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Sunday, May 27, 2007

हरी पाठक और राम का दहेज़

हरी पाठक के कारनामे -६
शुक्ला के दोनो कान भी लाल हो गए। " साला !! दो कौड़ी का पत्रकार मेरी बराबरी करता है ! " अचानक शुक्ला बिना कुछ कहे ही वहाँ से हट गया। थोडा सा किनारे आया और उस चैनल के मालिक को फोन करने लगा जिसमे कि चौधरी काम करता था। " साले की तो आज ऎसी की तैसी कर दूंगा।" फोन मिला और दूसरी तरफ से चैनल का मालिक श्यामलाल सीतावंशी बोला "जय हो ! जय जय हो शुक्ला जी महाराज की !" शुक्ला ने बेचैनी से फोन एक कान से दूसरे कान की तरफ ट्रांसफर किया, बोला " क्या सीतावंशी जी ! आपके राम तो बड़ा दहेज़ माँग रहे हैं। इतने मे तो न जाने कितने रामो की शादी हो जायेगी।" अब श्यामपाल हडबडाया, बोला, " मालिक ! आख़िर मामला क्या है? " शुक्ला ने मन ही मन उसे पचासों गालियाँ दीं , लेकिन फिर संभलकर बोला, " चौधरी आया हुआ है। किलष्ट किशोर सर्राफ़ के यहाँ हमारी बात चल रही है। साला न तो हमे खाने देगा और न ही खुद खायेगा।" अब दूसरी तरफ से सधी हुई आवाज़ में पूछा गया, " कितने की डिमांड है ?" शुक्ला बोला, " आधे की" श्यामपाल ने कहा ,"चलो , पांच परसेंट कम करके बात खतम करो।" अब तो शुक्ला और खौरा गया लेकिन खुद को संभालकर बोला,"ठीक है, देखता हूँ।" लेकिन यादव को हिस्सा देने का उसका कोई इरादा नही था।
अब आते हैं हरी पाठक पर। जब हरी शुक्ला के लिए तहखाने का दरवाज़ा खोलकर वापस जनरेटर रूम की तरफ आ रहा था तो दरवाज़े की चौखट पर मालिक खड़ा उसे अंगारे बरसाती नज़रों से घूर रहा था। अगर आंखो से क़त्ल करना मुमकिन होता तो हरी न जाने कब का मर गया होता। लेकिन इसी बात का दुकान के मालिक को शायद हमेशा अफ़सोस रहेगा कि आंखो से क़त्ल नही हो सकता। हरी अन्दर आया तो पीछे पीछे मालिक भी अन्दर आ गया, बोला, " हरी! तू गया !!अब तुझे कोई नही बचा सकता।" हरी ने निगाह ऊपर उठाई और सीधे मालिक की आंखो में गाड़ दीं । मालिक फिर सकपकाया। क्या था हरी की आँखों मे आख़िर !! तब तक उसने देखा कि शुक्ला तहखाने से बाहर निकल आया है और त्रिवेदी और दुबे से कुछ बातें कर रहा है। वह उसी ओर लपका। अब हरी भी दरवाज़े की चौखट पर आकर खड़ा हो गया और जो कुछ भी हो रहा था , देखने लगा। जब उसने देखा कि कुछ ले दे कर बात यही पर खतम हो जाने वाली है तो उसे अच्छा नही लगा। वह सोचने लगा। अचानक फिर से उसके दिमाग मे कही खट सा हुआ और हरी पिछले दरवाज़े से बाहर की तरफ बढ़ा। ज्ञानू पी सी ओ वाले के यहाँ पंहुचकर उसने अपनी जेब से एक फटी मटमैली पॉकेट डायरी निकाली , उसमे कुछ देखा । अब उसकी उँगलियाँ तेज़ी से टेलीफोन कि बटनों से खेलने लगी।
इधर शुक्ला चैनल के मालिक से बात करके वापस लौटा और दुकान के किनारों पर पडे सोफों मे से एक पर पसर गया। वही से उसने एक ऊँगली के इशारे से चौधरी को बुलाया। चौधरी पास आया तो सोफे पर हाथ थपथपाकर बैठने का इशारा किया। जब चौधरी बैठ गया तो शुक्ला ने पूछा , " सुर्ती है ?" चौधरी ने कहा , " हाँ बिल्कुल है।" शुक्ला बोला, " जरा बनाओ तो।" चौधरी ने पिछली जेब से पांच सौ पचपन की पंढरपुरी पुडिया निकाली और हाथ में लेकर रगड़ने लगा।

Sunday, May 20, 2007

हरी पाठक और चैनल के रिपोर्टर का आना

शुक्ला ने उसे ऊपर से नीचे तक चार बार देखा। मलिक की हालत और खराब। शुक्ला बोला , ' पचास ' । मालिक ने कहा , ' क्या !! ' अब तो शुक्ला ने मालिक तो डपट लिया। झिड़क कर फुन्फ्कारते हुए बोला, साले !! पचास का मतलब नही समझता ? ' इतना माल दबाकर रखा है , अगर हम ले जाएँ तो कितना बनेगा ? ' मालिक कुछ नही बोला। शुक्ला फिर बोला, 'पचास करोड़ से एक पाई भी कम नही और वो भी अभी , इसी जगह। नगद। ' मालिक ने नम ही मन हिसाब लगाया तो उसे पचास करोड़ मे सस्ता माल छूटता नजर आया। मालिक ने हाँ बोलने के लिए जैसे ही मुँह खोला तभी सामने दरवाज़े पर एक चैनल की ओ बी वैन रुकी। दरअसल शुक्ला के साथ आये यादव जी ने शुक्ला को अकेले डीलिंग करते देख अपने जातभाई खबेश चौधरी को फोन कर दिया था। वह एक चैनल मे रिपोर्टर था। चौधरी वैन से बाहर निकला। दुकान को ऊपर से नीचे तक देखा और ऐसे सांस भरी जैसे अभी अभी नहा के आया हो और दुकान के अन्दर घुस गया। उसे देखते ही यादव जी लपक कर आये और उसे एक कोने मे ले गए। दोनो दो मिनट तक पता नही क्या काना फूसी करते रहे। अब चौधरी अपनी छोटी छोटी आंखें नचाते हुए उस तरफ बढ़ा जिस तरफ कि शुक्ला और मालिक खडे थे। जैसे ही चौधरी शुक्ला के पास पंहुचा , उसने लपक कर शुक्ला के पैर छुए। शास्टांग किया। शुक्ला ने किसी तरह खुद को संभाला और उसे खीसें निपोरते हुए उसे आशीर्वाद दिया। अब चौधरी की बारी थी। बोला क्या पंडित जी ? सब अकेले अकेले ? अरे हम भी तो आप ही के भक्त हैं। शुक्ला बोला क्या अकेले अकेले , इनका फार्म ३१ रह गया था , वही पूरा करवाने आये हैं। चौधरी ने एक उडती सी निगाह त्रिवेदी और दुबे पर डाली जो तहखाने के दरवाज़े पर हकबकाये से कभी शुक्ला को देखते तो कभी चौधरी को। मालिक उनकी निगाहों के मरकज़ से दूर हो गया था। अब चौधरी बोला , अपने मालिक को एक्स्क्लुसिव के लिए बोल के आया हूँ और आपके साब का नंबर , ये देखिए री डायलिंग पर लगा हुआ है। शुक्ला ने मालिक की तरफ देखा। अब त्रिवेदी और दुबे भी मालिक कि ही तरफ देखने लगे। मालिक का सर हिला और हाँ मे ही हिला। यानी कि अभी तक उसका हिसाब सही चल रहा था। अब शुक्ला चौधरी से मुखातिब हुआ , पूछा,'कितना?' ही ही करते हुए चौधरी बड़ी ही मुलायमियत से बोला , बस आपका आधा। शुक्ला का चेहरा लाल हो गया। "!! साले !! मेरी बराबरी करता है !! "

Saturday, May 19, 2007

हरी पाठक और सेल टैक्स वाला शुक्ला

हरी को देखते ही उसे और गुस्सा आ गया। लेकिन दुकान पर उस समय कुछ सेल टैक्स वाले बैठे थे इसलिये वह कुछ बोल नही सकता था। उसने गल्ला अपने भाई गोबिन्द को पकडाया और हरी के पीछे पीछे जनरेटर वाले कमरे मे आ गया जहाँ हरी पानी पीने के लिए एक ग्लास को चमकाने मे लगा था। फुन्फ्कारते हुए मालिक बोला,'कहॉ मर गया था? दुकान क्या तेरा बाप खोलता ? साले ! तेरी अय्याशियाँ दिन ब दिन बढती ही जा रही हैं। आज तेरा जुगाड़ करता हूँ।' हरी को ऐसा लगा जैसे उसके सर में से कही से खट की आवाज़ आयी हो। मलिक जाने लगा तभी हरी के मुँह से आवाज़ निकली। "रुको !! " मालिक ठिठक गया। अचम्भे भरी नज़रों से उसने हरी की तरफ देखा। उसे हरी की आंखें बड़ी अजीब लगीं। हरी आगे बढ़ा और मलिक के हाथ से चाबी का गुच्चा ले लिया। मलिक को तो जैसे करंट मार गया था। चाबी लेकर हरी सेल टैक्स वाले शुक्ला जी के पास गया। वहाँ से उसने मलिक की तरफ निगाह दौड़ाई। मालिक अभी तक हक्बकाया हुआ टुकुर टुकुर उसे ही देख रह था। हरी ने शुक्ला के कंधे पर हाथ रखा। शुक्ल ने हरी की तरफ देखा, फिर उसकी आंखो की तरफ। हरी बोला,'मेरे साथ आओ'। शुक्ल किसी मशीन की तरह उठ खड़ा हुआ। हरी उसे दुकान के बांये कोने मे लेकर गया। वहाँ से तहखाने मे जाने के लिए गुप्त दरवाज़ा था। हरी ने उस गुच्चे मे से तहखाने की चाबी निकाली और तहखाना खोल दिया। मालिक, जो जनरेटर के कमरे वाले दरवाज़े से ये सब कुछ देख रह था , तहखाना खुलते देख उसकी हवा निकल गयी। धम्म से उसी दरवाज़े की चौखट पर बैठ गया और दोनो हाथो से अपना सर थाम लिया।सब कुछ गया !! इस हरी के बच्चे ने तो हमे कहीँ का नही छोड़ा !!

अब हरी और उसके मालिक के बीच लंबी बहस होनी थी, लेकिन पहले देखते हैं कि शुक्ला को वहाँ kyaa मिला और उसने क्या किया?
लकडी की सीढ़ियों से होते हुए जब शुक्ला तहखाने में पंहुचा तो उसकी आंखें हैरत से गोल, चौकोर और ना जाने क्या क्या होने लगी। उसे लगा कि वह अलीबाबा है और चालीस चोरों के अड्डे पर पंहुच गया है। एक तरफ की आलमारी पर चिप्पी लगी थी-२३ कैरेट तो दूसरी तरफ गिन्नी। कहीँ २४ कैरेट तो कहीँ शानील के टुकडों पर रखे बेशकीमती हीरे। एक तरफ की दीवार पर तो कुन्टलों चांदी की सिल्लियाँ पडी थी। अरबों की दौलत थी वो। काली दौलत। जिसकी चमक से शुक्ला की आंखें चौंधिया रही थी। शुक्ला तुरंत बाहर निकल कर आया। मालिक ने उससे बात करने की कोशिश तो की लेकिन उसने अपना मुह दूसरी तरफ फेर लिया। अपने साथ आये लोगों मे से उसने त्रिवेदी और दुबे जी को बुलाया। कान में कुछ खुसुर फुसुर की और दोनो जाकर तहखाने के दरवाज़े पर बैठ गए। मालिक बेचारा दीन हीन बना उसके सामने हाथ जोडे खड़ा था।

Friday, May 18, 2007

मसौधा पंहुचे हरी पाठक

हरी का सर रह रहकर घूम रहा था। उसके साथ जो हुआ, बार बार उसके दिमाग में चक्कर काट रहा था। जब उसे लगा कि अब आगे चलना मुश्किल है तो वह रेल के फाटक के सामने वाले तालाब के किनारे जाकर बैठ गया। सोचने लगा। थोडा सोचता और एक कंकड़ उठाता और तालाब के हरे पानी में फेंक देता। टपाक की आवाज़ आती और हरी फिर से सोचता। तभी उसे शक्तिमान याद आया। उसके साथ भी तो ऎसी ही अजीब अजीब चीज़े होती रहती थीं। हरी ने फिर से एक कंकड़ तालाब मे थोडा नचाकर फेंका। कंकड़ ने पानी पर दो तीन टापले खाए और डूब गया। हरी के दिमाग का बल्ब जल गया। अब उसे काफी कुछ समझ मे आने लगा था। उसे लगने लगा कि वह ही शक्तिमान है। वह उठ खड़ा हुआ। अपनी जगह पर खडे होकर उसने चारों तरफ घूम कर सात आठ चक्कर लगाए। और जब हरी पाठक रुका तो.... ! जब रुका तब भी वह उसी पाजामे और शर्ट में था और सामने खादी साईकिल उसे चिढ़ाती सी लगी। अन्मनेपन से उसने साईकिल से मुह फेर लिया और फिर से तालाब की तरफ देखने लगा। सोचा कि अगर भगवान् शंकर जी ने उसे आर्शीवाद दिया हैचाम्त्कारों का , तब तो वह पानी पर भी चल सकता है। यह सोच कर हरी ने तालाब की तरफ कदम बढाया और पूरे आत्मविश्वास से तालाब के पानी पर अपना पहला पैर रखा। भच्च की आवाज़ आयी और उसका पैर चप्पल सहित तालाब की मिटटी में धंस गया। पैर बाहर खींचा तो चप्पल उसी मिटटी मे धंसा का धंसा रह गया। बुदबुदाते हुए हरी ने हाथ डालकर मिटटी से चप्पल निकाली और पैर और चप्पल दोनो धुले। अब हरी को यकीन हो गया था उसमे कोई चमत्कारिक शक्ति नही है। सुबह के दस बज चुके थे और दस बजे वाली ट्रेन आने वाली थी इसलिये फाटक बंद हो गया था। हरी ने गहरी सांस ली और स्टेशन की तरफ बढ़ा।
जब हरी स्टेशन पंहुचा तो ट्रेन आकर खडी हो गयी थी। उसने साईकिल उलटी की और पैडल के सहारे उसे डब्बे की खिड़की से फंसाकर लटका दी। अन्दर जाकर उसे अपने अन्गौछे से बाँध दिया। अब साईकिल सुरक्षित थी। हरी आकर ट्रेन के दरवाज़े की सीढ़ियों पर बैठ गया। वहाँ से साईकिल भी दिखाई देती थी और साईकिल के पहिये की तरह गोल गोल घूमते खेत , पेड और सबकुछ भी। गोल घूमते खेतों को देखकर हरी उसी मे गुम हो गया। ध्यान तब टूटा जब मसोधा , जहाँ कि उसे उतरना था, आ गया। हरी उतरा और साईकिल लेकर आराम से पैडल मारते हुए दुकान पंहुचा। मालिक आ गया था और चुंकि उसने ही दुकान खोली थी इसलिये बुरी तरह से भन्नाया हुआ था।

Saturday, April 28, 2007

हरी पाठक के कारनामे-२

दुकान खोलने और बंद करने ,दुकान का पैसा बैंक पहुचाने के अलावा हरी का दुकान मे कोई और काम नही था। बाकी बचे समय मे वंही अपनी कुर्सी पर बैठकर औंघाते रहते। लेकिन हरी दुःखी थे। उन्हें सपने नही आते थे। गाँव के बनिया के घर वाली टी वी में हरी को इतवार को शक्तिमान देखने मे बड़ा मजा आता। वो शक्तिमान बनने का सपना देखना चाहते और इस लालच में दुकान के ऊपर जाकर सोते कि कोई डिस्टर्ब ना करे। लेकिन फिर भी सपने थे कि आते ही नही थे।
अब हम चलते हैं वहाँ , जहाँ से हरी पाठक में चमत्कारी शक्ति का संचार शुरू हुआ और उसके बाद से हरी ने चमत्कार दिखने शुरू कर दिए। उन चमत्कारों से दुकान का मलिक , मलिक के नौकर , दुकान के पडोसी, कनक चित्र मंदिर का गेटकीपर और यहाँ तक कि हरी पाठक की बीवी भी चमत्कृत हुई, और उसके बाद तो हरी पाठक एक से बढकर एक चमत्कार करने लगे। पूरी तरह से चमत्कार पुरुष बन गए।
हरी पाठक के घर से रेलवे लाईन के रास्ते में एक बहुत बड़ा सा पाकड़ का पेड था। वैसे पेड तो बहुत थे लेकिन ये कुछ खास था। एक तो ये बहुत बड़ा था दूसरे इस पर काफी सारे चमगादड़ लटके रहते थे। दिन मे भी भुतहा लगता था। चमगाद्ड़ों की साइज़ भी काफी बड़ी थी। पेड को घेरकर एक चबूतरा बना दिया गया था और जब रेल की लाईन बिछाई जा रही थी तो किसी ने वहाँ से तीन चार गोल मटोल पत्थर उस पेड के नीचे लाकर रख दिए थे। तब से वहाँ चमगादड़ वाले शंकर बाबा प्रगट हो गए थे और पूरा गाँव चमगादड़ वाले शंकर बाबा की थान पर पूजा करता , जल चढ़ाता और कराही देता। गाँव की कुंवारी लडकियां और लड़के अक्सर उसके आस पास मंडराते नज़र आते क्योंकि उस पेड की एक तरफ काफी सारी बांस और सरपत की झाडियाँ थी और अक्सर वहाँ से कभी कुत्ते की तो कभी कोयल की अजीब अजीब सी आवाजें आती। और चमगादड़ वाले शंकर बाबा का प्रताप कुछ ऐसा था कि इन आवाजों के आने के के तुरंत बाद वो लडकियां पता नही कहॉ अंतर्धान हो जाती। बहरहाल हमारी कहानी के नायक हरी पाठक भी उस थान पर जरूर शीश नवाते। ये उनका रोज़ का नियम था। उस दिन भी वह शीश नवाने के लिए अपनी साइकिल से उतरे थे। पोटली से अगरबत्ती निकली और थान पर जलते दिए से सुलगाई । शंकर बाबा को प्रणाम करने के लिए उनके आगे अपना सर झुकाया। लेकिन अचानक एक तेज़ हवा चली और पेड के चमगादड़ कें कें करते हुए उड़ने लगे। सर अभी थान पे झुका ही था कि एक चमगादड़ ऊपर से सीधे उनके सर पर गिरा। ऊपर से लगा धक्का तो सर जाकर थान की फर्श पे टकराया। हरी पाठक को ऐसा लगा जैसे खुद भगवान् भोले नाथ उनके सामने खडे हैं और सारे चमगादड़ उनके चारों तरफ उड़ रहे हैं... बस उड़ते ही जा रहे हैं। होश खोने से पहले उन्होने देखा कि शंकर बाबा ने एक चमगादड़ के कान मे कुछ कहकर उनकी तरफ इशारा किया। इसके बाद हरी पाठक अचेत हो गए। बमुश्किल दो मिनट मे ही उनकी बेहोशी टूट गयी। आंख खुली तो देखा , शीला , रूपा और अजयी उनके अगल बगल खडे होकर घबराए हुए उन्हें देख रहे थे। चमगादड़ उनके सर से टकराने के बाद जहाँ गिरा था , वहाँ एक बड़ा सा गढ्ढा हो गया था। हरी पाठक का सर थान के जिस हिस्से से टकराया था , वह पूरी तरह से टूट गया था लेकिन अचरज तो ये था कि हरी पाठक को खरोंच तक नही आयी थी। उनके अट्ठारह साल सात महीने से अकडे हुए कंधे और सर भी सीधे हो गए थे। एक तेज़ सा उनके चहरे पर आ गया था।
(जारी....)
अगले अंक मे पढे- हरी पाठक का पहला चमत्कार

Friday, April 27, 2007

हरी पाठक के कारनामे

एक शहर। जैसे कि पुराने शहर होते हैं , काफी कुछ वैसा ही ... एक शहर । भीड़ भरी सड़कें , सड़कों पे रिक्शे ,ठेले , साईकिल ,पैदल और कभी कभी मोटर साईकिल और स्कूटर भी। एक आम सा शहर जो कि आने वाले दिनों मे अंगूर बनने वाला है , उसे भी नही पता। अब आम से अंगूर !! ये क्या तुक हुआ ? हाँ , ये तुक तो हुआ और इसलिये हुआ क्योकि हमारी कहानी के नायक हरी पाठक यहीं पर पाये जाये है। कारनामे इनके अभी तक तो हुए नही हैं लेकिन जल्दी ही शुरू होने वाले हैं। बस... अब रहा नही जा रहा है इनके कारनामों की वजह से। जल्दी से शुरू करते हैं ।

शहर के बीच में चौक और चौक में क्लिष्ट किशोर सर्राफ़ की दुकान पर तैनात हरी पाठक। उम्र लगभग बयालीस साल , रंग गेन्हुआ टर्नड भूरा , क़द काठी सामान्य से कुछ कम। हाथ में लगभग सत्तर अस्सी चाबियों वाला गुच्छा। पैरों मे चप्पल और बदन पर कमीज और पैजामा। इतना सब अपने ऊपर लादकर हरी पाठक रोज़ सवेरे उन्नीस किलोमीटर दूर से सवेरे आठ बजे तक दुकान पंहुच जाते। साथ में रहती उनकी साईकिल । कैसे पन्हुचते ? घर से चलते रस्ते पर आते। बीच मे अक्सर ट्रेन दिख ही जति थी सवेरे वाली। बस हरी पाठक अपनी साईकिल उसी पर लाद लेते और टिकट चेक न हो इसलिये शहर से एक स्टेशन पहले उतार लेते। वहाँ से आते मलिक के घर चाबी लेने। चाबी लेकर दुकान आते , शटर उठाते और उसके बाद पूरी दुकान के ताले खोलते , दरवाजे खोलते। ये काम वह पिछले अट्ठारह साल सात महीने से करते चले आ रहे थे। हालांकि दुकान पर काम करते हुए उन्हें पूरे बाईस साल हो गए थे और इन बारह सालों में उनकी जिंदगी मे सिर्फ एक चमत्कार हुआ था और वह भी अट्ठारह साल सात महीने पहले। पहले वह दुकान पर पानी पिलाते थे लेकिन अट्ठारह साल सात महीने पहले धनतेरस वाले दिन मलिक ने उनकी तरक्की कर उन्हें पानी पिलाने की ड्यूटी से हटाकर दुकान खोलने की ड्यूटी पर लगा दिया । गाँव देस में बड़ा हल्ला मचा कि भईया अब दुकान के मलिक हो गए हैं... आख़िर चाबी तो उन्ही के पास रहती है। और हरी पाठक खुद को दुकान का मलिक समझने भी लगे। तब से कंधे और सर मिलाकर ऐसे अकडे कि अभी तक देखते इधर हैं और बात उधर करते हैं। बस ...कुछ इसी तरह उनकी जिंदगी कटती जा रही थी। सुबह दुकान खोलना और रात को बंद करना। अरे हाँ !! एक काम और था जो वह बडे मनोयोग से करते थे। दुकान के मुंशी जब पैसा जमा करवाने के लिए बैंक जाते तो रुपयों से भरा बैग हरी भईया ही सँभालते। ओफ्फो... हरी भईया उस समय तो ख़ुशी से फूल कर कुप्पा हो जाते । दिन भर दुकान की चाबी उनके हाथ में और दुकान का पैसा भी उन्ही के कर कमलों से बैंक में जमा होता । रात में बीवी से बताते कि आज दुकान की चार लाख की आमदनी हुई और कल साढ़े तीन लाख की हुई थी। बीवी को कोई अचरज नही होता क्योंकि पिछले अट्ठारह साल सात महीने से वह यही बात सुनती चली आ रही थी। और अब तो उसे कोफ़्त भी होने लगी थी। बिटिया जवान हो गयी थी इसलिये गाँव के कई लड़के उससे काफी इज़्ज़त से पेश आने लगे थे। अक्सर वो घर पर भी आ जाते पूछने कि चाची , कुछ चाहिऐ तो नही ?



(जारी....)