Wednesday, September 19, 2018

कुछ भी नहीं कर पाया मैं

कुछ भी नहीं कर पाया मैं
दिन गुजरते रहे
कुछ करने के ख्यालों की तरह
रातें कटती रहीं
कुछ करने के सपनों की तरह
हर सुबह मैंने यही पाया
कि कुछ भी नहीं कर पाया मैं।

न ठीक से प्रेम कर पाया
और न ही ठीक से नफरत
न ठीक से नौकरी की
और न ही ठीक से पैसे कमाए
न ठीक से कभी घर चला पाया
न ही ठीक से कभी गाड़ी चलाई
जब जब चोट लगी, यही याद आया
कुछ भी नहीं कर पाया मैं।

ऐसी कोई रात नहीं गुजरी
कि मैं ठीक से सोया
ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा
कि मैं पूरा पूरा जागा
जागती आंखों से देखता रहा सपना
और बंद आंखों में भरता रहा रेत
न ठीक से घर का हो पाया
और न ठीक से बाहर का ही
जब भी कुछ करने का ख्याल आया
कुछ भी नहीं कर पाया मैं।

जैसी चलती है ये दुनिया
जैसी चलती है ये हवा
जैसे फूटती है धूप
जैसे घेरते हैं बादल
कितना तो चाहा
मैं भी चलूं, फूटूं और घेरूं
लेकिन ठीक से नहीं चाह पाया
जब भी बैठना चाहा
बेचैन होकर चलने लगा
जब भी चलना चाहा
हारकर बैठ गया।

दिन गुजरते रहे
रात कटती रही
शाम होती रही
सूरज चांद सब उगे
फूल खिलते रहे
और सबने अपना काम ठीक से किया
मगर मैं रहा कि
कुछ भी ठीक से नहीं किया
न ठीक से सांस ली
न ठीक से एक खबर लिखी
न ठीक से एक फोटो खींची
न ठीक से कोई कहानी बनाई
और तो और
ठीक से कुछ नहीं कर पाया
ये भी ठीक से नहीं बता पाया मैं। 

Tuesday, August 28, 2018

अमेरिका के संबित पात्रा, अर्नब गोस्वामी और रवीश कुमार

हममें से शायद ही ऐसा कोई होगा, जो बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा के चीख चिल्लाकर लगातार झूठ बोलने की आदत न जानता हो। संबित एक ही झूठ को बार-बार और कुछ एक न्यूज चैनलों को छोड़ तों तो तकरीबन सभी चैनलों पर बैठकर बोलते हैं। उनका झूठ लगभग हर बार पकड़ा जाता है, लेकिन बजाय उससे सीख लेने के, संबित और भी ज्यादा बेशर्मी और दुगने वॉल्यूम से दूसरा झूठ दोहराने लगते हैं।

वहीं अगर बात करें पत्रकार बिरादरी के संबित पात्राओं की तो पांच नाम सबसे पहले आते हैं। पहला नाम है अर्नब गोस्वामी, दूसरा नाम है अर्नब गोस्वामी, तीसरा नाम है अर्नब गोस्वामी, चौथा नाम भी अर्नब गोस्वामी ही है और पांचवे नंबर पर हम सुधीर चौधरी को रख सकते हैं। सुधीर चौधरी को पांचवे नंबर पर इसलिए रखा जा सकता है क्योंकि उनकी कुछ कानूनी मजबूरिया हैं जिन्हें खत्म करने के लिए उनकी गैरकानूनी मजबूरी यह है कि वे सत्ता के तलवे चाटें। मगर एक से लेकर चार तक जिन अर्नब गोस्वामी साहब का नाम रखा गया है, उनकी कोई कानूनी मजबूरी नहीं है। न तो उन्होंने अपनी लाल लैंबोर्गिनी फुटपाथ पर सोते मजदूरों पर चढ़ाई है और न ही किसी जिंदल ने अभी तक उन्हें रिश्वत खाते रंगे हाथों पकड़वाया है। फिर भी अर्नब गोस्वामी पूरी श्रद्धा और लगन से सत्ता के तलवे चाटते हैं जो जाहिर है कि बात किसी मजबूरी से भी कहीं ऊपर की है।

बहरहाल इस बार खबर अपने देश से सात समुंदर पार के उस देश से है, जिसकी हम बेशर्मी की हद तक नकल करते हैं, और अभी तक हर बार ही उतनी ही बेशर्मी से फेल हुए हैं। लेकिन यह खबर बताती है कि बेशर्मी में भी हममें और उनमें हद दर्जे की समानता है।

मशहूर मीडिया मुगल राघव बहल बताते हैं कि आज भी भारत और अमेरिका के राजनीतिक माहौल की सरगर्मियां हैरान करने की हद तक एक जैसी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व वैसे तो बिलकुल अलग हैं- मसलन ट्रंप भद्दे ट्वीट लिखते रहते हैं, जबकि मोदी सोची-समझी रणनीति के तहत खामोशी से काम लेते हैं, लेकिन दोनों नेताओं में जो बात एक जैसी है, वह ये कि दोनों ने दस हजार मील की दूरी पर मौजूद दो बड़े लोकतांत्रिक देशों में एक जैसा ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है। दोनों सबके पास कट्टरपंथी समर्थकों की फौज है, जो लगातार जहर उगलने और विरोधियों को धमकाने का काम करते हैं। बेहद विनम्र आलोचकों को भी गद्दार घोषित कर दिया जाता है। आप या तो उनके प्यादे हो सकते हैं या फिर दुश्मन।

दोनों ही देशों में हाल यह है कि दूसरे देशों से आकर बसे लोग और अल्पसंख्यक डरे-सहमे रहते हैं। दोनों ही नेता अपना सीना ठोककर बड़े-बड़े दावे करते हैं और हर बात का श्रेय खुद को देते हैं, फिर चाहे वो ऊंची आर्थिक विकास दर और शेयर बाजार में उछाल हो या फिर पिछली सरकार का कचरा साफ करने और सत्ता के गलियारों में पसरी गंदगी को बाहर निकालने जैसे दावे। जो भी लोग स्वतंत्र और निष्पक्ष समाचार देते हैं या ऐसी कंपनियां किस्मत से बची रह गई हैं, उनके बारे में उनका मानना है कि झूठी और फर्जी खबरें फैलाने वाली इन तमाम राष्ट्र-विरोधी दुकानों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

लेकिन एक चीज है जो अमेरिका को वाकई अमेरिका बनाती है और भारत को लोकतंत्र की राह में लंगड़ाने को मजबूर कर देती है। भारतीय मीडिया में मोदी सरकार के सामने दर्जनों मीडिया संस्थानों और संपादकों ने कायरता भरा सरेंडर कर दिया है। यहीं लोकतंत्र का चौथा खंबा दरकने लगता है और लोकतंत्र यानी कि डेमोक्रेसी लंगड़ी हो जाती है। लेकिन अमेरिका के समाचार संस्थान ट्रंप को डटकर जवाब देने का दमखम और साहस दिखा रहे हैं। हाल ही में बोस्टन ग्लोब अखबार की पहल पर अमेरिका के तीन सौ अखबारों ने ट्रंप के खिलाफ संपादकीय लिखे। अपने यहां किसी को याद हो तो वह बताए कि किसी अखबार ने मोदी सरकार की सीधी आलोचना कब की थी? इस मामले में मेरे तथ्य थोड़े कम और थोड़े कमजोर पड़ रहे हैं, शायद आप लोग मुझे कुछ आंख खोलने वाले तथ्य दे सकें।

लेकिन बात हो रही है अमेरिका के संबित पात्राओं, अर्नब गोस्वामियों और सुधीर चौधरियों की। पहले तो जान लें कि कौन से चैनल अमेरिका के रिपब्लिक टीवी हैं और कौन से जी न्यूज। अमेरिका का फॉक्स न्यूज वहां का रिपब्लिक टीवी है। पत्रकारिता के नाम पर मैला परोसने वाला फॉक्स न्यूज अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का पसंदीदा चैनल है और गाहे बगाहे ट्रंप इसकी तारीफों का पहाड़ खड़ा करते नजर आते हैं।

पहले नंबर पर आते हैं अमेरिका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस। अबॉर्शन अपने यहां कोई खास मुद्दा नहीं माना जाता, मगर ईसाइयत में यह बड़ा मुद्दा है। हम सभी जानते हैं कि अबॉर्शन कोई मन से नहीं, बल्कि मजबूरी में कराता है। मसलन गर्भवती महिला की जान को खतरा हो, बच्चा पेट में मर गया हो या ऐसी कई बातें, जिन्हें डॉक्टर अच्छे से बता पाएंगे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने चुनाव में मुद्दा ही यही रखा कि अबॉर्शन कराने वाली महिलाओं को सजा दी जाएगी। उनके चेले माइक पेंस भी जब इंडियाना में गर्वनर थे, तब उन्होंने गर्भपात विरोधी बिल पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें विकलांगता, लिंग या फिर भ्रूण की नस्ल के आधार पर गर्भपात पर भी रोक लगाई गई थी। जब वह उपराष्ट्रपति बने तो पूरे अमेरिका से लोगों ने उनके विरोधस्वरूप गैर सरकारी संस्था प्लैंड पेरेंटहुड को उनके नाम पर चंदा दिया और हर बार उसकी रसीद माइक पेंस को भेजी। प्लैंड पेरेंटहुड अमेरिका में अबॉर्शन के लिए मदद देने वाली सबसे बड़ी संस्था है। लोगों को उम्मीद थी कि माइक पेंस को शायद इससे कुछ शर्म आए, लेकिन बेशर्मी में वह ट्रंप को टक्कर देते दिखाई देते हैं। संबित पात्रा को माइक पेंस से बेशर्मी की क्लास लेनी चाहिए।

वहीं अर्नब गोस्वामी का रोल अमेरिका में एक महिला ने संभाल रखा है। इनका नाम है जीनी फेरिस पिरो। जीनी फेरिस पिरो फॉक्स न्यूज पर आने वाले वीकेंड शो "जस्टिस विद जज जीनी" की होस्ट हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में वो वेस्टचेस्टर काउंटी कोर्ट की जज रह चुकी हैं और रिपब्लिकन पार्टी की राजनीति में भी सक्रिय रही हैं। उनके पति को (जिनसे बाद में उनका तलाक हो गया) टैक्स फ्रॉड का दोषी पाए जाने पर 29 महीने की जेल हो चुकी है। जीनी पिरो 2005 में न्यूयॉर्क सीनेटर के चुनाव के दौरान हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ उम्मीदवार घोषित होने के बेहद करीब तक पहुंच गई थीं. उस वक्त रियल एस्टेट कारोबारी डॉनल्ड ट्रंप (और टॉमी हिलफिगर) ने उनके कैंपेन के लिए फंड भी दिया था। जीनी पिरो में हम संबित पात्रा, अरनब गोस्वामी और कभी कभार सुधीर चौधरी को भी देख सकते हैं। टॉमी हिलफिगर को हम दूसरा संबित पात्रा भी मान सकते हैं और चाहें तो दूसरा अडानी भी। इन्होंने ट्रंप को चुनाव जितवाने के लिए दिल खोलकर पैसा लुटाया था।

जीनी फेरिस पिरो ने बाद में न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर लिस्ट में नंबर वन रही अपनी किताब “लायर्स, लीकर्स एंड लिबरल्स : द केस अगेंस्ट द एंटी-ट्रंप कॉन्सपिरेसी” में ट्रंप का पूरी ताकत से बचाव किया। जीनी पिरो एक बेहूदी और बेशर्म पोस्ट-ट्रुथ एक्टिविस्ट हैं, जो ये दावा कर चुकी हैं कि अबु बकर अल बगदादी को “ओबामा ने 2009 में कैद से रिहा कर दिया था”।

जब रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ उस "शर्मनाक" प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए ट्रंप की चौतरफा आलोचना हुई, तो पिरो ने उनके बचाव में कूदते हुए उलटा सवाल दाग दिया, "तो उन्हें क्या करना चाहिए था? क्या वो बंदूक लेकर पुतिन को गोली मार देते?" कुछ लोगों का तो यहां तक कयास है कि ट्रंप जेफ सेशन्स को हटाकर पिरो को अटॉर्नी जनरल भी बना सकते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे अपने यहां संबित पात्रा को झूठ बोलने के लिए मोदी जी ने ओएनजीसी का डायरेक्टर बना रखा है। ये कोई हैरानी की बात नहीं है कि पिरो सेशन्स को "अमेरिका का सबसे खतरनाक आदमी" कह चुकी हैं।

इसी अगस्त में एक शनिवार जीनी पिरो ने रॉबर्ट म्यूलर पर बेहद एकतरफा और पक्षपातपूर्ण शो टेलीकास्ट किया, जिसे देखकर अर्नब गोस्वामी चीखने चिल्लाने की ट्रेनिंग लेते हैं। आपको बता दें कि रॉबर्ट म्यूलर वही हैं जो किसी तरह के दबाव में झुके बगैर दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी यानी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ जांच कर रहे हैं। अपने इस शो में पिरो ने कहा, "जब बात बुरी तरह बिगड़ जाती है और क्राइम सीन से सारे सबूत मिटाने होते हैं तो माफिया डॉन क्लीनर को बुलाता है, जो मारे गए व्यक्ति के शव को ठिकाने लगाता है या अपराध के बाद सबूतों को छिपाने का काम करता है। और जब डेमोक्रेट्स के लिए हालात पूरी तरह बिगड़ जाते हैं, तो वो सीरियल क्लीनर (यानी म्यूलर) को बुलाते हैं।"

आरोपों से भरे अपने इस बयान का अंत उन्होंने ये कहते हुए किया कि "म्यूलर बौखला गए हैं" क्योंकि उनके पास ट्रंप के खिलाफ "कुछ नहीं" है। उन्होंने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जो एक पत्रकार को करना चाहिए और न ही कोई तथ्य दिए। सिर्फ एक बड़ा और निराधार दावा कि "म्यूलर बौखला गए हैं" - और फिर इस दावे को अनगिनत बार दोहराया गया, ताकि उसे किसी भी तरह "सच" मान लिया जाए। ठीक वैसे ही, जैसे सुधीर चौधरी चीख चीखकर झूठ दर झूठ बोलते जेएनयू में लगे नारों का देश विरोधी टेंपर्ड वीडियो दिखा रहे थे या ठीक वैसे ही, जैसे कि अर्नब गोस्वामी रोज चीखते हैं। पत्रकारिता का मूल धर्म सुनना होता है, लेकिन अब पत्रकारिता का धर्म बदल गया है और यह महज चीखना होता है, वह भी झूठ बोलते हुए। बार बार, लगातार।

अमेरिका के लिए यह गनीमत है कि वहां रवीश कुमार कुछ अधिक संख्या में बचे रहने में कामयाब हो गए हैं। जैसे सीएनएन चैनल पर आने वाला ब्रायन का शो रिलायबल सोर्सेस। अपने यहां हालांकि रवीश कुमार ऐसी हिम्मत नहीं कर पाए हैं और शायद अर्जुन की तरह किसी कृष्ण का इंतजार कर रहे हैं कि कृष्ण आकर उन्हें सच्चे धर्मयुद्ध में उतरने का गीता ज्ञान दें, लेकिन ब्रायन ने न तो किसी कृष्ण का इंतजार किया और न ही गीता पढ़ी है। अपने शो रिलायबल सोर्सेस में ब्रायन अमेरिकी संबित पात्राओं, अरबन गोस्वामियों और सुधीर चौधरियों जैसे पथभ्रष्ट और मतिभ्रष्ट लोगों का बाकायदा नाम लेकर पोल खोल रहे हैं।

अगस्त 2018 के जिस शनिवार जीनी का झूठ का पुलिंदा ऑन एयर हुआ, उसकी की अगली सुबह सीएनएन पर ब्रायन ने अपने शो "रिलायबल सोर्सेस" जीनी पिरो की वो क्लिप दिखाई जिसमें म्यूलर पर "बौखलाने" का आरोप लगाया गया था - CNN के एक शो में फॉक्स न्यूज की क्लिप खुलेआम दिखाई जा रही थी, पूरी ब्रैंडिंग और सौजन्य के साथ ! कोई सावधानी भरे शब्द नहीं, कोई खेद नहीं, कोई हिचकिचाहट नहीं। और फिर स्टेल्टर ने "म्यूलर के बौखला जाने" की मनगढ़ंत खबर दिखाने पर पिरो की जमकर धुलाई कर दी। ये आमने-सामने की सीधी टक्कर थी। अपने उसी शो में स्टेल्टर ने NBC के कार्यक्रम "मीट द प्रेस विद रुडी गुलियानी" की क्लिप भी दिखाई, जिसमें ट्रंप के करीबी ने ये अविश्वसनीय दावा किया कि "सत्य नहीं है सत्य"। रूडी गुलियानी भी ट्रंप के भरोसेमंद और पालतू संबित, अर्नब और सुधीर के मिक्सचर हैं।

तो ये थे अमेरिका के संबित पात्रा, अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी। हालांकि वहां ऐसे लोगों की लाइन काफी लंबी है और यकीनन अपने यहां से ज्यादा लंबी। आखिर अमेरिका हमसे कहीं ज्यादा बड़ा देश भी तो है। लेकिन सवाल पैदा होता है कि सच दिखाने का दावा करने वाले अपने यहां के बचे खुचे चैनल आखिर कब तक चैनलों पर चीख चीख कर झूठ बोलने और दिखाने वाले पत्रकार के नाम पर सत्ता की दलाली करने वाले लोगों को बचाकर रखेंगे? कब उनके झूठ को अपने यहां भी अमेरिकी तर्ज पर बेपर्दा किया जाएगा? क्या तब, जब लोकतंत्र लंगड़ाने की जगह रेंगने लगेगा? या तब, जब वह मर जाएगा?

- यह लेख अमेरिका से लौटे राघव बहल के लिखे लेख से पूरी तरह से प्रेरित है।

Friday, August 17, 2018

अटल बिहारी बाजपेयी और भारतीय दक्षिणपंथ की विकास यात्रा

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी का गुरुवार को देहान्‍त हो गया.

भारत में दक्षिणपंथी राजनेताओं में वे सबसे बड़े कद और सर्वाधिक प्रतिष्‍ठा वाले नेता रहे हैं. संसदीय अखाड़े में जनसंघ और जनता पार्टी के दौर से गुजरते हुए भाजपा तक उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की राजनीति का नेतृत्‍व किया. गांधीवादी समाजवाद के साथ संम्‍बंध का उनका संक्षिप्‍त दौर अब भाजपा के इतिहास में एक भूला बिसरा पन्‍ना बन चुका है. आडवाणी के आक्रामक हिन्‍दुत्‍व वाले अभियान की परिणति में भाजपा के सबसे बड़ा दल बनने के बाद ये बाजपेयी ही थे जिन्‍हें शासन के प्र‍मुख चेहरे के रूप में भाजपा ने चुना था.

आरएसएस के सिद्धांतकार गोविन्‍दाचार्य ने उन्‍हें भाजपा का उदारवादी ‘मुखौटा’ कहा था, जबकि आडवाणी भाजपा का असली चेहरा थे. वे एक ऐसे दौर में भाजपा के सर्व प्रमुख प्रतिनिधि थे जब भाजपा को अपनी साम्‍प्रदायिक फासीवादी राजनीति के लिए एक मुखौटे की जरूरत थी. प्रथम राजग गठबंधन सरकार के सहयोगियों के लिए जिन्‍हें आडवाणी या मोदी जैसे ‘कट्टर’ माने जाने वाले संघियों को समर्थन देने में असुविधा हो सकती थी, बाजपेयी का मुखौटा उनके लिए उपयोगी था.

राजग की पहली सरकार के दौर में उनसे जिस भूमिका की मांग थी उसे निभाने के लिए बाजपेयी को अपनी राजनैतिक भाषा को थोड़ा नरम बनाना पड़ा. आज जब हम मोदी या अमित शाह द्वारा एनआरसी के सवाल पर आप्रवासियों के बारे में जहरीले प्रचार को सुनते हैं तो हमें 1983 में असम में एक चुनावी भाषण में बाजपेयी के उस वक्‍तव्‍य को भी नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्‍होंने कहा था ‘‘विदेशी यहां घुस आये हैं और सरकार कुछ नहीं करती. अगर वे पंजाब में घुसे होते तो लोगों ने उनके टुकड़े-टुकड़े करके बिखरा दिये होते.’’ ठीक उसके बाद ही असम के नेल्‍ली में 2000 मुसलमानों का जनसंहार किया गया था. 1992 में बाजपेयी उन नेताओं में थे जो संघ की रणनीति के अनुरूप बाबरी मस्जिद विध्‍वंस की पूर्व संध्‍या पर ही अयोध्‍या छोड़ कर दिल्‍ली आ गये थे. अयोध्‍या छोड़ने से पहले बाजपेयी ने इशारों वाली भाषा में – वे निस्‍संदेह भाषण देने की कला के दिग्‍गज थे- कारसेवकों से कहा था कि उनके लिए विध्‍वंस के औजारों की जरूरत होना बिल्‍कुल स्‍वाभाविक है क्‍योंकि ‘जमीन को समतल करना जरूरी है’. इस भाषण के बाद श्रोताओं की उन्‍मादी गड़गड़ाहट से उसी क्षण स्‍पष्‍ट हो गया था कि उनका इशारा वे समझ गये हैं – अगले दिन कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को बाकायदा समतल कर दिया था.

प्रधानमंत्री के रूप में बाजपेयी ने गुजरात में 2002 में हुई साम्‍प्रदायिक हिंसा के लिए मोदी को राजधर्म निभाने की ‘नसीहत’ दी थी. पर साथ ही उन्‍होंने मोदी को मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने दिया और गुजरात के मुसलमानों की दंगों के दौरान और उसके बाद सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं किया. वे शिष्‍टाचार और बहस की हिमायत करते थे; पर गुजरात में धर्म परिवर्तन का विरोध करने के बहाने संघ द्वारा ईसाइयों के विरुद्ध की गई साम्‍प्रदायिक हिंसा के बाद उन्‍होंने ‘धर्म परिवर्तन पर बहस’ का आवाहन किया था. गुजरात जनसंहार, और इण्डिया शाइनिंग के जुमले के धराशायी होने के बाद 2004 में बाजपेयी नेतृत्‍व वाले राजग को भारी पराजय मिली.

आज भाजपा, राजग और उनकी सरकार एक बिल्‍कुल ही दूसरे दौर में हैं. अब उन्‍हें किसी मुखौटे की जरूरत नहीं रह गई है – भाजपा के दो स्‍टार प्रचारक मोदी और योगी अपने साम्‍प्रदायिक मंसूबों को छुपा कर नहीं रखते हैं. मंत्रियों द्वारा आज भीड़-हत्‍यारों को हार पहनाये जाते हैं, कैमरे के सामने एक मुसलमान को जिन्‍दा जलाने वाले को संघ के संगठन अपना नायक कहने में नहीं हिचकिचाते. ऐसी घटनाओं के बाद भाजपा को अब ‘गौ हत्‍या’ और ‘लव जेहाद’ पर घुमा-फिरा कर यह कहने की जरूरत नहीं रह गई है कि ‘राष्‍ट्रीय बहस’ चलनी चाहिए. आडवाणी समेत, जो बाजपेयी दौर में राजग के भीतर उनके पूरक की भूमिका में थे, उस दौर के भाजपा नेता ‘मार्गदर्शक मण्‍डल’ में भेजे जा चुके हैं.

भारत के शासक वर्गों और दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों की उस वैचारिक मरीचिका के प्रतिनिधि बाजपेयी रहे जिसके अनुसार भाजपा बगैर फासीवादी कोर के एक नरम दक्षिणपंथी पार्टी बन सकती है. बाजपेयी जी के देहान्‍त से बहुत पहले ही यह मरीचिका धुंधली हो गयी थी.

भारतीय दक्षिणपंथ के राजनीतिक इतिहास के लिए आज अटल बिहारी बाजपेयी एक महत्‍वपूर्ण संदर्भबिन्‍दु हैं, एक ऐसा पैमाना जिससे हमें कल के बाजपेयी युग और आज के मोदी के दौर के बीच की निरंतरता और फर्क को समझ कर वर्तमान फासीवादी हमले की तीव्रता को मापने में मदद मिलती है.

-    भाकपा(माले) लिबरेशन

16 अगस्‍त 2018

Tuesday, August 7, 2018

दिल छोटा औ नाक बड़ी, सिर पै चुरखी चढ़ी चढ़ी

दिल छोटा औ नाक बड़ी
सिर पै चुरखी चढ़ी चढ़ी
पढ़ पढ़ के भइन हैं चरखा
सूत न निकलै, चलै घड़ी।

अपनेन रंग से रंग मिलावें
जो न मिले तौ जंग लगावें
मेला देख के होवैं पागल
क्रांति क्रांति कहि मैला खावैं।

धान न चीन्हैं मान न चीन्हैं
भूंई पे ओलरा किसान न चीन्हैं
खर का समझैं स्विटजरलैंड
मौनी म पड़ा पिसान न चीन्हैं।

अइसेन बाटे दिल्ली वाले
दिल कै खोटे मन कै काले
लाल लाल के लगन लगावैं
हरियर पियर के फूंक उड़ावैं।

- रेजिंग राहुल, हैरिंग्टनगंज मिल्कीपुर - अवध बीज भंडार वाले

Tuesday, July 10, 2018

मोदी सरकार का लोन अकाउंट : हर चीज के लिए लोन


इसी महीने यानी जून में मोदी सरकार ने विश्व बैंक से 500 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया है। यह कर्ज अटल भूजल योजना के लिए लिया गया है, जिसके तहत देश की धरती के नीचे जो पीने का पानी बचा हुआ है, उसका मैनेजमेंट करेंगे। पिछले महीने, यानी मई में सरकार ने विश्व बैंक से 500 मिलियन डॉलर का कर्ज और लिया था, जिसके लिए गांव की सड़कों को सुधारने का तर्क दिया गया था। सरकार बनने से लेकर अब तक, यानी जून 2014 से जून 2018 तक मोदी सरकार 70 बार में 13,570.86 मिलियन डॉलर का कर्ज अकेले विश्व बैंक से ले चुकी है। जिन दूसरे लोगों से लोन लिया गया है, उनमें एशियाई डेवलपमेंट बैंक, चीन का एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, यूरोपियन यूनियन का यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक, जापान का ओडीए यानी ऑफिशियल डेवलपमेंट असिस्टेंट प्रमुख हैं,  जिनसे बीते चार सालों में 300 बिलियन डॉलर से भी अधिक कर्ज लिया गया है। अकेले एडीबी यानी एशियन डेवलपमेंट बैंक मोदी सरकार को अब तक लगभग 100 बिलियन डॉलर का कर्ज दे चुका है। जिस साल मोदी जी की सरकार बनी, उस वक्त स्विस बैंकों में कुल 14 हजार करोड़ रुपये जमा थे, जिसके वापस आने पर उन्होंने हम सबको 15-15 लाख रुपये देने का जुमला फेंका था। अब तक मोदी सरकार स्विस बैंक में जमा कुल धनराशि से कई गुना अधिक लोन तो अकेले जापान से ले चुकी है। चीन का बैंक एआईआईबी मोदी जी के आने के बाद सन 2015 से अधिक ताकतवर हुआ और उसके बाद तो देश शायद ही ऐसा कोई राज्य बचा है, जिसके लिए सरकार ने चीन से लोन नहीं लिया। गुजरात के गावों की तो सारी सड़कें ही चीनी लोन से बन रही हैं। 


विश्व बैंक से 13,570.86 मिलियन डॉलरचीन जापान से- 1 लाख मिलियन डॉलर से अधिकयूरोपियन यूनियन से 2 बिलियन यूरो से ज्यादा

इससे पहले कि विश्व बैंक से लिए गए सभी 70 लोन का हिसाब किताब जानें, यह देख लिया जाए कि इस सरकार में कितने लोन का खाता बंद हुआ। मई में शपथ ग्रहण के बाद अब तक सरकार ने अपने लिए गए लोन में से महज एक लोन का खाता बंद किया है। 250 मिलियन डॉलर का यह लोन राजस्थान में विद्युत वितरण में पहले सुधार के लिए लिया गया था, जो मार्च 2016 में बंद कर दिया गया। लेकिन अगर यह जानना हो कि जून 2014, यानी मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद से लेकर मार्च 2016 तक इस 250 मिलियन डॉलर से कितना लाइनलॉस कम हुआ, विद्युत वितरण में कितना सुधार आया, कितनी चोरी रुकी, कितने तार लगे या जो कुछ भी हुआ, तो आरटीआई लगाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचता। ऐसा इसलिए क्योंकि राजस्थान एनर्जी पोर्टल, जिसे हम राजस्थान में पॉवर डिपार्टमेंट का एग्रीगेटर कह सकते हैं, वहां इसका कोई हिसाब-किताब नहीं दिया गया है। 
वर्ष- 2016 बंद हुआ लोन - 250 मिलियन डॉलर


सरकार बनने के बाद यानी जून 2014 में मोदी सरकार ने पहला लोन मिजोरम में सड़क बनवाने के लिए 107 मिलियन डॉलर का लिया। यह अभी तक क्लोज नहीं हुआ है। उसी महीने 4.55 मिलियन डॉलर का लोन कर्नाटक मल्टीसेक्टोरल न्यूट्रीशियन पायलट के नाम पर लिया गया। यह भी अभी तक क्लोज नहीं हुआ है। सन 2014 में मोदी सरकार ने बस चलाने से लेकर गांव देहात के नाम पर 348.56 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया। पहले साल जो सबसे ज्यादा कर्ज लिया गया, वह नीरांचल नेशनल वॉटरशेड प्रोजेक्ट के लिए 178.50 मिलियन डॉलर का रहा। असल में यह पूरी योजना 357 मिलियन डॉलर की है, जिसमें भारत सरकार और विश्व बैंक आधा-आधा पैसा लगा रहे हैं। सिंचाई की हालत दुरुस्त करने के लिए यह योजना सन 1994-95 से ही चल रही है, जिसके तहत इस बार के लोन में देश के 9 राज्य सेलेक्ट किए गए हैं। इन सभी को अपनी ओर से इसमें 40 फीसदी लगाना पड़ेगा, 60 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार देती है और बाकी वर्ल्ड बैंक। यह पैसा उन्हीं किसानों के नाम पर लिया गया है, जो इन दिनों गांवबंदी पर हैं। इस साल विश्व बैंक से लोन के कुल 8 ट्रांजेक्शन हुए और कुल 460.11 मिलियन डॉलर का कर्ज उठाया गया। इस साल एशियन डेवलपमेंट बैंक से अकेले सड़क सुधार के नाम पर 9 बिलियन डॉलर का कर्ज लिया गया। अन्य मदों में एडीबी से 2,581.34 मिलियन डॉलर कर्ज में लिए गए हैं। एडीबी की 30 नवंबर 2014 की बैलेंस शीट 26 बिलियन डॉलर के आसपास का अमाउंट दिखा रही है। उत्तराखंड में पहाड़ों और जंगलों का सत्यानाश इन्हीं पैसों से किया जा रहा है। बाहरी देशों के बैंकों में जापान ऑफिशियल डेवलपमेंट असिस्टेंट - ओडीए ने भारत को वर्ष 2014 के लिए 1,141.68  मिलियन डॉलर का कर्ज दिया है। 

वर्ष 2014107 मिलियन डॉलर - मिजोरम सड़क348.56 मिलियन डॉलर - गांव देहात178.50 मिलियन डॉलर - नीरांचल नेशनल वॉटरशेड प्रोजेक्ट9 बिलियन डॉलर - सड़क सुधार 1,141.68  मिलियन डॉलर - जापान ऑफिशियल डेवलपमेंट असिस्टेंट


अमाउंट की दृष्टि से साल 2015 सबसे बड़ा साल कहा जाएगा। इस साल मोदी सरकार ने विश्व बैंक से कुल 5299.88 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा 1500 मिलियन डॉलर का रहा, जो स्वच्छ भारत अभियान के सपोर्ट के लिए लिया गया है। निर्मल भारत अभियान का नाम बदलकर चलाए जा रहे इस कार्यक्रम में अब तक 40 से 50 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। 2019 तक लगभग 65 लाख शौचालय बनने थे, जिसमें अभी तक आधे भी नहीं बने हैं। निर्मल भारत अभियान के तहत प्रति शौचालय 1,467 रुपये से लेकर  1,797 रुपये का खर्च आता था। स्वच्छ भारत अभियान में यही खर्च प्रति शौचालय 5,294 रुपये से लेकर 5,455 रुपये का आ रहा है। शौचालयों से ग्राउंड वाटर क्वालिटी भी खराब हो चुकी है और कई जगहों पर टेस्ट के बाद सामने आया है कि इसमें जिस सोक टैंक का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसकी वजह से पूरे इलाके में जमीन के नीचे मौजूद पीने का पानी खराब हो चुका है। वहीं कूड़ा निस्तारण की बात करें तो देश भर में निकलने वाला 75 फीसद कूड़ा यूं ही बिखरा हुआ है, यानी अनट्रीटेड है। ये तब है, जबकि देश के 81 हजार नगरपालिका वार्डों में से सरकार अभी तक कुल 44,650 में घर-घर जाकर कूड़ा उठाने का दावा कर रही है। ये कूड़ा उठाकर सरकार क्या कर रही है, इसके बारे में सभी जानते हैं। वहीं बात अगर कूड़ा प्रबंधन से जुड़ी इकाइयों की करें तो ऐसा कोई प्रदेश नहीं, जहां सफाई कर्मचारी हड़ताल न कर चुके हों। देश की राजधानी दिल्ली तो सफाई कर्मचारियों के साथ अछूत बर्ताव को लेकर नजीर बन चुकी है। 
वर्ष 2015 1500 मिलियन डॉलर - स्वच्छ भारत अभियान पहले खर्च1,467 - 1,797 रुपयेअब खर्च 5,294 -5,455 रुपये



साल 2015 में लिया गया दूसरा सबसे बड़ा लोन ईस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर-3 के लिए 650 मिलियन डॉलर का लिया गया। इस परियोजना के पहले हिस्से, मालगाड़ी से पंजाब को पश्चिम बंगाल तक जोड़ने वाले ट्रैक यानी ईस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर-1 का उद्घाटन इसी साल नवंबर में होने की उम्मीद है। यह कैसे होगा, यह तो गाड़ी दौड़ाने वाले जानें, क्योंकि धनबाद होकर गुजरने वाली सोन नगर से दानकुनी तक अभी तक एक किलोमीटर भी रेल लाइन नहीं बिछ पाई है। कई जगह काम बंद हो गया है। बिहार-झारखंड  के ज्यादातर हिस्से में सर्वे का काम पूरा हो चुका है लेकिन पटरी बिछाने का काम शुरू नहीं हो पाया है। बिहार बंगाल में इसके लिए अभी तक उतनी जमीन का अधिग्रहण ही नहीं हो पाया है, जितनी होने के बाद रेलवे काम शुरू करता है। जगह-जगह पर किसान अपनी जमीन पर खेती ही करना चाहते हैं। 400 मिलियन डॉलर तमिलनाडु में सस्टेनबल डेवलपमेंट के लिए लिया गया है तो 250-250 मिलियन डॉलर का लोन क्रमश: आंध्र प्रदेश डिजास्टर रिकवरी प्रोजेक्ट और झेलम और तावी में आई बाढ़ को झेलने के लिए लिया था। 300 मिलियन डॉलर का लोन मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा में सुधार लाने के लिए लिया है तो 250 मिलियन डॉलर शिक्षकों में सुधार लाने के लिए लिए हैं। 500 मिलियन डॉलर का लोन मंत्री गिरिराज सिंह के विभाग सूक्षम, लघु और मध्यम उद्यम के लिए लिया गया है, जिसके तहत ऐसे उद्योगों की दशा सुधारने का लक्ष्य रखा गया था। इनके विभाग में जो महिलाओं के लिए व्यापार संबंधी उद्यमिता सहायता और विकास की योजना थी, वह इस साल बंद कर दी गई है। वर्ष 2012-13 में सूक्षम, लघु और मध्यम उद्योगों की वृद्धि दर 15.27 फीसद थी जो 2013-14 में 12.27 फीसद, 2014-15 में 9.43 फीसद और 2015-16 में घटकर 7.62 फीसद पर आ गई है। अकेले तमिलनाडु में इसी साल 49,329 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की इकाइयां बंद हो चुकी हैं, जिसकी वजह से सवा पांच लाख से भी अधिक लोग बेरोजगार हो गए हैं। बाकी के प्रदेशों का हाल भी तमिलनाडु से कुछ जुदा नहीं है। वैसे अनुसूचित जाति-जनजाति की उद्यमिता के नाम पर लुधियाना में 490 करोड़ रुपये खर्च करने थे, जिसका हिसाब भी मंत्री जी से लिया जाना जरूरी है। इस साल विश्व बैंक से लोन के कुल 16 ट्रांजेक्शन हुए। इस साल एशियन डेवलपमेंट बैंक से 2000 मिलियन डॉलर से कुछ अधिक का कर्ज लिया गया। दूसरे मदों में भी एडीबी से ही लोन के तहत 11.09 बिलियन डॉलर की प्राप्ति हुई।  इसी साल जापान ने मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट के लिए 1.5 ट्रिलियन येन का ऋण भी जारी किया, यानी लगभग 83 हजार करोड़ रुपये। इसी साल चीन ने अपने एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक को भारत में उतारा। 

वर्ष 2015 650 मिलियन डॉलर - ईस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर-3 250 मिलियन डॉलर - आंध्र प्रदेश डिजास्टर रिकवरी प्रोजेक्ट250 मिलियन डॉलर - झेलम और तावी की बाढ़ एशियन डेवलपमेंट बैंक - 2000 मिलियन डॉलर 1.5 ट्रिलियन येन - मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट के लिए जापान से

वर्ष 2016 में मोदी सरकार ने विश्व बैंक से कुल 2355.63 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया। इसमें सबसे बड़ा कर्ज 500 मिलियन डॉलर का है जो ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप सोलर प्रोग्राम के लिए है। टारगेट है कि सन 2022 तक भारत सोलर पॉवर से 100 जीगा वाट बिजली का उत्पादन करेगा, जिसमें से अभी तक कई शर्तों के साथ 40 जीगा वाट के उत्पादन तक पहुंचा गया है। इसके अलावा एशियन डेवलपमेंट बैंक से भी सोलर रूफटॉप के लिए बड़ा अमाउंट कर्ज में लिया गया है। वैसे एडीबी को भारत सरकार ने एक जगह पर वर्ष 2022 तक सोलर पॉवर से 40 जीगा वाट के उत्पादन का लक्ष्य बताया है, तो दूसरी जगह, जो कि एडीबी और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का संयुक्त प्रोजेक्ट है, उसमें 2022 तक वापस 100 जीगा वाट का लक्ष्य बताया गया है। दूसरा बड़ा लोन 470 मिलियन डॉलर का रहा जो नॉर्थ ईस्ट में बिजली सिस्टम इंप्रूव करने के लिए लिया गया है। इसी साल एचआरडी मिनिस्ट्री ने देश भर की आईआईटी को सर्कुलर जारी करके कहा कि पैसों का इंतजाम खुद करो, अब केंद्र सरकार मदद नहीं देगी और इसी साल इन्हीं के लिए सरकार ने 201 मिलियन डॉलर का लोन तकनीकी शिक्षा की क्वालिटी सुधारने के लिए ले लिया। वैसे अकेले बिहार की सड़कों के खाते में दो बार क्रमश: 235 और 290 मिलियन डॉलर गए हैं। इसी के बाद बिहार में नीतीश कुमार ने बीजेपी से हाथ मिलाकर दोबारा शपथ ली। इस साल विश्व बैंक से लोन के कुल 13 ट्रांजेक्शन हुए। इस साल एशियन डेवलपमेंट बैंक से 3,076.19 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया गया। अन्य मदों में 11.42 बिलियन डॉलर एडीबी से बतौर लोन लिए गए। बाहरी देशों के बैंकों में जापान ऑफिशियल डेवलपमेंट असिस्टेंट - ओडीए ने भारत को वर्ष 2016-17 के लिए 21,590  करोड़ रुपये का कर्ज दिया है। इसके अलावा इसी साल ओडीए ने दूसरे 400 बिलियन डॉलर के कर्ज में से 390 बिलियन डॉलर भी जारी किए हैं।
वर्ष 2016500 मिलियन डॉलर - ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप सोलर प्रोग्राम470 मिलियन डॉलर - नॉर्थ ईस्ट में बिजली सिस्टम201 मिलियन डॉलर - तकनीकी शिक्षा की क्वालिटी3,076.19 मिलियन डॉलर - एशियन डेवलपमेंट बैंक21,590  करोड़ रुपये - ओडीए जापान


साल 2017 में जब तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर अपने यहां मरे किसानों की खोपड़ियां रखकर बैठे थे और अपना मूत्र पी रहे थे, तब सरकार ने तमिलनाडु में रूरल ट्रांसफॉरमेशन प्रोजेक्ट के लिए 100 मिलियन तो सिंचाई व्यवस्था सुधारने के नाम पर 318 मिलियन डॉलर ले लिए। तमिलनाडु में किसान अभी भी सड़क पर ही हैं और पिछले दिनों वहां के थिरुचेंधुर में जब वह प्रदर्शन कर रहे थे, तब उनके नेता पी अय्याकन्नू से बीजेपी की नेता नेल्लैयामल भिड़ गईं और किसानों पर चप्पल चलाते हुए उनकी वीडियो खूब वायरल भी हुई। रिजर्व बैंक की एग्रीकल्चर लोन बुक अकाउंट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साल 2015-16 में सबसे ज्यादा कृषि ऋण लेने वाले किसान तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश से हैं। इनपर औसतन दो लाख रुपये का कर्ज है और पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जो लोन माफ किया है, वह अधिकतम 1 लाख रुपये का है। योगी जी के पुअर टूरिज्म सेक्टर को सुधारने के लिए 40 मिलियन डॉलर का भी कर्ज लिया है, इसके बावजूद वाराणसी में पुल गिर गया। स्किल इंडिया मिशन के लिए भी इस साल 250 मिलियन डॉलर का कर्ज विश्व बैंक से लिया गया है तो आंध्र प्रदेश में चौबीस घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति देने के लिए 240 मिलियन डॉलर का कर्ज लिया है। स्किल इंडिया मिशन कामयाब नहीं हुआ और इसके मंत्री को बदलते हुए मंत्रालय का दर्जा भी कम कर दिया गया। नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की वेबसाइट के मुताबिक नोएडा में एसनीईजी नाम का कौशल विकास केंद्र चल रहा है लेकिन असलियत यह है कि वहां एक हॉस्टल चल रहा है, जबकि वेबसाइट के मुताबिक वहां 480 छात्रों को ब्यूटी और हेयरड्रेसिंग की ट्रेनिंग दी जा रही है। ऐसे ही काफी संस्थान या तो कागजों पर हैं, या फिर उनका ढांचा ही खड़ा हो पाया है, वहां संसाधन ही नहीं हैं। 375 मिलियन डॉलर नदियों में जहाज चलाने के नाम पर भी ले लिए गए, जिसके बारे में अभी हाल ही में रिपोर्ट आई थी कि नेशनल वॉटरवे परियोजना फिसड्डी हो चुकी है। उत्तराखंड में इसी साल हेल्थ सिस्टम सुधारने के नाम पर 100 मिलियन डॉलर ले लिए तो वहां पर एम्स के डायरेक्टर ने गरीब ग्रामीणों से अनाप शनाप फीस वसूली करनी शुरू कर दी। बाद में जब मामला मीडिया की सुर्खी बना तो वसूली तो बंद की, लेकिन वसूले गए पैसे आज तक न तो वापस किए हैं, और न ही उसका कोई हिसाब दिया है। साल 2017 में मोदी सरकार ने अकेले वर्ल्ड बैंक के साथ 21 लोन ट्रांजेक्शन करते हुए 2885.54 मिलियन डॉलर का कर्ज उठाया। इसी साल एशियन डेवलपमेंट बैंक से 32 बिलियन डॉलर का कर्ज लिया गया, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा ऊर्जा, फाइनांस और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर का रहा। 160 मिलियन डॉलर का लोन चीन के एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक से आंध्र प्रदेश में बिजली ठीक करने के नाम पर लिए गए। गुजरात के गावों में सड़क बनाने के लिए इसी चीनी बैंक से 329 मिलियन डॉलर, बैंगलोर में मेट्रो के नाम पर 335 मिलियन डॉलर, देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने के नाम पर 150 मिलियन डॉलर, बंगाल में सिंचाई सुधारने और बाढ़ राहत के नाम पर 145 मिलियन डॉलर, तमिलनाडु के ट्रांसमिशन सिस्टम दुरुस्त करने के लिए 100 मिलियन डॉलर और मुंबई मेट्रो के लिए 500 मिलियन डॉलर का लोन लिया है। देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य है, जहां चीनी सामान के साथ ही चीनी लोन न पहुंच सका हो। बंगलुरु मेट्रो के ही नाम पर 500 मिलियन यूरो और 300 मिलियन यूरो के दो लोन यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक यानी यूआईबी से लिए गए हैं। स्टेट बैंक की दशा सुधारने के लिए यहीं से 200 मिलियन यूरो का लोन लिया गया है। 

साल 2017 100 मिलियन डॉलर - तमिलनाडु में रूरल ट्रांसफॉरमेशन प्रोजेक्ट, तमिलनाडु 318 मिलियन डॉलर - सिंचाई व्यवस्था, तमिलनाडु375 मिलियन डॉलर - नदियों में जहाज चलाने के लिए100 मिलियन डॉलर -  हेल्थ सिस्टम, उत्तराखंड32 बिलियन डॉलर - एशियन डेवलपमेंट बैंक 335 मिलियन डॉलर -  बंगलुरु मेट्रो200 मिलियन यूरो - स्टेट बैंक500 मिलियन यूरो - बंगलुरु मेट्रो300 मिलियन यूरो - बंगलुरु मेट्रो



इस साल, यानी 2018 के जून तक मोदी सरकार विश्व बैंक से 2569.70 मिलियन डॉलर का कुल कर्ज ले चुकी है। 500-500 मिलियन डॉलर के दो सबसे बड़े कर्ज अटल भूजल योजना और पीएमजीएसवाई रूरल रोड प्रोजेक्ट हेतु लिए गए हैं। 420 मिलियन डॉलर का कर्ज महाराष्ट्र में जलवायु पर टिकी किसी लचीली परियोजना के को चलाने के लिए लिया गया है। इसके बावजूद महाराष्ट्र में किसानों का बुरा हाल है। गांव और ग्रामीणों की हालत सुधारने के नाम पर भी पांच सौ मिलियन डॉलर का कर्ज लिया गया है, उसके बावजूद आज गांव बंद हैं। किसान सड़क पर दूध गिरा रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार डेरी बढ़ाने के नाम पर जापान से लोन ले रही है। इस साल एशियन डेवलपमेंट बैंक से अपनी रिपोर्ट में यह साफ कहा है कि मोदी जी ने जो नोटबंदी की थी, वह भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले साल यानी वर्ष 2017 तक डुबोती रही। इस साल इस बैंक से 600 मिलियन डॉलर कर्ज उठाया गया। चीन से भी इसी साल 1-5 बिलियन डॉलर का लोन इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए तो लिया ही है, अरबन आंध्र प्रदेश में पानी और सेप्टेज के नाम पर 400 मिलियन डॉलर, नेशनल इन्वेस्टमेंट और इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड के नाम पर 200 मिलियन डॉलर, मध्य प्रदेश रुरल कनेक्टिविटी के नाम पर 140 मिलियन डॉलर लिया गया है। इसी साल मार्च में सरकार ने यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक यानी यूआईबी से भी 150 मिलियन यूरो यानी साढ़े सत्रह करोड़ डॉलर से भी अधिक लोन ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए लिया है। यहीं से 1.7 बिलियन यूरो का लोन और पास हुआ है, जिनसे मिले पैसों का प्रयोग देश में चल रहे आठ अलग अलग प्रोजेक्ट में लगाने की बात कही गई है। ये सारे आंकड़े इंटरनेट पर उपलब्ध इन सभी बैंकों की वेबसाइट से लिए गए हैं। पूरे मामले में गौर करने वाली एक इम्पॉर्टेंट बात यह दिखती है कि अधिकतर विदेशी बैंकों ने अपनी रकम का अधिकतर आंकड़ा ऑनलाइन कर रखा है। लेकिन भारत सरकार ने उन पैसों का क्या किया, या उसका क्या रिजल्ट आया, इसकी जानकारी कहीं भी नहीं दी है। इनकी जितनी योजनाएं चल रही हैं, किसी की भी ताजा जानकारी या आंकड़े इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या है, जिसकी पर्देदारी है? 

वर्ष - 2018500 मिलियन डॉलर - अटल भूजल योजना 500 मिलियन डॉलर - पीएमजीएसवाई रूरल रोड प्रोजेक्ट420 मिलियन डॉलर - महाराष्ट्र जलवायु 1-5 बिलियन डॉलर - चीन से 400 मिलियन डॉलर - आंध्र प्रदेश में पानी और सेप्टेज200 मिलियन डॉलर - नेशनल इन्वेस्टमेंट और इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड  140 मिलियन डॉलर - मध्य प्रदेश रुरल कनेक्टिविटी 150 मिलियन यूरो - ऊर्जा संबंधी जरूरतें 1.7 बिलियन यूरो का लोन - यूरोपियन यूनियन


2017 की आखिरी तिमाही, यानी पिछले साल के दिसंबर में भारत पर 513438 मिलियन डॉलर का बाहरी कर्ज चढ़ चुका था। यह पिछले 70 वर्षों के इतिहास में सबसे ज्यादा बड़ा अमाउंट है। सन 1999 से बाहरी कर्ज का औसत 260273.96 मिलियन डॉलर पर बना हुआ था जो पिछले साल के अंत के साथ ही टूट चुका है। लोन लेने में इस सरकार ने पिछले 70 सालों में सारी सरकारों को पीछे छोड़ दिया है।

Research References- 
वर्ल्ड बैंक: प्रोजेक्ट एंड ऑपरेशंस- इंडिया 
आईबीआरडी लोन एंड क्रेडिट - वर्ल्ड बैंक डाटा शीट- 
एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक : सर्च कीवर्ड- इंडिया - 147 खोज परिणाम
सर्च कीवर्ड-  लोन टु इंडिया - 304 खोज परिणाम 
एशियन डेवलपमेंट बैंक - MEMBER FACT SHEET 23 अप्रैल 2018 को प्रकाशित 
एशियन डेवलपमेंट बैंक -लोन टु इंडिया- 4272 सर्च रिजल्ट 
ऑफिशियल डेवलपमेंट असिस्टेंट, जापान
ऑफिशियल डेवलपमेंट असिस्टेंट, जापान - भारत
यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक - सर्च - लोन टु इंडिया - 500 खोज परिणाम 
यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक- बंगलुरु मेट्रो प्रोजेक्ट
बिजनेस स्टैंडर्ड: 70 साल में सबसे ज्यादा लोन लेने वाला देश बना भारत
ट्रेंडिंग इकोनॉमिक्स के मुताबिक कर्ज का हाल- 
स्वच्छ भारत मिशन - डाउन टु अर्थ 
स्वच्छ भारत मिशन इन्डेक्स 
कारवां- स्वच्छ भारत मिशन
एमएसएमई मिनिस्ट्री- सालाना रिपोर्ट-  2017-18
ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर
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2-