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Sunday, January 24, 2021

एक सुबह जब शाम हुई

दिन निकला। दिन क्या निकला, उसके निकलने से पहले शाम निकली। तड़के से मैं करवटें बदल रहा था कि दिन निकले, उजाला हो तो मैं बिस्तर से निकलूं। काफी देर तक जब दिन की कोई आहट नहीं मिली तो मैंने कंबल फेंका। सर्दी अचानक बढ़ चुकी थी। ठीक वैसी ही, जैसे कि जाती जनवरी की शामें अचानक से गहरी और ठंडी होने लगती हैं। एक पल को मुझे लगा कि कहीं मैं दोपहर के खाने के बाद तो नहीं सोया था। मगर देह पर मौजूद सोने वाले कपड़ों ने मुझे टहोका, कि नहीं, ये सुबह ही है और ये वही सुबह है, जिसका मैं पिछले दो तीन घंटों से इंतजार कर रहा था। ये वही सुबह है, जिसके लिए मैंने अपना वह सपना तोड़ दिया था, जिसमें मैं उड़ीसा के कोर्णाक मंदिर के गलियारे में लड़की से औरत बनने को उतारू किसी लड़की के साथ घूम रहा था। सपने में मंदिर था, मंदिर के पत्थर थे, बुर्ज थे, हवा के अलसाए झोंके थे और सबसे बड़ी बात तो ये कि सपने में गरमी थी। मेरे उस्ताद शम्सुर्रहमान फारुकी साहब एक जगह पर लिखते हैं कि हम हिंदुस्तानियों के लिए गर्मी से ज्यादा सर्दी तकलीफदेह है और ये लिखने से पहले पता नहीं जमानत में या यूं ही वे कैफी आजमी साहब का एक मिसरा नज्र करते हैं- 

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी 

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है। 

सो सपना था, सपने में गर्म हवा भी थी जो शायद इस डर से सपने में डोल रही थी कि बाहर बहुत सर्दी है और सर्दी के डर से हमारे हिंदुस्तान में आज का दिन रोज के दिन की तरह निकलने से इन्कार कर रहा है। आज हिंदुस्तान में आने के लिए उसे कल की शाम का भी साथ चाहिए, भले कल की शाम से ही उसके डर की वजह शुरू हुई हो। मैं सोचने लगा, जीवन में मैंने भी ऐसे लोगों का साथ खूब जोड़ा है, जो मेरा नुकसान करते रहे, जिनसे कहीं न कहीं मैं डरता रहा, फिर भी शायद किसी बड़े डर की वजह से मैंने नुकसान का साथ नहीं छोड़ा और शायद यही वजह है कि आज मैं घाटे में हूं। लोगों को लगता है कि ये बहुत नफा मार रहा है, लेकिन नफा मुझे उस जूते की तरह लगता रहा है, जो मुझे देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, मगर उसे बर्दाश्त करने की काबलियत अपने पास न होने की वजह से मैं उसे देखकर ही संतोष कर लेता रहा हूं। तो क्या यह मेरा संतोष है जो मेरे नुकसान की वजह है? हिंदुओं के धर्मग्रंथों में तो बहुत कहा गया है कि संतोष ही परमधन है, तो क्या मेरा सारा नुकसान मेरे इस परमधन की वजह से हुआ? क्या मुझे संतोष नहीं करना चाहिए? मगर मैं संतोषी कब था? दुनिया की कोई भी चीज मेरे अंदर यह परमधन नहीं भर पाई, और शायद नहीं ही भर पाएगी। मैं संतोषी नहीं हूं। संतोष ने मुझे इतना दिक्क किया कि आखिरकार मैंने कंबल दूर फेंक दिया और उससे चार गज और दूर मैंने संतोष को फेंका। इसलिए भी फेंका कि पिछले दिन भर और आधी रात तक की मेहनत के बाद मैं नींद से संतुष्ट नहीं था। मैं सुबह से भी संतुष्ट नहीं था, जो इतनी मेहनत, इतने इंतजार के बाद आई, मगर शाम से हाथ मिलाकर आई। सुबह ऐसे भी कहीं आती है? भुनभुनाते हुए मैंने बिस्तर छोड़ा, कि आज मैं इस सुबह को नहीं छोड़ूंगा। इसी की खातिर मैंने सपने में बहती गर्म हवा छोड़ी, खुला आंगन छोड़ा, और सबसे बड़ी बात जो रही, वह बताने की नहीं है, कोई कहेगा, तो भी नहीं बताउंगा। 

सुबह मैंने बिस्तर छोड़ा। रात के छोड़े हुए कपड़े कैसे-कैसे करके अपने बदन पर डाले और कमरे से बाहर आया। बाहर शाम होने को थी। बल्कि ये दिन ऐसा दिन था कि दिन निकलने के साथ ही शाम अपने होने की जिद लिए गठरी बनी बैठी थी। शाम को सर्दी बहुत लग रही थी, लेकिन किसी भी मौसम, या किसी भी दिन या किसी भी चीज से ज्यादा बड़ी चीज जिद होती है। शाम सुबह से ही अपनी जिद पर थी। एकबारगी मैंने सोचा कि आज मैं दिन से हार मान लूं क्या? फिर मैंने सोचा कि हर किसी से हारने के बाद अगर मैं दिन से भी हार गया, तो फिर अगले दिन में जाना और फिर उसके भी अगले दिन में जाना मुसीबत हो जाएगा। दिन अपना दरवाजा एक बार किसी के लिए बंद कर लेता है तो जल्दी खुलना मुश्किल हो जाता है। कई लोग तो पूरी उम्र खुद को रात का राही कहते रहे हैं। कई लोग आज तक अवध की शाम से नहीं निकल पाए, उनके जीवन में सुबह हुई ही नहीं। फिर शाम से मेरी उतनी दोस्ती भी नहीं रही, क्योंकि मेरे पेशे सहाफत की कुछ ऐसी मजबूरियां हैं कि हम लोग जब इस पेशे में आते हैं तो अपनी हर शाम मुल्तवी करके आते हैं। जब दुनिया शाम की रंगीनियत से दो चार हुई रहती है, हम लोग दुनिया से उड़ते रंगों की रपट लिखने में मगशूल होते हैं। क्या करें, पेशा ही ऐसा है। दुनिया जब रंग बिगाड़ती है, बदलती है तो हम दुनिया भर को बताने की तैयारी में लगते हैं कि रंग बिगड़ चुका है- बदल चुका है। 

जब भी मैं शाम देखता हूं, एक बार यह जरूर सोचता हूं कि किसी और पेशे में होता तो कम से कम शाम देख लेता। जब तक मैं इस पेशे में नहीं था, या कि यूं कहें कि जब मैं कहीं भी नहीं था तो अपने बारा पत्थर के मैदान शाम का आसमान देख रहा होता था। पहले पीला, फिर नारंगी और फिर लाल होते हुए सबकुछ गाढ़े नीले में तब्दील होते देखता। मैं चित्रकार नहीं हूं और तब भी इसके बारे में नहीं सोचा, जब इतने सारे रंग मेरे सामने खेल रहे होते। बल्कि कभी कभी मुझे खुद से चिढ़ होती है कि मैंने इतने सुंदर सुंदर रंग देखे हैं, फिर भी जब बात रंग चुनने की हो तो मैं हमेशा कोई न कोई वाहियात रंग चुनता हूं। मेरे जीवन की सारी चित्रकारी सिर्फ इसी वजह से धरी रह गई, क्योंकि मुझे रंग देखने तो आते हैं, मगर चुनने नहीं आते। मेरे घर के सामने एक नीम का पेड़ है, जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। मगर क्या मजाल कि मैं कभी भी उसके लिए एकदम सही सब्ज चुन पाऊं। फिर भी मैं रोज शाम का इंतजार किया करता, और अपने आप से शर्त लगाता कि आज वाला लाल कल वाले लाल से ज्यादा लाल होगा। बहुत बाद में जब मैंने पहाड़ देखे, वहां की शाम देखी तो नोट किया कि जितनी लाल, जितनी नर्म और जितनी रोमानी हमारे मैदानों की शाम होती है, उतनी पहाड़ों की शाम नहीं होती। बल्कि अगर कोई मुझे इसके लिए सजा न दे तो मैं ये भी कहूंगा कि पहाड़ों की शाम बेहद खुरदुरी और जकड़न से भरी होती है, जिसमें एक रंग डर का भी होता है। डर यह कि बाहर निकले तो जाने कौन खा जाए, जाने कहां से पैर फिसल जाए या जाने कौन सा कीड़ा-मकोड़ा काट ले। मैदानों की शाम बेखौफ होती है और शायद यही वजह है कि उसमें लाल, पीले और नीले के जितने शेड्स होते हैं, उतने मुझे कहीं भी देखने को नहीं मिले। कुछ लोग समुद्र का जिक्र कर सकते हैं, लेकिन समुद्र भी मैदान में ही होते हैं, पहाड़ों में नहीं होते। रंगों को फैलने के लिए बहुत ढेर सारी जगह चाहिए होती है, जिनमें धरती की सिकुड़न बेवजह शोर मचाती है। 

मगर मैं यह क्या सोच रहा हूं? मैं यह क्या कह रहा हूं और आखिर क्यों कह रहा हूं? मैं तो सुबह के इंतजार में था और भले ही शाम के साथ हुई, मगर सुबह तो हुई ही। फिर मुझे किस चीज से इतनी शिकायत है? और फिर शिकायतों का बंडल तो शाम तले खुलता है, अभी तो सुबह हुई है? सुबह से कैसी शिकायत? वह तो नया दिन लेकर आई है। नया दिन, जिसमें वह सब कुछ होगा, जो उस दिन से पहले कभी नहीं हुआ। नया दिन, जिसमें उस दिन से पहले वह सारी चीजें सामने आएंगी, जो पिछले हजारों हजार दिनों से सामने आने से रह गई हैं। मुझे नए का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं खीझ रहा हूं। मुझे सुबह का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं उससे मुंह फेरकर बैठा हूं। अगर किसी सुबह दिन शाम के साथ आ जाएगा तो क्या मुझे बर्दाश्त नहीं होगा? आखिर मोहल्ले की सारी लड़कियों की शादी हुई, मैंने बर्दाश्त की और आज भी मोहल्ले में वापस जाना नहीं छोड़ा। ना चाहते हुए भी कानून की मोटी मोटी और नीरस किताबें मैं बर्दाश्त करता रहा हूं। बेमन से ही सही, मगर आंकड़ों की फेहरिस्त को घंटों बर्दाश्त करता हूं, फिर एक अदद सुबह मुझसे बर्दाश्त क्यों नहीं हो रही है?   

.... नहीं पता कि जारी या खत्म।

एक सुबह जब शाम हुई

नींद तो यूं ही तमाम हुई

काम न कोई हो पाया

नाक लाल औ जाम हुई।

और ये मिसरे कैफी साहब के नहीं हैं, बल्कि ये मिसरे किसी के भी नहीं हैं। 

Sunday, February 16, 2020

शकरकंदी की कड़वाहट

मेरा एक दोस्त अक्सर कहता है कि लोग अच्छे नहीं होते, तो मैं कहता हूं कि लोग तो अव्वल अच्छे ही होते हैं, वक्त या हालात बुरे होते हैं। इस पर वह तुनककर अपनी उस पड़ोसी की बातें बताने लगता है, जिसे उसने आज तक किसी से सीधे मुंह या जरा सी मुलायमियत से बात करते नहीं देखा। मैं उसे समझाता हूं कि इसके पीछे उस पड़ोसी के वक्त का मुंह शायद हमेशा टेढ़ा रहता होगा या उसके हालात इतने कठोर होते होंगे। लेकिन वह नहीं माना। एक दिन वह मुझे अपने घर ले गया और अपनी उस पड़ोसन की निगरानी पर बैठा दिया। मैंने देखा कि उसकी पड़ोसन का मुंह कामवाली से लेकर मां-भाई के साथ भी टेढ़ा ही था। थी तो वह ठीक-ठाक घर की। देखने में गदराई शकरकंदी सी, लेकिन शकरकंदी जैसी अनाकर्षक तो नहीं थी। उसकी मां की आवाज तनिक तेज तो थी, लेकिन उसमें भी एक दिल्ली वाली पंजाबी शाइस्तगी तो थी ही।
फिर क्या वजह रही होगी कि इतनी सुंदर पड़ोसन का वक्त इस कदर टेढ़ा हो चुका था? मैंने दोस्त से पड़ोसन के बारे में कुछ पूछताछ की। वह पैंतीस पार थी, सुंदर थी। हंसे तो गोया फूल झड़ें। हालांकि मेरे दोस्त को मुझे दिखने वे फूल अब भी मेरी भूल ही लगते हैं और ज्यों ही मैं कभी भी उसकी हंसी में फूल देखता हूं, झट से वह हमेशा यही बोलता है, 'आई ऑब्जेक्ट मीलॉर्ड!' उस वक्त भी उसने यही जारी रखा। फूल दर फूल गिरते ऑब्जेक्शन से जब मैं परेशान हो गया तो मैंने दोस्त से पूछा, 'शादी हो गई है इसकी?' दोस्त बोला, 'नहीं हुई।' अब समस्या का एक सिरा तो मेरी गिरफ्त में था। इस सिरे पर अपनी गिरफ्त मजबूत करने के लिए मैंने फिर पूछा, 'कोई ब्वॉयफ्रेंड? किसी इश्क की कोई कहानी? या सिरे न चढ़ पाई किसी मोहब्बत की कोई दास्तां?' दोस्त बोला, 'पांच साल तो हो गए मुझे इस इलाके में रहते हुए, अभी तक तो ऐसी कोई चीज दिखी नहीं।'
फिर मैंने पूछा, 'क्या वह निपट अकेली है?' दोस्त ने जवाब दिया, 'लगता तो ऐसा ही है, जभी तो जब भी खिड़की पर आती है, खाती हुई आती है या खाते-खाते वापस चली जाती है।' इस जवाब पर मैं भड़क गया। मैंने कहा, 'खाने का अकेलेपन से क्या रिश्ता?' अरस्तू से सुकरात की देह में विचरते हुए दोस्त बोला, 'अकेला आदमी अक्सर किसी न किसी छोर पर ही रहता है। इस तरफ, या उस तरफ। उसके मन में बीच का रास्ता कहां होता है? फिर उसकी कोई ऐसी मजबूरी भी तो नहीं होती कि वह बीच का रास्ता अख्तियार करे ही करे।' उसके यह कहते ही मुझे याद आया कि मेरे दो मालिकों (जिनके यहां मैं कभी नौकरी करता था) ने कहा था कि साथ बहुत जरूरी होता है। एक बार जब मैं निपट अकेली महिलाओं से रूबरू था तो वहां भी मुझे ऐसी ही झल्लाहट दिखी थी। मैंने दोस्त से कहा, 'उसे समझाओ, अकेली न रहे।' अब तो दोस्त बिदक गया, बोला, 'अकेले के गले में समझाइश की घंटी बांधने की हिम्मत तुममें हो तो हो, मुझमें नहीं है।' 

Friday, January 3, 2020

सबसे मीठी तो बेहद गुस्सैल भी है उर्दू: संजीव सराफ

उर्दू पर दिल्ली में होने वाला सालाना जलसा जश्न-ए-रेख्ता पिछले दिनों भारी भीड़ के साथ संपन्न हुआ। एक भाषा को लेकर इतने सारे लोगों की मोहब्बत देखकर एकबारगी किसी को भी ताज्जुब हो सकता है। उर्दू की रगें झनझनाने का श्रेय संजीव सराफ को जाता है। उर्दू की मशहूर वेबसाइट रेख्ता डॉट ओआरजी इन्हीं की है और संजीव खुद भी उर्दू के जुनूनी पाठक हैं। पैदाइश नागपुर की है और पढ़ाई-लिखाई मुंबई, ग्वालियर और आईआईटी खड़गपुर की। फैमिली बिजनेस के बाद खुद का बिजनेस किया। पांच-छह मुल्कों में प्लांट्स हैं। सात साल पहले अपने जुनून के लिए सारे काम-धंधे से अलग हो गए। जुनून थी उर्दू, जिसकी महक पिछले दिनों दिल्ली सहित दुनिया भर में फिर से फैली। मैंने संजीव सराफ से बात की। पढ़िये प्रमुख अंश :

वेबसाइट रेख्ता की शुरूआत के बारे में बताएं?
अपने रोज-रोज के काम से उकता गया था। शांति मिल ही नहीं रही थी। शौक कहिए या अपनी रूह के लिए कहिए, मैंने उर्दू में शायरी और दूसरी चीजें पढ़नी-लिखनी शुरू कीं। तब लगा कि मुझ जैसे करोड़ों होंगे जो उर्दू पढ़ना चाहते हैं पर एक्सेस नहीं कर सकते। इसीलिए रेख्ता शुरू की। शुरू में लगभग पचास-एक शायरों के कलाम देवनागरी और रोमन में पेश किए। पर साल भर में उसमें पर लग गए। आज उसमें साढ़े चार हजार शायरों के कलाम हैं, चालीस हजार गजलें हैं, आठ हजार नगमे हैं। ऑडियो-वीडियो, डिक्शनरी के अलावा और भी बहुत कुछ है।

आपने नायाब किताबों को डिजिटली सेफ करने का भी काम किया है। इसके बारे में बताएं।
हम वेबसाइट के लिए कलाम खोज रहे थे, लेकिन उनकी अवेलिबिलिटी नहीं थी। कुछ किताबें लाइब्रेरी में थीं, कुछ लोगों के पर्सनल कलेक्शन में। मेरा मानना था कि धूल, दीमक, पानी या आग में ये सब बरबाद हो जाएंगी। तो हमने बड़े-छोटे पैमाने पर किताबों को स्कैन करके डिजिटली प्रिजर्व करना शुरू किया। फिर देखा कि किताबों की तादाद बहुत ज्यादा थी। तब हमारे पास सिर्फ एक मशीन थी। अब 17 शहरों में हमारी तीस मशीनें लगी हैं। अब तक हमने एक लाख किताबें डिजिटली प्रिजर्व की हैं।

ऐसी कितनी किताबें रहीं जो लगभग खत्म हो चुकी थीं, जिनकी दूसरी कॉपियां नहीं थीं? उनके बारे में बताइए।
ये कहना तो बहुत मुश्किल है। किताबें कहां-कहां हैं, ये किसी को अंदाजा नहीं है। जखीरा इतना बड़ा है, कि कहना मुश्किल है कि कितनी छपीं और कितनी बची हुई हैं? लेकिन नायाब किताबें तो बहुत हैं। सन 1700 से 1800 में छपी किताबें हैं। सन 1860 के बाद मुंशी नवल किशोर ने काफी किताबें छापी थीं, उसमें से भी काफी हैं।

पिछले दिनों दिल्ली में हुए जश्न-ए-रेख्ता में तकरीबन दो लाख लोग आए। यह दिल्ली का सबसे बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम हो चुका है। लेकिन बजरिए रेख्ता वेबसाइट, आप इस जुबान का ज्यादा बड़ा फैलाव देख पा रहे हैं। इसके बारे में बताइए।
ये तो जबान का कमाल है साहब, हम तो सिर्फ अरेंजमेंट करते हैं। इतनी मीठी जुबान दुनिया में कोई है ही नहीं। इसके जरिए ढेरों आर्ट फॉर्म्स बने हैं। गजल सिंगिंग, सूफी सिंगिंग, कव्वाली हो या ड्रामा या दास्तानगोई, इतने आर्ट फॉर्म्स किसी और जुबान में जल्दी नहीं मिलते। दुनिया के डेढ़-पौने दो सौ मुल्कों से रेख्ता वेबसाइट के दो करोड़ यूनीक यूजर्स हैं। जहां-जहां हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग बसे हैं, उनको रेख्ता के अलावा और कहीं भी इतना कंटेंट नहीं मिलता। 40 हजार लोगों ने तो उर्दू सीखने के लिए हमारी वेबसाइट जॉइन की है।

उर्दू क्या सिर्फ शायरी की जुबान है? शेर-ओ-शायरी के अलावा उर्दू को आप कहां देखते हैं?
ये गलत इलजाम है। शायरी की भाषा तो है ही, लेकिन इतनी खूबसूरत जुबान है कि इसमें आप कोई भी गुफ्तगू करें, लगता है कि शायरी कर रहे हैं। ये इजहार का जरिया है। हमारे इंडिपेंडेंट मूवमेंट के पहले से ही इंकलाबी शायरी हुई है। इंकलाब-जिंदाबाद हसरत मोहानी ने लिखा। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है, बिस्मिल अजीमाबादी ने लिखा। शायरी हर जगह इस्तेमाल हुई है। ये बोलचाल जुबान थी। ब्रिटिश ने थोड़ा पर्सनलाइज करके इसे मुसलमानों के लिए कर दिया और थोड़ा संस्कृटाइज करके हिंदुओं के लिए। फिर लिट्रेचर और बोलचाल की जुबान अलग भी होती है। जितना तंज-ओ-मजाह उर्दू में है, मेरे ख्याल से शायद अंग्रेजी के अलावा कहीं नहीं है। सोशल कॉन्टेस्ट में भी खूब लिखा गया है। मंटो की शॉर्ट स्टोरीज हों या इस्मत चुगताई की हों! ऑटोबायोग्राफीज हैं। वैसे ये बेहद गुस्सैल जुबान है, लेकिन ज्यादातर लोग शायरी या नगमे सुनते हैं तो उनके दिमाग में इसका इंप्रेशन वैसा ही है।

शायरी का पाठकों की उम्र से कुछ रिश्ता है? लोग किन शायरों को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं?
लोगों की पसंद होती है। पहले कहते थे कि जब तक कॉलेज में हो, साहिर लुधियानवी को पढ़ो, और बाद में भूल जाओ। साहिर को यों कि वो थोड़े रिवोल्यूशनरी प्रोग्रेसिव मूवमेंट के थे, थोड़ा इश्क भी किया था। लेकिन मैं मानता हूं कि उसी उम्र में रीडर को गालिब भी पसंद आएंगे और वह अर्थ भी अलग लेगा। वही शेर वह बाद में पढ़ेगा तो दूसरा ही मतलब समझ में आएगा। बात कैफियत की है जो बदलती रहती है और उसी हिसाब से अर्थ और शायर भी।

आप के पास उर्दू को देखने की तकनीकी नजर है। आप इस पर लगातार काम भी कर रहे हैं। इस नजर से बताइये कि उर्दू आज से दस साल पहले कहां थी, अब कहां है और आज से दस साल बाद इसे आप कहां देख रहे हैं?
जब हमने शुरू किया था, तब सुनते थे कि उर्दू जुबान पस्त है, मर रही है या कोमा में आ गई है, वगैरह-वगैरह। लेकिन रेख्ता की सक्सेस के बाद अब आप देखेंगे कि इसी तर्ज पर सैकड़ों जश्न होने लगे हैं। सबका नाम जश्न से ही शुरू हो रहा है। दरअसल पब्लिक कॉन्शस हुई और जबरदस्त चेंज आया है। अब ये जुबान मेनस्ट्रीम में आ गई है। अब आपको ये सुनने में नहीं आएगा कि उर्दू मर रही है।

अगर हिंदी से उर्दू निकाल दें तो क्या बचेगा?
सुबह-शाम मुंह से नहीं निकलेगा। प्रात:काल या संध्याकाल यूज करेंगे। या प्यार इश्क मोहब्बत न बोलकर प्रेम या फिर ऐसा ही कोई लफ्ज यूज करेंगे। हिंदी सिनेमा से निकाल के बताइए उर्दू, फिर क्या बचेगा? दूध में से चीनी निकाल दीजिए, फिर क्या बचा? कर लीजिए कोशिश। हमारी बोलचाल हिंदुस्तानी है। उर्दू-हिंदी का ग्रामर एक है। जो निकालना चाहें, निकाल दें, कर लें कोशिश।   

Tuesday, April 16, 2019

पतझड़ से पहले और बाद की एक बकवास



सबसे पहले शहतूत छोड़ता है अपनी पत्तियां 
और लगभग एक साथ ही हो जाता है नंगा 
डालें, टहनियां सब की सब नंगी 
हवा चलती है तो सर्र से गुजर जाती है 
एक भी टहनी नहीं हिलती शहतूत की 
फिर आती है बारी नीम की 
शहतूत के बाद नीम को नंगा होते देखना 
इतना आसान नहीं है 
वो एक साथ नंगा भी नहीं होता 
धीमे-धीमे मरता है नीम 
और रोज हमें पता चलता है कि 
नीम कितनी तकलीफ में है 
जैसे कि ट्रॉमा सेंटर में बेहोश पड़ा कोई मरीज 
जिसकी रुक-रुक कर सांस चलती है 
जैसे सड़क पर हुआ कोई एक्सीडेंट 
जिसमें भीड़ तो होती है, बस जान नहीं होती 
एक हिस्सा छोड़ने के बाद 
दूसरा हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं होता नीम
लेकिन मौसम उसे नंगा करके ही छोड़ता है। 
जब शहतूत पकने लगती है 
और नीम में आते हैं नए फूल 
तो चलाचली की बेला में होता है बेल 
चार छह बच गए सूखे बेल लटकाए यह पेड़ 
हर हरे के बीच ठूंठ सा खड़ा रहता है 
जैसे कोई बूढ़ा जर्जर खेलता हो बच्चों के साथ 
जैसे समुद्र मे कोई तालाब सा हो 
या फिर बहती नदी के बगल ठहरा हुआ हरा पानी
फिर एक दिन बूंदे बरसती हैं
और बढ़ता है नदी में पानी 
और ले जाता है अपने साथ 
नीम, शहतूत और बेल को भी। 

Wednesday, January 30, 2019

खजुराहो की इस तस्वीर को कैसे देखें


(चेतावनी- अगर आप प्रेम में नहीं हैं, या फिर जीवन में आप कभी प्रेम में नहीं रहे हैं तो इस तस्वीर को न देखें। इसलिए नहीं कि तस्वीर समझ में नहीं आएगी, इसलिए क्योंकि इसके भावों में उतर पाना उसी के लिए मुमकिन है, जो ऐन उसी भाव में रहा है, जिसकी कि यह एक भंगिमा है।) 

संदर्भ : खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर के एक दर्जन से अधिक कोने है और हरएक कोने में स्त्री-पुरुष के प्रगाढ़तम प्रेम की भंगिमाएं बनी हुई हैं। यह तस्वीर प्रेम का उद्दीपक है, बोले तो प्रेम की शुरुआत। खजुराहो में कामकला की प्रत्यक्ष मूर्तियां कामसूत्र से कॉपी की गई हैं, लेकिन इन दर्जन भर कोनों में जो मूर्तियां हैं, वे कामसूत्र को बहुत ज्यादा फॉलो नहीं करतीं। कोने की अधिकतर मूर्तियों में ठीक उसी तरह का झटपट प्रेम दिखता है, जैसा कि हम सभी कोने में घुसकर करते हैं।

प्रसंग : स्त्री सजी हुई है, पुरुष भी। दोनों ने यथासंभव श्रृंगार कर रखा है और एक दूसरे को आकर्षित करने के लिए गले में रत्नजड़ित माला, हाथ में मोटे बाजूबंद पहन रखे हैं। पुरुष ने कमर में रत्नजड़ित कमरबंद बांध रखा है जो शायद हथियार बांधने के भी काम में आता होगा। पुरुष के बाल बड़े हैं जिन्हें उसने सिर के ठीक ऊपर जूड़ा बनाकर बांधा हुआ है। हो सकता है कि उसी जूड़े पर उसने एक मुकुट भी पहना हो। स्त्री ने भी लगभग उसी अंदाज में जूड़ा बांध रखा है। जिस तरह से दोनों तैयार हो रखे हैं, हो सकता है कि दोनों मैटिनी शो देखने जा रहे हों और ये भी हो सकता है कि मैटिनी शो उन्हें दिखने के लिए खुद उनके पास आ रहा हो। स्त्री के जेवर ही उसके वस्त्र हैं, तो पुरुष ने अपनी पीठ पर कपड़े का लंबा लबादा टांग रखा है, जो कुछ-कुछ रोमन साम्राज्य के राजाओं के लबादे से मिलता है। समय के साथ साथ पुरुष का पुरुषत्व टूट चुका है, लेकिन स्त्री का स्त्रीत्व अभी तक कायम है।

भावार्थ : दोनों बहुत खुश हैं। लगभग हजार साल बाद भी दोनों के चेहरे पर प्रेम की वही गर्मी अभी तक बनी हुई है, जो हजार साल पहले उठी थी। प्रेम की इसी गर्मी से स्त्री का चेहरा भर आया है और गाल थोड़े से और गोल हो गए हैं। यही गर्मी पुरुष के भी चेहरे पर है, लेकिन उसमें काम तत्व अधिक दिख रहा है, इसलिए वह प्रेम में स्त्री जितना नहीं  बह रहा, उसका चेहरा गर्म तो है, लेकिन नियंत्रित है और गंभीर भी। दाहिने हाथ की तर्जनी से वह स्त्री की ठोड़ी थोड़ा ऊपर उठा रहा है कि उसके अंदर वह थोड़ा सा और उतर सके और उसे अपने अंदर थोड़ा सा और उतार सके। देखना महज देखना नहीं होता, वह पीना भी होता है, उतरना भी होता है, उतारना भी होता है और जज्ब करना भी होता है। देखा कैसे जाता है, यह हम इस तस्वीर में देखकर आसानी से सीख सकते हैं। पुरुष स्त्री को खुद में जज्ब कर रहा है, जबकि दैहिक रूप से यह काम स्त्री का माना जाता है। लेकिन यही तो प्रेम होता है जो स्त्री पुरुष की सभी मान्य अवधारणाएं तोड़कर छिन्न भिन्न कर देता है। इस तस्वीर में पुरुष भले ही पुरुष दिख रहा है, लेकिन वह पूरी तरह से स्त्री बन चुका है और जो कुछ भी है, सब अपने अंदर भर लेना चाह रहा है। वहीं स्त्री जानती है कि वह इसी रास्ते से पुरुष के अंदर जा रही है, घर बना रही है, विजय पा रही है। विजय के इस आनंद में स्त्री की आंखें बंद हो चुकी हैं, नाक फूल चुकी है और होंठ एक प्रगाढ़ चुंबन के लिए आधे खुलकर ऊपर की ओर उठ चुके हैं। स्त्री जानती है कि चुंबन शुरुआत नहीं, बल्कि देखने का और पुरुष पर विजय पाने का अंत ही होगा क्योंकि फिर देखना खत्म होकर महसूसना शुरू हो जाएगा। लेकिन स्त्री महसूसने तक जाना चाहती है, इसीलिए वह अपनी कमर का दाहिना हिस्सा पुरुष की बाईं टांग से रगड़ रही है। स्त्री के स्तन गोल हैं, कामोत्तेजक हैं, फिर भी पुरुष उसके चेहरे में ही फंसा हुआ है तो इसका एक अर्थ ये भी हो सकता है कि तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती, नजारे हम क्या देखें? ये तस्वीर हमें बताती है कि अंत पंत में हमारी पर्सनालिटी का सबसे बड़ा हिस्सा हमारे गुप्तांग नहीं होते, बल्कि हमारा चेहरा होता है, प्रेम होता है और स्त्री पुरुष के बीच हमेशा बनी रहने वाली गर्मी होती है।

Monday, April 9, 2018

पैंतीस के बाद प्रेम वाया और पतित होने के नारायणी नुस्खे

एक बार तो लगता है कि झपटकर कर लें, लेकिन फिर दिमाग चोक लेने लगता है। यहां तक आते-आते दिल की मोटरसाइकिल भी तीस से नीचे का एवरेज देने लगती है। गनीमत बस इतनी है कि रुक-रुककर ही सही, चलती तो है। और जैसे ही ‘आगे तीखा मोड़ है’ का बोर्ड दिखता है, मुई मोटरसाइकिल सीधे वोटरसाइकिल में बदलने लगती है। जो लगती है कि चल रही है, दिखती है कि आ रही है, लेकिन न चलती है, न आती है। घर्र-घर्र करके किसी मकैनिक की दुकान से कम से कम तीन किलोमीटर पहले ही रुक जाती है। यहां तक आते-आते दिल की ये जो मोटरसाइकिल है न, इसे चलाने में बड़ा डर भी लगता है। साठ की स्पीड पार करते ही लगता है कि एक पहिया दाहिने जा रहा है तो एक बाएं। कुछ दिन पहले टंकी फुल कराई, थोड़ी चलाई और फिर थोड़ी दौड़ाई, मगर वो स्पीड नहीं मिली जो पहले मिलती थी। सब दांए-बांए हो गया।

मोटरसाइकिल की जब ये हालत हो तो सड़क भी सूनी मिलती है। दूर-दूर तक ऐसा कोई नहीं दिखता कि धक्का ही लगा दे। और अगर उस सूनी सड़क पर कोई मिल भी जाए तो धक्का लगाने के लिए तैयार नहीं होता। खैर उसकी भी कोई गलती नहीं, साढ़े तीन दशक पुरानी धूल और थपेड़े खा चुकी मोटरसाइकिल यहां कोई छूना नहीं चाहता, धक्का तो बहुत दूर की बात है। फिर तहों तह जमी धूल हाथ भी तो गंदा कर देती है। वैसे कोई धक्का खाया मिल जाए तो वह धक्का लगाने में पीछे नहीं रहता है। धक्का खाए लोगों से पूरी दुनिया ही भरी-भरी है, मगर धक्का खाए लोग सड़कों पर नहीं मिलते। सूनी सड़कों पर तो बिलकुल नहीं मिलते। मोटरसाइकिल को इस उम्र में पहुंचाने के बाद जितनी जल्दी हो सके, हमें सीख लेना चाहिए कि कैसे भी करके, कम से कम एक धक्का खाया शख्स मोटरसाइकिल के पीछे बैठा लें, वरना सड़कों का तो वैसे भी कोई भरोसा नहीं है।

अभी परसों ही हैरिंग्टनगंज से मिल्कीपुर की ओर चला जा रहा था। अपने यहां सड़क सपाट तो हो नहीं सकती, पर सूनी जरूर हो जाती है। बाजार छोड़ते ही मोटरसाइकिल दाहिने-बाएं होने को हुई कि सूनी सड़क पर एक साहब मिल गए। अकेले चले जा रहे थे, और पीछे-पीछे मैं। मैंने सुना कि वो कैफी की कोई उम्मीद भरी गजल गुनगुना रहे थे, शायद किसी ताखे से उतार लाए थे। थोड़ी देर तक तो मैं पीछे-पीछे चला और जब न रहा गया तो पूछ बैठा- ‘धक्का लगाएंगे?’ इतना सुनना था कि उनका चेहरा लाल। बोले- ‘मूर्ख दिखता हूं मगर हूं नहीं।’ मैंने कहा- ‘साहब, मैंने तो सिर्फ धक्के का पूछा, न लगाना हो तो न लगाइए। आप दयालु दिखे, इसलिए पूछा।’ कहने लगे- ‘जानता हूं आप मजे ले रहे हैं।’ मैंने लाख समझाने की कोशिश की, रुकी पड़ी मोटरसाइकिल भी दिखाई, पर क्या मजाल कि वह धक्का लगा दें। हारकर मैंने पूछ ही लिया- ‘कभी धक्का खाया है आपने?’ वह बगैर बताए ही आगे बढ़ गए। जाते-जाते मैंने देखा कि इस बार उन्होंने मुंह पर रूमाल भी बांध लिया था।

Monday, February 19, 2018

ये सारे रंग तुम्हारे हैं

दिखाते कुछ हो, सुनाते कुछ हो?
कहते कुछ हो, बताते कुछ हो?
पता है रंग नजदीक है?
रंग आ रहे हैं।
तुम्हारा सुनाना लाल है। चटक लाल।
बुरांश देखा है ना?
खिला और खिलकर आग लगाता बुरांश।
जानते हो कि पहाड़ों में दो चीजें दूर से दिखती हैं?
श्मशान और बुरांश।
दोनों जंगल में लगी आग होती हैं।
एक गर्म तो एक ठंडी।
तुम सुनाते हो तो हिमशैल टकराते हैं। सबकुछ टूटने लगता है। बिखरने लगता है।
तुम्हारी आंख में जो आवाज है, वह सबकुछ पिघला देती है।
सब बिखरकर बूंद बूंद टपकने लगता है। सारी रात टपकता रहता है। दिन भर बहता रहता है।
और कितना हरा है तुम्हारा बताना!
बताते हो या समेटते हो?
उसी बाग में लेकर जाते, जिसका सपना रोपा था।
दूर तक हरा देखते रहने का सपना।
सपने बड़े हो रहे हैं। सपने हरे हो रहे हैं।
बताते हो या खुद में भरते हो?
इतना भरोगे, सब हरा करोगे तो कहीं...
कहीं सपनों में अमलतास न भर जाए।
और फिर सबकुछ बताकर उसमें बुरांश का गुच्छा क्यूं टांकते हो?
बंद करो अपना सुनाना बताना। कहना दिखाना सी दो।
बाग कटते जा रहे हैं। बुरांश का जूस निकाला जाएगा।
न लाल बचा है, न हरा बच पा रहा है।
पीला धूप खा गई।
मगर रंग तो नजदीक हैं।
रंग तो आ रहे हैं।
दिखाना, सुनाना, कहना, बताना तो खर्च हो गया।
फिर? 
मेरी सुनो।
मेरे पास कुछ रंग बचे हैं।
सूख गए हैं।
छू दो, गीले हो जाएंगे।
लगा लो, तुम्हारे हो जाएंगे।
ये सारे रंग तुम्हारे हैं।
तुम्हारे ही तो हैं।
कुंभ, प्रयाग।

















मिलेगा तो देखेंगे- 21 

Sunday, December 25, 2016

नए साल की प्रार्थनाएं

जो मुझसे नफरत करते हैं, वह और भी सुंदर होते जाएं।
जो मुझे नापसंद करते हैं, उनका काम कम खाने से भी चल जाए।
जो मुझे शूली पे टांगना चाहते हैं, उन्‍हें रोजगार मि‍ले।
जो मुझे दुख देते हैं, सुख उनकी कदमबोसी करे।
जि‍नकी आंखों में मुझे देख आग उतरती है, गर्मी का मौसम उन्‍हें कम सताए।
जो मुझे नहीं जानते, उन्‍हें नया जानवर पालने को मि‍ले।
-----------
प्रेमि‍काएं धोखा देती रहें। मैं धोखे खाता रहूं।
पड़ोसी आग लगाते रहें। मैं बेपरवाह जलता रहूं।
दर्द बना रहे। कि‍सी को पता भी न चले।
बांध टूट पड़ें। पानी में मैं तैरता हुआ बहूं।
बाप से बेटा दूर रहे। पहचान और धुंधली होती जाए।
यादें नाचती रहें। उनके हाथों में पैने हथि‍यार हों।
धागे उलझे रहें। सुई खो जाए।
घर की तरह मैं बाहर भी फटे कपड़े पहनूं।
अदालतें चलें तो सिर्फ मेरा चलना बंद करने को।
कचेहरी खुले तो सिर्फ मुझे लगाने को।
कोई दि‍खे तो सिर्फ मुझे दि‍खाने को।
सबके घर के बाहर नए चबूतरे बनें, गर्मी की शाम उनपर पानी छि‍ड़का जाए।
नए साल में प्रार्थनाएं बंद हों।

Sunday, November 6, 2016

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं और इसी आलम में वो सड़क पर उतरकर धुंए का विरोध कर रहे हैं। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता! मैं जो जानता हूं, वो ये कि मेरे अंदर भरा धुंआ बहुत जल्द मुझे सड़क पर ला पटकेगा। धुंआ नहीं पटकेगा तो मैं खुद को ही सड़क पर पटक दूंगा।

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं, लेकिन सड़कों पर भी नहीं उतर सकते। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता!

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

Sunday, January 31, 2016

3- सूनसान बि‍याबान

बहुत वक्‍त बाद बोलता मि‍ला एक जीवंत इंसान
मैं क्‍या करने नि‍कला था और क्‍या कर रहा था, इसका मुझे ठीक-ठीक कोई अंदाजा नहीं लग पा रहा था। अब तो जो कुछ भी था, सामने का रास्‍ता था, बुलेट की धड़-धड़ के साथ ठंडी हवा की कान के बगल से नि‍कलती खड़खड़ थी। इस लंबे रास्‍ते पर उन सारी जगहों के मील के पत्‍थर लगे हुए थे, जहां मुझे नहीं जाना था लेकि‍न क्‍या मजाल कि जहां जाना था, वहां का एक भी मील का पत्‍थर पूरे रास्‍ते में कहीं मि‍ल जाए। कुछ देर तक तो मैं चि‍ढ़ के साथ मील के पत्‍थरों को खोजता आगे बढ़ता रहा और तकरीबन सौ सवा सौ कि‍लोमीटर चलने के बाद जब उन्‍हें कहीं भी न पाया तो पूरी ऊब के साथ उन्‍हें तलाशता रहा। ये बड़ा अजीब रास्‍ता था। रास्‍ते पर चलने के लि‍ए बहुत कुछ था लेकि‍न चलने वाले थे कि दूर दूर तक नज़र ही नहीं आते थे। बड़ी देर बाद जब मुझे रास्‍ते में कीचड़ में पांव लथेड़े सि‍र पर धान लादे मोबाइल पर जोर जोर से हलो-हलो करता एक आदमी दि‍खा तो मैनें तुरंत उसकी फोटो उतार ली। वो बहुत वक्‍त बाद बोलता मि‍ला एक जीवंत इंसान था जि‍सके लि‍ए धीमे बोलने का कोई खास अर्थ नहीं था।

यूपी में बहुत घनी आबादी है। यहां अगर हर तरफ से बंद सड़क न हो (जैसे मुरादाबाद से दि‍ल्‍ली वाली या लखनऊ से फ़ैज़ाबाद वाली या एक्‍सप्रेस वे) तो साठ के ऊपर कुछ भी चलाना बहुत मुश्‍कि‍ल है। हर दो से तीन कि‍लोमीटर पर दो से तीन गांव पड़ते हैं और गांव में रहने वालों का सड़क पर हर हाल में एक ठीहा होना ही होता है। ठीहा होगा तो कुत्‍ते से लेकर बच्‍चे तक उसपर होंगे तो घंटा स्‍पीड मि‍लेगी। बिहार में भी आबादी है लेकि‍न यूपी जि‍तनी घनी नहीं। खासकर उस सड़क पर तो बि‍लकुल नहीं जो मोहनि‍यां से पटना की तरफ मुड़ती है। ये सड़क मुझे हमेशा याद रहेगी। ठि‍ठुरन, सि‍हरन, सड़न, करन, ऊबन... ऐसे कौन से भाव नहीं थे, जि‍नसे होते हुए मैं इस रास्‍ते से गुजरा। और वैसे भी, गि‍नती के 185 कि‍लोमीटर के रास्‍ते पर अगर पांच घंटे लग जाएं तो इन सारे भावों का आना ग़ैरवाज़ि‍ब नहीं है। वो भी तब, जबकि ये रास्‍ता नब्‍बे फीसद खाली था। कभी कभार कोई बस या जीप दि‍ख जाए तो सही रास्‍ते पर चलते रहने का यकीन होता था, नहीं तो कहां जा रहे हैं, इसका अंदाजा ही लगाना पड़ रहा था और वो भी ठीक-ठीक नहीं लग पा रहा था। इस रास्‍ते की उस रास्‍ते से भी तुलना की जा सकती है जो मुरादाबाद से रामपुर के चावल के कटोरे स्‍वार से होते हुए हल्‍त्द्वानी और फि‍र नैनीताल को जाता है।

जहानाबाद से गया जाते हुए ताड़ के पेड़
रोहतास से नि‍कलते ही शीत लहर ने जोर पकड़ा। हालांकि मैनें इनर के साथ गर्म पायजामा पहना हुआ था लेकि‍न सर्द हवाएं तेज़ हो रही थीं। एक जगह आराम करने के लि‍ए बाइक खड़ी की तो बहुत दि‍न क्‍या बहुत साल पहले कभी देखा हुआ नज़ारा फि‍र से देखा। दाहि‍नी तरफ सूरज छुप रहा था और बाईं तरफ चांद नि‍कल रहा था। यही नज़ारा फि‍र से एकबार जहानाबाद से गया जाते हुए ताड़ के पेड़ों के पार भी दि‍खा। आधे घंटे के अंदर मेरे सामने रात थी, उधड़ा हुआ पूरी तरह से बि‍याबान ऐसा रास्‍ता था जि‍समें 30-30 कि‍लोमीटर तक न तो कोई गांव दि‍खता था न इंसान। गाड़ी घोड़ा भी बहुत कम। भूख बहुत जोर की लगी थी क्‍योंकि दि‍न भर में जो खाने को मि‍ला था वो बक्‍सर में वही काले होंठों वाली स्‍त्री के बनाए दो समोसे थे या नि‍कलने से ठीक पहले मेवा मि‍ली बनारस की ठंडई। कहीं आदमी नहीं दि‍ख रहा था, कुछ ढंग के खाने की दूकान कहां से दि‍खती। बीती ताहि बि‍सारता भूखा पेट बुलेट लि‍ए मैं भागा जा रहा था। ठि‍ठुरता, सि‍हरता, डूबता पाटलि‍पुत्र की ओर।   

Thursday, December 24, 2015

कहानी उस ताखे पर है, जि‍सको घुटना कहते हैं

मेरे लड़कपन का प्रेम मेरी काजोल न होती तो क्‍या होता।
 कहानी मत देखि‍ए, काजोल को देखि‍ए। 
गुलाबी गाड़ी, पीली साड़ी, सूनसान सड़क, बरसात बेधड़क, पलटती लड़की, दि‍ल की खि‍ड़की, धूम धूम धांय धांय, मि‍लना बि‍छड़ना, फि‍र से बि‍गड़ना, बि‍गड़ के मि‍लना... क्‍या नहीं है इस फि‍ल्‍म में। उड़ती रॉल्‍स रॉयस और जुल्‍फों ने फि‍ल्‍म को ऐसा उड़ाया है कि अभी तक उड़ ही रही है, जमीन पर नहीं आई है। शर्म तो नहीं आ रही होगी शेट्टी भाई, थोड़ी बेशर्मी हम सबको भी देते जाओ, तीन सिटिंग में पूरी फि‍ल्‍म देख लेंगे। इतने तो दि‍लवाले हम भी हैं।

काली, राज, किंग, फूल, पत्‍ती, धूल, कार, सवार, प्‍यार, जीत-हार से लेकर संजय मि‍श्रा तक बोर हैं, जॉनी भाई भी चुके हुए लोगों के साथ कितना कर लेंगे। एक धागे में दस सुई डाल के सि‍लाई नहीं होती लेकि‍न पैसे हों तो दि‍लवाले जैसी होती है। अपने अफ्रीका वाले जेमी भाई तो जीवित हैं नहीं, कम से कम उनकी बनाई फि‍ल्‍में देखकर ही सीख लेते मेरे शरम शेट्टी।

नहले पे दहला, सगा सौतेला, सेट अलबेला सब डाल दि‍या और कहानी निकालकर उस ताखे पर रख दी जो घुटने में होती है। मेरे लड़कपन का प्रेम मेरी काजोल न होती तो क्‍या होता। कहानी मत देखि‍ए, काजोल को देखि‍ए। संतोष करि‍ए, असंतोष नहीं। इसे भी फि‍ल्‍म कहते हैं। बस।

इसे ही कभी घुसी कभी कम कहते हैं।

Tuesday, December 22, 2015

दि‍खती है धन के एश्‍वर्य की आभा

 बरेली वाली बाला कि‍स्‍मत की धनी है और शायद ही कहीं कमजोर पड़ी हो। 
बरेली में रहे लोग मजबूत होते हैं फि‍र चाहे वीरेन दा हों या प्रियंका। 
धन का भी एक एश्‍वर्य होता है, लेकि‍न ये जरूरी नहीं कि एश्‍वर्य से हर बार वो आभा नि‍कले, जि‍सके लि‍ए सौंदर्यसम्‍मत कलात्‍मक कोशि‍श की जा रही हो। ये भी जरूरी नहीं कि न नि‍कले। बहरहाल, भैसाली भाई जि‍स एश्‍वर्य की आभा ताउम्र दि‍खाने की कोशि‍श करते रहे, ईमानदारी से, अब जाकर थोड़ी थोड़ी झलक उसकी दि‍खाई दी है। भारी भरकम सेट और तकनीक का कि‍तना भी सद्उपयोग कर लें, कहानी कहने की कला का जादू सबको रंग देता है।

कहानी क्‍या है, ये कि‍सी से नहीं छुपा। तो फि‍र ऐसी क्‍या छुपी हुई चीज है, जि‍से देखने के लि‍ए ये फि‍ल्‍म बुलाए। छुपी हुई चीजों को देखने के लि‍ए ये फि‍ल्‍म देखनी पड़ेगी। वैसे अदाकारी पर बात की जा सकती है जि‍समें बाजीराव और मस्‍तानी कई जगहों पर कमजोर पड़े हैं। अपना भैसाली भाई चाहता तो कई जगहों पर रीटेक ले सकता था, लेकि‍न शायद इन दोनों की अदाओं के सामने वो भी कमजोर पड़ गया होगा। बरेली वाली बाला कि‍स्‍मत की धनी है और शायद ही कहीं कमजोर पड़ी हो। बरेली में रहे लोग मजबूत होते हैं फि‍र चाहे वीरेन दा हों या प्रियंका।

मैं सौ में से सत्‍तर फीसद मानकर चलता हूं कि बनाए हुए गीत फि‍ल्‍म का वास्‍तवि‍क हि‍स्‍सा नहीं होते हैं। तीस फीसद इसलि‍ए मानकर चलता हूं क्‍यों सि‍नेमा और उसका संगीत मेरे यहां बमुश्‍कि‍ल इतने ही लोगों तक पहुंचता है। भैंसाली भाई खुद इसका संगीत दि‍ए हैं और अलबेला सजन दूसरी टोन में लेकर आए हैं, सुनि‍एगा जरूर। कहने का बस इतना मतलब है कि न गीत और न संगीत, कहीं पर डि‍स्‍टर्ब नहीं कर रहे हैं। कम से कम उतना तो नहीं, जि‍तना फेसबुक की कति‍पय कवि‍ताएं करती हैं।

फि‍ल्‍म के अंत में कट्टर हिंदुत्‍व की हमलावर काली ध्‍वजा और काले घोड़े क्‍या संदेश देना चाहते हैं, ये लि‍खी हुई कहानी बयां नहीं कर सकती, इसका बयान सिर्फ एक फि‍ल्‍म ही कलमबंद कर सकती है। ऐति‍हासि‍क फि‍ल्‍मों की श्रेणी में अगर ये कहा जाए कि इस फि‍ल्‍म ने रि‍स्‍क लेने के नए रास्‍ते और इति‍हास में दर्ज होने के नए हर्फ गढ़े हैं तो अति‍श्‍योक्‍ति नहीं होगी। देखकर महसूस करना पढ़ने सुनने लि‍खने से कहीं अलग की अनुभूति है और वो भी तभी महसूसेगी जब दि‍खने वाले में वो स्‍पार्क होगा।

फि‍ल्‍म पाकि‍स्‍तान में बैन की गई, इसका कहानी से कोई रि‍श्‍ता नज़र नहीं आता। अगर मोइन अख्‍तर भाई साहब का लूजटाक देखें तो सबसे पहले तो वो बैन होना था। पाकि‍स्‍तानी लोगों को उन्‍हीं की इस कहानी से महरूम रखने के क्‍या वजहें हो सकती हैं, फि‍ल्‍म देख लेने के बाद ये जानना चाहें तो आपका 10 साल का बच्‍चा पूरी कहानी बता देगा। उनपर यकीन करें, वो आपसे ज्‍यादा इनफॉर्म्‍ड हैं।

ये फि‍ल्‍म शाहरुख को सोचने देने के लि‍ए दि‍या गया आराम है, लगातार कॉपी कि‍ए जाने पर अल्‍पवि‍राम है।

Saturday, October 17, 2015

आएगी बहार इसी बार... करता हूं इंतजार

ये जो चल रहा है, सोचता हूं उसके चलने के लि‍ए सबसे जरूरी क्‍या होता होगा... सुबह उठे तो पैरों को एक अदद चप्‍पल मि‍ल जाए, फ्रि‍ज में एक बोतल ठंडे पानी से दो घूंट मि‍ल जाए, मंजन करना हो तो ब्रश मि‍ल जाए, रसोई में प्‍याज न सही लेकि‍न आलू शि‍मला मिर्च टमाटर या मीनू का मीट काटने के लि‍ए एक अदद चाकू मि‍ल जाए, खाना बन जाए तो उसे पैक करने के लि‍ए टि‍फि‍न मि‍ल जाए, बाहर जा रहे हों तो बाल काढ़ने को एक कंघी मि‍ल जाए..
आम आदमी के जीवन में अंबानी बनना कोई इच्‍छा है तो उसे भी पता है कि उसका कोई मतलब नहीं है। वो तो बस जैसे तैसे काट देना चाहता है, ऐसे वैसे ही सही लेकि‍न जो चल रहा है, उसे गुजार देना चाहता है। क्‍या चाहि‍ए आखि‍र एक इंसान को चलने के लि‍ए.. चप्‍पल ही तो चाहि‍ए पैरों में। वो भी न हो तो..

चप्‍पल, जब तुम नहीं होती तो मैं जूता पहनकर टॉयलेट जाता हूं, जूता भीग न जाए इसलि‍ए उसे बाथरूम के बाहर उतार देता हूं। खाली डोरमैट पड़ा देख क्‍या बताऊं कि कैसी कैसी तुम्‍हारी याद आती है। तुम थी तो टॉयलेट भी टॉयलेट सा नजर आता था। तुम नहीं हो तो वो भी रेसिंग कोर्स सा लगता है और समझ में नहीं आता कि कर रहा हूं या भाग रहा हूं। बाथरूम में जब तुम भीगती थी, तुम्‍हें अपने भीगे पैरों में डाल कि‍तनी देर तक तो दि‍माग को ठंडा करता रहता था.. चप्‍पल, मेरी प्‍यारी चप्‍पल। जहां भी हो, मेरा प्‍यार हमेशा तुम्‍हारे साथ है।

चाकू... मेरे चमकीले सजीले कंटीले रपटीले तेज चाकू... तुम्‍हारे बि‍ना तो ये रसोई अब रसोई नहीं बल्‍कि सोई हुई है। काटने को कि‍तना कुछ तो है। डोंगी में पड़े मोटे मोटे आलू, उसके ठीक बगल चुन चुन कर लाए गए मोटे सफेद लहसुन। फ्रि‍ज में रखा लाल रसीला टमाटर, शि‍मला मिर्च और बड़े मन से लाई सीजन की पहली गोभी। पता है चाकू, अभी तक वो गोभी वैसे ही पड़ी हुई है। तुम हो नहीं तो वो भी होने नहीं पा रही है.. कि‍तना कुछ तो काटने को पड़ा है लेकि‍न जो नहीं पड़ा है वो तुम हो... तुम ही तो हो।

कंघी.. ओह मेरे बालों से लड़ने को बेताब मेरी पसंदीदा जंगी। मुझ बेकार को कार का लुक देने वाली कंघी। तुम मेरे जीवन और जोबन से कहां चली गई। तुम्‍हें खोजता हूं बार बार, मेज पर फैले बेतरतीब पड़े कागजों डि‍ब्‍बों दवाइयों चूरनों पि‍चकी हुई टूथपेस्‍ट की ट्यूबों, रजनीगंधा के खत्‍म डि‍ब्‍बों के बीच लेकि‍न तुम भी न जाने कहां मुझे छोड़कर चली गई। तुम्‍हारे बारे में मैं थोड़ा सो बेईमान हूं इसलि‍ए तुमको न जाने कहां बोल रहा हूं नहीं तो मुझे पता है कि तुम कि‍स जुल्‍मी के बालों संग खेल रही हो। जल्‍दी आओ नहीं तो तब तक मैं पाजामा तो बना ही हुआ हूं।

और टि‍फि‍न.. याद है तुम्‍हें हर दोपहर तुम कैसे खुलखुल कर खुलते थे मेरे सामने। अब कब खुलोगे.. खुलोगे या नहीं।

आएगी बहार इसी बार... करता हूं इंतजार कि मुझे भी मि‍ले एक चप्‍पल एक चक्‍कू और कंघी टि‍फि‍न..

Saturday, February 21, 2015

कि‍सी शहर में खड़े खड़े

पेरि‍स के कि‍सी स्‍टेशन पर कभी खड़े खड़े
कई बार उस आदमी ने सोचा कि खुद को शहर में कहीं तो खड़ा पाए। न खड़ा पाए तो कम से कम बैठा या लेटा तो पाए। इनमें से कुछ भी न पाए तो खुद से चार गुनी बड़ी कांच की खिड़की से शहर को देखता पाए या फि‍र सर्द कांच के कठोर केबि‍न में कि‍सी कि‍नारे खुद को पाए, लेकि‍न आदमी की इतनी चाहतों के बावजूद, रोज ब रोज की लट्ठमलट्ठे और गुत्‍थमगुत्‍थे के बावजूद आदमी खुद को शहर में खड़ा लेटा बैठा तो दूर, खुद को देख भी नहीं पा रहा था। न फ्लाईओवरों के ऊपर या शॉर्टकट के चक्‍कर में नीचे से गुजरते हुए, न रेड लाइट पर बेशर्मी से भीख मांगती बुढ़ि‍याओं को गरि‍याते हुए, न चाय वाले से नजदीकी बढ़ाते हुए और न ही हर तीसरे महीने एक नया प्रेम करते हुए, आदमी परेशान था कि वो खुद को पा क्‍यों नहीं पा रहा है, कहीं पहुंचा क्‍यों नहीं पा रहा है। साल भर की चार प्रेमि‍काओं और उनके मासि‍क धर्म भी उसे पाने में आखि‍र क्‍यों नहीं कोई मदद कर पा रहे हैं। क्‍या वो आदमी इतना भोथर हो चुका है कि साल भर में चार बार मासि‍क धर्म पूरी तन्‍मयता से नि‍भाने के बावजूद उसके पेट में उठने वाला वो दर्द भी उसे वो रास्‍ता नहीं दि‍खा पा रहा है, जो मुहल्‍ला मोतीबाग की गली नंबर चार से तो कतई होकर नहीं जाता है, भले ही उस गली नंबर चार में चार सौ कि‍लोमीटर साइकि‍ल चल चुकी हो।

हर वक्‍त या तो गांव या फि‍र से गांव में ही खुद को खड़ा, बैठा, लेटा और चढ़ा भी पाने वाला आदमी इन दि‍नों जब खुद को शहर में देखता है तो परेशान हो जाता है कि यहां के पेड़ों की डालि‍यां इतनी कमजोर क्‍यों होती हैं कि उंगली रखने से टूट जाती हैं। क्‍यों नहीं ये डालि‍यां गांव के उन पेड़ों के जि‍तनी मजबूत हैं, जि‍नपर मन भरकर लंफने के बाद भी सटाक से मन नीचे आकर गि‍र जाता था, लेकि‍न डाली मुस्‍कुराती, इठलाती चार पत्‍ती नुचवाकर वहीं पर हि‍लती रहती थी और थोड़ी देर बाद हि‍लनी बंद हो जाती थी। धान तो थोड़ा जिंक, जरा सा नमक या कभी कभी नि‍रमा डालने पर कैसे तो हरा होकर ठठाकर हंसने लगता था, तो क्‍यों यहां के धान इन सबको डालने के साथ-साथ यूरि‍या और पोटाश भी डालने के बाद मुरझाए रहते हैं, और जो दाना देते भी हैं, वो इतना पतला, महीन और अर्थहीन होता है कि आदमी की आर्थिक हालत तक डावांडोल होने लगती है। गांव  में पेड़ लगाता था तो दो दि‍न में ही एक कल्‍ला फोड़ देता था, यहां पर पेड़ लगाता है तो 40-40 दि‍न बाद भी क्‍या मजाल कोई नया कल्‍ला फोड़ें, उल्‍टे गमला जरूर फोड़ देते हैं।


इस शहर में आदमी खुद को खड़ा देखे भी तो कैसे देखे जहां लोग शादी में जाने के लि‍ए न चुकाने वाला उधार तीन-तीन हजार लेकर जाते हैं, लेकि‍न साला कोई हरामखोर अपनी प्रेमि‍का से मि‍लने के लि‍ए चार फूल गुलाब का खरीदने के लि‍ए दो सौ रुपया भी उधार नहीं मांगता।  ठेलों पर चभर चभर हर वक्‍त कुछ न कुछ चबाते चुम्‍हलाते लोगों के चेहरों पर झलकती तफरीह क्‍यों उस शहर को उसके अंदर खड़ा नहीं होने देती या फि‍र तफरीह का सारा मंत्र उस शहर की नींव में घुसकर लगातार खुद को पढ़-पढ़कर भोथरा कर रहा है कि न तो उस आदमी में शहर खड़ा हो पा रहा है और न ही वो आदमी उस शहर में खड़ा हो पा रहा है। होते हुए भी जो छूट गया है, दि‍खते हुए भी जो देखने से रह गया है, वो गांव बार बार क्‍यों उस शहर में आकर बस जा रहा है और आदमी के पैरों को थोड़ा सा और लुंजपुंज बना जा रहा है।

खड़ा होने का सारा ककहरा जि‍स जमीन पर चटाई बि‍छाकर कालि‍ख लगाकर सीखा था, शहर की जमीन उससे कहीं ज्‍यादा चि‍कनी, चमकदार और सलीकादार भी है तो भी वो सीखा ककहरा क्‍यों यहां फि‍सल जा रहा है जो गांव की उबड़खाबड़ जमीन पर इधर उधर उग आई घास या बन आए गड्ढों में पड़ा रहता था और खड़े खड़े पड़ा रहता था। ककहरा कुरेदने के लि‍ए पहले एक गड्ढा था, इस शहर की चिकनी सड़कों पर चप्‍पल घि‍सते घि‍सते
खुद चप्‍पल में एक गड्ढा हो गया और दूसरा ककहरा अपने आप उग आया। दोनों तरफ के शोरों से बेतरतीबी बटोर कर हि‍लते हुए दोनों को उगल देने की आदत से परेशान इस आदमी का ये पैर इन शहरों की चि‍कनी सड़कों पर चप्‍पल और बगल में भी एक गड्ढा लि‍ए खड़ा हो भी तो कैसे हो। गांव की पोली जमीन में पैर धंस जाते थे, चि‍पक जाते थे, आगे उठने का नाम नहीं लेते थे, तब जाकर खड़े होने की और आसपास देखने की बात समझ में आती थी।   आखि‍र ये आदमी शहर में कहीं कि‍सी कोने, कि‍सी फ्लाईओवर, कि‍सी बस, कि‍सी मेट्रो या कि‍सी लोकल में खड़ा हो भी तो कैसे हो जब ये शहर ही उसमें खड़ा होना तो दूर, झांकने भी नहीं आता।

अब तक जो कुछ भी ये आदमी समझा, वो ये समझा कि शहर में खड़ा होना पूरी तरह से बेमानी है। शहर में उड़ना चाहि‍ए, तैरना चाहि‍ए, लेकि‍न खड़ा कभी नहीं होना चाहि‍ए। शहर की छतें बहुत नीची होती हैं, सि‍र फट जाता है, दि‍माग बाहर नि‍कलकर चि‍कनी सड़क पर फैल जाता है। 

Sunday, February 1, 2015

लाई बे-कदरां नाल यारी, ते टुट गई तड़क करके Lai Beqadran Nal Yari

नी मि‍ल्‍या यार कहर वि‍च भारय ओ
अते नैनां
अते नैंना चरही खुमारी
काले रूप तयार दंगां नूं
ओदे हथ वि‍च हुस्‍न कटारी
लाई बे-कदरां नाल यारी, ते टुट गई तड़क करके
हो बल्‍ले बल्‍ले, ते टुट गई तड़क करके
बचपन गया जवानी आई
खि‍रि‍यां ने गुलजारां
बाए गल्‍लां सूहे रंग वताए
तख्‍न अजब बहारां
बाए पींग माही दी झूटन आइयां
बस्‍तल अल्‍हण मुटयारां
वारों वारी पींग झुझेवां
कर कर नाज हजारां
वारों वारी पींग झुठठेवां
कर कर नाज हजारां
जद्दों आई टटरी दी वारी
ते टुट गई तड़क करके
लाई बे-कदरां नाल यारी
ते टुट गई तड़क करके
हो बल्‍ले बल्‍ले, ते टुट गई तड़क करके
जद्दों सइयो मस्‍त जवानी हो च आवां लाग्‍गी
ओ जागे भागे माही घर आया शगन मनावन लाग्‍गी
बुल्‍लां नाल लगी जद प्‍याली... हाए
ते टुट गई तड़क करके
लाई बे-कदरां नाल यारी
ते टुट गई तड़क करके
हो बल्‍ले बल्‍ले, ते टुट गई तड़क करके
चैतर चि‍ट अचानक माही वेहरे आन खलोया
मैं चुन चुन फुल्‍ल उम्‍मदां वाले
सोहना हार पि‍रोया
चाएन चाए चक के हार नूं नाल गले दे छोया
भैरी नि‍कली डोर नकारी
ते टुट गई तड़क करके
लाई बे-कदरां नाल यारी, ते टुट गई तड़क करके
हो बल्‍ले बल्‍ले, ते टुट गई तड़क करके
लाई बे-कदरां नाल यारी, ते टुट गई तड़क करके
ते टुट गई तड़क करके



I met a beloved filled with a mighty fury, look
And her eyes were filled with an intoxicating charm, 
Her lustrous beauty was a black serpent poised to sting me
Her beauty a sharp sword ready to slay me
When we gave our heart to a scornful beloved, 
It broke with a sudden sharp snap 
Bravo! It broke with a sudden sharp snap 

Childhood has fled, and the bloom of youth has arrived 
Fragrant gardens have blossomed, 
And cheeks have acquired a rosy bloom, 
Spring has brought a wonderful freshness 
To swing on the beloved’s rope-swing, 
Some beautiful, joyful maidens have arrived 
One by one they rode the swing, 
With a thousand coquettish airs
And when it was my wretched turn at the swing,
It broke with a sudden sharp snap.
When we gave our heart to a scornful beloved,
It broke with a sudden sharp snap.
Bravo! It broke with a sudden sharp snap.

When, my dear friends, I started to become conscious of my blossoming youth
Fortune smiled on me, my beloved came home, and I began celebrating
I filled a cup and gave it to my beloved, and started rejoicing
As soon as the cup touched his lips, alas!
It broke with a sudden sharp snap.
When we gave our heart to a scornful beloved,
It broke with a sudden sharp snap.
Bravo! It broke with a sudden sharp snap.

In the spring, my beloved suddenly came and stood in my courtyard
I picked flowers of hope and longing, And strung a beautiful garland.
With great love, I took the garland and lifted it to his neck, 
But the thread of the garland turned out to be frail and useless.
It broke with a sudden sharp snap,
When we gave our heart to a scornful beloved, It broke with a sudden sharp snap.
Bravo! It broke with a sudden sharp snap.

Thursday, January 1, 2015

मेरी प्‍यारी मौसि‍यों

मेरी प्‍यारी मौसि‍यों 
(लीला और सुर्जकली मौसी के अलावा वाली मौसि‍यों),

कई दि‍न से हम घर से नि‍कलके चौराहे पे जा रहे हैं। असोक के यहां पान खाए के बाद अपने दोस्‍तों से बति‍याकर उनका बात चुपके चुपके मुंबई का घटा, बनारस का छटा, रांची दि‍ल्‍ली वाया पालमपुरो वाले दोस्‍तन को बता दे रहे थे। हालांकि हमका पता है कि हमरे सारे दोस्‍त हमको मि‍लके कूटेंगे, लेकि‍न इस्‍पेसली मनोरमा मउसी, आप तो हमारा मन जानती ही हैं। हम जब तलक चार लोगों से गाएंगे नहीं, गाली गुप्‍ता सुनके अपना गाल बजाएंगे नहीं, हमरे दि‍माग का जो डि‍स्‍परेसन है, वो कैसे नि‍कलेगा। बताइये। वैइसे मउसी, ई सारी बात सारे लोग जान रहे हैं, पर पता नहीं काहे मस्‍तराम की लुगदी की तरह एकदम कोने में, न जाने कौन बि‍लुक्‍का में लुकवाए बैठे रहते हैं, कि उनका जानते हुए कौनो जान ना लेय। ऐसे लोगन का भी इलाज लि‍खि‍एगा।

निर्मला मउसी होतीं तो यही कहतीं कि गीता का फलाना शलोक पढ़ो, उसे मन में बि‍ठाओ। और गीता भी कौन सी गीता, रि‍काबगंज में प्रि‍या ब्‍यूटी पार्लर वाली गीता का बात कहतीं, तभो मन में कोई गरमी पहुंचती (ठंड बहुत है, गरमी का जरूरत है) लेकि‍न ऊ त सीधे आठचक्‍कर वाली पता नहीं कौन सी गीता का बात करती रहती हैं। फि‍र कहतीं कि चूड़ी में जड़ने वाली मणी पढ़ौ, देमाग तेज होगा। निर्मला मउसी, तुमसे इस्‍पेसली दोनों हाथ जोड़ के वि‍नती करते हैं कि चुप्‍पेचाप अयोधा दरशन का चली आओ। अउर हां, इसका भी पूरा बंटवारा करने का आपसे दरकार है कि हम नास्‍ति‍क हूं या आस्‍ति‍क। इनामदारी से कह रहा हूं कि अबहूं कभो कभो हनुमानचलीसा तो कबहूं सुंदरकांड का चौपाई जबान पर चरपरा जाता है।

रामकली मौसी से हमको ये पूछना था कि अनाथालाय में जो औलादों को रखने का ठेका लि‍या था, का उसमें सब भक्‍तै हैं मने नजायज औलादें तो सभै जगहि‍या पे हैं। हम का सोच रहे हैं, कि काहे नहीं हम उनका भी बात वाया मोतीहारी नसलबारी सबतक पहुंचाएं। बाकी पहाड़ वाली मउसी चुपके चुपके मुस्‍कि‍या रही होंगी, इस बात का हमको पूरा यकीन है, गोबरधन का कसम खा के कहते हैं।

(फूल का थारी खरीदने गए थे कि आप लोगन को चि‍ट्ठी के साथ पठा देंगे, त उसका रेट तो एकदम्‍मे मोदी होय रहा है। यहलि‍ए अपने लैपटाप के स्‍क्रीने पे ई फोटू से काम चला लीजि‍ए, ज्‍यादा कहने की का दरकार है। थारी ठीक से दि‍ख रहा है ना.. नहीं त कहि‍ए लि‍टफेटि‍या थारी दि‍खाएं)

Wednesday, October 29, 2014

उफ ये बच्‍चे और इनके नखरे

पेड़ हों या पौधे, एकदम बच्‍चे जैसे होते हैं। जमीन में हों तो बड़े हो भी जाएं, लेकि‍न गमलों में ये ताजिंदगी बच्‍चों जैसे ही होते हैं। पता नहीं, शायद इसके लि‍ए सौंदर्यशास्‍त्र को दोष दि‍या जाए या नहीं, पर हम सभी लोग अपने आसपास हरा भरा ही देखना चाहते हैं। भले ही असलि‍यत हरी भरी ना हो, कंकरीटी हो, एसी से तपती हुई धूप की तरह जलती हुई हो, पर आसपास हरा भरा जरूर हो। हो सकता है कि इसके लि‍ए हमारे दि‍माग के सामंती अवशेष जि‍म्‍मेदार हो या फि‍र ये भी हो सकता है कि... कुछ और हो, बहरहाल कुछ तो है जो हम अपने आसपास हरा भरा देखना चाहते हैं। सभी लोग अपने घर में अपने इस नयन सुख के लि‍ए (बाज़ लोग इसे चाहे जैसा सुख समझें) गमले पौधे लगाते ही हैं, मैनें भी लगाए हैं। अक्‍सर लोगों से उनके बारे में राय भी लेता रहता हूं जो पौधे मैने लगाए हैं। बहरहाल बात ये नहीं कि मैने पौधे लगाए हैं, बल्‍कि बात ये है कि आज मेरे दो पौधों में मारे जलन के बुरी तरह से लड़ाई हुई है और कुल मि‍लाकर चूंकि मेरे ही दो बच्‍चों में लड़ाई हुई है, इसलि‍ए भुगतना मुझे पड़ रहा है।

गुड़हल भाई मेरे घर के सबसे पुराने मेंबर हैं। भाईजान एक बखुद एक मि‍ट्टी भरे अदद सीमेंटेड गमले सहि‍त हमारी छत पर पधारे थे। उसी वक्‍त हम इनकी जगह ठीक उस जगह तय कर दि‍ए, जहां सबसे पहले सूरज की रोशनी आती थी। मिट्टी भरे दूसरे गमले में साइकस बहुत बाद में लगा और अभी भी ठीक से सर्वाइव नहीं कर पाया है। गुड़हल भाई को हम रोज पानी देते थे और आते जाते हाथ फेर देते। तकरीबन 3 महीने तक भाई साहेब का मजाल कि एक फूल दि‍ए हों। पहले दूसरी जगह पर थे और रोजाना दो तीन फूल देते थे। जब हम जगह बदले तो भाईजान तीन महीने तक नाराज रहे हैं। हम रोज पानी दें और कमोबेश रोज हाथ फेर दें। इस बीच हमरे पास एक और कदंब चच्‍चा आ गए। ये वाले चच्‍चा तो लगावे के एक महीने के अंदर शेषनाग के फन भए। भरी गर्मी में गुड़हल और कदंब, दोनों लोगों का दि‍न में दो बार पानी देना पड़े, तब जाके दूनों की प्‍यास शांत हो।

परसों की बात है। सारे गमलों में पहले गुड़ाई कि‍ए, फि‍र कुछ देर बाद हलका पानी डाल दि‍ए। ईमानदारी से बता रहे हैं कि गुड़हल और कदंब में भी डाले थे, हमको पक्‍का याद है। और इन दोनों की गुड़ाई भी नहीं कि‍ए थे। कल दोनों को पानी नहीं दि‍ए, सोचे कि ठंड में कम सूख रहा है... लेकि‍न गुड़हल चच्‍चा तो ये रंग दि‍खाए कि पूछि‍ए मत। गलती हमसे ये हुई कि कदंब को कल रात में एक गि‍लास पानी पि‍ला दि‍ए, लेकि‍न गुड़हल को कुछ नहीं दि‍ए। आज सुबह भी दोनों को कुछ नहीं दि‍ए, लेकि‍न सुबह ही गुड़हल 3-4 हरी से पीली होती पत्‍ति‍यों से चेतावनी जारी कर रहा था। अभी रसोई आते जाते वक्‍त भाई साहब कई बार ध्‍यान दि‍लाए कि 7-8 पत्‍ती पीली हो चुकी है, जल्‍दी से पानी दि‍ए हैं। देखिए भाईजान को कब तक आराम मि‍लता है। और तुर्रा ये कि सामने वाला कदंब, जि‍ससे इनका कंपटीशन है, लहलहा रहे हैं। हम अभी खड़े होकर भाईजान को समझाकर आए हैं कि ऐसे परेशान न हुआ करें। वो घर के सबसे बुजुर्ग सदस्‍य हैं। कदंब के चि‍ढ़ाने पे तो बि‍लकुल ना जाया करें।अभी वो बच्‍चा है और ऐसे ही बचपने की हरकत करता रहेगा। और देखि‍ए तो, छठ हो ना हो, वैदि‍क रीति से भगबान सूरज को आपै रोज नमस्‍ते करते हैं, कदंबवा को तो हम करने भी नहीं देते। न तो बेचारा चांद देख पाता है ना सूरज, अब ऐसे में तनि‍क हंसी ठि‍ठोली कर लि‍या आपसे तो आप लगे पीले होने। ये कोई बात नहीं होती और अब तो आप सबके खुश होने के दि‍न हैं। कुछ दि‍न में आपके बगल वाली गुलदाउदी भी आपका पूरा साथ देगी। कदंबो देगा, लेकि‍न आप तो जानते ही हैं कि अभी वो बच्‍चा है। रात में पांच मि‍नट तक गुड़हल भाईजान को प्रवचन दि‍ए हैं, तब अभी सुबह जाकर देखते हैं कि कुछ कुछ हरापन लाना शुरू कि‍ए हैं।. उफ ये बच्‍चे और इनके नखरे। 

Tuesday, July 22, 2014

अंडरलाइन उदासी

फोटो- गार्जियन के लि‍ए एटकिंस भाई साब
आखि‍रीबार वो कब उदास हुआ होगा। अचानक ही ये सवाल उसके जेहन में कौंधा और चूंकि सवाल बावस्‍ता था तो जवाब खोजने की कोशि‍शें शुरू होनी भी लाजमी थीं। पर उदासी से जुड़ा ये सवाल उदास करने की बजाय परेशान ज्‍यादा कर रहा था क्‍योंकि डॉक्‍टर की दी गई गोलि‍यों को लगातार दि‍न में दो बार दो साल तक खाने के बाद उसे कई सारी चीजें भूल गई थीं। दि‍माग की हार्ड डि‍स्‍क से एक तरह से इरेज सी हो गई थीं। फि‍र भी सवाल मुंह बाए सामने खड़ा था और खुद से ही जवाब की दरकार कि‍ए जा रहा था।

कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। इस सवाल का जवाब खोजने में उसने कामवाली को चार बार डांटा और पांचवी बार दोबारा आने से मना कर दि‍या। उदासी का ये सवाल उसे चि‍ड़चि‍ड़ा कर रहा था पर बता के ही नहीं दे रहा था कि कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। क्‍यों नहीं उसने अपनी आखि‍री उदासी को अंडरलाइन करके कि‍सी वर्डफाइल में सेव कर रखा था। बोल्‍ड इटैलि‍क भी कर देता तो भी शायद काम चल जाता। पर दवाइयों का जो असर था, उनकी वजह से उसे वर्ड की वो फाइलें ही याद नहीं रह गई थीं जि‍नमें उसने अपनी उदासि‍यों को, अपनी खुशि‍यों को या अपनी कि‍सी भी चीज को अंडरलाइन कि‍या था। मतलब जवाब सामने तो था, पर जवाब सामने रखी कि‍न चीजों में था, ये याद नहीं। गनीमत रही कि सवाल उसे याद रहा।

आखि‍री बार की उदासी को पता लगाने के लि‍ए वो बाकायदा बाजार गया और लाला बैजनाथ की मूढ़ी संग प्‍याज की पकौड़ी जबरदस्‍ती उस लाल वाली चटनी के साथ खाई जो जबान पर आते ही जैसे कारबाइड की गैस बनाती थीं। सोचा कारबाइड से उसे कुछ याद आए। कारबाइड के साथ उसकी खुशी का पुराना रि‍श्‍ता रहा था। चाहे वो दि‍वाली हो या आम या केले का मौसम... कारबाइड उसके लि‍ए हमेशा खुशी लेकर आया था और तब तक उसने भोपाल की त्रासदि‍यां नहीं सुनी थीं, देखने की तो बात दूर की रही। बहरहाल, खुश होने की गैस मि‍लने के बावजूद मुसीबत बढ़ती जा रही थी क्‍योंकि उदासि‍यों की याद के जवाब के लि‍ए कमबख्‍त को ए बी या सी या डी का ऑप्‍शन भी नहीं दे रहा था जि‍ससे कि कम से कम तुक्‍का तो भि‍ड़ाया जा सकता था और वो उस तुक्‍के से संतुष्‍ट भी हो जाता क्‍योंकि कोई भी, सि‍वाय उसके, उस तुक्‍के को गलत नहीं ठहरा सकता था। जाहि‍र है कि ऑप्‍शन नहीं थे इसलि‍ए अब तक उसके पास कोई जवाब नहीं था।

ऐसा नहीं है कि सबकुछ एकसाथ गायब हुआ हो। हो ये रहा था कि एक लाइन याद आती थी फि‍र उसके दो दि‍न या चार महीने के बाद की लाइनें याद आती थीं। दि‍माग में गोले फूट रहे थे तो जीभ पर कभी गोले तो कभी कांटे उगने से परेशान वो बैठे बैठे उठ जाता था तो खड़े खड़े बैठना भी पड़ रहा था। सोचा कि कि‍सी को फोन करे, पर नहीं। सोचा कि शायद फेसबुक के टाइमलाइन पर हो, पर नहीं। सोचा कि शायद ब्‍लॉग में हो पर वहां भी नहीं। ऑरकुट तो पहले ही खत्‍म हो चुका था। उदासी की तलाश थी कि खाए जा रही थी, सि‍र धुने जा रही थी।

अचानक बत्‍ती जली। आखि‍रकार वो ये क्‍यों याद करना चाहता था कि वो आखि‍री बार कब उदास हुआ था। सवाल फि‍र से शुरू हो गए। जीभ पर गोले और कांटे फि‍र से बनने लगे। इस पर तो उंगलि‍यों में झनझनाहट भी हो रही थी। उसने तुरंत अपने साइकैट्रि‍स्‍ट को फोन लगाया। बताया कि एक बार फि‍र से उदास होना चाहता हूं। साइकैट्रि‍स्‍ट हंसा, तुरंत उसने दो दवाइयां नोट कराईं और बोला, ज्‍यादा उदास होने की जरूरत नहीं। अब वो नए तरीके से उदास होने लगा। उसने अभी तक वो दवाइयां नहीं खरीदी थीं। उसके पास उदासी की सबसे बड़ी वजह थी कि वो एक बार फि‍र से उदास होना चाहता था। साथ ही उसके पास अपने लि‍ए एक अच्‍छी खबर भी थी कि उसे उदासि‍यां याद नहीं आ रही थीं। 

Thursday, June 5, 2014

मंटू की डायरी के नोट्स

मंटू की डायरी के नोट्स

1 जुलाई-
संझा को हमारे पापा हमको बजार साथे लेकर गए अउर दुई जोड़ी इस्‍कूल की ड्रि‍रेस खरि‍दवाए। एक ठो नीली चड्ढी है अउर एक सुफेद। लेकि‍न हमका सुफेद वाली जादा अच्‍छी लगती है काहे कि ओकरे साथे सुफेद जूता अउर सुफेद बुश्‍शर्ट भी है। हम लउट के आए तो देखे कि संजुआ सार टइयो लाया है नीली काली रंग की। मार गुस्‍सा के हम वहीं जमीने पे ओलर गए अउर लोटने लगे। मम्‍मी लाख समझाईं, बोलीं कि बोलबो नहीं करेंगी, तौ भी हम आज  शाम के टाई लइन के माने।

2 जुलाई-
मारे खुसी के हमरी आंख भि‍नौखै मा ही खुल गई। लेकि‍न हम आज मम्‍मी से गुस्‍सा हैं। ऊ सफेद चड्ढी अउर बुश्‍शर्ट तौ पहनाईं, मुला टाई नहीं पहने दीं। हम जि‍दि‍याने तौ बरज के हमको चुप करा दीं कि तुम्‍हरा इस्‍कूल में चलता नहीं है टाई फाई। टाट पट्टी ल्‍यो अउर भागो जल्‍दी। अउर सुनौ, आज तौ तहरी मि‍ले ना, ई ल्‍यो, कगदे मा अचार बांध दि‍ए हैं। अब बताओ भगवान जी, ऊ लोग तहरी देते हैं जेहमन कक्षा नौ वाली दूरबीनौ लेके खोजौ, तब्‍बौ सबजी का एक्‍को टुकड़ा देखा जाए तौ गलीमत समझौ।

3 जुलाई-
आज तौ सुबह से शाम ले सब बेनीकै रहा। कुच्‍छौ मजा नै आवा। भिंसारे उठे तौ देखे कि मम्‍मी रसोई की जमीन पै वइसेन लोट रही हैं, जइसे हम टाई के लि‍ए लोटे थे। पप्‍पा कहत रहे कि अब दै दि‍ए वोट तौ दै दि‍ए, हमका का पता रहा कि हम लोगन का कीचड़ मि‍ले, वहू ऐतना महंग... बाबूजी रक्षा करैं, पर ऐतना बड़ा अहसान फरामोशी...उधर मम्‍मी कहत रहीं कि तुम्‍हरा तनखाह तौ बढ़ी नहीं, ई सब बढ़ गया। ऊ तौ मंटुआ का एक टैम इस्‍कूल में खाना मि‍ल जाता था, अब कइसे चले। लाओ ओरदावन, हम खतम होए जात हैं। हम जइसे ही ई रूप देखे, चुप्‍पेचाप अपना कपड़ा लत्‍ता पहि‍ने अउर पतली गली से इस्‍कूल नि‍कल लि‍ए।

4 जुलाई-
आज शाम का पापा के दुई तीन दोस्‍त आय रहे। लाला अंकल तो अइसा बोले कि हमरी वहीं पे खीस नि‍कल गई। बोलत रहे कि तौ का हुआ जउन गइस के दाम बढ़ गवा, अरे एक रुपय्या के काला नमक ल्‍यो, पि‍छवाड़े पे पैप लगाओ औ दे ढुसुर ढुसुर... ही ही ही। लाला अंकलो बहुत मजा लावत हैं।