Wednesday, May 1, 2019

खड़ाऊं चुराकर भागे थे राम, किस मुंह से लड़ेंगे मोदी से चुनाव?

प्रेम प्रकाश जी पेशे से पत्रकार हैं। गाजीपुर के हैं, लेकिन इन दिनों बनारस में हैं और रंग में हैं। बीजेपी से बनारस की सांसदी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मुकाबले में बीएसएफ के तेज बहादुर यादव थे। तब तक तो कुछ नहीं हुआ, जब तक कि तेज बहादुर अकेले थे, लेकिन जैसे समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपनी ओर से उम्मीदवार बनाया, चुनाव आयोग ने उनके सामने कठिन शर्त रख दी और उनकी उम्मीदवारी कैंसिल कर दी। हालांकि इस बीच सेना सेना मोदी मोदी भजने वाले भक्तों का सेना के प्रति आलाप प्रलाप में बदल चुका था। सो प्रेम जी के दिमाग में अचानक प्रकाश हुआ और उसने हम सबको अंधेरे से उस उजाले में खड़ा कर दिया, जहां प्रभु राम हैं। फर्क यही है कि प्रभु राम आज के वक्त में हैं। प्रेम जी ने बेहद शानदार लिखा है। आगे पढ़िए उनकी लिखाई- 

मान लीजिए, अगर पता चले कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम स्वयं महीयसी सीता माता के साथ अकस्मात काशी पधारे और सीधे कलेक्ट्रेट जाकर महामना मोदी जी के खिलाफ पर्चा भर आये, तो क्या सोचते हैं, फेसबुकिया भक्तों की दीवारें कैसे फटेंगी!!

भक्त1- जय श्री राम की ऐसी तैसी, बताइये हम इनका भव्य मंदिर बनवाने में लगे हैं और इनको चुनाव लड़ने की पड़ी है। अरे देशभक्त होते तो टाट में पड़े रहते, लेकिन इनको तो अब संसद की एसी चाहिए। चुनाव लड़ने वाली कौमें क्रांति नही करती। तब क्यो नही लड़े, जब बाप ने देशनिकाला दे दिया था? कौन बाप निकालता है अपने लड़के को ऐसे भरी जवानी में? नाकारा रहे होंगे तभी तो।

भक्त2-पूरे रविवंश में ऐसा कपूत नही हुआ कोई। प्राण जाय पर वचन न जाई वाली परम्परा का तेल निकाल कर रख दिया। माँ बाप ने इनको अकेले वनवास दिया था तो बीवी को भी साथ ले गए। वनवास था कि वनविहार? याद रखियेगा, भाई को भी भाई नही, नौकर बनाकर ले गए थे।

भक्त3- अरे बीवी छोड़नी ही थी तो मोदी जी की तरह छोड़ते, बेचारे धोबी के कंधे पर रखकर बन्दूक चला दी। नाहक बदनाम किया बेचारे गरीब को। यही है, यही है सामंती मानसिकता, साफ पता चलता है कि दलित और पिछड़ा विरोधी आदमी थे। जिस बीवी को छोड़ने के लिए बेचारे धोबी को बदनाम कर दिया, उसी बीवी के लिए ब्राह्मण रावण को मारा बताइये। ये जाति द्रोही आदमी है, इनका तो पर्चा खारिज कर देना चाहिए।

भक्त4- रोज 30 बाण मारते थे। दस सिर और बीस भुजाएं काटते थे। वो सब फिर से उग आता था। देश का धन बरबाद करते रहे, वो तो मोदी जी ने कान में असली राज बताया कि इसकी नाभि में अमृत है। तब जा के 31वाँ बाण नाभि में मारा। तब जा के अमृत सूखा था, लेकिन बिकाऊ मीडिया ये सब नही बताएगा आपको।

भक्त5- मियां बीवी ने मिलकर बेचारे लक्ष्मण को तो मरवा ही डाला था। सोने के मृग वाला इतिहास वामी इतिहासकारों का लिखा इतिहास है। असली इतिहास पढ़िए तो पता चलेगा, मारीच से मिल के लक्ष्मण को मारने का पूरा प्लान था। लक्ष्मण तो समझ भी गए थे पर त्रिया चरित्र भी तो कोई चीज़ होती है।

बीजेपी आईटी सेल- बेकार का, बाप के पैसे पर राज करने का सपना देखने वाला जानकर जब बाप ने देशनिकाला दिया तो हजरत राजसिंहासन का रत्नजड़ित खड़ाऊं चुरा ले गए।भागते भूत की लँगोटी भली। वो तो भरत की पारखी नज़र ने ताड़ लिया और पूरे लाव लश्कर के साथ वो कीमती और ऐतिहासिक खड़ाऊं ले आने वन आये। आप असली इतिहास पढ़ के देखिए, भरत इनको मनाने नही आये थे। वही रत्नजड़ित खड़ाऊं लेने आये थे और पूरे समय वही मांगते रहे, अंत मे लेकर ही माने।

ये है इतिहास इन तथाकथित सूर्यवंशियों का। चुपचाप वही टाट में पड़े रहते तो भव्य क्या, मोदी जी दिव्य मंदिर बनवा देते। लेकिन ये तो देशद्रोही निकले। अब रहिये वहीं।

Tuesday, April 16, 2019

पतझड़ से पहले और बाद की एक बकवास



सबसे पहले शहतूत छोड़ता है अपनी पत्तियां 
और लगभग एक साथ ही हो जाता है नंगा 
डालें, टहनियां सब की सब नंगी 
हवा चलती है तो सर्र से गुजर जाती है 
एक भी टहनी नहीं हिलती शहतूत की 
फिर आती है बारी नीम की 
शहतूत के बाद नीम को नंगा होते देखना 
इतना आसान नहीं है 
वो एक साथ नंगा भी नहीं होता 
धीमे-धीमे मरता है नीम 
और रोज हमें पता चलता है कि 
नीम कितनी तकलीफ में है 
जैसे कि ट्रॉमा सेंटर में बेहोश पड़ा कोई मरीज 
जिसकी रुक-रुक कर सांस चलती है 
जैसे सड़क पर हुआ कोई एक्सीडेंट 
जिसमें भीड़ तो होती है, बस जान नहीं होती 
एक हिस्सा छोड़ने के बाद 
दूसरा हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं होता नीम
लेकिन मौसम उसे नंगा करके ही छोड़ता है। 
जब शहतूत पकने लगती है 
और नीम में आते हैं नए फूल 
तो चलाचली की बेला में होता है बेल 
चार छह बच गए सूखे बेल लटकाए यह पेड़ 
हर हरे के बीच ठूंठ सा खड़ा रहता है 
जैसे कोई बूढ़ा जर्जर खेलता हो बच्चों के साथ 
जैसे समुद्र मे कोई तालाब सा हो 
या फिर बहती नदी के बगल ठहरा हुआ हरा पानी
फिर एक दिन बूंदे बरसती हैं
और बढ़ता है नदी में पानी 
और ले जाता है अपने साथ 
नीम, शहतूत और बेल को भी। 

Tuesday, February 19, 2019

इंसानियत का तकाजा

शंभु रैगर याद है? वही, जिसने एक मासूम मजूदर को कुल्हाड़ी से सिर्फ इसलिए काट डाला, क्योंकि वह मुसलमान था। उस वक्त उसके जैसे कुछ एक लोगों ने दम भरने की कोशिश की, लेकिन वे चुप इसलिए हो गए, क्योंकि हममें से किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया। हम ऐसे लोगों का साथ दे भी नहीं सकते। कैसे दे सकते हैं? क्या हमारे संस्कार ऐसे हैं? क्या हमारे मां-बाप ने हमें हत्या करना या हत्यारों का साथ देना सिखाया है या फिर क्या हममें से किसी का भी धर्म ये करना सिखाता है? फिर कोई शंभु रैगर न बने, इसलिए उस वारदात के बाद बहुत सारे मां-बाप ने अपने बच्चों को लेकर अतिरिक्त सावधानी भी बरतनी शुरू कर दी। एक हत्या ने समूचा देश हिला दिया था, लेकिन हममें से किसी ने उसके परिवार के बारे में गलत नहीं सोचा।
अखलाक याद है? वही, जिसे दादरी में गोरक्षक होने का झूठा दावा करने वाले लोगों ने घर में घुसकर जान से मार डाला था। गुंसाई इंसान नहीं मारते। हम उन हत्यारों का नाम और गांव जानते हैं। हममें से किसी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा कि उनका गांव खत्म कर देंगे। सभी सुरक्षित हैं, पूरा गांव वहीं है और सभी उतने ही भारतीय हैं, जितने कि हम-आप हैं। बुलंदशहर वाले शहीद इंस्पेक्टर सुबोध कुमार याद हैं? हमें पता है कि हत्यारे कौन हैं और यह भी कि हत्याएं करते जाने की यह अक्ल कौन दे रहा है। लेकिन क्या हमने सबको खत्म करना शुरू कर दिया? नहीं। हम ऐसा कभी भी नहीं कर सकते। संविधान तो है ही, लेकिन संविधान के पहले तो हम सब इंसान हैं। हम सभी इंसानियत के रास्ते ही आगे बढ़ते आए हैं। हैवानियत तो हमारी तरक्की तोड़ देती है।
अभी पुलवामा में आतंकी हमला हुआ और हमारे बच्चे बेमौत मारे गए। हम सब बेहद दुखी हैं। हमें प्रतिकार चाहिए। कुछ भटके लोग मासूम कश्मीरी बच्चों पर हमला कर रहे हैं। चीखते हैं कि सारे कश्मीरी आतंकवादी हैं। फिर अगर कोई पूछे कि शंभू रैगर या दादरी का वह पूरा गांव आतंकवादी है? या बुलंदशहर में जिसने इंस्पेक्टर सुबोध को मारा, वह तो पूरा गांव लेकर आया था- सारे आंतकवादी हैं? नहीं। एक की वजह से गांव बदनाम तो होता है, पर खराब नहीं होता। उत्तर प्रदेश और राजस्थान की ही तरह भटके लोग कश्मीर में भी हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सबको खत्म कर देंगे। दुख की इस बेला में वैसे तो अक्ल की बात करना बेमानी है, लेकिन इंसानियत की बात हर हाल में कही जाएगी। कश्मीरियों पर हमले बंद करिए। तुरंत। वे हमारे अपने हैं। और कोई भी कश्मीरी अगर दुख में पागल हो चुके किसी दूसरे भारतीय से डर रहा है, मेरे घर आए। मैं नोएडा में रहता हूं। 

Wednesday, January 30, 2019

खजुराहो की इस तस्वीर को कैसे देखें


(चेतावनी- अगर आप प्रेम में नहीं हैं, या फिर जीवन में आप कभी प्रेम में नहीं रहे हैं तो इस तस्वीर को न देखें। इसलिए नहीं कि तस्वीर समझ में नहीं आएगी, इसलिए क्योंकि इसके भावों में उतर पाना उसी के लिए मुमकिन है, जो ऐन उसी भाव में रहा है, जिसकी कि यह एक भंगिमा है।) 

संदर्भ : खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर के एक दर्जन से अधिक कोने है और हरएक कोने में स्त्री-पुरुष के प्रगाढ़तम प्रेम की भंगिमाएं बनी हुई हैं। यह तस्वीर प्रेम का उद्दीपक है, बोले तो प्रेम की शुरुआत। खजुराहो में कामकला की प्रत्यक्ष मूर्तियां कामसूत्र से कॉपी की गई हैं, लेकिन इन दर्जन भर कोनों में जो मूर्तियां हैं, वे कामसूत्र को बहुत ज्यादा फॉलो नहीं करतीं। कोने की अधिकतर मूर्तियों में ठीक उसी तरह का झटपट प्रेम दिखता है, जैसा कि हम सभी कोने में घुसकर करते हैं।

प्रसंग : स्त्री सजी हुई है, पुरुष भी। दोनों ने यथासंभव श्रृंगार कर रखा है और एक दूसरे को आकर्षित करने के लिए गले में रत्नजड़ित माला, हाथ में मोटे बाजूबंद पहन रखे हैं। पुरुष ने कमर में रत्नजड़ित कमरबंद बांध रखा है जो शायद हथियार बांधने के भी काम में आता होगा। पुरुष के बाल बड़े हैं जिन्हें उसने सिर के ठीक ऊपर जूड़ा बनाकर बांधा हुआ है। हो सकता है कि उसी जूड़े पर उसने एक मुकुट भी पहना हो। स्त्री ने भी लगभग उसी अंदाज में जूड़ा बांध रखा है। जिस तरह से दोनों तैयार हो रखे हैं, हो सकता है कि दोनों मैटिनी शो देखने जा रहे हों और ये भी हो सकता है कि मैटिनी शो उन्हें दिखने के लिए खुद उनके पास आ रहा हो। स्त्री के जेवर ही उसके वस्त्र हैं, तो पुरुष ने अपनी पीठ पर कपड़े का लंबा लबादा टांग रखा है, जो कुछ-कुछ रोमन साम्राज्य के राजाओं के लबादे से मिलता है। समय के साथ साथ पुरुष का पुरुषत्व टूट चुका है, लेकिन स्त्री का स्त्रीत्व अभी तक कायम है।

भावार्थ : दोनों बहुत खुश हैं। लगभग हजार साल बाद भी दोनों के चेहरे पर प्रेम की वही गर्मी अभी तक बनी हुई है, जो हजार साल पहले उठी थी। प्रेम की इसी गर्मी से स्त्री का चेहरा भर आया है और गाल थोड़े से और गोल हो गए हैं। यही गर्मी पुरुष के भी चेहरे पर है, लेकिन उसमें काम तत्व अधिक दिख रहा है, इसलिए वह प्रेम में स्त्री जितना नहीं  बह रहा, उसका चेहरा गर्म तो है, लेकिन नियंत्रित है और गंभीर भी। दाहिने हाथ की तर्जनी से वह स्त्री की ठोड़ी थोड़ा ऊपर उठा रहा है कि उसके अंदर वह थोड़ा सा और उतर सके और उसे अपने अंदर थोड़ा सा और उतार सके। देखना महज देखना नहीं होता, वह पीना भी होता है, उतरना भी होता है, उतारना भी होता है और जज्ब करना भी होता है। देखा कैसे जाता है, यह हम इस तस्वीर में देखकर आसानी से सीख सकते हैं। पुरुष स्त्री को खुद में जज्ब कर रहा है, जबकि दैहिक रूप से यह काम स्त्री का माना जाता है। लेकिन यही तो प्रेम होता है जो स्त्री पुरुष की सभी मान्य अवधारणाएं तोड़कर छिन्न भिन्न कर देता है। इस तस्वीर में पुरुष भले ही पुरुष दिख रहा है, लेकिन वह पूरी तरह से स्त्री बन चुका है और जो कुछ भी है, सब अपने अंदर भर लेना चाह रहा है। वहीं स्त्री जानती है कि वह इसी रास्ते से पुरुष के अंदर जा रही है, घर बना रही है, विजय पा रही है। विजय के इस आनंद में स्त्री की आंखें बंद हो चुकी हैं, नाक फूल चुकी है और होंठ एक प्रगाढ़ चुंबन के लिए आधे खुलकर ऊपर की ओर उठ चुके हैं। स्त्री जानती है कि चुंबन शुरुआत नहीं, बल्कि देखने का और पुरुष पर विजय पाने का अंत ही होगा क्योंकि फिर देखना खत्म होकर महसूसना शुरू हो जाएगा। लेकिन स्त्री महसूसने तक जाना चाहती है, इसीलिए वह अपनी कमर का दाहिना हिस्सा पुरुष की बाईं टांग से रगड़ रही है। स्त्री के स्तन गोल हैं, कामोत्तेजक हैं, फिर भी पुरुष उसके चेहरे में ही फंसा हुआ है तो इसका एक अर्थ ये भी हो सकता है कि तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती, नजारे हम क्या देखें? ये तस्वीर हमें बताती है कि अंत पंत में हमारी पर्सनालिटी का सबसे बड़ा हिस्सा हमारे गुप्तांग नहीं होते, बल्कि हमारा चेहरा होता है, प्रेम होता है और स्त्री पुरुष के बीच हमेशा बनी रहने वाली गर्मी होती है।

Wednesday, December 12, 2018

एक रात की बेबात

रोज की तरह रात आ तो गई
लेकिन रोज की तरह गई नहीं
रात जमकर बवाल काटा
सालों पुरानी प्रेमिका से भिड़ा
दाहिने गई तो दाहिने जाने पर चिल्लाया
बाएं गई तो बाएं जाने पर भी
चुप रही तो चुप्पी पर भड़का
बोली तो बोलने पर तड़का
दो सेकेंड में ब्रेकप करके दो घंटे बकवास की
फिर ठंड लगी
कंबल ओढ़ा, टोपी पहनी
और चला आया
उससे भी पुरानी प्रेमिका के पास
हर बार की तरह फिर से उसे
मीठा सा एक प्रपोज मारा
प्रेमिका मुदित हुई
उसकी आंखों से गरमी निकली
मैं तर हुआ
और तुरंत हस्तमैथुन करके
खुद को शांत किया
पुरानी प्रेमिका की तस्वीर बगल रखी
और तकिये से सटकर सो गया।
सुबह उठा
पैताने पर पहुंची तकिया सिराहने रखी
पहले पुरानी प्रेमिका की तस्वीर देखी
फिर लैपी पर एक्सवीडियोज लगाया
खुरचकर कमरे की दीवार पर एक निशान बनाया
और फ्रेश होकर हाथ धुलकर
फिर एक बार हस्तमैथुन किया
फिर भी ट्रैफिक की लाल बत्ती पर
सिर पर सवार थी पुरानी लाश
और पीछे सीना सटाकर बैठी रही
उससे भी पुरानी तकिया
कार वाले बूढ़े को गालियां दीं
भीख मांगने वाली बच्ची को भी
रिक्शे वाले को डांटा
फ्लाईओवर पर चलती ठंडी हवा को कोसा
तीन बार स्कूटी से गिरते गिरते बचा
कई बार पैदल चलते हुए लड़खड़ाया
भूख नहीं लगी, फिर भी जबरदस्ती
दो समोसे दो बाटी कोक के साथ गटके
दो डिब्बी सिगरेट फूंक गया
और धुंए में उड़ा दिया ब्रेकप के बाद याद आता रेशम
पी गया अपना सारा पानी
एक व्यंग लिखा, सामने बैठने वाली स्त्री की बुराई की
चिल्लाने वाले कर्मचारी पर पहली बार चिल्लाया
और पूरी कर दी नौकरी
रास्ते की सारी लाल बत्तियां तोड़ीं
और घर वापस आया
रात फिर से शुरू थी
और एक्सवीडियोज भी
तीन बजे रात तक चैट की हरी बत्ती जलाए रखी
मगर वो सोती रही
फिर फोन में सबको ब्लॉक मारा, उसे भी
नट्टी तक भरकर पी शराब
फेफड़ों में भरा ढेर सारा धुंआ
और तय किया कि
अब बाल कलर करा ही लूंगा,
बस बहुत हुआ।