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Tuesday, August 19, 2014

बेटा, गाली दे

बेटा 
गाली दे 
काली काली दे 
गालों को लाली दे 
बेटा 
गाली दे 

सारी दुनि‍या दि‍ल्‍ली ठैरी 
बेशर्मी की इल्‍ली ठैरी 
जलती सुर्ख कुबातों से 
मां की आंख सवाली दे 
बेटा 
गाली दे 

पटक मजूर मार दे लड़की 
तेरे कि‍ए से जनता भड़की 
मरते जलते इस गांव को 
लंपट एक मवाली दे 
बेटा 
गाली दे 

लाल कमाल पे मार दे अंडा 
भगवा ओढ़ लगा ले बंटा 
और नशे में करके वार 
जहरीले फूलों का माली दे 
बेटा 
गाली दे

रोली चंदन की लगा दुकान 
ति‍लक त्रि‍शूल को बता महान 
ठोंक के ताल ले ले जान 
टोपी वे ठप्‍पा जाली दे 
बेटा 
गाली दे 

गोंज गोंज के बना दे गाजा 
गि‍रा दे बम औ पी जा माजा 
देख पराई पेप्‍सी 
धर ताली पे ताली दे 
बेटा 
गाली दे 

छेड़ दे लड़की करा दे दंगा 
फाड़ दे कपड़ा, कर दे नंगा 
देश गांव को कर भि‍खमंगा 
कट्टा हाथ भुजाली दे 
बेटा 
गाली दे 

हिंदुस्‍तान की फाड़ के लुंगी 
पहन ले साफा बन जा संघी
कलम हो काफि‍र बनके जंगी 
खून सून की लाली दे 
बेटा 
गाली दे

बना धरम का जाली नोट 
फोड़ दे बम औ डाल दे वोट 
गंगा सीना यमुना चोट 
बनाके इनको नाली दे 
बेटा 
गाली दे 

(फेसबुक पर समय की वॉल से साभार)

Monday, February 24, 2014

एक तकनीकी प्रेम पत्र


तुम अभी पांच मि‍नट पहले ऑनलाइन हुई थी ना। हम देखे थे तुम्‍हरी एफबी पे हरी तो जीचैट पे लाल बत्‍ती जल रही थी। और तुम जीचैट का स्‍टेटस भी तो चेंज की थी। क्‍या तो था कि‍.. तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान
झूठ जाना और पता नहीं क्‍या दाना पाना। यहां तो हैशटैग बनाने में लगी पड़ी है औ तुम हो कि शायरी दर शायरी टेले रहती हो। र्इमानदारी से बताना, इतनी शायरि‍यां तुम लोग पढ़ती गढ़ती कहां से हो जी। औ ये जो आजकर फोटो दर फोटो टेले रहने का फैशन चला है...हम कि‍तना इंतजार करते हैं तुम्‍हारी अगली फोटो का... कि काजनी कहां से खिंचा के दन्‍न से हमें दि‍क्‍क कर दो। फोटो-शायरी-कवि‍ता-फोटो-शायरी-टैग...। अरे कभी हमें भी तो टैग कर दि‍या करो.. ;) कि‍तना तो इंतजार कि‍या करते हैं... बैठे-बैठे चैटलि‍स्‍ट में तुम्‍हारा नाम ताका करते हैं.. कि अभी दन्‍न से हमरी विंडो पे चमत्‍कार होगा और हम अनि‍ल कपूर त तुम अमृता सिंह बनके प्‍यार बि‍ना चैन कहां रे गा रहे होंगे...और तुम हो कि टैगे नहीं करती हो। कौनो बात नहीं...डि‍यर... एक दि‍न तुम हमरी फ्रेंडलि‍स्‍ट के बाहर आकर साक्षात हमरे अमर चैट प्रेम का गवाह बनोगी, ई हमका पता है। हमरा पुराना रेकॉर्ड गवाह है। देखो... अभी त तुम्‍हरी हरी लाल दूनौ बत्‍ती जली हुई है। हमरी प्रि‍यतमा... एक स्‍माइली ही भेज दो...केतना दि‍न से तो तुम्‍हरी पेंडिंग लि‍स्‍ट में लटक रहे हैं।

अच्‍छा सुनो, हमने तुम्‍हारी फ्रेंडलि‍स्‍ट में ज्‍यादा कमेंट और लाइक करने वालों को फ्रेंड रि‍क्‍वेस्‍ट भेज दी है। बहुत जल्‍द तुम्‍हारी लाइकिंग में इजाफा होगा। देखना...लाइक के चक्‍कर में हमको लाइक करना न भूल जाना... हम वही हैं जो तुम्‍हरी हरी बत्‍ती जलता देख मैसेज आने का इंतजार कि‍या करते हैं। तुम्‍हरा स्‍टेटस कभी लाइक त कभी चुपके से बि‍गेर लाइक कि‍ए नि‍कल लि‍या करते हैं। औ बीच बीच में ई वाला गाना भी सुन लि‍या करत हैं-- वो जो हममें तुममें जो करार था...तुम्‍हें याद हो के ना याद हो...। कब आओगी जी तुम... तुम्‍हरा नीला, हरा, नारंगी औ केतना त केतना सूट देखे एक ठो मेला मा... उफ्फ...


आज ही के बात सुनो, केतना त नि‍हारते रहे थे तुम्‍हरे स्‍टेटस पर... का गजबे शायरी टेली थी तुम...एकदम दि‍ल के आरपार हो गई। हमका त लगा कि‍ सीधे हमहीं से बति‍याय रही हो... औ हम आंख औ मुंह फाड़े केजरीवाल बने तुम्‍हरा दांत देख रहे हों। ...प्रि‍ये...एक बार त अपनी हरी बत्‍ती के परसाद के टरेन इधर भी रवाना कर दो...

तुम्‍हरा एकतरफा चैटर 

Monday, September 9, 2013

भक्‍त पत्रकार और नरेंद्र मोदी की काल्‍पनि‍क मुलाकात

पाठकों की सुवि‍धा के लि‍ए पत्रकार का नाम हम महर्षि रख लेते हैं। महर्षि ने दो दि‍न पहले ही फेसबुक पर घोषणा कर दी थी कि मोदी आ रहे हैं, बहुत दि‍नों बाद उनसे मि‍लना हो रहा है। (हालांकि मोदी की ओर से उन्‍हें टाइम नहीं दि‍या गया था, इसलि‍ए डर भी लग रहा था कि मोदी उनका हाल आसाराम वाला न कर दें)

भाषण के बाद जब मोदी मंच से नीचे उतरे तो महर्षि साहब सीढ़ी की रेलिंग कि‍सी तरह से थामे उड़ रहे थे। (उड़ इसलि‍ए रहे थे क्‍योंकि मोदी के बाकी समर्थकों को भी मोदी का आर्शीवाद लेना था और वो उन्‍हें धकि‍याए जा रहे थे) बहरहाल, जैसे ही मोदी मंच से नीचे उतरे, महर्षि साहब धड़ाम से उनके पैरों में जा गि‍रे। हल्‍ला मच
गया। मोदी का पीआरओ महर्षि जी को पहचानता था, सो तुरंत बाकि‍यों को उनके ऊपर से धक्‍का मार मारकर हटाया और उन्‍हें उठाकर उनकी झाड़ पोंछ की। उन्‍हें बताया कि अरे, आप तो पतकार हैं, आपके मि‍लने का खास इंतजाम कि‍या गया है। वहां ढोकला भी खाने को मि‍लेगा टोमेटो सास और प्‍लास्‍टिक वाली चम्‍मच के साथ। पतकार जी के मुंह में पानी आ गए और चश्‍मा ठीक करते, बटन बंद करते हुए वो फटाफट मीटिंग रूम की तरफ भागे, लेकि‍न भाग नहीं पा रहे थे क्‍योंकि कि‍सी समर्थक ने लंगड़ी मारकर उनकी चप्‍पल तोड़ दी। राम राम करते मीटिंग रूम में पहुंचे और आधा कि‍लो ढोकला मोदी के आने से पहले से सूत दि‍ए। हालांकि बाद में उन्‍हें याद आया कि अरे, उनका तो गणेश चतुर्थी का व्रत है। जीवन में ऐसी भूल उनसे पहली बार हुई। उन्‍होंने सोचा, खैर, आज साक्षात दर्शन हो रहे हैं तो व्रत भंग होना कोई बड़ी बात नहीं। आधा घंटा इंतजार कराने के बाद आखि‍रकार मोदी कमरे में आए। आगे पढ़ें महर्षि मोदी संवाद:-

मोदी के पैरों में गि‍रते हुए महर्षि: नमस्‍कार सर।
मोदी: अरे, उठि‍ए उठि‍ए, आप की जगह तो दि‍ल में है। और नमस्‍कार वैसे भी खड़े होकर कि‍या जाता है।
महर्षि: ही ही ही ही, अरे सर, क्‍या कहें, हम गंगा कि‍नारे वाले हैं ना, तनि‍क नरभसा गए थे। वैसे सर, आपका भासण बहोत अच्‍छा रहा। आपका जो भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों कहने का इस्‍टाइल है, इसपर हम इस्‍पेसल कवरेज करने जा रहे हैं। ऐसे जोसीले तरीके से भासण की सुरुआत कोई नहीं करता। हमने तो ईएनटी इस्‍पेसलि‍स्‍ट को आपके दो दर्जन भासण सुनाकर पता लगाया है कि आपकी 40 फीसदी ऊर्जा मेरे भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों में नि‍कलती है। इसीलि‍ए, वहां से जोस आ जाता है।

मोदी: ह ह ह ह। नाम क्‍या बताया आपने अपना।
महर्षि: सर महर्षि सर।
मोदी: महर्षि या सर महर्षि सर। या फि‍र ये दोनों।
महर्षि: आपके लि‍ए सिर्फ महर्षि। सर वैसे इंटरव्‍यू मैनें लेना है आपका।
मोदी: अरे वो तो हो जाएगा महर्षि जी। और बताइये, घर में सब कुशल मंगल। कहां कहां काम कि‍या है आपने।
महर्षि: बस सर, सब आपकी कृपा है। हमने तो घाट घाट, घर घर का पानी पि‍या है। पढ़ाई यूपी में की तो काम कि‍या एमपी और महाराष्‍ट्र में। ननि‍हाल ठहरा राजस्‍थान में तो सभी जगह की पॉलि‍टि‍क्‍स में हाथ तंग है। सॉरी सॉरी, पॉलि‍टि‍क्‍स में अपना हाथ है।
मोदी: हमारे साथ काम करेंगे महर्षि जी। (क्‍वेश्‍चन मार्क इसलि‍ए नहीं है क्‍योंकि ये आदेश टाइप में दि‍या गया था।)
महर्षि: ही ही ही ही...सरजी। (हीहीहीही करने पर महर्षि जी का थोड़ा थूक भी मोदी के चप्‍पल पर गि‍र गया जि‍से महर्षि ने लपककर अपना कुर्ता फाड़कर साफ कि‍या।)
महर्षि: सर, दि‍न में तो नौकरी करनी होती है। हम रात में आपका सारा प्‍लान बनाकर दे देंगे। और आपको अपने यहां पूरा स्‍पेस भी देंगे सर। ऑल एडीशन। मैं सर लोगों से बात कर लूंगा। पता नहीं क्‍यूं कांग्रेस के पीछे लगे रहते हैं ये लोग।
मोदी: ठीक है, अपना बायोडाटा भेज देना। देखेंगे। नेक्‍स्‍ट.
महर्षि: अरे सर, इंटरव्‍यू...
मोदी: नेक्‍स्‍ट प्‍लीज..
महर्षि: सर, एक ऑटोग्राफ तो दे दीजि‍ए।
मोदी: अरे भगाओ यार इसको। सारा ढोकला खा गया और चप्‍पल खराब कर दी।
कमरे से नि‍कलते हुए महर्षि: ही ही ही ही, सर भी बड़े मजाकि‍या हैं। (संपादक को फोन करते हुए- सर बहोत अच्‍छा इंटरभ्‍यू रहा। मुझे तो उन्‍होंने अपनी पूरी प्‍लानिंग बता दी।)


(डि‍स्‍क्‍लेमर: पूरी वारदात, आई मीन मुलाकात का कि‍सी जीवि‍त या मृत पतकार से कोई लेना देना नहीं है। वैसे जो ले या दे रहे हों, वो दि‍ल पर ले या दे सकते हैं।)

Sunday, September 4, 2011

चाहिए एक दीवार

बचपन में जब अम्मा डांटतीं या मारती थीं, तो हम किसी स्टोर में खुद को बंद कर लेते थे या फिर छत पर चले जाते थे। वहां जाकर घंटो उसी बात को सोच सोच कर रोते रहते थे कि अम्मा हमसे प्यार नहीं करती हैं तभी तो मारा। और या या कहकर मारा। अम्मा ने हमें ये नहीं सिखाया कि भगवान के सामने जाकर रोने से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। हालांकि अम्मा को खुद जब रोना होता था तो वह भगवान के सामने जाकर रो लेती थीं। इसके लिए वह रोजाना स्पेशल टाइम निकालती थीं जिसे पूजा कहते थे। अम्मा कम से कम पौन घंटे तो पूजा करती ही थीं। इस बीच वो भगवान से जो भी बातें करती थीं, किसी को नहीं बताती थीं। जब वो पूजा कर रही होती थीं तो कोई उनके पास या उस कमरे में नहीं जाता था। दरअसल रोना नितांत व्यक्तिगत क्रिया है। मानव स्वभाव रहा है कि अगर वह रोए तो कोई सुने ना और किसी न किसी से जरूर रोए। भले ही वो भगवान हो, आसमान हो या फिर स्टोर के बंद कमरे की दीवारें हों। रोने के लिए आखिरकार सबसे मुफीद जगह कौन सी होती होगी?
मंदिर में भीड़ रहती है तो वहां लोग रोने की जगह गाने लगते हैं। इस तरह से गाना भी एक तरह का रोना ही माना जाएगा योंकि हम अपनी भड़ास गाने के रूप में निकालते हैं। मंदिर में सामूहिक रूप से गाई जाने वाली आरती हो या फिर मस्जिद में लगाई जाने वाली अजान, चाहे गुरुद्वारा ही यों न हो, आखिर ये सब सुर में यों नजर नहीं आते हैं। रोना बेसुरा होता है जबकि गाने में सुर का समावेश बहुत जरूरी होता है। भगवान की परिकल्पना हमने एक ऐसी वस्तु के रूप में की जो कभी जवाब नहीं देता है। और जो जवाब नहीं देता है, और जिसके सामने हम रो सकते हों, वह भले ही मूर्ति के रूप में हो, अदृश्य हो या किसी किताब की शल में, रहती एक दीवार ही है। एक शून्य दीवार जिसे हम अपना अंतरंग दोस्त मानते हैं और ये भी विश्र्वास रखते हैं कि ये दोस्त हमारे अतिव्यक्तिगत बातों को किसी से कहेगा नहीं। इसलिए हर तरह से, हर तरह की बातों से उसके सामने रो सकते हैं और यदि समूह में हों तो गा सकते हैं। अजीब बात है कि रोने के लिए हमने मंदिर-मस्जिद और पता नहीं या या बना दिए, लेकिन अभी तक एक ऐसा दोस्त नहीं बना पाए, जिससे हम रो सकें। वैसे यह मानव स्वभाव भी है कि वह अनजानी चीजों पर ज्यादा विश्र्वास करता है बनस्बित जानी हुई चीजों के। हमें दिक्कत होती है तो हम तर्क नहीं करते। हमें दुख होता है तो उसके कारणों की तलाश नहीं करते। सारी चीजों के लिए एक ऐसी चीज पर निर्भर हो जाते हैं जो प्रतिक्रिया ही नहीं कर सकती।
बहरहाल, आजकल रोने की, मतलब पूजा करने की नई शैली विकसित हो रही है। पिछले दो तीन सालों से देख रहा हूं कि सामूहिक पूजा को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि ये शैली जैनियों से ली गई है जहां पीढ़ा या मूढ़ा लगाकर एक लाइन से महिलाएं या पुरुष बैठते हैं और पूजा करते हैं। ये अलग बात है कि भगवान महावीर एकांत में ही ध्यान-जिसे अब पूजा कहते हैं, किया करते थे। यही शैली गणेश, विष्णु लक्ष्मी, राम और शिव जैसे भगवानों पर भी अपनाई जा रही है। एक पीढ़े पर उक्त भगवान की तस्वीर रखी और लाइन से बैठ गए। पूजा हो रही है, तिलक लगाया जा रहा है, पंडित बता रहा है कि अ धूप बाी जलाइए तो अब अक्षत छिड़किए। दीवार का स्वरूप बदल रहा है, स्टोर रूम में लाइन लग रही है, छत पर भीड़ इकठ्‌ठा हो रही है। मजे की बात तो यह कि बेसुरे मंत्रों के बीच पूरे मनोयोग से रोया जा रहा है। इससे आत्मिक शांति मिलती है। दरअसल जी भरके रो लेने के बाद शांति या हलका महसूस करना लाजमी है। लेकिन चूंकि दीवार चाहिए, इसलिए दीवार का कोई नाम भी होना चाहिए।

Sunday, December 7, 2008

क्या हिंदू और क्या मुसलमान

hइंदु होने के फायदे- १०

अम्मा से दस रुपये लेकर मैंने पतारू का हाथ थामा और बढ़ लिया। अब हम लोगों की निगाह मे दो टारगेट थे। एक तो वो लड़की जो नदी मे नहा रही थी और दूसरी वो लड़की जो डम्पू के घर मे रहने आई थी। हमें पता था कि वो अपने पापा के साथ आई है और हम लोगों ने उसे बाग़ की दिवार फांदने से पहले देखा भी था। हमें नदी मे नहाने वाली लड़की नही दिखी। दरअसल सरयू पार करने के बाद परिक्रमा के दूसरे हिस्से मे रास्ता काफ़ी चौडा हो जाता है। इसलिए भीड़ भी तितर बितर हो जाती है। अब न तो हम लोग बदमाशी कर सकते थे और न ही कोई और। मजबूरन हमें सीधे सीधे चलना पड़ रहा था। खैर, लम्बी गहरी साँस लेकर मैंने पतारू और कल्लू ने एक साथ परिक्रमा पूरी कि। लेकिन अभी तो बधाइयों का सिलसिला चलना था। ये बधाइयाँ कुछ हैप्पी न्यू इयर के अंदाज़ मे दी जाती थी। जाल्पानाला से अमानीगंज तक हम लोग लड़कियों को बधाइयां देते हुए आए। घर पहुचे तो अम्मा और बाबू , जो हमसे पीछे पता नही कहाँ थे, पहले से ही पहुचे हुए थे। मम्मी परात मे नमक मिला गर्म पानी ले आई थी और बाबू और अम्मा उसमे अपना पैर सेंक रहे थे। मैंने बाबू को बताया कि मैंने पतारू और कल्लू ने कितना मजा लिया। फ़िर क्या था। अम्मा सुलग उठीं। उन्होंने पुछा, कल्लू काव करय गवा रहा तू लोगन की साथे ? ऊ तौ मुसलमान हुवे । मैं चुप। टुकुर टुकुर बाबू का मुह देख रहा था। शायद वो कोई जवाब देन। खैर बाबू खंखारे, और अम्मा से बोले, अब छोटे बच्चों मे क्या हिंदू और क्या मुसलमान। खाने खेलने की उम्र है इन लोगों की। और वैसे भी ये लोग हमेशा साथ मे ही रहते हैं। और तुम कल्लू को लेकर इसे बोल रही हो, तुम भी तो अली हुसैन की अम्मा के साथ सर से सर जोड़कर बतियाती रहती हो। तब नही याद आता कि क्या हिंदू और क्या मुसलमान?

Sunday, November 30, 2008

सवाल दस रुपये का

हिंदू होने के फायदे - ९

राम की पैडी पर जब हम लोग समोसे खा रहे थे, तब मुझे याद आया की अम्मा ने तो सिर्फ़ दस रुपये ही दिए हैं। वो सारे तो वही ख़त्म हो गए। अब क्या करें। बड़ी मुसीबत। आगे आने वाले रास्ते पर एक अजीब तरह का ताना बिकता था। बेचने वालों का कहना था कि उसे भगवान् राम ने अपने वनवास के टाइम पर खाया था, और अक्सर खाते रहते थे। बहरहाल मुझे वो खाना अच्छा लगता था। उसका अजीब सा कसैला और मीठा स्वाद मुझे अभी तक याद है। यही सोच ही रहा था कि पतारू के बड़े भाई प्रेम परकास नजर आए। प्रेम ने बताया कि अम्मा बाबू और चचेरे मामा की चोटी बेटी अभी अभी आगे गए हैं। बड़ी हद चोटी छावनी तक पहुचे होंगे फ़िर क्या था। मैंने और पतारू ने वही से दौड़ लगनी शुरू की। परिक्रमा मे दौड़ लगानी काफ़ी मुश्किल होती है। हजरून लोगों की एक ही तरफ़ चलती भीड़ मे हमें दौड़ना था। और इतनी तेज़ कि आने वाले दस पन्द्रह मिनट मे अम्मा को पकड़ लिया जाय नही तो वो मिलने वाली ही नही थीं। आख़िर दस रुपये का सवाल जो था। ये तो पहले से ही पता था कि अम्मा वो लाल वाला गन्ना तो खरीदेंगी ही। सो लाल वाले गन्ने की चिंता नही थी। मैंने और पतारू ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और दौड़ना शुरू कर दिया। आख़िर मे चोटी छावनी के पास जहा मन्दिर के लिए पत्थर काटे जा रहे थे, वहां पर हमें आमा और बाबू दिख गए। चैन मिला। लम्बी साँस ली और पहुचे अम्मा के पास। खैर अम्मा ने डपटा नही और चुपचाप दस रुपये दे दिए। मैं भी सोच रहा था कि अभी कितनी चिरोरी करनी पड़ेगी।

जारी ....

देर से आने वालों के लिए पूरी कहानी यहाँ पढ़ें .... हिंदू होने के फायदे

Tuesday, April 24, 2007

इसे अन्यथा न लें

हिंदू होने के फायदे -८

थोड़ी ही देर मे उस लडकी को पता चल गया कि कई सारी आंखें उसके बदन का पोस्ट मार्टम करने में जुटी हुई हैं। सो उसने पानी से अठखेलियाँ करने की इच्छा तुरंत पानी के हवाले की और निकलकर घाट पर आ गयी। वहाँ नयी मुसीबत उसका इंतज़ार कर रही थी।
"कपडे कहॉ बदले जाएँ?"
हालांकि सरयू घाट पर महिलाओं के कपडे बदलने के लिए एक सरकारी "कपड़ा बदलन केंद्र "बना तो हुआ है लेकिन उसकी हालत भी सरकारी ही थी और अभी भी है। ऊपर से इतनी भीड़... उसने देखा कि उसकी माँ ने ऊपर से सूखा पेटीकोट डाला और नीचे से गीला वाला निकाल दिया। उसे ये जुगाड़ मेंट समझ मे आ गया। सो उसने भी अपनी माँ की ही तरह कपडे बदलने की कोशिश करनी शुरू कर दीं। लेकिन आंखें थीं कि उसका पीछा ही नही छोड़ रही थी । तब तक हम लोग भी पानी से बहार निकाल आये थे और कपडे वगैरह बदल कर घाट की सीढ़ियों पर बैठकर धुप खा रहे थे और उस उम्र की भाषा में कहें तो आंखें सेंक रहे थे। और इस काम मे हमारे साथ कुछ पुलिस वाले कुछ नए बने जवान बाबा लोग और वहाँ पर रेह्डी लगाने वाले दूकानदार भी थे जिनकी निगाहों का मरकज़ वही लडकी थी। हवा काफी तेज़ चल रही थी सो हमे पता था कि कुछ ना कुछ तो होगा ही। (नोट:- ये सारी चीज़े अयोध्या ही नही बल्कि उन सारे घाटों पर काफी आम होती हैं जहाँ ऐसे मेले लगते हैं , इसलिये कृपया इसे अन्यथा ना लें ) इतनी देर मे एक तेज़ हवा का झोंका आया और बस्स... सब एक दूसरे का मुह देखकर मुस्की मारने लगे। इसके बाद हमे भी वहाँ बैठना फ़ालतू लगने लगा और बाकी बचा हुआ रास्ता पार करने के लिए हम लोग आगे बढ़े। राम की पैढी के बाहर समोसे की दुकान पर हमने समोसे खाए पानी पिया।
(जारी.....)

Saturday, April 21, 2007

जाओ !! तैर के आओ ।

खैर , किसी तरह रास्ता कटा और हम लोग नयाघाट पंहुचे। क्या हुजूम था वहाँ लोगों का। जबर्दस्त !! जिधर देखो सर ही सर। हमने तय किया कि पहले नदी में नहा लिया जाय। क्योंकि नदी और उसका पानी देख मुझे बिल्कुल भी रहा नही जा रहा था। हमने अपने कपडे उतारे और नदी की तरफ बढ़े। पहले पतारू घुसा। घुसते ही उसके मुँह से माँ की एक भद्दी सी गाली निकली और उसने अपना हाथ नदी के अन्दर कही डाला । जब हाथ बहार निकला तो उसके हाथ मे गणेश की एक मूर्ती थी जिसकी सूंड की जगह लोहे की पतली सी एक सींक दिखाई दे रही थी। हम समझ गए । दरअसल वह सींक पतारू के पैरों मे घुस गयी थी। और वह चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था , ' साले!! माँ..... । यही जगह मिलती है इनको मूर्तियों को फेंकने के लिए। ' गरियाते हुए वह बहार निकला और अपना पैर पकड़कर बैठ गया। उसके पैर से ख़ून निकल रहा था। बोला , अब मैं आगे कैसे चलूँगा? मैं बोला तू यहीं बैठ और आसपास का नज़ारा ले। थोड़ी देर मे दर्द ठीक हो जाएगा। तुझे नदी मे बचा कर पैर रखने थे। सीधे तैरना शुरू कर देना था। वो बोला ठीक है , तुम लोग जाओ , तैर कर आओ। मैं यही बैठकर सबके कपडे देख रहा हूँ। सो मैंने और कल्लू ने उसे कपड़ों के पास छोड़कर नदी में एक लंबी छलांग लगाईं और तैरते हुए तकरीबन तीन चार सौ मीटर आगे निकल गए। वहाँ से देखते हैं तो पतारू जी महाराज ध्यानमग्न हुए नदी मे खडे हैं और सिर्फ उनका सर ही दिखाई दे रहा था। हमने समझ लिया कि माजरा क्या है। तेजी से तैरते हुए हम वापस आये और तीनो सर जोडे वही देखने लगे जो थोड़ी देर पहले पतारू देख रहा था। ये एक गोरी चिट्टी लडकी थी जिसने कपडे तो पहने हुए थे लेकिन अन्दर के कपडे नही पहने हुए थे। हम उसे डुबकी लगाते देख रहे थे। तभी मुझे लगा कि कोई देख तो नही रहा है हमे ॥ सो अपना सर नचाया और चारों तरफ देखा। कोई नही देख रहा था। सब उसी को देख रहे थे और कईयों के तो मुँह भी खुल गए थे।

घोर कलजुग आय गवा है

हिंदू होने के फ़ायदे -६

"राम राम !! घोर कलजुग आय गवा है।" साथ में चल रही भीड़ मे से कहीँ से आवाज़ आयी। वैसे हम लोग उस भीड़ से छुटकारा पा सकते थे लेकिन उसका सिर्फ एक ही रास्ता था। वह ये कि भीड़ से किनारे की तरफ जाएँ और किनारे किनारे ही उस संकरी गली को पार करें। लेकिन मुसीबत तो ये थी कि किनारों पर सुबह सवेरे काफी सारे मानवीय केक पूरी दुर्गन्ध के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। और हमे भी उन्हें कटने से ज्यादा ठीक काम भीड़ मे ही चलते रहना लग रह था। सो चलते रहे , खिसकते रहे..... एक घंटे तक खिसकने के बाद जाकर कहीँ खुली हवा में सांस लेने को मिली। ये एक मोड़ था और भीड़ मुड़ रही थी। फासले बढते जा रहे थे। उसके बाद एक चढान था और भीड़ चढ़ रही थी। आगे ढलान था और थोड़ी देर ढुलकने के बाद सरयू का पहला घाट आने वाला था। हम सबकी आंखें चमकने लगी। पतारू बोला , 'अबे ! पिछली बार वाला किस्सा भूल गया ? ' मैंने कहा, ' कौन सा वाला ' वह बोला , ' अबे साले वही !! पिछली बार एक लडकी सिर्फ बनियान पहन कर नहा रही थी। और.... बड़ा मजा आया था।' इतना सुनना था कि कल्लू ही ही करके हंसने लगा। मैं भी ही ही करने लगा। फिर पतारू बोला, ' इस बार भी ऐसा ही माल दिख जाये तो भैयिया अपना तो जनम सफल हो जाये।' मैंने कहा, ' हाँ साले !! जनम सफल हो या ना हो , लेकिन तेरा यहाँ आना जरूर सफल हो जाएगा।' खैर, हम लोग पहले घाट पर रुके। इस सीढ़ी से उस सीढ़ी तक चक्कर काटते रहे। लेकिन ज्यादा कुछ दिखा नही वहाँ। एक तो उस घाट पर पानी कम था दुसरे उसमे काई और गंदगी ज्यादा थी। इसीलिये वहाँ ज्यादा रौनक नही थी। सो हमने समय खराब न करने का बुद्धिमानी भरा निर्णय लिया और आगे चले। अभी इस घाट से नयाघाट तक का रास्ता काटना था और मेन घाट वही था जहाँ सबसे ज्यादा रौनक रहती थी। लेकिन इस घाट से नयाघाट तक का जो रास्ता था , वह मुझे बहुत खराब लगता था। किनारों पर तरह तरह के मेक अप किये हुए भिखारी पडे रहते थे। उनका मेकप बड़ा जानदार रहता था। रहता था क्या, अब भी रहता है। किसी ने अपने पैर कुछ इस तरह सडाये होते हैं जैसे कि अभी मवाद टपक पडेगी। उनके पैरों की पली मवाद और उनके पीछे पड़ा पाखाना , यह सब मिलकर कुछ ऐसा दृश्य बनाते कि पूछो मत। मेरा तो मन खराब हो रहा था लेकिन पतारू उन्हें बडे मजे से देख रहा था।
(जारी ....)

Sunday, April 15, 2007

हिंदू होने के फायदे


मिलेट्री वाले मैदान मे पतंगो की बाजी हो रही थी । जबरदस्त । एक से एक पतंगबाज पता नही कहॉ कहॉ से आये हुए थे। इसी बीच मांझा लूटने वालों मे भी जबरदस्त बाजी हो रही थी कि कौन ज्यादा से ज्यादा लूट ले जाये। मैं, पतारू,कल्लू, घम्मड़,तबरेज़ ,अगम और पिंटू अपनी तेज़ नजर से मंझे का उतार चढ़ाव देख रहे थे। कल्लू और पतारू ने अब तक सबसे ज्यादा मंझा लूट लिया था। कल्लू मैदान से एकदम सटी हुई झोपडियों में रहता था जिसे हम लोग तकिया कहते थे क्योंकि सारे मुसलमान वही रहते थे । कल्लू अक्सर मंझा लूटता रहता था। पतारू भी उसी के साथ रहता था। इसलिये उसके पास भी ज्यादा मंझा था। पतारू और कल्लू स्कूल नही जाते थे । पतारू का तो स्कूल मे नाम लिखा था लेकिन कल्लू का नही। घम्मड़ और तबरेज़ का नाम भी स्कूल मे नही लिखा था। ये भी एक कारण था उनके ज्यादा मंझे लूटने का। मैं बड़ा निराश। मेरे पास बस ३ तिकल्ला मंझा और २ तिकल्ले सद्दी ही हो पायी थी। मैंने पतारू से कहा कि कुछ मुझे भी दे दे लेकिन उसने मना कर दिया। कल्लू से कहा तो उसने काफी ना नुकुर करते हुए आख़िर मुझे १ बड़ा तिकल्ला लाल वाला मंझा दे दिया। मैं बड़ा खुश। सीना फुलाते घर पंहुचा। घर पर अली हुसैन की अम्मा और मेरी अम्मा सर जोडे बैठी हुई थी। अली हुसैन भी उसी झोपड़ी मे रहता था जिसमे कल्लू रहता था। दरअसल अली हुसैन कल्लू का चाचा था। उन्हें फुसफुसाते देख मैंने बाबू से पूछा कि क्या बात है ? उन्होने ने बताया कि अली के अब्बा और अम्मी हज जाने वाले हैं। पूरा मुहल्ला पैसा देगा । चन्दा इकट्ठा होगा तब ये लोग जायेंगे । मैंने पूछा क्यों ? क्या इनके पास पैसा नही है ? तो बाबु ने बताया कि ये लोग बहुत गरीब हैं। अली अभी कुछ खास काम करता नही और अली के बडे भाई ने अभी अभी तो दर्जी का काम शुरू किया है। मैंने कहा, अच्छा , तभी कल्लू , तबरेज़ और घम्मड़ स्कूल नही जाते । मैंने देखा, अम्मा ने अली की अम्मा को पचास रुपये दिए। मैंने फिर बाबु से पूछा कि हज का किराया कितना होगा ? बाबू ने बताया, यही कोई १५- २० हज़ार रुपये। मैंने उनसे पूछा कि फिर ये लोग कैसे जायेंगे? बाबू ने कहा कि होगा कोई जुगाड़ । और जब उसके घर से बुलावा आता है तो आदमी किसी ना किसी तरह से जुगाड़ कर ही लेता है । मुझे नही समझ मे आया। मैंने फिर पूछा , कैसे? बाबू ने बताया , इन्हें मुसलमान होने के नाते हज जाने कि और भगवान कि पूजा करने मे छूट मिल जाती है । वहीँ से कोई जुगाड़ करेंगी अली हुसैन की अम्मा। मैंने कहा कि हम लोग तो हिंदु हैं । हमे कोई ऎसी छूट क्यों नही मिलती ? बाबु ने बताया कि मिलती है , लेकिन वो अलग तरीके से मिलती है । तभी तो देखो , अयोध्या मे इतने लोग मजे लूट रहे हैं । इनमे सरकारी भी होती है और ग़ैर सरकारी भी । सरकारी ऐसे , कि हर साल हमारे देश से जितने भी लोग हज जाते हैं , उससे कहीँ ज्यादा खर्च हमारी सरकार का होता है हमारे मंदिरों कि सुरक्षा मे। जैसे अगर कुम्भ हो तो उसमे बहुत साड़ी गाडियां चलायी जाती हैं जिसमे शायद ही कोई टिकट लेकर चलता हो , या फिर जैसे अपनी अयोध्या में राम नवमी का मेला लगता है , उसमे सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं । और जन्म भूमि को ही देख लो। सरकार के पास बजट नही है लेकिन महीने का पता नही कितना करोड़ रुपये सिर्फ उन जवानों को तनख्वाह देने मे ही खर्च हो जाता है जो उसके आस पास मटर गश्ती करते रहते हैं ।
जारी है .....

नमस्ते सदा वत्सले

हिंदू होने के फ़ायदे - २

थोड़ी देर बाद अली हुसैन की अम्मा चली गयीं। बाहर निकल कर देखा तो वो अनिल की अम्मा के चबूतरे पर बैठी हुई थीं। वहां गया तो उनकी पंचायत चल रही थी। अब सोचता हूँ तो हंसी आती है कि दुनिया का सबसे बड़ा झूठ यही हो सकता है कि दो औरतें एक कमरे में चुप बैठी थीं। मैं वहाँ पंहुचा और एक सोहर (जो हमारे यहाँ बच्चा होने पर गाया जता है ) गाने लगा। " नीम्बू ना खायू , इमलिया ना खायू , कवन फल खाए रहू भौजी , ललन बड़ा सुन्दर हो "। इतना सुनना था कि पीछे से मेरी अम्मा , सामने से अनिल और अली हुसैन की अम्मा ने मुझे मारने के लिए दौडा लिया। मैं थोड़ी दूर भागा फिर पीछे मुड़कर देखा तो तीनों हँस रही थीं। अनिल की अम्मा मेरी अम्मा से कह रही थी कि तोहार लड़का तो बहुत पाजी है।

थोड़ी देर बाद घर वापस आया। खाना खाया और बाबू के पेट पर तबला बजाने लगा । तब तक संजू और अप्पू क्रिकेट खेलने के लिए बुलाने आ गए। क्रिकेट हम लोग शाखा वाले मैदान में खेलते थे। कल्लू कभी कभी वहाँ हम लोगों के साथ शाम को क्रिकेट खेलने आ जता था । लेकिन जैसे ही वह टंडन जी को या खाकी हाफ पैंट पहने कुछ लोगों को देखता, तुरंत वहाँ से सरक लेता था। हालांकि तबरेज़ और घम्मड़ को मैंने कई बार उसी मैदान मे कबड्डी और फुटबाल खेलते देखता था लेकिन तब मेरी हिम्मत नही होती थी। मेरा स्कूल बारह बजे के आस पास छूटता था और तब काफी तेज़ धूप रहती थी। शाखा वाले मैदान मे तब कोई भी नही रहता था और तकिया के सारे बच्चे आकर या तो वहाँ पतंग उड़ाते या कबड्डी खेलते या फिर फुटबाल खेलते। लेकिन शाखा के बगल मे रहने वाले टंडन जी अगर उन्हें वहाँ खेलते देखते तो अपना वही डंडा जिसे लेकर वह रोज़ सवेरे टहलने जाते और लौटकर अपनी बगल मे दबाकर शाखा लगाते और नमस्ते सदा वत्सले गाते , उसे लेकर इन सारे बच्चों को दौडा लेते। इन सबको भागते देख मैं भी डर के मारे भागता । हालांकि मैं मैदान के बगल से गुजरने वाली सड़क पर चल रहा होता लेकिन भीड़ को भागते देख मैं भी उसके साथ हो लेता और हम लोग हो हो करते अपनी गली मे पहुचते । शाम को जब मैं बाबू को बताता कि टंडन जी ने दौड़ाया था तो बाबू हँसते। बोलते , तुम क्यों डरते हो ? तुम्हे वो कुछ नही बोलेंगे। वो तो सिर्फ तकिया वाले मुसलमानो के बच्चों को भगाने के लिए डांटते होंगे। मैं कहता , लेकिन वो तो मेरे दोस्त हैं। तो बाबू कहते , ऐसा तुम समझते हो ना। लेकिन टंडन जी ऐसा नही सोचते।
( जारी ....)

वो तो मुसलमान है !

हिंदू होने के फायदे - ३



बहरहाल जब मैं, संजू, अप्पू,और कल्लू शाखा वाले मैदान में पहुचे तो वहाँ पर तबरेज़ और गुड्डू पहले से ही मौजूद थे। थोड़ी देर में अगम और पतारू भी गए। अब हम लोगों की गहन मंत्रणा शुरू हो गयी। अगले दिन अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा थी। इस परिक्रमा का हम लड़कों मे काफी क्रेज था। हम लोग इसमे आगे चलती लड़कियों को ठुद्दे मारते चलते। परिक्रमा का नाम सुनकर घम्मड़ पहले ही अलग हो गया। कहने लगा कि तुम लोग सरयू मे जरूर नहाओगे और अगर किसी को पता चल गया कि मैं कौन हूँ , तो बड़ा बवाल हो जाएगा। लेकिन कल्लू और तबरेज़ से गहरी यारी थी सो हम लोगों ने उन्हें साथ मे चलने के लिए राजी कर लिया । ड्म्पू के घर में तब एक किरायेदार रहते थे और उनकी छोटी वाली लडकी मुझे अच्छी लगती। मैं अक्सर अगम की दुकान पर बैठकर उसे देखा करता। वह भी परिक्रमा करने जा रही थी और इसकी सूचना मुझे अपने गुप्त स्रोतों से पहले ही मिल चुकी थी । बहरहाल शाम को इस निर्णय पर सभा विसर्जित हुई कि पतारू और मैं सवेरे चार बजे तक उठकर पांच बजे तक सबको इकट्ठा करेंगे और कल्लू तबरेज़ और संजू को जगाते हुए अगम की दुकान के सामने सवेरे पांच बजे तक पहुंच जाएगा।


रात मे खाना खाने के बाद मैं अगम की दुकान के सामने आकर खड़ा था। थोड़ी देर मे पतारू और कल्लू वहाँ पंहुचे। अब वहाँ पर हम चार यार थे और ड्म्पू के घर वाली लडकी के कारण मैं ज्यादा लोगों को अपने साथ नही ले जाना चाहता था। मैंने ये समस्या पतारू के सामने रख्खी तो उसने बाक़ी दो को राजी कर लिया। अब तय हुआ कि कल हम चार लोग ही परिक्रमा करने जायेंगे । यानी कि मैं , पतारू , कल्लू और अगम। सवेरे मैं तब सोकर उठा जब कल्लू और पतारू धीमे धीमे मेरे गेट पर मुझे आवाज़ दे रहे थे। बिस्तर से निकल कर पिछले कमरे मे गया तो देखा बाबू और अम्मा दोनो ही परिक्रमा जाने के लिए तैयार हो गए थे। उन्होने मुझसे अपने साथ चलने के लिए पूछा तो मैंने कहा कि मैं कल्लू और पतारू के साथ जाऊंगा। अचानक अम्मा भड़क गयीं। कहने लगीं कि कल्लू परिक्रमा करने क्यों जा रहा है ? वो तो मुसलमान है । तब बाबू ने उन्हें चुप कराया। बोले इनको यह परिक्रमा करना अच्छा लगता है और कल्लू वैसे भी हमेशा साथ मे ही रहता है। अगर ये अपने दोस्तो के साथ जाना चाहता है तो जाने क्यों नही देती ? और फिर मुझे दस रुपये दिए और बोले कि जाओ। मौज करो।
(जारी ....)

ज्यादा शरारतें मत करना ...

हिंदू होने के फ़ायदे-4

बाहर निकला तो तीनो खडे हुए थे। सबकी जेबों का हिसाब किया गया तो कुल मिलाकर ३२ रुपये बने। आठ रुपये हमने आने जाने के लिए रख लिए क्योंकि जालापानाला , जहाँ से परिक्रमा शुरू होती थी, वहाँ तक टेंपो से जाना पड़ता था। तब तक हल्का हल्का उजाला फैलने लगा था। हम लोग पैदल चलते हुए नियावां चौराहे तक पंहुचे,टेंपो पकडा और जालापानाला की तरफ बढ़े। लेकिन उसके एक किलोमीटर पहले बेनीगंज मे ही हमे उतरना पड़ा। वहाँ काफी सारी पुलिस थी । उन लोगों ने आगे का रास्ता बंद किया हुआ था और अगर कोई गलती से भी गाड़ी लेकर उस चौराहे को पार करने की कोशिश भी करता, तो सबसे पहले उसका स्वागत माँ-बहन की गालियों से होता और फिर लगे हाथ वो पुलिस वाले उस बेचारे पर हाथ भी साफ कर लेते। हमारा टेंपो वाला भी पिटा जबकि वह बेनीगंज के मोड़ वाली मस्जिद पर ही हमें उतार रहा था। इतनी ढ़ेर सारी पुलिस देखकर हम चारों डर गए। मस्जिद के पीछे वाली गली पकड़ी और गली गली होते हुए बेनीगंज के आगे वाली मस्जिद पर जाकर निकले। वहाँ से पांच मिनट के अन्दर हम लोग जालापानाला के चौराहे पर खडे थे।
इसी चौराहे से परिक्रमा शुरू होती थी और तकरीबन उन्नीस किलोमीटर चलने के बाद इसी पर खतम भी। चौराहे के एक तरफ जालपा देवी का मंदिर था और दूसरी तरफ मस्जिद और एक कब्रिस्तान। इस कब्रिस्तान में बारावाफात में बहुत बड़ा मेला लगता। ठीक वैसा ही जैसा परिक्रमा वाले दिन लगता था। खैर... हम सबका ध्यान अलग अलग जगहों पर लगा हुआ था। मैं डम्पू के घर वाली लडकी को खोजने की कोशिश कर रहा था , पतारू देख रहा था कि कब्रिस्तान के बगल वाले बाग़ मे शलीफे बहुत लगे हुए थे। कल्लू को चप्पलों की चिन्ता थी क्योंकि परिक्रमा तो नंगे पैर करनी थी और अगम अपने लिए कोई लडकी तलाश रह था जिसके पीछे चलते हुए वह उसके पैरों में ठुद्दे मारते हुआ चल सके। खैर... चप्पलों की समस्या का हल कल्लू ने खोज निकाला। मस्जिद में उसका कोई जानने वाला था। सो हमने अपने चप्पल मस्जिद मे सुरक्षित रखवा दिए। वहाँ के इमाम ने हमें ठीक से परिक्रमा करने की हिदायत दीं और कहा कि ज्यादा शरारतें मत करना। उस दिन वो परिक्रमा जाने वालों की सेवा के लिए लगाए गए पंडाल में खडे थे।
( जारी ... )

श्री राम चंद्र कृपालु भज मन...

हिंदू होने के फ़ायदे - ५


वहाँ से निकले तो हम चारों सीधे बाग़ की तरफ लपके। बाग़ के चारों तरफ उँची दीवार बनी हुई थी। सो कल्लू ने पहले पतारू को अपने कंधे पे रखकर दीवार कुदाई फिर मुझे। अगम और कल्लू बाहर ही खडे रहे क्योंकि हमें शलीफे तोड़कर बहार फेंकने थे और बहार सारे शलीफे वो दोनो इकट्ठा कर रहे थे। हमने ख़ूब शलीफे तोड़े। बाहर से जब कल्लू ने आवाज़ लगाईं कि झोला और जेब दोनो भर गए हैं , तब जाकर हम लोग बाहर निकले। अरे हाँ ... जब हम लोग दीवार फांद रहे थे तो मुझे वही डम्पू के घर वाली लडकी दिखी। मुझमे जोश आ गया। दोनो लोगों ने जल्दी से दीवार फांदी और इस पार आये। देखा तो सिर्फ कल्लू था और अगम ग़ायब हो चुका था। कल्लू से पूछा कि कहॉ गया? उसने बताया , उसे कोई दिख गयी थी , उसी के पीछे गया है। बोल रहा था कि पहले वाले घाट पे मिलगा। तब तक डम्पू के घर वाली लडकी परिक्रमा मे शामिल हो चुकी थी । हम तीनो भी पीछे पीछे लपके। पतारू कह रहा था कि तू उसे नही पटा पायेगा और कल्लू का विचार था कि पटा लेगा। यही सारी बातें करते हुए हम लोग आगे बढ रहे थे।


तकरीबन तीन - चार किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद रास्ता काफी संकरा हो जता था और भीड़ एक दम से इकट्ठी होकर एक दूसरे से सट जाती थी। सबको बहुत ही धीमे धीमे चलना पड़ता था उस टाइम। हम तीनो भी एक दूसरे का हाथ पकड़कर भीड़ के साथ चल रहे थे। लेकिन इस तंग भीड़ में हमे काफी कुछ दिखाई दे रहा था। अचानक एक चीज़ पे मेरा ध्यान गया और मैंने कल्लू और पतारू का ध्यान उसी ओर आकर्षित किया। ये कोई गाँव की औरत थी जो हमारी तरह उस भीड़ में फंसी हुई थी। एक अधेड़ उम्र का बाबा जिसने केसरिया रंग का लबादा पहना हुआ था और माथे पे ढ़ेर सारा चंदन लगा हुआ था, कभी उस औरत के पुठ्ठों पर हाथ फेरता तो कभी उसके सीने को अपनी कोहनी से टटोलता। मजे की बात तो ये कि उसका चेहरा एकदम सामान्य था और वो कुछ भजन वगैरह गा रहा था। उसके भजन मे हमे सिर्फ राम ही सुनाई दे रहा था लेकिन रामायण पूरी दिखाई दे रही थी। अचानक उस बाबा ने उस औरत के पुठ्ठों पर कुछ किया तो वह औरत बड़ी जोर से चिहुंकी। बाबा के मुँह से और जोर से राम राम निकला और इस बार तो हमे उनका भजन भी सुनाई पड़ा। वह गा रहा था , " श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुड़्म।" जैसे कि अभी रामचंद्र जी महाराज आएंगे और उस औरत का भय और दारुण हर लेंगे। हम लोगों को हंसी छूट गयी तो बाबा थोडा शरमाये, जोर से खंखारे और आगे बढ लिए। तभी हमे अगम दिखा। वो भी वही सब करने की कोशिश कर रहा था जो अभी अभी बाबा जी महाराज करके आगे निकल लिए थे पतली गली से। लेकिन बेचारे के साथ बड़ी टरेजिडी थी। उसका हाथ तो पुठ्ठे तक जा रहा था लेकिन उसे छूने की उसकी हिम्मत ही नही पड़ रही थी। हम लोगों ने उसे आवाज़ लगाईं लेकिन वह हमारे पास ही नही आया।
(जारी...)