वैष्णव का होटल चल निकला था। शहर भर में धूम थी। बाहर से जो भी आता, स्टेशन पर ही उसे होटल का शानदार विज्ञापन दिखता। विज्ञापन तो और भी थे, लेकिन वैष्णव के होटल जितना बड़ा विज्ञापन और कोई नहीं था। फिर बत्ती भी उसी विज्ञापन पर जलती। वैष्णव ने बिजली विभाग से मिलकर जुगाड़ गांठ रखा था कि किसी और के बोर्ड पर बत्ती जले, तो तुरंत उसे नोटिस पहुंचा दिया जाए।
वैष्णव ने सारे सवालों को उठने से पहले ही समाप्त कर दिया था। वह खुश था। पहले प्रभु की आरती में कड़वे तेल की बत्ती जलाता था, अब देसी घी की बत्तियां जल रही थीं। सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन होटल का मुख्य रसोइया भाग गया।
ऐसा नहीं था कि वैष्णव उसे अच्छी तनख्वाह नहीं दे रहा था। मगर रसोइए को प्रेम हो गया था और वैष्णव उसे छुट्टी नहीं दे रहा था। छुट्टी के अलावा वैष्णव ने उसे ढेरों कसमें दीं, मगर जिन्होंने प्रेम किया है, वे जानते हैं कि प्रेम तो प्रेम ही होता है। चींटी की तरह प्रेमियों के भी पर निकल आते हैं।
यह भीषण आपदा थी, जिसके बारे में प्रभु ने वैष्णव को सपने में भी नहीं बताया था। वैष्णव ने प्रभु को उलाहना दी। माथा प्रभु की चौखट से टेक दिया। प्रभु ने सुन ली। वैष्णव आकर गल्ले पर बैठा तो देखा कि रसाइयों की कतार लगी है। सभी रसोइयों की विधिपूर्वक परीक्षा हुई। सबने एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन बनाकर दिखाए।
मगर एक रसोइया था, जिसने कुछ भी बनाकर नहीं दिखाया। बल्कि वह परीक्षा देने वाले रसोइयों की लाइन में भी खड़ा नहीं हुआ। वह फूड इंस्पेक्टर का भतीजा था और लाइसेंस कमिश्नर का साला भी। वैष्णव ने उससे पूछा, ‘क्या बनाते हो?’ रसोइया बोला, ‘मैं किसी भी तरह का लाइसेंस बनाता हूं।’
वैष्णव संतुष्ट हुआ। फिर उसने पूछा, ‘और अगर किसी ग्राहक को तुम्हारा लाइसेंस पसंद न आया तो?’ रसोइया बोला, ‘सीएमओ मेरे चाचा लगते हैं, ग्राहक का इलाज हो जाएगा।’ और अगर तुमको भर्ती करने पर बाकियों ने शोर मचाया तो? वैष्णव ने पूछा। ‘लेबर कमिश्नर मेरे जीजा हैं।’
यह सुनते ही वैष्णव ने बाकी रसोइयों को यह बोलकर वापस किया कि परिणाम रजिस्टर्ड डाक से आपके घर भेज दिए जाएंगे, और उस रसोइए को रख लिया। जब बाकी रसोइयों को इसका पता चला तो उन्होंने हंगामा कर दिया, धरने पर बैठ गए। कहने लगे कि हमारी योग्यता प्रमाणित है, फिर भी हमें नहीं रखा गया।
वैष्णव डर गया। फिर से प्रभु के पास पहुंचा। प्रभु ने पूछा, ‘तुम वैष्णव हो?’ हां प्रभु। ‘फिर तुम झूठ कैसे बोल सकते हो?’ वैष्णव की बत्ती जल गई। उसने तुरंत बयान जारी किया कि नियुक्ति पूरे पारदर्शी तरीके से हुई है। प्रभु के अलावा हम और किसी की भी सिफारिश नहीं मानते।
बात प्रभु की थी। सारे असंतुष्ट वापस चले गए। फिर वैष्णव ने होटल के बगल एक जमीन खरीद ली, और सीएमओ की मदद से उस पर तुरंत एक अस्पताल बनवा लिया। अब वैष्णव लाइसेंसी खाने के साथ लाइसेंसी इलाज भी करने लगा।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 5 अप्रैल को कैमरे के सामने एक पत्रकार को चूतिया बोल दिया। हालांकि आप सभी वह विडियो देख ही चुके होंगे, जिसमें योगी आदित्यनाथ एएनआई के कैमरामैन को क्या करते हो, चूतियापने का काम करते हो कहते देखे और सुने जा रहे हैं, लेकिन जिनने न देखा हो, एक बार फिर से देख लीजिए, उसके बाद हम बताएंगे इस खबर के पीछे की ऐसी खबर, जिसमें इस चूतिया शब्द के आने ने एक नई ही कहानी लिख रखी है।
इस विडियो के सामने आते ही सबसे पहले तो बीजेपी आईटी सेल यह कहने पर जुट गई कि यह फेक है। एक चैनल में काम करने वाले कथित गोदी मीडिया एंकर दीपक चौरसिया ने कहा कि सीएम योगी के आपत्तिजनक शब्द बोलने का मामला। एडिटेड निकला सीएम योगी का Video, वीडियो के आखिरी 3 सेकेंड में जोड़े गए आपत्तिजनक शब्द। लेकिन अल्ट न्यूज ने बताया कि विडियो एकदम सच्चा है और सिर्फ एनआई ही नहीं, उस वक्त चैनल पर इसी बातचीत का लाइव चलाने वाले एबीपी गंगा न्यूज और नेटवर्क 18 न्यूज पर भी चला है।
अब सबसे पहले तो यह सवाल पैदा होता है कि मुंह पर चूतिया कहने जाने के बाद एएनआई ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी है? इसके जवाब में हमें आपको बताने के लिए दो खबरें हैं। पहली यह कि 5 मार्च तक एएनआई ने अपने कैमरामैन को पड़ी गाली पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। उनके ट्विटर हैंडल पर अभी तक इस बारे में कोई रिएक्शन नहीं आया है। वहीं दूसरी बात यह है कि यूपी सरकार एएनआई को एक करोड़ रुपए सालाना दे रही है अपनी कवरेज के लिए, तो रिएक्शन लगता नहीं कि आएगा। जाने माने पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने आदित्यनाथ सरकार की वह चिट्ठी अपने ट्विटर हैंडिल पर पोस्ट की है, जिसमें उसे एक करोड़ रुपए सालाना दिए जाने की बात है और जिसे आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। यह चिट्ठी 27 अप्रैल 2018 को जारी की गई है, जिसमें एएनआई को एक करोड़ रुपए देकर यूपी सरकार अपने यूट्यूब चैनल पर अपनी क्लिपिंग चलवाने की बात भी है। पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं कि साल के एक करोड़ लेकर योगी सरकार के लिए प्रचार करने वाली ANI को अपने आत्मसम्मान की बिलकुल चिंता नहीं है। किस स्तर तक गिर सकती है यह सरकार? माफी मांगने की जगह वीडियो को झूठा ठहराने का प्रयास? अगर झूठा है तो असली वीडियो जारी कर मुक़दमा दर्ज कर दीजिए सभी पर। कोर्ट में फ़ैसला होगा।
वहीं प्रसिद्ध पत्रकार रोहिणी सिंह इस मसले पर कहती हैं कि तानाशाह की प्रवृत्ति होती है, जितना झुकोगे वो तुम्हें उतना ही डराता जाएगा और जब आंख मिला कर बात करोगे तो डर कर भागेगा या तो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करेगा। गाली मुख्यमंत्री दें, चलाएं उनके पसंदीदा चैनल और FIR उनपर करेंगे जो सवाल पूछते हैं? ये है आपका रामराज्य? शर्म नहीं आती? यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने चार स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कहा कि पत्रकारों को दिये ‘मान्यवर’ के प्रवचन सुनिए मधुर, पर हेडफ़ोन लगा के सुनिए व ‘बच्चों से रखिए दूर!’ वैसे आपको बता दें कि ऐसी भी खबरें हैं कि इस विडियो को प्रसारित करने वालों पर यूपी सरकार मुकदमा दर्ज करा सकती है। अब जरा सुनिए कि इस पर पूर्व आईएएएस सूर्य प्रताप सिंह के क्या तेवर हैं, पांच मार्च को सूर्य प्रताप जी ने ट्वीट करके कहा है कि आज से योगी जी का गाली देने वाला वीडियो मीडिया को आईना दिखाने के लिए मैं रोज सुबह ट्वीट करूंगा।
मैं सरकार के पक्ष के सभी वीडियो एक्स्पर्ट्स, कानूनी जानकार और फ़ारेंसिक टीम को खुली चुनौती देता हूं की मुझे ग़लत साबित करें और गिरफ़्तार कर लें। याद रखिएगा, रोज सुबह करूंगा। गोदी पत्रकार दीपक चौरसिया के बारे में सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं कि इस आदमी की नीचता देखिए। सच सामने आने के बाद भी ना ट्वीट हटाया और ना ही स्पष्टिकरण देने की लाज है इनमें। मीडिया का यह नीचतम स्तर भारत के इतिहास में पहली बार देखने को मिला है। जब सम्पादक स्तर के लोग ‘सत्ता’ के आगे ‘छम्मकछल्लो’ समान नृत्य कर रहे हैं। इन चेहरों को याद रखना। इस विडियो के सामने आने के बाद भारत में मीडिया की खबरों पर चलने वाली वेबसाइट भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि सीएम योगी आदित्यनाथ से ऐसी उम्मीद न थी. एक योगी नामधारी शख्स से ऐसी भाषा की तो कतई उम्मीद न थी. वह भी तब जब यह योगी इतने बड़े प्रदेश की सीएम की कुर्सी पर बैठा हो.
सीएम आदित्यनाथ योगी ने वीडियो न्यूज एजेंसी एएनआई के कैमरामैन को ‘चूतिया’ बोल दिया. उनका यह गुस्सा, यह अभद्र वचन लाइव टेलीकास्ट हो गया. इसके कारण हर ओर सीएम योगी की किरकिरी हो रही है. सीएम योगी के भक्त गण, आईटी सेल और नौकरशाही डैमेज कंट्रोल में जुट गई है. हर तरफ झूठ फैलाया जा रहा है कि सीएम योगी द्वारा गाली दिए जाने वाला वीडियो फर्जी है, एडिटेड है. साथ ही वीडियो शेयर करने वालों को मुकदमा झेलने की धमकी दी जा रही है. पर सच्चाई ये है कि सीएम योगी द्वारा गाली दिए जाने वाला वीडियो बिलकुल सही है. इस वीडियो का लाइव टेलीकास्ट भी दो भक्त चैनलों पर हो चुका है. दरअसल कोविड वैक्सीन लगवाने के बाद जब सीएम योगी से एएनआई का रिपोर्टर बाइट ले रहा था तो योगी के मुखारबिंदु से निकलने वाले शब्दों को तत्काल दो भक्त चैनलों ने लाइव प्रसारित करना शुरू कर दिया. इसी दौरान एएनआई की रिकार्डिंग में कुछ डिस्टर्बेंस होने से सीएम योगी का धैर्य चुक गया और कैमरामैन को चूतिया बोल बैठे. तब तक इस सदवचन का दो दो भक्त चैनलों पर प्रसारण भी हो चुका था.
यशवंत सिंह कहते हैं कि सीएम योगी द्वारा देश की जानी मानी वीडियो न्यूज एजेंसी एएनआई के कैमरामैन को गाली दिए जाने के मुद्दे पर पूरा मीडिया जगत खामोश है. निन्नायनबे फीसदी से ज्यादा चैनल तो भक्त चैनल में तब्दील हो चुके हैं. जो कुछ एक भक्त चैनल नहीं हैं वे भी डैमेज कंट्रोल की कवायद में फंस चुके हैं. अगर यही गाली अरविंद केजरीवाल या राहुल गांधी के मुंह से निकली होती तो भारतीय मीडिया अब तक आसमान सिर पर उठा चुका होता और पूरे देश की जनता को बता चुका होता कि ये नेता कितने गंदे हैं. पर ये कांड बीजेपी के एक सीएम द्वारा किया गया है इसलिए उनका हर खून माफ. वहीं पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह इस मसले पर कहते हैं कि अब जब ‘गाली प्रकरण’ पर दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका है
तब मैं @dgpup और @ChiefSecyUP से अनुरोध करूंगा की मुख्यमंत्री के सभी सलाहकारों पर जनता को मुक़दमे की धमकी देने, अपने पद का दुरुपयोग कर डराने और भय का माहौल पैदा करने के जुर्म में मुक़दमा दर्ज किया जाए। वे कहते हैं कि आज की हरकत ने CM ऑफ़िस को पूरी तरह एक्स्पोज कर दिया। जब यह पत्रकारों को गाली दे सकते हैं, एक लाइव वीडियो को खुले आम एडिटेड बता कर मुक़दमा दर्ज करने की धमकी दे सकते हैं, तब यह किसी भी स्तर पर जा सकते हैं। मुझ पर निजी हमले होंगे, झूठे मुक़दमे लिखे जाएंगे, पर यह लड़ाई जारी रहेगी। सूर्य प्रताप सिंह ने एएनआई के संपादक जी से भी सवाल किया कि क्यूं @ishaan_ANI जी? आज आप कुछ नहीं बोलेंगे, क्या आपमें भी आत्मसम्मान नहीं बचा? क्या आप भी अपनी संस्था के बारे में ऐसा सोचते हैं? आज दो बातें हो सकती हैं: 1. या तो ANI अपने आत्मसम्मान की रक्षा करेगा 2. या तो साबित हो जाएगा की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठीक ही कह रहे थे।
प्रसिद्ध पत्रकार और फिल्ममेकर विनोद कापड़ी कहते हैं कि ANI पर भारी दबाव है कि वो सफ़ाई दे कि आदित्यनाथ का गाली देने वाला वीडियो EDITED है पर ANI भी अब चाहते हुए भी ये नहीं कर सकता क्योंकि गाली LIVE गई थी , जिसे बाद में ANI ने हटा दिया ( screenshotsDown pointing backhand index) नतीजा ये है कि अब कुछ बिकाऊ एंकरों को योगी के रफू पैबंद के काम पर लगा दिया गया है। हालांकि ये रफू पैबंद बहुत चलता नजर नहीं आ रहा है। सच और झूठ अलग अलग करने वाली विश्व प्रसिद्ध वेबसाइट अल्ट न्यूज ने इस क्योंकि इस झूठ के ताबूत में आखिरी कील गाड़ दी है और बता दिया कि योगी आदित्यनाथ ने जो बोला, वह सौ फीसद सच बोला। अब कमेंट में ये बताइए कि योगी आदित्यनाथ जो कह रहे हैं, वह क्या सिर्फ एनएनआई ही है, या फिर और कौन कौन हैं?
मेरा एक दोस्त अक्सर कहता है कि लोग अच्छे नहीं होते, तो मैं कहता हूं कि लोग तो अव्वल अच्छे ही होते हैं, वक्त या हालात बुरे होते हैं। इस पर वह तुनककर अपनी उस पड़ोसी की बातें बताने लगता है, जिसे उसने आज तक किसी से सीधे मुंह या जरा सी मुलायमियत से बात करते नहीं देखा। मैं उसे समझाता हूं कि इसके पीछे उस पड़ोसी के वक्त का मुंह शायद हमेशा टेढ़ा रहता होगा या उसके हालात इतने कठोर होते होंगे। लेकिन वह नहीं माना। एक दिन वह मुझे अपने घर ले गया और अपनी उस पड़ोसन की निगरानी पर बैठा दिया। मैंने देखा कि उसकी पड़ोसन का मुंह कामवाली से लेकर मां-भाई के साथ भी टेढ़ा ही था। थी तो वह ठीक-ठाक घर की। देखने में गदराई शकरकंदी सी, लेकिन शकरकंदी जैसी अनाकर्षक तो नहीं थी। उसकी मां की आवाज तनिक तेज तो थी, लेकिन उसमें भी एक दिल्ली वाली पंजाबी शाइस्तगी तो थी ही।
फिर क्या वजह रही होगी कि इतनी सुंदर पड़ोसन का वक्त इस कदर टेढ़ा हो चुका था? मैंने दोस्त से पड़ोसन के बारे में कुछ पूछताछ की। वह पैंतीस पार थी, सुंदर थी। हंसे तो गोया फूल झड़ें। हालांकि मेरे दोस्त को मुझे दिखने वे फूल अब भी मेरी भूल ही लगते हैं और ज्यों ही मैं कभी भी उसकी हंसी में फूल देखता हूं, झट से वह हमेशा यही बोलता है, 'आई ऑब्जेक्ट मीलॉर्ड!' उस वक्त भी उसने यही जारी रखा। फूल दर फूल गिरते ऑब्जेक्शन से जब मैं परेशान हो गया तो मैंने दोस्त से पूछा, 'शादी हो गई है इसकी?' दोस्त बोला, 'नहीं हुई।' अब समस्या का एक सिरा तो मेरी गिरफ्त में था। इस सिरे पर अपनी गिरफ्त मजबूत करने के लिए मैंने फिर पूछा, 'कोई ब्वॉयफ्रेंड? किसी इश्क की कोई कहानी? या सिरे न चढ़ पाई किसी मोहब्बत की कोई दास्तां?' दोस्त बोला, 'पांच साल तो हो गए मुझे इस इलाके में रहते हुए, अभी तक तो ऐसी कोई चीज दिखी नहीं।'
फिर मैंने पूछा, 'क्या वह निपट अकेली है?' दोस्त ने जवाब दिया, 'लगता तो ऐसा ही है, जभी तो जब भी खिड़की पर आती है, खाती हुई आती है या खाते-खाते वापस चली जाती है।' इस जवाब पर मैं भड़क गया। मैंने कहा, 'खाने का अकेलेपन से क्या रिश्ता?' अरस्तू से सुकरात की देह में विचरते हुए दोस्त बोला, 'अकेला आदमी अक्सर किसी न किसी छोर पर ही रहता है। इस तरफ, या उस तरफ। उसके मन में बीच का रास्ता कहां होता है? फिर उसकी कोई ऐसी मजबूरी भी तो नहीं होती कि वह बीच का रास्ता अख्तियार करे ही करे।' उसके यह कहते ही मुझे याद आया कि मेरे दो मालिकों (जिनके यहां मैं कभी नौकरी करता था) ने कहा था कि साथ बहुत जरूरी होता है। एक बार जब मैं निपट अकेली महिलाओं से रूबरू था तो वहां भी मुझे ऐसी ही झल्लाहट दिखी थी। मैंने दोस्त से कहा, 'उसे समझाओ, अकेली न रहे।' अब तो दोस्त बिदक गया, बोला, 'अकेले के गले में समझाइश की घंटी बांधने की हिम्मत तुममें हो तो हो, मुझमें नहीं है।'
एक बार तो लगता है कि झपटकर कर लें, लेकिन फिर दिमाग चोक लेने लगता है। यहां तक आते-आते दिल की मोटरसाइकिल भी तीस से नीचे का एवरेज देने लगती है। गनीमत बस इतनी है कि रुक-रुककर ही सही, चलती तो है। और जैसे ही ‘आगे तीखा मोड़ है’ का बोर्ड दिखता है, मुई मोटरसाइकिल सीधे वोटरसाइकिल में बदलने लगती है। जो लगती है कि चल रही है, दिखती है कि आ रही है, लेकिन न चलती है, न आती है। घर्र-घर्र करके किसी मकैनिक की दुकान से कम से कम तीन किलोमीटर पहले ही रुक जाती है। यहां तक आते-आते दिल की ये जो मोटरसाइकिल है न, इसे चलाने में बड़ा डर भी लगता है। साठ की स्पीड पार करते ही लगता है कि एक पहिया दाहिने जा रहा है तो एक बाएं। कुछ दिन पहले टंकी फुल कराई, थोड़ी चलाई और फिर थोड़ी दौड़ाई, मगर वो स्पीड नहीं मिली जो पहले मिलती थी। सब दांए-बांए हो गया।
मोटरसाइकिल की जब ये हालत हो तो सड़क भी सूनी मिलती है। दूर-दूर तक ऐसा कोई नहीं दिखता कि धक्का ही लगा दे। और अगर उस सूनी सड़क पर कोई मिल भी जाए तो धक्का लगाने के लिए तैयार नहीं होता। खैर उसकी भी कोई गलती नहीं, साढ़े तीन दशक पुरानी धूल और थपेड़े खा चुकी मोटरसाइकिल यहां कोई छूना नहीं चाहता, धक्का तो बहुत दूर की बात है। फिर तहों तह जमी धूल हाथ भी तो गंदा कर देती है। वैसे कोई धक्का खाया मिल जाए तो वह धक्का लगाने में पीछे नहीं रहता है। धक्का खाए लोगों से पूरी दुनिया ही भरी-भरी है, मगर धक्का खाए लोग सड़कों पर नहीं मिलते। सूनी सड़कों पर तो बिलकुल नहीं मिलते। मोटरसाइकिल को इस उम्र में पहुंचाने के बाद जितनी जल्दी हो सके, हमें सीख लेना चाहिए कि कैसे भी करके, कम से कम एक धक्का खाया शख्स मोटरसाइकिल के पीछे बैठा लें, वरना सड़कों का तो वैसे भी कोई भरोसा नहीं है।
अभी परसों ही हैरिंग्टनगंज से मिल्कीपुर की ओर चला जा रहा था। अपने यहां सड़क सपाट तो हो नहीं सकती, पर सूनी जरूर हो जाती है। बाजार छोड़ते ही मोटरसाइकिल दाहिने-बाएं होने को हुई कि सूनी सड़क पर एक साहब मिल गए। अकेले चले जा रहे थे, और पीछे-पीछे मैं। मैंने सुना कि वो कैफी की कोई उम्मीद भरी गजल गुनगुना रहे थे, शायद किसी ताखे से उतार लाए थे। थोड़ी देर तक तो मैं पीछे-पीछे चला और जब न रहा गया तो पूछ बैठा- ‘धक्का लगाएंगे?’ इतना सुनना था कि उनका चेहरा लाल। बोले- ‘मूर्ख दिखता हूं मगर हूं नहीं।’ मैंने कहा- ‘साहब, मैंने तो सिर्फ धक्के का पूछा, न लगाना हो तो न लगाइए। आप दयालु दिखे, इसलिए पूछा।’ कहने लगे- ‘जानता हूं आप मजे ले रहे हैं।’ मैंने लाख समझाने की कोशिश की, रुकी पड़ी मोटरसाइकिल भी दिखाई, पर क्या मजाल कि वह धक्का लगा दें। हारकर मैंने पूछ ही लिया- ‘कभी धक्का खाया है आपने?’ वह बगैर बताए ही आगे बढ़ गए। जाते-जाते मैंने देखा कि इस बार उन्होंने मुंह पर रूमाल भी बांध लिया था।
देखिए नेतराम जी, कह तो आप बहुत कुछ रहे हैं लेकिन हम भी कह दे रहे हैं कि चोखा बनाने वास्ते जीवन में प्रेम होना होता है। न हो तो कहीं गांठ-वांठ बांध लीजिए काहेकि एक बार कह रहे हैं, दुबारा तभी कहेंगे जब दुबारा प्रेम होगा। हां तो करेंगे, पांच बार करेंगे, पचास बार करेंगे! का आदमी अपना जीवन में पचासो बार चोखा नहीं खाता बनाता होगा? आप पंचावन साल का सप्तसदी लांघ रहे हैं, का आठ बार भी अपना हाथ से चोखा नहीं बनाए होंगे? माने कि तेवराइन वाला मामला हमसे छुपा ले गए, मगर चोखा बनता है न नेतराम लाला, त इहां तक महकता है। अब हमसे न पूछो, जो बता रहे हैं, कहीं बांध लो, नहीं तो रस्ता में गिर-विर गया तो ललाइन तड़ लेंगी कि आज ई पक्का नक्खास होके आए हैं। अब ललाइन को कैसे समझाया जाए तुम्हीं बताओ लाला, कि प्रेम नहीं होगा त चोखा में तेल कितना पड़ता है, कइसे पता चलेगा आं? रस की धार बगैर प्रेम के फूल भले जाए, फुरेरी नहीं छोड़ेगी लाला, तुम्हीं बताए थे हमें ना?
फिर नमक का सवाल तो हइये है। बिगेर प्रेम के नमक पीसना कितना पिसने वाला काम है, ई उससे पूछो, जो बगैर प्रेम के रोज-रोज लेके सिल पे बट्टा रगड़ता रहता है, रगड़ता रहता है। ऊ गली नंबर पांच वाला मंटुआ है, सुबे-सुबे आके अपना घिसा अंगूठा दिखा रहा था। बेचारे का जीवन में जौबन तो है मगर प्रेम नहीं है। अइसा जीवन मा जौबन दैके राम आखिर कौन चीज का भली कराना चाह रहे हैं लाला, न पूछो! पूछ रहा था कि अइसे कइसे कब तक नमक पीसते रहें चाचा? कब बनाएंगे तुम्हरी तरह चोखा? मन मारके उसे हम प्रेम से बनाया हुआ दू चम्मच चोखा जबरदस्ती खिलाए, तब कहीं जाके उसके मुंह से प्रेम का फ्रेम निकला।
फिर भी ई बात अच्छे से समझ ल्यो लाला कि अगर तुमको प्रेम नहीं होगा त सही साइज का भांटा तुमको पूरी मंडी में का मजाल कहीं दिख जाए? और ई चैलेंज है, ललकार है, तुम्हरे ही नहीं, पूरा पुरुस समाज के पुरसत्त को कि बगैर प्रेम किए चोखा वास्ते सही साइज का भांटा खोजके दिखा दें तो जिन्नगी भर पुरुस समाज को चोखा खिलाएंगे, वहू कड़ुवा तेल में नट्टी तलक डुबो के! भांटा लेना इतना आसान है जी कि गए बजार औ ले आए भर डोलची? न कौनो रूप न कौनो रंग, न कौनो डील न कौनो ढंग। अब अइसा है नेतराम लाला कि रूप-रंग और डील-ढंग बगैर प्रेम किए तो अचार्र फुरसोत्तमो को नहीं समझ मा आवा, जो भांटा कैसे बोएं कि आत्मकथा लिखे रहे, त ललाइन को कइसे समझ में आएगा जी?
प्रेम करो त तुम्हरे पास कितनी आसानी से तेल मिल जाता है, नमक पिस जाता है, भांटौ आ जाता है। फिर करना का है, जितने प्रेम से तेवराइन का जूड़ा मा गेंदा ठूंसते हो, बस उतने ही प्रेम से भांटा मा लहसुन का जवा खोंस दो। हां ठीक है, जानते हैं कि तेवराइन तुमको बस चौथाई जूड़े में ही फूल लगाने को देती हैं और बकिया जूड़ा तेवारी के लिए बचा लेती हैं, लेकिन लाला, सच-सच बताओ, का तुम्हरा दिल चौथाई जूड़े के गेंदे में गेंद नहीं बन जाता? हम देखे हैं लाला, अब अइसे भी न छुपाओ। हमसे कुछ छुपा नहीं है लाला, तुम्हरी बाईं जेब मा पड़ी माचिस मा कितनी तीली है, कहो तो बता दें? लाओ माचिस लाओ लाला, आग लगानी है।
आग का सवाल सबसे इम्पारटैंट है लाला। बगैर प्रेम के आग लग जाएगी? कैसे लगेगी आग अगर पास में प्रेम नहीं होगा? हां, मानते हैं कि ई दुनिया में बहुत सारा लोग माचिस, लैटर औ सबसे जादा त फुसफुस से आग लगाता रहता है, मगर लाला, ई चोखा वाली आग है! इसका खातिर प्रेम चाहिए होता है और चौथाई जूड़ा से ज्यादा चाहिए होता है। रहने दो लाला, तुमसे न लगेगी आग! तुम ससुर चौथाई जूड़े के गेंदे में ही गेंद बन जाते हो, अगर कहीं तेवराइन एक बटा तीन कर दीं तो तुम तो भांटा में ही आगी फोड़ दोगे। आग लगाना हर किसी के बस का काम नहीं है लाला, चोखा तो कोई बना ले। चोखा त ऊ ससुर मंटुआ भी बनाता है, औ खुदै खाता है। बड़ा चोर है भाई ई मंटुआ! पहिले दस तरफ देखता है कि कौनो देख तो नहीं रहा। फिर धीमे से चोखा निकालता है, गोड़ पसारता है औ चभर-चभर करता सब चाट जाता है। हमको त यही नहीं समझ में आया कि सार चोखा चाट रहा है कि जीवन चाट रहा है कि जोबन चाट रहा है।
आदमी अगर पाजामा है तो औरत पेटीकोट। और यह बात मैं आदमी और औरत, दोनों को हाजिर नाजिर मानकर कह रहा हूं। यह मजाक नहीं है, बल्कि उतना ही बड़ा सत्य है, जितना बड़ा पाजामा होता है, या फिर पेटीकोट। जिस तरह से पुरुष कभी भी पैंट से बाहर आकर पाजामा बन जाता है, उसी तरह से औरत भी पेटीकोट बन जाती है। बाहर आने की बात इसलिए गोल कर रहा हूं कि किसी के मन में शील-अश्लील लड्डू न फूटने लगें। आदमी को पाजामा कहने की हिम्मत हर किसी में होती है और जिसमें नहीं होती, उसमें आदमी पाजामा पहनकर पैदा कर देता है। औरत को पेटीकोट कहने की हिम्मत किसी में नहीं होती, मगर जिस तरह से महात्मा गांधी ने चौरीचौरा के बाद असहयोग आंदोलन स्थगित करने की हिम्मत दिखाई थी, उसी तरह से मैं भी आज औरत को पेटीकोट कहने की हिम्मत दिखा रहा हूं। पेटीकोट नहीं दिखा रहा हूं, वो मेरे पास नहीं है। पाजामा है, और हिम्मत भी। जिस किसी ने देखना या देखनी हो, आए और छूकर देख ले।
रात रिक्शा किनारे-किनारे चला जा रहा था कि एक औरत पीछे से हॉर्न बजाने लगी। यह भी नहीं कि एक-दो बार बजाकर चुप हो जाए और कम से कम रिक्शे के किनारे होने तक वेट कर ले। औरत थी कि लगातार हॉर्न बजाती ही जा रही थी। मैंने रिक्शेवाले को डांटकर तुरंत रिक्शा किनारे कराया तो उसी तरह से हॉर्न बजाते हुए औरत आगे निकली। आगे स्पीडब्रेकर था। मैंने रिक्शेवाले से कहा- देखना, अभी ये स्पीडब्रेकर देखकर भी हॉर्न बजाएगी। और सचमुच उसने स्पीडब्रेकर देखकर हॉर्न बजा ही दिया। रिक्शेवाला खिलखिलाने लगा। मैंने कहा- बेटे, अभी कोई आदमी इस तरह से करता तो तुम उसे क्या कहते? वह बोला- पागल कहता। मैंने पूछा- पाजामा न कहते? खी-खी करते हुए वह बोला- पाजामा तो जरूर कहता और दो चार होते तो नाड़ा भी खींच देते। मैंने कहा- बेटे, इस औरत को रोककर पेटीकोट कहकर दिखाओ। हीही करते वह बोला- कहने का तो बहुत जोर से मन हो रहा है, मगर कह दिया तो मेरा पाजामा फाड़ दिया जाएगा।
आगे पहुंचा तो पीछे से चार चार आदमी हॉर्न बजाने लगे। बजाते हुए वह कार की सीट पर से ही उछल-उछलकर देख रहे थे कि आगे जाने का रास्ता आगे है या पीछे तो नहीं छोड़ आए? मुझे चार-चार पाजामे दिखे। मैंने फिर रिक्शेवाले को चढ़ाया- अबे, पेटीकोट नहीं बोला था, अब पाजामा तो बोल दे। रिक्शावाला जोश में आ गया। चारों जब ओवरटेक करके निकलने को हुए तो उसमें से वह दो से बोलने को पा गया- अबे आदमी हो या पाजामा? उधर जिसने पाजामा सुना, वह मुंह से नाड़ा निकालता हुआ भागा। भागा इसलिए क्योंकि भागने के अलावा और कोई चारा न था। रात मैं इस बात का प्रत्यक्ष गवाह बना कि पुरुष जब पाजामा पहनकर भागते हैं तो उनमें मुंह में नाड़ा होता है, जो बाहर निकलता रहता है। वैसे बाज दफे मैंने यह नाड़ा पेटीकोट से भी निकलता देखा है।
आदमी का पाजामा मैचिंग हो या न हो, औरत का पेटीकोट जरूर मैचिंग होता है। आदमी जब पाजामा बनता है तो वह मिसमैचिंग नाड़े दिखाता है। किसी की सिलाई में गहरी मैल जमी होती है तो फुंदे साफ होते हैं, तो किसी के फुंदे दातून की तरह कूंचे होते हैं और सिलाई उधड़ी होती है। औरत जब पेटीकोट बनती है तो कसम से बता रहा हूं, न मैं पेटीकोट देखता हूं और न ही उसका नाड़ा। मानता हूं कि मैं बहुत कुछ देखता हूं, लेकिन मैं यह कभी नहीं मानूंगा कि मैंने पेटीकोट देखा है। गीता पर हाथ रखवाएंगे, तो भी नहीं मानूंगा। हां, आकांक्षा या श्वेता पर हाथ रखवाएंगे तो मान जाउंगा। लेकिन तब भी इतना ही मानूंगा कि कोट देखा है- पेटी और नाड़ा नहीं देखा। पूरी बात मनवाने के लिए सविता को सामने लाना पड़ेगा और मेरे कान में फुसफुसाना पड़ेगा कि- अबे भाभी हैं भाभी!
खैर, यह तो मजाक की बात हुई। असल बात तो यह है कि हम आदमी को तो पाजामा कह देते हैं, औरत को पेटीकोट क्यों नहीं कहते? इसका जवाब भी मुझे एक रिक्शेवाले ने दिया। उसने मुझे बताया कि आदमी को कितनी भी गाली दो, उसके पाजामे का नाड़ा भी खोल दो, वह रहेगा पाजामा ही। मगर औरत को कितना भी पेटीकोट बोलो, नाड़ा खोलो या न खोलो, या नाड़े की ओर देखो ही मत, फिर भी वह रहेगी औरत ही। कह सकते हैं कि पुरुष हमेशा पाजामा बना रहता है, मगर स्त्री कभी-कभार ही पेटीकोट बनती है। फिर भी बनती तो है। और चूंकि वह बनती है, इसलिए दुनिया में एक अज्ञात जगह पर बैठकर मैं लिखता हूं कि आदमी अगर पाजामा है तो औरत पेटीकोट।