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Thursday, March 4, 2021

दिख ही गई सीजेआई बोबडे की स्त्री विरोधी मानसिकता

 सोमवार एक मार्च को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे ने एक रेप पीड़िता के लिए ऐसा फैसला दे दिया, कि लोगों को पूछना पड़ रहा है कि आखिर अदालत में ये सब हो क्या रहा है। हर तरफ सीजेआई बोबडे के इस फैसले की मुखालफत जारी है। महिलाओ ने खास तौर पर इस पर नाराजगी जताते हुए इसे स्त्री विरोधी बताया है। इस फैसले में जो कहा गया है उससे सवाल उठता है कि कोर्ट के फैसले भी बोलीवुड की तरह अब फिल्मी ही होंगे क्या ? या फिर जस्टिस बोबडे ये देश की सुप्रीम कोर्ट के बजाय कहीं किसी खाप पंचायत में तो नहीं जाकर बैठ गए? दरअसल मामला कुछ यूं है कि  सुप्रीम कोर्ट में रेप के आरोपी  की याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई बोबडे ने उससे पूछा कि क्या वह पीड़ित महिला से शादी करेगा? उन्होंने कहा कि अगर वह पीड़िता से शादी करने को तैयार है तो उसे राहत दी जा सकती है। रेप का ये आरोपी सरकारी कर्मचारी है उसने गिरफ्तारी से राहत के लिए


सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसके वकील का कहना था कि गिरफ्तारी होने पर उसे नौकरी से सस्पेंड कर दिया जाएगा। उसकी ये दलीलें सुनने के बाद सीजेआई बोबडे ने कहा, "अगर आप शादी करना चाहते हैं तो हम आपकी मदद कर सकते हैं। अगर नहीं तो आपको अपनी नौकरी गंवानी पड़ेगी और जेल जाना पड़ेगा। आपने लड़की से छेड़खानी की, उसका रेप किया।" क्योंकि मोहित नाम का यह आरोपी व्यक्ति पहले से शादी –शुदा है इसलिए उसके वकील ने बताया कि शादी भी नहीं हो सकती है। सवाल यह है कि क्या इस तरह के फैसले से उस पीडिता को न्याय मिल सकता है जिसके साथ इतना वीभत्स कृत्य किया गया हो। क्या सजा से बचने के लिए आरोपी शादी का प्रस्ताव दे तो उस पर रहम करना चाहिए ? एक सवाल यह भी है कि सीजेआई बोबडे का काम पीड़ित को न्याय देना है या फिर वे वहां बलात्कारियों की शादी कराने के लिए बैठाए गए हैं? और इससे भी बड़ा सवाल महिलाओं की तरफ से यह है कि ऐसी महिला विरोधी मानसिकता के साथ किसी भी शख्स को क्या सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनने का हक है? क्यों नहीं सीजेआई बोबडे को महिलाओं का सम्मान करते हुए स्वेच्छा से अपनी गलती मानते हुए कुर्सी छोड़ देनी चाहिए? फिल्म अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी ने लड़की से यह सवाल पूछा कि क्या वह दुष्कर्म करने वाले शख्स से शादी करना चाहती है या नहीं? क्या यह सवाल है? यही हल है या सजा? एकदम घटिया। वहीं माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात ने भारत के चीफ जस्टिस एस ए बोबडे को पत्र लिख कर उनसे वह टिप्पणी वापस लेने का आग्रह किया है, जिसमें उन्होंने बलात्कार के मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी से पूछा था कि क्या वह पीड़िता के साथ विवाह करने के लिये तैयार है।

वैसे अदालत में यह कोई पहली बार नहीं है कि उसका महिला विरोधी चेहरा दिखा है। असल में हमारी अदालतें अपनी जड़ से ही महिला विरोधी हैं। पिछले साल यानी दस जुलाई 2020 में एक बहुत ही विचित्र घटना हुई जो बताती है कि हमारा अदालती सिस्टम किस कदर स्त्री विरोधी हो चुका है। ये घटना  बिहार के अररिया जिले की है। जहां सामूहिक दुष्कर्म की शिकार युवती को ही जेल भेज दिया गया। उस पर न्यायिक कार्य में कथित तौर पर बाधा डालने का आरोप लगाया गया। हुआ ये कि इस केस में युवती के किसी परिचित ने ही अपने दोस्तों के साथ मिलकर उसका रेप किया था और शिकायत करने पर उसे ही जेल जाना पड़ गया था। जब घटना सामने आई तो हंगामा मच गया। इस घटना पर देश के जाने माने वकीलों और सामाजिक संस्थाओं ने पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश से दखल देने की अपील करते हुए एक पत्र लिखा . 15 जुलाई 2020 को लिखे पत्र में साफ़ कहा गया कि ऐसा मामला पहली दफा सुनने में आया है कि मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराने आई बलात्कार पीड़ित युवती व उसके दो सहयोगियों को उसकी मनोदशा को संवेदनशीलता के साथ देखे बिना अदालत की अवमानना के आरोप में माननीय मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत में लेने का निर्देश जारी किया गया। तीनों को न्यायिक हिरासत में लेकर वहां से 240 किलोमीटर दूर दलसिंहसराय जेल भेज दिया गया। लगभग 376 वकीलों द्वारा लिखे पत्र का नतीजा था कि  इन पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने इन पत्रों को जनहित याचिका (पीआइएल) में बदल दिया। इस तरह के मामलों की जैसे पूरे देश में ही झड़ी लगी हो।  एक मामला 2018 का है जब सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक आरोपी की सजा में बदलाव करने या संशोधन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी निहित शक्तियों का उपयोग किया था। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी द्वारा जेल में बिताए गए दिनों को ही पर्याप्त सजा माना था ताकि पीड़िता या शिकायकर्ता को कोई और कष्ट न झेलना पड़े क्योंकि घटना के तुरंत बाद आरोपी से उससे शादी कर लिया था।


अब यहां सवाल ये है कि शादी करने या करवाने से अपराध कम हो जाता है क्या ? क्या यह संभव नहीं है कि कई बार शातिर अपराधी सजा से बचने के लिए भी शादी का फैसला कर सकता है। और कोई पीडिता समाज की उपेक्षा से बचने के लिए राजी भी हो सकती है लेकिन इसका परिणाम अंतत उस पीड़ित स्त्री को ही भुगतना पड़ता है जैसा की दिल्ली में हुए 2017 में एक केस में हुआ था। मामला कुछ ऐसा था कि इसमें एक रेप पीडिता और रेप आरोपी की शादी की गई थी। कुछ ही दिनों बाद आरोपी उस लड़की से छुटकारा पाने की सोचने लगा। उसने अपनी ही पत्नी के अश्लील वीडिओ बनाकर उन्हें वायरल करने की धमकी दी। तंग आकर लड़की ने रिपोर्ट की तब जाकर पुलिस को पता चला यह हरकत उसका पति कर रहा था। वो उसे तमाम धमकियां भी देता था जिससे लड़की खुद भाग जाये। शायद इस तरह करायी गई शादी का यही हश्र होता है। एक निहायत बचकाना फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने कुछ ही अरसा पहले 19 जनवरी को २०२१ दिया था इसमें एक मामले में जस्टिस पुष्पा वी। गनेदीवाला की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि टॉप को हटाए बिना किसी नाबालिग लड़की का ब्रेस्ट छूना यौन हमले की श्रेणी में नहीं आएगा, लेकिन इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत किसी महिला का शीलभंग करने का अपराध माना जाएगा। हैरत की बात यह है कि ऐसा फैसला एक महिला जज की पीठ से आया था। जिसमे पाक्सो एक्ट के तहत यौन हमले की व्याख्या कुछ इस तरह की गई। कहा गया कि यौन इरादे और स्किन-टू-स्किन कांटैक्ट के बिना किसी बच्चे के ब्रेस्ट को जबरन छूना यौन अपराधों से बच्चों को बचाने के लिए बने विशेष कानून प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (पोक्सो) एक्ट के तहत यौन हमला नहीं है।

इस फैसले से महिला संगठनो सहित तमाम लोगो ने नाराजगी जताई। गुजरात की एक महिला देवश्री त्रिवेदी ने इस फैसले से नाराज होकर तमाम जगह कंडोम के पैकेट ही भेज दिए और जज पुष्पा गनेदीवाला को निलंबित करने की मांग की। एक और मामला बेहद भयावह है जिसमे ये सुनकर ही गुस्सा आ जाये कि आखिर कोई न्यायधीश ऐसी सलाह कैसे दे सकता है। मामला दिल्ली की अदालत का है जहां भूरा नाम के आदमी पर रेप का केस था। युवक ने  अस्पताल में काम करने वाली एक नर्स के साथ बलात्कार किया था और फिर उसकी एक आंख निकाल ली थी। मुक़दमे में जब दोषी ने पीड़ित महिला के संग शादी का सुझाव दिया था तो न्याधीश ने पीड़ित महिला को सुझाव पर गौर करने को कहा था। न्यायाधीश की सलाह के बावजूद नर्स ने भूरा के साथ शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था जिसके बाद अदालत ने भूरा को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। इतने हिंसक व्यव्हार के बाद किसे कोई स्त्री ऐसे इन्सान से शादी करने का सोच सकती है इसे एक पुरुष न्यायाधीश ही सोच सकता है। जाहिर है आरोपी तो शादी का प्रस्ताव अपने बचाव में दे रहा। शारीरिक और मानसिक चोट देने वाले से शादी का फैसला करना आसन नहीं है। जिसने किया भी कोर्ट की सलाह के बाद मज़बूरी में ही किया होगा। जबलपुर की एक अदालत भी ऐसे ही एक फैसले में आरोपी  कमलनाथ पटेल और पीड़ित लड़की की शादी अदालत परिसर में बने मंदिर में ही करा चुकी है।

इसी तरह का एक और केस पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का है। इस केस में एक नाबालिग का गैंगरेप चार लोगों ने किया। इनमें से एक आरोपी ने 1 दिसंबर 2019 को ज़मानत के लिए याचिका लगाई कहा कि उसने जेल में विक्टिम के साथ शादी कर ली है। कोर्ट ने उसे ज़मानत दे दी। पर बाकी तीन आरोपियों की याचिका खारिज़ कर दी। कोर्ट ने जमानत इस चेतावनी के साथ दी कि अगर आरोपी ने लड़की को तलाक देने की भी कोशिश करता है तो भी उसकी ज़मानत रद्द हो जाएगी। और अगर आरोपी आने वाले समय में शादी तोड़ेगा तो भी उसके खिलाफ उचित आपराधिक कार्यवाही भी की जाएगी।  जहां शादी वाली सलाह से काम नहीं चला वहां भाई बनाने की सलाह भी दी गई। रक्षाबंधन सलाह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की है। एक महिला का रेप करने पर आरोपी को जमानत दी गई और उसे कहा गया कि  शिकायतकर्ता के घर जाए उसकी रक्षा का वचन देकर उससे  "राखी बांधने" का अनुरोध करे। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अपर्णा भट और आठ अन्य महिला वकीलों ने इस जमानत आदेश में चुनौती दी। इस तरह की सलाह बेहद ही हास्यास्पद है। पीड़िता की तकलीफ़ को बढ़ाने वाली है। कोर्ट ने महज शादी करने ,भाई बनाने की की सलाह दी हो यहीं तक सीमित नहीं है उसने एक मामले में सास की भूमिका भी निभा डाली। 19 जून 2020 का एक फैसला गुआहाटी का है जिसमें  हाईकोर्ट ने ‘सिंदूर’ लगाने और ‘चूड़ी’ पहनने से इनकार करने पर एक व्यक्ति को अपनी पत्नी से तलाक लेने की अनुमति दे दी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, ‘चूड़ी पहनने और सिंदूर लगाने से इनकार करना यह दर्शाएगा कि वह अपने पति साथ इस शादी को स्वीकार नहीं करती है।  समझ से परे है कि फैसले में ऐसी बातें किसी स्मृति या शास्त्र के हिसाब से कही गईं हैं या फिर संविधान के हिसाब से।


दिल्ली में ही एक केस में रेप के एक आरोपी को हाईकोर्ट से एक टैटू की वजह से ज़मानत मिल गई। आरोपी के वकील ने कहा कि शिकायत करने वाली महिला शादीशुदा है और आरोपी के साथ सहमति से रिलेशन में थी। अपनी इस दलील के पीछे वकील ने सबूत के तौर पर महिला के हाथ पर बने एक टैटू का ज़िक्र किया जिसमें आरोपी व्यक्ति का नाम लिखा है। आरोपी के वकील ने कहा कि महिला भी आरोपी से प्यार करती थी, जिसका सबूत ये टैटू है। इस पर शिकायतकर्ता महिला ने कहा कि ये टैटू उसके हाथ पर जबरन बनवाया गया है। लेकिन कोर्ट ने महिला की इस बात को ना मानते हुए कहा कि “सामने वाले की रज़ामंदी के बगैर टैटू बनाना कोई आसान काम नहीं है। हमारी राय में टैटू बनाना एक कला है और उसे बनाने के लिए एक विशेष प्रकार की मशीन की ज़रूरत होती है। शिकायतकर्ता के हाथ पर जहां ये टैटू बनाया गया है, वहां बनाना आसान नहीं। वो भी तब, जब उसने इस बात का विरोध किया हो। इस तरह के ना जाने कितने फैसले हैं जो बहुत सारे सवाल खड़े करते हैं। इनमे एक अहम् सवाल है कि क्या इस तरह के फैसलों का एक बड़ा कारण न्यायपालिका में पुरुष वर्चस्व है। पूरे भारत में उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में 1,113 न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या में से केवल 80 महिला न्यायाधीश हैं।  इन 80 महिला जजों में से, सुप्रीम कोर्ट में केवल दो हैं, और अन्य 78 विभिन्न उच्च न्यायालयों में हैं, जो कुल न्यायाधीशों की संख्या का केवल 7।2 प्रतिशत है। इस सख्या को और बढ़ाने की जरुरत है। माना कि कुछ केसेज गलत हो सकते हैं लेकिन कुछ की वजह से तमाम पीड़ित महिलाओं की हक़तलफी ना हो जाये। कोर्ट कम से कम पीड़िता लिए इतना संवेदनशील हो कि सलाह उसके लिए सजा न बन जाये।

Sunday, March 1, 2020

कौन मरा है? किसका बेटा?

कौन मरा है
किसका बेटा
अभी यहीं था
पलंग पे लेटा
किसने थी
आवाज लगाई
किसने शामत
नियति बनाई
किसने मारा
पहला पत्थर
किसने ली
पहली अंगड़ाई
जांच करो भाई
जांच करो
किसने पहले
आग लगाई
मगर सुनो तो
हमको दे दो
बेटे की जो
लाश है आई
दे दो दे दो
जहां छुपाई
रोक के रखी
हमने रुलाई
रोना है अब
खून पर अपने
रोना है
सब जून पर अपने
रोना है
पी पीकर पानी
रोना है
जो छंटी जवानी
रोना है
क्यों ईंट उठाई
रोना है
अब लाश जलाई
रोना है
पहले नहीं सोचा
रोना है
लो भीगा अंगोछा
रोना है
कि तब क्यों बोले
रोना है
कि आ अब रो लें
रोना है
हर इक नारों पर
रोना है
दंगों के मारों पर
रोना है
क्यों आग लगाई
रोना है
क्यों बुझ ना पाई
रोना है
ये फेर जो आया
रोना है
सब घेर के आया
रोना है
अब उन आवाजों पर
रोना है
टूटे साजों पर
रोना है
सब रूठ चुका है
रोना है
सब टूट चुका है
होता सलामत
बच्चा अपना
पूरा करता
अपना सपना
मार पीट
दंगा फसाद में
बच्चा मरा
और मर गया सपना।

Saturday, April 13, 2013

पुराने झोले से नि‍कलीं बासी लाइनें




ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आवे..
1
जहर भरे खुद को ले जाऊं मैं कहां,
हर तरफ तो तू ही तू दिखाई देता है।

2
मुझे यकीन है तेरे फिर से आने का,
तेरे बिना मेरी तन्हाई अकेली है।

3
तूने फिर किया है साथ देने का वादा,
मैँ फिर से तेरा यकीन करता हूं।

4
कौन कहता है कि गुजरा वक्त नही आता,
यारों आज फिर मैं अकेला हूं।

5
मेरा होना मुश्किल की दो बूंदे ही तो हैं,
फिर मेरे जिबह की राहें इतनी मुश्किल क्यों हैं।

6
ख्यालों में बोलो कि कोई सुन न ले,
ख्वाहिशें तुम्हारी बड़ी बेहिसाब हैँ।

7
रम मिटाए गम,
बेहिसाब पियो रम।

8
प्रेम गले का खूंटा है
जिसने भी दिल लूटा है
सबसे बड़ा वो झूठा है ।

9
मुस्लमां न हुए तो कैसे आएगा,
हुनर तेरी आंखों मे झांकने का।
मुस्लमां हो भी गए तो क्या हुआ,
तेरी आंखे तो कुछ और ही चाहती हैं।

10
मेरे न होने पे ताज्जुब न करना दोस्तों,
इस गली से पहले भी कई गुजरे हैं।

11
मैनें देखा है तुम्हें उमस भरी दोपहरों में,
बासबब बातों पे तुम मन उतारा करते थे,
यूं हंस के गले मिलते थे तुम हमसे,
और तंगहाली में हम हंसी संवारा करते थे।

12
साल दर साल जो बनते रहे अनजान हमसे,
टूटे रास्ते तो मुड़कर पीछे देखते हैं..

13
मतलबी लोगों ने फिर निशाना साधा है,
क्या पता, इस बार क्‍या लूटने का इरादा है।

14
सुना है कि तूने खामोश रहना सीखा है,
कहीं ये तेरे प्यार सा इक धोखा है?

15
जो अपनी दुश्वारियां रखीं उसके सामने,
वो लगा मेरी रूबाइयों की दाद देने।

16
सारी रात बह गई, अकेला दिन थम गया, तुमने तो आने को कहा था, पीठ पे टिक के लंबी सांस भी तो ली थी. . इसे उधार मानूं या दान. ? सूद चुकाऊं या असल या फिर दोनोँ . . .? कितना तो अच्छा होता कि सांसों को मेरी पीठ पर देने से पहले ही बातें साफ हो जातीं। अब उन सांसों को वापस कैसे करूं . . ?

17
उनके चंद रोज के फरेब पे हुआ आशिक मैं,
वो थे कि सालों सूद ही वसूलते रहे।

18
शराबियों में होते हैं कुछ खास शराबी,
वो पीने से पहले ही महक जाते हैं।
प्याले मे मय न हो पानी ही सही ,
गिलास भरा देखकर ही चहक जाते हैँ।

19
धूप का इक टुकड़ा अब मेरे घर भी आता है,
भरी दुपहरी रहता है, शाम तलक खो जाता है।

Thursday, March 1, 2012

साहस -2


कोई तीस साल पहले बसंत के दिनों में जब अपूर्वा का जन्म हुआ तो घर में खिचड़ी बनी थी। कठोर सर्दी के दिन खत्म हो रहे थे और हवा में तैरता गुलाबीपन अपूर्वा की मां के गालों से झलक रहा था। जन्म देने के बाद पीले पड़े चेहरे के साथ जब अपूर्वा की मां ने उसे देखा तो अनजाने में ही अपूर्वा नाम निकल गया। बस जन्म के दो घंटे बाद ही नाम अपूर्वा पड़ गया जो सात साल बाद से ही अपूर्वा को सख्त नापसंद आने लगा। उसने कई बार अपनी मां से पूछा भी कि मेरा नाम इतना कठिन यों रखा कि लोग बुलाने में भी झिझकें? कोई आसान सा नाम नहीं मिल पा रहा था? अब उसकी पत्रकार मां को आसान नाम सूझा नहीं और न ही अपूर्वा के इस आसान से सवाल का कोई जवाब। तीस सालों से एक नाम ढो रही अपूर्वा की जिंदगी फिसलती चली गई। हां, दो बार संभालने की कोशिश तो की, पर संभली नहीं। एक बार बीस साल की उम्र में तो एक बार छब्बीस साल की उम्र में। लय क्या होती है, ये गाने गाकर भी अपूर्वा नहीं जान पाई। कभी कभी अपूर्वा को लगता है कि उसे शराब पीनी चाहिए, साथ में सिगरेट भी...
आज खाना क्या बनाना है? काम वाली बाई ने पूछा।
कुछ भी बना दो..अच्छा ऐसा करो कि आलू मटर की सब्जी और ज्यादा सा चावल ही बना दो। सजी में टमाटर जरूर डाल देना। थोडा सा खांसते हुए अपूर्वा ने काम वाली बाई को बताया। एक बार फिर से फेसबुक पर अपना स्टेटस चेक करने में लग गई। कोई कमेंट नहीं। शुक्र है। आज किसी ने उसे नहीं देखा। कितनी अजीब चीज होती है ये कि हम चाहते हैं कि सब हमें देखें लेकिन कोई हमें देख न ले। कहीं से छू न ले। उस दिन जब आकाश ने उसे छुआ था...
छह साल पहले दतर में काम करते हुए एक दिन आकाश ने अचानक उससे पूछ लिया कि उसका नाम अपूर्वा क्यो? बस, यहीं से अपूर्वा को लगने लगा कि शायद आकाश उसे इस सवाल का जवाब दे सके कि उसका नाम अपूर्वा क्यो है। वो न चाहते हुए उसके पास जाने लगी। उससे बातें करने लगी। बातें बढ़ीं तो घर तक पहुंच गईं। अपूर्वा के अकेले कमरे में एक आकाश सजने लगा। तारे टिमटिमाए तो पेट में बवाल मच गया। अपूर्वा ने ये बात आकाश को बताई। आकाश ने उसे दो हजार रुपये दिए और प्यार से उसके माथे पर आई लटें उलझाते हुए बताने लगा कि उसे चंडीगढ़ में बीस हजार ज्यादा तन्ख्वाह पर नौकरी मिल रही है। क्या करे? ये सही वक्त नहीं है। आखिरकार अपूर्वा डाक्टर के पास गई और दो दिन काम वाली बाई से खिचड़ी और सूप बनवाकर पिया। आकाश चला गया। तारे टिमटिमाना बंद हो गए। स्याह काली रातें अल्प्राजोलम के सहारे गुजरने लगीं। ये दवाइयां भी कितनी अजीब चीज होती हैं। हमें जरूरत पर मिल जाती हैं लेकिन खत्म कर देती हैं।
प्वाइंट फ़ाइव की तीन गोल अल्प्रॉक्स ली और सोचने लगी। आखिर मुझे क्यो आकाश से प्यार हुआ? नहीं नहीं....ये प्यार नहीं था। ये तो जरूरत थी, प्यार होने जैसी किसी अनुभूति की। उस वक्त मेरी देह जल रही थी। मुझे छुअन की असीम इच्छा थी। ये मायने नहीं रखता था कि कौन छू रहा है, पर ये भी देखना होता था कि कम से कम वो गोरा हो या फ़िर स्मार्ट हो, या फ़िर किसी अच्छे खान्दान का दिखता हो। तुम सोचना बंद यों नहीं कर देती हो... उस दिन आकाश ने कहा था। मुझे लगा कि वो सही कह रहा है। सारी समस्याएं यहीं से पैदा होती हैं। सोच से...विचारों से। अगर हम सोचना बंद कर दें तो एक झटके में सारी समस्याओं से बाहर आ जाएंगे। या यों सोचना कि समस्याएं खत्म हुई हैं या नहीं। समस्याओं को छोड़ना ज्यादा इपॉर्टेंट है या उन्हें सॉल्व करना?

Friday, December 23, 2011

साहस

फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करते ही लगातार कमेंट आने शुरू हो गए थे। कोई कुछ कह रहा था तो कोई कुछ। इसी बीच किसी ने प्रोफाइल पर एक फोटो भी टैग कर दिया था। फोटो था कि किसी थाली में एक बच्ची रोटी से ढंककर रखी हुई थी। उधर वॉल पर लोग लगातार पोस्ट पर पोस्ट किए जा रहे थे मानो बरसात के बाद की हरी घास उगने से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। कमेंट की कोपलें भले ही न फूट रही हों पर पोस्ट के पोस्ट हरे होकर लहलहा रहे थे। टि्‌वटर का भी काफी कुछ यही हाल था लेकिन इन सबके बीच चाय की खत्म हो गई पाी की चिंता सता रही थी। अब चाय की पाी खत्म होने की चिंता तो फेसबुक पर पोस्ट तो की नहीं जा सकती थी। कुछ चाय की तलब तो कुछ लिखने की मजबूरी और काफी कुछ अकेलेपन ने अपूर्वा को बाजार की तरफ धकेल ही दिया। कम से कम बाजार में भीडङ्ग तो मिलेगी। लोग दिखेंगे, लोगों के चेहरे दिखेंगे। जाड़ों में बोरोलीन की चिपचिपाहट से भरे चेहरों में कुछ तलाश शायद खत्म हो। या कुछ तलाशने की कोशिश ही की जाए। अब ये तलाश कोई दो सलाई लेकर स्वेटर बुनना तो है नहीं कि दो सलाइयां एक दूसरे से भिड़ाते रहे और दिन भर में एक आस्तीन तो बुनकर रख ही दी। गाना भी याद आ रहा था...मेरा कुछ सामान...तुहारे पास पड़ा है, मेरा सामान लौटा दो....खैर बाजार में भीड़ तो ज्यादा नहीं थी लेकिन रोशनी भरपूर थी। दुकानदार ने चाय की पाी का पैकेट देते वक्त हौले से हाथ सहला दिया। अपूर्वा कुछ नहीं बोली। भला लगा या बुरा, इसका भी チयाल नहीं आया। पैसे दिए तो पैसे लेते वक्त भी उंगलियां जानबूझकर सहला दीं। अपूर्वा को महसूस तो हुआ सहलाना पर भावना महसूस नहीं हुई। दरअसल अकेलेपन में अपूर्वा की छुअन कुछ मर सी चुकी थी। मकान मालकिन बुलाती रह जातीं, पर वो बगैर जवाब दिए ही सरपट सीढ़ी चढ़ती चली जाती।

चाय की पाी तो घर में आ चुकी थी पर चाय पीने की इच्छा सूख चुकी थी...बिलकुल उसी चाय की सूखी हुई पाी की तरह। हिप पर कुछ मांस ज्यादा हो रहा है, शीशा देखते समय अपूर्वा ने सोचा। लेकिन हो भी तो या? करना या है? किसे दिखाना है? फिर ये सोचना ही यों कि हिप पर कुछ मांस ज्यादा हो रहा है। शीशा देखा, मुंह धुला और लैपटॉप लेकर फिर से बिस्तर में घुस गई। ये जितने भी लड़के फेसबुक या टि्‌वटर पर हैं, सब साल भर के ही साथी होते हैं। साल भर बाद या तो लड़के मुझसे बोर हो जाते हैं या फिर मैं इन लड़कों से बोर हो जाती हूं। छुअन मर चुकी है तो या हुआ, अपना छुआ हुआ तो महसूस होता है। कंप्यूटर की घड़ी बता रही थी कि रात के पौने नौ हो चुके हैं। जैसे जैसे रात काली होती जाती है, छुअन की चाहत और उजली होकर भक से सामने आ जाती है। अब छोड़ो भी, जब तय कर लिया कि अकेले ही खड़े होना है तो अकेले ही खड़े होना है। इस बार फेसबुक नहीं खोलूंगी। अपूर्वा ने सोचा। जीमेल खोला तो फेसबुक पर आए ढेरों कमेंट मुंह बाए सामने रखे हुए थे। लेकिन एक भी वो कमेंट नहीं था, जिसकी अपूर्वा को तलाश थी। जो उसे कब्र से निकाल कर कब्रिस्तान की हरियाली दिखाए। कब्रिस्तान के पुराने दरチतों से फूटती ताजी कोपलों की लाली से जो रस टपकता है, उसका स्वाद दिलाए...कोई ऐसा कमेंट करने वाला मिला ही नहीं।
रात के साढ़े दस बज गए थे। अपनेपन के गहरे नशे में डूबी अपूर्वा को पता ही नहीं चल पा रहा था कि घड़ी आखिरकार इतनी तेजी से भाग कैसे रही है। ये अपनापन भी अजीब चीज है। हम जानते हैं कि हम हैं फिर भी हम मानने के लिए तैयार ही नहीं होते कि हम हैं। हम अपनी परिकल्पना बगैर किसी दूसरे के कर ही नहीं पाते। ठीक वैसे ही जैसे कि रेखागणित या बीज गणित। एक दूसरे के बराबर कैसे होगा। या एक दूसरे के बराबर किस सिद्धांत से होगा। स्टेटस तो अपूर्वा ने अपडेट नहीं किया, अलबाा उंगलियां फोड़ने में लग गई। एक उंगली फूटी तो दूसरी फोड़ी, दूसरी फोड़ी तो तीसरी फोड़ी....पर ये कैसे समझ में आएगा कि हम अकेले ही हैं। कैसे समझ में आएगा। भले ही सपने में देख ले कि रामलीला के सारे किरदार उसके साथ होली खेल रहे हैं। उसके सीने पर... उसके हिप्स पर रंग लगा रहे हैं...फिर भी वह छुअन महसूस ही नहीं कर पा रही है। या रामलीला के सारे किरदार झूठे हैं?
जारी....

Tuesday, March 11, 2008

ये कोई ज्यादा बड़ी कहानी नही है...

ये कोई ज्यादा बड़ी कहानी नही है। मेरठ का एक इलाका है फिरोजनगर। ज्यादा नही, पिछले दो तीन दशक से यह पीने का पानी गन्दा आ रहा है। यहा रहने वाले बच्चों मे से एक दो बच्चा हर दूसरे तीसरे महीने मर जाता है। कारण, डायरिया, उलटी, दस्त। इन्ही की कुछ फोटो हैं।

इसका नाम इयत्ता है। फिरोज नगर मे ही रहती है। हो सकता है कुछ दिन बाद ये भी मर जाय ।

ये मिस्बाह है। दो महीने पहले इसकी बहन डायरिया से मर गई। अब शायद इसकी बारी है। ये भी फिरोज नगर मे रहती है।
ये भूरा है. इसकी उम्र १६ साल है. पैदा होने के बाद से ही गन्दा पानी पीने की वजह से इसका विकास ही नही हो पाया.
और भी फोटो हैं, यहाँ क्लिक कीजिये- photobajaar

Sunday, April 15, 2007

अब मैं मरती हूँ ...--2

पहले से आगे ..
मुझे ठीक ठीक याद नहीं की कब हममें दोस्तों जैसी बातें होने लगीं . जहाँ तक मैं समझता हूँ की पूरे दफ़्तर मे लोग वहाँ के अपराध संवाददाता से काफ़ी डरते थे और सिर्फ़ मैं और प्रियंका , दो ही ऐसे शख्स थे जिनकी झड़प उसके साथ होती थी और कोई भी उन्नीस रहने के लिए तय्यार नही होता था . शायद यह भी एक कारण रहा हो . मैं अख़बार की सामाजिक-राजनीतिक मेग़ज़ीन का काम करता था और लोग इसे मेरा सौभाग्य कहेंगे लेकिन मैं इसे अपना दुर्भाग्य मानता हूँ की उसमे छपने वाले लेखों को पसंद किया जाता था . मार्केटिंग मे तो ज़रूर ही. मुझे याद आता हैं , हम लोग उस समय 'आत्महत्या' पर काम कर रहे थे और हमारी बहस से रोज़ का अख़बार विचलित ना हो इसलिए बॉस ने हमे अपना केबिन दे दिया थ . वही केबिन , जिससे मार्केटिंग विभाग सटा हुआ था और बीच मे सिर्फ़ एक लकड़ी की दीवार भर थी. उस केबिन मे आत्महत्या पर रोज़ घंटों गरमागरम बहसें होती थी . एक दिन मैं और मेरे बाक़ी साथी तीनो बैठकर अपने विषयों पर क्या लिखा जाए , इसपर बहस कर रहे थे कि केबिन का दरवाज़ा खुला और इस लड़की ने अंदर क़दम रखा . कहने लगी कि उसे हम लोगो का काम अच्छा लगता है और उसका भी मन करता है कि वो भी कुछ लिखे . हम लोगो ने सोचा कि चलो अच्छा हुआ , काम कुछ हल्का हुआ . मुझे ठीक ठीक याद है कि मैने उसे 'किशोरों में बड़ती आत्महत्या' पर लिखने के लिए दिया था . तब उसने पूछा भी था की आत्महत्या करने का कोई आसान तरीक़ा बताओ . मैने कहा की थोड़ी देर मे सोच के बताउंगा . थोड़ी देर बाद जब मैं कुछ चुगने की फ़िराक मे पूड़ी वाली दुकान पर गया तो मुझे उस दुकान पर एक लंबी सी चमकती हुई लाल मिर्च दिखी , मैने कुछ सोचा और उस पुड़ी वाले से वो लाल मिर्च माँग ली . मैं वापस केबिन मे आया और एक काग़ज़ पर लिखा ' आत्महत्या करने का आसान उपाय' और लाल मिर्च उस काग़ज़ मे लपेटी और प्रियंका की टेबल पर ले जाकर रख दी . उसकी एक और साथिन उसके साथ बैठी थी . मुझे याद है की इस बात पर हम इतना हँसे थे इतना हँसे थे की हमारी आँखों मे पानी आ गया था.

अब मैं मरती हूँ ...

हमारे दफ़्तरों मे क्या क्या होता रहता है क्या क्या नही होता है ... हम सब इसकी कल्पना तो कर सकते हैं , इसके परिणामो के बारे मे बहस तो कर सकते हैं लेकिन शायद आज तक किसी ने इसके लिए कुछ किया होगा , मुझे इसकी आशा नही .. बाज़ार मे हमारे दफ़्तर भी आते हैं , वो भी कुछ बेचते हैं , कुछ ख़रीदते हैं , लेकिन आख़िर इन दफ़्तरों का असली रंग क्या है .. कुछ कुछ इस स्टोरी से साफ़ हो जाता है ..
प्रियंका (काल्पनिक नाम) ... मेरे दफ़्तर मे काम करने वाली एक लड़की . मैं अपना दफ़्तर छोड़ चुका हू लेकिन जो बात मुझे बार बार कॉन्फ़्यूज कर रही है कि मैं इसका परिचय किस काल मे दूं . दफ़्तर छोड़ चुका हूँ इसलिए सोचता हू की इसका परिचय भूत काल मे देना चाहिए . प्रियंका अभी ज़िंदा है , इसलिए सोचता हूँ कि वर्तमान काल मे इस से सबका परिचय होना चाहिये और अभी भी इसकी ज़िंदगी का कोई भरोसा नही इसलिए सोचता हू कि ये ताना बाना भविष्य मे ही बूना जाना चाहिये. बहर हाल चीज़ें अपने इतिहास पर ही टिकी होती हैं इसलिए बात उनके इतिहास से ही शुरू कि जाएँ तो अच्छा रहता है और उन्हे क्रम से समझने मे भी आसानी होती है . मैं नोयडा पिछले साल आया और नौकरी भी पिछले साल ही शुरू की . पहली नौकरी थी और कुछ कर गुज़रने की जोश भी . सो मैं जी जान से काम मे लग गया . मैं दफ़्तर के संपादन विभाग मे था और अक्सर मुझे काम के सिलसिले मे बॉस के केबिन तक जाना पड़ता था . बॉस के केबिन तक पहूचने के लिए मुझे रिसेपस्न और मार्केटिंग विभाग पार करके जाना होता था जो की छोटे और कबूतर के डर्बे की तरह बीच मे बने हुए थे . रास्ते से गुज़रते वक़्त गाहे - बगाहे सब पर नज़र पड़ ही जाती थी जिनमे प्रियंका भी शामिल थी .लेकिन तब उस से मेरी कोई बात-चीत नही होती थी. कारण यही था की मैं नया था और अभी दफ़्तर के लोगों से उतना घुल-मिल नही पाया था. एक दिन बॉस का हुक़म हुआ कि मैं प्रियंका को साथ लूँ और ग्रेटर नोयडा के एक अस्पताल का मुयायना कर आइए . उस अस्पताल पैर मुझे एक इँपेक्ट फ़ीचर करना था . हम दोनो ड्राइवर के साथ कार से तक़रीबन 20-25 किलोमीटर का फ़ासला तय करके उस अस्पताल तक पहुचे . रास्ते मे हुमरे बीच कोई बात-चीत नही हुई . इसका कारण शायद यह था कि मैं काफ़ी झिझक रहा था और वैसे भी वो वहा मार्केटिंग के काम से जा रही थी तो उससे मेरा उतना मतलब भी नही था . रास्ते भर मैं और ड्राइवर आपस मे बतीयाते रहे और ये लड़की कार कि पिछली सीट पैर खोए खोए अंदाज़ मे बैठी रही . बहर हाल हमारी बातचीत आधा काम निपटाने के बाद तब शुरू हुई जब हम दोनो डॉक्टर के केबिन के बाहर बैठे थे . लेकिन तब भी सिर्फ़ इतना ही कि इससे पहले कहा काम करते थे और क्या काम करते थे ?

अब मैं मरती हूँ ...4

उसके चहरे की उन्मुक्त हँसी अभी भी दिखाई दे जाती थी लेकिन पता नही मुझे ऐसा क्यूं लगता था कि ये हँसी सिर्फ़ उसके चेहरे क़ी ही है . उसकी आँखें धसति ही जा रही थी . चेहरे का नूर दिनो -दिन ख़तम होता जा रहा थ . एक दिन उसका एक्सीडेंट हुआ तो उसने मुझसे रिक़्वेस्ट क़ी कि मैं दफ़्तर में किसी को बताए बिना ये बहाना बना कर दू कि मैं उसे आटो मे बिठाने जा रहा हू जबकि मुझे उसे उसके बॉयफ़्रेंड के पास ले जाना था जो कि उसका इंतेज़ार रोड पे कर रहा था . ख़ैर मैं उसे उसके बॉयफ़्रेंड के पास छोड़ आया . उस दिन मैने उसके बॉयफ़्रेंड को देखा . अच्छा ख़ासा स्मार्ट लड़का था . मैने सोचा कि आख़िर क्या वजह है कि उस उमर के लड़के जो सपना देखते हैं उसके विपरीत उसने इस प्रियंका जैसी लड़की को , जो ऐसे लड़को के मानदंड पर कतई ख़री नही उतरती है , वह इस से प्रेम करने लगा . एह एक काफ़ी सोचने वाली बात थी ... ख़ैर इतना सब होने के बाद नोयडा मे बहुचर्चित निठरि मे मार्मिक हत्या कांड हो गया. अब काफ़ी दिनों तक मेरी बातचीत उससे नही हो पाई . आख़िरी बार मेरी उससे क़ायदे से एक ही बार बातचीत हो पाई . वह फिर से मुझसे आत्महत्या के बारे मे पूछ रही थी . बातों ही बातों मे उसने नटवर सिंह कि पुत्रवधू कि बात छेड़ी . वो शराब पीकर और उसके बाद नींद कि गोली ख़ाके मर गयी थी . इस घटना के बाद वो मुझसे अक्सर शराब की माँग करने लगी . लेकिन मैं हमेशा उससे बहाने बना देता था . अभी कुछ दिन पहले ही जब हम लोग एक समाचार टी वी मे एक्ज़ाम देने जा रहे थे , वो मेरे घर आई . उसने फिर से शराब की माँग शुरू कर दी . यहाँ तक की रसोई मे रखी ख़ाली शिषियों मे भी काफ़ी खोजबीन की लेकिन उसे मायूस लौटना पड़ा. हम लोग काफ़ी जल्दी मे थे इसलिए कोई ख़ास बात नही हो पाई . मैने उसे सोमवार को निकलने वाली मेगज़ींन का सारा समान दिया और उसे कहा की इसे गुप्ता को दे देना . लेकिन पता नही क्यों मुझे लग रहा था की कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है . रास्ते मे भी उसने काई बार मुझे फ़ोन करके कहा की कब आ रहा हो वापस ? मैं उस समाचार चैनल मे अपना फ़ॉर्म जमा करके तक़रीबन 4 घंटे बाद वापस लौटा . वह अपने विभाग से मेरे पास आई ,मेरे सामने बैठ गयी . उसके बाद वो फिर से मुझसे शराब की माँग करने लगी . मैने जानने के लिए काफ़ी ज़ोर दिया तो उसने मुझे बताया की आत्महत्या करने के लिए उसे शराब चाहिए थी . लेकिन उसकी किसी भी बात पर मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था . ख़ैर मैने उसे किसी तरह चलता किया और अपना शक मैने सामने बैठे समाचार संपादक पर ज़ाहिर किया . मैने उससे कहा की ये बात बॉस को बताई जाए . लेकिन उस टाइम यही सोचा गया की थोडि देर और इंतेज़ार करके देखते हैं और इसे वाच करते हैं . वक़्त गुज़रा और मैने अपना काम निपटाया और अख़बार का पेज बनवाना शुरू कर दिया. उस दिन मेरे घर पर पार्टी थी इसलिए मुझे घर जाने की जल्दी भी थी . जल्दी जल्दी पेज बनवाने के बाद जब मैं निकलने लगा तो वह फिर से मेरे पास आई और शराब की ज़िद करने लगी . जब तक मैं उससे कोई और बात करता , मार्केटिंग की हेड ने मुझे बुला लिया और पूछने लगी की प्रॉपर्टी वाले पेज का क्या हुआ ? मैने उसे बताया की बन जाएगा और मैं आज अपनी नौकरी छोड़ रहा हू . मैने उसे ये भी बताया कि प्रियंका को आज अपने घर ले जाओ क्योकि मुझे लग रहा है की आज वो कुछ उल्टा सीधा करेगी लेकिन वो बोली की उससे कोई मतलब नही है , वो सिर्फ़ दफ़्तर मे ही उसे जानती है . इतना सुनने के बाद मुझे विश्वास हो गया की ये लड़की आज कुछ ना कुछ ज़रूर करेगी . मैने बाद मे उसे फ़ोन किया की कही वो कुछ ऐसा वैसा ना कर ले . उसने कभी हाँ तो कभी ना वाले जवाब दिए . रात मे उसने मुझे फिर से फ़ोन किया.

मै अब मरती हू ...३

पहले से आगे ..
ये वो दिन था जब दफ़्तर मे मुझे लेकर काफ़ी सारी भावनाएँ उत्पन्न हुईं . संपादकीय मे मुझे जलन से देखा गया तो मार्केटिंग मे ठीक ठाक़ सा लड़का . इसके बाद तो मेरी पूरे दफ़्तर से ही अच्छी दोस्ती हो गयी . हम लोग अक्सर आपस मे हँसी मज़ाक करते , आख़िर हमेशा काम तो नही ही हो सकता है ना . इसी मज़ाक मे अक्सर वह मुझसे पूछ लेती कि आत्महत्या करने का कोई आसान तरीक़ा मेरे दिमाग़ मे आया कि नही ? और मैं भी इसे मज़ाक समझ कर अक्सर हँस के टाल देता था . एक दिन हम यूँ ही बैठे थे और बस यूँ ही दुनिया जहान क़ी और एक दूसरे के बॉयफ़्रेंड और गर्लफ़्रेंड क़ी बातें कर रहे थे . प्रियंका ने मुझे बताया कि उसकी शादी हो चुकी है . मैं जानता था कि वो शादीशुदा नही है और उसका बॉयफ़्रेंड अक्सर उसे दफ़्तर से थोड़ी दूर पर छोड़ कर चला जाता था . दफ़्तर मे अक्सर लोग मज़ाक भी किया करते थे कि उसने तो करवा चौथ का व्रत भी रखा और चंद्र देव को जल भी चड़ाया . ख़ैर उसने कहा कि एक दिन वो उसको मुझसे मिलवाएगी . उसने मुझसे भी पूछा तो मैने भी उसे अपने बारे मे बताया . दरअसल अब तक हम दोनो अच्छे दोस्त बन चुके थे और जैसे ही टाइम मिलता दोनो काफ़ी सारी बातें एक दूसरे से शेयर करते . लेकिन एक चीज़ जो मुझे अक्सर ख़टकने लगी थी वो ये कि हमारी बात चाहे ज़हाँ से शुरू हो , ख़त्म पता नही कैसे आत्महत्या पर ही होती थी . ख़ैर उस टाइम हमारी बस इतनी ही बात हुई और हम काम मे लग गये . इस बीच मुझे पता चला कि उसे लेकर बॉस किसी होटल मे गये और वही सब किया जो आमतौर पर ऐसे दफ़्तरों मे बॉस लोग करना अपना हक़ समझते हैं बाद एक और ख़बर मिली कि ये सब उसके लिए अपनी नौकरी का ही एक हिस्सा बन गया . वह कमज़ोर होती जा रही थी , उसे अक्सर चक्कर भी आने लगे थे कमज़ोरी की वजह से . इसका ज़िक्र वो अक्सर मुझसे करती थी . लेकिन मैं हँस के टाल देता था . उसका काम भी ठीक से नही चल पा रहा था और इसलिए उसे बॉस की डाँट अक्सर ही सुनने के लिए मिल जाती थी .

मैं अब मरती हूँ ...आखिरी किश्त

चौथे से आगे ...
यह आधी रात का वक़्त रहा होगा और वह इतनी रात को मुझे कभी भी फ़ोन नही करती थी . मैने ये सारी बातें उसी समय बॉस को फ़ोन करके बताईं और यह भी बताया कि वह काफ़ी बहकी बहकी बातें कर रही है . बॉस ने उससे बात की , फिर मुझे वापस फ़ोन किया और कहा कि तुम व्हस्की पीकर बैठे हो तभी तुम्हे ये सारी बातें सूझ रही हैं . ख़ैर दूसरे दिन प्रियंका ने मुझे सवेरे फ़ोन करके बताया कि वह ठीक है . हालाँकि उसने रात मे भी बॉस के फ़ोन के बाद मुझे फ़ोन करके कहा भी था कि मैं ये सारी बातें बॉस को क्यो बताईं . लेकिन मैं अपनी ज़िम्मेदारी से नही बच सकता था . इतना सब हो जाने बाद मैं काफ़ी परेशान हो गया . उस दिन मेरा एक न्यूज़ चेनल मे मेरा इंटरव्यू भी था , सो मैं सबके साथ वहा चला गया . वहाँ हम लोग एक पार्क मे बैठ कर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे कि तभी उसका फ़ोन आया . उसने मुझे बताया कि वह लक्ष्मी नगर मे है और शराब ख़रीदने जा रही है . मैं समझ गया कि अब ये लड़की कुछ कर के रहेगी . मैने उसे फ़ोन पर बहुत समझाया . इसी बीच उसने बॉस से अपने संबंध होने कि बात क़बूल की . तब तक हमारी बस इतनी ही बात हो पाई . लौटते हुए हम सारे ही लोग इतना ज़्यादा थक गाये थे कि सभी ने अपने अपने फ़ोन साईलेंट मोड़ पर डाले और खाना खाकर सो गये . दूसरे दिन जब मैं सवेरे सोकर उठा तो देखा कि तड़के 4 बजे उसकी 4 मिस काल पड़ी हुई थी . मैने सोचा कि अभी तो वो सो रही होगी इसलिए मैने तुरंत उसे फ़ोन नही किया . तक़रीबन 9 बजे के आसपास मैने उसे फ़ोन किया लेकिन मुझे कोई जवाब नही मिल पा रहा था . मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा . मैने कई बार उसका फ़ोन ट्राई किया लेकिन कोई रिसपोंस नही मिल रहा थ . काफ़ी डरते हुए मैने पता लगाने की कोशिश की तो ये पता चला कि वह हॉस्पिटल मे है . मैं समझ गया , वो जो कह रही थी , उसने कर दिखाया . फिर दूसरे दिन उसका फ़ोन हॉस्पिटल से आया और उसने मुझे बताया कि उसने तक़रीबन 35-40 नींद की गोलियाँ खा लीं थी. उसी के साथ मुझे पता चला कि उसने कई लोगों से उधार भी लिया था . एक बार उसने मुझे बताया भी था कि उसके उपर काफ़ी उधारी भी हो गयी थी . अब उसे इतने ज़्यादा पैसों की ज़रूरत क्यों पड़ती थी यह तो वही जाने लेकिन जो बात मैं जानता हूँ , उसका ख़ुद का ख़र्च 4-5 हज़ार से ज़्यादा नही था . ज़ाहिर है यह पैसे वह किसी को देती थी . शायद उसका बॉयफ़्रेंड .....
गिद्ध उसके शरीर को ही नही बल्कि उसके मन को भी लगातार नोच रहे थे .. और ये ज़िल्लत वह बर्दाश्त नही कर पाई , मुझे भी उसके बच जाने का दुख हुआ ..काश वो मर ही गयी होती .. हालाँकि अब भी उसके फ़ोन आते हैं और मैं हर बार उससे वादा लेता हूँ कि अब वो दफ़्तर कभी नही जाएगी .. कम से कम बॉस से तो कभी नही मिलेगी ...
एक बार उसने मुझे बड़ी ही मासूमियत से पूछा कि क्यो ना वो बॉस से मिले तो मैने कहा कि तू ख़ूब जानती है कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हू...तब उसने हामी भरी कि
...हाँ ...मैं जानती हूँ कि तू क्यों ऐसा कह रहा है ...
और अंत में ...
आजकल वह कुछ ख़ुश दिखाई देती है ..कहती है कि उसने ग़लत किया .. उसके घर वाले उसे बहुत प्यार करते हैं ..लेकिन मैं जानता हूँ और हर बार उससे बात करने वक़्त महसूस करता हूँ .. कि वो ...वो अब नही रही ..
समाप्त