Thursday, March 23, 2017

काले वाले ठाकुर साहब की कहानी

ठाकुर साहब जब दरभंगा से दिल्‍ली की ट्रेन में बैठे तो उनके मन में बस एक ही विचार रह-रह कर कौंध रहा था और वो ये कि 'जमीन खोद दूंगा-मकान पोत दूंगा।' दिल्‍ली जाकर नाम कमाकर किसी न किसी तरह से दरभंगा को दन्‍न न कर दि‍या तो वह खुद अपने नाम के आगे और पीछे से ठाकुर हटाकर खुद का नाम तिमि‍र कुमार रख देंगे। दरभंगा पुलिस उनको तीसरी बार लड़की छेड़ने में धरी तो बड़ी मुश्‍किल से छूटे थे और नाम वाकई तिमिर कुमार ही होने जा रहा था। एक बार तो मोहल्‍ले के पप्‍पन की नौ साल की बच्‍ची के साथ लबर सबर करते धराए थे। पकड़े गए तो बोले नारीवाद सिखा रहे थे। बहरहाल, राम-राम करते किसी तरह से दिल्‍ली पहुंचे और अपने एक दोस्‍त के कमरे में ढेर हुए। दोस्‍त उनका सीधा सादा कि मकान पोत देने जैसा ख्‍याल उसके सपनों में भी न आए तो वहीं ठाकुर साहब हर दूसरे डायलॉग में डब्‍बा कूची लेकर खुद उसी का मकान पोतने को तैयार रहते।

मोरी गेट से लेकर लक्ष्‍मी नगर और पंजाबी बाग तक चक्‍कर लगा लेने के कई दिनों बाद जब ठाकुर साहब को नौकरी मिली, तब भी उनके मुंह से वही डायलॉग निकला। लेकिन नौकरी ऐसी चीज होती नहीं और कैसी चीज होती है, ये ठाकुर साहब नहीं जानते थे। नौकरी में क्‍या-क्‍या काम करने होते हैं, ये भी उन्‍हें नहीं पता होता। नतीजा ये निकला कि कुछ दि‍न ठाकुर साहब ने कूड़ा नाली खड़ंजा विभाग में काम कि‍या तो विभाग वालों ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दि‍ए कि भई, ठाकुर साहब रहेंगे तो उन लोगों से कुछ न हो पाएगा। दोष ठाकुर साहब का नहीं, पुराने काम करने वालों का ही है, जिनके काम करने के लच्‍छन ही नहीं हैं।

असल में हुआ यह कि जब ठाकुर साहब को कूड़े का खाता दि‍या गया तो उसमें वह खड़ंजा बिछाने लगे और जब नाली वि‍भाग पकड़ाया गया तो उसमें वह कूड़ा भरने लगे। साथ के लोग जब उनसे कहते कि नाली को नाली की ही तरह लो तो वह धमकी देते कि जो कुछ भी वह कर रहे हैं, वह 220 फीसद सही कर रहे हैं। अगर कि‍सी ने बार बार उन्‍हें गलत कहा तो वह मैनेजमेंट से शि‍कायत करेंगे कि उनके साथ रंगभेद कि‍या जा रहा है। उनके बिहार से होने की वजह से उनसे गलत व्‍यवहार किया जा रहा है। अब बाकी के लोगों को अपनी इज्‍जत बचानी थी सो सभी ने समवेत यही कहा कि उन सभी को एकदम काम नहीं आता। खैर, मैनेजमेंट समझदार था सो ठाकुर साहब को दूसरे विभाग में भेजा गया।

इधर ठाकुर साहब बुरी तरह से फुंके हुए थे। 'काम उन्‍हें नहीं आता तो तबादला मेरा क्‍यों' का सवाल उन्‍हें लगातार जलाए जा रहा था। उनका काला रंग दिनों दिन और सुर्ख होता जा रहा था। 'सोफी और उसके संसार' के बारे में उन्‍होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था और 'स्‍लीमेन की अवध डायरी' के बारे में सुना तक नहीं था। फैज और फिराक को वह एक ही मानते थे। बावजूद इसके, उनका पढ़ने लिखने वाले विभाग में तबादला कि‍या गया जो पढ़-पढ़कर अपनी रिपोर्ट ऊपर दि‍या करता था जिससे कंपनी की नीतियां बनती और बि‍गड़ती थीं। पढ़ने लिखने से सख्‍त दुश्‍मनी रखने वाले ठाकुर साहब ने जब देखा कि यहां तो उनकी दाल नहीं गलनी है तो बड़े परेशान हुए। जब उन्‍हें कुछ पढ़ने को दिया जाता तो उनके पेट में दर्द होने लगता और जब लिखने को कहा जाता तो उनकी नाक बहने लगती।

मीटिंग वगैरह में भी जब लोग क्‍या पढ़ें-क्‍यों पढ़ें और क्‍या लिखें-क्‍यों लिखे के सवालों से जूझ रहे होते तो वह व्‍हाट्सएप्‍प पर दरभंगा में सरसों के तेल का भाव पूछ रहे होते। कई दफे तो चप्‍पल के टूटे फीते और लौंग का भी भाव पूछते पकड़े जाते तो बताते कि लौंग को वह रात में अपने बारह दांतों के बीच बनी जगह में फंसाकर सोते हैं। शायद ये रात में दांतों में लौंग फंसाकर सोने का ही नतीजा निकला कि विभाग में उन्‍होंने सभी से सीधे मुंह बात करना बंद कर दी। जि‍ससे भी बात करते, मुंह टेढ़ा करके ही बात करते। इसके चलते कोई भी बात करते, टेढ़ी ही करते। सीधी बात और सीधी चाल उन्‍होंने दरभंगा स्‍थित अपने घर की दुछत्‍ती पर रखकर बंद करके रख दी और भूल गए। आखिरकार यह लोग भी कब तक बर्दाश्‍त करते, सो उन्‍होंने भी मैनेजमेंट को बोल दि‍या कि भई, हमीं लोग नाकाबिल हैं, हमें न तो पढ़ना आता है, न लिखना। इसलि‍ए हमारा ट्रांसफर साफ सफाई विभाग में कर दि‍या जाए।

मैनेजमेंट समझदार था सो चुपचाप ठाकुर साहब को उठाकर डाक-तार विभाग में बैठा दि‍या। वहां बैठकर ठाकुर साहब प्रतिदिन चिट्ठियां पढ़ते। पढ़ते-पढ़ते और भी कुढ़ते जाते। मन ही मन बुदबुदाते कि उनके जैसा महान, हर वाद का वादी, राष्‍ट्रीय रंग से लैस क्‍या दुनि‍या में ये दो कौड़ी की चिट्ठियां पढ़ने आया है। अपनी इसी सुपति‍त कुढ़न के चलते इस बार तो उन्‍होंने नए विभाग में पहुंचते ही सभी काम करने वालों पर रंगभेद का आरोप लगा दि‍या। फि‍र क्‍या था, एक के बाद एक, सभी की पेशियां मैनेजमेंट के सामने होने लगीं। सभी लोग सहम गए क्‍योंकि जहां वह काम करते थे, वहां भले ही झूठ-मूठ ही क्‍यों न लगाया जाए, लेकिन ऐसा आरोप बर्दाश्‍त नहीं कि‍या जाता था। सभी ने अपनी सफाई में अपनी बात रखी। पिछले विभागों में काम करने वालों के बयान भी दर्ज हुए।

मैनेजमेंट समझदार था। सभी लोगों के बयान सुनने और सारे सबूतों को देखने के बाद उसने अपना फैसला खुद ही मुल्‍तवी कर लि‍या। डाक-तार विभाग में काम करने वालों को एक दूसरे कमरे में ले जाया गया और उनसे प्रार्थना की गई कि वह कि‍सी तरह से भी अपना काम चलाएं, लेकिन ठाकुर साहब को बि‍लकुल डिस्‍टर्ब न करें। विभाग वाले भी समझदार थे, मैनेजमेंट का इशारा उन्‍होंने हाथो-हाथ लि‍या। एक वो दिन था और एक आज का दिन है, लगभग सारे विभाग ठाकुर साहब नाम का नाम पूरी तरह से भूल चुके हैं। वह अब इशारों इशारों में उन्‍हें तिमिर कुमार ही बुलाते हैं। एक तो थोड़ा दिमाग का तेज निकला तो उसने तिमि‍र कुमार के नाम से ठाकुर साहब के दरभंगा वाले पते पर तिहत्‍तर चिट्ठियां भेज दीं। बच इसलि‍ए गया क्‍योंकि उनपर कहीं भी उसका नाम नहीं था।

हालांकि वो तो बच गया, लेकिन ठाकुर साहब के कुंठित कोप के भागी आए दि‍न डाक बाबू और तार बाबू बनने लगे। कुछ दिन पहले डाक बाबू ने ठाकुर साहब से सिर्फ यह पूछने की हिमाकत कर दी कि छतरपुर वाली चिट्ठियां कहां रखी हैं, तो हाल ये हुआ कि जैसे पूरे दफ्तर में कोई तीन बैल जोतकर हेंगा चला दे। तार बाबू बड़ी-बड़ी आंख लि‍ए टपर-टपर कभी इधर ताकें, कभी गहरी सांस छोड़ें तो कभी उधर ताकें। बीच-बीच में नाक और कान में उंगली भी करते रहें। उस दिन की बात बताते हुए आज भी तार बाबू बोलते हैं कि 'क्‍या बोलें, बोलती ही बंद हो गई थी भैया। भगवान किसी को कैसा भी दिन दि‍खाए लेकिन ऐसे आदमी के बगल बैठने का दुर्भाग्‍य न दे जैसा कि डाक बाबू को दे रहा है। हमको भी दे ही रहा है, लेकिन अब है तो काट रहे हैं।'

कुछ दिन पहले डाक बाबू ने दफ्तर में बाकायदा घोषणा की कि उनकी आवाज चली गई है। पूछा गया कि कहां चली गई है तो उनका कहना था कि कहां चली गई है पूछने से पहले पता करना होगा कि आ कहां से रही है और आती कहां से है। एक वो दिन है और एक आज का दिन है, क्‍या दिन और क्‍या रात, किसी को नहीं पता कि डाक बाबू की आवाज आती कहां से है। चली जाने का सबको पता है।

वैसे ठाकुर साहब जैसे लोग हर कहीं हर किसी को मिल ही जाते हैं। उनके बारे में बताने से पहले मेरे सामने सवाल था कि उनके बारे में कुछ बताया जाए या न बताया जाए। उनके बारे में कुछ भी बताना उनको चंद चीकट शब्‍दों में ही सही, लेकिन अमर कर देगा। उनके बारे में न बताया तो जाने कितनों की आवाज मर जाएगी या मरी रहेगी। इसलि‍ए मैंने तय किया कि उनके बारे में बता ही दि‍या जाए। इसबीच ठाकुर साहब की तहकीकात में मुझे कुछ एक ऐसी खबरें और पता चलीं, जिनसे यह साबित हुआ कि ठाकुर साहब के दिल पर भी वही रंग चढ़ा है जो उनके अगवाड़े और पि‍छवाड़े चढ़ा हुआ है।

उनके पहले के एक दोस्‍त ने मुझे बताया कि दिल्‍ली आने के तुरंत बाद से ही उनकी नौकरी सेट नहीं हुई। अलबत्‍ता वह कुछ और ही सेट करने लगे। पहले जहां वह काम करते थे, वहां पर उनकी एक बूढ़ी मालकिन हुआ करती थी। साल दो साल तो ठाकुर साहब मालकिन की गोद में ऐसा खेले कि हर आता जाता इंसान मालकिन को इतनी अजीब नजरों से देखना शुरू कर दि‍या। आखिर मालकिन कब तक सहती। वह भी उम्र के इस ढलान पर आकर सहने सुनने की क्षमताएं वैसे भी कम ही होती जा रही हैं। किसी तरह खुदा-खुदा करते हुए उनकी मालकिन ने उनकी नौकरी दूसरी जगह सेट की।

दूसरी जगह आने के बाद ठाकुर साहब ने क्‍या क्‍या किया, उसकी एक भरी पूरी लंबी लिस्‍ट है। काफी कुछ तो पहले बता ही दि‍या, ठाकुर साहब के जो कर्म हैं और जिन कर्मों के चलते वह अब पूरी तरह से तिमि‍र कुमार बनकर प्रसिद्ध हो चुके हैं, वह आइंदा भी बताने पर मजबूर करते ही रहेंगे। तिमि‍र वि‍ल बैक। तिमि‍र इज ऑन।

Saturday, March 11, 2017

अब तौ फि‍र उधिरइहैं राम, सबका कचर के जइहैं राम

अब तौ फि‍र उधिरइहैं राम
सबका कचर के जइहैं राम
मार पीट दंगा फसाद मा
सबसे उप्‍पर रहि‍हैं राम।

दिसि दिगंत बि‍स भरिहैं राम
बिस-बिस से अब मरिहैं राम
जैदी भइया ना रोवा हो
मंदिर का ना तरिहैं राम।

लाल त कब से हारा बइठा
तब्‍बौ लाल हरइहैं राम
लाल लाल ही बोल बाल के
लालै लाल लगइहैं राम।

भय अंजोर अब भय कै भइया
चलत रेल फुंकवइहैं राम
पकड़ के दाढ़ी दै के गारी
फि‍र चक्‍कू चलवइहैं राम।

-रेजिंग राहुल, हैरिंग्‍टनगंज मिल्‍कीपुर वाले

Friday, March 3, 2017

नतमस्‍तक मोदक की नाजायज औलादें- 49

प्रश्‍न: नारियलपानी माने?
उत्‍तर: अंग्रेजी ना चोदो!
प्रश्‍न: पाइनएप्‍पल का पेड़ देखा है?
उत्‍तर: तुम्‍हारी तरह घर में नहीं बंद रहते बे!
प्रश्‍न: कैसा होता है?
उत्‍तर: खजूर से थोड़ा बड़ा और ताड़ से थोड़ा छोटा.
प्रश्‍न: और उसपर पाइनेप्‍पल लटकता है?
उत्‍तर: नहीं चूतिये, उसी पर चढ़कर बैठा रहता है!
प्रश्‍न: कैसे लटकता है?
उत्‍तर: नारियल का पेड़ देखे हो?
प्रश्‍न: हां, देखा है.
उत्‍तर: तो हरामी, जैसे नारियल लटकता है, वैसे ही लटकता है!
प्रश्‍न: वो नारियल की तरह लटकता है?
उत्‍तर: तुमको लटकाएं तब समझ आएगी?
प्रश्‍न: तो नारियल कहां लटकता है?
उत्‍तर: भो**** के, बोले न, अंग्रेजी ना चोदो!!
प्रश्‍न: मने पेड़ पे लटकता है या जमीन पे उगता है?
उत्‍तर: दोनों होता है.
प्रश्‍न: ऐसा कौन बोला?
उत्‍तर: हम बोले!
प्रश्‍न: आपका बोलना गलत है!
उत्‍तर: हम जो भी बोल दें, सब सही है.
प्रश्‍न: तो फिर गलत क्‍या है?
उत्‍तर: वामपंथी हैं गलत!
प्रश्‍न: बहनजी गलत हैं?
उत्‍तर: -----
प्रश्‍न: बोलि‍ए ना, क्‍या बहनजी गलत हैं?
उत्‍तर: तुम्‍हारी सारी बहनें गलत हैं!
प्रश्‍न: मेरी बहनें क्‍यों?
उत्‍तर: क्‍योंकि वो तुम्‍हारी बहनें हैं.
प्रश्‍न: लेकिन अब तक तो आप उन्‍हें अपनी बहनें कहते थे?
उत्‍तर: कहने से क्‍या होता है?
प्रश्‍न: अभी तो आप कहे..
उत्‍तर: बोले तो नहीं थे ना?
प्रश्‍न: कहना बोलना अलग अलग है?
उत्‍तर: हगना मूतना अलग अलग है कि नहीं?
प्रश्‍न: आपका कहना बोलना क्‍या ऐसा ही है?
उत्‍तर: ये बताओ भो*** के कि पाकिस्‍तान से कितनी बोटी खाई?
प्रश्‍न: उसमें तो आपके लोग उस्‍ताद निकले!
उत्‍तर: जेएनयू में नारा कौन लगाया?
प्रश्‍न: उसमें भी आपके ही लोग निकले!
उत्‍तर: लोगों की पिटाई किसने की, उन्‍हें मारा किसने?
प्रश्‍न: वहां भी तो आप ही थे.
उत्‍तर: तो बहिन*** तुम कहां थे, अपनी बहन के साथ?
प्रश्‍न: मार्च शुरू हो गया है!
उत्‍तर: टांग तोड़ दी जाएगी सबकी!
प्रश्‍न: महीने की टांग कैसे तोड़ेंगे?
उत्‍तर: हम किसी को भी तोड़ सकते हैं!
प्रश्‍न: पाकिस्‍तान को भी?
उत्‍तर: देखे नहीं, तोड़ के दो टुकड़े कर दि‍ए?
प्रश्‍न: वो तो इंदि‍रा गांधी ने कि‍या था?
उत्‍तर: बलूचिस्‍तान अलग होगा.
प्रश्‍न: अलग होके कहां जाएगा?
उत्‍तर: हमारे साथ आएगा.
प्रश्‍न: लेकिन बीच में तो पाकिस्‍तान है?
उत्‍तर: बीच में मेरा लं*** है भो*** के!! 

Wednesday, March 1, 2017

जानते हैं वो क्‍यूं इतना चिढ़ते हैं?

पहले छुपकर नारे लगाते पकड़े गए। फि‍र आईएसआई के लि‍ए जासूसी करते जकड़े गए। पता चला कि कुछ आइसि‍स फाइसि‍स से भी बात चल ही रही थी। फि‍र मारपीट करते पकड़े गए।
जानते हैं वो क्‍यूं इतना चिढ़ते हैं
क्‍योंकि
हम छुपकर नारा नहीं लगाते।
हम आईएसआई के लि‍ए जासूसी नहीं करते।
हमारे दोस्‍त आइसि‍स का खात्‍मा कर रहे हैं।
हम पिट रहे हैं।
हम पिट रहे हैं क्‍योंकि हमें आजादी चाहि‍ए।
एक बार पूरा देश पि‍टा था।
आजादी के लि‍ए पि‍टा था।
वो आजादी से चिढ़ते हैं।
आजादी उनके लि‍ए अति‍क्रमण है।
वह युद्ध चाहते हैं।
क्‍योंकि युद्ध उनका धंधा है।
फि‍र भले वह युद्ध सीमा पर हो या सीमा के अंदर
धंधा चलता रहना चाहि‍ए।
आजादी मांगने वाले, आजादी चाहने वाले
धंधे की राह का रोड़ा हैं
इसलि‍ए वह हर आजाद अमन पसंद को हर बार जान से मार डालने की कोशि‍श करते हैं
पर हम फि‍र भी नहीं मरते
उग आते हैं अपनी ही लाशों पर
हरी दूब बनकर
इसीलि‍ए वह चि‍ढ़ते हैं।
वह डरते हैं
हर नई कोपल से।
I could say on this pic that ABVP... TAKE THIS YOU SKRS!!
 लेकिन मैं ऐसा कुछ कहूंगा नहीं क्‍योंकि इसे न संघी ले पाएंगे और न उनके लड़कपि‍ल्‍लू .
Students against ABVP in New Delhi 28 feb 2017

Tuesday, February 7, 2017

नवयुग में निसपच्छता के पराठे (सिर्फ सहाफि‍यों के लि‍ए)

निसपच्छता नामक एक चीज होती है। यह नामक भी होती है और मानक भी होती है। जो लोग इसे नामक मानते हैं वो इसे नमक की तरह लेते हैं। जो लोग इसे मानक मानते हैं वो इसे मन में बसा लेते हैं। निसपच्छता स्वच्छता की अम्मा भी होती है। अगर कोई निसपच्छ नाली में भी पड़ा होगा, तो भी वह साफ माना जाएगा क्योंकि वो निसपच्छ है। निसपच्छ है इसलिए स्वच्छ है। जो लोग निसपच्छ नहीं होते, वो स्वस्थ नहीं होते। अस्वस्थ लोगों के मन में अस्वस्थ दिमाग का वास होता है। अस्वथ दिमाग में स्वच्छ निसपच्छता नहीं रह सकती क्योंकि वहां पहले से ही पक्षधरता के कीड़े बिलबिला रहे होते हैं। निसपच्छता के लिए दिमाग को धोकर स्वच्छ बनाना होता है। उसके बाद उसमें निसपच्छता भरनी होती है। यह कार्य हमें मंगल, गुरु और शनि की शामों में अगरबत्ती जलाकर करना होता है। सोम, बुध और शुक्र को हम निसपच्छता का स्वच्छता के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इतवार को निसपच्छता की छुट्टी होती है तो वह संडास नहीं जाती।

हमें अपने मन में निसपच्छ रहना चाहिए। फैसला करते हुए हमें अपने मन की नहीं सुननी चाहिए। हमें अपने दिमाग की सुननी चाहिए। मन में निसपच्छता पक्षधारी हो जाती है। इसलिए उसे दिमाग में शिफ्ट कर देना चाहिए। इसके लिए अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स की मदद लेने में कुछ भी मायूब बात नहीं। निसपच्छ लोगों को चाहिए कि वह अपनी अपनी कुर्सी से उतरकर सावधान खड़े हो जाएं। हिलना डुलना पूरी तरह से मना है क्योंकि इससे किसी एक पक्ष की तरफ गिरने का खतरा है। गिरने पर निसपच्छता टूट जाती है और गंदी भी हो जाती है। वैसे बाद में इसे फेवीक्विक लगाकर जोड़ भी सकते हैं और नए निसपच्छ बनने वालों को सहाफत डे पर गिफ्ट दे सकते हैं। निसपच्छता को आप बाहर से नहीं सीख सकते। इसे आपको अपने अंदर उगाना होता है। यह दिमाग पर उगने वाला आत्मा का हरा पेड़ है जिसकी पत्ती उसी के सिर पर निकली नजर आती है, जो वाकई निसपच्छ होता है।

जब व्यक्ति वाकई निसपच्छ होता है तो वह अपने मन को बराबर के सत्तर-सत्तर खानों में बांटकर उसमें मोजे रख देता है। यह सारे मोजे वक्त आने पर निसपच्छ रहते हुए सभी पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिए जाते हैं। इससे सब खुश हो जाते हैं और निसपच्छता का भी धंधा चलता रहता है। निसपच्छ दिमाग को याद रहना चाहिए कि निसपच्छता का धंधा होता है, न कि धंधे में निसपच्छता। उसे धंधे की पक्षधारिता का सम्मान करते हुए पूरी तरह से निसपच्छ पराठे ही खाने चाहिए, वह भी पत्तागोभी भरे हुए। याद रखिए, अगर आप निसपच्छ रहेंगे तो सब आपसे प्रेम करेंगे, लेकिन अगर आप पक्षधारी होंगे तो कुछ ही आपसे प्रेम करेंगे। धंधा सबके प्यार से चलता है, कुछ के प्यार से नहीं।