Tuesday, February 7, 2017

नवयुग में निसपच्छता के पराठे (सिर्फ सहाफि‍यों के लि‍ए)

निसपच्छता नामक एक चीज होती है। यह नामक भी होती है और मानक भी होती है। जो लोग इसे नामक मानते हैं वो इसे नमक की तरह लेते हैं। जो लोग इसे मानक मानते हैं वो इसे मन में बसा लेते हैं। निसपच्छता स्वच्छता की अम्मा भी होती है। अगर कोई निसपच्छ नाली में भी पड़ा होगा, तो भी वह साफ माना जाएगा क्योंकि वो निसपच्छ है। निसपच्छ है इसलिए स्वच्छ है। जो लोग निसपच्छ नहीं होते, वो स्वस्थ नहीं होते। अस्वस्थ लोगों के मन में अस्वस्थ दिमाग का वास होता है। अस्वथ दिमाग में स्वच्छ निसपच्छता नहीं रह सकती क्योंकि वहां पहले से ही पक्षधरता के कीड़े बिलबिला रहे होते हैं। निसपच्छता के लिए दिमाग को धोकर स्वच्छ बनाना होता है। उसके बाद उसमें निसपच्छता भरनी होती है। यह कार्य हमें मंगल, गुरु और शनि की शामों में अगरबत्ती जलाकर करना होता है। सोम, बुध और शुक्र को हम निसपच्छता का स्वच्छता के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इतवार को निसपच्छता की छुट्टी होती है तो वह संडास नहीं जाती।

हमें अपने मन में निसपच्छ रहना चाहिए। फैसला करते हुए हमें अपने मन की नहीं सुननी चाहिए। हमें अपने दिमाग की सुननी चाहिए। मन में निसपच्छता पक्षधारी हो जाती है। इसलिए उसे दिमाग में शिफ्ट कर देना चाहिए। इसके लिए अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स की मदद लेने में कुछ भी मायूब बात नहीं। निसपच्छ लोगों को चाहिए कि वह अपनी अपनी कुर्सी से उतरकर सावधान खड़े हो जाएं। हिलना डुलना पूरी तरह से मना है क्योंकि इससे किसी एक पक्ष की तरफ गिरने का खतरा है। गिरने पर निसपच्छता टूट जाती है और गंदी भी हो जाती है। वैसे बाद में इसे फेवीक्विक लगाकर जोड़ भी सकते हैं और नए निसपच्छ बनने वालों को सहाफत डे पर गिफ्ट दे सकते हैं। निसपच्छता को आप बाहर से नहीं सीख सकते। इसे आपको अपने अंदर उगाना होता है। यह दिमाग पर उगने वाला आत्मा का हरा पेड़ है जिसकी पत्ती उसी के सिर पर निकली नजर आती है, जो वाकई निसपच्छ होता है।

जब व्यक्ति वाकई निसपच्छ होता है तो वह अपने मन को बराबर के सत्तर-सत्तर खानों में बांटकर उसमें मोजे रख देता है। यह सारे मोजे वक्त आने पर निसपच्छ रहते हुए सभी पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिए जाते हैं। इससे सब खुश हो जाते हैं और निसपच्छता का भी धंधा चलता रहता है। निसपच्छ दिमाग को याद रहना चाहिए कि निसपच्छता का धंधा होता है, न कि धंधे में निसपच्छता। उसे धंधे की पक्षधारिता का सम्मान करते हुए पूरी तरह से निसपच्छ पराठे ही खाने चाहिए, वह भी पत्तागोभी भरे हुए। याद रखिए, अगर आप निसपच्छ रहेंगे तो सब आपसे प्रेम करेंगे, लेकिन अगर आप पक्षधारी होंगे तो कुछ ही आपसे प्रेम करेंगे। धंधा सबके प्यार से चलता है, कुछ के प्यार से नहीं।

Monday, January 16, 2017

अशोक मोची से जिग्नेश मेवानी तक

अशोक मोची के साथ महेंद्र मिश्र
गुजरात में दलित राजनीति एक नये चरण में पहुंच गयी है। गुजरात दंगों में हथियार के तौर पर इस्तेमाल होने वाला ये तबका अब अपनी पूरी पहचान के साथ सामने है। कभी ये सत्ता का औजार हुआ करता था लेकिन आज उसकी लगाम अपने हाथ में लेने को बेताब है। इस कड़ी में उसका चेहरा भी बदला है और एजेंडा भी। अशोक मोची, गुजरात दंगों का चेहरा। रविवार को अहमदाबाद में उनसे मुलाकात हो गयी। कहने को तो ये मुलाकात उनके घर पर हुई। लेकिन ये एक स्कूल था जिसके वरांदे में बिछी चारपाई उनका घर, द्वार और आंगन सब कुछ थी। रात यहां कटती है दिन अपनी दुकान में। जहां वो मोचीगिरी का काम करते हैं। मां-बाप बचपन में गुजर गए थे। संपत्ति के नाम पर महज एक घर था जिसका बड़े भाई से बंटवारा करने की जगह अपना हिस्सा भी उसके हवाले कर दिया और खुद के लिए दर-बदर की जिंदगी चुन ली। न इतना पैसा हुआ कि घर बसा सकें और न अब उसकी कोई चाह रही।

गुजरात दंगों का चेहरा बनने का उन्हें जरूर मलाल है। उनका कहना था कि दंगे इतने भयंकर होंगे इसकी उन्हें उम्मीद ही नहीं थी। उनका मानना था कि हमेशा की तरह छिटपुट पत्थरबाजी और कुछ घटनाएं होंगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा। ये बात सही है कि गोधरा की घटना से उनके भीतर रोष था और चर्चे में आयी तस्वीर भी उसी का नतीजा थी। लेकिन हालात इतने बदतर होंगे ये उनकी सोच और कल्पना से भी परे था। उनका न तो विश्व हिंदू परिषद से कुछ लेना-देना था। न ही किसी दूसरे हिंदू संगठन से कोई वास्ता। उस घटना के 15 सालों बाद भी उनके सीने में एक ही दर्द जज्ब है। वह है जाति व्यवस्था की गुलामी। कुछ दार्शनिक अंदाज में वो कहते हैं कि उन्होंने दलित बस्ती को छोड़ दिया है और अब वो जातिवाद से आजाद हो गए हैं। और इस बात के लिए उन्हें अपने ऊपर गर्व है।

अशोक मोची का दर्द व्यक्तिगत दायरे तक सीमित था जिसे जिग्नेश मेवानी ने एक स्वर दे दिया है जो सामूहिक है। इसकी आवाज बड़े फलक पर जाती है और ये व्यापक हिस्से को प्रभावित करती है। ये आरएसएस द्वारा पोषित परंपरागत हिंदू व्यवस्था से विद्रोह का सुर है। इसमें दलितों के अलग पहचान की दावेदारी है तो रोजी-रोटी और सम्मान की गारंटी के लिए जमीन मालिकाने के हक की मांग भी । जिग्नेश मेवानी उसके प्रतीक बन गए हैं। उना आंदोलन ने ये साबित कर दिया कि दलित अब इस्तेमाल की चीज नहीं रहा । वो अपना रास्ता खुद बनाएगा। दलितों के इस सशक्तिकरण ने उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात को दूसरे नंबर पर खड़ा कर दिया है। ये न केवल अपना अलग रास्ता बनाता दिख रहा है बल्कि पूरे देश के स्तर पर आरएसएस द्वारा पेश किये जा रहे गुजरात के हिंदू माडल को भीतर से खुली चुनौती भी है। हिंदू राष्ट्र के गुब्बारे में गुजरात का दलित आंदोलन एक कारगर पिन साबित हो सकता है। अनायास नहीं उना की घटना के बाद गौरक्षकों को सांप सूंघ गया। और उन्हें रोकने के लिए प्रधानमंत्री को सामने आना पड़ा। इतना ही नहीं गुजरात के दलित आंदोलन को रोहित वेमुला और जेएनयू के नजीब से जोड़कर मेवानी ने इसे नई ऊंचाई दे दी है।

इस कशमकश और रस्साकशी के बीच आरएसएस अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। उसने दलितों को अपना हथियार बनाने के लिए सांस्कृतीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाया है। इसके तहत एक दौर में एकात्मकता यात्रा निकालने से लेकर उनके लिए अलग से देवी-देवताओं को स्थापित करने का काम किया गया। इस कड़ी में कुत्ता, गधा और बकरी की सवारी वाले देवी-देवताओं की खोज की गयी। देवताओं के इस बंटवारे के साथ ही जाति व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी कर दी गयी। संघ एकात्मकता की कितनी बात करे लेकिन सच यही है कि देवताओं तक को वो सभी जातियों के बीच साझा करने के लिए तैयार नहीं है।


लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 

Sunday, December 25, 2016

नए साल की प्रार्थनाएं

जो मुझसे नफरत करते हैं, वह और भी सुंदर होते जाएं।
जो मुझे नापसंद करते हैं, उनका काम कम खाने से भी चल जाए।
जो मुझे शूली पे टांगना चाहते हैं, उन्‍हें रोजगार मि‍ले।
जो मुझे दुख देते हैं, सुख उनकी कदमबोसी करे।
जि‍नकी आंखों में मुझे देख आग उतरती है, गर्मी का मौसम उन्‍हें कम सताए।
जो मुझे नहीं जानते, उन्‍हें नया जानवर पालने को मि‍ले।
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प्रेमि‍काएं धोखा देती रहें। मैं धोखे खाता रहूं।
पड़ोसी आग लगाते रहें। मैं बेपरवाह जलता रहूं।
दर्द बना रहे। कि‍सी को पता भी न चले।
बांध टूट पड़ें। पानी में मैं तैरता हुआ बहूं।
बाप से बेटा दूर रहे। पहचान और धुंधली होती जाए।
यादें नाचती रहें। उनके हाथों में पैने हथि‍यार हों।
धागे उलझे रहें। सुई खो जाए।
घर की तरह मैं बाहर भी फटे कपड़े पहनूं।
अदालतें चलें तो सिर्फ मेरा चलना बंद करने को।
कचेहरी खुले तो सिर्फ मुझे लगाने को।
कोई दि‍खे तो सिर्फ मुझे दि‍खाने को।
सबके घर के बाहर नए चबूतरे बनें, गर्मी की शाम उनपर पानी छि‍ड़का जाए।
नए साल में प्रार्थनाएं बंद हों।

DANGAL REVIEW: न खाता न बही, जो पापा बोले वही सही!

अमूमन कहानियां तीन तरह से कही जाती हैं। पहला तरीका, सत्य घटनाओं का अपनी दृष्टि के मद्देनजर सीधा सच्चा बयान। दूसरा, आद्यांत कपोल कल्पना। तीसरा, सत्य घटनाओं से कुछ हिस्से उठाकर उसे समाजपयोग के लिए मन-माफिक मोड़ देना। यह तीसरा तरीका ही ज्यादातर किस्सागो अपनाते हैं। इसे समाजपयोग के लिए बनाने का काम दरअसल लेखक की सोच, उसकी तैयारी और समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है। दंगल फिल्म तीसरे तरीके से कही गई कथा है। राष्ट्रकुल खेलों में गीता फोगाट को मिला गोल्ड इस फिल्म की प्रस्थान बिंदु है। महावीर फोगाट के संघर्षों को समेट पाने में नितांत असफल यह फिल्म देशभक्ति के खोल में लिपट जाती है।

सौरभ दुग्गल ने महावीर फोगाट की जीवनी लिखी है, जिससे यह फिल्म उठाई गई है, उस जीवनी में महावीर के आतंरिक, सामाजिक और घरेलू संघर्षों का जितना बढ़िया और सटीक वर्णन है, यह फिल्म उस पूरे संघर्ष का शतांश भी नहीं पकड़ पाती। उस असफलता के कारण फिल्म देशभक्ति का आसान रास्ता पकड़ लेती है और वह पूरा संघर्ष एक मामूली कथा में बदल दिया गया है, जिसे फिल्म के शुरू में ही बता दिया जाता है कि - इस फिल्म में गीता और महावीर के जीवन को 'फिक्सनलाईज' किया गया है। यह वो 'फिक्शन' वाला हिस्सा ही है जो पुरातनपंथी है।

दंगल से पहले 'तारे जमीन पर' का जिक्र करते हैं। उस फिल्म में भी एक पिता है जिसके अपने बच्चों से अरमान असीम हैं, बड़ा बेटा सफल होता दीखता है लेकिन छोटा अपने अलग मिजाज का है, वह पिता के अरमानों पर पानी फेरते रहता है। फिर पिता और स्कूल की क्रूरताएं हैं। वहाँ, आमिर खान के रूप में एक शिक्षक आता है। वह छोटे बेटे को नई राह दिखाता है। यहाँ बात पिता बनाम शिक्षक नहीं है। ऐसा होता भी नहीं। किसी के भी जीवन में शिक्षक का एक किरदार होता है, जिसकी एक सीमा होती है, उसी तरह पिता का भी किरदार अपनी सीमाओं को लिए रहता है। मुख्य बात यह होती है कि जीवन में आपकी दिलचस्पी कौन जगा पाता है। वह दिलचस्पी ही बहुधा जीवन के रास्ते तय करती है, मिलने वाले लोग तय करती है। तारे जमीन पर फिल्म वह दिलचस्पी चित्रकारी के रूप में शिक्षक जगाता है और दंगल, कुश्ती के रूप में, यह काम गीता और बबीता की वह सहेली करती है, जिसकी शादी में वो दोनों गयी होती हैं। वरना उसके पहले तो पिता की लाख कोशिशों के बावजूद दोनों बहनें कुछ भी सीखने को राजी नहीं।

असल जीवन से उलट फिल्म में पिता का सपना कुश्ती को लेकर कम, देश के लिए मेडल लाने को लेकर अधिक है। एक भौतिक सफलता: जैसा कि अमूमन भारतीय पिताओं का स्वप्न होता है। यही वो पहलू है जहाँ महावीर फोगाट के जीवन संघर्ष को हल्का कर दिया गया है। कुश्ती के लिए, एक कला के लिए, समर्पित इंसान को, व्यवसायिक फायदे के लिए देशभक्ति के चासनी में डुबो दिया गया है। और देशभक्ति की चाशनी जब सबको नजरबन्द कर लेती है तो शुरू होता है: एजेंडा सेटिंग। न खाता न बही, जो पापा बोले वही सही, वाले फॉर्मूले पर फिल्म बढ़ निकलती है। यह परिवार व्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार है कि पिता ने जो कह दिया वो सही है। यह फिल्म उन सभी पिताओं को तर्क देती है कि पिता ही बच्चों का भविष्य बनायेगा और इसके लिए हर तरह का शासन सही माना जाएगा।

इस फिल्म में सबसे पहले तो विराट जीवन को 'महान भारतीय परिवार' वाली फॉर्मूला कहानी में बदल दिया गया है और फिर मनमाफिक खलनायक भी चुन लिए गए हैं। जैसे, कोच। गिरीश कुलकर्णी ने उस पतित आदमी के किरदार को जबर्दस्त निभाया है लेकिन उस किरदार के लिखावट/बनावट पर गौर करें तो पाएंगे कि आमिर यानी पिता के चरित्र को मजबूत बनाये रखने ( यानी परिवार ही सही है) के लिए कोच के किरदार को लगातार गलत दर गलत दिखाया गया है। अंततः वह किसी भुनगे की माफिक दीखता है। अच्छे कोच की तो जाने दीजिए, खराब से खराब कोच भी इतने जुगाड़-जतन से अपना पोजिशन बरकरार रखता है कि एक खिलाड़ी के पिता से उसे कोई खतरा हो ही नहीं सकता।

कहानी यों बनाई गयी है कि जहाँ जहाँ गीता ने अपने पिता की बात मानी है, वहाँ वहाँ वो सफल हुई है। और पिता भी अपनी सारी बात देशभक्ति के रसे में भिंगो कर कहता है। देशभक्ति के नाम पर इस फिल्म में अनुशासन को हंसने वाली चीज बना दी गयी है। कुश्ती ही नहीं दुनिया के सारे खेल पर्याप्त लगन और अनुशासन की मांग रखते हैं। फिल्म का इरादा जो भी रहा हो, सन्देश यही देती है फिल्म कि पिता नाम की सत्ता ही आपके अच्छे बुरे का ख्याल रख सकती है।

फिल्म का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा है जो पिता और बेटी का द्वन्द दिखाता है, नया बनाम पुराना का आदिम द्वन्द। अंततः यह द्वन्द पिता और पुत्री को आमने सामने कर देता है। अखाड़े में। पिता को यह अखर जाता है कि उसके ही अखाड़े में उसकी ही बेटी नए सीखे दाँव आजमा रही है। वो खुद बेटी को कुश्ती लड़ने की चुनौती देता है, और अभी बेटी तैयार भी नहीं होती है कि उसे उठाकर पिता पटक देता है। बेटी, जो कि खिलाड़ी पहले है और बेटी बाद में, कहती है, पापा मैं तैयार नहीं थी। तब पिता फिर ललकारता है। बेटी तैयारी से लड़ती है और पिता को चित्त कर देती है। यह फिल्म का सर्वाधिक प्रशंसनीय हिस्सा है।

पिता भी खिलाड़ी रहा है, उसका मान सम्मान के लिए लड़ना समझ में आता है। कोई भी लड़ जाएगा। लेकिन ठीक इस दृश्य के बाद फिल्म को रसातल में ले जाने की कवायद लिख दी जाती है। जीतने वाली बेटी को शर्मिन्दा कराया जाता है, पिता की उम्र हो गयी है, वो बड़े हैं, उन्होंने इतना कुछ किया है..मार तमाम..आशय यह कि गीता को अपने पिता को हराना नहीं चाहिए था।

आमने सामने के जोर में हारने के बाद पिता फिर से भारतीय पिता बन जाते हैं। रखवाला, सबसे बड़े ज्ञानी, स्ट्रैटजिस्ट...। कहानी में यह भी लिख दिया गया है कि महावीर यानी आमिर न मौजूद हों तो बेटी एक भी दाव सही लगा ही नहीं सकती। और हर बात में वही तर्क: देश के लिए मैडल लाना है। सोल्जर बोल दिया, आर्गुमेंट ख़त्म। क्योंकि तर्क खत्म हो गए इसलिए कोई नहीं जानना चाहता कि महावीर फोगाट का संघर्ष देश के लिए मैडल लाने से बहुत ऊपर का संघर्ष था, वरना जिस खेल में जिस वर्ष गीता को स्वर्ण पदक मिला, उसी वर्ष अलका तोमर को 59 किलो वर्ग और अनीता श्योराण को 67 किलो वर्ग में स्वर्ण पदक मिला था।

आशय यह कि अगर इस फिल्म को गीता फोगाट और महावीर फोगाट के नाम पर न बेंचा गया होता और हर दूसरा डायलॉग देश के लिए मैडल लाने से सम्बंधित न होता तो यह फिल्म अपने सच्चे रूप में दिखती। लेकिन, ऊपर कहे गए दोनों तथ्यों के जरिए नजरबंदी कर दी गयी है और फिर,पूरी फिल्म एक आदर्श और देवतुल्य पिता पर लिखा निबंध हो कर रह गयी है। भारत के नए पिताओं के लिए यह डूबते तिनके का सहारा बन कर आई है जिसके मार्फ़त वो अपने बच्चों पर धौंस दोगुनी कर सकें। जो पापा बोले वही सही। जो परिवार बोले वही सही। वरना, सोल्जर बोलकर बहस ख़त्म कर दी जायेगी और निर्णय लाद दिए जाएंगे।
लेखक चंदन पाण्डेय वरिष्ठ विश्लेषक हैं। 

Wednesday, December 21, 2016

नतमस्तक मोदक की नाजायज औलादें- 48

प्रश्न: लोग लाइन में खड़े हैं।
उत्तर: देश को आगे बढ़ाने को खड़े हैं
प्रश्न:लाइन में लगकर देश आगे बढ़ता है?
उत्तर: और कैसे बढ़ता है?
प्रश्न: आप बताइए
उत्तर: नहीं, पहले तुम बताओ
प्रश्न: अरे सवाल मेरा है
उत्तर: लाइन में लगे हो?
प्रश्न: हां
उत्तर: आगे बढ़े हो?
प्रश्न: हां
उत्तर: तो भैंचो, जैसे तुम बढ़े, वैसे ही देश भी बढ़ता है
प्रश्न: आगे बढ़कर कहां जाएगा?
उत्तर: मंगल पे जाएगा बेटी-- तुमसे मतलब?
प्रश्न: मुझे भी तो वहीं जाना होगा?
उत्तर: तुमको तो पाकिस्तान भेजेंगे।
प्रश्न: वेनेजुएला में नोटबंदी वापस ले ली।
उत्तर: सही है, तुम भी वहीं चले जाओ।
प्रश्न: मेरी वजह से नहीं ली।
उत्तर: सब मोदी जी का प्रताप है।
प्रश्न: रोज नियम बदल रहे हैं।
उत्तर: तुम रोज पाजामा बदलते हो?
प्रश्न: नियम पाजामा होते हैं?
उत्तर: नियम बदलने के लिए ही होते हैं।
प्रश्न: पहले तो आप तोड़ते थे?
उत्तर: हां तो अब बनाते हैं।
प्रश्न: फिर नियम बदल दिया
उत्तर: फिर से बदल देंगे बे।
प्रश्न: लोग मर रहे हैं।
उत्तर: पहले क्या मरके जिंदा हो रहे थे?
प्रश्न: लाइन में मर रहे हैं।
उत्तर: राशन की लाइन में क्यूं नहीं मर रहे?
प्रश्न: क्या वहां भी मरें?
उत्तर: मंदिर की लाइन में क्यूं नहीं मर रहे?
प्रश्न: वहां भी मरें?
उत्तर: लोग साजिशन मर रहे हैं।
प्रश्न: क्या साजिश है?
उत्तर: लोग मरकर सरकार को बदनाम कर रहे हैं।
प्रश्न: कैसे?
उत्तर: लोग पैसा लेके मर रहे हैं।
प्रश्न: अरे लोग पैसा लेने को ही लाइन में खड़े हैं।
उत्तर: लोग पैसा लेके लाइन में लग रहे हैं।
प्रश्न: वो दूसरी बात है।
उत्तर: कैसे दूसरी बात है बे?
प्रश्न: गांव में पैसा नहीं है।
उत्तर: अच्छी बात है।
प्रश्न: ये अच्छी बात है?
उत्तर: और क्या, पैसा जहां होगा, रार पैदा करेगा।
प्रश्न: रोज के खर्चे के लिए पैसा नहीं है।
उत्तर: गांव में रहने वाले को कौन खर्च?
प्रश्न: खेती में पैसा लगता है।
उत्तर: कौन खेत में पैसा उगा देखे हरामी?
प्रश्न: आप मंगल ग्रह से आए हैं?
उत्तर: नहीं, लेकिन जाने वाले हैं।
प्रश्न: वो कैसे?
उत्तर: देखना, मोदी जी ले जाएंगे
प्रश्न: वहां क्या करेंगे?
उत्तर: हिंदू राष्ट्र बनाएंगे।