Friday, December 2, 2016

सरकार बदहवास, समझदारी खल्लास

अब बदहवासी में आने की बारी सरकार की है। नोटबंदी के फैसले के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि काला धन रखने वालों की रातों की नींद हराम हो गई है लेकिन सच बिल्कुल उल्टा निकला। सारे कालाधनधारी आराम से चैन की बांसुरी बजा रहे हैं। उनका पैसा सफेद होकर बैंक पहुंच रहा है और जनता परेशान है। दरअसल सरकार को उम्मीद थी कि इस पूरी कवायद में तकरीबन ढाई से तीन लाख करोड़ काला धन पकड़ लिया जाएगा। फिर उसे सरकार अपनी मर्जी के मुताबिक खर्च कर सकेगी। लेकिन सच यह है कि सारा काला धन सफेद होने के करीब है। राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया है कि 18 दिनों में 8.50 लाख करोड़ मूल्य की बड़ी नोटें जमा हो चुकी हैं। देश में बैंकों से लेकर बाजार तक 15 लाख 44 हजार मूल्य की कुल बड़ी नोटें हैं। इसमें बैंकों के रिजर्व बैंक में सीआरआर के तौर पर जमा तकरीबन 4 लाख करोड़ रुपये भी शामिल हैं। बाकी बैंकों में भी 70 हजार करोड़ रुपये पहले से मौजूद थे। ऐसे में अभी योजना को करीब एक महीने बचे हैं। जबकि अब बाजार से केवल 2.50 लाख करोड़ रुपये आने शेष हैं। रुपये जमा होने की जो गति है उसमें इन रुपयों के आने को लेकर कोई दुविधा नहीं है। यही वजह है कि सरकार ने आखिरी दौर में फिफ्टी-फिफ्टी की घोषणा कर दी। हालांकि उससे भी बहुत ज्यादा कुछ सरकार के खाते में आते नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में आनन-फानन में घोषणा प्रसाद ने एक नई घोषणा कर दी है। जो सोने से संबंधित है। इसके मुताबिक एक शादीशुदा महिला घर में 500 ग्राम सोना रख सकती है। जबकि गैर शादीशुदा 250 ग्राम और एक पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकता है। ये कितना कारगर होगा उसके बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। या फिर ये अमीरों के खिलाफ लड़ाई के लिए महज एक कागज की तलवार है। क्योंकि कालेधन का केवल 6-7 फीसदी हिस्सा ही करेंसी नोटों के तौर पर है। सरकार ने पूरे देश को उसके लिए कतार में खड़ा कर दिया है। अब जब मिलने की बारी आ रही है। तो मामला ठन-ठन गोपाल जैसा दिख रहा है।

इस बात से कई नतीजे निकाले जा सकते हैं। सरकार की मंशा कालाधन निकालना नहीं बल्कि उसके खिलाफ लड़ते हुए महज दिखना था। अगर सचमुच सरकार लड़ना चाह रही थी तो सबसे पहले उसे कालाधन के ज्ञात स्रोतों की तरफ ध्यान केंद्रित करना चाहिए था। जिसमें पनामाधारियों से लेकर बड़े घरानों की विदेशों में जमा रकम है। या फिर देश के उद्योगपतियों के ज्ञात स्रोत हैं। उदाहरण के लिए अडानी का 5400 करोड़ रुपया है जिसे उन्होंने मारीशस और मध्यपूर्व चैनेल के रास्ते बाहर भेजा। लेकिन सरकार न तो उनका नाम ले रही है और न ही उन जैसे दूसरों के खिलाफ कार्रवाई का कोई संकेत दे रही है। ऐसे में छोटे और काले धन के अज्ञात स्रोत पर केंद्रित करने का कोई तर्क नहीं बनता था। और यह बात तब और बेमानी हो जाती है जब खुद चौकीदार ही लूट की व्यवस्था का हिस्सा बन जाए। यह सरकार, बैंक और उसके मैनेजरों से लेकर इनकम टैक्स विभाग के कर्मचारियों तक के लिए सच है। और सबने मिलकर कालेधन को ठिकाने पर लगाने में पूरी मदद की है।

यह कुछ उसी तरह की कवायद है जिसे प्रधानमंत्री जी पिछले ढाई सालों में करते रहे हैं। तमाम भाग-दौड़ और व्यस्तता के बाद भी ढाई सालों का नतीजा सिफर है। और अब पूरी जनता को भी उन्होंने अपने ही पायदान पर लाकर खड़ा कर लिया है। जनता की सारी परेशानी के बाद भी देश को कुछ हासिल नहीं हुआ। अलबत्ता 100 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ गयी। क्या इसकी सीधी जवाबदेही फैसला लेने वालों की नहीं बनती है? और उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? भले ही ये धाराएं गैरइरादत हत्या की दर्ज की जाएं। लेकिन उसका मामला तो बनता है। देश और दुनिया के इतिहास में भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं। जब शासकों को उनकी नीतियों के लिए दोषी ठहराया गया है और उसकी सजा उन्हें भुगतनी पड़ी है।

अगर देश में कानून और संविधान नाम की कोई चीज है तो सरकार के फैसले को जरूर उसकी कसौटी पर कसा जाना चाहिए। किसी भी नोट के मामले में करार रिजर्व बैंक और धारक के बीच होता है। जिसमें यह बात शामिल होती है कि रिजर्व बैंक धारक को उतने रुपये देगा और न देने की स्थिति में उसके बराबर के मूल्य की कोई दूसरी चीज या फिर सोना देगा। रिजर्व बैंक और नोट के धारक के बीच कोई तीसरा नहीं आता है। वह सरकार भी नहीं हो सकती है। ऐसे में रिजर्व बैंक अपने इस शपथ से कैसे पीछे हट सकता है। और अगर वह इस भूमिका में नहीं खड़ा हो पाया तो ये उसकी नाकामी है। और इस नाकामी की सजा बनती है। जिसे जरूर देश की सर्वोच्च अदालत और सबसे बड़ी संस्था संसद को संज्ञान लेना चाहिए।

लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 

Sunday, November 27, 2016

सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है

पहली बार किसी ने दस रूपए के नोट पर लिखा होगा, सोनम गुप्ता बेवफा है, तब क्या घटित हुआ होगा? क्या नियति से आशिक, मिजाज से आविष्कारक कोई लड़का ठुकराया गया होगा, उसने डंक से तिलमिलाते हुए सोनम को बदनाम करने की गरज से उसे सरेबाजार ला दिया होगा. या वह सिर्फ फरियाद करना चाहता था, किसी और से कर लेना लेकिन इस सोनम से दिल न लगाना.

क्या पता सोनम को कुछ खबर ही न हो, वह सड़क की पटरी पर मुंह फाड़ कर गोलगप्पे खा रही हो, जिंदगी में तीसरी बार लिपिस्टिक लगाकर होठों को किसी गाने में सुने होंठों जैसा महसूस रही हो, अपनी भाभी के सैंडिलों में खुद को आजमा रही हो और तभी वह लड़के को ऐसी स्वप्न सुंदरी लगी हो जिसे कभी पाया नहीं जा सकता. लड़के ने चाहा हो कि उसे अभी के अभी दिल टूटने का दर्द हो, वह एक क्षण में वो जी ले जिसे जीने में प्रेमियों को पूरी जिंदगी लगती है, उसने किसी को तड़प कर बेवफा कहना चाहा हो और नतीजे में ऐसा हो गया हो. यह भी तो हो सकता है कि किसी चिबिल्ली लड़की ने ही अपनी सहेली सोनम से कट्टी करने के बाद उसे नोट पर उतार कर राहत पाई हो.

जो भी हुआ हो लेकिन वह वैसा ही आविष्कारक था या थी जैसा समुद्र से आती हवा को अपने सीने पर आंख बंद करके महसूस करने वाला वो मछुआरा या मुसाफिर रहा होगा जिसे पहली बार नाव में पाल लगाने का इल्हाम हुआ होगा. या वह आदमी जिसने इस खतरनाक और असुरक्षित दुनिया में बिल्कुल पहली बार अभय मुद्रा में कहा होगा, ईश्वर सर्वशक्तिमान है. उसने नोट के हजारों आंखों से होते हुए अनजान ठिकानों पर जाने में छिपी परिस्थितिजन्य ताकत को शायद महसूस किया होगा, वो भी ऐसे वक्त में जब हर नोट को बड़े गौर से देखा जा रहा है, उसके बारे में आपका नजरिया आपको देशभक्त, कालाधनप्रेमी या स्यूडोसेकुलर कुछ भी बना सकता है.
नोटबंदी के चौकन्ने समय में सोनम गुप्ता सारी दुनिया में पहुंच गई, उसके साथ वही हुआ जो सूक्तियों के साथ हुआ करता है. वे पढ़ने-सुनने वाले की स्मृति, पूर्वाग्रहों, वंचनाओं और कुंठाओं के साथ घुलमिल कर बिल्कुल अलग कल्पनातीत अर्थ पा जाती हैं. यह रहस्यमय प्रक्रिया है जिसके अंत में किसी स्कूल या रेलवे स्टेशन की दीवार पर लिखा “अच्छे नागरिक बनिए” जातिवाद के जहर के असर में झूमते समाज में जरा सा स्वाराघात बदल जाने से प्रेरित करने के बजाय कहीं और निशाना लगाने लगता है. सबसे लद्धड़ प्रतिक्रियाएं सरसों के तेल के झार की तासीर वाली नारीवादियों की तरफ से आईं जिन्होंने कहा, सोनू सिंह या संदीप रस्तोगी क्यों नहीं? उन्हें सोनम गुप्ता नाम की लड़कियों की हिफाजत की चिंता सताने लगी जिन्हें सिर्फ इसी एक कारण से छेड़ा जाने वाला था और यह भी कि हमेशा औरत ही बेवफा क्यों कही जाए. हमेशा घायल होने को आतुर इस ब्रांड के नारीवाद को अंजाम चाहे जो हो, “सपोज दैट” में भी मर्द से बराबरी चाहिए. जूते के हिसाब से पैर काटने की जिद के कारण वे अपनी सोनम को जरा भी नहीं पहचान पाईं.

इन दिनों देश में पाले बहुत साफ खिंच चुके हैं और एक बड़े गृहयुद्ध से पहले की छोटी झड़पों से आवेशित गर्जना और हुंकारें सुनाई दे रही हैं. एक तरफ आरएसएस की उग्र मुसलमान विरोधी विचारधारा और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिपूजा की केमिस्ट्री से पैदा हुए भक्त हैं जो बैंकों के सामने लगी बदहवास कतारों में से छिटक कर गिरने वालों की बेजान देह समेत हर चीज को देशभक्ति और देशद्रोह के पलड़ों में तौल रहे हैं. दूसरी तरफ मामूली लोग हैं जिनके पास कुछ ऐसा भुरभुरा और मार्मिक है जिसे बचाने के लिए वे उलझना कल पर टाल देते हैं. भक्त सरकार के कामकाज को आंकने, फैसला लेने का अधिकार छीनकर अपना चश्मा पहना देना चाहते हैं जो इनकार करे गद्दार हो जाता है. हर नुक्कड़ पर दिखाई दे रहा है, अक्सर दोनों पक्षों के बीच एक तनावग्रस्त, असहनीय चुप्पी छा जाती है. तभी सोनम गुप्ता प्रकट होती है जो लगभग मर चुकी बातचीत को एक साझा हंसी से जिला देती है. सोनम गुप्ता उस युद्ध को टाल रही है. उसकी वेवफाई से अनायास भड़कने वाली जो हंसी है उसमें कोई रजामंदी और खुशी तो कतई नहीं है. सब अपने अपने कारणों से हंसते हैं.

लेखक अनि‍ल कुमार यादव वरि‍ष्‍ठ पत्रकार हैं। 

Monday, November 21, 2016

लोग मर रहे थे, पीएम भाषण कर रहे थे

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है- 

यदि तुम्हारे घर के/ 
एक कमरे में आग लगी हो/ 
तो क्या तुम/ 
दूसरे कमरे में सो सकते हो? 
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों/ 
तो क्या तुम/ 
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?

कल आगरा में रैली करके प्रधानमंत्री ने इसका जवाब दे दिया। उन्होंने देश को बता दिया कि ऐसे मौके पर सोना और प्रार्थना ही नहीं बल्कि अट्टहास किया जा सकता है। वैसे कहने को तो हमारे प्रधानमंत्री को कार के नीचे पिल्ले के आने से भी दर्द होता है, लेकिन जब गाड़ी के नीचे 130 लोग आ जाते हैं तो साहेब की संवेदना घास चरने चली जाती है। देश का शीर्ष नेतृत्व अगर इतना संवेदनहीन है तो इसके लिए उसको नहीं बल्कि हमें अपने बारे में सोचना चाहिए। आख़िरकार हम ऐसे नेतृत्व को कैसे चुन सकते हैं?

दरअसल मोदी जी इन्हीं तरह की स्थितियों के लिए देश को तैयार कर रहे हैं। उन्हें पता है कि जिस तरह की नीतियों को वो आगे बढ़ा रहे हैं उसके नतीजे बेहद खतरनाक होने जा रहे हैं। इसके चलते  देश और समाज में अराजकता फ़ैल सकती है। लिहाजा उसकी तैयारी बहुत जरूरी हो जाती है। आगरा रैली उसका पूर्वाभ्यास है। इस रैली के जरिये पीएम ने न केवल अपनी संवेदनहीनता दिखाई है बल्कि आगरा समेत देश की जनता को भी संवेदनहीन होने के लिए मजबूर किया है। आगरा के लोग अगर कुछ सौ किमी की दूरी पर स्थित कानपुर के लोगों के दर्द को नहीं महसूस कर सकेंगे, तो कल को आप के दर्द को कौन महसूस करेगा? इस हादसे में तो वैसे भी कितने लोग आगरा के आसपास के ही होंगे, लेकिन यह प्रधानमंत्री का दुस्साहस ही कहा जाएगा कि जब आगरा के आसपास के घरों में मौत का मातम पसरा है तो वो मंच से राजनीतिक भाषण दे रहे थे।

ऊपर से घाव पर नमक छिड़कने का काम रेल मंत्री प्रभु ने किया। वैसे तो वो मदद करने गए थे, लेकिन 500 और 1000 के पुराने नोटों के जरिये आफत दे आये। कोई उनसे पूछे कि यह नोट जब अवैध हो गई है तो सरकार कैसे उसको किसी नागरिक को दे सकती है और उनके चलने का हाल तो पूरा देश देख रहा है। ऐसे में घायलों को जहां तत्काल जरूरत है उनके साथ रेल मंत्री का यह रवैया किसी क्रूर मजाक से कम नहीं है। दरअसल सरकार भी जनता को कीड़े मकोड़ों की तरह ही देखती है और जानती है कि उसे किसी भी तरीके से हांका जा सकता है। हमारी सहने की क्षमता का तो अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

इस मामले से एक दूसरा सवाल भी खड़ा हो जाता है। आखिर जिस जनता के नाम पर ये पूरा निजाम खड़ा हुआ है, उसमें उसकी कितनी कीमत है? कहने को तो हमारे देश में हाथी मार्का लोकतंत्र है, लेकिन उसमें जनता की हैसियत चींटी के बराबर भी नहीं है। यही हाल किसी कुदरती आपदा में सैकड़ों-हजारों लोगों के मरने के बाद भी होता है। शोक में अवकाश और झंडा झुकाने की बात तो दूर संसद में दो मिनट का मौन भी नहीं रखा जाता है। वहीं अगर कोई नेता मर जाए तो सात-सात दिन का शोक और उतने ही दिन झंडा झुका दिया जाता है। फिर तो सरकार को जरूर इस बात को बताना चाहिए कि आखिर कितनी लाशें गिनने के बाद वो शोक मनाएगी? अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो दो सेकेंड के लिये ही सही हमें जरूर अपने और अपनी हैसियत के बारे में विचार करना चाहिए।
लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 

Tuesday, November 15, 2016

बड़े नेताओं का भला क्या बिगाड़ लेगी मोदी की नोटबंदी?

बीजेपी अध्यक्ष श्री अमित शाह ने हाल में यूपी के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं का नाम लेकर कहा है कि बड़े नोटों की बंदी से मुलायम सिंह और मायावती की हालत खराब हो गई है। यूपी में चुनावी माहौल चल रहा है। ऐसे में नेता विरोधी पार्टियों के विरुद्ध और एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करेंगे ही। लेकिन स्वयं प्रधानमंत्री अपनी सरकार की जिस पहल को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए इतनी महत्वपूर्ण बता रहे हैं कि इसके पक्ष में खड़े होने के लिए उन्हें रोते हुए जनता से 50 दिन तक सारी तकलीफें बर्दाश्त कर लेने की अपील करनी पड़ रही है, उसका इस्तेमाल उन्हीं की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा संकीर्ण राजनीतिक लड़ाइयों के लिए करना थोड़ा अटपटा लग रहा है।

चलिए, नोटबंदी को लेकर मुलायम सिंह और मायावती के अतिशय कष्ट को देखते हुए मैं उनको एक तरफ कर देता हूं, और थोड़ी देर के लिए उनकी जगह खुद को रख देता हूं। मैं एक मान्यताप्राप्त पार्टी का मुखिया हूं और मेरे पास 200 करोड़ रुपये 1000 और 500 रुपये के नोटों की शक्ल में मौजूद हैं। ये रुपये मैं दस-दस करोड़ करके विभिन्न बैंकों में जमा कराने ले जाता हूं। वहां बैंककर्मी मुझसे साफ कहते हैं कि इस रकम में से ढाई लाख रुपया तो वे साफ जमा कर लेंगे, लेकिन बाकी की रकम आपकी तभी जमा हो पाएगी, जब आप इसका स्रोत बताएंगे। अन्यथा इस रकम पर आपको 30 प्रतिशत टैक्स देना होगा और टैक्सेबल रकम पर 200 प्रतिशत की पेनाल्टी अलग से देनी पड़ेगी।

अब, उनके इस सवाल के सामने मैं क्या करूंगा? क्या चीख-चिल्लाकर अपनी बेचैनी जताऊंगा, वहीं बैंक में खड़ा होकर भरी भीड़ में सिर पीट-पीट कर रोऊंगा? बिल्कुल नहीं। अगर मैं एक सीजन्ड राजनेता हूं तो तार्किक रुख अपनाते हुए अपने पक्ष में मौजूद कानूनी व्यवस्था का उपयोग करूंगा। व्यवस्था यह कि राजनीतिक दलों के लिए 20 हजार रुपये से कम मात्रा में दिए गए चंदों की रसीद दिखाना, दूसरे शब्दों में कहें तो इस तरह हुई समूची आय का स्रोत बताना जरूरी नहीं है।

लंबे अर्से से सूचना आयोग राजनीतिक दलों से अपनी आय को आरटीआई के तहत लाने की अपील कर रहा है, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस समेत देश की कोई भी पार्टी इसके लिए तैयार नहीं है। और तो और, कोई भी दल अपना ऑडिट तक सार्वजनिक नहीं करता। राष्ट्रीय पार्टियां अपनी जितनी आय को टैक्सेबल बताती हैं, उतने से तो वे एक मंझोले स्तर के राज्य का भी चुनाव नहीं लड़ सकतीं। मेरी बात को लेकर जिस भी मित्र के मन में संदेह हो, वह किसी भी पार्टी के भीतरी स्रोतों से यह पता लगाकर बताए कि वित्त वर्ष 2015-16 में उसने कितना टैक्स चुकाया था। मुझे बीजेपी के बारे में पता है कि उसने पिछले साल अपनी सालाना राष्ट्रीय आय साढ़े चार सौ करोड़ के आसपास दिखाई थी। इतने पैसों में वह सिर्फ यूपी का चुनाव लड़कर दिखा दे!

बहरहाल, मैं शुरू में ही स्वयं को एक राजनीतिक दल के मुखिया के रूप में प्रस्तुत कर चुका हूं, लिहाजा मैं, या मेरी तरफ से मेरा सीए बैंक के प्रतिनिधि से कह सकता है- चलिए, आज नहीं तो कुछ दिन बाद पक्का कहेगा- कि पांच सौ और एक हजार के नोटों की शक्ल में मेरे पास मौजूद यह दो सौ करोड़ रुपया मेरी पार्टी की जायज स्रोतों से अर्जित की गई संपत्ति है, जिसे इसके गरीब समर्थकों ने रुपया-दो रुपया चंदा देकर जमा किया है। कुछ लोगों को शायद याद हो कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में यूपी के उपरोक्त दोनों नेताओं द्वारा यह दलील अदालत में पहले ही दी जा चुकी है और अदालत दोनों को सारे आरोपों से बाइज्जत बरी भी कर चुकी है।
इस लिए राजनेताओं के पास मौजूद काले धन को लेकर आप न तो अपनी रातें बर्बाद करें, न ही उनकी बर्बादी को लेकर चुनावी मंचों से सार्वजनिक जश्न मनाएं। इत्मीनान रखें महोदय, आपकी नोटबंदी से न तो तिजोरियों में तहें लगाकर रखे गए उनके पैसों का कुछ बिगड़ने वाला है, न ही आपके। हां, व्यक्तिगत रूप से जिन उम्मीदवारों ने चुनाव में करोड़ों अलग से खर्च करने का मन बना रखा था, उन्हें अब यह काम विकेंद्रित रूप से करना होगा। खासकर यूपी को लेकर तो पक्की सूचना है कि वे यह काम शुरू भी कर चुके हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि अन्य क्षेत्रों में- मसलन भ्रष्ट अफसरों और व्यापारियों के पास- मौजूद नकदी काला पैसा भी बड़ी पार्टियों के शीर्ष राजनेताओं के पास पहुंचने लगा है, जो अपना (या अपनी पार्टी का) कमीशन काट कर देर-सबेर इसे बैंकों में जमा करने का इंतजाम कर देंगे। तो, जैसा मैं कह चुका हूं कि मैं एक मान्यताप्राप्त राजनीतिक दल का प्रमुख नेता हूं, और आज की रात चैन से सोने के लिए नींद की दवा खाने की फिलहाल मुझे कोई जरूरत नहीं महसूस हो रही है।

लेखक चंद्रभूषण एनबीटी एडिट पेज के संपादक हैं। 

Friday, November 11, 2016

अमेरिकी जनता की बौद्धिक समझ का आइना हैं डॉनल्ड ट्रंप

कई सभ्यताओं के पतन की कहानियां इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन एक बड़े साम्राज्य को हम अपनी आंखों के सामने ढहते देख रहे हैं। हालांकि यह अभी आखिरी वाक्य नहीं है। अमेरिकी जनता ने एक ऐसा राष्ट्रपति चुना है जो अपने पूरे चरित्र में लंपट है। जिसकी महिलाओं के साथ छेड़खानी की कहानियां हैं, पोर्न स्टार्स से रिश्ते हैं। जो धुर मुस्लिम विरोधी होने के साथ अप्रवासियों के खिलाफ है। काले जिसको फूटी आंख नहीं सुहाते, अफ्रीकी-अमेरिकी उसे एक पल के लिए भी बर्दाश्त नहीं। वो देश में फिर से गोरों की सत्ता का ख्वाहिशमंद है। सरकारी प्रशासन के संचालन का जिसे एक दिन का अनुभव नहीं है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की यह नई असलियत है, जो खुद में बहुत भयावह है। 250 साल के पूंजीवादी लोकतंत्र का अगर यही जमा हासिल है, तो इस पर फिर से विचार की जरूरत है। यह शायद पहला अमेरिकी चुनाव हो जिसमें नतीजों की घोषणा के बाद ही लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हों। सब एक सुर में बोल रहे हों कि ट्रंप उनके राष्ट्रपति नहीं हैं। यह अभूतपूर्व स्थिति है।

ट्रंप के चयन के जरिये अमेरिकी समाज की वास्तविक तस्वीर भी सामने आ गई है। कहा जाता है कि नेतृत्व कुछ और नहीं बल्कि जनता की सोच, समझ और उसके बौद्धिक स्तर का आईना होता है। यह एक दूसरे तरीके से अमेरिकी पूंजीवादी समाज के पतन की कहानी भी बता रहा है। यह बताता है कि अमेरिकी समाज का बड़ा हिस्सा पतित हो गया है। उसके जीवन में विचारों, मूल्यों और सिद्धांतों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है। मुनाफे के बाजार में पला बढ़ा उपभोक्ता अब सामान का हिस्सा बन चुका है। उसमें किसी मानवीय सोच और संवेदना के लिए जगह तलाशना बेमानी है।

दरअसल अमेरिकी अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है, ट्रंप उसी की पैदाइश हैं। जब तक पूरी दुनिया में अमेरिकी लूट का कारोबार चलता रहा, पूंजी का निर्बाध प्रवाह उसके मक्का की ओर बना रहा, इस लूट में जनता की हिस्सेदारी चलती रही, तब तक कोई समस्या नहीं दिखी। लेकिन जैसे ही इसमें अड़चन आयी, प्रक्रिया बाधित होती दिखी, समस्याओं का अंबार आ गया। अमेरिका 2008 की मंदी से अभी तक नहीं उबर सका है। ऊपर से चीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़त और बाजारों पर कब्जे ने उसके सामने नई परेशानी खड़ी कर दी है। मध्यपूर्व में दखल और युद्धों में उसकी शिरकत ने फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुंचाया। पूंजी के मद में भले ही कुछ फायदा हुआ हो लेकिन इसने जन हानि और आतंकवाद के तौर पर नई समस्याएं दे दी।

घरों में आर्थिक संकट होता है तो पारिवारिक झगड़े बढ़ जाते हैं। यही अमेरिका में हुआ। संसाधन सीमित होते जा रहे हैं। और उसमें हिस्सेदारी के लिए होड़ बढ़ती जा रही है। ऐसे में एक पक्ष को असली दावेदार करार देकर दूसरे पक्ष के एक हिस्से को अवैध ठहराने और दूसरे को बाहर निकालने और तीसरे को शंट करने की राजनीति शुरू हो गई। ट्रंप ने इसी राजनीति को सुर दिया। जब उन्होंने स्थानीय गोरों का संसाधनों पर पहला हक बताया। इस कड़ी में उन्होंने मुसलमानों से लेकर अप्रवासियों और अफ्रीकी-अमेरिकियों को बाहरी करार देने के साथ ही उन्हें सारी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। पूरी दुनिया का ठेका नहीं लेने का उनका  बयान इसी का विस्तार है। फिर इसको बढ़ाते हुए उन्होंने एक प्रक्रिया में दुनिया के पैमाने पर अपने फौजी अड्डों वाले देशों से उसकी कीमत वसूलने का ऐलान किया। उनके इस पूरे आक्रामक प्रचार में समस्या को हल करने का एक रास्ता दिखा। यह अपने तरीके से एक दृष्टि का भी निर्माण करता था। यह बेवजह नहीं है कि ट्रंप के वोटरों में गोरे अमेरिकी, कम शिक्षित, वर्किंग क्लास, सब अर्बन क्षेत्रों के लोगों के साथ पुरुषों समेत धनाड्य विरोधी जेहनियत वाले तबकों का बहुमत है।

दूसरी तरफ हिलेरी क्लिंटन के साथ महिलाएं, उच्चशिक्षित अभिजात तबका तथा भारतीय और अफ्रीकी-अमेरिकियों समेत उच्चवर्गों का बड़ा हिस्सा था। लेकिन उनके पास समस्याओं को हल करने का कोई विजन नहीं था। डेमोक्रैटिक पार्टी के लगातार सत्ता में बने रहने और ओबामा के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा न कर पाने का ठीकरा भी क्लिंटन के सिर फूटा है। ऊपर से आईएसआईएस को फंडिंग से लेकर उसे खड़ा करने में क्लिंटन की हिस्सेदारी का खुलासा ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। इस मामले में रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भूमिका बेहद संदिग्ध मानी जा रही है। कहा जा रहा है कि पुतिन अमेरिका में ट्रंप को देखना चाहते थे। और इस लिहाज से उन्हें हर संभव सहायता दे रहे थे। रूसी हैकरों के जरिये विकीलीक्स के माध्यम से क्लिंटन के ईमेल का खुलासा इसी का हिस्सा था। रूसी विदेश उपमंत्री ने भी ट्रंप की टीम से संपर्क में रहने की बात मानी है। दरअसल पुतिन को लग रहा है कि ट्रंप के आने पर सीरिया में उनका मिशन आसान हो जाएगा। चाहकर भी ट्रंप आईएसआईएस के साथ नहीं जा पाएंगे। क्योंकि उन्होंने अपना पूरा चुनाव ही उसी के खिलाफ लड़ा है। नाटो मंच के खिलाफ ट्रंप पहले ही बोल चुके हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका का दखल कुछ कमजोर होने की आशंका है। और रूस से बाहर पांव पसारने के लिए बेताब पुतिन के लिए इससे बेहतर मौका दूसरा नहीं हो सकता है।

बहरहाल आने वाले तीन-चार साल पूरी दुनिया के लिए बेहद उथल-पुथल और अनिश्चितता भरे होने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति किस करवट बैठेगी कुछ कह पाना मुश्किल है। कुछ ऐसी चीजें हो सकती हैं जिनके बारे में किसी ने कभी सोचा भी नहीं हो। अनायास नहीं अमेरिकी न्यूक्लियर बमों की कमान संभालने वाले एक पूर्व कर्मचारी ने ट्रंप की दिमागी अनिश्चितता को देखकर उन्हें वोट न देने की अपील की थी। फिलहाल अब जब उन्हें चुन लिया गया है। और उनका ह्वाइट हाउस पहुंचना तय है। ऐसे में वह खतरा दुनिया के बिल्कुल सामने है। यह ट्रंप के राष्ट्रपति की कुर्सी पर रहने तक बना रहेगा। इस कड़ी मंा देखना होगा कि अमेरिका खुद को कितना बचा पाएगा और कितनी अपनी समस्याएं हल कर पाएगा। या फिर वैश्विक साम्राज्यवाद के सूरज के अब ढलने के दिन आ गए हैं?

लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।