Saturday, March 10, 2018

हिंदी पत्रकारिता के पितामह का गांव

बाबूराव विष्णुराव पराड़कर: तस्वीर- शीतल वर्मा
काशी का पराड़कर भवन पत्रकारिता और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र है, किंतु पराड़ गांव में कुछ बुजुर्गों की यादों के सिवा कुछ नहीं जिसे पराड़कर से जोड़ा जा सके।आजादी के संघर्ष में अपनी लेखनी से अभूतपूर्व योगदान करने वाले गैर हिंदीभाषी बाबूराव विष्णु पराड़कर का हिंदी पत्रकारिता में ऊंचा स्थान रहा है। नई पीढ़ी के पत्रकारों-संपादकों को उनके कृतित्व से प्रेरणा मिले इस उद्देश्य से उनके पैतृक गांव ‘पराड़’ (महाराष्ट्र) में स्मारक की रूपरेखा मूर्तरूप ले रही है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में सिंधुदुर्ग जिले के मालवण -कनकवली इलाके का यह गांव आज भी हिंदी पत्रकारिता और स्वाधीनता संग्राम में पराड़कर जी के योगदान पर गर्व करता है, पर सरकार और पत्रकारिता जगत की उपेक्षा के कारण यह अज्ञात-अनाम सा है। गांव के बुजुर्ग ‘पुलिस पाटिल’ सुभाष सोमा पराड़कर बताते हैं कि 17-18 साल पहले बंबई (अब मुंबई) से किसी मराठी समाचारपत्र के संपादक आए थे और गांव में पराड़कर स्मारक के बारे में लोगों से बातचीत कर चले गए। तब जिन उम्रदराज गांववालों से उनकी बातें हुई थीं और जिन्हें बाबूराव और उनके पिता विष्णुराव पराड़कर के बारे में आधिकारिक जानकारी थी, वे अब नहीं हैं। पराड़कर परिवार के वरिष्ठ सदस्य बताते हैं कि उनका वंश कुलकर्णी था, परंतु पराड़ गांव का होने के कारण उन्होंने नाम के आगे पराड़कर टाइटल लगाया।

संपादक पराड़कर की स्मृति उनके कार्यक्षेत्र काशी में जीवित रखने के उद्देश्य से वहां स्थापित पराड़कर भवन की संकल्पना 1940 में काशी पत्रकार संघ की स्थापना के समय की गई थी। संघ के पहले अध्यक्ष थे ‘आज’ और ‘संसार’ के यशस्वी संपादक तथा राजनीतिज्ञ पंडित कमलापति त्रिपाठी। आगे चलकर पराड़कर भवन नगर के बीच बना, जो आज पत्रकारिता और सामाजिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र है, किंतु पराड़ गांव में उनकी स्मृति में कुछ बुजुर्ग लोगों की यादों के सिवा कुछ भी नहीं है।

मैं काशी पत्रकार संघ का अध्यक्ष 1982 से 1984 तक था। उसी दौरान पराड़कर जी के गांव जाने और वहां स्थायी पराड़कर स्मृति की स्थापना का संकल्प मन में आया था। जलगांव के उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव में पुणे निवासी मराठी के वरिष्ठ पत्रकार एसके कुलकर्णी से मुलाकात के बाद इसके मूर्त रूप लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। कोल्हापुर में प्रतिष्ठित पत्र ‘पुढारी’ के संपादक प्रताप सिंह जाधव ने भी आत्मीय भेंट में स्मारक के लिए पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

मगर पराड़ गांव जाने का योग बना पिछले साल। कुलकर्णी के साथ जब हम पराड़ पहुंचे तो वहां सरपंच श्वेता फोंडेकर, जिला परिषद सदस्य वसंत सातविलकर और अधिकारियों ने स्वागत कर गांव की स्थिति बताई। वे हमें अंदर गांव में उस स्थान पर ले गए जहां कभी बाबूराव विष्णु पराड़कर के नाम से पाठशाला चलती थी। अब वहां झाड़-झंखाड़ भर हैं। गांव के लोग बड़ी तादाद में आ गए और सभी ने स्मारक की योजना का भरपूर स्वागत करते हुए ग्राम पंचायत की पर्याप्त भूमि और अन्य सहयोग प्रदान करने का संकल्प व्यक्त किया।

मुंबई के साथियों ने इस संकल्प को मजबूती दी। मुंबई प्रेस क्लब के मंत्री धर्मेंद्र जोरे तथा कोषाध्यक्ष ओम प्रकाश तिवारी से विस्तृत चर्चा हुई। तिवारी ने इस परियोजना को अपना और प्रेस क्लब का ‘ड्रीम प्रॉजेक्ट’ बताते हुए पर्याप्त संसाधन जुटाने का आश्वासन दिया। पराड़कर स्मारक की यह परियोजना मूर्त रूप ले और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के विशेष मार्गदर्शन में पराड़कर स्मारक का संकल्प पूर्ण हो, इसके लिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा है।

मुख्यमंत्री फड़नवीस ने मेरे साथ गए काशी तथा मुंबई के पत्रकारों को यह ठोस आश्वासन दिया कि पूरी परियोजना का प्रारूप मिलते ही काम शुरू हो जाएगा। मुख्यमंत्री का यह मंतव्य था कि मराठी के प्रथम पत्रकार ‘दर्पण’ के संपादक बाला साहेब जांभेकर के औरस क्षेत्र (सिंधुदुर्ग जिला मुख्यालय) में निर्माणाधीन स्मारक की ही भांति पराड़कर जी का कीर्तिस्मारक भी शीघ्र बन जाएगा। स्मारक की योजना मूर्तरूप ले ले तो यह स्थान भारतीय पत्रकारिता का एक प्रमुख तीर्थ होगा।
लेखक- राममोहन पाठक

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