Wednesday, March 21, 2018

वह ऑर्गेज्म के वक्त बीवी का मुंह दबा देता है

कांग्रेस और बीजेपी दो अलग-अलग पार्टियां हैं, मगर विचारधारा दोनों की एक ही है- दक्षिणपंथ। दक्षिणपंथ-पूंजीवाद का ऐसा अतिव्यक्त उदाहरण दुनिया के दूसरे देशों में कम ही देखने को मिलता है, शायद न के बराबर ही। याद नहीं आता कि दुनिया के किसी और देश में दक्षिणपंथ ही पक्ष में हो और वही विपक्ष में भी हो।

होना तो यह चाहिए कि हम चीजें और साफ करने की ओर बढ़ते, जैसे कि दुनिया के दूसरे देश बढ़ रहे हैं। जर्मनी को देखिए, वहां से साफ सिस्टम कहीं और दिखेगा? माना कि पूरा साफ नहीं है पर जितना है, उतना क्या कहीं और है? मगर बात जब अपने यहां की आती है तो हमारी राजनीति की समूची आस्था गंदगी और धुंधलेपन में घुस जाती है। क्यों? क्योंकि हमारा मध्यवर्ग पड़ोसी की अरगनी पर लटकी ब्रा और कूड़े में पड़ा कांडोम ही देखता है और यही देखते रहना चाहता है।

ये ऐसा मध्यवर्ग है जो दूध फटने पर लाल झंडा उठाता है और बिवाई फटने पर फेसबुक में घुस जाता है। जो रेल से लेकर बैंक तक में कॉमरेड लाल सलाम तो कहता है, मगर घर में टीका लगाकर कहता है- शादी के लिए तो गोरी गौर ब्राह्मण लड़की ही चाहिए- उम्र 25 से कम, सरकारी सेवारत। बाकी जो चाहिए होता है- कान में फुसफुसाकर निकल जाता है। मुझे चौबीसों घंटे यह फुसफुस सुनाई देती है। पूरा देश फुसफुसा रहा है, लोकतंत्र भी। सरकार फुसफुसा रही है, विपक्ष का फुसफुसाना किसी से छुपा है? अंबानी का फुसफुसाना किस-किस ने नहीं सुना- नाम पता बताओ, मेरे पास कान का एक अच्छा डॉक्टर है।

देश एक फुसफुस है जो कानोंकान निकल जाना चाहता है। किसी और का हो या न हो, मेरा तो है ही। इतने साल हो गए पैदा हुए, इस देश को बोलते नहीं सुना। कैसे बोलेगा? दक्षिणपंथ बोलने देगा? बीजेपी या कांग्रेस? सपा या बसपा? टीडीपी या तृणमूल? फुसफुस एक थैली है, जिसके ये सब चट्टे बट्टे हैं। बल्कि चट्टे-बट्टे भी नहीं, ये जोंक हैं। इस जोंक का पेट अंबानी या अडानी नहीं है, इसका पेट हमारे देश का मध्यवर्ग है। जो वही है, जो सबकुछ चूस लेना चाहता है और जानबूझकर डकार नहीं लेता है। इसलिए कि पड़ोसी को न पता चल जाए कि उसका पेट भरा है।

केरल के एनकेपी मुथुकोया की एक पेंटिंग
हेडफोन लगाकर पॉर्न फिल्म की आह-आहा सुनता है और ऑर्गेज्म के वक्त बीवी का मुंह दबा देता है। गली में घूमती मुर्गी को देखकर मुंह बनाता है और केएफसी के हॉट विंग्स के साथ एलिफैंट स्ट्रॉन्ग गटक जाता है। जो चाहता है कि दुनिया में पढ़े तो बस वही पढ़े, काम मिले तो बस उसी को मिले, ईनाम मिले तो बस उसी को मिले, इंतजाम मिले तो बस उसी को मिले- और किसी को भी न मिले। कतई नहीं। किसी और को मिलने लगता है तो वह फेसबुक पर सुसाइड नोट डालकर रस्सी में गला फंसाने लगता है- और उसे लगता है कि ये रस्सी सीधे किसी बड़ी रस्सी के पेट से निकली है और सिर्फ उसके लिए ही निकली है और इसलिए, वह रस्सी हमेशा टूट जाती है। वह जानता है कि वह नहीं मरेगा।

जानता हूं कि वह नहीं मरेगा। जबसे हुआ हूं, उसे गले में रस्सी लटकाए ही देख रहा हूं। हम सबने अपने-अपने गले में रस्सी लटका रखी है और बड़े आराम से हैं। पत्रकार साहब लिख रहे हैं, डॉक्टर साहब ऑपरेशन कर रहे हैं, वकील साहब जिरह कर रहे हैं, प्रफेसर साहब कामायनी पढ़ा रहे हैं, इंजीनियर साहब स्टार्टअप बढ़ा रहे हैं, कवि कविता सुना रहा है, कहानीकार -कहानी। सब बड़े आराम में हैं। बीजेपी और कांग्रेस वाले भी बड़े आराम में हैं। वह भी इसी रस्सी को देखते हैं। जो इस रस्सी के पार निकल गया, उसे नहीं देखते। देखेंगे भी कैसे? वह तो पार निकल गया।

यह रस्सी नहीं टूटेगी। इस रस्सी को वही तोड़ सकते हैं, जिन्होंने भीषण भूख चखी है। जिनकी आंतें उनका पेट खुरचती हैं। आंख से निकले बूंद भर पानी से गलकर बह जाने वाली रस्सी वह कैसे तोड़ेंगे जिनकी सूखी आंख में 'मैं ही हूं' की लालच भरी है।

यहां से मध्यवर्ग के लिए मेरी शराफत की सीमा समाप्त होती है।
फायदा नहीं इससे शराफत बरतने का।
और मैं नुकसान का व्यापारी हूं।  

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