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Thursday, April 5, 2018

फिर मिलेंगे, या नहीं मिलेंगे, या नहीं पता...

आता तो है इधर, लेकिन ठहरता नहीं है। गलती से कभी ठहर भी गया, तो राम कहां ठहरने वाले। मन में रंग रहता है, रंग में मन रहता है। आता है जब सुख तो जीवन में कुछ ढंग रहता है, लेकिन ढंग के जीवन जैसी कोई चीज ढंग से कभी होती नहीं, पहले कभी यूजी ने कुढ़कर कहा था, मैं सपाट कहता हूं। लगता है कि सबकुछ ठीक चल रहा है और लगता ही है। लगना होना नहीं होता। ढंग की उमंगे लगने को होने देने के लिए बार-बार ऊपर लेकर आती हैं, और बार बार राम थोड़ा और नीचे गिर जाते हैं।
जीवन जैसा ही बनना है। चाहे जो भी हो, जीवन को कोई फर्क नहीं पड़ता। सांस हर हाल में चलती ही रहती है। सुख से जीवन को कोई सुख नहीं मिलता, न दुख से दुख। अपनी बनाई चीजों से तो कतई कुछ नहीं मिलता और दूसरा कोई न था, न है, न होगा। होगा भी तो महज लगना ही होगा और लगना होना नहीं होता नीला बाबू। वैसे भी जीवन की गति गतिहीनता में ही है। बाकी तो दुर्गति है।
फिर मिलेंगे नीला बाबू, शायद जीवन की जड़ता से पार कहीं। या नहीं मिलेंगे, क्या फर्क पड़ता है, या नहीं पता...
तबतक तुम्हारे बुंदे का एक मोती मेरे पास है।

Thursday, February 22, 2018

जो है, वह था हो गया है

समझता हूं कि सब समझते हो नीला बाबू। देखता हूं कि सब देखते हो नीला बाबू। पाता हूं कि सबकुछ तो पा जाते हो नीला बाबू। फिर क्या है जो रुके हो? यूं ठिठकना ठीक नहीं नीला बाबू। रेल जा रही है। जाओ, बैठ जाओ। चलने की स्थिर हिलन में शायद चल सको। कुछ कदम। शायद तय कर सको वह फासले, जो बाकी रह गए हैं। जो हैं, जो नहीं हैं। फासले हैं नीला बाबू?

रंगरेज के रंग उबल रहे हैं। सुबह पत्थर के कोयले भरे थे। आंच तेज है और पत्थर लाल। लाल तो रंगरेज का चेहरा भी है, आंख भी। आग आंखों में है, आंच भी। उबलते रंगों की भाप महज कपड़ा नहीं रंगती नीला बाबू, मन भी रंगती है। मन के कपड़े पहनते हो? मन में कैसे दिखते हो नीला बाबू? मन का रंग कैसा है? रंग है। रंग है ना नीला बाबू?

जानता हूं बुंदे नहीं दोगे। सुख सिर्फ गांव के चौधरी का है। ताला भी चौधरी का है। चाबी भी उसी की है। तुम क्या हो नीला बाबू? ताला? चाबी? बुंदे? सुख? या महज एक गांठ?

ये अधूरा ही रहेगा नीला बाबू। ये गांठ नहीं खुलेगी। ये सुख नहीं मिलेगा। ये कपड़ा नहीं रंगेगा। ये रेल रुक गई है। फासले बढ़ गए हैं। गांठ कड़ी हो गई है। जो है, वह था हो गया है। जो था, वह कभी था ही नहीं। जाने दो नीला बाबू। तुमसे न हो पाएगा। तुमसे ये गांठ न खुलेगी नीला बाबू। बड़ी जुगत लगानी होती है खोलने के लिए।
चाचाजी की दोस्तियां















मिलेगा तो देखेंगे: 24

Wednesday, February 21, 2018

सुख है!

जाते-जाते जाता है दुख। आते-आते आता है सुख। तुम्हारा आना, सुख का आना है। तुम्हारा जाना, सुख का जाना है। जाते-जाते जो जाता है, वह तुम्हारे जाने जितनी जल्दी नहीं जाता। सुख की बात समझते हो ना नीला बाबू? सुखी कैसे दिखते हो नीला बाबू? हमको भी सिखाओ सुखी दिखना। हमने भी सीखना है सुख! क्या कहा? दूर से सिखाओगे? कितनी दूर से?

हिंदी में कोई सुख नहीं है नीला बाबू। बिंदी में भी कोई सुख नहीं है। तुम्हें मिला? तो फिर धोती में बुंदे बांधकर क्यों घूम रहे हो? पीठ पर चिपकाकर क्यों घूम रहे हो? ऐसे क्यों दिखाते हो जैसे धोती में सुख बांधकर घूम रहे हो? क्यों कहते हो कि सुख पीठ पर चिपकता है? अच्छा बताओ, धोती में बंधा सुख कब निकालते हो? और पीठ से? जब नहीं निकालते हो तो क्या निकलता रहता है नीला बाबू? जो है? है क्या? क्या है नीला बाबू? सुख है? कहां है? धोती में बंधा है? पीठ पर चिपका है? सुख पर गांठ क्यों लगा रखी है नीला बाबू? गांठ कब खोलोगे सुख की? या यूं ही बोलोगे- सुख है!

हंसते हो? हंसो। हंसने में सुख है। हंसने में सुख है? वाकई है? हंसना सुखी होना है? नहीं नीला बाबू, नहीं। हंसना सुखी होना नहीं। दुख एक चुटकुला है नीला बाबू, कब समझोगे? हंसी है। किससे लिपटी है हंसी? मेरी तरह छत देखकर हंसते हो? दीवार देखकर? जमीन देखकर? सड़क, गली या बिजली का खंबा देखकर? नहीं नीला बाबू, दिमाग नहीं चला है मेरा। दुख चल रहा है। दुख में हंसता हूं नीला बाबू। दुख पर हंसता हूं। हंसता तो हूं ना नीला बाबू? नहीं?

गांठ में सुख बांधकर मुझे भी चलना है नीला बाबू। पुरानी ख्वाहिश है। जब चाहा, गांठ खोली और कतरा भर सुख सूंघ लिया। सूंघने से सुख तो मिल जाएगा ना नीला बाबू? नहीं? क्यों नहीं? नाक में बसाना है सुख। आंखों में लगाना है सुख। तुम कहोगे तो सिर पर भी पहन लूंगा, गांठ तो खोलो नीला बाबू! या अपने पास ही बांधे रहोगे सुख के बुंदे? मुझे भी तो पहनाओ थोड़ा सा सुख। धान का पुआल दुआरे पड़ा है। बटकर नई रस्सी बनाई है। ढीला होगा तो कसकर बांध लूंगा। दो तो सही! सुख की गांठ खोलो तो सही नीला बाबू!

(परसाई हंसते थे। हंसते थे?)

मिलेगा तो देखेंगे- 23

Tuesday, February 20, 2018

समेट लो अपना अपना आलता


याद में कौंधते बियाबानों को भूल जाएं। सांस में आता महुआ बिसरा दें। कान की लौ चुंभलाती गर्म हवाओं को फूंक मारकर उड़ा दें, तो भी बड़ी देर तक सुख का धुंआ धीमे-धीमे निकलता रहता है, बहता रहता है। एक फिल्म है जो चलती रहती है। संगीत है जो बजता रहता है। कागज है, जो उड़ता रहता है। हवा है, जो बहती रहती है। और पैर हैं जो ठहरते रहते हैं। सुख की चौखट किस चौखट है, किस देहरी है, किस दुआरे है, किस किनारे है? है भी या कौंधते बियाबानों में किसी पीपल के पीछे छुपी है जिन्हें पत्तियों के पीछे से चटकती धूप में मैं नहीं देख पाता? दिखता नहीं है, दिखते की उम्मीद भी नहीं। फिर भी कैसी है ये मेड़, जिसपर गिरते-रपटते चला जा रहा हूं? कहां हैं मेरे धान के खेत?
उस दिन तिवारी जी चुनौटी में रखे दो बुंदे दिखा रहे थे। काली माई के थान पर बैठकर पूरे गांव को सुना रहे थे कि दुनिया में अगर कहीं सुख है तो चुनौटी में है और चुनौटी में रखे दो बुंदों में है। मन तो हुआ कि वहीं दोनों बुंदे छीनकर उसकी सुर्ती बना दें, मगर तेवराइन का ख्याल आ गया जो आते जाते गर्म नजरें फेंका करती हैं। ऐसे ही आता है सुख जो नजरों से सहलाकर फिर अपनी चौखट के उस पार जाकर मुंह पर पल्लू लपेट लेता है। दिखता है, छुप जाता है। छुपकर और भी छुप जाता है।
याद से थोड़ा सा काजल निकालूं? एक टिकुली? आलता? पिछली बार आलता लगाया था। आईसीयू की उजली चादरें गुलाबी हो गई थीं। भागी-भागी नर्स आई और बोली- पैरों से तो रंग निकल रहे हैं। ऑक्सीजन मास्क निकालकर बोला- सुख निकल रहा है सखी। देखकर बताओ- पूरा तो निकल गया ना? बोलती है- थोड़ा बाकी है। नाखून बड़े हो गए हैं।
चैत आने वाला है। कहां है तुम्हारी चुनरी? तेवराइन, तुम भी अपनी धोती लाओ। अभी मेरे पैरों में थोड़ा सा सुख लगा हुआ है। पैतानों पर मसलते-मसलते किनारे तो कोरे हो गए, पोरों में अभी भी रंग बचे हैं। लो, रंग लो अपनी चुनरी। भिगो लो अपनी धोती। इससे पहले कि नदी पार करते-करते सब धुल जाए, समेट लो अपना अपना आलता।

मिलेगा तो देखेंगे- 22

Monday, February 19, 2018

ये सारे रंग तुम्हारे हैं

दिखाते कुछ हो, सुनाते कुछ हो?
कहते कुछ हो, बताते कुछ हो?
पता है रंग नजदीक है?
रंग आ रहे हैं।
तुम्हारा सुनाना लाल है। चटक लाल।
बुरांश देखा है ना?
खिला और खिलकर आग लगाता बुरांश।
जानते हो कि पहाड़ों में दो चीजें दूर से दिखती हैं?
श्मशान और बुरांश।
दोनों जंगल में लगी आग होती हैं।
एक गर्म तो एक ठंडी।
तुम सुनाते हो तो हिमशैल टकराते हैं। सबकुछ टूटने लगता है। बिखरने लगता है।
तुम्हारी आंख में जो आवाज है, वह सबकुछ पिघला देती है।
सब बिखरकर बूंद बूंद टपकने लगता है। सारी रात टपकता रहता है। दिन भर बहता रहता है।
और कितना हरा है तुम्हारा बताना!
बताते हो या समेटते हो?
उसी बाग में लेकर जाते, जिसका सपना रोपा था।
दूर तक हरा देखते रहने का सपना।
सपने बड़े हो रहे हैं। सपने हरे हो रहे हैं।
बताते हो या खुद में भरते हो?
इतना भरोगे, सब हरा करोगे तो कहीं...
कहीं सपनों में अमलतास न भर जाए।
और फिर सबकुछ बताकर उसमें बुरांश का गुच्छा क्यूं टांकते हो?
बंद करो अपना सुनाना बताना। कहना दिखाना सी दो।
बाग कटते जा रहे हैं। बुरांश का जूस निकाला जाएगा।
न लाल बचा है, न हरा बच पा रहा है।
पीला धूप खा गई।
मगर रंग तो नजदीक हैं।
रंग तो आ रहे हैं।
दिखाना, सुनाना, कहना, बताना तो खर्च हो गया।
फिर? 
मेरी सुनो।
मेरे पास कुछ रंग बचे हैं।
सूख गए हैं।
छू दो, गीले हो जाएंगे।
लगा लो, तुम्हारे हो जाएंगे।
ये सारे रंग तुम्हारे हैं।
तुम्हारे ही तो हैं।
कुंभ, प्रयाग।

















मिलेगा तो देखेंगे- 21 

Sunday, September 11, 2016

मिलेगा तो देखेंगे- 18

मेरा हाथ वो अपने बड़े से हाथों में लेकर कहती या शायद बुदबुदाती कि हम गांव जरूर चलेंगे। वहां नदी है, पहाड़ियां हैं, चट्टानें हैं, बकरियां हैं और ढेर सारे जंगली फूल भी। और फिर अम्मा तो वहीं है। क्या हुआ जो वो मुझे नहीं मानती? तुमको देखेगी तो मानने लगेगी। मैं हां हूं करके चुप बैठा रहता और अपने हाथ की साइज उसके हाथ से मिलाता रहता। उसकी हथेलियां मेरी हथेलियों से बड़ी थीं। मैं अपना पूरा पंजा भी फैला लेता तो भी बीस और अट्ठारह का फर्क रहता ही रहता। इस तरह से उसकी बड़बड़हाट से ऊबता मैं उसे उसकी ही हथेली दिखाने लगता या फिर उसका सबसे अप्रिय सवाल पूछता कि जब तुम्हारी अम्मा पाएंगी कि मैं तुमसे छोटा हूं तो? इस पर वो बड़ी देर तक चुप रहती। फिर कहती कि नहीं चलेंगे गांव। न अपने न तुम्हारे। और तुम्हारे गांव तो मैं कभी नहीं जाउंगी। यूपी के गांव भी भला कोई गांव होते हैं? सपाट धरती और तुम्हारी तरह उस वीराने से आए अकेले लोग। जो बचे रह गए वो दूसरों को कैसे बचकर नहीं रहने दिया जाए, इसी की जुगत में अपनी सुबहें और शाम खेत करते रहते हैं।

एक दिन मैंने उससे आखिरकार पूछ ही लिया कि उसके पास कितनी खेती है। उस दिन वो बड़े मन से मेरे लिए कढ़ी बनाकर लाई थी जो कहीं से भी नहीं कढ़ी थी। पता नहीं न कढ़ पाने की नाराजगी रही होगी या यूपी में पूछे जाने वाले सबसे आम सवाल की आम जिज्ञासा से उपजी टीस। बहरहाल, मुझे यही लगा कि खेतों में कहीं कुछ टूटा है। बोली कि उसके यहां ज्यादा खेती नहीं है। बल्कि जो भी खेत हैं वो यूंही पड़े रहते हैं, उनपर भी कोई काम नहीं हो पाया। मिलिट्री में मजदूर रहे उसके पिता ने अपनी रिटायरमेंट के बाद जितना धान तरोई उगाई, बस उतनी ही खेती वो देख पाई। अलबत्ता गांव के दूसरे लोगों को वो रोज स्कूल से जाते और आते हुए खेती करते देखती तो थी, लेकिन इस काम में उसकी कोई खास रुचि नहीं जम पाई। खेती उसे अच्छी नहीं लगती। मैंने फिर पूछा कि क्यों नहीं अच्छी लगती? वह फिर चुप हो गई।

उस दिन वो स्लीवलेस ब्लाउज और कत्थई बॉर्डर वाली हरी सूती धोती पहनकर आई थी। अपने आसपास मैं आमतौर पर इस तरह की महिलाओं को देखने का आदी नहीं हूं, लेकिन उसे देखकर न तो मुझे कोई ताज्जुब हुआ और न ही कोई हूक उठी। सबकुछ पूरी तरह से सामान्य था। मेरे कंधे तक पहुंचते बाल तेजी से गिर रहे थे। मैं उसकी कुर्सी के पास गया, नजदीक से ही एक कुर्सी खींची और अपने कंधे उसे दिखाने लगा कि देखो, कितनी तेजी से और कितने सारे बाल गिर रहे हैं। आखिर तुम कैसे इतने सालों से अपने बाल संभालती आई? मुझसे तो संभल ही नहीं रहे हैं। मैं इन्हें कटा दूंगा। वो धीमे से मुस्कुराई और अजीब तरीके से अपनी आंखों की गोलियां नचाते हुए अपने झोले में कुछ खोजने लगी। एक छोटा सा डिब्बा उसने निकाला जिसमें भुनी हुई अलसी थी। दो चुटकी अलसी उसने मुझे खाने को दी और मेरे बालों में उंगलियां फेरीं। बोली-रोज दो चुटकी अलसी खाया करो, बाल गिरना बंद हो जाएंगे। अलसी का बालों से इस तरह का संबंध मेरे लिए नया था लेकिन उसके लिए नहीं। उसके इलाके में महिलाएं अपने बालों को इसी तरह से बचाती आई हैं। 

Saturday, January 16, 2016

मिलेगा तो देखेंगे - 17

an original photo of dreams by Lesley Roberts
जब मैं तुम्‍हें सपने में देख रहा होता हूं तो क्‍या तुम भी खुद को देख रही होती हो? लगती तो तुम खुद को वैसी ही होगी जैसा मैं तुम्‍हें देखता हूं या फि‍र तुम खुद को जैसा दि‍खाना चाहती हो, जब चाहती हो, वैसा लग लेती हो? उम्र के साथ आपाधापी करती हर कदम पटककर जमीन को तोड़ देने जैसा तुम्‍हारा दि‍खाना मैं देखता रहता हूं। तुम्‍हें भी और उस ज़मीन को भी जहां तुमने लात मारी थी। हर कदम को मैं उसी खुरपी से टहोकता हूं जि‍ससे खेत में आलू। क्‍या मजाल एक भी आलू को चोट लगे।

आलू को चोट लगती है तो वो छीलने पर भी नहीं जाती। चेहरों को चोट लगती है तो सि‍लवटाें में नुमायां होती है। सपनों को जो चोट लगती है, वो नींद के खालीपन में भरी रहती है। आलू की चोट तो काटकर अलग कर लेते हैं, सपनों की चोट अलग करने को बने चाकू को खोजते अक्‍सर मैं खाली नींद में वि‍चरता हूं। अक्‍सर मैं सपनों में सो जाता हूं। अक्‍सर वही होता है जैसा तुमने चाहा। अक्‍सर वही होता है, जि‍सका मै सपना ही नहीं देख पाया। रेत मेरे हाथों से फि‍सलती जाती है। झुर्रियां रोज एक नया सपना देखने का नि‍शान तो दर्ज कर लेती हैं लेकिन खालीपन में वि‍चरते अदेखे सपने मेरी तरह अबोले ही रह जाते हैं।

मैं चोट लि‍खता हूं, फि‍र कुरेद देता हूं। मैं नींद देखता हूं और सपने सो जाता हूं। मैं खुरचता हूं और खाली नि‍शान देखता रहता हूं। मैं चि‍ल्‍लाना रिकॉर्ड करता हूं और नीरवता सुनता रहता हूं। मैं खुरपी हाथ में लेता हूं और जमीन में गाड़ देता हूं। मैं शीशा बनाता हूं और नींदों में उड़ेल देता हूं। तलवों पर रेत जमाता हूं और फि‍र हाथ झाड़ लेता हूं। दि‍खाता हूं खुद को और अनदेखा रह जाता हूं। करता हूं प्रेम और नहा लेता हूं नफरत से। बैठता हूं आगे जाने को, आना भूल जाता हूं।

Tuesday, December 29, 2015

मिलेगा तो देखेंगे - 16

आने के अपने रंग थे और जाने के अपने रंग। अपने आप में यूनीक। अपने आप में ही घुलते जाते। दुनि‍या थी कि स्‍थि‍र हुई जाती थी, आदमी था कि सपनों के सत्‍तर रंगों पर बि‍छलाता तैरता जाता था। सांस तो थी लेकि‍न उसे लेने की जरूरत नहीं थी। औरत सामने वलय में केंद्रि‍त खड़ी थी पर उसे भी देखने की जरूरत नहीं थी। समय के उस हि‍स्‍से का सारा चेतन जड़ गया था। पेड़ों के पत्‍तों ने गि‍रने के लि‍ए पतझड़ का इंतजार करना बंद कर दि‍या था। नदी बहने से पहले बनाई जाने लगी थी। पक्षी उड़ने के पहले उकेरे जाने लगे थे। घड़ि‍यां थीं कि गल गल कर गि‍री जाती थीं और बार बार इसी टपकनवस्‍था में कि‍सी पेड़ से या गि‍रि‍जे के पेंडलुम से लटकी नजर आती थीं। सि‍तारे रात पर जो रेखा खींचते थे कि दस साल पहले का पीला चांद दोनों हथेलि‍यों में लेकर भी अपनी वो खुरदुराहट और गड्ढे जि‍स बेकदरी से छुपाता था, उसका कहीं कोई चि‍त्र उन सि‍तारों ने बनाने से ही मना कर दि‍या। आदमी था कि बार बार उड़ने की बात करता था और बार बार अपने उसी गड्ढे में गि‍रा पड़ा रहता था, जो उसे पैताने पर पैर मसल मसलकर बेवक्‍त जगाता रहता था। 

Friday, December 11, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 15

उन ढलानों की याद जि‍नपर हम कभी फि‍सले, उन मैदानों की भूल जि‍न पर हमने चलने की कोशि‍श की और उस पानी की महक जि‍नमें हमने कभी तैरना चाहा, सब मि‍लाकर तुम्‍हे मि‍टटी की वो महक कर देते हैं जो हर बूंद पर बरबस नाक में घुस ही जाती है। बरसात की वो बूंद जो सि‍मटी पड़ी है, तुम्‍हारे बहने पर बहती दि‍खती काइयों की तरह अपार में हि‍लती तो दि‍खती है। वही तो अपार होता है जि‍सके बीच गति है। जि‍सके बीच समग्र समयांतर है जो खुद के फासलों को खाते चबाते है। तुम्‍हारी गति की शांति मैं कैसे महसूस करूं जबकि मैं पानी के बाहर बैठ तुमको ताकता हूं। तुम्‍हारी शांत क्‍लांत अवस्‍थाओं को मैं कैसे महसूस करूं जबकि मैं उन सबसे बाहर हूं।
आदमी झूठ बोलना चाहता था। आदमी अपने आस पास की तरह होना चाहता था। आदमी पत्‍थरों को देख पत्‍थर तो पानी को देख पानी होना चाहता था। आधारभूत समस्‍या उसके खुद आदमी हो जाने की थी। भूत की समस्‍या उसके आदमी का अंत कर देने की थी और जो कुछ भी नहीं था, वो एकमात्र वो आदि था जि‍सके बीच का एक भी सि‍रा आदमी के हाथ न आ पाया था।
ये बीच का सि‍रा ही तो है जो बीच में हाथ आ जाए तो आदि और अंत दोनों ही सध जाते हैं। सधने के लि‍ए जो होना होता है औरत बखूबी जानती थी। सध पाने के लि‍ए कि‍तना औरत होना होता है, आदमी ने भी सब का सब शुरू से ही पढ़ रखा था। सधी सीधी रेखा पर औरत चलती चली जाती थी और प्रस्‍थान बिंदु पर हि‍लता आदमी उसे जाता देख उसका औरत होना सीखने की व्‍यर्थ कोशि‍श करता रहता। आदमी सुस्‍थि‍र हि‍लन में स्‍वयं को गति‍मान समझ गुनगुनाता था। औरत सधी गति से सीधे चलती जाती थी।

Sunday, July 19, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 14

फि‍र वही। फि‍र से वही सपना। बदलता भी नहीं, रुकता, संभलता या थोड़ी दूर कहीं टहलता भी नहीं। आता है तो आता रहता है, बार बार। एक ही वक्‍त में कई खि‍ड़कि‍यां, कई रोशनदानों से सीधा घुसा चला आता। साथ में इतना उजाला लाता कि गहरी नींद में भी नींद खुल जाए। आदमी परेशान था। हर रोज बगैर कि‍सी इजाजत या मुरव्‍वत के ये सपना उसे लगातार आता जा रहा था। एक ही चीज बार बार दि‍खती थी। हर बार नींद तोड़कर जाती थी। कि‍सी तरह का नशा हो, थकान हो, मरन हो लेकि‍न सपना था कि पीछा ही नहीं छोड़ता था। बार बार इसका आना अभी तक आदत नहीं बन पाया था। वैसे आदमी इसके आने के हरएक रास्‍ते से पूरी तरह वाकि‍फ था। हर रात तीन से चार बार ये आता और आदमी पैर पर पैर मसलते हुए करवट बदलते हुए आधी नींद तक पहुंचता और फि‍र परेशान होकर आधी बची नींद भी पैताने से धीरे से मसल देता। असल में मसल तो सपना रहा था। नींद को या आदमी को, ये भी आदमी अच्‍छी तरह से जानता था। 

सपना असल में सपना ही था। सबकुछ उसमें उड़ता था। घास, पत्‍ति‍यां, कपड़े, दुपट्टे, रूमाल, टोपि‍यां, आवाजें, झंडे, कुर्सियां, कंप्‍यूटर, माउस, ब्राउजर, बाल, खुशबू, उजाला, धूप... सबकुछ उड़ता था और आकर आदमी के चेहरे पर दस्‍तक देता रहता, अक्‍सर तो थपेड़े लगाता रहता। हर दस्‍तक पर वही बेचैनी, हर थप्‍पड़ पर वही बेहोशी और हर अंधेरे में वही खुशबू। एक आवाज सुनाई देती जो 'हूं' से ज्‍यादा न होती, पर होती तो दो तीन बार होती। कभी उड़ान ज्‍यादा गहरी होती तो कभी आवाज भारी होती जाती। कभी बाल चेहरे पर आए पसीने से चि‍पक जाते तो कभी उड़कर खुशबू फैलाते। सपने की वो खुशबू आदमी को नींद के उसी ढलान पर लाती, जहां से वो न फि‍सलना चाहकर भी फि‍सलकर गि‍र पड़ता। हर बार वही आवाज, हर बार वही दस्‍तक, हर बार वही बेचैनी और बेहोशी, हर बार वही खुशबू। आदमी जानता था कि खुशबुएं कैसे बदलती हैं, दस्‍तकों की आवाज कैसे कम होती है, बेचैनी और बेहोशी कैसे खपती हैं और... और सपने कैसे बदलते हैं। 

आदमी कि‍तना कुछ तो जानता है जो औरत बताती रहती थी। न जाने क्‍या क्‍या... वो बातें उसके सपने में नहीं आतीं।

Monday, July 13, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 13

नि‍शान खो जाएंगे, बातें बह जाएंगी, रातें कट जाएंगी, दि‍न फि‍सलते रहेंगे, फूल सूखते रहेंगे और पेड़ भी, नदी बहती रहेगी और पानी भी ठहरकर सड़ता रहेगा, दि‍शाएं भी बदलती रहेंगी, दशाओं का कोई नामलेवा न होगा, फि‍र भी...

फि‍र भी आदमी होगा और औरत भी। वहीं पर रुके, ठहरे, ठि‍ठके, सि‍हरे, डरे-सहमे से ही, लेकि‍न होंगे और होते रहेंगे। आवेग अनायास ही नहीं होगा, उसके सायास कारण उसके होने का आधार होंगे और वो कि‍सी के होने न होने के इंतजार में न होंगे। औरत खोती जाएगी और बहती भी, आदमी डूबता और चुप होता जाएगा। समय के न तो उनमें कोई घाव होंगे न ही खरोंचों के कोई दूसरे नि‍शान। दोनों नहीं भी रहेंगे, तो भी ऐसा कुछ बचा नहीं रहेगा जो दोनों के होने या न होने की कहानी बयान करेगा। दोनों खो भी जाएंगे तो भी उन्‍हें न तो कोई खोजने वाला होगा और न ही कि‍सी की उन्‍हें खोजने में कोई दि‍लचस्‍पी होगी। दि‍लचस्‍पी जैसी कि‍सी चीज या भावना से दोनों पहले ही खुद को दूर कर चुकेंगे। इतनी दूर कि जहां क्षि‍ति‍ज भी न पहुंचता हो, जहां अंधेरा भी न पसर पाता हो, जहां उजाले की बरसात कि‍सी के सपने में भी न आती हो। उस दूरी पर भी दोनों दूर नहीं होंगे, न हो पाएंगे क्‍योंकि ये शाप ही ऐसा है कि जहां सपने न आते हों, वहां पर भी ये शाप सपनों की चौखट डांककर उन दोनों में पैवस्‍त होगा, अंदर तक... उतने ही अंदर तक, जि‍तनी कि दूरी होगी।

Saturday, June 20, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 12

औरत अंधेरे की नहीं थी। औरत पूरी तरह से उजाले की भी नहीं हो पाई थी। औरत शाम में वि‍चरती, सुबह के धुंधलके में कुछ खोजती थी। दोपहर में छुप जाती थी और रात में न सोते हुए भी सो जाती थी। जगह जगह से नि‍कलते तार उसे कि‍सी भी जगह नहीं जोड़ते थे। जगह जगह से लगी चोटें उसे कहीं से भी नहीं तोड़ती थीं। ढहने को तैयार अपनी ढलान पर वो समझौता करना तो चाहती थी लेकि‍न हर बार डरकर पहाड़ की दूसरी चोटी पर दूसरे के साथ बैठने की इच्‍छा लि‍ए अकेली अपनी इच्‍छाओं को दमि‍त करती, शायद कुंठि‍त भी करती रहती थी। दमि‍त इच्‍छाओं की कुंठा वो आदमी पर नि‍कालती थी, उसके कसकर पकड़कर दबाती थी, मर्दाना आवाज लगाती थी, मर्द की तरह हाथ या शायद अक्‍सर आदमी की उंगली ही पकड़कर उसे सड़क पार कराती थी। आदमी नहीं समझ पाता था कि असल में हि‍ल कौन रहा है या हि‍ला हुआ कौन है। सड़क की गाड़ि‍यां हि‍ल रही हैं या लोगों के हाथ के झंडे या गोलचक्‍कर के चक्‍कर या जेब्रा क्रॉसिंग या नीचे तहखाने को जाती सीढ़ि‍यां या तहखाने से ऊपर आती सीढ़ि‍यां। इस सुस्‍थि‍र हि‍लन को अपनी उंगलि‍यों में उतारकर आदमी उस औरत की मजबूत पकड़ में जकड़ा घि‍सटता चला जाता था।
* लाओ रे, तनी चावल पछोर दी।
न जाने कहां से ये बात आदमी में गूंज जाती और आदमी पछोरे जाने पछोरे जाने के बाद सूप से उलट भूसी के साथ सुलगने से डर औरत से गुहार लगाता कि एक बार फि‍र से वो उसे पकड़ ले। औरत बीच की चीजें हटा देती और उसे पकड़ती तो दोनों चुपचाप एक दूसरे में जकड़े कुछ भी न करते, सि‍वाय कभी कभी हि‍लने के... 

Friday, June 19, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 11

आदमी कुछ इधर से जोड़ लेता था तो कुछ थोड़ी दूर जाकर उधर से जोड़ लेता था। दमि‍त इच्‍छाओं और अवश्‍यंभावी आकांक्षाओं के दोहरे बोझ पर दो जोड़ों का बोझ था कि लगातार उसकी कमर की हड्डि‍यों में वो वि‍चलन अनचाही चि‍लकन के साथ कुछ यूं उभारता था, आदमी सब जोड़ा हुआ तोड़कर चिंदी-चिंदी बि‍खेर देता था। कुछ था, कहीं कुछ जरूर था जो टूटने को तैयार नहीं था, जो फूटने को और फूटकर बहने को भी तैयार नहीं होता था। आदमी सवार था रेत के उस वक्‍ती घोड़े पर जो अपनी पहली हि‍नहि‍नाहट पर ही बि‍खर जाने का आदती और कि‍स्‍मती, दोनों ही था। हाथ में दबी पेन हो या कान में लगा हेडफोन या फि‍र एक पैर का सही सलामत बच गया जूता, सबके मुंह नि‍कल आए थे, जीभ और दांत भी। आदमी डरता था, फि‍र भी इनके साथ ही रहता था, फि‍र डरता था और फि‍र साथ रहता था। अंदर के तय बेकार के समय में वो न तो फि‍सलता था, न घि‍सटता था, बस उन सबको अपने आसपास बि‍खेरकर यूं ही खि‍ड़की से झांका करता, झांका करता कि शायद वो बंद खि‍ड़की कभी खुल जाए और उसके वो अरमान पूरी तरह से पूरे हो जाएं जो बंद खि‍ड़की को देख देख उसने मजबूरी में अधूरे छोड़ दि‍ए या अधूरे छोड़ने को मजबूर कर दि‍या गया। ये कोई सवाल नहीं कि क्‍यों मजबूर कर दि‍या गया और ये कोई जवाब भी नहीं कि मजबूर कर दि‍या गया। बंद खि‍ड़की बड़ी हद सवाल ही पैदा कर सकती है, जवाब तो नहीं ही दे सकती। खि‍ड़की बंद है। आदमी भी और संगीत तो पूरी तरह से। 

Monday, March 30, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 10 (फुटकर नोट्स)


1-
हमने नशा नहीं कि‍या था, पर नशे में थे। उनने नशा भी कि‍या था और ज्‍यादा नशा करने के उनके पास ज्‍यादा कारण थे। वो शोर मचा रहे थे, संगीत बजा रहे थे। शोर और संगीत हममें भी खूब मच और बज रहा था। वो दि‍ल्‍ली जीत लेने पर आह्लादि‍त थे, हम खुद को हार जाने पर... हमारे सामने ये ति‍रंगा मंद हवा में अलट पलट रहा था। और भी बहुत कुछ अलट पलट रहा था। शोर था, संगीत था, नशा था और ति‍रंगा भी था। बस ये हवा ही कुछ धीमी हो चली थी...। अब शायद कई लोगों के लि‍ए सांसों को लंबा करके छोड़ने का वक्‍त आ गया है।
2-
कॉफी लेंगे सर। पानीदार प्‍लास्‍टि‍क की ट्रे में थर्माकोल के ग्‍लास में फूली हुई कॉफी दि‍खाकर उसने पूछा। हमने कहा नहीं। उसने कहा केजरीवाल की कॉफी है। हमने कहा नहीं, हम चाय पीते हैं। उसने कहा चाय का जमाना गया, अब आपका वक्‍त है। हमने फि‍र भी कहा कि नहीं, हमने चाय ही पीनी है। वो हमारे बीच कॉफी का ट्रे ढक्‍कन लगवाकर रखकर चाय लाने चला गया। हमने कॉफी के कपों के साथ दूरि‍यां बरतकर रखीं। ति‍रंगा अब भी लहराकर फैलने की पुरजोर कोशि‍श कर रहा था। कॉफी के पानीदार प्‍लास्‍टि‍क के ढक्‍कन पर पांच साल केजरीवाल का स्‍टीकर लगा था। हम आज शाम ही आइंदा के सालों का वायदा ले लेना चाह रहे थे... वहां साल लि‍मि‍टेड थे, यहां अनलि‍मि‍टेड। पॉलि‍टि‍क्‍स अभी भी लि‍मि‍टेशंस तोड़ देती है।
3-
हम दया करते हैं तो प्रेम नहीं कर सकते। उसने कहा। हम प्रेम करते होंगे तो शायद दया नहीं कर सकते। मैने सोचा। इस बार हवा जरा सी तेज चली और तिरंगा उड़कर आधा हो गया। उसने कहा- यू सक्‍स। उधर संगीत और नारों का शोर दोबाला हो गया। इधर संगीत का वॉल्‍यूम धीमा होता गया और शोर बढ़ता गया। थककर कई सारे चरसी मैदान में औंधे पड़े थे और हम एक बाउंड़ी वॉल पर। हम सब थके थे। हम सब सीमाओं में बंधे थे। हम सब बंधन तोड़ने की लंबे अर्से से कोशि‍श कर रहे थे। हम सब बंधन तोड़ चुके थे... या फि‍र हमें बस लग रहा था कि हम सबकुछ तोड़ चुके हैं।
4-
हम जीत चुके हैं, इसलि‍ए बाद में बात करेंगे। आप ने कहा। हम हारकर थक चुके हैं, इसलि‍ए बात नहीं करेंगे। उसने कहा। हमारे पास बहुत सारे अधूरे काम हैं। आप ने कहा। हमारे पास बहुत से अधूरे काम हैं। उसने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍ए। आप ने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍एं। उसने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। आप ने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। उसने कहा। पालि‍का बाजार की उन अचानक तंग होती सीढ़ि‍यां में अपना पैर कि‍सी की एड़ि‍यों तले दबवाते मैं सोचता रहा... मैं कहां कि‍सके तले इस वक्‍त होउंगा।
5-
कल खुशी की रात थी। कि‍सी को नींद नहीं आई। आज वि‍जय की रात है, जीतने वाले चैन की नींद सोएंगे। हारने वालों की बैटरी बार बार लो होगी, फि‍र भी वो उसे चार्ज नहीं करेंगे। बैटरी चार्ज करने के बावजूद हारने वालों को जीतने में कोई मदद नहीं मि‍लने की, भले ही बैटरी फुल चार्ज हो। एफबी पर फोटो मैसेज दि‍खा- जीत हार में बस हार जीत जि‍तना ही फर्क होता है।

Sunday, March 29, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-9

तुम परेशान होगे, बार बार तुम्‍हारा मन कभी कुछ करने को तो कभी कुछ कहने को कचोटेगा, लेकि‍न कह नहीं पाओगे। सांसें अंदर जाएंगी तो सवाल के साथ जाएंगी कि जा क्‍यों रहीं हैं और जाने से पहले रुक क्‍यों न गईं, इन दो सवालों के साथ-साथ तुम्‍हारी सांसें ही तुम्‍हारी सजा होंगी। हर सुबह तुमसे अपना हि‍साब लि‍खवाएगी, पलक का हर झपकना तुमसे पानी की दरख्‍वास्‍त करेगा, लेकि‍न न तो तुम अपना हि‍साब पूरा कर पाओगे और न ही पानी की कोई दरख्‍वास्‍त। तुम अपना सबकुछ मुझे बताना चाहोगे, फि‍र भी न बता पाओगे और अगर बताओगे, तो भी मैं उनमें से कोई भी बात नहीं सुनने वाली, समझना तो उतनी दूर की बात है जि‍तना तुम्‍हारा हि‍साब और दरख्‍वास्‍त के नजदीक जाकर उन्‍हें वैसे सहलाने की हि‍म्‍मत करना। तुम अक्‍सर चौंकोगे, अपने चौंकने को अपनी नि‍यति न मानने की जि‍द में बार बार फि‍र से वैसे ही चौंकना चाहोगे और कभी कभार शायद तुम्‍हारा चाहना पूरा हो भी जाए, लेकि‍न याद रखना, तुम्‍हारा चाहने की हद सिर्फ तुम्‍हारे चौंकने तक ही खुदी हुई है। और हां, ये दरार इतनी चौड़ी है कि इ‍समें मैं अपने उसी मुखौटे के साथ अंदर तक पैवस्‍त हूं, जि‍से पार करने की हि‍म्‍मत तुम्‍हारे अंदर के मैं में तो नहीं है, नहीं ही है।

मुझे पता है कि मेरा मन कचोटेगा, लेकि‍न आखि‍र है तो मेरा ही मन। सीधी सच्‍ची बात ये है कि मेरे मन में क्‍या चल रहा है, इससे वाकई दुनि‍या को या फि‍र तुम्‍हें भी कोई खास मतलब नहीं है, अगर होगा भी तो मैं ये अच्‍छी तरह से जानता हूं कि तुम तो मुझे कभी नहीं बताओगी और दुनि‍या अव्‍वल तो आदतन नहीं बताएगी और अक्‍सर इरादतन नहीं। सांसों का सवाल भी कोई नया नहीं है और नया न होने के बावजूद बस इस सजा को कुछ देर के लि‍ए भूलने की कोशि‍श करने में न तो कोई बेजा बात है और न कोई बेइमानी, इसलि‍ए सजा को अगर कुछ देर के लि‍ए भी भूला रह गया तो ये मेरी अपनी सांसों के साथ कुछ गनीमत होगी, जि‍सका शायद सि‍वाय मेरे और कि‍सी से कुछ लेना देना नहीं है। मुझे ये भी पता है कि दुश्‍वारि‍यों की दरख्‍वास्‍त बड़े ही कमजोर पन्‍नों और बड़ी ही फीकी स्‍याही से लि‍खी होती है। पन्‍ना हाथ में लेते ही चि‍टककर टूट जाता है और हर्फ बेपढ़े ही उसी पन्‍ने में गीले होकर जज्‍ब हो जाते हैं। मैं ये भी जानता हूं कि मेरे चौंकने से न तो दुनि‍या चौंकती है, न तुम चौंकती हो और तुम्‍हारा वो मुखौटा तो बि‍लकुल भी नहीं चौंकता जो चौंकने से लेकर ऊपर से नीचे तक की सारी दरख्‍वास्‍तों को सांसों से जुड़ी एक तफरीह मानता है। 

Saturday, March 14, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-8

और फि‍र ऐसा वक्‍त आया जब हर गलत पर दोनों एक दूसरे की दाद देने लगे। आदमी ने सबसे पहले गलत बोलना शुरू कि‍या और औरत ने सबसे पहले उस गलत पर वाह की दाद दी। आदमी मुसलसल गलत बयान करता जाता था। भाषा और उसकी खूबसूरती को पूरी दुर्दांतता से नष्‍ट करता जाता था और जब जब जि‍तना भी क्रूर हुआ, हर क्रूरता के स्‍वागत में एक दाद बड़ी खामोशी से कि‍सी पुल से उसे नि‍हारते सबसे ऊंचे सुर में सराहती सहलाती हुई मि‍ली। दोनों के हाथों में बस औरत की ही पकड़ मजबूत थी जो पूरे जोर के साथ हथेलि‍यों को पकड़ती थी, दबाती थी और तफरीहन एक अंगूठे से दो उंगलि‍यों के बीच सहलाती थी। मुख्‍तसर में अगर इसे समेट दें तो दोनों एक दूसरे के साथ बेहद क्रूर होने की कोशि‍श करने की जद्दोजहद में हर गलत को दाद देते देते कुछ इस कदर मुलायम होते जा रहे थे कि उनका आने वाला वक्‍त चि‍ल्‍ला चि‍ल्‍लाकर उनके न हो पाने की बात बता रहा था, पर दाद के शोर में और अंगूठे के जोर में न तो वो सुनाई दे पा रहा था और न ही उसका अहसास हो पा रहा था। ये वो वक्‍त था जब दोनों उस हरी बेंच पर बैठकर हवाओं के चलने और सामने लगे झंडे का लहराकर और बलखाकर भी उड़ने का इंतजार करते हुए एक दूसरे से हवाओं के न चलने की शि‍कायत कि‍या करते थे, लेकि‍न उनकी लाख शि‍कायतों के बीच गलति‍यों का एक बीज फूटकर अपनी हरी पत्‍ति‍यां बाहर फेंक चुका था और हर पत्‍ती के साथ एक मनमोहना फूल जानबूझकर नजरअंदाज की जाने वाली गलति‍यों के साथ खि‍ल रहा था। उन्‍हें बि‍लकुल भी इसकी परवाह नहीं थी और जो होनी भी नहीं थी क्‍योंकि जो हो रहा था वो सबकुछ अपने आप बस होता ही जा रहा था। उसे होने से रोकना चाहते हुए भी, जि‍समें कि‍सी को कुछ साबि‍त नहीं करना था या कि‍सी को उसे होने के बारे में सोचना भी नहीं था, वो दोनों कुछ ऐसे लम्‍हों की बुनावट में लगे थे, जि‍नकी सलाइयों ने पहले के आठ फंदे ही इस कदर उलझा दि‍ए कि उन्‍हें सुलझाते सुलझाते दोनों को कब ये लगने लगा कि दोनों पुराने हो गए हैं, पता नही नहीं चला। इस पता न चलने या पता न चलने देने की जबरदस्‍ती ने दोनों को कब उस बेंच से उठाकर हरे मैदान में बैठा दि‍या, कब दोनों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जि‍द में बाजार ने उन्‍हें हाथोहाथ लि‍या, इसका जि‍क्र बेकार है। बल्‍कि बेकार वो सबकुछ ही है, जो है और जो होने से बचा हुआ है, वो भी। 

Thursday, March 12, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 7

आखि‍रकार उसकी जिंदगी में एक ऐसा वक्‍त आया, जब उसे लगने लगा कि इस दुनि‍या में जो कुछ भी बाकी बचा रह गया है, वह सबकुछ एकसाथ मि‍लकर उसके सि‍र पर एक दि‍न कुछ यूं गि‍रेगा कि उसकी और उस जहाज की तबाही में कोई खास अंतर न रह जाएगा, जो एक दि‍न कहीं जाने को तो नि‍कला था, लेकि‍न उसका आखि‍री पुर्जा भी कि‍नारों तक पहुंचने में सि‍रे से नाकामयाब रहा। उसे लगने लगा कि सारा दोष उसकी शक्‍ल का है, उसे यकीन होने लगा कि उसके बालों से सि‍तारे बार बार उलझ जाते हैं और उसे ये भी लगने लगा कि अगर इस शक्‍ल को जल्‍द हटाया न गया तो दुनि‍या के उस बोझ से उसे मुक्‍ति नहीं मि‍लने वाली। मुक्‍ति की उसने नई नई परि‍भाषाएं गढ़नी शुरू कर दीं जि‍समें से एक उस मासूम के चेहरे से भी होकर गुजरती थी जि‍सकी मासूमि‍यत को वो ढाल बनाकर दुनि‍या के आगे आकर खड़ी होती थी, बगैर ये सोचे कि मासूम चीजें ढाल नहीं हुआ करतीं। कुछ ऐसी भी परि‍भाषाएं बनीं जो अपनी जगह ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थीं पर इतनी लि‍जलि‍जी थीं कि दूसरों पर वो रोज ब रोज चि‍पकाई जाने लगीं। वो सोचना चाहती थी या नहीं, ये बात ज्‍यादा सोचने की नहीं, असल बात ये है कि वो करती क्‍या थी और उसका दुनि‍या पर फर्क क्‍या पड़ता था। खुद को छुपाने और बेखुद को दि‍खाने के अलावा भी दुनि‍या थी कि बहुत कुछ देखना चाहती थी और कमोबेश देख भी लेती थी। औरत के मन की रातें तक दुनि‍या के सामने कुछ यूं उजली बि‍खरी पड़ी थीं ज्‍यूं कि खुले काले आसमान में सारे सि‍तारे छि‍तराए रहते हैं। उसके भीतर का आदमी जि‍स रास्‍ते पर जा रहा था, गि‍रते पड़ते और अक्‍सर तो लड़ते लड़ते वो भी उसी रास्‍ते पर कदम बढ़ा रही थी जो आगे से बंद था, जि‍स रास्‍ते से आगे जाने का सि‍लसि‍ला शुरू होने के साथ ही अपने अंत की भवि‍ष्‍यवाणी लेकर उस औरत की मुट्ठी में बंद था। लेकि‍न ये औरत ही थी जो मुट्ठी खोलने को तैयार नहीं थी। आदमी था कि आगे बंद रास्‍ते की तरफ बढ़ा जा रहा था। औरत दूर से आदमी का पीछा कर रही थी, बड़बड़ाते, गालि‍यां देते और बार बार मुखौटे बदल बदलकर।  

Wednesday, March 11, 2015

पीर उठे जो जावैं राम, घाव रि‍से जो आवैं राम

पीर उठे जो जावैं राम
घाव रि‍से जो आवैं राम
चोट के ई का चक्‍कर है
हमका भी समझावैं राम।

कनक बि‍हारी के होय आरती
सबका सुबे जगावैं राम
हम तो कबसे जागा बैइठा
हमका भी त सोवावैं राम।

काट करेजवा देहे हो भइया
बकि‍या त अब बचावैं राम
गुड़ के डली ससुराल चली
दि‍ल त अब धड़कावैं राम।

धोय रगड़ के साफ करी हम
छि‍न छि‍न गंद मचावैं राम
हर सुफेद मा करि‍या धब्‍बा
यहि बि‍धि देस देखावैं राम।

मना करे जौ मान जांय यै
कइसे फि‍र कहि‍लावैं राम
कवि कै मन कब स्‍थि‍र होए
फि‍रि-फि‍रि चंवर डोलावैं राम। 

Tuesday, March 3, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-6

आदमी का मन है कि मन से बाहर बस यूं ही नि‍कल जाता है, पर मन सी बात कहीं पाता है-नहीं पाता है इसकी खबर लि‍ए बगैर ही मन से बाहर नि‍कलता और अक्‍सर तो बहता चला जाता है। औरत का मन है कि मन ही मन सि‍मटा और बगलों में चि‍पका कभी कभी सड़कों पर बेतरतीब घि‍सटता चला जाता है। आदमी फूटना चाहता है और औरत महसूस करना चाहती है। आदमी मन में बात करते करते बीत जाना चाहता है, औरत एक मजबूत जकड़न में जकड़े जकड़े रीतती जाती है। आदमी सामने लगे झंडे की बात करता है, औरत उसे उड़ाने वाली हवा की। आदमी को भूख भी लगी है, औरत को चाय की इच्‍छा है। आदमी रोना चाहकर भी नहीं रो सकता, औरत न चाहते हुए भी बार बार रो देती है। आदमी का मन, मन से जैसे ही बाहर आना चाहता है, औरत का मन झट से कहीं छुप जाता है। इस बीच हवा थोड़ी सी तेज चलती है, आदमी जैकेट पहन लेता है। औरत एक और वादा चाहती है, आदमी मन ही मन मुस्‍कुरा देता है। आदमी सपने देखता है, औरत कहती है कि वो सपनों से घबराती है क्‍योंकि उसे अकेले मरने के सपने आते हैं और यकीनन ये एक सार्वभौम सपना होगा जो ति‍रछी नजरों से नहीं देखा जाता होगा, जो बेइमानी के साथ कभी न बरता गया होगा। एक दिन आदमी ने औरत को एक सपना बताया। इसमें न आप था, न तुम था। जो था वो बस एक शायद था। ठीक दूसरे दि‍न औरत ने भी वही सपना देखा। दोनों अपने अपने सपनों में घि‍सट रहे थे, लोग दोनों को दोनों तरफ से खींच खींचकर आधा कर देना चाहते थे। पहले से ही दोनों की आधी जान और पूरा मन सपनों में ही जज्‍ब हो रहे थे, उसपर ये शायद के बाद की दुनि‍या, जि‍से कोई भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहा था। सपनों में घसीटे जाने से ऊबकर दोनों ने एक दूसरे पर शर्तें लादने का नया दौर शुरू कर दि‍या। असल में ये दौर नहीं बल्‍कि शुरुआती मुफलि‍सी का मन में दायर वो मुकदमा था जि‍समें न तो मुद्दई था और न गवाह। न वकील था और न ही कोई मुंशी। दोनों जज थे और वो भी दोनों की तरफ पीठ कि‍ए हुए। कैसी अजीब पीठ थी उस मुकदमे की जि‍सके जज ही शायद की दुनि‍या में आकर एक दूसरे पर शर्त दर शर्त दुश्‍मन बने जाते थे। आदमी हंसता है कि वि‍दा का गीत दोनों ने शुरुआत से ही पढ़ा था। आंगन में बच्‍चा खि‍ला लेने की ख्‍वाहि‍श से लेकर जांघों की मछलि‍यों को एक साथ बरता था।
(जारी...)

मि‍लेगा तो देखेंगे-इंट्रो- विपुमेले में हि‍ले हुए को कैसे देखें

हि‍लते-हि‍लते शुरू होता है। क्‍या मजाल दि‍न कि‍सी भी दि‍न चैन से शुरू हो। कैसी उम्‍मीद भरी नजरों से देखता हूं, मायूसि‍यों के डूबे समंदर में बेहयाई से इस हि‍लन को थामकर सुस्‍थि‍रता की तरकीब हासि‍ल करने को हाथ पैर पटकता हूं, मगर दि‍न की तो कोई क्‍या कहे, हरामखोर डोंगल तक जो अपनी जगह सुस्‍थि‍र रहे, कनेक्‍ट होता नहीं कि डि‍स्‍कनेक्‍ट होता हूं। ओह... कैसा हिलता हुआ डोंगल है और कैसे हि‍ले हुए दि‍न। बेवकूफ लोग क्‍या जानें, क्‍या हमारी हसरत थी, खूब थी कि हम भी तीन नई कि‍ताबों के कवर के साथ फोटो खिंचाएं। मगर क्‍या मजाल कि फोटो चैन से खिंच जाए, वह भी साली मि‍ली, तो हि‍ली हि‍ली। एक प्रेम था ठहरा हुआ, चल रहा सा, मगर आज खबर हुई कि वह भी अपनी जगह था हि‍ला-हि‍ला सा। सन्‍न हूं... यह कैसा दौर है? कैसा समय है? कैसे लोग हैं? और कैसा मैं हूं? इतने हैं फोटो लहरा रहे, क्‍या क्‍या हि‍ला रहे, फि‍र ऐसा क्‍यों है कि मैं ही हि‍ला हि‍ला हुआ हूं? दि‍खता हूं कभी कभी पुस्‍तक मेलों में खुद को, मगर वह सुस्‍थि‍र मैं नहीं, 'मेरा मैं' हि‍ला हुआ है।

मेरे महबूब तुम्‍हारा शुक्रि‍या कि तुमने ऐसा हि‍लाया।