Sunday, 7 December, 2008

क्या हिंदू और क्या मुसलमान

hइंदु होने के फायदे- १०

अम्मा से दस रुपये लेकर मैंने पतारू का हाथ थामा और बढ़ लिया। अब हम लोगों की निगाह मे दो टारगेट थे। एक तो वो लड़की जो नदी मे नहा रही थी और दूसरी वो लड़की जो डम्पू के घर मे रहने आई थी। हमें पता था कि वो अपने पापा के साथ आई है और हम लोगों ने उसे बाग़ की दिवार फांदने से पहले देखा भी था। हमें नदी मे नहाने वाली लड़की नही दिखी। दरअसल सरयू पार करने के बाद परिक्रमा के दूसरे हिस्से मे रास्ता काफ़ी चौडा हो जाता है। इसलिए भीड़ भी तितर बितर हो जाती है। अब न तो हम लोग बदमाशी कर सकते थे और न ही कोई और। मजबूरन हमें सीधे सीधे चलना पड़ रहा था। खैर, लम्बी गहरी साँस लेकर मैंने पतारू और कल्लू ने एक साथ परिक्रमा पूरी कि। लेकिन अभी तो बधाइयों का सिलसिला चलना था। ये बधाइयाँ कुछ हैप्पी न्यू इयर के अंदाज़ मे दी जाती थी। जाल्पानाला से अमानीगंज तक हम लोग लड़कियों को बधाइयां देते हुए आए। घर पहुचे तो अम्मा और बाबू , जो हमसे पीछे पता नही कहाँ थे, पहले से ही पहुचे हुए थे। मम्मी परात मे नमक मिला गर्म पानी ले आई थी और बाबू और अम्मा उसमे अपना पैर सेंक रहे थे। मैंने बाबू को बताया कि मैंने पतारू और कल्लू ने कितना मजा लिया। फ़िर क्या था। अम्मा सुलग उठीं। उन्होंने पुछा, कल्लू काव करय गवा रहा तू लोगन की साथे ? ऊ तौ मुसलमान हुवे । मैं चुप। टुकुर टुकुर बाबू का मुह देख रहा था। शायद वो कोई जवाब देन। खैर बाबू खंखारे, और अम्मा से बोले, अब छोटे बच्चों मे क्या हिंदू और क्या मुसलमान। खाने खेलने की उम्र है इन लोगों की। और वैसे भी ये लोग हमेशा साथ मे ही रहते हैं। और तुम कल्लू को लेकर इसे बोल रही हो, तुम भी तो अली हुसैन की अम्मा के साथ सर से सर जोड़कर बतियाती रहती हो। तब नही याद आता कि क्या हिंदू और क्या मुसलमान?

Sunday, 30 November, 2008

सवाल दस रुपये का

हिंदू होने के फायदे - ९

राम की पैडी पर जब हम लोग समोसे खा रहे थे, तब मुझे याद आया की अम्मा ने तो सिर्फ़ दस रुपये ही दिए हैं। वो सारे तो वही ख़त्म हो गए। अब क्या करें। बड़ी मुसीबत। आगे आने वाले रास्ते पर एक अजीब तरह का ताना बिकता था। बेचने वालों का कहना था कि उसे भगवान् राम ने अपने वनवास के टाइम पर खाया था, और अक्सर खाते रहते थे। बहरहाल मुझे वो खाना अच्छा लगता था। उसका अजीब सा कसैला और मीठा स्वाद मुझे अभी तक याद है। यही सोच ही रहा था कि पतारू के बड़े भाई प्रेम परकास नजर आए। प्रेम ने बताया कि अम्मा बाबू और चचेरे मामा की चोटी बेटी अभी अभी आगे गए हैं। बड़ी हद चोटी छावनी तक पहुचे होंगे फ़िर क्या था। मैंने और पतारू ने वही से दौड़ लगनी शुरू की। परिक्रमा मे दौड़ लगानी काफ़ी मुश्किल होती है। हजरून लोगों की एक ही तरफ़ चलती भीड़ मे हमें दौड़ना था। और इतनी तेज़ कि आने वाले दस पन्द्रह मिनट मे अम्मा को पकड़ लिया जाय नही तो वो मिलने वाली ही नही थीं। आख़िर दस रुपये का सवाल जो था। ये तो पहले से ही पता था कि अम्मा वो लाल वाला गन्ना तो खरीदेंगी ही। सो लाल वाले गन्ने की चिंता नही थी। मैंने और पतारू ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और दौड़ना शुरू कर दिया। आख़िर मे चोटी छावनी के पास जहा मन्दिर के लिए पत्थर काटे जा रहे थे, वहां पर हमें आमा और बाबू दिख गए। चैन मिला। लम्बी साँस ली और पहुचे अम्मा के पास। खैर अम्मा ने डपटा नही और चुपचाप दस रुपये दे दिए। मैं भी सोच रहा था कि अभी कितनी चिरोरी करनी पड़ेगी।

जारी ....

देर से आने वालों के लिए पूरी कहानी यहाँ पढ़ें .... हिंदू होने के फायदे