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Saturday, August 17, 2024

849 वॉर्निंग | सोती रही सेबी-'अडानी' बुच!

अडानी की जेबी बनकर सेबी सरगना बनी माधबी बुच के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च ताजे खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट में इसी हफ्ते एक नई याचिका डाली गई है। सुप्रीम कोर्ट से ये मांग की गई है कि उसने सेबी को जांच करने में कितना भी टाइम लगाने की छूट दे रखी है, उसे तुरंत वापस ले और अडानी पर लगे आरोपों की जांच पूरी करने के लिए एक टाइट टाइम लाइन दे। 3 जनवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को तीन महीने की मोहलत दी थी। यह मोहलत कब की बीत चुकी है और इंडियन इन्वेस्टर्स की जिल्लत शुरू हो चुकी है। याचिका दायर करने वाले एडवोकेट विशाल तिवारी ने याचिका में कहा है कि हिंडनबर्ग की नई रिपोर्ट ने लोगों और निवेशकों के मन में शक पैदा कर दिया है। अब सेबी के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह पेंडिंग इन्वेस्टिगेशन खत्म करे और रिपोर्ट दे। यह जनहित और उन निवेशकों के हित में है, जिन्होंने 2023 में अडानी ग्रुप में अपने करोड़ों रुपये गवां दिए हैं। सेबी की रिपोर्ट जानने का उनको अधिकार है।

बता दें कि 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडानी में पैसा लगाने वालों ने लाखों करोड़ रुपये गवां दिए थे। वहीं इस बार सेबी पर रिपोर्ट आने के बाद फिर से अडानी के शेयरों में 17 पर्सेंट से अधिक की गिरावट चल रही है और आम लोगों के 53 हजार करोड़ से भी अधिक डूब चुके हैं। वैसे जनवरी में अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने माना था कि रिकॉर्ड में इस बात के पुख्ता सबूत हों कि सेबी की जांच पहली नजर में सेवापानी जैसी दिखे तो वह जांच को उससे वापस ले सकता है। संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट को ये अधिकार है। यह फैसला सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की तीन जजों की बेंच ने 3 जनवरी 2024 को सुनाया था। तब सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि अगर सेबी की रिपोर्ट में फेवर दिखता है तो वह जांच एसआईटी को दे देगा। हालांकि अपने फाइनल फैसले में उसने सेबी को अडानी मामले की जांच से हटाने से इनकार कर दिया था। संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार का प्रयोग सुप्रीम कोर्ट ने तभी करने को कहा था कि जब ये साबित हो जाए कि सेबी की रिपोर्ट में सेवापानी है और ये आई तो खुद जस्टिस ही फेल हो जाएगा। दरअसल, अदालत ने कहा था कि सेबी की जांच लोगों में भरोसा बढ़ा रही है। इतनी बड़ी जांच करने के लिए अदालत ने सेबी की पीठ भी थपथपाई थी। तब सेबी ने 24 में से 22 जांच पूरी कर ली थी। बाकी की दो जांचों में वह "बाहरी एजेंसियों/संस्थाओं" से इनपुट का इंतजार कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट में जांच की स्थिति पर यह अंतिम रिपोर्ट थी। इसके बाद से सेबी ने क्या किया, सेबी की मुखिया अडानी बुच ने इस मसले पर क्या किया, किसी को कुछ नहीं पता, अलबत्ता पिछले तीन चार दिनों में लोगों के 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक डूब चुके हैं। वहीं नई याचिका डालने वाले एडवोकेट विशाल तिवारी ने अपनी याचिका में मोदी और सेबी दोनों से हालात पर रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने पूछा है कि क्या मोदी और सेबी ने कोर्ट की स्पेशलिस्ट कमिटी की उन सिफारिशों पर कार्रवाई की है, जो कमेटी ने सेबी ढांचे को मजबूत करने के लिए करी थीं? उन्होंने जुलाई में आए इलेक्शन रिजल्ट के बाद शेयर बाजार में आई गिरावट और निवेशकों को हुए घाटे पर भी मोदी और सेबी से डीटेल्ड रिपोर्ट मांगी है। यह याचिका एडवोकेट तिवारी ने फिर से 13 अगस्त को लगाई है, अखबारों में यह 13 अगस्त को खबर छपी थी। लेकिन इससे भी बड़ी खबर ये कि यही याचिका उन्होंने 5 अगस्त को भी लगाई थी। हिंदुस्तान टाइम्स के आर्थिक अखबार मिंट में खबर है कि तब सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने तिवारी के एप्लीकेशन को रजिस्टर्ड ही नहीं किया था, उल्टे मुंह मना कर दिया था और न सिर्फ मना कर दिया था, बल्कि इसे "पूरी तरह से गलत" बताया था। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने कहा था कि इसमें कोई उचित कारण प्रस्तुत नहीं किया गया है। रजिस्ट्रार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सेबी की जांच के लिए कोई टाइट टाइम लाइन नहीं बनाई थी, जैसा कि एडवोकेट तिवारी दावा कर रहे हैं। रजिस्ट्रार ने यह भी बताया कि कोर्ट ने स्पेशलिस्ट कमिटी की सिफारिशों या चुनाव के बाद निवेशकों को हुए नुकसान के बारे में रिपोर्ट देने के लिए कोई खास डायरेक्शन जारी नहीं किए हैं। रजिस्ट्रार साहब के इतने दावों के बावजूद निवेशकों को चुनाव और हिंडनबर्ग का ताजा खुलासा मिलाकर एक लाख करोड़ से ऊपर का नुकसान हो चुका है। कुल मिलाकर अब बात इस पॉइंट पर आकर टिक गई है कि क्या अडानी की जेबी सेबी मुखिया पक्षपात कर रही हैं या नहीं? और क्या अपने अडानी रिलेशन के बारे में उन्होंने सेबी या फिर सुप्रीम कोर्ट की बनाई स्पेशलिस्ट कमेटी बताया था या नहीं बताया था? यह स्पेशलिस्ट कमेटी सुप्रीम कोर्ट ने मई या जून 2023 में बनाई थी। इस स्पेशलिस्ट कमिटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अभय मनोहर सप्रे ने की थी। बाकियों में बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज जेपी देवधर, सीनियर एडवोके सोमशेखर सुंदरेसन, बैंकर ओपी भट्ट, केवी कामथ के साथ साथ नंदन नीलेकणी भी शामिल थे। सेबी को इस कमिटी को बताना था कि वह अडानी ग्रुप के खिलाफ आरोपों की जांच किस तरह कर रही है।
इस बारे में इकोनॉमिक टाइम्स में एक खबर मिलती है जो सूत्रों के हवाले से बताती है कि बुच ने दिल्ली में पैनल से मुलाकात की और इस कमिटी को उनकी ब्रीफिंग सबसे पहली और इम्पॉर्टेंट ब्रीफिंग थी और इसके बाद उन्होंने कहा कि अब जब तक जरूरी न हो, वो कमेटी के सामने हाजिर नहीं होंगी। वकील विशाल तिवारी का कहना है कि यह साफ है कि बुच या सेबी ने स्पेशलिस्ट कमिटी के साने ये खुलासे नहीं किए हैं क्योंकि उनकी रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस बात का संकेत देता हो। तिवारी को लगता है कि कमिटी के सामने फैक्ट रखे ही नहीं गए।" अब जरा इस कमिटी का भी हाल जान लीजिए। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिकाकर्ता जो कि लॉ स्टूडेंट हैं अनामिका जायसवाल, उन्होंने हितों के टकराव के आधार पर स्पेशलिस्ट कमिटी के दो मेंबरानों के खिलाफ अदालत में आपत्ति जताई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भट्ट और सुंदरेसन के अडानी ग्रुप के साथ प्रफेशनल रिलेशंस हैं। हालांकि लोया से लेकर अडानी तक, हर केस की तरह इस केस को भी सुप्रीम कोर्ट ने निराधार बताते हुए खारिज कर दिया था। जायसवाल की वकील नेहा राठी ने स्क्रॉल डॉट कॉम को बताया कि स्पेशलिस्ट पैनल ने अपनी रिपोर्ट में सेबी के ढेरों फेल्योर का खुलासा किया है और यह भी इशारा किया है कि अडानी ने शेयर मार्केट में हेरफेर किया है। कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सेबी अप्रैल 2016 से 13 विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की जांच कर रहा था, जो अडानी ग्रुप की कंपनियों में में पैसा लगा रहे थे और फिर भी फायदा उठाने वालों की पहचान नहीं कर पाया। सवाल उठता है कि सेबी पहचान नहीं कर पाया, या उसने पहचानने की कोशिश ही नहीं की? हिंडनबर्ग रिपोर्ट और संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग परियोजना साफ साफ इन निवेशकों और अडानी ग्रुप के बीच का रिलेशंस खोलते हैं जो कम से कम कानून का उल्लंघन तो बताता है। स्पेशलिस्ट कमिटी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डीआरआई ने जनवरी 2014 में सेबी को अडानी ग्रुप के घोटाले के बारे में बताया था, जिसमें बिजली के इक्यूपमेंट्स के एक्सपोर्टे का दाम अधिक बताया गया था। यह कुल 6,278 करोड़ रुपये की हेराफेरी थी, इसके सबूत सीडी में दिए गए थे, फिर भी सेबी अपने अंग विशेष में दही जमाए रही। स्पेशलिस्ट कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद भी, सेबी ने अडानी एंटरप्राइजेज के आईपीओ को तब जारी होने दिया, जब तक अडानी ने उनको खुद ही वापस नहीं ले लिया। रिपोर्ट में एक और बहुत ही बड़ी बात कही गई है। अप्रैल 2018 और दिसंबर 2022 के बीच अडानी ग्रुप को लेकर 849 ट्रेडिंग अलर्ट जारी हुए। इसके बावजूद सेबी सोई रही। बड़ी बात ये कि इन अलर्ट में से 603 प्राइस वॉल्यूम मूवमेंट के थे और 246 संदिग्ध अंदरूनी व्यापार के थे। एक दो नहीं, बल्कि साढ़े आठ सौ वॉर्निंग जारी होने के बावजूद सेबी ने तब तक कोई जांच शुरू नहीं की, जब तक कि भारतीय लोगों के एक डेढ़ लाख करोड़ स्वाहा नहीं हो गए। इतना ही नहीं, सेबी ने अडानी के लिए अपने ही नियम बदल डाले। खास तौर से विदेशी निवेशकों और सेबी के खुद के लिस्ट की गई लाइबिलिटीज और उसे पब्लिश करने के नियम तब बदल डाले। इन सब चीजों ने अडानी का रास्ता और आसान बनाया, ऐसा सुप्रीम कोर्ट की स्पेशलिस्ट कमिटी की रिपोर्ट कहती है। इतनी थू-थकार होने के बावजूद सेबी ने आज की तारीख तक अडानी पर अपनी जांच पूरी नहीं की है, जबकि स्पेशलिस्ट कमिटी ने मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। मजे की बात ये कि सुप्रीम कोर्ट भी आराम से उसे बार बार तारीख देता जा रहा है, देखिए कैसे। 2 मार्च , 2023 को अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को दो महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया था। अप्रैल में, सेबी ने अडानी की लिस्टेड, अनलिस्टेड और बरमूडा ट्रायंगल का का हवाला देते हुए छह महीने और मांगे। मई में, सुप्रीम कोर्ट ने इसे 14 अगस्त, 2023 तक का वक्त दे दिया। फिर सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से 15 दिन और मांगे। इस साल 3 जनवरी को बिना सेबी के फाइनल रिपोर्ट दिए ही सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने उसी तरह से अडानी घोटाले पर आदेश जारी कर दिया, जैसे कि लोया केस में किया था। लोया केस में भी यही साहब थे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़। जनवरी वाले फैसले में फिर से सेबी को तीन महीने की मोहलत दे दी गई। फिर याचिकाकर्ता बार बार सुप्रीम कोर्ट से मांग करते रहे कि जांच का क्या हुआ, और सुप्रीम कोर्ट याचिकाएं खारिज करता रहा। इस पूरे वक्फे में निवेशकों के डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए।

Saturday, February 15, 2020

डाटा से प्यार, डाटा से सेक्स और डाटा से बच्चे!

मुझे वो टिंडर पर मिली थी, या मैं उसे टिंडर पर मिला, यह तो ठीक से याद नहीं, लेकिन मैच हो गया था। झारखंड की थी, अनारक्षित वर्ग की और साढ़े तीन शादियां कर चुकी थी। साढ़े तीन यूं कि आखिरी में बात मंगनी के बाद टूट गई थी, लेकिन मिलना-मिलाना हो चुका था। हमारी बातें आगे बढ़ने लगीं तो पहले तो उसने धीमे से मुझे यह बताया कि उसके पापा मोदी जी के खिलाफ एक बात नहीं सुनते और अगर कोई कह दे तो उसको ऐसी-ऐसी सुनाते हैं कि पानी पनाह मांगे। मैंने उससे कहा, ‘तो क्या हुआ। मेरे घर में भी कुछ बीजेपी वाले हैं, कुछ कांग्रेस वाले हैं, सपा-बसपा वाले भी हैं और खुद मैं कम्यूनिस्ट हूं।’ तो वह बोली कि उसके यहां भी कुछ यही हाल है, उसका भाई कांग्रेसी है, भाभी को आम आदमी पार्टी अच्छी लगती है और मां इधर-उधर डोलती रहती हैं, और जो भी जोर से बोल दे, उसी की तरफ हो जाती हैं। मैंने उससे पूछा, ‘और तुम? तुम क्या हो’? वह बोली, ‘मैं तो वर्कोहलिक हूं। काम पसंद करती हूं। जो भी काम करता है, उसे पसंद करती हूं।’

यह सुनकर मेरे मन में लड्डू फूटा। आज के जमाने में जब लोग काम से ज्यादा नाम पसंद करते हों, ऐसे लोग मिलने मुश्किल होते हैं। कुछ दिन तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। फिर उसने धीमे-धीमे स्कूलों के बारे में फेक इन्फॉरमेशन मेरी ओर पुश करनी शुरू की। जैसे पहली तो यही कि अब देखो, सारे स्कूलों में पढ़ाई हो रही है। सारे टीचर्स स्कूलों में वक्त पर पहुंच रहे हैं और क्लासेस ले रहे हैं। लगातार आती इन फर्जी खबरों से जब मैं पक गया तो एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘आखिरी बार तुमने किस स्कूल का दौरा किया था?’ कहने लगी, ‘दौरा तो नहीं किया था, लेकिन उसका एक रिश्तेदार मध्य प्रदेश के स्कूल में पढ़ाता है, वही हमेशा सरकार से इस बात को लेकर हमेशा परेशान रहता है कि टाइम पर स्कूल पहुंचना है।’ मैंने उससे पूछा, ‘उसकी बीएलओ में ड्यूटी लगती है?’ वह बोली, ‘ये तो न पूछो, रोज ही जाने कहां कहां ड्यूटी लगती रहती है।’ मैंने फिर पूछा, ‘फिर वह स्कूल कब जाता है‌?’ इस पर वह थोड़ी नाराज हो गई और बोली, ये सब फालतू की बात है, वक्त पर तो स्कूल आना ही पड़ेगा।

फिर कुछ दिन बाद वह मुझसे सरकारी दफ्तरों की बेहतरी की बात बताने लगी। वहां भी आने-जाने के वक्त की पाबंदी की बात। मैंने पूछा, ‘अधिकारियों के दफ्तर वक्त पर आने जाने से क्या सारे काम वक्त पर होने लगे?’ वह बोली, ‘और क्या।’ मैंने पूछा, तुम अपनी जीएसटी कैसे फाइल करती हो तो बोली कि उसने इस काम के लिए एजेंट कर रखा है। मैंने पूछा कि अगर अधिकारी या सरकारी कर्मचारी अपने काम के इतने ही पाबंद हैं तो बीच में दलाल क्यों लगाया? क्या दलाल पूरा काम ईमानदारी से कराता है? छूटते ही वह बोली, ‘तुम मोदी विरोधी हो।’ पहले तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि मैं इस गलीच सिस्टम का विरोधी हूं, लेकिन वो तो समझने का नाम ही न ले। फिर मैंने उससे पूछा, ‘तुम मोदी समर्थक हो?’ इस बार वह खुलकर बोली, ‘हां। और मोदी जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।’ मैंने पूछा, ‘क्या अच्छा काम कर रहे हैं?’ बोली, ‘नोटबंदी करके काले धन की कमर तोड़ दी।’ मैंने कहा, ‘लेकिन सारा पैसा तो रिजर्व बैंक वापस आ गया।’ इस पर वह बोली, ‘इतना अंधा विरोध तो न करो।’ मैंने कहा, ‘ये मैं नहीं, रिजर्व बैंक का डाटा कह रहा है। ’तो कहती है, ‘जाओ, उसी डाटा से प्यार करो, उसी से सेक्स करो और उसी से बच्चे पैदा करना।’

Friday, December 20, 2019

एनआरसी करने के लिए सीएए लाए हैं: कन्नन गोपीनाथन

अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर आईएएस ऑफिसर कन्नन गोपीनाथन ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद से वे देश भर में घूम-घूमकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अपनी बात कहते रहे। इसी बीच नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) आ गया। केंद्र के कई नेताओं ने इसे एनआरसी के साथ जोड़कर लागू करने की बात कही। अब कन्नन देश भर में घूम-घूमकर सीएए और एनआरसी पर जागरूकता सभाएं कर रहे हैं। मैंने उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

अपने बारे में बताइए।
मैं 12वीं तक केरल में पढ़ा। कोट्टयम का रहने वाला हूं। इसके बाद मैंने रांची के बिरला इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की। इसके बाद मैं नोएडा आ गया और नौकरी करने लगा। नोएडा में रहने के दौरान मैं सेक्टर 16 की झुग्गी में बच्चों को पढ़ाता था। कुछ दिन बाद में नोएडा के ही अट्टा मार्केट में भी बच्चों को पढ़ाने लगा। वहां का हाल देखकर समझ में आया कि सिस्टम के अंदर रहकर काम करना होगा- तब कुछ सही होगा, इसलिए मैंने आईएएस का एग्जाम पास किया। 2012 बैच में आईएएस बना, फिर मिजोरम में डीएम रहा, दादरा-नगर हवेली में भी कलेक्टर के साथ-साथ वहां के कई विभागों में कमिश्नर रहा। वहां डिस्कॉम कॉरपोरेशन था जो लगातार लॉस में जा रहा था, उसे एक-डेढ़ साल में प्रॉफिट में ले आया। जम्मू-कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 हटाया गया तो वहां पर प्रशासन ने लोगों की आवाज दबाई। अब भी दबा ही रही है। समस्या 370 हटाने या लगाने से नहीं, बल्कि आवाज दबाने से उपजी। फिर मुझे लगा कि ये सही बात नहीं है और कम से कम मैं लोगों की आवाज दबाने के लिए तो आईएएस में नहीं आया। इसलिए मैंने रिजाइन कर दिया। हालांकि सरकार ने अभी तक मेरा इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है।

इस्तीफा देने के बाद आप क्या कर रहे हैं?
रिजाइन करने के बाद मैंने ठीक से तय नहीं किया था कि किस ओर जाना था। इसी बीच कुछ जगहों पर टॉक के लिए बुलाया। इसी सिलसिले में एक बार चेन्नई गया। वहां एक टॉक में मैं 'बोलने की आजादी' विषय पर बोल रहा था कि बीच में एक लड़की ने मुझे टोक दिया। नॉर्थ ईस्ट की उस 23 साल की लड़की का कहना था कि बोलने की आजादी उसकी समझ से बाहर है क्योंकि अभी तो उसे यही डर है कि वो इस देश में रह पाएगी या नहीं। उसका दादा आईएमए में था और वो कोई सन 1951 का डॉक्यूमेंट खोज रही थी जो उसे मिल नहीं रहा था। उस शो में खड़ी होकर वह रो रही थी और मैं निरुत्तर था। मैंने खुद से यही पूछा तो पता चला कि पेपर्स तो मेरे पास भी पूरे नहीं। बीस साल से ज्यादा पुराने कागज तो मेरे पास भी नहीं है। फिर मैं मुंबई आया और दोस्तों से इस पर चर्चा की, मामले को ठीक से समझा। तब से मैं लोगों को बता रहा हूं कि कैब और एनआरसी किस तरह से हम सभी लोगों के लिए नुकसानदेह हैं।

अब तक आप कहां कहां जा चुके हैं और आगे का क्या प्रोग्राम है?
आगे का तो मैंने नहीं सोचा, लेकिन बिहार के कई जिलों में जा चुका हूं। सीएए और एनआरसी का खौफ देखना हो तो बिहार का दौरा करिए। वहां इस वक्त आधार कार्ड सेंटरों में वही नोटबंदी वाली भीड़ दिख रही है। रात के दो-दो बजे तक आधार कार्ड सेंटरों में लाइन लगी है। लोग अपना आधार कार्ड दुरुस्त करा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई जिलों में मैं लोगों को इसके नुकसान बता चुका हूं। महाराष्ट्र और साउथ में तो लगातार बोल ही रहा हूं। इसके बारे में अभी बहुत जागरुकता फैलानी होगी।

लोगों की क्या प्रतिक्रिया है?
लोग बहुत डरे हुए हैं। सबसे ज्यादा तो गरीब मुसलमान और दलित-आदिवासी डरे हुए हैं। वजह यह कि भारत में किसी के भी कागजात या तो पूरे नहीं हैं और अगर पूरे हैं भी तो उनमें कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी छूटी हुई है। यही वजह है कि बिहार में आधी-आधी रात तक लाइनें लगी हैं। लोगों को लगता है कि आधार करेक्शन से काम हो जाएगा। इससे पता चलता है कि लोगों में कितना ज्यादा डर का माहौल है। वॉट्सएप के मुस्लिम ग्रुप में इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा ट्रेंड में है- डॉक्यमेंट्स कैसे पूरे करें? उनको पता है कि कागजात नहीं होंगे तो ये सीधे डिटेंशन सेंटर भेजेंगे। सबने देखा कि पिछले दिनों कैसे केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को डिटेंशन सेंटर बनाने का लेटर भेजा है।

सीएए और एनआरसी को अलग-अलग देखें या एक साथ?
सीएए इसलिए आया क्योंकि एनआरसी करना चाहते हैं। वरना सीएए नहीं आता। असम में एनआरसी हुआ तो सबसे ज्यादा हिंदू ही डिटेंशन सेंटर पहुंच गए। कागज तो हिंदुओं के पास भी नहीं हैं। ये चीज राजनीतिक रूप से इनके खिलाफ जाती है। हालांकि सरकार उनको वापस लेने के लिए वहां नोटिफिकेशन जारी कर रही थी, लेकिन अब वह इसके लिए कैब ले आई है। एनआरसी और सीएए- दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, सीएए का अकेले कोई खास मतलब नहीं है।

किसे किसे यह प्रभावित कर रहा है और कैसे?
अगर आपके पास करेक्ट डॉक्यूमेंट्स नहीं है तो यह आपको भी प्रभावित करेगा। मुझे लगता है कि सरकार नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के जरिए इसकी शुरुआत करेगी। सरकारी आदमी घर आएगा और हमारे कागजात चेक करेगा। वहां पर अगर कोई कमी हुई तो असम की ही तरह हमारे नाम के आगे संदिग्ध का निशान लग जाएगा और फिर हमें यह साबित करना होगा कि हम यहां के नागरिक हैं या नहीं हैं। पहले यह सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे, लेकिन अब यह उल्टा हो गया है। अब हम सबको साबित करना होगा कि हम भारत के नागरिक हैं या नहीं। कागजात तो बहुत कम लोगों के पूरे हैं, ऐसे में सीन साफ है। जो सबसे गरीब हैं, वो इसे भुगतेंगे। जो बाहर काम कर रहे हैं, यानी जितने कामगार हैं, उन्हें इससे दिक्कत होगी। हर साल देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ और सूखे से प्रभावित होता है, वहां विस्थापन नियमित चलता है, वो भुगतेंगे। आदिवासियों के पास तो कोई कागज ही नहीं होता।

डॉक्यूमेंट्स बनवाने में भ्रष्टाचार सबसे आम शिकायत है। क्या इससे भ्रष्टाचार भी बढ़ सकता है?
बिलकुल। अब जिसका शासन-सत्ता में कनेक्शन नहीं है, जिनका भ्रष्टाचार से कनेक्शन नहीं है, वो इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली में ऐसे हजारों लोग आपको मिल जाएंगे जो सड़क पर रहते हैं, वो कहां जाएंगे। फिर जनता को तो कैसे भी सर्वाइव करना है, वह कैसे भी करके कोशिश करेगी।

आईएएस लॉबी में इसे लेकर क्या कुछ प्रतिक्रिया है?
मुझे आईएएस लॉबी इसे लेकर क्या कर रही है, ये नहीं पता। हम सब इंडीविजुअल्स हैं। ऐसे तो कई सारे हैं जिन्हें लगता है कि इस मुद्दे को अभी छोड़ देना चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोई लॉबी है। अधिकतर तो यही सोचते हैं कि मनपसंद पोस्ट मिल जाए या मनपसंद जगह ट्रांसफर हो जाए। मुझे तो लगता है कि जिस संविधान पर हाथ रखकर इन्होंने शपथ ली है, आधे भी उसका अर्थ ठीक से नहीं जानते होंगे।

अब तो बिल पास हो गया तो अब क्या करें?
बिल तो शुरुआत है। जब संसद फेल होती है तो जनता शुरू होती है। हमें संविधान ने यह अधिकार दिया है कि हम शांतिपूर्वक सभा कर सकते हैं और प्रदर्शन कर सकते हैं। हम यह अधिकार भूल चुके हैं। इसे हमें इस्तेमाल करना होगा, अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे? सरकार हमारी नागरिकता पर सवाल उठा रही है तो हम सरकार ने अब नहीं पूछेंगे तो कब पूछेंगे? नोटबंदी में हमारा पैसा तीन महीने बाद वापस किया, ऐसे ही हमारी नागरिकता ले ली जा रही है जो कब वापस होगी, नहीं पता। 

Monday, March 12, 2018

कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए...

मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश, कि चलो फ्रीलांसिंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे।
दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, सस्‍ते का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।
इसी बीच बीवी ने एक दि‍न खुशखबरी दी तो पत्रकार महोदय ने मंदि‍र में जुगाड़ लगाकर प्रसाद में चढ़े दो तीन कि‍लो लड्डू हथि‍याए और दफ्तर में सबका मुंह मीठा कराया। साथि‍यों ने जै-जै की, पत्रकार महोदय फूले। मैंने भी देखा, बाइचांस वहीं थी। सबकुछ ठीक चल रहा था कि पांचवे हफ्ते डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ भी ठीक नहीं। बीवी को भर्ती कराया, बच्‍चा गंवाया। डॉक्‍टरनी ने तो फीस नहीं ली, मगर साढ़े नौ हजार की दवाइयां लि‍ख दीं।
साथी पत्रकारों  ने मदद की, फि‍र भी साढ़े चार हजार रुपए की कमी थी। पत्रकार महोदय को वही अधि‍कारी याद आए, जि‍न्‍हें उनके बड़े भाई ने सहारनपुर में उनका लोकल गार्जियन बनाया था। ये पहुंचे उनके पास, लेकि‍न मुश्‍किल ये कि बतौर पत्रकार तो उन्‍होंने उस अधि‍कारी की भी बेजा हरकतें अखबार-ए-आम की हुई थीं। अब बोलें तो बोलें कैसे। बड़ी मुश्‍किल से अटक-अटक कर मुसीबत के बारे में बताया। अंत में मदद की दरख्‍वास्‍त की- यह कहकर कि सात तारीख को पूरी रकम चुका देंगे। अधि‍कारी महोदय ने कहा- सोचेंगे।
पत्रकार महोदय के मुताबि‍क उन्‍हें अंदाजा हो गया था, सो अधि‍कारी के यहां से बाइक लेकर नि‍कले और पहुंचे सीधे मि‍स्‍त्री की दूकान पर। बाइक बेच दी और उसकी जगह ली एक और भी सस्‍ती और तीसरे दि‍न खराब रहने वाली बाइक। बचे हुए पैसों से दवा खरीदी और घर पहुंचे।
कुछ समय पहले उनसे बात हो रही थी। बता रहे थे कि लाला ने मजीठि‍या न देने के लि‍ए चार बार साइन कराए हैं। फि‍र उसी अधि‍कारी की याद दि‍लाई। बोले कि दि‍ल्‍ली रोड पर वसूली करते वि‍जलेंस वालों ने पकड़ा। कहने लगे- आप तो वापस चली गई थीं, मगर इस अधि‍कारी ने संपादक के पास लि‍खकर शि‍कायत की थी और मेरी रि‍कॉर्डिंग भी कर ली थी। लेकि‍न रिकॉर्डिंग में भी मैंने कोई गलत बात नहीं की थी, इसलि‍ए संपादक जी ने छोड़ दि‍या। दफ्तर आकर भी उन्‍होंने बहुत हंगामा कि‍या तो संपादक जी ने उनसे कहा कि आप मुकदमा दर्ज कराइए। वो तो पुलि‍स में नहीं गए, मगर अब पुलि‍स उन्‍हें जरूर ले गई।
अब उन्‍हें महीने में साढ़े बारह हजार रुपए तनख्‍वाह, पांच सौ मोबाइल और हजार पेट्रोल के मि‍लने लगे हैं। आलू प्‍याज वैसे ही साथी पत्रकार के गांव से बि‍ला नागा आ जाती है, जैसे आठ दस साल पहले आती थी। पैसे पहले बीस बाइस को खत्‍म होते थे, अब तो 18 तक का भी इंतजार नहीं करते और अगर सात को संडे पड़ गया तो नौ तक ही मि‍लते हैं। हर महीने आधी तनख्‍वाह एडवांस में कटती है। मैंने उनको कई बार कहा कि वि‍चार से जीवन नहीं चलेगा, कुछ कमाई करि‍ए। रि‍पोर्टर हैं तो अधि‍कारि‍यों से या कि‍सी से भी कुछ कमाने की सेटिंग करि‍ए। बोले, एक जगह मैगजीन डि‍जाइन करने का काम मि‍ला है, महीने में दो बार करना है, ढाई दे देंगे। कुल मि‍लाकर वो वैसे कमाने के लि‍ए नहीं मान रहे हैं, जैसे कि मैं कह रही हूं।
बात सहारनपुर के पत्रकार की ही नहीं है, कहानी अकेले एक अखबार की भी नहीं। पहले संपादक भी सबकी सोचते थे, अब तो संपादक वह जीव है जो सबसे ज्‍यादा सैलरी इसलि‍ए लेता है कि पत्रकारों को सबसे कम सैलरी दी जा सके। तुर्रा ये कि पत्रकारि‍ता का त भी न पहचानने वाले जब तब उन्‍हें भ्रष्‍ट कहते रहते हैं। जानते हैं, पत्रकार दुनि‍या का अकेला ऐसा जीव होता है जो दुनि‍याभर के लि‍ए आवाज उठाता है, पर खुद के लि‍ए ऐसे खामोश हो जाता है, जैसे कि‍सी ने जबरदस्‍ती उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर बांध दि‍या हो। याद करि‍ए आखि‍री बार शहर में कब पत्रकारों को अपने लि‍ए आवाज उठाते देखा।
पत्रकार अगर भ्रष्‍ट हैं तो मैं कहती हूं कि‍ उन्‍हें और भी भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए। तब तक पूरी तरह से भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए, जब तक कि उनका और उनके परि‍वार का पेट तीन वक्‍त न भरे। धर्म भी यही कहता है। जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं। उन्‍हें अपनेे ही बच्‍चों की भूख भरी आह लगेगी।
जि‍स कि‍सी को इस भ्रष्‍टाचार से दि‍क्‍कत है, तो पहले वह पत्रकारों की मदद करना शुरू करें, तभी उनकी भी दि‍क्‍कत खत्‍म होगी, पत्रकारों की भी। कुछ नहीं कर सकते तो कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए। जबरदस्‍ती। पत्रकारि‍ता हमेशा समाज के भरोसे ही आगे बढ़ती आई है, न कि सत्‍ता के। सत्‍ता के भरोसे होती तो सत्‍ता उसे कब की मिटा चुकी होती। चीन में देखि‍ए, मि‍टा ही चुकी है। दि‍ल्‍ली, लखनऊ, पटना, कलकत्‍ता का चश्‍मा उतारकर जरा उन शहरों के पत्रकारों की भी खबर लीजि‍ए, जहां से खबरें आती हैं। जोगेंद्र सिंह और राम चंदेर प्रजापति याद हैं या भूल गए?

लेखिका- रोहिणी गुप्ते

Thursday, February 22, 2018

जो है, वह था हो गया है

समझता हूं कि सब समझते हो नीला बाबू। देखता हूं कि सब देखते हो नीला बाबू। पाता हूं कि सबकुछ तो पा जाते हो नीला बाबू। फिर क्या है जो रुके हो? यूं ठिठकना ठीक नहीं नीला बाबू। रेल जा रही है। जाओ, बैठ जाओ। चलने की स्थिर हिलन में शायद चल सको। कुछ कदम। शायद तय कर सको वह फासले, जो बाकी रह गए हैं। जो हैं, जो नहीं हैं। फासले हैं नीला बाबू?

रंगरेज के रंग उबल रहे हैं। सुबह पत्थर के कोयले भरे थे। आंच तेज है और पत्थर लाल। लाल तो रंगरेज का चेहरा भी है, आंख भी। आग आंखों में है, आंच भी। उबलते रंगों की भाप महज कपड़ा नहीं रंगती नीला बाबू, मन भी रंगती है। मन के कपड़े पहनते हो? मन में कैसे दिखते हो नीला बाबू? मन का रंग कैसा है? रंग है। रंग है ना नीला बाबू?

जानता हूं बुंदे नहीं दोगे। सुख सिर्फ गांव के चौधरी का है। ताला भी चौधरी का है। चाबी भी उसी की है। तुम क्या हो नीला बाबू? ताला? चाबी? बुंदे? सुख? या महज एक गांठ?

ये अधूरा ही रहेगा नीला बाबू। ये गांठ नहीं खुलेगी। ये सुख नहीं मिलेगा। ये कपड़ा नहीं रंगेगा। ये रेल रुक गई है। फासले बढ़ गए हैं। गांठ कड़ी हो गई है। जो है, वह था हो गया है। जो था, वह कभी था ही नहीं। जाने दो नीला बाबू। तुमसे न हो पाएगा। तुमसे ये गांठ न खुलेगी नीला बाबू। बड़ी जुगत लगानी होती है खोलने के लिए।
चाचाजी की दोस्तियां















मिलेगा तो देखेंगे: 24

Wednesday, February 21, 2018

सुख है!

जाते-जाते जाता है दुख। आते-आते आता है सुख। तुम्हारा आना, सुख का आना है। तुम्हारा जाना, सुख का जाना है। जाते-जाते जो जाता है, वह तुम्हारे जाने जितनी जल्दी नहीं जाता। सुख की बात समझते हो ना नीला बाबू? सुखी कैसे दिखते हो नीला बाबू? हमको भी सिखाओ सुखी दिखना। हमने भी सीखना है सुख! क्या कहा? दूर से सिखाओगे? कितनी दूर से?

हिंदी में कोई सुख नहीं है नीला बाबू। बिंदी में भी कोई सुख नहीं है। तुम्हें मिला? तो फिर धोती में बुंदे बांधकर क्यों घूम रहे हो? पीठ पर चिपकाकर क्यों घूम रहे हो? ऐसे क्यों दिखाते हो जैसे धोती में सुख बांधकर घूम रहे हो? क्यों कहते हो कि सुख पीठ पर चिपकता है? अच्छा बताओ, धोती में बंधा सुख कब निकालते हो? और पीठ से? जब नहीं निकालते हो तो क्या निकलता रहता है नीला बाबू? जो है? है क्या? क्या है नीला बाबू? सुख है? कहां है? धोती में बंधा है? पीठ पर चिपका है? सुख पर गांठ क्यों लगा रखी है नीला बाबू? गांठ कब खोलोगे सुख की? या यूं ही बोलोगे- सुख है!

हंसते हो? हंसो। हंसने में सुख है। हंसने में सुख है? वाकई है? हंसना सुखी होना है? नहीं नीला बाबू, नहीं। हंसना सुखी होना नहीं। दुख एक चुटकुला है नीला बाबू, कब समझोगे? हंसी है। किससे लिपटी है हंसी? मेरी तरह छत देखकर हंसते हो? दीवार देखकर? जमीन देखकर? सड़क, गली या बिजली का खंबा देखकर? नहीं नीला बाबू, दिमाग नहीं चला है मेरा। दुख चल रहा है। दुख में हंसता हूं नीला बाबू। दुख पर हंसता हूं। हंसता तो हूं ना नीला बाबू? नहीं?

गांठ में सुख बांधकर मुझे भी चलना है नीला बाबू। पुरानी ख्वाहिश है। जब चाहा, गांठ खोली और कतरा भर सुख सूंघ लिया। सूंघने से सुख तो मिल जाएगा ना नीला बाबू? नहीं? क्यों नहीं? नाक में बसाना है सुख। आंखों में लगाना है सुख। तुम कहोगे तो सिर पर भी पहन लूंगा, गांठ तो खोलो नीला बाबू! या अपने पास ही बांधे रहोगे सुख के बुंदे? मुझे भी तो पहनाओ थोड़ा सा सुख। धान का पुआल दुआरे पड़ा है। बटकर नई रस्सी बनाई है। ढीला होगा तो कसकर बांध लूंगा। दो तो सही! सुख की गांठ खोलो तो सही नीला बाबू!

(परसाई हंसते थे। हंसते थे?)

मिलेगा तो देखेंगे- 23

शब्द शब्द सांस कहो!

दूर कहो
पास कहो
रंग कहो
रास कहो।

गंध कहो
बास कहो
शब्द शब्द
सांस कहो।

नूर कहो
आस कहो
भरी भरी
टास कहो।

सूर कहो
दास कहो
तृप्ति कहो
प्यास कहो।

गीत कोई
आज कहो
मीत मेरे
साथ कहो।

Tuesday, February 20, 2018

समेट लो अपना अपना आलता


याद में कौंधते बियाबानों को भूल जाएं। सांस में आता महुआ बिसरा दें। कान की लौ चुंभलाती गर्म हवाओं को फूंक मारकर उड़ा दें, तो भी बड़ी देर तक सुख का धुंआ धीमे-धीमे निकलता रहता है, बहता रहता है। एक फिल्म है जो चलती रहती है। संगीत है जो बजता रहता है। कागज है, जो उड़ता रहता है। हवा है, जो बहती रहती है। और पैर हैं जो ठहरते रहते हैं। सुख की चौखट किस चौखट है, किस देहरी है, किस दुआरे है, किस किनारे है? है भी या कौंधते बियाबानों में किसी पीपल के पीछे छुपी है जिन्हें पत्तियों के पीछे से चटकती धूप में मैं नहीं देख पाता? दिखता नहीं है, दिखते की उम्मीद भी नहीं। फिर भी कैसी है ये मेड़, जिसपर गिरते-रपटते चला जा रहा हूं? कहां हैं मेरे धान के खेत?
उस दिन तिवारी जी चुनौटी में रखे दो बुंदे दिखा रहे थे। काली माई के थान पर बैठकर पूरे गांव को सुना रहे थे कि दुनिया में अगर कहीं सुख है तो चुनौटी में है और चुनौटी में रखे दो बुंदों में है। मन तो हुआ कि वहीं दोनों बुंदे छीनकर उसकी सुर्ती बना दें, मगर तेवराइन का ख्याल आ गया जो आते जाते गर्म नजरें फेंका करती हैं। ऐसे ही आता है सुख जो नजरों से सहलाकर फिर अपनी चौखट के उस पार जाकर मुंह पर पल्लू लपेट लेता है। दिखता है, छुप जाता है। छुपकर और भी छुप जाता है।
याद से थोड़ा सा काजल निकालूं? एक टिकुली? आलता? पिछली बार आलता लगाया था। आईसीयू की उजली चादरें गुलाबी हो गई थीं। भागी-भागी नर्स आई और बोली- पैरों से तो रंग निकल रहे हैं। ऑक्सीजन मास्क निकालकर बोला- सुख निकल रहा है सखी। देखकर बताओ- पूरा तो निकल गया ना? बोलती है- थोड़ा बाकी है। नाखून बड़े हो गए हैं।
चैत आने वाला है। कहां है तुम्हारी चुनरी? तेवराइन, तुम भी अपनी धोती लाओ। अभी मेरे पैरों में थोड़ा सा सुख लगा हुआ है। पैतानों पर मसलते-मसलते किनारे तो कोरे हो गए, पोरों में अभी भी रंग बचे हैं। लो, रंग लो अपनी चुनरी। भिगो लो अपनी धोती। इससे पहले कि नदी पार करते-करते सब धुल जाए, समेट लो अपना अपना आलता।

मिलेगा तो देखेंगे- 22

Monday, February 19, 2018

ये सारे रंग तुम्हारे हैं

दिखाते कुछ हो, सुनाते कुछ हो?
कहते कुछ हो, बताते कुछ हो?
पता है रंग नजदीक है?
रंग आ रहे हैं।
तुम्हारा सुनाना लाल है। चटक लाल।
बुरांश देखा है ना?
खिला और खिलकर आग लगाता बुरांश।
जानते हो कि पहाड़ों में दो चीजें दूर से दिखती हैं?
श्मशान और बुरांश।
दोनों जंगल में लगी आग होती हैं।
एक गर्म तो एक ठंडी।
तुम सुनाते हो तो हिमशैल टकराते हैं। सबकुछ टूटने लगता है। बिखरने लगता है।
तुम्हारी आंख में जो आवाज है, वह सबकुछ पिघला देती है।
सब बिखरकर बूंद बूंद टपकने लगता है। सारी रात टपकता रहता है। दिन भर बहता रहता है।
और कितना हरा है तुम्हारा बताना!
बताते हो या समेटते हो?
उसी बाग में लेकर जाते, जिसका सपना रोपा था।
दूर तक हरा देखते रहने का सपना।
सपने बड़े हो रहे हैं। सपने हरे हो रहे हैं।
बताते हो या खुद में भरते हो?
इतना भरोगे, सब हरा करोगे तो कहीं...
कहीं सपनों में अमलतास न भर जाए।
और फिर सबकुछ बताकर उसमें बुरांश का गुच्छा क्यूं टांकते हो?
बंद करो अपना सुनाना बताना। कहना दिखाना सी दो।
बाग कटते जा रहे हैं। बुरांश का जूस निकाला जाएगा।
न लाल बचा है, न हरा बच पा रहा है।
पीला धूप खा गई।
मगर रंग तो नजदीक हैं।
रंग तो आ रहे हैं।
दिखाना, सुनाना, कहना, बताना तो खर्च हो गया।
फिर? 
मेरी सुनो।
मेरे पास कुछ रंग बचे हैं।
सूख गए हैं।
छू दो, गीले हो जाएंगे।
लगा लो, तुम्हारे हो जाएंगे।
ये सारे रंग तुम्हारे हैं।
तुम्हारे ही तो हैं।
कुंभ, प्रयाग।

















मिलेगा तो देखेंगे- 21 

Monday, November 27, 2017

भारतदेश की पुड़िया मंदिर कथा- हाथ जोड़ पालथी मार पढ़ना

तीन चार दशक पहले की कथा है। भारतवर्ष में डकैतों का एक नामी गिरोह हुआ करता था। इस गिरोह की खास बात यह थी कि यह पहले ठगी करता था, फिर ठगे हुए लोगों के घर में घुसकर दिन दहाड़े डकैती डाला करता था। गिरोह के पास ठग विद्या की जो पुड़िया थी, उसमें बस एक ही सुंघनी थी। डकैती लायक कोई भी शख्स जब इन्हें दिखता, फट ये गिरोह या गिरोह का मुखिया वह पुड़िया खोलकर उसे दिखाने लगता।

आरंभ में तो लोग इस पुड़िया को देखते, सूंघते और फिर पुड़िया से निकली ठगी में लसकर उसका गुणगान करते-करते अपना सबकुछ डकैतों के हवाले कर देते। जब डकैतों ने राह चलते लोगों पर पुड़िया का यह असर होते देखा तो उनकी हिम्मत बढ़ी। अब वह पुड़िया लेकर देश के घर घर पहुंचते, पुड़िया दिखाते और डकैती डालकर अगले घर का रुख करते। ऐसा करते करते इन डकैतों ने पुड़िया को भगवान बना दिया और लोगों को पुड़िया मंदिर बनाने का सपना दिखाने लगे। पुड़िया के नशे में झूमते लोगों को भी चहुंओर पुड़िया मंदिर दिखाई देने लगा। इधर डकैतों ने पुड़िया मंदिर का सपना दिखाकर अपना खजाना भर लिया और चुप हो गए।

कुछ दिन बाद डकैतों के मुखिया को उसके सहयोगी ने सूचना दी कि खजाना खाली होने वाला है और स्वर्ण मुद्राएं तो चूहे कुतर गए। यह सुनकर डकैतों का मुखिया हौले से मुस्कराया। उसने जेब से वही पुरानी मुड़ी-तुड़ी पुड़िया निकाली और सहयोगी से बोला- इसे राजप्रासाद के कंगूरे पर चढ़कर लोगों को दिखाओ। जैसे ही लोगों को पुड़िया दिखेगी, उनके मन में उसी पुराने नशे की आकांक्षा प्रबल हो उठेगी और हमारी पुड़िया फिर से काम कर जाएगी।

पुड़िया दिखाकर खजाना भरते-भरते इन डकैतों को तीन दशक बीत गए। तीन दशक तक लोग जब कुछ भी पूछते, कुछ भी कहते तो उन्हें वही पुरानी पुड़िया दिखा दी जाती। तीन दशक के बाद जब लोगों को पुड़िया सूंघने की लत कुछ यूं लगी कि सूंघना या न सूंघना बराबर लगने लगा। इधर डकैतों का खजाना फिर से खाली होने लगा था।

डकैतों के चिंतातुर मुखिया ने यह देख जेब से वही मुड़ी-तुड़ी पुड़िया निकाली तो देखा कि उसमें तो उन ईंटों का मलबा भरा है, जो उसने पुड़िया मंदिर के निर्माण के लिए दान में ठगी थीं। अब मलबे से मंदिर तो नहीं बनने वाला, मगर किसी को यह नहीं पता था कि पुड़िया के अंदर मलबा भरा है। उसने पुड़िया की पुड़िया देने के लिए उसका प्रदर्शन करने के लिए राजधानी से दूर पुड़िया धर्म सभा आयोजित कराई।

इस धर्मसभा में देश भर के डकैतों का आगमन हुआ। मुखिया डकैत द्वारा बहला फुसलाकर घर से भगाई गई स्त्रियों ने सभी डकैतों के चरण कमल धुले, दबाए और डार्शीवाद लिया। देश के सरकारी सेवाओं ने पुड़िया सभा का सीधा प्रसारण किया। बस यहीं पर डकैतों से चूक हो गई। हुआ यूं कि जब डकैत मुखिया ने जेब से मलबों भरी पुड़िया निकाली और दिखाने के लिए दोनों हाथों में रखकर उसे ऊपर किया, ईंट का एक टुकड़ा टप से नीचे गिर पड़ा। भांग के नशे में झूमते दूसरे डकैतों को तो यह नहीं दिखा, मगर सरकारी सेवाओं के कैमरों से भला यह कहां छुपने वाला था।

देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया कि पुड़िया में मंदिर नहीं बल्कि उसका मलबा है। जिन लोगों ने पुड़िया के बारे में सुना भर था, वह मलबा मलबा चिल्लाने लगे और जिन्होंने पुड़िया गलती से भी सूंघ ली थी, वह मंदिर के बहाने बनाने लगे। इस बीच दूसरे राज्य से आए प्रतिगमन मिश्रा ने डकैत मुखिया को पीछे से एक टीप मारी और पूछा- दिखता नहीं क्या गिरा रहे हो? डकैत मुखिया बोला- हमारा काम गिरा देना है, यह देखना नहीं कि क्या गिरा, कौन गिरा और कितना गिरा। संयोग से यह वार्तालाप भी सरकारी चैनल पर प्रसारित हो गया।

अब तो जितने गिरे दबे कुचले लोग थे, उनमें जांबियों की आत्मा आ गई। वह धीमे-धीमे उठने लगे, उठकर खड़े होने लगे, खड़े होकर चलने लगे और चलकर पूछने लगे। सबको पुड़िया चाहिए थी, मगर पुड़िया में मलबा था, यह भी सबको पता था। देखते ही देखते पुड़िया देने वाला डकैत मुखिया जांबियों से घिर गया। उसका क्या हुआ? उसका क्या होगा जैसे सवालों के जवाब उन्हीं जांबियों के पास हैं, जो आज भी पुड़िया मांग रहे हैं।

Tuesday, February 7, 2017

नवयुग में निसपच्छता के पराठे (सिर्फ सहाफि‍यों के लि‍ए)

निसपच्छता नामक एक चीज होती है। यह नामक भी होती है और मानक भी होती है। जो लोग इसे नामक मानते हैं वो इसे नमक की तरह लेते हैं। जो लोग इसे मानक मानते हैं वो इसे मन में बसा लेते हैं। निसपच्छता स्वच्छता की अम्मा भी होती है। अगर कोई निसपच्छ नाली में भी पड़ा होगा, तो भी वह साफ माना जाएगा क्योंकि वो निसपच्छ है। निसपच्छ है इसलिए स्वच्छ है। जो लोग निसपच्छ नहीं होते, वो स्वस्थ नहीं होते। अस्वस्थ लोगों के मन में अस्वस्थ दिमाग का वास होता है। अस्वथ दिमाग में स्वच्छ निसपच्छता नहीं रह सकती क्योंकि वहां पहले से ही पक्षधरता के कीड़े बिलबिला रहे होते हैं। निसपच्छता के लिए दिमाग को धोकर स्वच्छ बनाना होता है। उसके बाद उसमें निसपच्छता भरनी होती है। यह कार्य हमें मंगल, गुरु और शनि की शामों में अगरबत्ती जलाकर करना होता है। सोम, बुध और शुक्र को हम निसपच्छता का स्वच्छता के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इतवार को निसपच्छता की छुट्टी होती है तो वह संडास नहीं जाती।

हमें अपने मन में निसपच्छ रहना चाहिए। फैसला करते हुए हमें अपने मन की नहीं सुननी चाहिए। हमें अपने दिमाग की सुननी चाहिए। मन में निसपच्छता पक्षधारी हो जाती है। इसलिए उसे दिमाग में शिफ्ट कर देना चाहिए। इसके लिए अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स की मदद लेने में कुछ भी मायूब बात नहीं। निसपच्छ लोगों को चाहिए कि वह अपनी अपनी कुर्सी से उतरकर सावधान खड़े हो जाएं। हिलना डुलना पूरी तरह से मना है क्योंकि इससे किसी एक पक्ष की तरफ गिरने का खतरा है। गिरने पर निसपच्छता टूट जाती है और गंदी भी हो जाती है। वैसे बाद में इसे फेवीक्विक लगाकर जोड़ भी सकते हैं और नए निसपच्छ बनने वालों को सहाफत डे पर गिफ्ट दे सकते हैं। निसपच्छता को आप बाहर से नहीं सीख सकते। इसे आपको अपने अंदर उगाना होता है। यह दिमाग पर उगने वाला आत्मा का हरा पेड़ है जिसकी पत्ती उसी के सिर पर निकली नजर आती है, जो वाकई निसपच्छ होता है।

जब व्यक्ति वाकई निसपच्छ होता है तो वह अपने मन को बराबर के सत्तर-सत्तर खानों में बांटकर उसमें मोजे रख देता है। यह सारे मोजे वक्त आने पर निसपच्छ रहते हुए सभी पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिए जाते हैं। इससे सब खुश हो जाते हैं और निसपच्छता का भी धंधा चलता रहता है। निसपच्छ दिमाग को याद रहना चाहिए कि निसपच्छता का धंधा होता है, न कि धंधे में निसपच्छता। उसे धंधे की पक्षधारिता का सम्मान करते हुए पूरी तरह से निसपच्छ पराठे ही खाने चाहिए, वह भी पत्तागोभी भरे हुए। याद रखिए, अगर आप निसपच्छ रहेंगे तो सब आपसे प्रेम करेंगे, लेकिन अगर आप पक्षधारी होंगे तो कुछ ही आपसे प्रेम करेंगे। धंधा सबके प्यार से चलता है, कुछ के प्यार से नहीं।

Sunday, November 6, 2016

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं और इसी आलम में वो सड़क पर उतरकर धुंए का विरोध कर रहे हैं। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता! मैं जो जानता हूं, वो ये कि मेरे अंदर भरा धुंआ बहुत जल्द मुझे सड़क पर ला पटकेगा। धुंआ नहीं पटकेगा तो मैं खुद को ही सड़क पर पटक दूंगा।

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं, लेकिन सड़कों पर भी नहीं उतर सकते। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता!

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

Saturday, August 27, 2016

हम लोगों के घरों में सोना नहीं मिलता

दोनों लड़ रहे थे। दोनों डर रहे थे। दोनों एक दूसरे से दूर भाग जाना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर एक दूसरे को खत्म कर देना चाह रहे थे। दोनों विरोधी थे। दोनों चिपके हुए थे। एक के हाथ में दूसरे का बाल था तो दूसरे ने पहले का हाथ उमेठ रखा था। एक दूसरे से दूर होने के इच्छुक दोनों इस डर से दूर नहीं हो पा रहे थे कि उनमें से कोई एक लौटकर पास आ गया तो? इसी तो के चक्कर में दोनों उलझे हुए थे। तो का चक्कर तो कंगना के साथ भी चिपकाया गया था, तो?

इसी बीच एक कवि ऐलान करता था कि वह बहुत नहीं है। उसके पहले वह कह चुका था कि वह कहीं नहीं है और उसके कई साल पहले वह कह चुका था कि वह नहीं है। हालांकि ज्यादा नहीं तो कुछ एक लोग, जिनने उसकी इकलौती किताब पढ़ी थी, वो जानते थे कि कवि अक्सर उस खिड़की से झांकते होता रहता है जो उसके किसी एक बनबिगड़े घर के बाहर खुलती थी। बस कवि कमरे में नहीं होता।

एक कमरा है। एक न होने लायक कमरा है। आमतौर पर कमरे में चार दीवारें होती हैं, लेकिन उस कमरे में छह दीवारें हैं। कमरे को अपने कमरे होने के बारे में कोई भ्रम नहीं है। कवि को है, लड़नेवाले को है, हो सकता है कंगना को भी हो। हो तो हो। तो?

मैं सोना तलाश रहा हूं। नींद मेरी जेबों में ही नहीं, बुश्शर्ट के कॉलरों और कफों में भी भरी है। नदी नहाने गए लड़कों की जेब में तलाशी लेता हूं तो उसमें आलपिन मिलती है। एक की जेब में पांच पैसा मिलता है लेकिन सोना नहीं मिलता। हम लोगों के घरों में सोना नहीं मिलता। किसी के यहां मिलता भी है तो बक्से में, न कि जेब में। लेकिन मुझे वाकई नहीं पता, इसलिए मैं जेब ही टटोलता हूं।

दुनिया भरी भरी है सर। मैं भी भरा भरा हूं। मजे मजे में मजाज ने नोंच-नाच के मजा ले लिया। डाक्टर साहब ने कुल्हड़ रखवाकर उसपर लिंटर डलवा लिया। रामू के कैंप से भागकर लोग टाटशाह मस्जिद की छत पर बैठकर अपनी शामें खाली करने लगे। नेताजी ने धांसू बयान दे दिया। मनोज श्रीवास्तव सभासद की पत्नी सभासदी जीत गईं। इंडिया मार्का पंप पर नेतानी का सिर फूट गया। साइकैट्रिस्ट के सामने बैठी लड़की ने सबकुछ खाली कर दिया।

ऊपर से नीचे तक सब झूठ है। भरोसा रखें। नहीं है? तो?

डिस्क्लेमर: मैं टीवी नहीं देखता।

अंदर कश्मीरी लाठी खाते हैं, बाहर मैं लात

ये इस देश में मेरे ख्‍याल से सबके साथ सबसे बड़ी समस्‍या है। लोग हंसते हुए घर से नि‍कलते हैं कि वे बड़े सुखी हैं, लेकि‍न दस मि‍नट बाद नर्क की बातें करने लगते हैं। ठेले से एक पर्सेंट ठीक खाना मि‍ल जाता है तो लगने लगता है कि सारा कश्‍मीर मि‍ल गया, कश्‍मीर के सारे बाग मि‍ल गए। दो महीने बाद कोई रि‍श्‍तेदार आके पूछ लेता है कि गुरु, सेहत बना रहे हो क्‍या? बस उतने में ही फूलकर सब अपनी अपनी कंपनी पर लहालोट होने लगते हैं। हालांकि रि‍श्‍तेदार के जाने के बाद ये भी कहते देखे जाते हैं कि कंपनी वंपनी कुछ नहीं, कहीं कोई आजादी नहीं है। दोस्‍त सुनते ही समझाने के मोड में आ जाते हैं कि गुरु, आजादी तो कहीं नहीं है। न कंपनी के अंदर न बाहर। बड़ेघर में भी ठीक ठीक आजादी नहीं मि‍लती।

मैंने सोचा है कि चने का अचार बनाउंगा। लौकी का भी और तुरई का भी। अगर स्‍कॉर्पियन यहां बन सकती है, अगर पर्रिकर रक्षामंत्री बन सकते हैं और अगर फ्रांस बुर्किनी उतार कर चालान कर सकता है तो तुरई का अचार आने वाले सात साल तक सुरक्षि‍त रखकर देखा और मन होने न होने पर खाया भी जा सकता है। देश को नर्क से नि‍कालने के लि‍ए अचार खाना जरूरी है। लि‍खना जरूरी नहीं है, पढ़ना तो बि‍लकुल नहीं। कि‍ताब की बात करना फालतू का काम है। कवि‍ता गरीब की लुगाई है। आजाद तो सिर्फ गोवा है, थोड़ा बहुत युसुफ भाई भी हैं, कुछ दि‍न में पूरे हो जाएंगे। महबूबा... एक बार तो बगैर मुफ्ती के मि‍लो। आई वि‍ल टेक योर ऑल व्‍यू इन माई मर्तबान। यू नो आइ लव अचार। डोंट यू नो? यू मस्‍ट नो!! आफ्टरऑल, आई एम एन आईटीयोआइयन!! यू मस्‍ट मेक एन आईटीओ देयर एट लाल चौक।

भारतीय नामपंथ के वि‍रोध में कौन कौन है। प्‍लीज जल्‍द बताएं। एक स्‍मारि‍का नि‍काल रहा हूं जि‍समें वो सारे होंगे तो नामपंथ के वि‍रोध में हैं, नाम के वि‍रोध में हैं, पंथ के वि‍रोध में हैं, संधि के वि‍रोध में हैं, वि‍च्‍छेदों के वि‍रोध में हैं, छेदों के वि‍रोध में हैं और इन सारे विरोधों के विरोध में हैं। जो भी वि‍रोध में हैं अगर वो नहीं हैं तो वही बता दें जो सिर्फ हैं। जो कहीं नहीं हैं वो मंडी हाउस आकर मुझसे मि‍ल सकते हैं। मैं भी कहीं नहीं हूं। जो है वो बस एक सटकन है!!

कश्‍मीरि‍यों, तुम चिंता न करो। मैं भी नहीं कर रहा। लाठी खाना तुम्‍हारी नि‍यति है और लात खाना मेरी। जैसे तुम्‍हारे साथ कई सारी आत्‍माएं लाठी लेकर चलती रहती हैं, वैसे ही मेरे साथ कई आत्‍माएं लात लेकर चलती रहती हैं। कश्‍मीर में तुम कहीं भी रहोगे, लाठी खाते रहोगे। कश्‍मीर के बाहर मैं कहीं भी रहूंगा, लात खाता रहूंगा। हम दोनों का खाते रहना, खाके बैठे रहना लोगों को ज्‍यादा जरूरी महसूस होता है। हम लोगों का कुछ भी करना, कर लेना वाजि‍ब नहीं। मैं अब चुप होता हूं। तुम तो चुप कर ही दि‍ए गए हो।

Thursday, March 3, 2016

हिंदी कैसे लि‍खें

हिंदी कैसे लि‍खें? कैसे लि‍खें हिंदी कि अभी तक जि‍तनी लि‍खी गई है, उसकी जब तक चिंदी चिंदी ना उड़ जाए, मा कसम, हिंदी लि‍खते रहें- कुछ ऐसे लि‍खें हिंदी

कैसे लिखेंगे हिंदी कि अभी तक कि‍तने हिंदी लि‍खने वाले कीपैड को क्रुति‍ देव और मंगल समझे हुए हैं और इससे भी दो कदम आगे कि रेमिंगटन, फोनेटि‍क और रोमन को समझना उनके सपने में भी नहीं आता।

जि‍तनी तरह से उंगली चल सकती है, उतने तरह के कीपैड बने हैं और मुई मोबाइल कंपनि‍यां हर मॉडल के साथ एक ठो और जोड़के दुनि‍या को कि‍स अंधेरे जाल में ले जाना चाह रही हैं, नहीं पता। नो सर.. जानना भी नहीं है।

आइपैड खोलि‍ए तो अलग कीबोर्ड, मोटो जी का मोबाइल खोलि‍ए तो अलग, सैमसंग का खोल लीजि‍ए तो उसमें भी अलग। कंप्‍यूटर पर तो अलग हइये है। कीबोर्डों के जंजाल में फंसा आदमी जाए तो कहां जाए और उधि‍राए तो क्‍यों न उधि‍राए

हम अपलि‍टि‍कल हुए इल्‍जाम लगाना चाह रहा हूं कि आधी चड्ढी पहनने वाले इसी जंजाल से मुक्‍त होने के लि‍ए इतना छनछनाए हैं। अगर देश सुलग रहा है तो उसमें काफी सारा हाथ उंगलि‍यों के सरल स्‍वाभावि‍क नृत्‍य को तांडव में बदलना है। और दीजि‍ए ढेर सारा कीपैड।

एक तरफ वि‍देशी हैं कि एक बटन पे पूरी दुनि‍या लाके रख दि‍ए हैं और एक दांत काटा सेब चि‍पका के सबका हाथ एक बटन पे नचा रहे हैं और एक हम हैं कि हमारे लि‍ए सबसे अच्‍छा वही जि‍समें सत्रह बटन पंद्रह काज हो।

रवि भाई एक ठो बनाने की कोशि‍श कि‍ए रहे, अगर ये न होता तो आपका तो पता नहीं लेकि‍न मेरा काफी कुछ डि‍स्‍बैलेंस हो गया होता। सधे रहि‍ए, नॉर्मल रहि‍ए और कंप्‍यूटर या लैपटॉप पे हिंदी लि‍खने का लि‍ए यहां क्‍लि‍क करि‍ए। 

बाकी तो जीवन और हिंदी जैसी चल रही है, वैसी चलती ही रहेगी। बल्‍कि‍ जब जब संघी सरकार आएगी, आशा है कि नई नई हिंदि‍यों का जन्‍म होगा जो गूगल के सर्च इंजन सेटिंग को ध्‍वस्‍त करते हुए सीधे मंगल ग्रह तक मार करेगी। 

Saturday, February 21, 2015

कि‍सी शहर में खड़े खड़े

पेरि‍स के कि‍सी स्‍टेशन पर कभी खड़े खड़े
कई बार उस आदमी ने सोचा कि खुद को शहर में कहीं तो खड़ा पाए। न खड़ा पाए तो कम से कम बैठा या लेटा तो पाए। इनमें से कुछ भी न पाए तो खुद से चार गुनी बड़ी कांच की खिड़की से शहर को देखता पाए या फि‍र सर्द कांच के कठोर केबि‍न में कि‍सी कि‍नारे खुद को पाए, लेकि‍न आदमी की इतनी चाहतों के बावजूद, रोज ब रोज की लट्ठमलट्ठे और गुत्‍थमगुत्‍थे के बावजूद आदमी खुद को शहर में खड़ा लेटा बैठा तो दूर, खुद को देख भी नहीं पा रहा था। न फ्लाईओवरों के ऊपर या शॉर्टकट के चक्‍कर में नीचे से गुजरते हुए, न रेड लाइट पर बेशर्मी से भीख मांगती बुढ़ि‍याओं को गरि‍याते हुए, न चाय वाले से नजदीकी बढ़ाते हुए और न ही हर तीसरे महीने एक नया प्रेम करते हुए, आदमी परेशान था कि वो खुद को पा क्‍यों नहीं पा रहा है, कहीं पहुंचा क्‍यों नहीं पा रहा है। साल भर की चार प्रेमि‍काओं और उनके मासि‍क धर्म भी उसे पाने में आखि‍र क्‍यों नहीं कोई मदद कर पा रहे हैं। क्‍या वो आदमी इतना भोथर हो चुका है कि साल भर में चार बार मासि‍क धर्म पूरी तन्‍मयता से नि‍भाने के बावजूद उसके पेट में उठने वाला वो दर्द भी उसे वो रास्‍ता नहीं दि‍खा पा रहा है, जो मुहल्‍ला मोतीबाग की गली नंबर चार से तो कतई होकर नहीं जाता है, भले ही उस गली नंबर चार में चार सौ कि‍लोमीटर साइकि‍ल चल चुकी हो।

हर वक्‍त या तो गांव या फि‍र से गांव में ही खुद को खड़ा, बैठा, लेटा और चढ़ा भी पाने वाला आदमी इन दि‍नों जब खुद को शहर में देखता है तो परेशान हो जाता है कि यहां के पेड़ों की डालि‍यां इतनी कमजोर क्‍यों होती हैं कि उंगली रखने से टूट जाती हैं। क्‍यों नहीं ये डालि‍यां गांव के उन पेड़ों के जि‍तनी मजबूत हैं, जि‍नपर मन भरकर लंफने के बाद भी सटाक से मन नीचे आकर गि‍र जाता था, लेकि‍न डाली मुस्‍कुराती, इठलाती चार पत्‍ती नुचवाकर वहीं पर हि‍लती रहती थी और थोड़ी देर बाद हि‍लनी बंद हो जाती थी। धान तो थोड़ा जिंक, जरा सा नमक या कभी कभी नि‍रमा डालने पर कैसे तो हरा होकर ठठाकर हंसने लगता था, तो क्‍यों यहां के धान इन सबको डालने के साथ-साथ यूरि‍या और पोटाश भी डालने के बाद मुरझाए रहते हैं, और जो दाना देते भी हैं, वो इतना पतला, महीन और अर्थहीन होता है कि आदमी की आर्थिक हालत तक डावांडोल होने लगती है। गांव  में पेड़ लगाता था तो दो दि‍न में ही एक कल्‍ला फोड़ देता था, यहां पर पेड़ लगाता है तो 40-40 दि‍न बाद भी क्‍या मजाल कोई नया कल्‍ला फोड़ें, उल्‍टे गमला जरूर फोड़ देते हैं।


इस शहर में आदमी खुद को खड़ा देखे भी तो कैसे देखे जहां लोग शादी में जाने के लि‍ए न चुकाने वाला उधार तीन-तीन हजार लेकर जाते हैं, लेकि‍न साला कोई हरामखोर अपनी प्रेमि‍का से मि‍लने के लि‍ए चार फूल गुलाब का खरीदने के लि‍ए दो सौ रुपया भी उधार नहीं मांगता।  ठेलों पर चभर चभर हर वक्‍त कुछ न कुछ चबाते चुम्‍हलाते लोगों के चेहरों पर झलकती तफरीह क्‍यों उस शहर को उसके अंदर खड़ा नहीं होने देती या फि‍र तफरीह का सारा मंत्र उस शहर की नींव में घुसकर लगातार खुद को पढ़-पढ़कर भोथरा कर रहा है कि न तो उस आदमी में शहर खड़ा हो पा रहा है और न ही वो आदमी उस शहर में खड़ा हो पा रहा है। होते हुए भी जो छूट गया है, दि‍खते हुए भी जो देखने से रह गया है, वो गांव बार बार क्‍यों उस शहर में आकर बस जा रहा है और आदमी के पैरों को थोड़ा सा और लुंजपुंज बना जा रहा है।

खड़ा होने का सारा ककहरा जि‍स जमीन पर चटाई बि‍छाकर कालि‍ख लगाकर सीखा था, शहर की जमीन उससे कहीं ज्‍यादा चि‍कनी, चमकदार और सलीकादार भी है तो भी वो सीखा ककहरा क्‍यों यहां फि‍सल जा रहा है जो गांव की उबड़खाबड़ जमीन पर इधर उधर उग आई घास या बन आए गड्ढों में पड़ा रहता था और खड़े खड़े पड़ा रहता था। ककहरा कुरेदने के लि‍ए पहले एक गड्ढा था, इस शहर की चिकनी सड़कों पर चप्‍पल घि‍सते घि‍सते
खुद चप्‍पल में एक गड्ढा हो गया और दूसरा ककहरा अपने आप उग आया। दोनों तरफ के शोरों से बेतरतीबी बटोर कर हि‍लते हुए दोनों को उगल देने की आदत से परेशान इस आदमी का ये पैर इन शहरों की चि‍कनी सड़कों पर चप्‍पल और बगल में भी एक गड्ढा लि‍ए खड़ा हो भी तो कैसे हो। गांव की पोली जमीन में पैर धंस जाते थे, चि‍पक जाते थे, आगे उठने का नाम नहीं लेते थे, तब जाकर खड़े होने की और आसपास देखने की बात समझ में आती थी।   आखि‍र ये आदमी शहर में कहीं कि‍सी कोने, कि‍सी फ्लाईओवर, कि‍सी बस, कि‍सी मेट्रो या कि‍सी लोकल में खड़ा हो भी तो कैसे हो जब ये शहर ही उसमें खड़ा होना तो दूर, झांकने भी नहीं आता।

अब तक जो कुछ भी ये आदमी समझा, वो ये समझा कि शहर में खड़ा होना पूरी तरह से बेमानी है। शहर में उड़ना चाहि‍ए, तैरना चाहि‍ए, लेकि‍न खड़ा कभी नहीं होना चाहि‍ए। शहर की छतें बहुत नीची होती हैं, सि‍र फट जाता है, दि‍माग बाहर नि‍कलकर चि‍कनी सड़क पर फैल जाता है। 

Friday, January 23, 2015

एक खबर

मैं एक खबर लि‍खना चाहता हूं
मैं अब अपने बारे में एक खबर लि‍खना चाहता हूं
उस खबर में
मैं जि‍क्र करना चाहता हूं
अपना कामनाओं का
और वासनाओं का भी
अपनी नजरों का
और उनकी भरपूर गंदगी का भी
टि‍कुलि‍यों का,
और उनके पीछे झांकती अनजानी आस का भी
और हां,
अपने कुकर्मों का जि‍क्र अगर मैनें ना कि‍या
ये खबर पूरी तरह से बेस्‍वाद होगी
थोड़ा मसाला और डालना चाहता हूं इस खबर में
अपने कई सारे प्रेम संबंधों को साइड स्‍टोरी बनाकर
और सबकुछ होते हुए भी
मैं प्रेम के वि‍ज्ञापन क्‍यों नि‍कालता हूं
इस खबर में उसका भी जि‍क्र करना चाहता हूं
खबर के अंदर तस्‍वीरें भी डालना चाहता हूं
उन पलों की जि‍न्‍हें मैं जी ना पाया
जि‍नको जीने की उतनी शि‍द्दत थी
जि‍नको जीना जीने की इक इबादत थी
पर मैं इबादत वो क्‍यूं न कर पाया
खबर में वो भी रंग भरना चाहता हूं
और अंत तो नहीं ही है
फि‍र भी,
कुल मि‍लाकर
मैं एक खबर लि‍खना चाहता हूं।

चूंकि काश और आस, कि‍सी कि‍सी के ही पूरे होते हैं, इसलि‍ए वो खबर अभी के लि‍ए मुल्‍तवी की जाती है।

Thursday, January 1, 2015

मेरी प्‍यारी मौसि‍यों

मेरी प्‍यारी मौसि‍यों 
(लीला और सुर्जकली मौसी के अलावा वाली मौसि‍यों),

कई दि‍न से हम घर से नि‍कलके चौराहे पे जा रहे हैं। असोक के यहां पान खाए के बाद अपने दोस्‍तों से बति‍याकर उनका बात चुपके चुपके मुंबई का घटा, बनारस का छटा, रांची दि‍ल्‍ली वाया पालमपुरो वाले दोस्‍तन को बता दे रहे थे। हालांकि हमका पता है कि हमरे सारे दोस्‍त हमको मि‍लके कूटेंगे, लेकि‍न इस्‍पेसली मनोरमा मउसी, आप तो हमारा मन जानती ही हैं। हम जब तलक चार लोगों से गाएंगे नहीं, गाली गुप्‍ता सुनके अपना गाल बजाएंगे नहीं, हमरे दि‍माग का जो डि‍स्‍परेसन है, वो कैसे नि‍कलेगा। बताइये। वैइसे मउसी, ई सारी बात सारे लोग जान रहे हैं, पर पता नहीं काहे मस्‍तराम की लुगदी की तरह एकदम कोने में, न जाने कौन बि‍लुक्‍का में लुकवाए बैठे रहते हैं, कि उनका जानते हुए कौनो जान ना लेय। ऐसे लोगन का भी इलाज लि‍खि‍एगा।

निर्मला मउसी होतीं तो यही कहतीं कि गीता का फलाना शलोक पढ़ो, उसे मन में बि‍ठाओ। और गीता भी कौन सी गीता, रि‍काबगंज में प्रि‍या ब्‍यूटी पार्लर वाली गीता का बात कहतीं, तभो मन में कोई गरमी पहुंचती (ठंड बहुत है, गरमी का जरूरत है) लेकि‍न ऊ त सीधे आठचक्‍कर वाली पता नहीं कौन सी गीता का बात करती रहती हैं। फि‍र कहतीं कि चूड़ी में जड़ने वाली मणी पढ़ौ, देमाग तेज होगा। निर्मला मउसी, तुमसे इस्‍पेसली दोनों हाथ जोड़ के वि‍नती करते हैं कि चुप्‍पेचाप अयोधा दरशन का चली आओ। अउर हां, इसका भी पूरा बंटवारा करने का आपसे दरकार है कि हम नास्‍ति‍क हूं या आस्‍ति‍क। इनामदारी से कह रहा हूं कि अबहूं कभो कभो हनुमानचलीसा तो कबहूं सुंदरकांड का चौपाई जबान पर चरपरा जाता है।

रामकली मौसी से हमको ये पूछना था कि अनाथालाय में जो औलादों को रखने का ठेका लि‍या था, का उसमें सब भक्‍तै हैं मने नजायज औलादें तो सभै जगहि‍या पे हैं। हम का सोच रहे हैं, कि काहे नहीं हम उनका भी बात वाया मोतीहारी नसलबारी सबतक पहुंचाएं। बाकी पहाड़ वाली मउसी चुपके चुपके मुस्‍कि‍या रही होंगी, इस बात का हमको पूरा यकीन है, गोबरधन का कसम खा के कहते हैं।

(फूल का थारी खरीदने गए थे कि आप लोगन को चि‍ट्ठी के साथ पठा देंगे, त उसका रेट तो एकदम्‍मे मोदी होय रहा है। यहलि‍ए अपने लैपटाप के स्‍क्रीने पे ई फोटू से काम चला लीजि‍ए, ज्‍यादा कहने की का दरकार है। थारी ठीक से दि‍ख रहा है ना.. नहीं त कहि‍ए लि‍टफेटि‍या थारी दि‍खाएं)

Tuesday, September 2, 2014

Once upon a time: एक समय की बात है

एक समय की बात है। दुनि‍या के एक पि‍छड़े देश को और न पि‍छड़ने देने की जि‍द लेकर छोटे से एक शहर का लड़के ने उस देश की राजधानी जाने की सोची। लड़के के मन में था कि वह राजा से मि‍लेगा और देश को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, उसपर बनाई अपनी त्रि‍कालजयीयोजना को वि‍स्‍तार से राजा को बताएगा। राजा खुश होगा और लड़के को ढेर सारी अशरफि‍यां ईनाम में देकर तुरंत उसके लि‍ए कार्यालय से लेकर योजना को कार्यान्‍वयि‍त कि‍ए जाने के लि‍ए कर्मचारी भर्ती कर देगा। लड़के ने उस समय के अंतरजाल पर पता कि‍या तो पता चला कि राजा को अपनी बनाई त्रि‍कालजयी योजना बताने के लि‍ए उसे कुछ खास डि‍ग्रि‍यों की जरूरत है। उन डि‍ग्रि‍यों के बगैर उसकी योजना में राजा तो दूर, उसका दरबान तक रुचि नहीं लेगा। लड़के ने दि‍न रात मेहनत की, बेईमानी भी की और कि‍सी तरह से अंतरजाल पर बताई गई डिग्रि‍यों में से एक को लेने में कामयाब हो गया। इतना सब करने के बाद लड़का राजधानी पहुंचा और राजधानी से सटे एक गांव में दो बटा दो के एक कमरे में रहने लगा। हमेशा खुले या बड़ी जगहों पर रहने के आदी इस लड़के को वह दो बटा दो का कमरा सोचने से मना करने लगा। अपनी सोच को वह दाएं लेकर जाता तो दो कदम पर दीवार आ जाती, बाएं लेकर जाता तो फि‍र से दीवार। यह दीवार उसकी सोच को दुनि‍या से नहीं जुड़ने दे रही थी। यहां तक कि रसोई में भी वह खुलकर अंगड़ाई न ले पाता तो उसकी सोच सरसों के तेल के गरम झाग से कहीं ऐसी जगह जाकर गुम हो जाती, फि‍र तो उसे अपनी सोच को तलाशने में ही कई दि‍न लग जाते। लोग कहेंगे कि रसोई में अंगड़ाई लेने का क्‍या तुक है तो लोगों को समझना होगा कि लड़का गरीब भी हो सकता है और गरीब की आंख खुलती है तो वह सबसे पहले रसोई में बच रहे दाने तलाशती है न कि बगल में रखी बेड टी की चुस्‍की। कई सालों तक अपनी सोच को दो बटा दो के कमरे की दीवारों में टकराने के बाद जब आखि‍रकार झन्‍नाहट नि‍कली तो लड़का भागा। भागते भागते वह राजधानी पहुंच गया। हालांकि वह कमोबेश राजधानी में ही था, पर राजधानी के उन इलाकों में था जो अक्‍सर अंधेरे में डूबे रहते थे। इस बार लड़के ने सोच रखा था कि न तो अंधेरे में सोचेगा, बल्‍कि कहीं की दीवारें उसकी सोच को प्रभावि‍त नहीं कर सकेंगी। काफी जि‍द करने के बाद, कई दि‍न तक अपने आश्रयदाता की नाक में दम करने के बाद लड़के को उसके आश्रयदाता ने राजधानी में रहने वाली अपनी एक बहन के पास भेजा। वहां लड़के को बहुत बड़ा घर मि‍ला। पि‍छले घर में तो सोच तो दीवारों से कैद होती ही थी, शौच वगैरह के लि‍ए भी बस दो कदम चलना होता था। मगर इस बार, इस नए घर में सोच के लि‍ए हमेशा दरवाजा खुला रहता था। हालांकि इस बार नि‍त्‍यक्रि‍या के लि‍ए लड़के को छाता लेकर नि‍कलना होता था, क्‍योंकि अगर बरसात होती तो नि‍त्‍यक्रि‍या स्‍थल तक पहुंचते पहुंचते लड़का पानी से तर बतर हो जाता। नए घर में लड़के की सोच को न सिर्फ आसमान मि‍ला, बल्‍कि एक बड़ा सा आंगन भी मि‍ला जो उसे रोज बगैर सोचे समझे साफ करना पड़ता था। इसी बीच उस देश में बड़ा तूफान आया। पानी नहीं बरसा, आंधी नहीं चली, पेड़ नहीं उखड़े, बस एक बड़ा तूफान आया और पुराने राजा को अपने साथ उड़ा ले गया। नया राजा आया जो न सिर्फ खराब और डरावना दि‍खता था, बल्‍कि पड़ोसि‍यों ने लड़के को यह भी बताया कि नया राजा कहीं दक्‍खि‍न-पश्‍चि‍म में भयानक नरसंहार करके आया है। हालांकि आते वक्‍त राजा ने मशहूर तोइबातेई मसुनलेई स्‍नान कर लि‍या था जि‍ससे उसके शाही वस्‍त्रों पर से लगे खून के धब्‍बे तो हट गए थे, पर उसके पास जाने से सड़ी गली लाशों की बदबू आती है। पड़ोसि‍यों ने लड़के को यह भी बताया कि नया राजा रोज दो कटोरा खून पीकर दो कटोरा जहर नि‍कालता है और उस जहर को उसके खास सेवक देश के उत्‍तरी हि‍स्‍सों में तेजी से फैला रहे हैं। नए राजा के बारे में इतनी भयानक बातें सुनकर लड़के को इतना दुख हुआ कि वह आए दि‍न पेड़ लगाने लगा। पहले उसने अपना आंगन भरा, छत भरी और अपना नया बड़ा कमरा और नई बड़ी रसोई भी भर डाली। इसके बाद तो जहां भी उसे खाली जगह दि‍खे, टप से एक पेड़ लगा दे। एक दि‍न राजधानी की एक मशहूर जगह पर वह पेड़ लगा रहा था कि उसे एक लड़की मि‍ली। लड़की ने उसे देखा, फि‍र अपनी फटी फ्रॉक को देखा, फि‍र उसे देखा और मुस्‍कुरा दी। लड़के ने लड़की को देखा, मि‍ट्टी से सने अपने हाथों को देखा और फि‍र लड़की की मुस्‍कुराहट को देखा तो लपक कर उसके पास पहुंचा। उसने लड़की को बताया कि जबसे नया राजा आया है, उसका घर में मन नहीं लगता है। उसने अपने पूरे घर में सैकड़ों पौधे लगा डाले, तब भी उसका मन घर में नहीं लगा। अब वह बाहर पौधे लगा रहा है क्‍योंकि बचपन में जब वह कब्रि‍स्‍तान के बगल से अपने बाबू के साथ गुजरता था तो वहां की हरि‍याली देखकर बाबू से यही पूछता था कि यहां इतनी हरि‍याली कैसे। बाबू उसे बताते थे कि इंसान का जि‍स्‍म सबसे अच्‍छी खाद होता है। लड़के ने लड़की से यह भी शि‍कायत की कि बाबू ने उसे यह नहीं बताया कि इंसानी जि‍स्‍म पर कि‍स कि‍स तरह के पौधे अच्‍छी फसल देते हैं। लड़के का इतना कहना था कि अचानक सबकुछ गायब होने लगा। सब तरफ से धुंआ उठने लगा और सबकुछ गोल गोल घूमने लगा। यह एक अजीब तरह का तूफान था। इसमें सबकुछ गोल गोल घूम रहा था पर लड़का, उसका लगाया ताजा पेड़ और वो सारे मेहराब पहले की ही तरह अपनी जगह पर खड़े थे, राजा के भी सारे मेहराब पहले की ही तरह खड़े थे, बल्‍कि तूफान में और बड़े.... खूब बड़े होते चले जा रहे थे। जब तूफान गया तो लड़के ने अपने हाथ में एक स्‍मार्टफोन पाया। स्‍मार्टफोन की घंटी बज रही थी। अन्‍नोन नंबर था। लड़के ने फोन रि‍सीव कि‍या। दूसरी तरफ देश का राजा था जो उस देश के स्‍वतंत्रता दि‍वस पर बधाई दे रहा था और बोल रहा था कि वह राजा नहीं बल्‍कि सेवक है। रैंगलर का बैग भी लड़के ने लटका रखा था जि‍समें सैमसंग का एक लैपटॉप भी रखा था। लड़के ने लैपटॉप ऑन कि‍या और उसकी नजर फेसबुक पर गई। फेसबुक को देखते ही लड़का उसे पढ़ने लगा। कई सालों तक फेसबुक पढ़ने, स्‍टेटस अपडेट करने, लोगों की पोस्‍ट पर लाइक और कमेंट बनाने, तरह तरह की स्‍माईली बनाने के बाद लड़के ने पाया कि वह तो वहीं है, जहां पर खड़ा था। बल्‍कि अपने लगाए पेड़ में वह पानी डालना भूल गया था, वो तो गनीमत थी कि उस पेड़ के नीचे इंसानी लाशों का जखीरा था, इसलि‍ए पेड़ ने अपना आकार ले लि‍या था। 

अब लड़का घर वापस आ गया है। वह रोज अपना आंगन, बरतन, कपड़े साफ करता है। लड़का घर में पोंछा भी लगाता है और गमलों में पानी भी देता है। अब वह लड़का नहीं सोचता। कभी कभार फेसबुक पर आकर कि‍सी कि‍सी का स्‍टेटस या फोटो लाइक कर देता है क्‍योंकि उसमें सोचने की जरूरत नहीं पड़ती।