Tuesday, May 29, 2018

भाषाएं हार का प्रतीक हैं

1
बार बार हारता हूं
हर बार हारा हूं।
हारे हुए लोगों से भी
हार चुका हूं।

2
मैंने हारना सीखा है
यही मेरा सीखना है।
मौसम कोई भी हो
मुझे हारना आता है।

3
हारने में दुख है
दुख ही सत्य है।
अंतिम वह भी नहीं
और मैं फिर हारा।

4
हर किसी से ज्यादा
हार पहचानी है।
हारना जानने के लिए
भाषा जरूरी नहीं।

5
हारने के हिसाब में
मर्जी से भी हारा हूं।
पर खुद हारा
तो झूठा हारा।

6
बेस्वाद होती है असल हार
बिलकुल धूल की तरह
गरदन में जाते खंजर की तरह
रोज आते अखबार की तरह।

7
हारने के बाद
मैं बोलता हूं।
भाषाएं
हार का प्रतीक हैं।

8
कल फिर हारा था
कल फिर हारूंगा
हारते रहना ही
हमारा अतिक्रमण है।

9
लड़कर हारा
और बिना लड़े भी।
कुछ तय हो न हो
हार तय है।

10
जानता हूं कि
हारते हुए ही जीना है
हर बार हारते हुए
धूल बढ़ाते हुए।

A portrait from Rajgir (Bihar)

Wednesday, April 18, 2018

सिंधु घाटी की सभ्यता और नौ सौ साल लंबा सूखा

लेह-लद्दाख की त्सो-मोरीरी झील में पांच हजार साल पुरानी मिट्टी की तहों के जरिये मॉनसून पैटर्न्स का अध्ययन करने के बाद आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने सिंधु घाटी सभ्यता के खत्म होने का विचित्र कारण बताया है। उनका कहना है कि लगभग 4350 साल पहले सिंधु घाटी में नौ सौ साल लंबा सूखा पड़ा था।
ताज्जुब की बात है कि नौ सौ तो क्या, सौ-पचास साल लंबे सूखे का भी कोई जिक्र हमें किसी वेद-पुराण में नहीं मिलता। लेह-लद्दाख की झील में मौजूद मॉनसून के निशान बताते हैं कि इतनी लंबी अवधि तक उत्तर-पश्चिम हिमालय में बारिश न के बराबर हुई और इसके चलते पंजाब की जो नदियां पानी से भरी रहती थीं, वे सब सूख गईं। सिंधु घाटी की सभ्यता कभी इन्हीं नदियों से गुलजार रही होगी।
मॉनसून की इस स्थायी बेरुखी के चलते सिंधु घाटी में बसे लोग पूरब की गंगा घाटी में और दक्षिण दिशा की ओर चले गए। आईआईटी खड़गपुर के भूविज्ञान और भूभौतिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने पाया कि नौ सौ साल लंबा यह सूखा लगभग 2,350 ईसा पूर्व से शुरू होकर 1,450 ईसा पूर्व तक चला।
दुख की इतनी लंबी अवधि की कोई थाह व्यास और वाल्मीकि जैसे हमारे महाकवि भी नहीं लगा पाए, जिनकी लिखाई भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में समादृत है। बताया जाता है कि महाभारत में जिस समय का जिक्र है, वह 3100 से 1200 ईसा पूर्व का है, पर इतने असहनीय सूखे का कोई जिक्र महाभारत में भी नहीं मिलता है। 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक अस्तित्व में रहे वैदिक काल की किसी ऋचा में भी इसकी कोई भनक नहीं मिलती है।
वैज्ञानिकों की यह रिसर्च बीसवीं सदी में पेश की गई उस धारणा को भी सीधी चुनौती देती है कि 3300 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक चली सिंधु सभ्यता का पराभव किसी दो सौ साल लंबे सूखे से हुआ था। जाहिर है, आईआईटी खड़गपुर के इस शोध को कड़ी कसौटियों पर परखा जाएगा। मसलन, यह सवाल भी उठेगा कि इतने लंबे सूखे के निशान दक्षिण-पश्चिम एशिया के बाकी भूगोल में क्यों नहीं दर्ज किए जा सके? एक बात तो तय है कि इतिहास की नवीनतम खोजें भूविज्ञान, भूभौतिकी, जेनेटिक्स और कंप्यूटर मॉडलिंग के दायरों से आ रही हैं। भारत जैसे इतिहासग्रस्त समाज में इन खोजों को ज्यादा तवज्जो मिलनी चाहिए।

Wednesday, April 11, 2018

यही अंत है...

जल्दी से कुछ लिख लें। जल्दी से कुछ कह दें। जल्दी से किसी को देख लें। जल्दी से कहीं छुप जाएं। जल्दी से कहीं भाग जाएं। जल्दी से कहीं चढ़ जाएं। जल्दी से कहीं उतर जाएं। जल्दी-जल्दी-जल्दी।
यहां से जाना, वहां से आना, वहां बैठना, कहीं और जाकर ठहर जाना, फूल देखना, पत्ती चुनना, हवा रोकना, पानी भरना। सब जल्दी-जल्दी-जल्दी-जल्दी।
ये खा लो, वो पहन लो, उससे मिल लो, वहां बात कर लो, वहां बोल दो, वहां चुप रहो, यहां से दूर रहो, वहां के पास रहो, उससे बोलो, उससे न बोलो, बैठे रहो, खड़े रहो, लेटे रहो। रहो-रहो-रहो। जल्दी में रहो।
धीमे-धीमे आती है बेचैनी। धीमे-धीमे चढ़ता है पारा। धीमे-धीमे उतरता है पानी। धीमे-धीमे चलती हैं आंखें। धीमे-धीमे आती है आवाज। धीमे-धीमे निकलती है बात। धीमे-धीमे पकता है सपना उधार का।
धीमी सी एक बात है- रह कर करेंगे क्या? कर के भी करेंगे क्या? करना क्यों है? क्यों ही क्यों है? जीवन ने मेरे से कभी न पूछा, मैं पूछने वाला कौन हूं?
चुप की बारात है, रोज घोड़े लेकर घेरती है। लकड़ी की मेज है, रोज सामने खड़ी रहती है। खूंटी पर टंगी शर्ट है, हवा चलने पर हिलती है। फिर मन का क्या करूं बुच्चन? सड़ रहे मन का क्या करूं बुच्चन?
एक बच्चा है, जो दूर है। एक दूर है, जो अभी बच्चा है। रुका हुआ पानी है। रुकी हुई कहानी है। लात मार-मारकर जिसे बढ़ाते हैं और पाते हैं कि वो तो हमसे भी पीछे चली गई है।
एक देह है, जो हद के पार कहीं दिखती है। एक आंख है, जिसके हाथ नहीं हैं। एक कमरा है, दीवारों से भरा हुआ। एक रसोई है, जिसमें न आटा है न आलू।
मन चंट है, फिर भी दीवार नहीं तोड़ पाता। पांव में चक्कर है जो पैताने पर मसल देता हूं। दांतों से आज मैं धुंआ पीसता हूं बुच्चन। यही अंत है। है न?

रात किसी बरसात से बाहर

Monday, April 9, 2018

पैंतीस के बाद प्रेम वाया और पतित होने के नारायणी नुस्खे

एक बार तो लगता है कि झपटकर कर लें, लेकिन फिर दिमाग चोक लेने लगता है। यहां तक आते-आते दिल की मोटरसाइकिल भी तीस से नीचे का एवरेज देने लगती है। गनीमत बस इतनी है कि रुक-रुककर ही सही, चलती तो है। और जैसे ही ‘आगे तीखा मोड़ है’ का बोर्ड दिखता है, मुई मोटरसाइकिल सीधे वोटरसाइकिल में बदलने लगती है। जो लगती है कि चल रही है, दिखती है कि आ रही है, लेकिन न चलती है, न आती है। घर्र-घर्र करके किसी मकैनिक की दुकान से कम से कम तीन किलोमीटर पहले ही रुक जाती है। यहां तक आते-आते दिल की ये जो मोटरसाइकिल है न, इसे चलाने में बड़ा डर भी लगता है। साठ की स्पीड पार करते ही लगता है कि एक पहिया दाहिने जा रहा है तो एक बाएं। कुछ दिन पहले टंकी फुल कराई, थोड़ी चलाई और फिर थोड़ी दौड़ाई, मगर वो स्पीड नहीं मिली जो पहले मिलती थी। सब दांए-बांए हो गया।

मोटरसाइकिल की जब ये हालत हो तो सड़क भी सूनी मिलती है। दूर-दूर तक ऐसा कोई नहीं दिखता कि धक्का ही लगा दे। और अगर उस सूनी सड़क पर कोई मिल भी जाए तो धक्का लगाने के लिए तैयार नहीं होता। खैर उसकी भी कोई गलती नहीं, साढ़े तीन दशक पुरानी धूल और थपेड़े खा चुकी मोटरसाइकिल यहां कोई छूना नहीं चाहता, धक्का तो बहुत दूर की बात है। फिर तहों तह जमी धूल हाथ भी तो गंदा कर देती है। वैसे कोई धक्का खाया मिल जाए तो वह धक्का लगाने में पीछे नहीं रहता है। धक्का खाए लोगों से पूरी दुनिया ही भरी-भरी है, मगर धक्का खाए लोग सड़कों पर नहीं मिलते। सूनी सड़कों पर तो बिलकुल नहीं मिलते। मोटरसाइकिल को इस उम्र में पहुंचाने के बाद जितनी जल्दी हो सके, हमें सीख लेना चाहिए कि कैसे भी करके, कम से कम एक धक्का खाया शख्स मोटरसाइकिल के पीछे बैठा लें, वरना सड़कों का तो वैसे भी कोई भरोसा नहीं है।

अभी परसों ही हैरिंग्टनगंज से मिल्कीपुर की ओर चला जा रहा था। अपने यहां सड़क सपाट तो हो नहीं सकती, पर सूनी जरूर हो जाती है। बाजार छोड़ते ही मोटरसाइकिल दाहिने-बाएं होने को हुई कि सूनी सड़क पर एक साहब मिल गए। अकेले चले जा रहे थे, और पीछे-पीछे मैं। मैंने सुना कि वो कैफी की कोई उम्मीद भरी गजल गुनगुना रहे थे, शायद किसी ताखे से उतार लाए थे। थोड़ी देर तक तो मैं पीछे-पीछे चला और जब न रहा गया तो पूछ बैठा- ‘धक्का लगाएंगे?’ इतना सुनना था कि उनका चेहरा लाल। बोले- ‘मूर्ख दिखता हूं मगर हूं नहीं।’ मैंने कहा- ‘साहब, मैंने तो सिर्फ धक्के का पूछा, न लगाना हो तो न लगाइए। आप दयालु दिखे, इसलिए पूछा।’ कहने लगे- ‘जानता हूं आप मजे ले रहे हैं।’ मैंने लाख समझाने की कोशिश की, रुकी पड़ी मोटरसाइकिल भी दिखाई, पर क्या मजाल कि वह धक्का लगा दें। हारकर मैंने पूछ ही लिया- ‘कभी धक्का खाया है आपने?’ वह बगैर बताए ही आगे बढ़ गए। जाते-जाते मैंने देखा कि इस बार उन्होंने मुंह पर रूमाल भी बांध लिया था।

Thursday, April 5, 2018

फिर मिलेंगे, या नहीं मिलेंगे, या नहीं पता...

आता तो है इधर, लेकिन ठहरता नहीं है। गलती से कभी ठहर भी गया, तो राम कहां ठहरने वाले। मन में रंग रहता है, रंग में मन रहता है। आता है जब सुख तो जीवन में कुछ ढंग रहता है, लेकिन ढंग के जीवन जैसी कोई चीज ढंग से कभी होती नहीं, पहले कभी यूजी ने कुढ़कर कहा था, मैं सपाट कहता हूं। लगता है कि सबकुछ ठीक चल रहा है और लगता ही है। लगना होना नहीं होता। ढंग की उमंगे लगने को होने देने के लिए बार-बार ऊपर लेकर आती हैं, और बार बार राम थोड़ा और नीचे गिर जाते हैं।
जीवन जैसा ही बनना है। चाहे जो भी हो, जीवन को कोई फर्क नहीं पड़ता। सांस हर हाल में चलती ही रहती है। सुख से जीवन को कोई सुख नहीं मिलता, न दुख से दुख। अपनी बनाई चीजों से तो कतई कुछ नहीं मिलता और दूसरा कोई न था, न है, न होगा। होगा भी तो महज लगना ही होगा और लगना होना नहीं होता नीला बाबू। वैसे भी जीवन की गति गतिहीनता में ही है। बाकी तो दुर्गति है।
फिर मिलेंगे नीला बाबू, शायद जीवन की जड़ता से पार कहीं। या नहीं मिलेंगे, क्या फर्क पड़ता है, या नहीं पता...
तबतक तुम्हारे बुंदे का एक मोती मेरे पास है।