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Tuesday, August 23, 2011

ख़ज़ाना हमारा है ...

प्राचीन भारत से लेकर अब तक हमारी व्यवस्था कृषि व कुटीर उद्योग आधारित रही है। हमारे खेतों में उगने वाले खाद्यान्न और खुदरा व्यापार की चेन ने हमें विश्व में एक अलग तरह की अर्थव्यवस्था दी है। इसी अर्थव्यवस्था के चलते हमने विश्र्वव्यापी मंदी से मुकाबला किया और सफल भी रहे। इस अर्थव्यवस्था से देश की आधी आबादी जो गांवों में बसी है व बीस करोड़ की शहरी आबादी का गुजर बसर होता है। जिस बचत से मंदी से बचने के दावे किए जा रहे थे, वह इसी आबादी की डाकघरों व बैंकों के बचत खातों की धनराशि थी। इस बात पर हमने तो डंका पीटा कि बच गए लेकिन उसे संभालकर रखने की बात अब सिरे से ही गायब हो चुकी है। हालांकि विदेशियों की पूरी नजर इस बचत की धनराशि पर है। खतरनाक बात तो यह है कि अंग्रेजों के जमाने की तरह किसी एक ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर इस खजाने पर नहीं है बल्कि अमेरिका सहित कई देशों की नजर में यह खजाना किसी कुबेर के खजाने से कम नहीं है। आखिर अस्सी करोड़ लोगों ने अगर सौ रुपया महीना भी बचाया होगा तो सोचा जा सकता है कि यह रकम महीने में या साल भर में कितनी होगी।
विदेशी पूंजीपति किसान व खुदरा व्यापारी का सैकड़ों साल पुराना रिश्ता तोड़ देना चाहते हैं। वह इस चेन को तोड़कर सीधे किसान या व्यापारिक भाषा में उपभोक्ता तक पहुंचना चाहते हैं। इस उपभोक्ता को वह सब कुछ बेचा जाएगा, जिसकी उसे जरूरत भी न हो। जब उपभोक्ता की सारी बचत समाप्त हो जाएगी तो उसे उधार भी दिया जाएगा। यह सब बचत के खजाने को लूटने के लिए किया जा रहा है और इसमें पूरी साजिश है। दरअसल सबसे ज्यादा विदेशी निवेश संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से होने के करार हो रहे हैं। लेकिन इसी अमेरिका का विदेश व्यापार घाटा दुनिया में सबसे ज्यादा है। कहीं से कपड़ा तो कहीं से जूता, कहीं से चाय कॉफी तो कहीं से डॉटर इंजीनियर उनके लिए जा तो रहे हैं लेकिन उनके यहां पैदा नहीं हो रहे। निर्यात कम व आयात ज्यादा होने की वजह से अमेरिका पर दुनिया में सबसे ज्यादा कर्ज है, जिसे उतारने के लिए उसकी कंपनियों की नजर, जाहिर है हमारे इस खजाने पर है। यह तभी संभव है जब देशी व्यापारियों का अस्तित्व खत्म कर दिया जाए। और ऐसा हो भी रहा है, केंद्र सरकार एक के बाद एक बेतुके कानून बनाए जा रही है। केंद्र की कांग्रेस सरकार के इस बारे में अमेरिका से समझौते भी हो चुके हैं। अमेरिकी कंपनी वालमार्ट का ही उदाहरण लें। वालमार्ट जैसी कंपनी के भारत में खुदरा व्यापार की अनुमति देना न सिर्फ देश के स्थानीय बाजारों को खत्म करने की, बल्कि भारत की रीढ़ बनी बचत व्यवस्था को भी लूट की सरकारी छूट देने की अनुमति देना है।
विदेशी कंपनी को खुदरा व्यापार की अनुमति देने व स्थानीय बाजार को खत्म करने से महंगाई और बढ़ेगी। हमारा खजाना तो खाली होगा ही, हम अमेरिका की तरह कर्ज के तले दबे नजर आएंगे। और ऐसा शुरू भी हो गया है। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने महंगाई से निपटने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। न तो लोगों को दाल में कोई राहत मिली और न ही प्याज में। यह सब व्यापारियों व व्यापार के लिए बनाए गए बेतुके कानूनों का भी नतीजा हो सकता है। बढ़ते टैस ने ही नहीं, उस टैस को चुकाने तक की प्रक्रिया ने व्यापारी की कमर तोड़कर रख दी है। सवाल पैदा होता है कि हम दुनिया भर की विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए मुक्त व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं, सेज-स्पेशल इकोनॉमिक जोन बना रहे हैं, लेकिन हमारे अपने ही देश के व्यापारी एक राज्य से दूसरे राज्य तक मुक्त व्यापार नहीं कर सकते। टैस के अलावा रास्ते में होने वाली लूट खसोट अलग से जोड़ी जा सकती है। यहां तक कि अगर किसान अपनी खेती से मिला उत्पादन यदि मंडियों में लाता है तो सड़क पर आने से लेकर मंडी की पर्ची कटाने तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। सरकार की तरफ से संरक्षण प्राप्त सट्‌टा बाजार इस महंगाई में घी का काम कर रहा है। इसे रोकने के लिए कांग्रेस की केंद्र सरकार कुछ भी नहीं कर रही है। सरकार यदि कुछ कर रही है तो यह कि विदेशी कंपनी की मांग पर एक के बाद एक विधेयक पारित कर कानून में संशोधन किया जाता है। अगर देश के नागरिक साधारण सी भी कोई मांग कर दें तो सरकार को सांप सूंघ जाता है और बयानबाजियां शुरू हो जाती हैं।
उार प्रदेश में तो और भी बुरे हालात हैं। यहां पर न तो महंगाई कम करने की मांग की जा सकती है और न ही रोजगार देने की। भ्रष्टाचार के चलते कत्ल दर कत्ल होते चले जा रहे हैं। जिस तरह से विधायक स्वयं अपराध के दलदल में फंसे हैं और प्रदेश सरकार उन्हें निकालने के लिए अदालत में मुकदमा वापस लेने के आवेदन करती जा रही है, आने वाला समय या होगा, इसकी परिकल्पना करना कोई मुश्किल काम नहीं है। दरअसल विनिमय के सभी सिद्धांत बदल चुके हैं। अब विनिमय मात्र वस्तुओं के लेनदेन तक सीमित नहीं रह गया है। अधिकारों से लेकर कानून तक विनिमय ने हर वस्तु को बिकाऊ बना दिया है। ऐसे में अगर महंगाई बढ़ती है तो कोई अचरज की बात नहीं है बल्कि लाजमी है।

ग्रेट इंडियन कनवर्टर शो

तेजगढ़ी से जरा सा आगे बढ़ें तो एक पलिक स्कूल टाइप का स्कूल है। पलिक स्कूल टाइप का इसलिए, योंकि न तो व पूरी तरह से पलिक स्कूल की अवधारणा को पूरा करता है और न ही सामान्य स्कूल की सोच को। एक तरह से खिचड़ी हो चुका है। बहरहाल, शाम का समय था और मैं और मेरा बेटा जरा तफरीह को निकले। बेटा अभी डेढ़ साल का है। घूमते-घूमते दोनों उस स्कूल के सामने जाकर खड़े हुए। स्कूल में दो ढाई साल से लेकर दस साल के बच्चों को कराटे सिखाया जा रहा था। छोटे-छोटे बच्चों को हू हा करते देख बेटे को उनमें कुछ देखने लायक सा लगा और हम दोनों कराटे लास देखने लगे। तकरीबन बीस मिनट बाद कराटे लास खत्म हुई। खत्म होने से ठीक पांच मिनट पहले बुलेट पर एक स्टाइलिश युवक आया। कराटे पूरी तरह से सिस्टम पर आधारित है। आप शुरू करते हैं तो एक दूसरे को कमर के बल पर थोड़ा सा झुक कर प्रणाम करते हैं और जब खत्म करते हैं, तो भी यही करते हैं। तो जैसे ही कराटे लास खत्म हुई, गुरूजी वहां पहुंचे। कमर के बल पर वह थोड़े से झुके। लेकिन यहां भी वही चाऊमीन वाली हालत थी। बच्चे झुक भी रहे थे और गुरूजी को पैरीपौना भी करते जा रहे थे। गुरूजी झुक भी रहे थे और सभी पैरीपौना करने वाले बच्चों को खुश रहो, आबाद रहो- जो कि शायद वो मन में बोल रहे हों- का आर्शीवाद देते जा रहे थे। ये चीनी कराटे का शुद्ध भारतीय संस्करण था। इसमें कोई मिलावट नहीं थी योंकि हम हमेशा से बाहरी चीजों का इसी तरह से भारतीयकरण करते आए हैं।
जीरा चाऊमीन
याद कीजिए जब शुरू शुरू में हमारे यहां चाऊमीन आया था। मतलब चाऊमीन आ तो गया होगा सालों पहले, लेकिन लोकप्रिय होना शायद ढाई दशक पहले शुरू हुआ था। ठीक ठाक होटलों में यह मिलता था और इसमें तरह तरह की सजी और केंचुए जैसे तार को देखकर सुड़ुकने में जी खुश हो जाता था। तब इसमें चीन की महक डालने के लिए सोया सॉस और अजीमोमोटो पाउडर डाला जाता था। लेकिन अब जो चाऊमीन बिक रहा है, वह शुद्ध भारतीय संस्करण है। बगैर जीरे के कैसा चाऊमीन। बगैर गरम मसाले के कैसा चाऊमीन और बगैर कद्‌दू वाले लाल सॉस के कैसा चाऊमीन। अजीमोमोटो तो अब भी डाला जाता है।
बर्गर मसाला
बर्गर भी काफी कुछ यही हालत हो गई। मैडॉनल्ड वाले बेचारे या बर्गर बेचते होंगे जो हमारे यहां टिक्की वाले बनाकर बेचते हैं। उनकी तो पॉव रोटी भी कच्ची ही रहती है। सिर्फ आलू की टिकिया पकाई और क्रीम डालकर दे दी खाने को। भला इसमें कोई स्वाद है। स्वाद तो तब आता है जब बर्गर की पॉवरोटी बढ़िया से सेंकी जाए, उसमें आलू मटर की टिक्की डाली जाए, ऊपर से हरी चटनी फिर पनीर की एक स्लाइस भी हो। थोड़ी से कतरी हुई पाागोभी भी चलेगी, लेकिन उसके ऊपर इमली की लाल चटनी और गरम मसाला जरूर होना चाहिए। आखिर जीभ को करंट मिलना भी तो जरूरी है। बर्गर अब बर्गर नहीं रहा, बल्कि यह चाट पकौड़ी की प्राचीन श्रृंखला में शामिल हो चुका है। कभी कभी मुझे लगता है कि भारतीय कयुनिस्ट आंदोलन चाऊमीन और बर्गर नहीं बन पाया, वरना वह भी लोकप्रिय होता और आज किसी को बंदूक उठाने की जरूरत न पड़ती।
आलू गोभी
अभी कुछ दिन पहले एक ट्रैवेल एंड लिविंग चैनल देख रहा था। उसमें कुछ विदेशी लोग थे जो तरह तरह का खाना पका कर जज लोगों को खिला रहे थे और जज खाना खाकर बता रहे थे कि इसमें फलां सॉस कम है और इसमें पता नहीं कौन से समुद्र की पता नहीं कौन से मछली का टेस्ट आ रहा था। इन लोगों ने एक भारतीय परिवार को भी बुला लिया। मजे की बात देखिये कि भारतीय परिवार ने इन्हें जो खिलाया, जज लोगों का कहना था कि ऐसा टेस्ट उन्हें पहले कभी नहीं मिला। इन लोगों ने जज को आलू गोभी की सूखी सजी और रोटी खिलाई। एक जज ने कहा कि ये जबान पर करंट भी देता है और तरावट भी। ऐसी चीज उन्होंने पहले नहीं खाई। अब पता नहीं किसने इन लोगों को जज बना दिया कि इन्हें ये तो पता है कि पता नहीं कौन से समुद्र की पता नहीं कौन सी मछली कैसा स्वाद देती है लेकिन एक अरब बीस करोड़ लोगों की लोकप्रिय आलू गोभी की सजी का स्वाद इन्हें नहीं पता और वह इन्हें जबरदस्त करंट देती है।
करंट
कांग्रेस ने इस करंट को अच्छी तरह समझा। उसे पता है कि अमेरिका की नीतियां कब इस देश में लानी है, मैडॉनल्ड को कब इस देश में घुसने देना है। वह मैडॉनल्ड में बैठकर बढ़िया क्रीम वाला बर्गर भी खाते हैं और ठेले पर खड़े होकर पांच रुपये वाला बर्गर दूसरों को खिलाते हैं। आखिर बर्गर तो बर्गर ही है। और लोगों को जब तक करंट न लगे, कैसा बर्गर। बाकी इस करंट के झटके में चार काम और हो जाएं तो हर्ज या है। कभी कभी मुझे लगता है कि कांग्रेस और भाजपा में आपसी सुलह हो गई है जो अमेरिका ने कराई है। राजा का मामला कोर्ट में है, वालमार्ट को देश में जगह बनानी है। अब अगर लोग अन्ना के आंदोलन में खोये रहें और राजा का भला हो जाए, कलमाड़ी की सुलह हो जाए और वालमार्ट दुकान खोल ले तो मजे ही मजे। अखिर है तो आखिर वही पांच रुपये वाला बर्गर ही। भाजपा भी इसमें पूरा साथ दे रही है। बेरोजगार हैं तो हों, इन दोनों की बला से। बीस से चालीस करोड़ लोगों को दोनों वक्त खाना न मिले, बर्गर तो पांच रुपये में मिल रहा है। बढ़िया चटखारेदार बर्गर। जिसमें एक परत हरी चटनी की है, एक परत गरम मसाले की है और ऊपर से खट्‌टी इमली वाली मीठी चटनी।

Tuesday, August 4, 2009

डेली डायरी - एक नया ब्लॉग

डेली डायरी के नाम से आज से एक नया ब्लॉग शुरू कर रहा हूँ। ये ब्लॉग पत्रकारिता के उन रहस्यों को साफ़-साफ़ सामने लाने की कोशिश करेगा, जो रोज की दिनचर्या मे किसी एक पत्रकार के सामने आते हैं। मुश्किलें कम होंगी, इसकी आशा तो न के बराबर है, लेकिन कई नई और रोचक जानकारियाँ सामने आयेंगी इस बात की उम्मीद पूरी है। इसे ब्लॉग सूची मे दाल दिया है और यहाँ लिंक भी दे रहा हूँ। टाइम कम होने की वजह से चिठ्ठाजगत और ब्लोग्वानी से ये कुछ समय बाद ही जुड़ पायेगा। ये रहा लिंक--- डेली डायरी

Thursday, July 5, 2007

ये (नारद और उसके (कु)कर्म ) हिंदी की सेवा नही जीतू जी

कुवैत मे रहकर हिंदी और हिंदीभाषियों की सच्चाई नही जानी जा सकती है(हिंदी भाषी के अलावा भी , किसी की भी हकीकत देश के बाहर रहने वाले कितना जानते हैं वो नारद की कड़ी कार्यवाही से पता चल जाता है ) और आपके पास जो स्रोत हैं उन्हें सूचनाये कैसे मिलती हैं और कैसे बनती हैं , इसको मैं अच्छी तरह से जानता हूँजीतू जी , नारद के पुष्पक विमान मे बैठकर सतही चीज़े जान लेना और एक अवधारणा बना लेना एक बात है और जमीन पर रहकर काम करना दूसरी बातखैर आपसे और क्या कहू , आप तो खुद ही पलायन वादी हैं तभी देश छोड़कर बाहर बैठे हुए हैं और देशभक्ति का सिला जमीनी आवाजों को दबाकर दे रहे हैंलेकिन अगर ये सोचते हैं कि नारद की इस अहमकाना हरकत से मैं भी पलायन वादी बन जाऊंगा और मेरा चिठ्ठा बंद हो जाएगा तो ये सिर्फ नारद की खामख्याली है , और कुछ नहीआप जिस हिंदी की बात कर रहे हैं , जरा इमानदारी से बताइए कि कितने लोग उस हिंदी मे बात करते हैं ? और आप जिस हिंदी की बात कर रहे हैं , जरा बता दीजिए कितने लोग उससे प्रभावित होते हैं ? हाँ , संघ या संघी अगर गालियों (तेल लगाओ डाबर का - %^*& मारो बाबर का , सन ९२ ) मे भी कुछ कहते हैं तो आप जैसे कुछ लोगो का वह नारा बन जाता हैउस पर कोई भी बैन लगाने की बात नही करता । बल्कि उस naare साथ देने वालों के लिए दूसरों की अभिव्यक्ति मुह मे बैन का डंडा डाल kar बंद kar दीं जाती hai। uske baad अगर कोई उन जैसे लोगो से उन्ही की जबान मे बात करता है तो आप उसे बुरा कहते हैं और उसके खिलाफ मोर्चा खोल देते हैंये (नारद और उसके (कु)कर्म ) हिंदी की सेवा नही जीतू जीये जान बूझ कर पूरी दुनिया से एक ही विचारधारा के लोगों को एक साथ करके इण्टरनेट जैसे माध्यम से फैलायी जा रही साम्प्रदायिक साजिश है , जो मेरे ब्लोग पर बैन लगाने के बाद पूरी दुनिया मे नंगी हो चुकी हैअब ये खेल खुल कर सामने गया हैअगर आप हिंदी के अनन्य सेवक या भक्त (जो भी आप अपने आप को कहते हैं ) होते तो आप कम से कम यह तो लिखते
एक दो साथियों ने नारद से अपने ब्लॉग हटाने की अर्जी दी थी, उनकी अर्जियां हमारे पास पेंडिंग है, अभी नारदमुनि छुट्टी पर है, समय मिलते ही उनपर विचार किया जाएगा, उनको भी पुनर्विचार का वक्त दिया जा रहा है वे दोबारा सोच लें और २० जुलाई तक अपनी अर्जियां वापस ले अथवा हम उन पर विचार करें।

इसका क्या अर्थ लगाया जाय ? आप समझते क्या हैं नारद को ? अब वो जमाना गया जीतू जी कि जब नारद इकलौता फीड गेटर थाये बाजार है और रोज़ लोग आते रहते हैं ! ! ये मत कहियेगा कि आप निष्काम भाव से हिंदी की सेवा कर रहे हैंविचारो के भी बाजार होते हैं जीतू जी और विचारो की इस जंग मे चुंकि ताकत आपके पास थी और आपने उसका भरपूर उपयोग कियाअगर आप हिंदी के इतने ही अन्य सेवक होते तो ऊपर दीं गई बाते कभी लिखते , बल्कि ऐसा कोई विचार आपके मन मे आता ही नहीलेकिन क्योंकि आपके मन मे पहले से ही धर्म निरपेक्षता की बात करने वालो के लिए "जहर " भरा हुआ है , तो हम ये मान लेते हैं कि ये उसी जहर का असर बोल रहा हैकभी कभी मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे मैं इतने जहरीले माहौल मे रह गया और वो भी इतने दिन तकमुझे बहुत पहले ही नारद से किनारा कर लेना चाहिऐ थाखैर चलिये , देर आये दुरुस्त आयेआपके पास जो दो तीन लोगों की ब्लोग हटाने की अर्ज़िया पडी हुई हैं , उसी मे मेरी भी शामिल कर लीजियेक्योंकि बेईमानी मुझसे होती नही और गलत बात मैं बर्दाश्त नही करताछूटते ही गलियां देता हूँक्या पता , अभी बजार पर अवैध अतिक्रमण को बैन किया है , कल को बजार पर भी आपके हिसाब से कुछ उल्टा सीधा छप गया तो आप उसपर भी बैन लगा देंगेऔर उसके बाद बाक़ी के नारदिये बंदरो की तरह कूद कूद के खौखियाने लगेंगे , कि वो मारा , बहुत अच्छे मारा
rahul

Sunday, April 15, 2007

मेरा बज़ार


बचपन मे याद आता है कि बजार का हमारे अंदर एक ज़बरदस्त क्रेज़ था . वहा काफ़ी सारी चीज़ें मिलती थी , रंगीन और चटपटी भी , क़रारी क़रारी और मख़्कन सी मुलायम भी . कही पे बाँस क़ी बीन और वो भी गुब्बारे वाली तो कही पे दफ़्ती का लाल वाला चश्मा जिस पर शीशे कि जगह लाल पन्नी लगी रहती है मूंगफली , टिक्कियाँ , फुलकियाँ , पकोडी और सबसे बच कर सर्र्र से निकलती साइकिल . लेकिन ये समय सर्र्र से ऐसे निकला क़ी बहुतो को बचने का मौक़ा ही नही मिला.अब हाल ये है कि सारा ज़हाँ तो बजार है और अंकल सैम कि माने तो पूरी दुनिया ही एक गाँव है ज़हाँ सब कुछ तो मिलता है , डेमोक्रेसी भी मिलती है और लाल झंडा भी फहराया जाता है यहाँ पर , हिंदुस्तानी फ़िल्मों मे जितने भी सीन होते हैं , यहा बड़े आराम से देखने को मिल जाते हैं बस फ़र्क यही होता है कि वहाँ कोई अमिताभ बच्चन होता है और यहाँ कोई अवधेश बैरागी . लेकिन ग़ज़ब के हैं हम लोग , हममें से अकसर उन्हे पहचान तक नही पाते हैं और अगर भूले भटके पहचान भी गये तो उन्हे जानबूझकर अनदेखा कर देता हैं इस टाइम भी बॉलीवुड मे काम हो रहा होगा . वहा का बाज़ार चल रहा होगा , लेकिन गाँव कि बजार तो अब भी 7-8 बजे तक बंद हो जाती है . ये डूसरी बात है कि वहा अभी भी बजार के बनीए के यहाँ, जो मोटा सा होगा और जिसका लड़का अभी भी स्कूल के बहाने दोस्तो के साथ विदीओ हाल मे बैठ कर सिनेमा देखता होगा, टी वी देखा जा रहा होगा और वो भी डिश पर . अपनी बजरिया बदली और बहुत बदली , लोगो कि आदते भी बदली , काफ़ी लोग ऐसे हैं जो पहले वी सी आर मँगा कर टी वी से फ़िल्मो का लुत्फ़ उठाते थे और अब केबल पर पूरा मज़ा लेते हैं . मोबाइल पर बतीयाते हैं और मामा की माने तो भाई साहेब तो मुह पे उ काजनी काव फ़ेस वाश लग़ावत रहे .----------------------------------------------------------------------------
इस फ़ोटो के साथ एक लिंक है हिंदी मे टाइप करने का..रोमन मे ही हिंदी टाइप किया जा सकता है फ़र्क यही है की ये एक वेबसाइट है

Thursday, March 8, 2007

ये बज़ार है

वैसे तो हम सब इस बज़ार के अंग हैं और रहते भी इसी के इर्द गिर्द हैं इसी मे रोज़ हम कुछ ख़रीदते हैं और बेचते हैं लोगो को देखते हैं और उनसे मिलते भी हैं हँसी तहाके लगते हैं और कभी कभी इसी बाज़ार मे गला फाड़कर रोते हैं ये बाज़ार है यहाँ सभी रंग हैं एक दूसरे से मिलते हुए रंग, सबमे सिमते हुए रंग, बे-रंगो से रंग और रंगो जैसे रंग, ये बज़ार है.....स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग बाज़ार में,रंगो के बाज़ार में,और हाँ..बे-रंगों के भी बज़ार मे....