Showing posts with label सर्वाधिकार साभार. Show all posts
Showing posts with label सर्वाधिकार साभार. Show all posts

Monday, October 14, 2024

संसार का पहला लॉन- कैसे लॉन हमारे दिमाग, फिर घर में घुसे

 मकान बनवाते वक्त मकान के सामने की सजावट के लिए सबसे आसान उपाय अगर आज किसी के दिमाग में आता है तो वो लॉन है। घर के सामने चाहे चार हाथ का लॉन ही क्यों न हो, लेकिन हो। कई घरों में मैंने 2X4 फीट के भी लॉन देखे हैं। और तो और, अब तो लॉन के मारे लोग भले मल्टिस्टोरी इमारतों में रहते हों, अपनी बाल्कनी में ही प्लास्टिक की घास लगवाकर उसे लॉन लुक देने की कोशिश करने लगे हैं। मेरे एक परिचित ने तो अपनी लगभग पूरी छत पर ही लॉन बना रखा है, क्योंकि उनका घर तीन मंजिला इमारत पर है, जिसमें वो सबसे ऊपरी मंजिल पर रहते हैं। लॉन किस तरह से हमारे दिमाग में उगा है, इसके बारे में युवाल नोआ हरारी कुछ काम की बातें बताते हैं।

चैंबर्ड कैसल का लॉन- संसार का पहला लॉन
अपनी किताब होमो डेयस में युवाल नोआ हरारी वो कहते हैं कि पाषाण युग के शिकारी-संग्रहकर्ता अपनी कन्दराओं के प्रवेश द्वार पर घास की खेती नहीं करते थे। ऐसा कोई चारागाह नहीं था, जो एथेनियाई एक्रोपोलिस, रोमन कैपिटोल, यरुशलम के यहूदी देवस्थल या बीजिंग के निषिद्ध नगर आने वाले आगन्तुकों का स्वागत करता। निजी आवासों और सार्वजनिक इमारतों के प्रवेश- द्वार पर लॉन विकसित करने का विचार मध्य युग में फ़्रांसीसियों तथा अंग्रेज़ कुलीनों के क़िलों में जन्मा था। शुरुआती आधुनिक युग में इस आदत ने गहरी जड़ें जमाईं, और यह अभिजात वर्ग की ख़ास पहचान बन गई।

सुव्यवस्थित लॉन ज़मीन की और ढेर सारे काम की मांग करते थे, ख़ासतौर से उससे पहले के दिनों में, जब घास काटने की मशीनें और पानी का छिड़काव करने वाले स्वचालित उपकरण नहीं हुआ करते थे। बदले में, वे कोई मूल्यवान चीज़ नहीं उपजाते थे। आप उन पर जानवरों तक को नहीं चरा सकते थे, क्योंकि वे घास को खाते और उसको रौंद देते। ग़रीब किसान लॉनों पर अपनी क़ीमती ज़मीन और वक़्त बर्बाद नहीं कर सकते थे। इसलिए सामन्ती क़िलों के प्रवेश-द्वार पर विशुद्ध घास के मैदान प्रतिष्ठा के ऐसे प्रतीक हुआ करते थे, जिनकी नक़ल कोई नहीं कर सकता था। वह आने-जाने वालों के सामने पूरी दबंगई के साथ यह दावा करता था : 'मैं इतना धनवान और ताक़तवर हूं, और मेरे पास खेत जोतने वाले इतने दास हैं कि मैं इस हरियाले वैभव को जुटाने में सहज समर्थ हूं'। लॉन जितना ही बड़ा और स्वच्छ होता था, उतना ही वह राजवंश शक्तिशाली होता था। अगर आप किसी ड्यूक के घर जाते और उसके लॉन को बुरी हालत में देखते, तो आप समझ जाते कि वह ड्यूक मुश्किल हालात से गुज़र रहा है।

यह बेशक़ीमती लॉन अक्सर महत्त्वपूर्ण उत्सवों और सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजनों का स्थल हुआ करता था, बाक़ी सारे समय दूसरे लोगों के लिए सख्त रूप से प्रतिबन्धित होता था। आज दिन तक, असंख्य महलों, सरकारी इमारतों और सार्वजनिक स्थलों पर लगे साइनबोर्ड लोगों को 'घास से दूर रहने की' सख्त हिदायत देते हैं। मेरे पूर्व ऑक्सफ़ोर्ड कॉलेज में समूचा अहाता विशाल, आकर्षक लॉन से निर्मित हुआ करता था, जिस पर हमें साल में सिर्फ़ एक दिन चलने या बैठने की इजाज़त हुआ करती थी। अन्य दिनों में बेचारे उस छात्र की शामत आ जाती थी, जिसने घास के उस पवित्र मैदान को अपने पैरों से गन्दा कर दिया होता था।

शाही महलों और सामन्ती क़िलों ने लॉनों को प्रभुत्व के प्रतीक में बदल दिया। जब परवर्ती आधुनिक काल में राजाओं को राजगद्दी से हटा दिया गया और सामन्तों के सिर क़लम कर दिए गए, तो नए राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री लॉन रखने लगे। संसदें, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति भवन और अन्य सार्वजनिक इमारतें स्वच्छ हरी पत्तियों की अनेक कतारों में उत्तरोत्तर अपनी शक्ति की उद्घोषणा करती गईं। इसी के साथ-साथ लॉनों ने खेलों की दुनिया को भी जीत लिया। हज़ारों सालों से मनुष्य बर्फ से लेकर रेगिस्तान तक हर तरह के कल्पनीय मैदानों में खेलते आ रहे थे, लेकिन पिछली दो सदियों में वास्तविक महत्त्वपूर्ण खेल, जैसे कि फुटबॉल और टेनिस घास के मैदानों में खेले जाते रहे हैं। बशर्ते, ज़ाहिर है, आपके पास पैसा हो। रियो डि जनेरियो के फ़ावेलाओं (झुग्गियों) में ब्राजीलीय फुटबॉल की भावी पीढ़ी रेत और मिट्टी पर कामचलाऊ गेदों से खेल रही है, लेकिन समृद्ध उपनगरों में रईसों के बेटे उत्तम तरीक़े से तैयार लॉनों का आनन्द लेते हैं 1

इस तरह मनुष्यों ने लॉन को राजनैतिक शक्ति, सामाजिक हैसियत और आर्थिक समृद्धि से जोड़ लिया। आश्चर्य की बात नहीं कि उन्नीसवीं सदी में उभरते हुए बूर्चा वर्ग ने पूरे उत्साह के साथ लॉन को अपनाया। शुरू में अपने निजी आवासों पर इस तरह की विलासिता सिर्फ़ बैंककर्मियों, वकीलों और उद्योगपतियों के बूते की ही बात हुआ करती थी, लेकिन जब औद्योगिक क्रान्ति ने मध्य वर्ग का विस्तार किया और घास काटने की मशीनों तथा पानी के छिड़काव के स्वचालित उपकरणों को जन्म दिया, तो लाखों परिवार अचानक घरेलू लॉनों का रख-रखाव करने में समर्थ हो गए। अमेरिकी उपनगरों में स्वच्छ और सुव्यवस्थित लॉन रईस आदमी की विलासिता से मध्यवर्ग की ज़रूरत में बदल गए।

यह तब हुआ, जब उपनगरीय गिरजाघरों की पूजन-पद्धति में एक नए अनुष्ठान का योग हुआ। गिरजाघर में इतवार की सुबह की उपासना के बाद बहुत सारे लोग समर्पित भाव से अपने लॉनों की घास काटने छांटने लगे। सड़कों पर चलते हुए आप तत्काल किसी भी परिवार के लॉन के आकार और ख़ासियत से उस परिवार की समृद्धि और हैसियत का निश्चय कर सकते थे। जॉनेस परिवार किसी मुसीबत में फंसा है, इस बात को जानने का उनके घर के सामने के हिस्से के उपेक्षित पड़े लॉन से ज़्यादा पक्का संकेत और कुछ नहीं हो सकता। संयुक्त राज्य अमेरिका में घास आज मक्का और गेहूं के बाद सबसे व्यापक फ़सल है, और लॉन उद्योग (पौधे, खाद, घास काटने की मशीनें, पानी छिड़कने के उपकरण, माली) सालाना अरबों डॉलर का व्यापार करता है।

लॉन पूरी तरह से यूरोपीय या अमेरिकी जुनून नहीं रहा। जिन लोगों ने कभी वैली का भ्रमण नहीं किया, वे भी संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति का लुआख़ भाषण सुनने वाइट हाउस के लॉन में जाते हैं, हरे स्टेडियमों में महत्त्वपूर्ण फुटबॉल खेल खेले जाते हैं, और घास को काटने छांटने की बारी किसकी है, इस बात को लेकर होमर तथा बार्ट सिम्पसन आपस में झगड़ते हैं। सारी दुनिया के लोग लॉनों को सत्ता, पैसे और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। इसलिए लॉन दूर-दूर तक और हर तरफ़ फैल चुके हैं, और मुस्लिम दुनिया का दिल जीतने की तैयारी में हैं। क़तर का नया-नया स्थापित म्यूज़ियम ऑफ़ इस्लामिक आर्ट ऐसे भव्य लॉनों से घिरा हुआ है, जो हारून अल-रशीद के बग़दाद से ज़्यादा लुई चौदहवें के वर्साइल की याद दिलाते हैं। इनका आकल्पन और निर्माण एक अमेरिकी कम्पनी द्वारा किया गया था, और उनकी 100,000 वर्ग गज़ में फैली घास अरब के रेगिस्तान के बीचोंबीच - हरी बनी रहने के लिए ताज़ा पानी की अतिविशाल मात्रा की मांग करती है। इस बीच, दोहा और दुबई के उपनगरों में मध्यवर्गीय परिवार अपने लॉनों पर गर्व करने लगे हैं। अगर वहां सफ़ेद चोगे और काले हिजाब दिखाई न देते होते, तो आप आसानी-से ऐसा सोच सकते थे कि आप मध्य पूर्व की बजाय मध्यपश्चिम में कहीं पर हैं।

लॉन का यह संक्षिप्त इतिहास पढ़ चुकने के बाद, अब आप जब अपने सपनों का मकान तैयार करने की योजना बना रहे होंगे, तब आप मुमकिन है कि सामने के परिसर में लॉन बनाने के बारे में दो बार सोचें। बेशक, आप अभी भी यह करने के लिए स्वतन्त्र हैं, लेकिन आप उस सांस्कृतिक बोझ को झटककर अलग करने के लिए भी स्वतन्त्र हैं, जो यूरोपीय सामन्तों, पूंजीपति मुग़लों और सिम्प्सनों ने आपको वसीयत में दिया है। 

Saturday, September 28, 2019

मुसलमां हैं यूं बस खतावार हैं हम

व्हाटसएप्प पर एक बुजुर्ग इस लिखाई को सुनाते दिखे। पता किया तो सन 2017 में इनकी पहली रिकॉर्डिंग मिली, लेकिन नाम नहीं मिला। कुछ और पता किया तो पता चला कि शायद राहत इंदौरी साहब ने इसे लिखा हो सकता है, लेकिन कहीं भी इसकी स्क्रिप्ट नहीं मिली, इसलिए यह भी कन्फर्म नहीं कि इसे राहत इंदौरी ने ही लिखा है। बहरहाल, जिसने भी लिखा है, कमाल का लिखा है, कहीं गलती हो तो पहले से ही माफी दरकार है। आप भी मुलायजा फरमाएं, जब तक मोदी जी हैं, तब तक मौजूं है- 

हुकूमत के दिल से वफादार हैं हम,
इशारों पे चलने को तैयार हैं,
मुसीबत में फिर भी गिरफ्तार हैं हम,
मुसलमां हैं यूं बस खतावार हैं हम।

सजा मिल रही है अदावत से पहले,
समझते हैं बागी बगावत से पहले,
मुसलमां चीन और जापान में हैं,
यही कौम रूस और यूनान में है,
यही लोग यूरोप और सूडान में हैं,
जहां भी हैं ये अमन ओ अमान में हैं,
हर एक मुल्क में तो वफादार हैं हम,
मगर हिंद में सिर्फ गद्दार हैं हम।

हमें रोज धमकी भी दी जा रही है,
घरों में तलाशी भी ली जा रही है,
बिला वजह सख्ती भी की जा रही है,
अदालत यहां से उठी जा रही है।

जो मासूम थे वो तो मुजरिम बने हैं,
जो बदफितना थे आज हाकिम बने हैं,
कौन सिर में हमें ये रहने न देंगे,
हमें दर्द अपना ये कहने न देंगे,
गम ओ रंज सहिये तो सहने न देंगे,
सितम है कि आंसू भी बहने न देंगे।

जुंबा बंदियां हैं नजरबंदियां हैं,
हमारे लिए ही सारी पाबंदियां हैं,
अब उर्दू जुबां भी मिटानी पड़ेगी,
कि बच्चों को हिंदी पढ़ानी पड़ेगी,
यहां सबको चंदी रखानी पड़ेगी,
रहोगे तो शुद्धि करानी पड़ेगी।

वफादार होने का मेयार ये है,
यकीं फिर भी आ जाए दुश्वार ये है,
तकाजा है अपनी जमाअत को छोड़ो,
मुसलमानों की तुम कयादत को छोड़ो,
नहीं तो चले जाओ भारत को छोड़ो,
यही नजरिया है यही जेहनियत है,
इसी का यहां नाम जम्हूरियत है।

गिराते हो तुम मस्जिदों को गिराओ,
मिटाते हो तुम मकबरों को मिटाओ,
बहाते हो अगर खूं ये नाहक बहाओ,
मगर ये समझकर जरा जुल्म ढहाओ,
जालिम का लबरेज जब जाम होगा,
तो हिटलर और टीटो सा अंजाम होगा।

हमें मुल्क से है भगाने की ख्वाहिश,
हमें दहर से है मिटाने की ख्वाहिश,
तो सुन लें जिन्हें है मिटाने की ख्वाहिश,
तो हमको भी है सर कटाने की ख्वाहिश।

कटेगा सर तो ये मजमून होगा,
हिमालय से शिलांग तक खून होगा,
बिहार और यूपी में हम कुछ न बोले,
हुआ जुल्म देहली में हम कुछ न बोले,
किया कत्ल गाड़ी में हम कुछ न बोले,
घरों में घुसाए तो हम कुछ न बोले।

जालिम अगर यूं ही होते रहेंगे,
तो क्या अहले ईमां सोते रहेंगे?
अलग होके बरतानिया देखता है,
हरएक कौम का पेशवा देखता है,
जमाना हरेक माजरा देखता है,
कोई देखे न देखे खुदा देखता है,
करेगा जो जुल्म यूं आजाद होकर,
खुद ही मिट जाएगा वो बरबाद होकर।

Wednesday, March 14, 2018

हमें ब्रह्मांड का पेटेंट कराके रॉयल्टी वसूलनी चाहिए: हॉकिंग

स्टीफन हॉकिंग मुझे पिछली दो सदियों के महानायक लगते रहे हैं और मैं उन्हें देवतुल्य मानता हूं. उनके न रहने का दुखद समाचार आ रहा है. यह बहुत बड़ा नुकसान है. उन्हें याद करते हुए 2014 की उनकी एक वार्ता के अंश - अशोक पांडे
-------

"इस ब्रह्माण्ड से अधिक बड़ा या पुराना कुछ नहीं है. मैं जिन प्रश्नों की बाबत बात करना चाहूंगा वे हैं: पहला, हम कहां से आये? ब्रह्माण्ड अस्तित्व में कैसे आया? क्या हम इस ब्रह्माण्ड में अकेले हैं? क्या कहीं और भी ‘एलियन’ जीवन है? मानव जाति का भविष्य क्या है?

1920 के दशक तक हर कोई सोचता था कि ब्रह्माण्ड मूलतः स्थिर और समय के सापेक्ष अपरिवर्तनशील है. फिर यह खोज हुई कि ब्रह्माण्ड फैल रहा था. सुदूर तारामंडल हमसे और दूर जा रहे थे. इसका अर्थ यह हुआ कि पहले वे एक दूसरे के नज़दीक रहे होंगे. यदि हम पीछे इसके विस्तार में जाएं तो पाएंगे कि आज से करीब 15 बिलियन वर्ष पहले हम सब एक दूसरे के ऊपर रहे होंगे. यही ‘बिग बैंग’ था, ब्रह्माण्ड की शुरुआत.

लेकिन क्या बिग बैंग से पहले भी कुछ था? अगर नहीं था तो ब्रह्माण्ड की रचना किसने की? बिग बैंग के बाद ब्रह्माण्ड उस तरह अस्तित्व में क्यों आया जैसा वह है? हम सोचा करते थे कि ब्रह्माण्ड के सिद्धांत को दो भागों में बांटा जा सकता है. पहला यह कि कुछ नियम थे जैसे मैक्सवेल की समीकरण वगैरह और यह देखते हुए कि एक दिए गए समय में समूचे स्पेस में उसकी जो अवस्था थी उसमें सामान्य सापेक्षता ने ब्रह्माण्ड के विकास को निर्धारित किया. और दूसरा यह कि ब्रह्माण्ड की प्रारंभिक अवस्था का कोई प्रश्न ही नहीं था.

पहले हिस्से में हमने अच्छी तरक्की की है, और अब हमें केवल सबसे चरम परिस्थितियों के अलावा अन्य सभी परिस्थितियों में विकास के नियमों का ज्ञान है. लेकिन अभी हाल के समय तक हमें ब्रह्माण्ड के लिए प्रारम्भिक परिस्थितियों की बाबत बहुत कम ज्ञान था. यह और बात है कि विकास के नियमों में इस तरह का वर्गीकरण और प्रारम्भिक परिस्थितियां अलग और विशिष्ट होने के साथ ही समय और स्पेस पर निर्भर होती हैं. चरम परिस्थितियों में, सामान्य सापेक्षता और क्वांटम थ्योरी समय को स्पेस में एक अलग आयाम की तरह व्यवहार करने देती हैं. इस से समय और स्पेस के बीच का अंतर मिट जाता है, और इसका यह अर्थ हुआ कि विकास के नियम प्रारम्भिक परिस्थितियों को भी निर्धारित कर सकते हैं. ब्रह्माण्ड अपने आप को शून्य में से स्वतःस्फूर्त तरीके से रच सकता है.

इसके अलावा, हम एक प्रायिकता की गणना कर सकते हैं कि ब्रह्माण्ड अलग-अलग परिस्थितियों में अस्तित्व में आया था. ये भविष्यवाणियां कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड के WMAP उपग्रह के पर्यवेक्षणों, जो कि बहुत शुरुआत के ब्रह्माण्ड की एक छाप है, से बहुत ज्यादा मेल खाती हैं. हम समझते हैं कि हमने सृष्टि के रहस्य की गुत्थी को सुलझा लिया है. संभवतः हमने ब्रह्माण्ड का पेटेंट करवाकर हर किसी से उसके अस्तित्व के एवज़ में रॉयल्टी वसूलनी चाहिए.

अब मैं दूसरे बड़े सवाल से मुख़ातिब होता हूं – क्या हम अकेले हैं या ब्रह्माण्ड में और भी कहीं जीवन है? हम विश्वास करते हैं कि धरती पर जीवन स्वतःस्फूर्त ढंग से उपजा, सो यह संभव होना चाहिए कि जीवन दूसरे उपयुक्त ग्रहों पर भी अस्तित्व में आ सके जिनकी संख्या पूरी आकाशगंगा में काफी अधिक है .

लेकिन हम नहीं जानते कि जीवन सबसे पहले कैसे अस्तित्व में आया. हमारे पास इसके पर्यवेक्षणीय प्रमाणों के तौर पर दो टुकड़े उपलब्ध हैं. पहला तो 3.5 बिलियन वर्ष पुराने एक शैवाल के फॉसिल हैं. धरती 4.6 बिलियन वर्ष पहले बनी थी और शुरू के पहले आधे बिलियन सालों तक संभवतः बहुत अधिक गर्म थी. सो धरती पर जीवन अपने संभव हो सकने के आधे बिलियन वर्षों बाद अस्तित्व में आया जो कि धरती जैसे किसी गृह के दस बिलियन वर्षों के जीवनकाल के सापेक्ष बहुत छोटा कालखंड है. इससे यह संकेत मिलता है कि जीवन के अस्तित्व में आने की प्रायिकता काफी अधिक है. अगर यह बहुत कम होती तो आप उम्मीद कर सकते थे कि ऐसा होने में उपलब्ध पूरे दस बिलियन वर्ष लग सकते थे.

दूसरी तरफ, ऐसा लगता है कि अब तक हमारे गृह पर अजनबी ग्रहों के लोगों का आगमन नहीं हुआ. मैं UFO’s की रपटों को नकार रहा हूं. वे सनकियों या अजीबोगरीब लोगों तक ही क्यों पहुंचते हैं? अगर ऐसा कोई सरकारी षडयंत्र है जो इन रपटों को दबाता है और अजनबी ग्रहवासियों द्वारा लाये गए वैज्ञानिक ज्ञान को अपने तक सीमित रखना चाहता है, तो ऐसा लगता है कि यह नीति अब तक तो पूरी तरह से असफल रही है. और इसके अलावा SETI प्रोजेक्ट के विषद शोध के बावजूद हमने किसी भी तरह के एलियन टीवी क्विज़ शोज़ के बारे में नहीं सुना है. इससे संभवतः संकेत मिलता है कि हमसे कुछ सौ प्रकाशवर्ष की परिधि में हमारे विकास की अवस्था में कहीं कोई एलियन सभ्यता नहीं है. इसके लिए सबसे मुफ़ीद उपाय यह होगा कि एलियनों द्वारा अपहृत कर लिए जाने की अवस्था के लिए बीमा पालिसी जारी की जाएं.

अब मैं सबसे आख़िरी बड़े प्रश्न पर आ पहुंचा हूं; मानव सभ्यता का भविष्य. अगर हम पूरी आकाशगंगा में अकेले बुद्धिमान लोग हैं, तो हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा अस्तित्व बना रहे और चलता रहे. लेकिन हम लोग अपने इतिहास के एक लगातार अधिक खतरनाक होते हुए दौर में प्रवेश कर रहे हैं. हमारी आबादी और हमारी धरती के सीमित संसाधनों का दोहन बहुत अधिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं, साथ ही हमारी तकनीकी क्षमता भी बढ़ रही है कि हम पर्यावरण को अच्छे या बुरे दोनों के लिए बदल सकें. लेकिन हमारा आनुवांशिक कोड अब भी उन स्वार्थी और आक्रामक भावनाओं को लिए चल रहा है जो बीते हुए समय में अस्तित्व बचाए रखने के लिए लाभदायक होती थीं. अगले सौ सालों में विनाश से बच पाना मुश्किल होने जा रहा है, अगले हज़ार या दस लाख साल की बात तो छोड़ ही दीजिये.

हमारे अस्तित्व के दीर्घतर होने का इकलौता अवसर इस बात में निहित है कि हम अपनी पृथ्वी ग्रह पर ही न बने रहें, बल्कि हमें अन्तरिक्ष में फैलना चाहिए. इन बड़े सवालों के उत्तर दिखलाते हैं कि पिछले सौ सालों में हमने उल्लेखनीय तरक्की की है. लेकिन यदि हम अगले सौ वर्षों से आगे भी बने, बचे रहना चाहते हैं तो हमारा भविष्य अन्तरिक्ष में है. इसीलिये मैं हमेशा ऐसी अन्तरिक्ष यात्राओं का पक्षधर रहा हूं जिसमें मनुष्य भी जाएं.

अपनी पूरी ज़िन्दगी मैंने ब्रह्माण्ड को समझने और इन सवालों के उत्तर खोजने की कोशिश की है. मैं भाग्यशाली रहा हूं कि मेरी विकलांगता गंभीर अड़चन नहीं बनी. वास्तव में इसके कारण मुझे उससे अधिक समय मिल सका जितना अधिकतर लोग ज्ञान की खोज में लगाते हैं. सबसे आधारभूत लक्ष्य है ब्रह्माण्ड के लिए एक सम्पूर्ण सिद्धांत, और हम अच्छी तरक्की कर रहे हैं.

मैं समझता हूं कि यह बहुत संभव है कि कुछ सौ प्रकाशवर्षों के दायरे में हम इकलौती सभ्यता हों; ऐसा न होता तो हमने रेडियो तरंगें सुनी होतीं. इसका विकल्प यह है कि सभ्यताएं बहुत लम्बे समय तक नहीं बनी रह पातीं, वे खुद अपना विनाश कर लेती हैं."

Monday, March 12, 2018

कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए...

मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश, कि चलो फ्रीलांसिंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे।
दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, सस्‍ते का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।
इसी बीच बीवी ने एक दि‍न खुशखबरी दी तो पत्रकार महोदय ने मंदि‍र में जुगाड़ लगाकर प्रसाद में चढ़े दो तीन कि‍लो लड्डू हथि‍याए और दफ्तर में सबका मुंह मीठा कराया। साथि‍यों ने जै-जै की, पत्रकार महोदय फूले। मैंने भी देखा, बाइचांस वहीं थी। सबकुछ ठीक चल रहा था कि पांचवे हफ्ते डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ भी ठीक नहीं। बीवी को भर्ती कराया, बच्‍चा गंवाया। डॉक्‍टरनी ने तो फीस नहीं ली, मगर साढ़े नौ हजार की दवाइयां लि‍ख दीं।
साथी पत्रकारों  ने मदद की, फि‍र भी साढ़े चार हजार रुपए की कमी थी। पत्रकार महोदय को वही अधि‍कारी याद आए, जि‍न्‍हें उनके बड़े भाई ने सहारनपुर में उनका लोकल गार्जियन बनाया था। ये पहुंचे उनके पास, लेकि‍न मुश्‍किल ये कि बतौर पत्रकार तो उन्‍होंने उस अधि‍कारी की भी बेजा हरकतें अखबार-ए-आम की हुई थीं। अब बोलें तो बोलें कैसे। बड़ी मुश्‍किल से अटक-अटक कर मुसीबत के बारे में बताया। अंत में मदद की दरख्‍वास्‍त की- यह कहकर कि सात तारीख को पूरी रकम चुका देंगे। अधि‍कारी महोदय ने कहा- सोचेंगे।
पत्रकार महोदय के मुताबि‍क उन्‍हें अंदाजा हो गया था, सो अधि‍कारी के यहां से बाइक लेकर नि‍कले और पहुंचे सीधे मि‍स्‍त्री की दूकान पर। बाइक बेच दी और उसकी जगह ली एक और भी सस्‍ती और तीसरे दि‍न खराब रहने वाली बाइक। बचे हुए पैसों से दवा खरीदी और घर पहुंचे।
कुछ समय पहले उनसे बात हो रही थी। बता रहे थे कि लाला ने मजीठि‍या न देने के लि‍ए चार बार साइन कराए हैं। फि‍र उसी अधि‍कारी की याद दि‍लाई। बोले कि दि‍ल्‍ली रोड पर वसूली करते वि‍जलेंस वालों ने पकड़ा। कहने लगे- आप तो वापस चली गई थीं, मगर इस अधि‍कारी ने संपादक के पास लि‍खकर शि‍कायत की थी और मेरी रि‍कॉर्डिंग भी कर ली थी। लेकि‍न रिकॉर्डिंग में भी मैंने कोई गलत बात नहीं की थी, इसलि‍ए संपादक जी ने छोड़ दि‍या। दफ्तर आकर भी उन्‍होंने बहुत हंगामा कि‍या तो संपादक जी ने उनसे कहा कि आप मुकदमा दर्ज कराइए। वो तो पुलि‍स में नहीं गए, मगर अब पुलि‍स उन्‍हें जरूर ले गई।
अब उन्‍हें महीने में साढ़े बारह हजार रुपए तनख्‍वाह, पांच सौ मोबाइल और हजार पेट्रोल के मि‍लने लगे हैं। आलू प्‍याज वैसे ही साथी पत्रकार के गांव से बि‍ला नागा आ जाती है, जैसे आठ दस साल पहले आती थी। पैसे पहले बीस बाइस को खत्‍म होते थे, अब तो 18 तक का भी इंतजार नहीं करते और अगर सात को संडे पड़ गया तो नौ तक ही मि‍लते हैं। हर महीने आधी तनख्‍वाह एडवांस में कटती है। मैंने उनको कई बार कहा कि वि‍चार से जीवन नहीं चलेगा, कुछ कमाई करि‍ए। रि‍पोर्टर हैं तो अधि‍कारि‍यों से या कि‍सी से भी कुछ कमाने की सेटिंग करि‍ए। बोले, एक जगह मैगजीन डि‍जाइन करने का काम मि‍ला है, महीने में दो बार करना है, ढाई दे देंगे। कुल मि‍लाकर वो वैसे कमाने के लि‍ए नहीं मान रहे हैं, जैसे कि मैं कह रही हूं।
बात सहारनपुर के पत्रकार की ही नहीं है, कहानी अकेले एक अखबार की भी नहीं। पहले संपादक भी सबकी सोचते थे, अब तो संपादक वह जीव है जो सबसे ज्‍यादा सैलरी इसलि‍ए लेता है कि पत्रकारों को सबसे कम सैलरी दी जा सके। तुर्रा ये कि पत्रकारि‍ता का त भी न पहचानने वाले जब तब उन्‍हें भ्रष्‍ट कहते रहते हैं। जानते हैं, पत्रकार दुनि‍या का अकेला ऐसा जीव होता है जो दुनि‍याभर के लि‍ए आवाज उठाता है, पर खुद के लि‍ए ऐसे खामोश हो जाता है, जैसे कि‍सी ने जबरदस्‍ती उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर बांध दि‍या हो। याद करि‍ए आखि‍री बार शहर में कब पत्रकारों को अपने लि‍ए आवाज उठाते देखा।
पत्रकार अगर भ्रष्‍ट हैं तो मैं कहती हूं कि‍ उन्‍हें और भी भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए। तब तक पूरी तरह से भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए, जब तक कि उनका और उनके परि‍वार का पेट तीन वक्‍त न भरे। धर्म भी यही कहता है। जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं। उन्‍हें अपनेे ही बच्‍चों की भूख भरी आह लगेगी।
जि‍स कि‍सी को इस भ्रष्‍टाचार से दि‍क्‍कत है, तो पहले वह पत्रकारों की मदद करना शुरू करें, तभी उनकी भी दि‍क्‍कत खत्‍म होगी, पत्रकारों की भी। कुछ नहीं कर सकते तो कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए। जबरदस्‍ती। पत्रकारि‍ता हमेशा समाज के भरोसे ही आगे बढ़ती आई है, न कि सत्‍ता के। सत्‍ता के भरोसे होती तो सत्‍ता उसे कब की मिटा चुकी होती। चीन में देखि‍ए, मि‍टा ही चुकी है। दि‍ल्‍ली, लखनऊ, पटना, कलकत्‍ता का चश्‍मा उतारकर जरा उन शहरों के पत्रकारों की भी खबर लीजि‍ए, जहां से खबरें आती हैं। जोगेंद्र सिंह और राम चंदेर प्रजापति याद हैं या भूल गए?

लेखिका- रोहिणी गुप्ते

Saturday, March 10, 2018

हिंदी पत्रकारिता के पितामह का गांव

बाबूराव विष्णुराव पराड़कर: तस्वीर- शीतल वर्मा
काशी का पराड़कर भवन पत्रकारिता और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र है, किंतु पराड़ गांव में कुछ बुजुर्गों की यादों के सिवा कुछ नहीं जिसे पराड़कर से जोड़ा जा सके।आजादी के संघर्ष में अपनी लेखनी से अभूतपूर्व योगदान करने वाले गैर हिंदीभाषी बाबूराव विष्णु पराड़कर का हिंदी पत्रकारिता में ऊंचा स्थान रहा है। नई पीढ़ी के पत्रकारों-संपादकों को उनके कृतित्व से प्रेरणा मिले इस उद्देश्य से उनके पैतृक गांव ‘पराड़’ (महाराष्ट्र) में स्मारक की रूपरेखा मूर्तरूप ले रही है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में सिंधुदुर्ग जिले के मालवण -कनकवली इलाके का यह गांव आज भी हिंदी पत्रकारिता और स्वाधीनता संग्राम में पराड़कर जी के योगदान पर गर्व करता है, पर सरकार और पत्रकारिता जगत की उपेक्षा के कारण यह अज्ञात-अनाम सा है। गांव के बुजुर्ग ‘पुलिस पाटिल’ सुभाष सोमा पराड़कर बताते हैं कि 17-18 साल पहले बंबई (अब मुंबई) से किसी मराठी समाचारपत्र के संपादक आए थे और गांव में पराड़कर स्मारक के बारे में लोगों से बातचीत कर चले गए। तब जिन उम्रदराज गांववालों से उनकी बातें हुई थीं और जिन्हें बाबूराव और उनके पिता विष्णुराव पराड़कर के बारे में आधिकारिक जानकारी थी, वे अब नहीं हैं। पराड़कर परिवार के वरिष्ठ सदस्य बताते हैं कि उनका वंश कुलकर्णी था, परंतु पराड़ गांव का होने के कारण उन्होंने नाम के आगे पराड़कर टाइटल लगाया।

संपादक पराड़कर की स्मृति उनके कार्यक्षेत्र काशी में जीवित रखने के उद्देश्य से वहां स्थापित पराड़कर भवन की संकल्पना 1940 में काशी पत्रकार संघ की स्थापना के समय की गई थी। संघ के पहले अध्यक्ष थे ‘आज’ और ‘संसार’ के यशस्वी संपादक तथा राजनीतिज्ञ पंडित कमलापति त्रिपाठी। आगे चलकर पराड़कर भवन नगर के बीच बना, जो आज पत्रकारिता और सामाजिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र है, किंतु पराड़ गांव में उनकी स्मृति में कुछ बुजुर्ग लोगों की यादों के सिवा कुछ भी नहीं है।

मैं काशी पत्रकार संघ का अध्यक्ष 1982 से 1984 तक था। उसी दौरान पराड़कर जी के गांव जाने और वहां स्थायी पराड़कर स्मृति की स्थापना का संकल्प मन में आया था। जलगांव के उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव में पुणे निवासी मराठी के वरिष्ठ पत्रकार एसके कुलकर्णी से मुलाकात के बाद इसके मूर्त रूप लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। कोल्हापुर में प्रतिष्ठित पत्र ‘पुढारी’ के संपादक प्रताप सिंह जाधव ने भी आत्मीय भेंट में स्मारक के लिए पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

मगर पराड़ गांव जाने का योग बना पिछले साल। कुलकर्णी के साथ जब हम पराड़ पहुंचे तो वहां सरपंच श्वेता फोंडेकर, जिला परिषद सदस्य वसंत सातविलकर और अधिकारियों ने स्वागत कर गांव की स्थिति बताई। वे हमें अंदर गांव में उस स्थान पर ले गए जहां कभी बाबूराव विष्णु पराड़कर के नाम से पाठशाला चलती थी। अब वहां झाड़-झंखाड़ भर हैं। गांव के लोग बड़ी तादाद में आ गए और सभी ने स्मारक की योजना का भरपूर स्वागत करते हुए ग्राम पंचायत की पर्याप्त भूमि और अन्य सहयोग प्रदान करने का संकल्प व्यक्त किया।

मुंबई के साथियों ने इस संकल्प को मजबूती दी। मुंबई प्रेस क्लब के मंत्री धर्मेंद्र जोरे तथा कोषाध्यक्ष ओम प्रकाश तिवारी से विस्तृत चर्चा हुई। तिवारी ने इस परियोजना को अपना और प्रेस क्लब का ‘ड्रीम प्रॉजेक्ट’ बताते हुए पर्याप्त संसाधन जुटाने का आश्वासन दिया। पराड़कर स्मारक की यह परियोजना मूर्त रूप ले और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के विशेष मार्गदर्शन में पराड़कर स्मारक का संकल्प पूर्ण हो, इसके लिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा है।

मुख्यमंत्री फड़नवीस ने मेरे साथ गए काशी तथा मुंबई के पत्रकारों को यह ठोस आश्वासन दिया कि पूरी परियोजना का प्रारूप मिलते ही काम शुरू हो जाएगा। मुख्यमंत्री का यह मंतव्य था कि मराठी के प्रथम पत्रकार ‘दर्पण’ के संपादक बाला साहेब जांभेकर के औरस क्षेत्र (सिंधुदुर्ग जिला मुख्यालय) में निर्माणाधीन स्मारक की ही भांति पराड़कर जी का कीर्तिस्मारक भी शीघ्र बन जाएगा। स्मारक की योजना मूर्तरूप ले ले तो यह स्थान भारतीय पत्रकारिता का एक प्रमुख तीर्थ होगा।
लेखक- राममोहन पाठक

Monday, July 10, 2017

पढ़िए नूर ज़हीर की कहानी बालूचरी

अकरम अली को अपनी आँखों यक़ीन नहीं हो रहा था। उस जैसे ग़रीब तांती के दस्तरखान पर इतने पकवान! इतनी भेंट तो कभी किसी ने नहीं दी; शायद आजतक कोई गाहक, इतना अमीर नहीं आया जितना यह सामने बैठा खरीदार , जो एक हाथ से दाढ़ी सहला रहा था और दूसरे से तस्बीह फेर रहा था। इसे कैसे पता चला? किसने इसे खबर दी होगी ? सवाल दिल में आते ही अकरम अली ने ग़ुस्से से अपने बड़े बेटे शरीफुद्दीन की तरफ देखा जो बाप से आँखे चुराकर उस अरब शेख की चापलूसी में लगा हुआ था. वैसे सुलगते लोबान की खुशबू और नई बालूचरी साड़ी की खबर फैलते देर नहीं लगती. बशीरहाट में सभी जानते थे अकरम ने एक नई बालूचरी साड़ी तैयार की है, लेकिन इसकी खबर कलकत्ता और इस शेख तक पहुंचाने की क्या ज़रूरत थी?
अपनी ही लाइ हुई, आगे बढ़ी मिठाई की प्लेट को इशारे से इंकार करते हुए शेख ने मामूली मलमल में लिपटी हुई बालूचरी की तरफ हाथ बढ़ाया। अकरम अली ने ढंकी हुई साड़ी पर हाथ रखा। उसका सारा जिस्म जैसे झनझना उठा। कितनी आस से उसने इस साड़ी को करघे पर चढ़ाया था । सबसे नज़र बचाकर, अपनी बीवी के ज़ेवर बेचकर मुर्शिदाबाद गया था, रेशम के कोये खरीदने। उसने सोचा था खदीजा को तो मरे चार साल होने को आये, अब उसके ज़ेवर रखने से क्या फ़ायदा ? एक एक रेशम के कोये को उसने अपने सामने बंटवाया था और तार बनवाये थे. जब रेशम के धागे बन गए तब रंगाई में कितनी एहतियात बरती थी उसने। तभी तो ऊपर का मलमल हटाकर, पहली तह खुलते ही जैसे ही पल्लू सामने आया आसपास खड़े लोगो की सांस थम गई और शेख के मुंह से यक ब यक निकला "सुभांनल्लाह।"
अकरम अली के तीनो बेटों की बांछे खिल गई --शेख़ फंस गया!
कांपते हाथों से अकरम अली ने साड़ी की एक एक परत खोलनी शुरू की। हर तह के साथ यादों का एक काफिला जुड़ा हुआ था -- नीले रंग पर उसने कितनी बहस की थी ---आकाश नील, समुन्दर नील, शंख नील या फिरोज़ी नील ! तंग आकर ग़ुलाम नबी रंगरेज़ ने कहा था---अरे बाबा मोर के पंखों में इतने नील होते हैं क्या?
अकरम अली हंस पड़ा था "अरे इतने नील नहीं होते तो मोर नाचता क्यों है ? क्या मोर बादल देखकर नाचता है? बेवकूफ, वो अपने रंग दिखाने लिए इतराता है!"
"तो नाचता मोर बनाना ज़रूरी है क्या?" ग़ुलाम नबी ने आगे हुज्जत की।
"वाह ! जो नाचे न वह मोर काहे का, वह तो कौआ हुआ। "
बालूचरी बनाना कोई ख़ाला जी का घर नहीं है इसीलिए बस दस या बारह साड़ियां ही बनाता है अकरम अली साल भर में। ज़्यादातर साड़ियां दुर्गा पूजा के लिए खरीदी जाती हैं। आस पास की सार्वजनिक पूजा कमिटियों से लेकर कलकत्ता तक की पूजा कमिटियों में होड़ लगी रहती है ; अकरम अली की बनाई बालूचरी हाथ लग जाए और पूजा में स्थापित होने वाली दुर्गा ठाकुर के रूप को चार चाँद लग जायें। पूजा पंडाल में आने वाले लोग भी झट पहचान जाते और एक दुसरे से कहते ---'अकरम अली तांती की साड़ी है ना ?' अकरम का सीना गर्व से फूल जाता I लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं दिल में एक काँटा सा चुभता रहता। उसने तो साड़ी माँ को बेचीं है। भेंट तो उस भक्त ने की जिसने उसके दाम चुकाए। फिर वह दिल को समझाता और वादा करता, एक साड़ी वह ऐसी बनाएगा जो अपने आप में एक मिसाल होगी; बेषकीमती! नायाब! कारीगरी और कला की ऐसी मिसाल जो खुद अकरम अली के हुनर को पार कर जाएगी, वह हाथ की नफासत उसमे दिखेगी जो कला का दर्जा पायेगी। वह साड़ी जो वह देवी को बेचेगा नहीं; देवी को भेंट करेगा !
ढब की आवाज़ से अकरम अली का ध्यान टूटा. सामने एक हज़ार के नोटों का बण्डल पड़ा था। जल्दी जल्दी तीन और बण्डल तख़्त पर गिरे. एक लाख से ज़्यादा साडी का दाम नहीं था। यह तो चार लाख थे। उसके दिल में एक टीस सी उठी। यही रुपये पांच साल पहले मिल गए होते तो खदीजा बच जाती। न उसकी जान बचा पाया न ही उसकी ख्वाहिश पूरी कर पाया। बेचारी दिल में बालूचरी पहनने की आस लिए इस दुनिया से चली गई। शेख ने एक और गद्दी उसकी तरफ बढ़ाई। उसके पास खड़ा उसका सेक्रेटरी बोला "यह तुम्हारी बख्शीश है, तुम्हारे हुनर और मेहनत की दाद दे रहे हैं शेख !"

"लेकिन मोहतरम, आपके देश में तो औरतें साड़ी पहनती नहीं। आप इसका क्या करेंगे ?"
शेख सवाल समझ कर मुस्कुराया "अगले महीने मेरी शादी है; हम लोगों में लड़की के लिए लड़के वालों की तरफ से अबाया भेजा जाता है। इस साड़ी को काटकर अबाया बनेगा; पल्लू से नक़ाब और ऊपर वाला हिस्सा। बहुत खूबसूरत लगेगा इसका अबाया; शायद हमारी बीवी इसे पहली रात को ही पेहेनना चाहे। "

"आप मेरी साड़ी पर कैची चलवाएंगे?"
"काटे बग़ैर तो बुर्का नहीं बन सकता।" शेख अपनी होने वाली बीवी के लिए बहुत से कीमती तोहफे खरीद रहा था। बंगाल की नायाब सोने की नक्काशी के ज़ेवर खरीदने कलकत्ता आया था। वहीं उसे इस साडी की खबर मिली थी और इसी की लालच में इतनी दूर बशीरहाट आया था। सौदा हो गया था अब बेकार बातों में वक़्त गवाना उसे खल रहा था.
अकरम अली खड़ा हो गया। सबको नज़र भरकर देखा और बोला "बुर्का तो तन ढंकने के लिए होता है। "
"सभी कपडा तन ढंकने के लिए होता है." शेख ने दुभाषिये के ज़रिये जवाब दिया।
"सभी का तो मैं नहीं जानता, साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं होती."
"तो फिर किसलिए होती है ?" शेख ने तंज़ से सवाल किया।
"सदियों पहले इंसान जानवर की खाल और पेड़ की छाल से भी तन ढँक लेता था. इतना बेहतरीन सूत और रेशम, ऐसे ऐसे रंग, इतनी कारीगरी, ऐसे नमूने ईजाद करने की क्या ज़रूरत थी? नहीं शेख़ साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं, जिस्म का हुस्न उभारने के लिए होती है। साड़ी पल्लू को आँचल करके सिर ढंकते हैं ताकि वह बार बार फिसले और काले बालों की घटा लहरा ये और उसमे खिंची हुई सीधी मांग जैसे बिजली का कौंधा ! पल्लू कंधे पर यूँ डाला जाता है ताकि बार बार ढलक जाये और सामने वाले की नज़रे गले से गुज़रती, छाती के उभार से होती, कमर के ख़म पर रूकती, नितम्बो की गोलाइयों पर से फिसलती धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरे।”

कुछ समझकर कुछ न समझकर शेख हंसा "तुम तो तांती काम और शायर ज़्यादा मालूम होते हो। इसीलिए औरतों के पहनने की चीज़ बनाते हो , आशिकमिजाज जो ठहरे। "
"जी हाँ सुनते हैं पहले यूनान और रोम के मर्द भी साड़ी जैसा लिबास पहनते थे; लेकिन मर्दों का सीधा सपाट, लठ जैसा शरीर साडी की ताब क्या लाता ? मर्दों से साडी कबकी छूट गई, औरतें आजतक पेहेन रही हैं। "
"खैर वह सब मैं नहीं जानता , हाँ तुम्हारी साड़ी बेजोड़ है। मेरी बीवी इसका अबाया पहनकर बहुत खुश होगी। "
"मैं अपनी साड़ी आपको नहीं बेचूंगा! "
अकरम के छोटे से घर का आँगन खचाखच भरा हुआ था। बशीरहाट में कभी मर्सिडीज़ बेन्ज़ देखी नहीं गई थी। अंदर हो रही बातचीत को सब दम साधे सुन रहे थे। जैसे ही अकरम अली ने साड़ी न बेचने का ऐलान किया बाहर जमा भीड़ जैसे अचानक फट पड़ी; जितने मुह उतनी बात। एक पल को तो शेख़ भी हक्का बक्का रह गया फिर संभलते हुए बोला "क्या कीमत हमने काम लगाई है?"
अकरम कुछ पल चुप रहा फिर साड़ी पर हाथ फेर और उसे बहुत संभाल कर मलमल में लपेटते हुए बोला "यह साड़ी मेरी रूह है शेख साहब और रूह को काट फाड़ कर, टुकड़े टुकड़े नहीं किया जाता, सुइयाँ चुभाकर छलनी नहीं करते आत्मा को मोहतरम!"
"क्या कह रहे हो अब्बा ?" अकरम का दूसरा बेटा करीमुद्दीन बोला। "इतना पैसा तो हमने कभी देखा भी नहीं है!"

"चुप रह कूढ़ कहीं के. कितना तुझे अपना हुनर सिखाने की कोशिश की पर रहा तू जानवर का जानवर ही। तांत और रेशम आंकना तो दूर की बात तुझसे तो करघे पर बैठा भी नहीं जाता। आधे घंटे में ही कहता है 'हाय हाय मेरी कमर दुःख रही है ‘ अरे कमर तोड़े और आँखे फोड़े बिना कहीं बालूचरी बनती है ? "
"लेकिन बनाई तो बेचने के लिए है न?" शेख के सेक्रेटरी ने पूछा।
"आजतक जितनी साड़ियां बनाई सब बेचीं; यह नहीं बेचूंगा। यह साड़ी मैंने माँ दुर्गा के लिए बनाई है।”
"यह कौन हैं ?" शेख ने शायद माँ दुर्गा को कोई दूसरा, ज़्यादा मालदार गाहक समझा।
"अब्बा, देवी को पहनाई गई साड़ी भी तो बर्बाद ही होती है न। ठाकुर के साथ ही विसर्जन हो जाता है साड़ी का। "
ज़ोर की तड़ाक की आवाज़ आई और शमसुद्दीन गिरते गिरते बचा "खबरदार जो काफिरों जैसी बाते मुंह से निकाली। बेटी को सजा संवार कर ही तो ससुराल भेझा जाता है। मेरी बनाई हुई साड़ी पहनकर, दस दिन से बिझुड़े शिव को दुर्गा रिझाती है। तभी तो तप भांग होता है महातपस्वी का, सब मेरी बनाई हुई साड़ी के कारण ही तो। "
"इतनी साड़ियां एक साथ पहनती है देवी दुर्गा?' शरीफउद्दीन ने गाल सहलाते हुए पूछा।
"कितनी पहनती है, कैसे पहनती है, क्यों पहनती है यह तो देवी ही जाने। मैं बस इतना जानता हूँ की मेरी बनाई साड़ी बहुत पसंद करती है माँ, इसीलिए तो हर साल से बेहतर साड़ी बन जाती है, देवी माँ की दया से। "
शेख उठ खड़ा हुआ. ग़ुस्से से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। "तुम मुसलमान होकर भी देवी देवता को मानते हो-----ताज्जुब है!"
अकरम अली के चेहरे पर न घुसा था, न नफरत , न नाराज़गी न हिकारत. एक मासूम सी ख़ुशी उसके चेहरे पर खेल रही थी, जैसी कोई बच्चा, अपने घर के रोशनदान में दिए चिड़िया के अण्डों में से बच्चे निकलते, बड़े होते और अंत में पहली उड़ान भरते देख रहा हो। मलमल में लिपटी बालूचरी साड़ी को अपने सीने से लगाते हुए वो पूरे ऐतमाद से बोला "आप इंसान होकर भी कला और फ़न का मर्म नहीं समझते ---ताज्जुब है!"
--------------------
यह कहानी मूलरूप से पत्रिका कथादेश में प्रकाशित हुई है। प्रस्तुत कॉपी फेसबुक से ली गई है। नूर जहीर ख्यातिलब्ध साहित्यकार व रंगकर्मी हैं। 

Tuesday, July 21, 2015

आबे हयात से एक पाठ

''संस्‍कृत की इतनी रक्षा की गई, फि‍र भी मनु-स्‍मृति जो वेदों के संपादन से कई सौ वर्ष बाद लि‍खी गई, उसमें और वेदों की भाषा में बड़ा स्‍पष्‍ट अंतर है और अब समय बीतने पर यह अंतर और भी अधि‍क हो गया है। लेकि‍न क्‍योंकि‍ राज्‍य और प्रामाणि‍क ग्रंथों पर धर्म का चौकीदार बैठा था, इसलि‍ए हानि‍ का अधि‍क भय न था कि अकस्‍मात 543 ई.पू. में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक शाक्‍य मुनि‍ का जन्‍म हुआ जो मगध देश से उठे थे। इसलि‍ए वहीं की प्राकृत में धर्मोपदेश प्रारंभ कि‍या, क्‍योंकि‍ अधि‍कतर काम जनसाधारण से था और स्‍त्री-पुरुष से लेकर बच्‍चे और बूढ़े तक, सब यही भाषा बोलते थे। उनके ओजस्‍वी वक्‍तव्‍यों से उक्‍त धर्म ऐसा फैलना प्रारंभ हुआ जैसे जंगल में आग लगे। देखते-देखते धर्म, राज्‍य, समाज, रीति‍-रि‍वाज, धर्म-वि‍धान सबको जलाकर भस्‍म कर दि‍या और मगध देश की प्राकृत समस्‍त राज-दरबार और समस्‍त कार्य की भाषा हो गई। प्रताप के यश से वि‍द्या एवं कला में भी ऐसी उन्‍नति‍ हुई कि थोड़े ही दि‍नों में अद्भुत ग्रंथों की रचना हो गई और इसी भाषा में वि‍द्याओं एवं कलाओं के पुस्‍तकालय सज गए और कलाओं की रचना शालाएं खुल गईं। कहीं कोने बि‍चाले में जहां के राजा वेद को मानते रहे, वहां वेदों का प्रभाव रहा। अन्‍य राज दरबार और वि‍द्वत परि‍षद सब मागधीमय हो गए। इसके व्‍याकरण की पुस्‍तकें भी रची गईं। ईश्‍वर की लीला देखो जो दासी थी वह रानी बन बैठी और रानी मुंह छि‍पाकर कोने में बैठ गई।
काल ने अपनी प्रकृति‍ के अनुसार (लगभग 1500 वर्ष के बाद) बौद्ध धर्म को भी ति‍लांजलि‍ दी और उसके साथ उसकी भाषा भी ति‍लांजलि‍त हुई। शंकराचार्य के प्रताप से ब्राह्मणों का डूबा हुआ सि‍तारा फि‍र से उभरकर चमका और संस्‍कृत की मान-मर्यादा पुन: प्रारंभ हुई। राजा वि‍क्रमादि‍त्‍य के युग में जो अाभा उसके प्रसाद स्‍वरूप मि‍ली, वह आज तक लोगों की आंखों का उजाला है। इससे भी यही सि‍द्ध होता है कि राज-दरबार और प्रति‍ष्‍ठि‍त लोग संस्‍कृत बोलना प्रामाणि‍कता एवं गौरव का आधार मानते थे और प्राकृत जनसाधारण की भाषा थी, क्‍योंकि इस युग में महाकवि‍ कालीदास ने शकुंतला नाटक लि‍खा है। सभा में देख लो--राजा, सामंत और पंडि‍त संस्‍कृत बोल रहे हैं। कोई सामान्‍य-जन कुछ कहता है, तो प्राकृत में कहता है। संस्‍कृत और मूल फारसी अर्थात जिंदवस्‍ता की भाषा आर्य होने के बाद एक पि‍तामह की संतानें हैं, किंतु समय का संयोग देखो कि ईश्‍वर जाने कि कि‍तने सौ वर्ष या कि‍तने हजार वर्ष की बि‍छुड़ी हुई बहनें, इस दशा में आकर मि‍ली हैं कि ऐ-दूसरे की शक्‍ल नहीं पहचान सकतीं।''
पृ-3-4
आबे हयात, आब-ए-हयात, aabehayat, aabe hayat, aab-e-hayat 

भाषा क्‍यों बि‍गड़ती है? अपभ्रष्‍ट होती है?

प्रश्‍न है- भाषा क्‍यों बि‍गड़ती है? अपभ्रष्‍ट होती है?
इसके कारण ऐति‍हासि‍क और भौगोलि‍क हैं। अपभ्रंश का अर्थ (सामान्‍य रूप में) कि‍सी भी भाषा के बि‍गड़े हुए रूप से लि‍या जा सकता है। इस दृष्‍टि‍ से डा. श्रीधर व्‍यंकटेश केतकर ने अनेक उदाहरण दि‍ए हैं।
''वे (पारसी लोग) लोग शुद्ध गुजराती नहीं बोलते, अपि‍तु गुजराती का एक अपभ्रंश बोलते हैं। उन्‍हें आज भी 'ळ' का उच्‍चारण करना नहीं आता। जब कुछ लोग अपनी भाषा-रक्षण में पूरी तरह समर्थ नहीं होते; फि‍र भी वे एकत्रि‍त रूप में (साहचर्य में) रहते हैं, तब उनकी भाषा स्‍थानीय न होकर पैतृक एवं स्‍थानीय, दोनों में से कि‍सी एक का अपभ्रंश होती है। जि‍प्‍सी लोगों ने अपनी भाषा जीवि‍त रखी और पारसि‍यों ने उसे मृत होने दि‍या। ऊपर-ऊपर से ऐसा ही प्रतीत होता है किंतु गहराई से अवलोकन करें तो प्रतीत होगा कि‍ पारसि‍यों को जि‍प्‍सि‍यों की अपेक्षा परदेश में अधि‍क काल तक रहना पड़ा है। ... और जि‍प्‍सी भाषा के जि‍प्‍सी स्‍वरूप की रक्षा हो जाना और पारसी भाषा के पारसी स्‍वरूप का लुप्‍त होना, इसमें बहुत अंतर नहीं है। अर्थात स्‍वभाषा रक्षण में जि‍प्‍सी पारसी लोगों से अधि‍क सफल हो गए, ऐसा मानने की आवश्‍यकता नहीं। क्‍योंकि जि‍प्‍सि‍यों ने भी अपनी भाषा की वाक्‍यरचना बदल दी है और उसे अंग्रेजी का स्‍वरूप दि‍या है।
जब भी दो भि‍न्‍न भाषाओं का सन्‍नि‍कर्ष होता है तो बलवान भाषा की रचना का स्‍वरूप बना रहता है किंतु दुर्बल राष्‍ट्र उस रचना के स्‍वरूप को स्‍वीकार कर लेता है, केवल अपने शब्‍द अपने रख पाता है, ऐसा प्रतीत होता है। संक्षेप में यदि‍ मनुष्‍य के समुदायों का इति‍हास लि‍खना हो तो उस भाषा के वि‍कृत रूप (अपभ्रंश रूप) का साहि‍त्‍य भी महत्‍वपूर्ण मानना चाहि‍ए। क्‍योंकि उसकी सहायता से हमें लुप्‍त मानव इति‍हास का ज्ञान होता है। और वि‍शेष रूप से मानवी समुच्‍चयों की घटनाओं के वि‍घटन का इति‍हास मालूम होता है। उसके आधार पर जाति‍यों की भ्रमणशील प्रवृत्‍ति‍यों का भी बोल होता है।''
पृष्‍ठ- 103-04

Wednesday, October 29, 2014

टुकुर टुकुर देखा केहेन

मन भर पि‍सान मि‍लै 
तौ देस महान बनै 
तबलेक तौ सूखा 
पतरका कि‍सान चलै। 
.
एक जून खाब मि‍लै
चबैना हि‍साब मि‍लै
आलू हेरान बा
मि‍रचा परसाद मि‍लै।
.
कनटरी से प्रेम पै
जेल बेहि‍साब मि‍लै
मांग लि‍हो जहां हक
गोली साफ साफ मि‍लै।
.
मौजो खाओ ना झेलै जाओ
पइसा बेहि‍साब मि‍लै
सेना कि‍हि‍स घोसना
सबका आसपास मि‍लै।
.
पइसा मि‍लै साफ मि‍लै
काला से हाफ मि‍लै
जमि‍नि‍या बचायो भाय
बेभाव के नाप मि‍लै।
.
लोभी चहुं ओर मि‍लै
क्रोधी तौ साथ चलै
बचके बचाय ल्‍यो
सपरी तौ काल्‍ह मि‍लै।
.
इहै पेड़ जंगल बा
जेसे हमका सांस मि‍लै
काटै पे तुला बाटे
कि कइसे अब फूल खि‍लै।
.
दाम लिहि‍न दंभ कि‍हि‍न
रुपि‍या मा आग लगै
मोट मूस मोटान बाटै
सागौ में भाग लगै।
.
उत्‍तर की तरफ जभै
टुकुर टुकुर देखा केहेन
दक्‍खि‍न से आवै आग
बाग सब खाक मि‍लै।
.
समझा हो मोर बाबू
अब तो दुरभाग मि‍ले
उठावा मशाल अब
तभै भाेर भाग जलै।


- राइजिंग राहुल (अवध बीज भंडार, हरिंग्‍टनगंज मि‍ल्‍कीपुर खजुरहट वाले)

Saturday, December 7, 2013

फासीवाद की क्षय: कँवल भारती

लोकतंत्र में भी फासीवाद मरता नहीं है, बल्कि पूरी हनक के साथ मौजूद रहता है. यह किसी एक देश की बात नहीं है, बल्कि प्राय: सभी लोकतान्त्रिक देशों की बात है. अक्सर दो किस्म के लोग फासीवादी होते हैं, (एक) राजनेता, जो वोट की राजनीति करते हैं और (दो) धर्मगुरु, जो अज्ञानता फैलाते हैं. ज्ञान की रौशनी से ये दोनों लोग डरते हैं. इसलिए सत्य का गला दबाने के लिए ये दोनों एक-दूसरे से हाथ मिलाये रहते हैं. जब तक जनता गूंगी-बहरी बनकर जहालत की चादर ओढ़े रहती है, वे लोग खुश रहते हैं, क्योंकि इसी में उनकी तानाशाही सत्ता बनी रहती है. पर उन्हें जनता के जागरूक होने का डर हमेशा बना रहता है. इसीलिए ये दोनों लोग शान्ति और अमन की बातें करते हैं, ताकि समाज में यथास्थिति बनी रहे.

यथास्थिति का अर्थ है राजनीति और धर्मगुरुओं का गठजोड़ कायम रहे और उनके द्वारा जनता का शोषण और संसाधनों की अबाध लूट चलती रहे. इसलिए जैसे ही नेताओं को पता चलता है कि जनता जहालत की चादर उतारकर फेंकने लगी है और उनके विरोध में प्रदर्शन करने वाली है, तो वे तुरंत शान्ति बनाने के लिए धारा 144 लगा देते हैं. इस धारा के तहत दस लोग भी एक जगह न इकठ्ठा हो सकते हैं और न मीटिंग कर सकते हैं. अगर इकठ्ठा होंगे और मीटिंग करेंगे, तो पुलिस को पूरा अधिकार दिया गया है कि वह उन्हें तुरंत गिरफ्तार करके जेल भेज सकती है, अगर विरोधी उनकी सत्ता के लिए चुनौती है, तो वह उस पर रासुका लगा सकती है, उसे जिला बदर कर सकती है, यहाँ तक कि उसे देश निकला तक दे सकती है या उसे देश छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर सकती है. फ़िदा मकबूल हुसैन और तसलीमा नसरीन के मामले में हम यह देख भी चुके हैं. ( यहाँ मैं सिर्फ बुद्धिजीवियों तक सीमित हूँ, राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शनों को इस सन्दर्भ में न देखें, क्योंकि वे फासीवादियों से अलग नहीं होते, बल्कि उनके हमशक्ल ही होते हैं, सिर्फ उनकी टीमें अलग-अलग होती हैं.)

इस फासीवाद के तहत सत्य का स्वर बुलन्द करने वाले लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों और जनता का दमन सिर्फ आज की हकीकत नहीं है, बल्कि यह दमन सदियों से होता आया है. चार्वाकों से लेकर शम्बूक तक, कबीर से लेकर मीरा तक, गैलेलियो से लेकर सुकरात तक, बहुत लम्बी सूची है. इस फासीवाद के अभी ताज़ा शिकार डा. विनायक सेन, सीमा आज़ाद, डा. दाभोलकर, तसलीमा नसरीन और शीबा फहमी हुए हैं. तसलीमा नसरीन के खिलाफ दरगाहे आला हज़रत के cleric के साहबजादे हसन रज़ा खां नूरी ने FIR लिखाई है कि उन्होंने ट्विटर पर अपने कमेन्ट से मुसलमानों की भावनाएं भड़कायी हैं. दरअसल ये भावनाएं जनता की नहीं होती हैं, वरन खुद धर्मगुरु (क्लेरिक) की होती हैं.

शीबा फहमी ने ऐसा क्या लिख दिया कि जज ने उनके खिलाफ गिरफ़्तारी का वारंट निकाल दिया? उन्होंने एक साल पहले मोदी के खिलाफ फेसबुक पर लिखा था, जिसके विरुद्ध एक संघी ने FIR लिखाई थी, मामला अदालत में था, पर जज भी उसी शान्ति का पक्षधर निकला, जिसे मोदी जैसे नेता और धर्मगुरु चाहते हैं और जो फासीवाद चाहता है, सो जज ने शीबा के खिलाफ वारंट इशु कर दिया. यहाँ यही कहने को मन करता है कि जज ने साम्प्रदायिकता का साथ दिया, न्याय का नहीं. बहरहाल, ऐसे हजार जज मिलकर भी सत्य का गला नहीं घोंट सकते और न लेखक की आवाज़ को दबा सकते हैं. ख़ुशी है कि शीबा फहमी को उच्च अदालत से जमानत मिल गयी है. लोकतंत्र में आस्था रखने वाले हम सारे लेखक, कलाकार और बुद्धिजीवी तसलीमा नसरीन और शीबा फहमी के साथ पूरी तरह एकताबद्ध हैं. जितना संभव हो सकेगा, हम फासीवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ेंगे. हम सब उनके साथ हैं. लोकतंत्र की जय और फासीवाद की क्षय होकर रहेगी.

FB account of writer- Kanwal Bharti

Tuesday, November 5, 2013

तीन दिन की शेव में हर लड़का हॉट लगता है

शुभम श्री की नई कविताएं. 

कॉमरेड

(1)
पूरी शाम समोसों पर टूटे लोग
दबाए पकौड़े, ब्रेड रोल
गटकी चाय पर चाय
और तुमने किया मेस की घंटी का इंतजार
अट्ठाइस की उम्र में आईना देखती
सूजी हुई आंखें
कुछ सफेद बाल, बीमार पिता और रिश्ते
स्टूडियो की तस्वीर के लिए मां का पागलपन
घर
एक बंद दरवाजा
---
हमारी आंखों में
तुम हंसी हो
एक तनी हुई मुट्ठी
एक जोशीला नारा
एक पोस्टर बदरंग दीवार पर
एक सिलाई उधड़ा कुर्ता
चप्पल के खुले हुए फीते की कील
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम
भी हो तुम चुपके से
---
यूं ही गुजरती है ज़िंदगी
पोलित ब्यूरो का सपना
महिला मोर्चे का काम
सेमिनारों में मेनिफेस्टो बेचते
या लाठियां खाते सड़कों पर
रिमांड में कभी कभी
अखबारों में छपते 
पर जो तकिया गीला रह जाता है कमरे में
बदबू भरा
उसे कहां दर्ज करें कॉमरेड?

(2)
टेप से नापकर 20 सेंटीमीटर का पोल और उसका शरीर
बराबर हैं
तिस पर एक झलंगी शर्ट 90 के शुरुआती दिनों की
और जींस पुरातत्व विभाग का तोहफ़ा
पैंचे की सिगरेट के आखिरी कश के बाद भी
पराठे का जुगाड़ नहीं
तो ठहाके ही सही
सेकेंड डिवीजन एम.ए, होलटाइमर
मानसिक रोगी हुआ करता था
पिछले महीने तक
दिवंगत पिता से विरासत में पार्टी की सदस्यता लेकर
निफिक्र खिलखिलाता
ये कॉमरेड
दुनिया की खबर है इसे
सिवाय इसके कि 
रात बाढ़ आ गई है घर में
पंद्रह दिनों से बैलेंस जीरो है !

भाकपा (माले)

पापा का मर्डर
चाचा लापता
ड्राइंग बेरंग
निकर बड़ी
नंबर कम
डांट ज्यादा
पेंसिल छोटी
अंगूठा बड़ा
---
इससे पहले कि ग्रेनाइट चुभ जाए
गोलू ने लगाई रेनॉल्ड्स की ठेपी पेंसिल के पीछे
सो पेंसिल भी गिरी कहीं बैग के छेद से
अब जो जोर-जोर से रो रहा है गोलुआ
इसको अपना पेंसिल दे दें?

मोजे में रबर

वन क्लास के गोलू सेकेंड ने
क्लास की मॉनीटर से
सुबह सुबह अकेले में
शर्माते हुए
प्रस्ताव रखा-
अपनी चोटी का रबर दोगी खोल कर?
‘सर मारेंगे’
‘दे दो ना
सर लड़की को नहीं मारेंगे
मेरा मोजा ससर रहा है !’

मेरा बॉयफ्रेंड

(छठी कक्षा के नैतिक शिक्षा पाट्यक्रम के लिए प्रस्तावित निबंध)

मेरा बॉयफ्रेंड एक दोपाया लड़का इंसान है
उसके दो हाथ, दो पैर और एक पूंछ है
(नोट- पूंछ सिर्फ मुझे दिखती है)
मेरे बॉयफ्रेंड का नाम हनी है
घर में बबलू और किताब-कॉपी पर उमाशंकर
उसका नाम बेबी, शोना और डार्लिंग भी है
मैं अपने बॉयफ्रेंड को बाबू बोलती हूं
बाबू भी मुझे बाबू बोलता है
बाबू के बालों में डैंड्रफ है
बाबू चप चप खाता है
घट घट पानी पीता है
चिढ़ाने पर 440 वोल्ट के झटके मारता है
उसकी बांहों में दो आधे कटे नीबू बने हैं
जिसमें उंगली भोंकने पर वो चीखता है
मेरा बाबू रोता भी है
हिटिक हिटिक कर
और आंखें बंद कर के हंसता है
उसे नमकीन खाना भौत पसंद है
वो सोते वक्त नाक मुंह दोनों से खर्राटे लेता है
मैं एक अच्छी गर्लफ्रेंड हूं
मैं उसके मुंह में घुस रही मक्खियां भगा देती हूं
मैंने उसके पेट पर मच्छर भी मारा है
मुझे उसे देख कर हमेशा हंसी आती है
उसके गाल बहुत अच्छे हैं
खींचने पर 5 सेंटीमीटर फैल जाते हैं
उसने मुझे एक बिल्लू नाम का टेडी दिया है
हम दुनिया के बेस्ट कपल हैं
हमारी एनिवर्सरी 15 मई को होती है
आप हमें विश करना
*मेरा बॉयफ्रेंड से ये शिक्षा मिलती है कि 
बॉयफ्रेंड के पेट पर मच्छर मारना चाहिए
और उसके मुंह से मक्खी भगानी चाहिए ।

बूबू

दूदू पिएगी बूबू
ना
बिकिट खाएगी
डॉगी देखेगी
ना
अच्छा बूबू गुड गर्ल है
निन्नी निन्नी करेगी
ना
रोना बंद कर शैतान, क्या करेगी फिर ?
मम्मा पास

बूबू-2

खिलौने सीज़ हो गए तो
पेन के ढक्कन से सीटी बजाई
डांट पड़ी
तो कॉलबेल ही सही
ड्राइंग बनाई दो चार
और कपड़े रंग डाले
अखबार देखा तो प्रधानमंत्री का श्रृंगार कर दिया
मूंछे बना दी हीरोइनों की
मन हुआ तो
जूतों के जोड़े बिखेरे
नोचा एक खिला हुआ फूल
चबाई कोंपल नई करी पत्ते की
हैंडवॉश के डब्बे में पानी डाला
पिचकारी चलाई थोड़ी देर
रसना घोला आइसक्रीम के लिए
तो शीशी गिराई चीनी की
चॉकलेट नेस्तनाबूद किए फ्रिज से
रिमोट की जासूसी की
शोर मचाया जरा हौले हौले
कूदा इधर उधर कमरे में
खेलती रही चुपचाप
पापा जाने क्या लिख रहे थे सिर झुकाए
बैठी देखती रही 
फिर सो गई बूबू
सपने में रोया
पलंग से गिरी अचानक
तो बुक्का फाड़ के रोया
अभी पापा की गोद में
कैसी निश्चिंत सोयी है छोटी बूबू

उस लड़के की याद

तीन दिन की शेव में
हर लड़का हॉट लगता है
(ऐसा मेरा मानना है)
और जिम के बदले 
अस्पताल में पड़ा हो हफ्ते भर
तो आंखें दार्शनिक हो जाती हैं
पीली और उदास
जलती हुई और निस्तेज
बिना नमक की हंसी और सूखी मुस्कुराहटें
चले तो थक जाए
भरी शाम शॉल ओढ़ कर शून्य में ताके
एक बार खाए, तीन बार उल्टी करे
दुबक जाए इंजेक्शन के डर से
उस लड़के के उदास चेहरे पर हाथ फेरती लड़की
मन ही मन सोचती है
मैं मर जाउं पर इसे कुछ न हो
बीमार लड़के प्रेमिकाओं पर शक करने लगते हैं
मन नहीं पढ़ पाते बीमार लड़के

सफल कवि बनने की कोशिशें

ऐसा नइ कि अपन ने कोशिश नइ की
सूर्योदय देखा मुंह फाड़े
हाथ जोड़े
जब तक रुक सका सूसू
चांद को निहारा
मच्छरों के काट खाने तक
हंसध्वनि सुना किशोरी अमोनकर का
थोड़ी देर बाद लगावेलू जब लीपीस्टिक भी सुना
कला फिल्में देखीं
कला पर हावी रहा हॉल का एसी
वार एंड पीस पढ़ा
अंतर्वासना पर शालू की जवानी भी पढ़ी
बहुत कोशिश की
मुनीरका से अमेरिका तक
कोई बात बने
अंत में लंबी गरीबी के बाद अकाउंट हरा हुआ
बिस्तर का आखिरी खटमल
मच्छरदानी का अंतिम मच्छर मारने के बाद
लेटे हुए
याद आई बूबू की
दो बूंदें पोंछते पोंछते भी चली ही गईं कानों में 
तय करना मुश्किल था
रात एक बजे कविता लिखने में बिजली बर्बाद की जाए
या तकिया भिगोने में
अपन ने तकिया भिगोया
आलोचक दें न दें
अलमारी पर से निराला
और बाईं दीवार से मुक्तिबोध
रोज आशीर्वाद देते हैं
कला की चौखट पर
बीड़ी पिएं कि सुट्टा
व्हिस्की में डूब जाएं कि
पॉकेट मारी करें
सबकी जगह है ।

औरतें

उन्हें एशिया का धैर्य लेना था
अफ्रीका की सहनशीलता
यूरोप का फैशन
अमेरिका का आडंबर
लेकिन वे दिशाहीन हो गईं
उन्होंने एशिया से प्रेम लिया
यूरोप से दर्शन
अफ्रीका से दृढ़ता ली
अमेरिका से विद्रोह
खो दी अच्छी पत्नियों की योग्यता
बुरी प्रेमिकाएं कहलाईं वे आखिरकार
जब तक भाषा देती रहेगी शब्द

साथ देगा मन

असंख्य कल्पनाएं करूंगी
अपनी क्षमता को
आखिरी बूंद तक निचोड़ कर
प्यार करूंगी तुमसे
कोई भी बंधन हो
भाषा है जब तक
पूरी आजादी है ।

प्यार

गंगा का
सूरज का
फसलों का
फूलों का
बोलियों का अपनी
और
तुम्हारा
मोह नहीं छूटेगा
जैसा भी हो जीवन
जब तक रहेगी गंध तुम्हारे सीने की जेहन में
मन नहीं टूटेगा।

Thursday, October 31, 2013

हमारे युग का नायक

अवि‍नाश मि‍श्र 

हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष राजेंद्र यादव अब सदेह हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं। 28 अक्टूबर की रात उनका देहांत हो गया। वे 84 वर्ष के थे...  इसके आगे और भी बहुत कुछ जोड़ा जाना चाहिए, मसलन मृत्यु की वजह, अब उनके परिवार में उनके पीछे कौन-कौन रह गया है, शिक्षा-दीक्षा, उनका सामाजिक और साहित्यिक अवदान, उनकी कृतियों के नाम, उनके अवसान पर उनके समकालीनों के विचार... वगैरह-वगैरह। ये सब कुछ निश्चित तौर पर इस दुखद खबर के साथ जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन फिर भी बहुत त्रासद ढंग से बहुत कुछ छूट जाएगा। इसलिए यहां केवल यह जोड़ना चाहिए कि समग्र सकारात्मक अर्थों में राजेंद्र यादव की मृत्यु एक क्रांतिकारी सृजक की मृत्यु है। उन्होंने हिंदी साहित्य और समाज में बहुत कुछ बदला। वे एक लोकतांत्रिक, परिवर्तनकामी और युगद्रष्टा व्यक्तित्व थे। उनकी सारी खूबियों और खामियों के साथ अब उन पर बात करते हुए हम उनके लिए ‘थे’ का प्रयोग करेंगे। ‘हैं’ के ‘थे’ में बदल जाने पर हमें यकीन करना होगा।

कथा सम्राट प्रेमचंद की ओर से शुरू की गई साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ का राजेंद्र यादव 1986 से संपादन कर रहे थे। वे अपनी अंतिम सांस तक सक्रिय रहे। ‘हंस’ का संपादन करते और संपादकीय लिखते रहे। उनकी किताबें और उन पर किताबें हाल-हाल तक आती रहीं और अब भी कई प्रकाशन-प्रक्रिया में हैं। मीडिया में उनकी बाइट्स/वर्जन भी बराबर सुनने/पढ़ने को मिलते रहे। 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती और 28 अगस्त को अपना जन्मदिन वे प्रतिवर्ष बहुत लगन और उत्साह से आयोजित करते रहे। मृत्यु से चंद दिनों के फासले पर खड़े और अस्वस्थ होने के बावजूद भी राजेंद्र यादव साहित्यिक आयोजनों में अध्यक्षीय भूमिका निभाते दिखते रहे। उन्होंने कभी किसी एकांत, एकाग्रता और अनंतता की चाह नहीं की। भीड़-भाड़, रंगीनियां, चहल-पहल, साहित्यिक शोर और विवाद उन्हें पसंद थे। बगैर लड़े कोई महान और बड़ा नहीं बनता। वे उम्र भर लड़ते रहे... पाखंड से, जातीयता से, शुद्धतावाद से, हिंदी के प्राचीन और अकादमिक छद्म और षड्यंत्र से, कट्टरता से, सांप्रदायिकता से और सत्ता से भी।  

एक लैटिन अमेरिकी कहावत है कि मृतकों के विषय में अप्रिय नहीं कहना चाहिए। लेकिन राजेंद्र यादव अपने संपादकीयों में कइयों को आहत करते रहे। इसमें जीवित और मृतक दोनों ही रहे। जब कभी इस कहे/लिखे पर फंसने की सूरत आई, उन्होंने अगले ही अंक में माफी भी मांग ली। उन्होंने ‘हंस’ में कई बार अपने मित्रों, करीबियों और साहित्यकारों के अवसान पर बेहद भावपूर्ण और मार्मिक संपादकीय भी लिखे। इस तरह के संपादकीयों में वे दो बातें बहुत जोर देकर कहते रहे। पहली यह कि हमें मृतक की कमियों पर भी बात करनी चाहिए और दूसरी यह कि देह के साथ व्यक्ति से जुड़ी बुराइयां खत्म नहीं होतीं। शेक्सपीयर ने अपने नाटक ‘जूलियस सीजर’ में भी कुछ ऐसा ही कहा है... ‘मनुष्य की बुराइयां उसके बाद भी जीवित रहती हैं, अच्छाइयां अक्सर हड्डियों के साथ दफन हो जाती हैं।’ राजेंद्र यादव अपने अंतिम दिनों में शेक्सपीयर के नाटकों के मुख्य पात्रों की त्रासदियों के नजदीक जाते नजर आते हैं।

‘स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार’ लिखवाने की स्थिति में जब वे पहुंचे तब उनकी विरासत का प्रश्न उनके उत्तराधिकारियों के सम्मुख खड़ा हो गया। आनन-फानन में उनके अंत को  निकट देख ‘हंसाक्षर ट्रस्ट’ में बड़े बदलाव किए गए। राजेंद्र यादव जब अपने ‘अंत’ को पछाड़कर लौटे तब भीड़ से घिरे होने के बावजूद बहुत अकेले और टूटे हुए थे। ‘हंस’ अब उनके सपनों का ‘हंस’ नहीं रह गया था...। उनकी शारीरिक विकलांगता उन्हें लोगों का सहयोग लेने और उन पर भरोसा करने के लिए बाध्य करती थी। उनके कुछ करीबियों, लेखक-लेखिकाओं ने उनकी इस कमजोरी और यकीन का गलत फायदा उठाते हुए अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी कीं।

राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’ का अतीत विमर्शों के पुनर्स्थापन  प्रतिभाओं की खोज और एक बेबाक समझ व सत्य से संबंधित रहा है। ‘हंस’ ने कितनों को कहानीकार, कवि, समीक्षक, विश्लेषक, समाजशास्त्री और संपादक (अतिथि) बना दिया, यह उसके प्रशंसकों और आलोचकों से छुपा हुआ नहीं है। वे प्रतिपक्ष को स्पेस देना और उससे बहस करना पसंद करते थे। हिंदी में एक पूरी की पूरी स्थापित और स्थापित होने की ओर अग्रसर पीढ़ी है जो ‘हंस’ पढ़ते और राजेंद्र यादव से लड़ते हुए बड़ी हुई है। वे असहमतियों को सुनना जानते थे।

‘न लिखने के कारण’ बताते हुए उन्होंने अपने समय और समाज के सवालों से ‘हंस’ के संपादकीय पृष्ठों पर सीधी मुठभेड़ की। ‘मेरी तेरी उसकी बात’ कभी ‘मेरी मेरी मेरी बात’ नहीं लगी, हालांकि ‘कभी-कभार’ ऐसे आरोप जरूर लगे। एक कविता संग्रह के कवि होने के बावजूद उनकी छवि एक कविता-विरोधी व्यक्ति और संपादक की बनी, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब ‘हंस’ के कविता-पृष्ठों पर प्रकाशित होना किसी भी युवा कवि के लिए अपनी पहचान पुख्ता करने का एक माध्यम हुआ करता था। लेकिन गए पांच वर्षों से ‘हंस’ की स्तरीयता में भयानक कमी आई और वह केवल निकलने के लिए ही निकलती रही। ‘मैं हंस नहीं पढ़ता’ यह कहना अज्ञान और अजागरूकता का नहीं बेहतरीन साहित्यिक समझ का परिचायक हो गया। बावजूद इसके ‘हंस’ के ‘अपना मोर्चा’ में दूर-दराज के पाठकों के पत्र बराबर छपते रहे...।

वर्तमान समय का सबसे विराट संकट यदि कुछ है तो यही है- बड़े अध्वसाय से अर्जित की गई गरिमा को अंततः बचाकर रख पाना। इस अर्थ में राजेंद्र यादव के आखिरी दिन उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने वाले रहे। लेकिन अंततः व्यक्ति का काम ही शेष रहता है, तब तो और भी जब यह काम हाशिए पर जी रहे समाज के वंचित वर्ग के पक्ष में खड़ा हो। उन्हें स्वर दे रहा हो, जिनकी आवाज सदियों से कुचली जाती रही हो। स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, किसानों... सबके लिए विमर्श उत्पन्न करने वाले राजेंद्र यादव को उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर ‘हमारे युग का खलनायक’ बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। लेकिन राजेंद्र यादव खलनायक नहीं हैं, वे नायक हैं हमारे युग के नायक। वे जब तक रहे, काम करते हुए विवादों में रहे, अब यादों में रहेंगे...।

असुरों का ज्ञान सहेजने में जुटीं सुषमा

झारखंड में असुर आदिम जनजाति नेतरहाट के आसपास मिलते हैं. वैसे इनका निवास स्थान नेतरहाट से छत्तीसगढ. को जोड़ने वाली पट्टी तक फैला है. लेकिन , आज इनका अस्तित्व खतरे में है. ऐसे में एक असुर की बेटी ने इस जनजाति के संरक्षण का बीड़ा उठाकर मिसाल पेश की है. इनका नाम सुषमा असुर है. इनके पिता खंभीला असुर लातेहार जिला के नेतरहाट के रहने वाले हैं. इस जनजाति को बचाने के लिए जो काम सरकार को करनी चाहिए वह सुषमा कर रही हैं. बकौल सुषमा अगर असुर का अस्तित्व समाप्त हो गया तो झारखंड से एक इतिहास का अंत हो जायेगा. उनके मुताबिक 1872 में देश में पहली जनगणना हुई थी. उस समय 18 जनजातियों को मूल आदिवासी की श्रेणी में रखा गया था. इसमें असुर पहले नंबर पर थे. लेकिन, इन 150 वर्षों में जैसे सरकार ने इस आदिवासी समुदाय को भुला दिया है. नेतरहाट क्षेत्र में जहां इनका निवास स्थान है, वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं जैसे चिकित्सा, पेयजल, बिजली, सड़क आदि का आभाव है. शिक्षा के नाम पर इनके पास प्राथमिक विद्यालय तो है पर शिक्षक नहीं. दसवीं कक्षा पास आदिम जनजाति के लोगों को सीधे सरकारी नौकरी देने का प्रावधान है. लेकिन, कईलोग ऐसे हैं जो दसवीं पास हैं और नौकरी नहीं है. जिस इलाके में असुर जनजाति रहते हैं वह एक पठारी इलाका है. निचली जगह से उपर की ओर चढ.ने में दिक्कत होती है. उपरी इलाके में चढ.ने के लिए इन्हें बॉक्साइट लदे ट्रक का सहारा लेना पड़ता है. इन ट्रकों में इनके साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है. ऐसा परिवहन की सुविधा नहीं होने के कारण होता है.

सुषमा बताती हैं कि असुर समुदाय के लोग अपने कला-कौशल के कारण जाने जाते थे. लेकिन, अब इनकी कला कौशल को बचाये रखना मुश्किल होता जा रहा है. अब लगता है असुर जाति केवल हमें किस्से-कहानियों में ही सुनने को मिलेंगे. कभी प्रचीन काल में दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने वाले असुर आज की तारीख में अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं. असुरों की संख्या अब महज 10000 से भी कम बची है. ऐसे में इनके कला कौशल के संरक्षण की जरूरत है.

सुषमा असुर अपने जनजाति के ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की कोशिश में लगी हैं. इसके तहत वे वीडियो फुटेज बनाकर रखना चाहती हैं ताकि आने वाली पीढ.ियों को इस ज्ञान की संपदा हासिल हो सके. सुषमा के इस प्रयास को हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार उदय प्रकाश का सर्मथन और सहयोग मिला है. रांची से साहित्यकार अश्‍विनी कुमार पंकज लगातार उनके संपर्क में हैं और उनके काम को आगे बढ.ाने में हर तरह का सहयोग कर रहे हैं.

असुरों का महत्व

साहित्यकार अश्‍विनी पंकज के मुताबिक झारखंड के लोकगीतों में असुरों का उल्लेख मिलता है. इनमें असुरों की वीरता और उनके कार्यों की जानकारी मिलती है. ऐसा माना जाता है कि महाभारत के लिए हथियारों का निर्माण असुरों के द्वारा ही हुआ था. ये सारी बातें सादरी और कुड़ुख भाषा के लोकगीतों में सुनने को मिलती है. रामायण में भी इन असुरों का उल्लेख मिलता है. असुरों को इस काल में युद्ध करने वाला बताया जाता है. ये शारीरिक रूप से सृदृढ. होते थे. असुर दुनिया के सबसे पुराने बाशिंदे और धातुविज्ञानी हैं. ऐसा माना जाता है कि असुरों ने ही लोहा बनाने की विधि का अविष्कार किया जिससे स्टील बनाया जा सका. अध्ययनकर्ताओं और इतिहासकारों के मुताबिक एशिया व यूरोप में और कोई इंसानी समुदाय ऐसा नहीं बचा है जो यह प्राचीन धातुविज्ञान जानता हो. शायद अफ्रीका में एक-दो आदिवासी समुदाय हैं जिन्हें यह कला आती है.

खतरे में असुर 

नेतरहाट क्षेत्र में असुरों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. इनकी जमीन पर बॉक्साइट खनन का काम होने से आजीविका का मूल स्रोत छिन गया है. इनके पास आजीविका का साधन नहीं होने के कारण ये भूखे रहने को मजबूर हैं. खेतों में बॉक्साईट के अपशिष्ट जमा हो जाने के कारण खेत उपजाऊ नहीं रहे. खेतो की उर्वरा शक्ति कम हो गई है. सरकार भी इनके लिए कुछ नहीं कर रही. सरकार की जितनी भी योजना इनके लिए बनी वह केवल कागजों में ही दब कर रह गई. पिछले कुछ सालों में इनकी आबादी लगातार कम होती जा रही है. जाहिर है, जिस रफ्तार के साथ असुरों की आबादी सिमट रही है, उसमें अब ये सवाल खड़ा होने लगा है कि क्या असुरों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा?

मदद को आगे आये 

असुर जनजातियों के कला एवं कौशल के संरक्षण के लिए सुषमा को तकनीक की जरूरत थीा. इसके लिए इन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया है. फेसबुक पर इन्होंने असुरों के आदि ज्ञान एवं सामुदायिक ज्ञान के संग्रह के लिए एक वीडियो एचडी कैमरा, एक ऑडियो रिकॉर्डर, कार्यक्षेत्र में स्टोरेज के लिए एक लैपटाप, ऑडियो, वीडिया एवं फोटो के व्यविस्थत संग्रहण व संपादन के सबटाइटलिंग के लिए एक मैक पीसी की डिमांड की. जिससे वे अपने विलुप्त होते ज्ञान को संरक्षित कर सकें.

इसके बाद असुरों की पीड़ा और विषय की गंभीरता को समझते हुये भारत के सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश ने एक मिनी डीवी कैमरा इन्हें भेंट किया. इंग्लैंड के एक विश्‍वविद्यालय के छात्र तथागत नियोगी ने उन्हें कैनन का एक डिजिटल कैमरा दिया है. यह उनके लिए बहुत उपयोगी साबित हो रहा है.

तथागत का कहना है कि ‘असुरों के पास जो ज्ञान है अब वह कम से कम एशिया के किसी इंसानी समाज के पास नहीं बचा है. खासकर, धातुविज्ञान की प्राचीनतम परंपरा. एशिया से बाहर अफ्रीका के दो-तीन आदिवासी समाज में भी अभी यह ज्ञान परंपरा बची हुई है.’ असुरों के अनुसार उनकी संस्कृती को बचाने के लिए उन्हें और भी संसाधन की अवश्यकता है. असुर झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखडा संगठन ने भी इन असुरों की आवाज उठाई और इनका सर्मथन किया है.

असुरों का पर्व

हर आदिम जनजाति का अपना एक विशेष पर्व होता है. इसी प्रकार असुरों का भी अपना एक पर्व है. यह फागुन के महीने में मनाया जाता है. इसे ये लोग सड़सी कुटासी के नाम से मनाते हैं. इस पर्व में ये लोग अपने पुराने औजारों के साथ-साथ उस भट्ठी की भी पूजा करते हैं जिसमें ये औजार बनाते थे. इनके समुदाय में एक नेत्रहीन बुजुर्ग आज भी हैं जो कच्ची धातु को हाथ में उठा कर यह बता देते हैं कि इसमें धातु की कितनी मात्रा है.