चल देना आदमी के लि‍ए इतना मुश्‍कि‍ल कभी नहीं रहा, जि‍तना कि इस बरसते में ख्‍वाबों को कालि‍ख से बचाना लगा। क्‍या था आखि‍र, एक मुर्दा मन ही तो, जो न तो दफन था और न ही अपनी कब्र से बाहर था। चौकोर कमरे में बनी खुली कब्र में एक छत का बस भ्रम था जो उसपर लटके पंखे की तरह खराब हो होकर बार बार बस यही दि‍लासा देना चाहता था कि पंखा चलेगा और एक दि‍न जरूर चलेगा। ...और पंखे को नहीं ही चलना था जि‍सका कारण भी उतना ही साधारण था, जि‍तना अंधेरे का बेवजह बरसते जाना या जि‍तना मन के मरघि‍ल्‍ले पि‍ल्‍ले का कि‍सी गाड़ी के नीचे आकर कुचलकर मर जाना। फि‍र भी, सवाल ये नहीं कि जिंदा कौन रहना चाहता था, सवाल ये है कि मरना कौन चाहता था। लगातार बरसता अंधेरा या उजाले के फैलाव की प्राचीन इच्‍छा या मरघि‍ल्‍ला मन, जो बार बार आशा की नजर से उस अनजान चेहरे की तरफ बार बार यूं ही देखता था और बार बार दुत्‍कारे जाने के बावजूद दो घड़ी आसमान की तरफ देखने के बाद फि‍र उसी चेहरे की तरफ देखने लगता था।
(जारी...)

Sunday, September 14, 2014

The Ant: चींटी

जब भी चींटी की मम्‍मी और चौकसी चाची आपस में मि‍लते, चींटी बेचारी इतनी बोर होती, इतनी बोर होती कि तकि‍ए के नीचे मुंह छुपाने पर भी मम्‍मी और चौकसी चाची की चि‍कचि‍क लगातार कान में कुछ इस तरह से जाती, जैसे कान में दर्द होने पर टपकाई जाने वाली दवा जाती है। दरअसल चौकसी चाची के पास पूरे मोहल्‍ले के बच्‍चों की खबर रहती जि‍से चींटी की मम्‍मी बड़े चाव से सुनतीं। पर चींटी अपनी छोड़, दूसरों की बड़ाई सुनना ही नहीं चाहती थी। इस बार जब चौकसी चाची चींटी के घर आईं तो चींटी ने चुपचाप अपने जूते पहनने शुरू कर दि‍ए। वो तुरंत पास वाले पार्क में जाकर चिंटू और वि‍क्‍की के साथ गेंदताड़ी खेलना चाहती थी और ये भी चाहती थी कि मम्‍मी और चौकसी चाची की वो फालतू वाली चि‍कचि‍क उसे सुनाई ना पड़े। लेकि‍न चींटी के छठें जूते में एक छेद था और वो पहले भी तीन बार अपनी मम्‍मी से बता चुकी थी। मम्‍मी ने उसे वादा कि‍या था कि मधु आंटी के छत्‍ते से वो बहुत जल्‍द मोम लाएगी और उसका जूता जोड़ देंगी। पर मधु आंटी तो पि‍छले छह दि‍नों से अपने छत्‍ते में आई ही नहीं थी। चींटी की मम्‍मी वहां तक गई भी थीं कि अगर मधु आंटी होंगी तो मोम के साथ दो बूंद शहद भी दे देंगी। शहद के नाम से तो चींटी क्‍या, चींटी के 24 भाई बहनों के मुंह से पानी बहने लगता था।

तो इस बार चींटी ने अपना जूता ठीक करने के लि‍ए एक जुगत लगाई। उसने पड़ोस में रहने वाली पि‍न्‍नी को साथ लि‍या और दोनों लोग घास के मैदान में पहुंच गए। एक छोटी सी घास की पत्‍ती दोनों ने मि‍लकर तोड़नी शुरू की। पर पत्‍ती बड़ी मजबूत थी। चींटी और पि‍न्‍नी ने मि‍लकर खींचा पर पत्‍ती नहीं टूटी। इस खींचतान में चींटी के छठें जूते में जो छेद था, वो और बड़़ा हो गया और जूते से चींटी का एक अंगूठा बाहर झांकने लगा। चींटी परेशान हो गई। अब तो ये छेद मोम से भी नहीं जुड़ने वाला और अगर कि‍सी तरह से मम्‍मी ने इसे मोम से जोड़ भी दि‍या तो पार्क में एक मैच में ही सारा मोम पि‍घल जाएगा और चींटी को जो बेहतरीन फि‍ल्‍डर का खि‍ताब मि‍ला था, वो भी छि‍न जाएगा। चींटी और पि‍न्‍नी घास नोंचने की मेहनत से थककर आराम से पार्क की बेंच के हैंडि‍ल पर लेट गए और दूसरी जुगत सोचने लगे। तभी पि‍न्‍नी को वि‍क्‍की जाता दि‍खाई दि‍या। उसने वि‍क्‍की को आवाज लगाई तो वि‍क्‍की भी अपने सारे पैर बड़े मन से इधर उधर डोलाते हुए उस बेंच के बगल लगे लैंपपोस्‍ट के नीचे पहुंचा और लैंपपोस्‍ट पर चढ़ गया। पि‍न्‍नी ने जब उससे कहा कि चींटी का छठां जूता आज टूट गया है और वो फि‍ल्‍डिंग नहीं कर पाएगी तब जाकर वि‍क्‍की के समझ में आया कि उसे चींटी के पास जाना चाहि‍ए था, न कि लैंपपोस्‍ट पर चढ़कर आराम से दूर दूर देखना चाहि‍ए था।

इतना समझ में आना था कि वि‍क्‍की के दि‍माग में एक जुगत आई। उसने चिंटू को आवाज लगाई, चिंटू ने अप्‍पू को और अप्‍पू ने चालाक चमचे चींटे को। चींटे को जब आवाज सुनाई दी तब वो अपने घर में बैठकर धौंकनी में हवा भर रहा था और उसके पापा इस साल फसल काटने के लि‍ए आग में हंसि‍या तपा तपाकर तेज कर रहे थे। अप्‍पू की आवाज आने का मतलब था कि जरूर कहीं कोई इमरजेंसी है, पर चींटा बेचारा अपने पापा को अकेले काम करता कैसे छोड़े। चींटा वहां से नि‍कलने की जुगत सोच ही रहा था कि उसके पापा ने उसे कुल्‍हाड़ी और उसकी बेंत दी और उसे धनोकू बढ़ई से ठीक कराके लाने को कहा। चींटे को तो जैसे मन का काम मि‍ल गया। उसने एक हाथ में बगैर बेंत लगी कुल्‍हाड़ी ली और कंधे पर कुल्‍हाड़ी का बेंत रखा और घर से मटकते मटकते धनोकू के यहां जाने को नि‍कला। हालांकि चींटे को पता था कि गली के बाहर अप्‍पू आवाज लगाकर उसी का इंतजार कर रहा है। चींटा अपने सारे सामान के साथ जैसे ही गली से बाहर नि‍कला, अप्‍पू ने उसे बताया कि वि‍क्‍की ने पार्क के लैंपपोस्‍ट पर चढ़कर सबको आवाज लगाई है, जरूर कुछ गड़बड़ हुई है और हम सबको जल्‍दी से जल्‍दी पार्क में पहुंचना चाहि‍ए। चींटे ने अप्‍पू से कहा कि पहले वो वो वाला काम कर ले, जो पापा ने उससे कहा है। इसपर अप्‍पू ने तुरंत चींटे को अपनी सूंड़ पर बैठा लि‍या और आनन फानन में दोनों धनोकू बढ़ई के पास पहुंचे। हांफते हुए अप्‍पू ने धनोकू बढ़ई से कहा कि जल्‍दी जल्‍दी से कुल्‍हाड़ी में बेंत लगा दो, हम लोगों को बहुत जल्‍दी जल्‍दी एक जगह पहुंचना है। धनोकू ने पांच मि‍नट में कुल्‍हाड़ी में बेंत लगा दि‍या और दो खपच्‍ची फंसाकर उसे खूब मजबूत भी कर दि‍या। अप्‍पू और चींटा वहां से भागे तो सीधे पार्क में लगे लैंपपोस्‍ट के बगल पहुंचे, उसी लैंपपोस्‍ट के बगल, जहां से चिंटू ने आवाज लगाई थी।

ओह... तो जूते में छेद हो गया है। अप्‍पू बोला। उधर जूते में हुए छेद से ज्‍यादा न खेल पाने से परेशान चींटी बेचारी रुंआसी भी हो रही थी। पि‍न्‍नी जो थी, वो चींटी को तरह तरह की कवि‍ता सुनाकर हंसाने की कोशि‍श कर रही थी। पि‍न्‍नी ने चींटी को सुनाया-

चकमक चकमक चि‍कचि‍क चि‍कचि‍क
ट्यूब से नि‍कली पि‍चपि‍च पि‍चपि‍च
अंदर डाला सारा पेस्‍ट
एक बूंद भी हुआ ना वेस्‍ट।

पर चींटी थी कि हंसने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसके दि‍माग में तो बस आज का मैच, जो वो अपने फटे जूते की वजह से नहीं खेल पा रही थी, वही चल रहा था। इतने में चींटे ने थोड़ा दि‍माग लगाया। चींटे से और थोड़ा ज्‍यादा दि‍माग अप्‍पू ने लगाया। चींटा भागा भागा गया और पार्क में से एक घास उसी कुल्‍हाड़ी से काट लाया। उधर अप्‍पू ने चिंटू और वि‍क्‍की को अपने ऊपर बैठाया और मधु आंटी के छत्‍ते के नीचे पहुंच गया। अप्‍पू के सि‍र पर चिंटू चढ़ा और चिंटू के सि‍र पर वि‍क्‍की। वि‍क्‍की कि‍सी तरह से छत्‍ते से एक बूंद मोम तोड़ने में कामयाब हो गया। मधु आंटी ने जब वि‍क्‍की को ये करते देखा तो उससे पूछा। वि‍क्‍की ने मधु आंटी को बताया कि चींटी के छठें जूते में एक छेद हो गया है और उसका अंगूठा भी जूते के बाहर आकर दि‍ख रहा है। हम सबको चींटी का जूता जोड़ना है। इतना सुनना था कि मधु आंटी भी सुई धागा लेकर अप्‍पू, चिंटू और वि‍क्‍की के साथ पार्क की तरफ उड़ चलीं।

पार्क पहुंचकर मधु आंटी ने पहले तो चींटी के छठें जूते के छेद को घास से ढंक दि‍या और फि‍र उसे चारों तरफ मोम से पैक कर दि‍या। सुई धागे से मधु आंटी ने जैसे ही जूते के छेद में गांठ मारी, चींटी खुशी से चीख पड़ी और पार्क में हर तरफ दौड़ने लगी। और पता है... उस दि‍न चौकसी आंटी की चि‍कचि‍क से दूर चींटी ने चार कैच पकड़े। चींटी की पूरी टीम खुश थी और अप्‍पू ने चींटी को अपनी सूंड़ पर बैठाकर पूरे मुहल्‍ले की सैर भी कराई।

Tuesday, September 2, 2014

Once upon a time: एक समय की बात है

एक समय की बात है। दुनि‍या के एक पि‍छड़े देश को और न पि‍छड़ने देने की जि‍द लेकर छोटे से एक शहर का लड़के ने उस देश की राजधानी जाने की सोची। लड़के के मन में था कि वह राजा से मि‍लेगा और देश को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, उसपर बनाई अपनी त्रि‍कालजयीयोजना को वि‍स्‍तार से राजा को बताएगा। राजा खुश होगा और लड़के को ढेर सारी अशरफि‍यां ईनाम में देकर तुरंत उसके लि‍ए कार्यालय से लेकर योजना को कार्यान्‍वयि‍त कि‍ए जाने के लि‍ए कर्मचारी भर्ती कर देगा। लड़के ने उस समय के अंतरजाल पर पता कि‍या तो पता चला कि राजा को अपनी बनाई त्रि‍कालजयी योजना बताने के लि‍ए उसे कुछ खास डि‍ग्रि‍यों की जरूरत है। उन डि‍ग्रि‍यों के बगैर उसकी योजना में राजा तो दूर, उसका दरबान तक रुचि नहीं लेगा। लड़के ने दि‍न रात मेहनत की, बेईमानी भी की और कि‍सी तरह से अंतरजाल पर बताई गई डिग्रि‍यों में से एक को लेने में कामयाब हो गया। इतना सब करने के बाद लड़का राजधानी पहुंचा और राजधानी से सटे एक गांव में दो बटा दो के एक कमरे में रहने लगा। हमेशा खुले या बड़ी जगहों पर रहने के आदी इस लड़के को वह दो बटा दो का कमरा सोचने से मना करने लगा। अपनी सोच को वह दाएं लेकर जाता तो दो कदम पर दीवार आ जाती, बाएं लेकर जाता तो फि‍र से दीवार। यह दीवार उसकी सोच को दुनि‍या से नहीं जुड़ने दे रही थी। यहां तक कि रसोई में भी वह खुलकर अंगड़ाई न ले पाता तो उसकी सोच सरसों के तेल के गरम झाग से कहीं ऐसी जगह जाकर गुम हो जाती, फि‍र तो उसे अपनी सोच को तलाशने में ही कई दि‍न लग जाते। लोग कहेंगे कि रसोई में अंगड़ाई लेने का क्‍या तुक है तो लोगों को समझना होगा कि लड़का गरीब भी हो सकता है और गरीब की आंख खुलती है तो वह सबसे पहले रसोई में बच रहे दाने तलाशती है न कि बगल में रखी बेड टी की चुस्‍की। कई सालों तक अपनी सोच को दो बटा दो के कमरे की दीवारों में टकराने के बाद जब आखि‍रकार झन्‍नाहट नि‍कली तो लड़का भागा। भागते भागते वह राजधानी पहुंच गया। हालांकि वह कमोबेश राजधानी में ही था, पर राजधानी के उन इलाकों में था जो अक्‍सर अंधेरे में डूबे रहते थे। इस बार लड़के ने सोच रखा था कि न तो अंधेरे में सोचेगा, बल्‍कि कहीं की दीवारें उसकी सोच को प्रभावि‍त नहीं कर सकेंगी। काफी जि‍द करने के बाद, कई दि‍न तक अपने आश्रयदाता की नाक में दम करने के बाद लड़के को उसके आश्रयदाता ने राजधानी में रहने वाली अपनी एक बहन के पास भेजा। वहां लड़के को बहुत बड़ा घर मि‍ला। पि‍छले घर में तो सोच तो दीवारों से कैद होती ही थी, शौच वगैरह के लि‍ए भी बस दो कदम चलना होता था। मगर इस बार, इस नए घर में सोच के लि‍ए हमेशा दरवाजा खुला रहता था। हालांकि इस बार नि‍त्‍यक्रि‍या के लि‍ए लड़के को छाता लेकर नि‍कलना होता था, क्‍योंकि अगर बरसात होती तो नि‍त्‍यक्रि‍या स्‍थल तक पहुंचते पहुंचते लड़का पानी से तर बतर हो जाता। नए घर में लड़के की सोच को न सिर्फ आसमान मि‍ला, बल्‍कि एक बड़ा सा आंगन भी मि‍ला जो उसे रोज बगैर सोचे समझे साफ करना पड़ता था। इसी बीच उस देश में बड़ा तूफान आया। पानी नहीं बरसा, आंधी नहीं चली, पेड़ नहीं उखड़े, बस एक बड़ा तूफान आया और पुराने राजा को अपने साथ उड़ा ले गया। नया राजा आया जो न सिर्फ खराब और डरावना दि‍खता था, बल्‍कि पड़ोसि‍यों ने लड़के को यह भी बताया कि नया राजा कहीं दक्‍खि‍न-पश्‍चि‍म में भयानक नरसंहार करके आया है। हालांकि आते वक्‍त राजा ने मशहूर तोइबातेई मसुनलेई स्‍नान कर लि‍या था जि‍ससे उसके शाही वस्‍त्रों पर से लगे खून के धब्‍बे तो हट गए थे, पर उसके पास जाने से सड़ी गली लाशों की बदबू आती है। पड़ोसि‍यों ने लड़के को यह भी बताया कि नया राजा रोज दो कटोरा खून पीकर दो कटोरा जहर नि‍कालता है और उस जहर को उसके खास सेवक देश के उत्‍तरी हि‍स्‍सों में तेजी से फैला रहे हैं। नए राजा के बारे में इतनी भयानक बातें सुनकर लड़के को इतना दुख हुआ कि वह आए दि‍न पेड़ लगाने लगा। पहले उसने अपना आंगन भरा, छत भरी और अपना नया बड़ा कमरा और नई बड़ी रसोई भी भर डाली। इसके बाद तो जहां भी उसे खाली जगह दि‍खे, टप से एक पेड़ लगा दे। एक दि‍न राजधानी की एक मशहूर जगह पर वह पेड़ लगा रहा था कि उसे एक लड़की मि‍ली। लड़की ने उसे देखा, फि‍र अपनी फटी फ्रॉक को देखा, फि‍र उसे देखा और मुस्‍कुरा दी। लड़के ने लड़की को देखा, मि‍ट्टी से सने अपने हाथों को देखा और फि‍र लड़की की मुस्‍कुराहट को देखा तो लपक कर उसके पास पहुंचा। उसने लड़की को बताया कि जबसे नया राजा आया है, उसका घर में मन नहीं लगता है। उसने अपने पूरे घर में सैकड़ों पौधे लगा डाले, तब भी उसका मन घर में नहीं लगा। अब वह बाहर पौधे लगा रहा है क्‍योंकि बचपन में जब वह कब्रि‍स्‍तान के बगल से अपने बाबू के साथ गुजरता था तो वहां की हरि‍याली देखकर बाबू से यही पूछता था कि यहां इतनी हरि‍याली कैसे। बाबू उसे बताते थे कि इंसान का जि‍स्‍म सबसे अच्‍छी खाद होता है। लड़के ने लड़की से यह भी शि‍कायत की कि बाबू ने उसे यह नहीं बताया कि इंसानी जि‍स्‍म पर कि‍स कि‍स तरह के पौधे अच्‍छी फसल देते हैं। लड़के का इतना कहना था कि अचानक सबकुछ गायब होने लगा। सब तरफ से धुंआ उठने लगा और सबकुछ गोल गोल घूमने लगा। यह एक अजीब तरह का तूफान था। इसमें सबकुछ गोल गोल घूम रहा था पर लड़का, उसका लगाया ताजा पेड़ और वो सारे मेहराब पहले की ही तरह अपनी जगह पर खड़े थे, राजा के भी सारे मेहराब पहले की ही तरह खड़े थे, बल्‍कि तूफान में और बड़े.... खूब बड़े होते चले जा रहे थे। जब तूफान गया तो लड़के ने अपने हाथ में एक स्‍मार्टफोन पाया। स्‍मार्टफोन की घंटी बज रही थी। अन्‍नोन नंबर था। लड़के ने फोन रि‍सीव कि‍या। दूसरी तरफ देश का राजा था जो उस देश के स्‍वतंत्रता दि‍वस पर बधाई दे रहा था और बोल रहा था कि वह राजा नहीं बल्‍कि सेवक है। रैंगलर का बैग भी लड़के ने लटका रखा था जि‍समें सैमसंग का एक लैपटॉप भी रखा था। लड़के ने लैपटॉप ऑन कि‍या और उसकी नजर फेसबुक पर गई। फेसबुक को देखते ही लड़का उसे पढ़ने लगा। कई सालों तक फेसबुक पढ़ने, स्‍टेटस अपडेट करने, लोगों की पोस्‍ट पर लाइक और कमेंट बनाने, तरह तरह की स्‍माईली बनाने के बाद लड़के ने पाया कि वह तो वहीं है, जहां पर खड़ा था। बल्‍कि अपने लगाए पेड़ में वह पानी डालना भूल गया था, वो तो गनीमत थी कि उस पेड़ के नीचे इंसानी लाशों का जखीरा था, इसलि‍ए पेड़ ने अपना आकार ले लि‍या था। 

अब लड़का घर वापस आ गया है। वह रोज अपना आंगन, बरतन, कपड़े साफ करता है। लड़का घर में पोंछा भी लगाता है और गमलों में पानी भी देता है। अब वह लड़का नहीं सोचता। कभी कभार फेसबुक पर आकर कि‍सी कि‍सी का स्‍टेटस या फोटो लाइक कर देता है क्‍योंकि उसमें सोचने की जरूरत नहीं पड़ती।

Tuesday, July 22, 2014

अंडरलाइन उदासी

फोटो- गार्जियन के लि‍ए एटकिंस भाई साब
आखि‍रीबार वो कब उदास हुआ होगा। अचानक ही ये सवाल उसके जेहन में कौंधा और चूंकि सवाल बावस्‍ता था तो जवाब खोजने की कोशि‍शें शुरू होनी भी लाजमी थीं। पर उदासी से जुड़ा ये सवाल उदास करने की बजाय परेशान ज्‍यादा कर रहा था क्‍योंकि डॉक्‍टर की दी गई गोलि‍यों को लगातार दि‍न में दो बार दो साल तक खाने के बाद उसे कई सारी चीजें भूल गई थीं। दि‍माग की हार्ड डि‍स्‍क से एक तरह से इरेज सी हो गई थीं। फि‍र भी सवाल मुंह बाए सामने खड़ा था और खुद से ही जवाब की दरकार कि‍ए जा रहा था।

कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। इस सवाल का जवाब खोजने में उसने कामवाली को चार बार डांटा और पांचवी बार दोबारा आने से मना कर दि‍या। उदासी का ये सवाल उसे चि‍ड़चि‍ड़ा कर रहा था पर बता के ही नहीं दे रहा था कि कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। क्‍यों नहीं उसने अपनी आखि‍री उदासी को अंडरलाइन करके कि‍सी वर्डफाइल में सेव कर रखा था। बोल्‍ड इटैलि‍क भी कर देता तो भी शायद काम चल जाता। पर दवाइयों का जो असर था, उनकी वजह से उसे वर्ड की वो फाइलें ही याद नहीं रह गई थीं जि‍नमें उसने अपनी उदासि‍यों को, अपनी खुशि‍यों को या अपनी कि‍सी भी चीज को अंडरलाइन कि‍या था। मतलब जवाब सामने तो था, पर जवाब सामने रखी कि‍न चीजों में था, ये याद नहीं। गनीमत रही कि सवाल उसे याद रहा।

आखि‍री बार की उदासी को पता लगाने के लि‍ए वो बाकायदा बाजार गया और लाला बैजनाथ की मूढ़ी संग प्‍याज की पकौड़ी जबरदस्‍ती उस लाल वाली चटनी के साथ खाई जो जबान पर आते ही जैसे कारबाइड की गैस बनाती थीं। सोचा कारबाइड से उसे कुछ याद आए। कारबाइड के साथ उसकी खुशी का पुराना रि‍श्‍ता रहा था। चाहे वो दि‍वाली हो या आम या केले का मौसम... कारबाइड उसके लि‍ए हमेशा खुशी लेकर आया था और तब तक उसने भोपाल की त्रासदि‍यां नहीं सुनी थीं, देखने की तो बात दूर की रही। बहरहाल, खुश होने की गैस मि‍लने के बावजूद मुसीबत बढ़ती जा रही थी क्‍योंकि उदासि‍यों की याद के जवाब के लि‍ए कमबख्‍त को ए बी या सी या डी का ऑप्‍शन भी नहीं दे रहा था जि‍ससे कि कम से कम तुक्‍का तो भि‍ड़ाया जा सकता था और वो उस तुक्‍के से संतुष्‍ट भी हो जाता क्‍योंकि कोई भी, सि‍वाय उसके, उस तुक्‍के को गलत नहीं ठहरा सकता था। जाहि‍र है कि ऑप्‍शन नहीं थे इसलि‍ए अब तक उसके पास कोई जवाब नहीं था।

ऐसा नहीं है कि सबकुछ एकसाथ गायब हुआ हो। हो ये रहा था कि एक लाइन याद आती थी फि‍र उसके दो दि‍न या चार महीने के बाद की लाइनें याद आती थीं। दि‍माग में गोले फूट रहे थे तो जीभ पर कभी गोले तो कभी कांटे उगने से परेशान वो बैठे बैठे उठ जाता था तो खड़े खड़े बैठना भी पड़ रहा था। सोचा कि कि‍सी को फोन करे, पर नहीं। सोचा कि शायद फेसबुक के टाइमलाइन पर हो, पर नहीं। सोचा कि शायद ब्‍लॉग में हो पर वहां भी नहीं। ऑरकुट तो पहले ही खत्‍म हो चुका था। उदासी की तलाश थी कि खाए जा रही थी, सि‍र धुने जा रही थी।

अचानक बत्‍ती जली। आखि‍रकार वो ये क्‍यों याद करना चाहता था कि वो आखि‍री बार कब उदास हुआ था। सवाल फि‍र से शुरू हो गए। जीभ पर गोले और कांटे फि‍र से बनने लगे। इस पर तो उंगलि‍यों में झनझनाहट भी हो रही थी। उसने तुरंत अपने साइकैट्रि‍स्‍ट को फोन लगाया। बताया कि एक बार फि‍र से उदास होना चाहता हूं। साइकैट्रि‍स्‍ट हंसा, तुरंत उसने दो दवाइयां नोट कराईं और बोला, ज्‍यादा उदास होने की जरूरत नहीं। अब वो नए तरीके से उदास होने लगा। उसने अभी तक वो दवाइयां नहीं खरीदी थीं। उसके पास उदासी की सबसे बड़ी वजह थी कि वो एक बार फि‍र से उदास होना चाहता था। साथ ही उसके पास अपने लि‍ए एक अच्‍छी खबर भी थी कि उसे उदासि‍यां याद नहीं आ रही थीं। 

Tuesday, May 27, 2014

हम एक गडकरी टाइप का कूलर ले आए हैं

हमरे मामा कहा करते हैं कि‍ जब भी बजार में मजूर लाने जाओ, कभी मोटा मजूर न चुनना। बैइठ के ससुरे बीड़ी फूंकते रहते हैं और चार मंजि‍ल चढ़ने पर हांफा छूट जाता है। यह लि‍ए ठोंक बजा के देख लेना, हड्डी से टन की आवाज आए तो समझ लेना कि‍ आदमी काम का है। 

और अब हम ये दावा खुद अपने आप पर ठोंकना चाहते हैं, हलांकि‍ जबसे मकान शि‍फ्ट कि‍ए हैं, हथौड़ी का जनी कहां हेरा गई है और दरवाजे पर टांगने वाला परदा रोज हमारे खटि‍या खाली करने के बाद खंचही खटि‍या की टूटी ओरदावन ढंकने के काम आ रहा है। इतने में हम बस यही सोचके संतोख कि‍ए हुए हैं कि‍ चलो... दरवाजा न सही, ओरदावन तो ढंकने के काम आ रहा है। बहरहाल, हमारा दावा अभी भी हमारे ऊपर ठुंका हुआ है कि हम बहुत मेनहती पुरुस हैं। और हमारी बात मान लीजि‍ए कि‍ रोज झाड़ू लगाना, खाना पकाना अउर बरतन धोना को न कभी भारतीय समाज मि‍नहत माना है ना मानेगा, तो ऊ तो हम रोज करते हैं पर हमको गि‍नवाने की दरकार नहीं है। ऊ कौनो मि‍नहत है जी... सब कर लेते हैं। असली मि‍नहत वाला काम तो अभी आगे आने वाला है।

हां तो पावती मि‍ले कि‍ परसों ही हम एक गडकरी टाइप का कूलर ले आए हैं। जैसा उसका साइज वैसा ही उसका भ्रष्‍टाचार। मने पूरा कमरा कि‍तनो गरम हो, आग से भकाभक जल रहा हो, मजाल है कि‍ पांच मि‍नट बाद चादर न ओढ़ा दे। अइसा तो हरहरा के चलता है कि‍ आखि‍री टाइम कब हम महायानी मुद्रा में लेटे थे, कब फि‍री होकर सोए, यादे नै आ रहा है। हमको अगर रच्‍चौ बि‍स्‍सास होता कि‍ हमारा पराकि‍रति‍क स्‍वरूप ई हमसे सोख लेगा, फूंक मारके सबकुछ उड़ा देगा, तो हम इसको लाते... मने सपनो में लाने की न सोचते, भले हमरे सपने की बैसाखी बार बार टूट जाती और भले ही करीना उसे फेवीकोल लगाके जोड़ देती। जादा सोचे नहीं, इसलि‍ए कूलर ले आए। सोचते तो पंखा भी न लेकर आते।

सुबइहैं हमारी नई कामवाली पूरी दरभंगा मेल बनी हुई आई औ झाड़ू खोदके उठाई कि‍ जल्‍दी से कूलर का कुछ करि‍ए, उसमें पानी एकदम दि‍खा ही नहीं रहा है। औ टेंट भी ढीली करि‍ए, हमको दू सौ रुपि‍या चाहि‍ए और दूध का पइसा अलग से दीजि‍ए। हम उठे तो देखे कि‍ कूलर एकदमे सूखा पड़ा है औ फि‍रि‍ज में रखा दूध भी पता नहीं कैसे दही की शकल का हो गया है। दूध का दही कैसे बना, इस बारे में सेपरेटली बात करेंगे, लेकि‍न पहले जो बात बता रहे हैं, उसे सुनि‍ए, ज्‍यादा इधर उधर लबर सबर करेंगे तो मेन बात तो रहि‍ये जाएगी ना। सबकुछ देख दाख के हम वापि‍स बि‍स्‍तर पर आए और कूलर में जो रेगि‍स्‍तान बन गया था, सोचने लगे कि‍ उसको अपने आजकल के मन की तरह हरि‍यर बाग बगीचा में कइसे बदलें। कइसे हमको जो पि‍राकि‍रति‍क होने का मौका मि‍ला है, उसे मानव निर्मित सामान अप्‍लाई करके अपि‍राकि‍रति‍क कर दें। अब आखि‍र हमेसा हमेसा परकि‍रती का रक्षा करके मसीन थोड़े बचा पाएंगे। टेंट से हजारन रुपि‍या बहि‍रि‍याए थे, तब तो दि‍माग में कौनो बत्‍ती चि‍राग न जला न दि‍ल में कौनो कमल दल खि‍ल रहा था। तब तो बस दि‍माग में बस एक्‍कै चीज था कि कइसे इस अगलगी गरमी को दूर करें।

बहरहाल, हम उठे, बि‍गेर कुछ तय कि‍ए उठे, लेकि‍न फि‍र भी चूंकि‍ हमें उठना ही था, इसलि‍ए उठे। ऊ का है कि झाड़ू लगाने के बास्‍ते हमारी दरभंगा मेल हमको बार बार बोल रही थी, त उठना ही पड़ा। अब जब उठ ही गए, हलांकि‍ हमारा कौनो खास मन नहीं था उठने का तो हम कमरे से बाहर नि‍कल आए। कमरे से बाहर नि‍कले तो देखे कि हम तो आंगन में खड़े हैं। खैर, हमने अपने आंगन से पूरे 47 मि‍नट तक बात की और अपनी मकान मलकि‍न को बता दि‍या कि‍ देखि‍ए, ई बातचीत में से सिर्फ इतना ही लीक होना चाहि‍ए कि‍ हम बहुत नाराज हुए। का नाराज हुए, का बोले, का सुने, ई सब बात का डि‍टेलि‍न में कि‍सी का भी, हम रि‍पीटि‍या रहे हैं, कि‍सी का भी बताने का कौनो दरकार नहीं ना है। 47 मि‍नट बाद हमको याद आया कि‍ आंगन में तो एक ठो रबर वाला पाइप रखा है। हम पाइप तुरंत उठा लाए औ उसको नल से कनेक्‍ट कर दि‍ए। अब देखे कि‍ दूसरका छोर तो पाइक के दूसरके छोर पर जाके एकदमे सूखा पड़ा है। दुसरका छोर एकदम सुरच्‍छि‍त देखे तो उसे लेजाकर कूल में ठूंस दि‍ए। फि‍र हम वापस आए। वापस आने के बाद हम गोल गोल घुमाकर नल की टोंटी खोल दि‍ए और वापस अपने बि‍स्‍तरा पर जाकर ओलर गए। पांच मि‍नट बाद हम फि‍र से चादर ओढ़ लि‍ए औ कूलर को नि‍हारते रहे।

(लोड ना लो भाई। बात इतनी सी है कि‍ सुबह कूलर में पानी खत्‍म हो गया था, उठके पानी भरे थे.... बस) 

Friday, May 23, 2014

रबर का राष्‍ट्रीय हि‍तवाद बनाम एक चड्ढी की खरीद

ये कोई बहुत ज्‍यादा रात की बात हो तो बात और है पर ज्‍यादा रात की बात नहीं, बस यही कोई आठ बजने के आसपास की बात है तो वो और बात नहीं है जो बहुत ज्‍यादा रात होने पर होती। वैसे यहां अभी नया नया ही आया हूं तो ईमानदारी से ये भी नहीं बता सकता कि ज्‍यादा रात होने पे आखि‍र बात क्‍या होती। इसलि‍ए प्‍लीज लोड न लें और आगे आराम से अपने दि‍माग की दही कराएं। लोड ले भी लेंगे तो भी दही ही होनी है, दूध न बनने का।

अब क्‍या बताएं कि क्‍या क्‍या न हुआ आठ बजे रात। ज्‍यादा कुछ बता दें तो पता चले कि सरकार ही सरकने लगेगी और उसके बाद की जो ऊटपटांग हरकतें शुरू होंगी, वो बर्दाश्‍त करें या कम बता कर ही काम चला लें। नत्‍थू हलवाई नहीं है हमारे यहां कि शाम आठ बजे गरम गरम कचौरि‍यां नि‍कालेगा और हम भर दोना चापेंगे। नत्‍थू तो न सही कल्‍लू हलवाई भी नहीं। लोहा छीलती मशीनें और कटते गर्म लोहे से नि‍कलती भभक के बीच बच गई गली से गुजरते हुए इधर उधर देखने पर अगर कुछ नजर आया तो बस कटता लोहा ही मि‍ला। थोड़ा आगे बढ़े तो पता चला कि सिर्फ लोहा ही नहीं कटता हमारी गली में, रबर भी खूब कटता है। रबर की महक बहुत ही मीठी होती है। पांच मि‍नट तक सूंघने के बाद खटाक से नाक में जो कसैलापन भरती है कि नाक में उंगली करने का जो राष्‍ट्रीय या अंर्तराष्‍ट्रीय हि‍तवाद रहा होगा, अगरचे कभी रहा होगा, वो भी पनाह मांगेगा। न सिर्फ पनाह मांगेगा, बल्‍कि जब हेने ओने न जाने केने केने ये पाजी टोएगा तो भी चुप्‍प पटाए मुंह दबाए नाक भींचे भागने के अलावा कोई दूसरा चारा अगर बच जाए त समझि‍ये कौनो बात है।

वैसे हम कह रहे हैं कि इसे हमारी मजबूरी न समझी जाए, और अगर समझ भी ली जाए तो भी हमारे हि‍तवाद से ही जोड़ कर समझी जाए क्‍योंकि हम रबर की उस मीठी महक से भागे और ऐसा भागे कि अब सुबह ही उसका मुंह देखेंगे। वो तो गनीमत रही कि आगे थोड़ा हरा धनि‍या, लहसुन और प्‍याज वगैरह दि‍ख गए तब कहीं जाकर नाक में सांस आई। उससे पहले तो यही लग रहा था कि सांस की जगह नाक में कोई चप्‍पल ठूंस के बैठा है और कंधे पे हाथ रखके बजोरी कह रहा है कि सूंघो... सूंघो-सूंघो क्‍योंकि अब सूंघना ही तुम्‍हारी नि‍यति है। खैर, कंधे पे सवार उस जबर रबर को कि‍सी तरह से उतारने के बाद लहसुन की दुनि‍या में पहुंचे, जेब में हाथ डाला तो सांप सूंघ गया। पांच रुपय्या का लहसुन के लि‍ए पांच सौ का नोट बुश्‍शर्ट की अगलकी जेब में लहालोट हुआ जा रहा था। मजबूरी में आगे बढ़े कि कहीं तुड़ा लें लेकि‍न ईमानदारी से कह रहे हैं कि अगर पाने की लालसा न हो तो पांच सौ का नोट उसमें मौजूद गांधी से ज्‍यादा चि‍ढ़ाता लगता है। हमें ही नहीं, सबको लगता है चाहे मनोरमा मउसी से पूछ लो या फि‍र नैहर गई रामजीत राय की ब्‍याहता बेबी कुमारी राय से भी। पतित लोगों से भी पांच सौ रुपये के नोट के बारे में सलाह ली जा सकती है और अगर ज्‍यादा कुछ करना हो तो इतनी सारी सर्वे कंपनि‍यां हैं, उन्‍हें भी पांच सौ के नोट पर लगाया जा सकता है। हम बता रहे हैं कि इन सबका रि‍जल्‍ट वही होगा जो हमारे साथ रात में हुआ। रात क्‍या, मने शाम को हुआ।

आखि‍रकार उसपर हमारी नजर ठहर ही गई। वो मुझे देख रही थी और मैं उसे। ये एकदम उस वक्‍त की बात है जब मैं चौराहे पर बरतन मांजने वाला झाबा देख रहा था, तभी अचानक उसपर नजर गई। कैसी तो लाल पीली नीली थी। कभी इधर लहराए तो कभी उधर। मने रात की मंद बयार में उसके प्‍यार का खुमार इस तरह से मेरे सि‍र पर चढ़के बोलने लगा कि आखि‍रकार हम उस तक पहुंच गए। मगर उसका बाप जो था, वो दूसरों को बनि‍यान सरकाने में बि‍जी ठैरा। लेना हो त लीजि‍ए नहीं त हमको बेचने का इतना दरकार नहीं है। ''एक दाम लगाते हैं दूसरा बताने के लि‍ए भी जेब में नहीं रखते चाहें तो झारा ले लीजि‍ए ना हमारा।'' उधर बापजान बनि‍यान में बि‍जी ठैरे तो हमने लपक कर अपनी ललछौंआ का हाथ पकड़ा। मुलायमि‍यत महसूस की तो लगा कि यही तो है जि‍सका हम पि‍छले एक साल से एक लाल चड्ढी पहनके इंतजार कर रहे हैं। बापजान से पूछा तो बताए कि तीस की एक चड्ढी पड़ेगी। हम कहे कि दो दे दो। और हम दो चड्ढी लेकर बाजार से जब चले तो दि‍माग आसमान में इस कदर उड़ा कि लहसुन यादे ना रहा। चड्ढी का खुशी में रात 12 बजे जब दाल नि‍काले तो वहीं सि‍र पकड़ के बैठ गए कि हाए... लहसुन। काश तुम्‍हें ले लि‍ए होते...

(यार अब और नी हो रही। इत्‍ती देर से दि‍माग की दही कर रहा हूं। बात तो बस इतनी है कि लहसुन खरीदने गए थे तो दो चड्ढी लेकर आ गए।  )