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Monday, March 8, 2021

तोहरे कागज के टुकड़न कै, का करिहैं बतलाओ राम

 जौ तू मनई हौ असली तौ 

बात हमार ई लिहौ तू मान 

राम नाम पै लाखौं लुटावौ 

अइसे ना खुश होइहैं राम

चार आना या आठ आना

चाहे जेतना लगावौ दाम 

तोहरे कागज के टुकड़न कै

का करिहैं बतलाओ राम

राम प्रेम परतापी राजा 

के उनका दै पाए दान 

उनके नाम जे चंदा मांगै

ओकर देह कै दिहौ तू जाम।

राम रसायन निकला चंदा

 राम रसायन निकला चंदा 

राम नाम कै होय रहा धंधा 

राम राम कहिके गोहरावैं 

राम जौ निकरैं, चक्कू देखावैं

राम नाम कै लूट रही तब 

अब तौ राम का नोच उड़ावैं

राम नाम का कै दिहिन गंदा 

दिखैं गली मा तौ मारौ डंडा।

Sunday, March 1, 2020

कौन मरा है? किसका बेटा?

कौन मरा है
किसका बेटा
अभी यहीं था
पलंग पे लेटा
किसने थी
आवाज लगाई
किसने शामत
नियति बनाई
किसने मारा
पहला पत्थर
किसने ली
पहली अंगड़ाई
जांच करो भाई
जांच करो
किसने पहले
आग लगाई
मगर सुनो तो
हमको दे दो
बेटे की जो
लाश है आई
दे दो दे दो
जहां छुपाई
रोक के रखी
हमने रुलाई
रोना है अब
खून पर अपने
रोना है
सब जून पर अपने
रोना है
पी पीकर पानी
रोना है
जो छंटी जवानी
रोना है
क्यों ईंट उठाई
रोना है
अब लाश जलाई
रोना है
पहले नहीं सोचा
रोना है
लो भीगा अंगोछा
रोना है
कि तब क्यों बोले
रोना है
कि आ अब रो लें
रोना है
हर इक नारों पर
रोना है
दंगों के मारों पर
रोना है
क्यों आग लगाई
रोना है
क्यों बुझ ना पाई
रोना है
ये फेर जो आया
रोना है
सब घेर के आया
रोना है
अब उन आवाजों पर
रोना है
टूटे साजों पर
रोना है
सब रूठ चुका है
रोना है
सब टूट चुका है
होता सलामत
बच्चा अपना
पूरा करता
अपना सपना
मार पीट
दंगा फसाद में
बच्चा मरा
और मर गया सपना।

Saturday, September 28, 2019

मुसलमां हैं यूं बस खतावार हैं हम

व्हाटसएप्प पर एक बुजुर्ग इस लिखाई को सुनाते दिखे। पता किया तो सन 2017 में इनकी पहली रिकॉर्डिंग मिली, लेकिन नाम नहीं मिला। कुछ और पता किया तो पता चला कि शायद राहत इंदौरी साहब ने इसे लिखा हो सकता है, लेकिन कहीं भी इसकी स्क्रिप्ट नहीं मिली, इसलिए यह भी कन्फर्म नहीं कि इसे राहत इंदौरी ने ही लिखा है। बहरहाल, जिसने भी लिखा है, कमाल का लिखा है, कहीं गलती हो तो पहले से ही माफी दरकार है। आप भी मुलायजा फरमाएं, जब तक मोदी जी हैं, तब तक मौजूं है- 

हुकूमत के दिल से वफादार हैं हम,
इशारों पे चलने को तैयार हैं,
मुसीबत में फिर भी गिरफ्तार हैं हम,
मुसलमां हैं यूं बस खतावार हैं हम।

सजा मिल रही है अदावत से पहले,
समझते हैं बागी बगावत से पहले,
मुसलमां चीन और जापान में हैं,
यही कौम रूस और यूनान में है,
यही लोग यूरोप और सूडान में हैं,
जहां भी हैं ये अमन ओ अमान में हैं,
हर एक मुल्क में तो वफादार हैं हम,
मगर हिंद में सिर्फ गद्दार हैं हम।

हमें रोज धमकी भी दी जा रही है,
घरों में तलाशी भी ली जा रही है,
बिला वजह सख्ती भी की जा रही है,
अदालत यहां से उठी जा रही है।

जो मासूम थे वो तो मुजरिम बने हैं,
जो बदफितना थे आज हाकिम बने हैं,
कौन सिर में हमें ये रहने न देंगे,
हमें दर्द अपना ये कहने न देंगे,
गम ओ रंज सहिये तो सहने न देंगे,
सितम है कि आंसू भी बहने न देंगे।

जुंबा बंदियां हैं नजरबंदियां हैं,
हमारे लिए ही सारी पाबंदियां हैं,
अब उर्दू जुबां भी मिटानी पड़ेगी,
कि बच्चों को हिंदी पढ़ानी पड़ेगी,
यहां सबको चंदी रखानी पड़ेगी,
रहोगे तो शुद्धि करानी पड़ेगी।

वफादार होने का मेयार ये है,
यकीं फिर भी आ जाए दुश्वार ये है,
तकाजा है अपनी जमाअत को छोड़ो,
मुसलमानों की तुम कयादत को छोड़ो,
नहीं तो चले जाओ भारत को छोड़ो,
यही नजरिया है यही जेहनियत है,
इसी का यहां नाम जम्हूरियत है।

गिराते हो तुम मस्जिदों को गिराओ,
मिटाते हो तुम मकबरों को मिटाओ,
बहाते हो अगर खूं ये नाहक बहाओ,
मगर ये समझकर जरा जुल्म ढहाओ,
जालिम का लबरेज जब जाम होगा,
तो हिटलर और टीटो सा अंजाम होगा।

हमें मुल्क से है भगाने की ख्वाहिश,
हमें दहर से है मिटाने की ख्वाहिश,
तो सुन लें जिन्हें है मिटाने की ख्वाहिश,
तो हमको भी है सर कटाने की ख्वाहिश।

कटेगा सर तो ये मजमून होगा,
हिमालय से शिलांग तक खून होगा,
बिहार और यूपी में हम कुछ न बोले,
हुआ जुल्म देहली में हम कुछ न बोले,
किया कत्ल गाड़ी में हम कुछ न बोले,
घरों में घुसाए तो हम कुछ न बोले।

जालिम अगर यूं ही होते रहेंगे,
तो क्या अहले ईमां सोते रहेंगे?
अलग होके बरतानिया देखता है,
हरएक कौम का पेशवा देखता है,
जमाना हरेक माजरा देखता है,
कोई देखे न देखे खुदा देखता है,
करेगा जो जुल्म यूं आजाद होकर,
खुद ही मिट जाएगा वो बरबाद होकर।

Tuesday, April 16, 2019

पतझड़ से पहले और बाद की एक बकवास



सबसे पहले शहतूत छोड़ता है अपनी पत्तियां 
और लगभग एक साथ ही हो जाता है नंगा 
डालें, टहनियां सब की सब नंगी 
हवा चलती है तो सर्र से गुजर जाती है 
एक भी टहनी नहीं हिलती शहतूत की 
फिर आती है बारी नीम की 
शहतूत के बाद नीम को नंगा होते देखना 
इतना आसान नहीं है 
वो एक साथ नंगा भी नहीं होता 
धीमे-धीमे मरता है नीम 
और रोज हमें पता चलता है कि 
नीम कितनी तकलीफ में है 
जैसे कि ट्रॉमा सेंटर में बेहोश पड़ा कोई मरीज 
जिसकी रुक-रुक कर सांस चलती है 
जैसे सड़क पर हुआ कोई एक्सीडेंट 
जिसमें भीड़ तो होती है, बस जान नहीं होती 
एक हिस्सा छोड़ने के बाद 
दूसरा हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं होता नीम
लेकिन मौसम उसे नंगा करके ही छोड़ता है। 
जब शहतूत पकने लगती है 
और नीम में आते हैं नए फूल 
तो चलाचली की बेला में होता है बेल 
चार छह बच गए सूखे बेल लटकाए यह पेड़ 
हर हरे के बीच ठूंठ सा खड़ा रहता है 
जैसे कोई बूढ़ा जर्जर खेलता हो बच्चों के साथ 
जैसे समुद्र मे कोई तालाब सा हो 
या फिर बहती नदी के बगल ठहरा हुआ हरा पानी
फिर एक दिन बूंदे बरसती हैं
और बढ़ता है नदी में पानी 
और ले जाता है अपने साथ 
नीम, शहतूत और बेल को भी। 

Wednesday, December 12, 2018

एक रात की बेबात

रोज की तरह रात आ तो गई
लेकिन रोज की तरह गई नहीं
रात जमकर बवाल काटा
सालों पुरानी प्रेमिका से भिड़ा
दाहिने गई तो दाहिने जाने पर चिल्लाया
बाएं गई तो बाएं जाने पर भी
चुप रही तो चुप्पी पर भड़का
बोली तो बोलने पर तड़का
दो सेकेंड में ब्रेकप करके दो घंटे बकवास की
फिर ठंड लगी
कंबल ओढ़ा, टोपी पहनी
और चला आया
उससे भी पुरानी प्रेमिका के पास
हर बार की तरह फिर से उसे
मीठा सा एक प्रपोज मारा
प्रेमिका मुदित हुई
उसकी आंखों से गरमी निकली
मैं तर हुआ
और तुरंत हस्तमैथुन करके
खुद को शांत किया
पुरानी प्रेमिका की तस्वीर बगल रखी
और तकिये से सटकर सो गया।
सुबह उठा
पैताने पर पहुंची तकिया सिराहने रखी
पहले पुरानी प्रेमिका की तस्वीर देखी
फिर लैपी पर एक्सवीडियोज लगाया
खुरचकर कमरे की दीवार पर एक निशान बनाया
और फ्रेश होकर हाथ धुलकर
फिर एक बार हस्तमैथुन किया
फिर भी ट्रैफिक की लाल बत्ती पर
सिर पर सवार थी पुरानी लाश
और पीछे सीना सटाकर बैठी रही
उससे भी पुरानी तकिया
कार वाले बूढ़े को गालियां दीं
भीख मांगने वाली बच्ची को भी
रिक्शे वाले को डांटा
फ्लाईओवर पर चलती ठंडी हवा को कोसा
तीन बार स्कूटी से गिरते गिरते बचा
कई बार पैदल चलते हुए लड़खड़ाया
भूख नहीं लगी, फिर भी जबरदस्ती
दो समोसे दो बाटी कोक के साथ गटके
दो डिब्बी सिगरेट फूंक गया
और धुंए में उड़ा दिया ब्रेकप के बाद याद आता रेशम
पी गया अपना सारा पानी
एक व्यंग लिखा, सामने बैठने वाली स्त्री की बुराई की
चिल्लाने वाले कर्मचारी पर पहली बार चिल्लाया
और पूरी कर दी नौकरी
रास्ते की सारी लाल बत्तियां तोड़ीं
और घर वापस आया
रात फिर से शुरू थी
और एक्सवीडियोज भी
तीन बजे रात तक चैट की हरी बत्ती जलाए रखी
मगर वो सोती रही
फिर फोन में सबको ब्लॉक मारा, उसे भी
नट्टी तक भरकर पी शराब
फेफड़ों में भरा ढेर सारा धुंआ
और तय किया कि
अब बाल कलर करा ही लूंगा,
बस बहुत हुआ।


Wednesday, September 19, 2018

कुछ भी नहीं कर पाया मैं

कुछ भी नहीं कर पाया मैं
दिन गुजरते रहे
कुछ करने के ख्यालों की तरह
रातें कटती रहीं
कुछ करने के सपनों की तरह
हर सुबह मैंने यही पाया
कि कुछ भी नहीं कर पाया मैं।

न ठीक से प्रेम कर पाया
और न ही ठीक से नफरत
न ठीक से नौकरी की
और न ही ठीक से पैसे कमाए
न ठीक से कभी घर चला पाया
न ही ठीक से कभी गाड़ी चलाई
जब जब चोट लगी, यही याद आया
कुछ भी नहीं कर पाया मैं।

ऐसी कोई रात नहीं गुजरी
कि मैं ठीक से सोया
ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा
कि मैं पूरा पूरा जागा
जागती आंखों से देखता रहा सपना
और बंद आंखों में भरता रहा रेत
न ठीक से घर का हो पाया
और न ठीक से बाहर का ही
जब भी कुछ करने का ख्याल आया
कुछ भी नहीं कर पाया मैं।

जैसी चलती है ये दुनिया
जैसी चलती है ये हवा
जैसे फूटती है धूप
जैसे घेरते हैं बादल
कितना तो चाहा
मैं भी चलूं, फूटूं और घेरूं
लेकिन ठीक से नहीं चाह पाया
जब भी बैठना चाहा
बेचैन होकर चलने लगा
जब भी चलना चाहा
हारकर बैठ गया।

दिन गुजरते रहे
रात कटती रही
शाम होती रही
सूरज चांद सब उगे
फूल खिलते रहे
और सबने अपना काम ठीक से किया
मगर मैं रहा कि
कुछ भी ठीक से नहीं किया
न ठीक से सांस ली
न ठीक से एक खबर लिखी
न ठीक से एक फोटो खींची
न ठीक से कोई कहानी बनाई
और तो और
ठीक से कुछ नहीं कर पाया
ये भी ठीक से नहीं बता पाया मैं। 

Tuesday, August 7, 2018

दिल छोटा औ नाक बड़ी, सिर पै चुरखी चढ़ी चढ़ी

दिल छोटा औ नाक बड़ी
सिर पै चुरखी चढ़ी चढ़ी
पढ़ पढ़ के भइन हैं चरखा
सूत न निकलै, चलै घड़ी।

अपनेन रंग से रंग मिलावें
जो न मिले तौ जंग लगावें
मेला देख के होवैं पागल
क्रांति क्रांति कहि मैला खावैं।

धान न चीन्हैं मान न चीन्हैं
भूंई पे ओलरा किसान न चीन्हैं
खर का समझैं स्विटजरलैंड
मौनी म पड़ा पिसान न चीन्हैं।

अइसेन बाटे दिल्ली वाले
दिल कै खोटे मन कै काले
लाल लाल के लगन लगावैं
हरियर पियर के फूंक उड़ावैं।

- रेजिंग राहुल, हैरिंग्टनगंज मिल्कीपुर - अवध बीज भंडार वाले

Tuesday, May 29, 2018

भाषाएं हार का प्रतीक हैं

1
बार बार हारता हूं
हर बार हारा हूं।
हारे हुए लोगों से भी
हार चुका हूं।

2
मैंने हारना सीखा है
यही मेरा सीखना है।
मौसम कोई भी हो
मुझे हारना आता है।

3
हारने में दुख है
दुख ही सत्य है।
अंतिम वह भी नहीं
और मैं फिर हारा।

4
हर किसी से ज्यादा
हार पहचानी है।
हारना जानने के लिए
भाषा जरूरी नहीं।

5
हारने के हिसाब में
मर्जी से भी हारा हूं।
पर खुद हारा
तो झूठा हारा।

6
बेस्वाद होती है असल हार
बिलकुल धूल की तरह
गरदन में जाते खंजर की तरह
रोज आते अखबार की तरह।

7
हारने के बाद
मैं बोलता हूं।
भाषाएं
हार का प्रतीक हैं।

8
कल फिर हारा था
कल फिर हारूंगा
हारते रहना ही
हमारा अतिक्रमण है।

9
लड़कर हारा
और बिना लड़े भी।
कुछ तय हो न हो
हार तय है।

10
जानता हूं कि
हारते हुए ही जीना है
हर बार हारते हुए
धूल बढ़ाते हुए।

A portrait from Rajgir (Bihar)

Saturday, March 31, 2018

आओ ऐसे आओ जैसे आए ही न थे

1
उस दुनिया में- 

जाओ ऐसे जाओ
जैसे जाता है जीवन
आओ ऐसे आओ
जैसे आती है हर सांस
जाओ ऐसे जाओ
जैसे जाता है हर सुख
आओ ऐसे आओ
जैसे आती है बरसात
जाओ ऐसे जाओ
जैसे जाती है हर रात
आओ ऐसे आओ
जैसे आता है हर दिन

2
इस दुनिया में- 

जाओ ऐसे जाओ
जैसे जाती है बिजली
आओ ऐसे आओ
जैसे आती है बिजली
जाओ ऐसे जाओ
जैसे जाता है पानी
आओ ऐसे आओ
जैसे आता है पानी
जाओ ऐसे जाओ
जैसे लगता है कर्फ्यू
आओ ऐसे आओ
जैसे लगता है कर्फ्यू

3
जाने किस दुनिया में-

जाओ ऐसे जाओ
फिर वापस ना आओ
आओ ऐसे आओ
आते ही फिर से जाओ
जाओ ऐसे जाओ
जैसे जाना होता है
आओ ऐसे आओ
जैसे जाना होता है
जाओ ऐसे जाओ
जैसे आए ही न थे
आओ ऐसे आओ
जैसे आए ही न थे।

कार्ड बांस बल्ली- सब डाली का है।

Wednesday, February 21, 2018

शब्द शब्द सांस कहो!

दूर कहो
पास कहो
रंग कहो
रास कहो।

गंध कहो
बास कहो
शब्द शब्द
सांस कहो।

नूर कहो
आस कहो
भरी भरी
टास कहो।

सूर कहो
दास कहो
तृप्ति कहो
प्यास कहो।

गीत कोई
आज कहो
मीत मेरे
साथ कहो।

Saturday, March 11, 2017

अब तौ फि‍र उधिरइहैं राम, सबका कचर के जइहैं राम

अब तौ फि‍र उधिरइहैं राम
सबका कचर के जइहैं राम
मार पीट दंगा फसाद मा
सबसे उप्‍पर रहि‍हैं राम।

दिसि दिगंत बि‍स भरिहैं राम
बिस-बिस से अब मरिहैं राम
जैदी भइया ना रोवा हो
मंदिर का ना तरिहैं राम।

लाल त कब से हारा बइठा
तब्‍बौ लाल हरइहैं राम
लाल लाल ही बोल बाल के
लालै लाल लगइहैं राम।

भय अंजोर अब भय कै भइया
चलत रेल फुंकवइहैं राम
पकड़ के दाढ़ी दै के गारी
फि‍र चक्‍कू चलवइहैं राम।

-रेजिंग राहुल, हैरिंग्‍टनगंज मिल्‍कीपुर वाले

Tuesday, May 3, 2016

घन गरजत नहीं घेरत बाटे

जि‍या जबर सन्‍यासी भइया
होइके आवा कासी भइया
घन गरजत नहीं घेरत बाटे
बरसत बाटे उदासी भइया।


राम दुआरे सब औघारे
परबत के हे बासी भइया
चार बूंद तनि एहर पठावा
नगरी पूर बा प्‍यासी भइया।


काम काज सब सून पड़ा बा
धूपौ सत्‍यानासी भइया
कवि‍कुल प्रेमी पांड़े काढ़ैं
अंखि‍यन लोर चुआसी भइया।

Friday, December 11, 2015

राम लला हम आएंगे, गली गली बौराएंगे

राम लला हम आएंगे
गली गली बौराएंगे
हग हग गंद मचाएंगे
नंग धड़ंग चि‍ल्‍लाएंगे
मंदि‍र वहीं बनाएंगे।

मलबा होगा चारों ओर
बलवा होगा चारों ओर
इंसा काटे जाएंगे
काट काट के गाएंगे
मंदि‍र वहीं बनाएंगे।

जब होगा काला अंधेरा
छोड़ेंगे हम अपना डेरा
घर घर आग लगाएंगे
खून से ही हम नहाएंगे
मंदि‍र वहीं बनाएंगे।

सरयू होगी लालो लाल
लूटपाट के सारा माल
फि‍र फि‍र वापस जाएंगे
लौटके फि‍र फि‍र आएंगे
मंदि‍र वहीं बनाएंगे।

-हाल-ए-अयोध्‍या

Tuesday, May 19, 2015

कवि, कुरता संभाल

कवि
कुरता संभाल
गि‍रती थी पहले भी
अब गि‍र गई तेरी
कवि‍ता की डाल

कवि
सुना कुछ हाल
अगली जेब में रखी
नेटवर्क में आते ही अपलोड करने वाली
कविता नि‍काल

कवि
और तेरे जंजाल
कुरता संभाल
पहन पीला या हरा भी
कबतक पहनेगा
कुरता लाल। 

शुभम श्री की कवि‍ता: रि‍सर्च स्‍कॉलरों का गीत

(बाबा नागार्जुन की पुरानी जूतियों का कोरस से प्रेरित होकर)
खेतिहर रिसर्चर
गोभी के सब फूल कट गए
भिंडी और बैंगन बोना है
आमों के मौसम में अबकी
फिर मचान पर सोना है
थीसिस लिखनी थी कॉर्बन पर, गाइड गया जापान
केमिस्ट्री का रिसर्च स्कॉलर,  हलक में अटके प्राण

कुक रिसर्चर
एक टीन गुझिया बनवाया
तीज हो गया पार
जितिया पर अब फेना घोलो
कैसा अत्याचार
हिस्ट्री में पीएचडी ब्याह आइएएस से करना था
गाइड के कीचन में देखा ये सुंदर सपना था

छोटे शहर का रिसर्चर
तीन बजे भोर से लगा है लाइन में
आठ बजे तत्काल कहां
फिजिक्स के रिसर्चर की
कहां, है मुक्ति कहां ?
गाइड का दामाद आ गया, टीसन से लाना है
बेटी का भी इस असाढ़ में गौना करवाना है

जुगाड़ू रिसर्चर
मेरिट का भंडार पड़ा है
माल रहे भरपूर
पचास हजार में थीसिस लिखाओ
माथा रक्खो कूल
राहर खूब हुआ अबकी सोयाबीन भी लगवाएंगे
ए जी, याद दिलाना कॉलेज तनखा लाने जाएंगे

धोखा खाया हुआ रिसर्चर
चार साल तक झोला ढोए
गाइड निकला धोखेबाज
हमसे पॉलीटिक्स कराके
अपना किया विभाग पर राज
नहीं परमानेंट चलो एड हॉक सेट हो लेंगे
वर्ना उस चूतिए के नाम पर ब्लाउज पीस बेचेंगे

कॉमरेड रिसर्चर
कम्युनिस्ट समझ कर इसके अंडर में आया था
साला संघी निकला सबको धोखे में डाला था
नवरात्रि का व्रत, माथे पर तारापीठ की भस्म
विचारधारा का प्रश्न है साथी, अब पीएचडी बंद

शोषित रिसर्चर
एम ए से ही नंबर देता, स्माइल पास करता था
पीएचडी में आकर जाना क्यों इतना मरता था
डिग्री के चक्कर में चुप हूं, मुफ़्त एक बदनामी
रिटायरमेंट के समय गाइड को चढ़ गई नई जवानी
बच्चे हैं यूएस में इसके, बीवी है गांधारी
रेप केस की धमकी इसको दे-देकर मैं हारी

गाइड प्रेमी रिसर्चर
धन्य धन्य मेरे गाइड का फिर से हुआ प्रोमोशन
किंगफिशर घटिया है अबकी फ्रेंच वाइन देंगे हम
सर ने बोला सोमवार सो इंटरव्यू देना है
टॉप सीक्रेट मित्र यहां पर मेरा ही होना है
सर खुद हैं पैनल में प्रिंसिपल से कर ली है सेटिंग
देखें कैसे रोड़ा अटकाती है सेकिंड डिविजिन

भाग्यहीन रिसर्चर
पहला गाइड कामधेनु था पर हो गया सस्पेंड
दूजे ने फिर दुनिया छोड़ी, हुआ था एक्सीडेंट
अब तो बंजर धरती जैसी गाइड संग रोना है
हाय शनि महाराज मेरे साथ और क्या होना है
कॉलेज की उम्मीद नहीं अब बीएड करना होगा
नई कविता के ज्ञाता को कारक रटना होगा

Friday, May 15, 2015

इस वक्त में सब हैं सही सही

सही होने की टेंढ़ी गर्दन
सही सही सब सही

तुम्हारी बात सही
सिर पे पड़ती लात सही
तम्हारा आना सही
जाना भी सही

तुम्हारा पहनना सही
ओढ़ना सही, लोटना सही
छुपाना सही, बताना सही
राम सही, हनुमान सही

सब सहें सही सही
देश सही, काल सही
सबपे टपकती राल सही
हजम हुए सब सही सही
बचे हुए सब सही सही

मालिक, तुम्हारा सही
कवि और पुलिस भी सही
कलम, लाठी, जेब भी सही
पैर पैर पाज़ेब सही

सही तुम्हारे सारे राग
सही तुम्हारी सारी रीत
सही तुम्हारे सारे नखरे
सही तुम्हारी हंसती प्रीत।

इस वक्त में सब हैं सही सही
बाहर हैं जो थे नहीं सही
खुश हैं वो जिनने सबकी सही
कहते रहिए सब सही सही
करते रहिए सब सही सही।

Wednesday, March 11, 2015

पीर उठे जो जावैं राम, घाव रि‍से जो आवैं राम

पीर उठे जो जावैं राम
घाव रि‍से जो आवैं राम
चोट के ई का चक्‍कर है
हमका भी समझावैं राम।

कनक बि‍हारी के होय आरती
सबका सुबे जगावैं राम
हम तो कबसे जागा बैइठा
हमका भी त सोवावैं राम।

काट करेजवा देहे हो भइया
बकि‍या त अब बचावैं राम
गुड़ के डली ससुराल चली
दि‍ल त अब धड़कावैं राम।

धोय रगड़ के साफ करी हम
छि‍न छि‍न गंद मचावैं राम
हर सुफेद मा करि‍या धब्‍बा
यहि बि‍धि देस देखावैं राम।

मना करे जौ मान जांय यै
कइसे फि‍र कहि‍लावैं राम
कवि कै मन कब स्‍थि‍र होए
फि‍रि-फि‍रि चंवर डोलावैं राम। 

Friday, March 6, 2015

मैनें उससे ये कहा/ मुर्शिद/ हबीब जालि‍ब

क्‍या चचा गालि‍ब अल्‍ला ताला को प्‍यारे हो गए ? क्‍या मियां मीर नूर खानम की याद में नहर का बर्फ जैसा पानी पी-पीक गला इतना खराब कर लि‍ए कि उनकी आवाज अब कि‍सी को सुनाई नहीं देती है ? खैर, वो दौर और था वो वक्‍त और था.. 

मरहूम हबीब जालि‍ब हों या पाश, हालि‍या ना गुजरने वाले गुजरे वक्‍त के जरि‍ए बहुत कम आवाजें सुनाई देती हैं, दोनों उन्‍हीं आवाजों में हैं। बाअदब माफ करने वाली गुस्‍ताखी के साथ मैं ये अर्ज करना चाहता हूं कि हर दौर की तरह इन्‍हें भी वो खि‍ताब मि‍लना चाहि‍ए, ये उस वक्‍त का सम्‍मान होगा, जि‍समें इन्‍होंने कहने के लि‍ए जलते हुए हर्फों का हल उठाया। वरना अंगुलि‍माल वाजपेयी भी आप हो सकते हैं और दो सौ चालीस रि‍सर्च खुदपर कराकर चश्‍मा पेट पे उगती नाक पर लगाकर एक पेट तक लटकता चेहरा पैदा करने में महारत हासि‍ल कर खि‍ताब और कि‍ताब, दोनों की ले सकते हैं।  

मैंने उससे ये कहा
            ये जो दस करोड़ हैं
            जेहल का निचोड़ हैं
         
            इनकी फ़िक्र सो गई
            हर उम्मीद की किरण
            ज़ुल्मतों में खो गई

            ये खबर दुरुस्त है
            इनकी मौत हो गई
            बे शऊर लोग हैं
            ज़िन्दगी का रोग हैं
            और तेरे पास है
            इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा

            तू ख़ुदा का नूर है
            अक्ल है शऊर है
            क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये शर पसंद हैं
इनकी खींच ले ज़बाँ
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा

            जिनको था ज़बाँ पे नाज़
            चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़
            चैन है समाज में
            वे मिसाल फ़र्क है
            कल में और आज में
            अपने खर्च पर हैं क़ैद
            लोग तेरे राज में
            आदमी है वो बड़ा
            दर पे जो रहे पड़ा
            जो पनाह माँग ले
            उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा

            हर वज़ीर हर सफ़ीर
            बेनज़ीर है मुशीर
            वाह क्या जवाब है
            तेरे जेहन की क़सम
            ख़ूब इंतेख़ाब है
            जागती है अफ़सरी
            क़ौम महवे ख़ाब है
            ये तेरा वज़ीर खाँ
            दे रहा है जो बयाँ
            पढ़ के इनको हर कोई
            कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा

            चीन अपना यार है
            उस पे जाँ निसार है
            पर वहाँ है जो निज़ाम
            उस तरफ़ न जाइयो
            उसको दूर से सलाम
            दस करोड़ ये गधे
           जिनका नाम है अवाम
            क्या बनेंगे हुक्मराँ
            तू "चक़ीं" ये "गुमाँ"
            अपनी तो दुआ है ये
            सद्र तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा