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Wednesday, September 25, 2024

ये सांप है या प्रकृति का वरदान?


ये प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर के पास पानी में तैरता आया पनडुब्बी सांप है (पानी में बैरियर वाली)। इलाहाबाद निवासी रवींद्र मिश्रा ने इसे एक जीव विज्ञानी ग्रुप पर शेयर किया है। जीव विज्ञानी इसे चेकर्ड कीलबैक के नाम से बुलाते हैं। लेकिन हम लोग इसे पनडुब्बी कहते थे। इस तस्वीर में इसका सफेद हिस्सा बहुत साफ दिख रहा है और इसपर बने चेक भी एकदम साफ दिख रहे हैं। गांव-गिरांव के तालाबों में यह अक्सर काले या स्लेटी रंग का दिखता है और पानी के बाहर इसकी गरदन बस एकाध फुट ही दिखती है।
हम लोग इसे पनडुब्बी सांप इसलिए कहते थे कि जैसे ही यह हमें आता देख, झट से डुबकी मार दे। अक्सर यह तालाब में कछुए की तरह भी सिर निकाले तैरता दिखता था, लेकिन कछुए की बहुत ही गंदी नकल करता था, तो हम लोग पकड़ पा जाते थे कि पनडुब्बी ही है। वैसे यह तालाब में ही नहीं रहता था। यह पानी से भरे धान के खेतों में भी दिखता था। चूंकि धान के खेत उथले होते हैं तो वहां यह कछुए की तरह ही तैरता था। कभी-कभार हममें से कुछ दोस्त इसकी कछुए वाली चालबाजी में गच्चा भी खा गए, और उन्होंने इसे कछुआ समझकर पकड़ने की कोशिश की। बदले में मिला एक तेज वार। पनडुब्बी काफी कटखन्ना होता है, तुरंत काटता है। बस गनीमत यही होती है कि इसमें जहर नहीं होता और गांव-जुआर के लोग यह बखूबी जानते हैं। माना जाता है कि उनके लार में थोड़ा सा जहर होता है, क्योंकि काटने पर अक्सर खुजली होती है और थोड़ी सूजन होती है।

वैसे तो दुनिया में तरह-तरह के सांप पाए जाते हैं, पानी में रहने वाले भी। समुद्री पानी में जितने भी तरह के सांप पाए जाते हैं, लगभग सभी जहरीले होते हैं। कई तो इतने कि घंटे भर में अगर इलाज ना मिला तो जान निकलने में देर नहीं लगती। लेकिन पनडुब्बी धरती नाम के गोले में बस इसी ओर मिलता है। इसी ओर भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में। थोड़ा बहुत यह जावा, सुमात्रा, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, दक्षिणी चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में भी पाया जाता है, लेकिन थोड़ा बहुत ही।
पनडुब्बी घासफूस नहीं खाता, और वैसे भी कोई सांप घासफूस नहीं खाता। सापों की देह की बुनावट ही कुछ ऐसी है कि उन्हें हाई प्रोटीन आहार चाहिए होता है। तो अपने कीलबैक महाराज मछलियों और मेंढक का सेवन करते हैं, चर्बी सहित। साहब बेहतरीन तैराक हैं और हमला करने में मगरमच्छ की कॉपी करते हैं, मतलब धीमे धीमे चुपचाप आना और अचानक झपट्टा मारना। लेकिन जब इस पर हमला होता है तो यह अपने शरीर को चपटा कर लेता है और फुफकारने जैसी आवाज़ें निकालता है ताकि दुश्मन को डराया जा सके। इसके चपटे शरीर के कारण यह बड़ा और खतरनाक दिखाई देता है, जिससे दुश्मन डर कर पीछे हट जाए। लेकिन अगर कोई इसे अच्छे से जानता हो तो वह शायद ना डरे।
और अगर कोई इससे ना डरे तो ये बेचारा खुद डर जाता है। फिर यह तेजी से भागने की कोशिश करेता है और आमतौर पर पानी में कूद जाता है, जहां यह आसानी से तैर सकता है और शिकारियों से बच सकता है। यह एक नंबर का नाटकबाज होता है और अपने आप को बड़ा दिखाने, फुफकारने और छिपने का प्रयास करता है ताकि खतरे से बच सके। इसमें कोई बेजा बात नहीं है। इंसान भी तो यही करता है, चाहे वो किसी का भी नुकसान ना कर पाए।
चेकर्ड कीलबैक के इवोल्यूशन पर केंद्रित कोई विस्तृत शोध नहीं है। यानी यह सांप कैसे बना, इसकी देह पर चेक्स कैसे बने, इसने पानी में रहना कैसे शुरू किया, इसने चपटा होना कैसे डिवेलप किया- इस तरह की बातों के सीधे-सीधे कोई जवाब हमारे सामने नहीं हैं। अगर किसी को इन सवालों के जवाब चाहिए, तो शायद पूरी एक उम्र लगानी होगी और वो हम भारतीयों के पास है नहीं। हम तो अभी तक कुत्तों को नहीं समझ पाए हैं, सांप तो बहुत दूर की चीज है। भले ये सांप-सपेरों का देश कहा जाता हो दुनिया भर में, लेकिन सांपों को लेकर हमारे यहां किसी भी लेवल की जागरूकता नहीं है।

ये सब तो बतकुच्चन है, असल बात ये है कि एक दूसरा रास्ता है जो कीलबैक चिचा के इवोल्यूशन से जुड़े कुछ मिलते जुलते जवाब दे सकता है। कीलबैक न सिर्फ तालाब के पानी या धान के खेतों में घुलमिल जाता है, बल्कि आप इसे ध्यान से देखेंगे और इससे मुलाकात और मुकालात करने वाले अच्छे से जानते हैं कि ये झाड़-झंखाड़ और घास में भी छुपे हुए होते हैं। ऐसे में हमें चलना होगा सांपों के छलावरण और प्राकृतिक चयन पर हुए शोधों की तरफ, जो इस सांप के इवोल्यूशन की समझ को बेहतर बनाते हैं।
इन अध्ययनों में से एक थोड़ा ध्यान खींचता है और सवाल के सबसे पास पहुंचता है। इसके मुताबिब सांपों का रंग और पैटर्न का कनेक्शन उनकी प्रजनन सफलता के साथ भी है। जिन सांपों के पास बेहतर छलावरण होता है, वे न केवल शिकारियों से बचने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे बेहतर तरीके से शिकार भी कर पाते हैं। यह उन्हें अधिक समय तक जीवित रहने और प्रजनन करने का अवसर देता है, जिससे उनके अनुकूल जीन पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार, चेकर्ड कीलबैक जैसे सांपों का चेक पैटर्न केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता को भी बढ़ाता है​।
चेकर्ड कीलबैक में कई गोल दांत होते हैं, जो फिसलन वाली मछलियों को पकड़ने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, लेकिन आसानी से खून बहने का कारण बन सकते हैं। यह बताता है कि इसका इवोल्यूशन धरती से पानी की ओर भी हो सकता है। वैसे भी सांपों की इवोल्यूशन थ्योरी यह भी इशारा करती ही है कि सांपों के पूर्वज टेट्रापोड्स (चार पैरों वाले सरीसृप) थे, जो जमीन पर चलते थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि सांपों के पूर्वज स्क्वामेट्स (Squamates) नामक सरीसृप वर्ग से थे, जिनमें छिपकलियां और सांप दोनों शामिल हैं। सांपों का विकास समुद्री और जमीन दोनों प्रकार के जीवन से जुड़ा रहा है, और वे धीरे-धीरे अपने चार अंगों को खोते गए और एक लंबा, बिना अंग वाला शरीर विकसित किया।
सांपों के विकास को समझने के लिए कई फॉसिल्स (जीवाश्म) का अध्ययन किया गया है। सबसे पुराने सांपों के फॉसिल्स में अंगों के अवशेष पाए गए हैं, जो बताते हैं कि उनके पूर्वज चार पैरों वाले जीव थे। यह भी देखा गया है कि सांपों का विकास छिपकलियों के समान हुआ है, जिनसे वे अपने शरीर के अंग खोकर अलग हुए। समय के साथ कुछ सांपों ने समुद्र और जलाशयों में जीवन के लिए खुद को अनुकूलित किया, जबकि अन्य ने जमीन पर रहना पसंद किया।
जैसे-जैसे उनके पर्यावरण के अनुसार सांपों की आदतें बदलती गईं, उनके शरीर में भी बदलाव आते गए। जमीन पर रहने वाले सांपों ने अपनी त्वचा के रंग और पैटर्न को इस तरह विकसित किया, जिससे वे अपने परिवेश में छिप सकें और शिकारियों से बच सकें। वहीं पानी में रहने वाले सांपों ने लाखों वर्षों के इवोल्यूशन के दौरान तैरने की क्षमता को विकसित किया। इस अनुकूलन ने उन्हें जल निकायों में शिकार करने और शिकारियों से बचने में मदद की।

भारत में चेकर्ड कीलबैक (Xenochrophis piscator) तो है ही, ओलिव कीलबैक (Atretium schistosum) भी है जो नदियों, तालाबों और झीलों के पास पाया जाता है। इसका आहार मुख्य रूप से जलीय जीव होते हैं, और यह तैरने में कुशल होता है। डार्क-बेलीड मार्श स्नेक (Gerarda prevostiana) भी मिलता है जो मुख्य रूप से पश्चिमी घाट और भारत के तटीय क्षेत्रों में रहता है। यह जलीय शिकारियों से बचने और कीचड़ भरे इलाकों में तैरने में सक्षम होता है। एशियाई वाटर स्नेक (Homalopsis buccata) भी है जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में ताजे पानी के स्रोतों के पास पाया जाता है। यह धीमी गति से बहने वाली नदियों और तालाबों में मछलियों और अन्य छोटे जलीय जीवों का शिकार करता है। फॉरस्टेन्स कैट स्नेक (Boiga forsteni) भी है जो तैरने में सक्षम तो होता ही है, पेड़ों पर चढ़ने में माहिर होता है। यह सांप पानी में भोजन की तलाश में उतर सकता है।
मैं जानता हूं, मगर चलते चलते बस एक आखिरी सवाल। पनडुब्बी इस संसार में है क्यों? चेकर्ड कीलबैक हमारे साथ रह क्यों रह रहा है? दरअसल चेकर्ड कीलबैक सांप प्रकृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके व्यवहार और शिकार संबंधी आदतें इसे पारिस्थितिकी तंत्र का एक आवश्यक हिस्सा बनाती हैं। यह मुख्य रूप से मछलियों, मेंढकों, और छोटे जल जीवों का शिकार करता है। यह इन प्रजातियों की आबादी को नियंत्रित करता है, जिससे पानी के निकायों में शिकार-शृंखला संतुलित रहती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य प्रजातियों को भी जीवित रहने का मौका मिलता है।
इसके बिना, इन प्रजातियों की आबादी अनियंत्रित रूप से बढ़ सकती है, जिससे जल निकायों की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है​। चेकर्ड कीलबैक छोटे जल जनित कीड़ों और उनके लार्वा को खाता है, जो कृषि क्षेत्रों में एक तरह के कीट होते हैं। यह सांप इन कीटों की संख्या कम करता है, जिससे फसलों को नुकसान कम होता है और कीटनाशकों पर निर्भरता घटती है। इस प्रकार, यह सांप प्राकृतिक कीट नियंत्रण के रूप में कार्य करता है और हमारी धान की पैदावार बढ़ाता है। आगे से अगर आप चावल का एक कौर भरें तो एक बार कीलबैक यानी पनडुब्बी चिचा का भी शुक्रिया अदा करें।

सबसे बड़ी बात यह कि सबसे ज्यादा कुर्बानियां भी पनडुब्बी के ही हिस्से में आई हैं। यह सांप न केवल शिकार करता है, बल्कि खुद भी बड़े पक्षियों और अन्य शिकारियों के लिए भोजन का स्रोत है। चील हो, बगुला हो या फिर मगरमच्छ या घड़ियाल ही क्यों न हो, सबको इसका स्वाद पसंद है। यह चक्र है जो कि पारिस्थितिक तंत्र की विविधता को बनाए रखने में मदद करता है, क्योंकि यह अन्य शिकारियों के लिए भोजन के रूप में काम करता है, जिससे उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक संतुलन बना रहता है​।
अंत में, यह हमारा सफाईकर्मी भी है क्योंकि यह वहां भी रहता है, जहां पानी के निकाय होते हैं। यह पानी में रहने वाले छोटे मृत या बीमार जीवों को खाकर पानी को साफ रखने में मदद करता है। इसके परिणामस्वरूप, जलाशयों की स्वास्थ्यवर्धक स्थिति बनी रहती है और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल पर्यावरण सुनिश्चित होता है​। मेरे ख्याल से इतना प्रकृति की इस महान पनडुब्बी को सलाम करने के लिए काफी होगा।

Thursday, March 8, 2018

मैं महुआ बीनता हूं, आपको भी महुआ मिले

यह मेरी सफलता नहीं है। यह बिक चुकी भारतीय पत्रकारिता की असफलता है। लोगों को ताकत चाहिए। ताकत इन्फॉरमेशन से मिलती है, जो इंडियन मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म नहीं दे पा रहा है। इंटरनेट ने ताकत चाहने वालों के सामने खुला खेत खोल दिया है। लोग ताकत ले रहे हैं, खेत जोत रहे हैं। लोग एक लाख घंटे से ज्यादा की ताकत पी चुके, वह भी तीन महीने में। तीन महीने पहले मैं मेनस्ट्रीम मीडिया से बुरी तरह से ऊब गया। टीवी तो वैसे भी नहीं देखता, लेकिन अखबार और इंटरनेट पर दिखते यलो जर्नलिज्म से मन खट्टा हो गया। तय किया कि सबकुछ असांजे की ही तर्ज पर करूंगा। खुद से वादा किया कि जो जैसा है, वैसा ही सामने रखना है, बगैर किसी ड्रामा के। किसी ने पूछा कि तुम बोलते हो या मशीन? उसके सवाल में मुझे मेरा जवाब मिल गया। असांजे गुरु, क्या सिखा दिया बे तुमने? जीवन में कभी वीडियो नहीं बनाई थी। प्रिंट का हूं, कैसे बनाता और क्यों ही बनाता? फिर दस दिन तक वीडियो बनाने वालों का पीछा करता रहा कि कुछ सिखा दें, मगर मुझे सिखाना उन्हें अपनी नौकरी का संकट लगा। फिर दुनिया के पास गया। बोला कि सिखाओ, और दुनिया ने वीडियो बनाना सिखा दिया। दुनिया है ना, सब सिखा देती है। मुझे पता है कि मैं वाहियात वीडियो बनाता हूं। उसमें कला कहीं नहीं होती। कला करनी भी नहीं है मैंने। सूचनाओं में कला होनी भी नहीं चाहिए, उनके अर्थ बदल जाते हैं। सूचनाएं कला करने में स्वयं सक्षम हैं, बशर्ते कोई दे तो सही। कोई बताए तो सही। अगर कहूं कि मैं सूचनाएं देता हूं तो यह पूरी तरह से गलत और झूठ होगा। मैं सिर्फ मैनेजर हूं, कलेक्टर हूं इन्फॉरमेशन का। सूचनाएं हमारे सामने ही होती हैं, बस हम फर्क नहीं कर पाते। सामने की सारी सूचनाएं इसी दुनिया से इकट्ठा करता हूं और इसी को दे देता हूं। जो है, वह सबका है, सबके लिए है। मैं महुआ बीनता हूं। नाक में महुआ बसा है। आपको भी महुआ मिले, मिलता रहे, इसी खुशबू के साथ-

सवा लाख से एक लड़ाऊँ 
चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ 

तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ

MORE POWER TO YOU..
MORE RISING TO YOU..

Wednesday, October 29, 2014

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं, चार आने की धनि‍या हैं।

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।
करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।


- राइजिंग राहुल (अवध बीज भंडार, हरिंग्‍टनगंज मि‍ल्‍कीपुर खजुरहट वाले)

कौन है पत्रकार? कहां है समाचार??

कौन है पत्रकार?
कहां है समाचार??
पीएम की सभा में 
कलम से हो बलात्‍कार।
कैमरा नि‍कले भी तो 
सेल्‍फी का कदाचार।
कौन पूछे मरा कौन?
कौन बोले सदाचार।
रंगीन तंबुओं में
कौन घुटा कहां यार।
चंद कट प्‍लेटों में
नीलाम हुआ पत्रकार।
बि‍क चुके खंबों को
कौन मारे जूते चार।
सीमेंट का यहां पर
ना बने कोई अचार।
हंसता है नरपि‍शाच
खि‍लखि‍लाते कलमकार
कौन है पत्रकार?
कहां है समाचार??


- राइजिंग राहुल (अवध बीज भंडार, हरिंग्‍टनगंज मि‍ल्‍कीपुर खजुरहट वाले)

Thursday, May 8, 2014

अयोध्‍या में दंगा भड़काने की कोशि‍श की नरेंद्र मोदी ने

अयोध्‍या फैजाबाद में रैली करने के लि‍ए बहुत सारे मैदान हैं। बचपन से आज तक देखता आया हूं कि‍ राजनीति‍क रैलि‍यों के लि‍ए दो मैदान (लालकुर्ती कैंट और गुलाबबाड़ी) का मैदान लगभग सभी दलों को मुफीद लगता रहा है। दोनों ही मैदान खासे बड़े हैं और शहर के दो छोरों पर हैं। ऐसे में राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान में, जि‍समें 6-7 हजार से ज्‍यादा की भीड़ कि‍सी भी तरह से नहीं आ सकती है, वहां राम की फोटो लगाकर हिंदू गर्जना करने के नि‍हि‍तार्थ क्‍या हैं, इसे थोड़ा समझने की जरूरत है। काबि‍लेगौर है कि‍ यह गर्जना ऐसे माहौल में की गई, जब शहर दंगे के दर्द से नि‍कलने की कोशि‍श में था और यह भी कि‍ शहर में यकीनन बेतरतीब तनाव, डर, घृणा, आक्रोश जैसी भावनाएं बेभाव में तैर रही थीं।

इससे पहले कि कि‍सी रि‍जल्‍ट पर पहुंचा जाए, एक बार राजकीय इंटर कॉलेज के आसपास की भौगोलि‍क स्‍थि‍ति‍ समझ लेनी चाहि‍ए। जीआईसी के मेन गेट के सामने ही एक मशहूर मस्‍जि‍द है जो अपनी तार्किक तकरीरों के लि‍ए मुस्‍लि‍मों में ही नहीं, हिुदओं में भी एक सदभाव की नजर से देखी जाती रही है। इस मस्‍जि‍द के बगल से ही मुस्‍लि‍म आबादी का मोहल्‍ला कसाबबाड़ा शुरू होता है जि‍सकी सीमा फतेहगंज चौराहे पर जाकर खत्‍म होती है। जीआईसी के मेन गेट की दाहि‍नी तरफ की आबादी में 70 फीसद से ज्‍यादा मुस्‍लि‍म परि‍वार हैं। जीआईसी के पि‍छले गेट की तरफ रेल की पटरी है जि‍सको पार करके वि‍श्‍व वि‍ख्‍यात बहू बेगम के मकबरे को जाने वाली रोड है जो कि‍ बमुश्‍कि‍ल डेढ़ सौ मीटर दूर जाकर मकबरा ति‍राहे पर मि‍लती है। वहां भी मुस्‍लि‍म मि‍श्रि‍त आबादी है। जीआईसी के बाईं तरफ प्रिंसि‍पल का मकान है जि‍सको पार करते ही फि‍र से मुस्‍लि‍म आबादी है। यहां पर याद दि‍ला दें कि‍ दो साल पहले फैजाबाद में वि‍जयादशमी के दि‍न दंगे की चिंगारी जीआईसी के मेन गेट से लेकर फतेहगंज चौराहे के बीच ही भड़की थी। फतेहगंज भाजपा को समर्थन देने वाले बनि‍या व कायस्‍थों का इलाका है जि‍समें गाहे बगाहे कुर्मी और पंडि‍त भी रहते देखे जा सकते हैं।

अब जो पहला सवाल जेहन में उठता है कि लालकुर्ती और गुलाबबाड़ी जैसी सेफ और जनता के लि‍ए सुवि‍धाजनक मैदानों को छोड़ एक मुस्‍लि‍म आबादी के बीच हिंदुत्‍व की हुंकार बाकायदा राम की तस्‍वीर के साथ क्‍यों भरी गई। आखि‍र वह कौन सा कारण रहा होगा जो दो साल से रि‍स रहे दंगे के घाव को बजाए भरने के, उसे और खोदने की कोशि‍श की गई। एकबारगी दि‍माग जवाब देता है कि सत्‍ता प्राप्‍ति‍। और शायद यही पहला जवाब भी होगा। लेकि‍न जि‍स तरह से जीआईसी मैदान में नरेंद्र मोदी ने जहर उगला है, कसाबबाड़ा के मुसलमान सत्‍ता प्राप्‍ति‍ के सवाल से जरा सा भी मुतमईन नहीं हैं। मेरे कई दोस्‍तों ने साफ कहा कि अगर मोदी सत्‍ता में आते हैं तो जाहि‍राना तौर पर उनकी आंख में मुस्‍लि‍मों के लि‍ए बाल जरूर रहेगा, जैसा कि मोदी की क्राइम केस हि‍स्‍ट्री हमें पहले भी बताती आई है।

मतदान वाले दि‍न शहर में कई लोगों से बातचीत करने के बाद जो नि‍ष्‍कर्ष नि‍कला, जि‍स तरह से नरेंद्र मोदी की जीआईसी मैदान में रैली आयोजि‍त की गई, उसका पूर्वानुमान लगाना कोई कठि‍न नहीं था। जीआईसी में हुई रैली के चलते जो मुस्‍लि‍म वोट पारंपरि‍क रूप से समाजवादी पार्टी में जाता था, वह भी पलटकर कांग्रेस के पास आ गया। और ये सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही नहीं हुआ, लखनऊ रोड पर रुदौली तक और इलाहाबाद रोड पर तकरीबन बीकापुर तक मुस्‍लि‍म मतदाताओं की एकजुटता कांग्रेस के प्रति‍ दि‍खाई/सुनाई दी। यह वही इलाका है जो दो साल पहले भीषण दंगे की चपेट में आया था। ये वही दंगा था जि‍सकी चिंगारी जीआईसी मैदान से भड़की और आगजनी चौक में शुरू हुई। जीआईसी मैदान में सभा करने का साफ मतलब था कि हिंदू मतों का साफ वि‍भाजन। अब ये वि‍भाजन भले ही दंगे की शक्‍ल में होता तो इससे भी नरेंद्र मोदी को कोई खास मतलब नहीं था। हजारों करोड़ रुपये के खर्च में सौ पचास लोगों की जान भी चली जाए तो मुझे नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी को कोई खास फर्क पड़ने वाला है या था। फर्क पड़ता होता तो अब तक भगोड़ा ना साबि‍त हुए होते। इस बार के मतदान में कांग्रेस एक तरह से फैजाबाद में सांप्रदायि‍कता वि‍रोध और धर्मनि‍रपेक्ष राजनीति‍ का परचम वोट के लालच में ही सही, पर उठाती दि‍खी, जबकि‍ इसकी भी क्राइम केस हि‍स्‍ट्री दंगों की ही रही है।

बहरहाल, फैजाबाद में दो धर्मों के बीच की खाई को पाटने की बजाए नरेंद्र मोदी इसे और गहरा करने में थोड़ा बहुत कामयाब भी हुए, वो तो अयोध्‍या (अ+युद्ध+आ=जहां युद्ध न होता हो, वहां आइये) में अभी भी गंगा जमुनी तहजीब कायम रह पाई है जो कसाबबाड़ा से लेकर कुरैश नि‍स्‍वां स्‍कूल कंधारी बजार तक के मेरे बचपन के मुस्‍लि‍म दोस्‍तों ने पूरी शि‍द्दत से बरती। जि‍स दि‍न मोदी जीआईसी के मैदान में दंगा कराने आए थे, रात भर कई दोस्‍तों के फोन आते रहे जो लगातार समुदाय में डर की चर्चा करते रहे। उन्‍हें तो यहां तक चिंता थी कि क्‍या उन्‍हें अपने मत के प्रयोग का भी अधि‍कार मि‍लेगा या उन्‍हें अपने घरों में कैद रहना पड़ेगा। राम की तस्‍वीर के साथ मंदि‍र निर्माण और राम कसम और राम राज जैसे शब्‍दों या जुमलों से कौन सा मुस्‍लि‍म मुतमईन हुआ है और रह सकता है। और वो कैसा प्रधानमंत्री होगा जो एक मुस्‍लि‍म इलाके में जाकर उनकी मस्‍जि‍द पर एक मंदि‍र निर्माण की कसम खाता है। जीआईसी में हुई सभा में कोशि‍श तो ये थी कि‍ शक्‍ति‍ प्रदर्शन कर साफ तौर पर यह संदेश दि‍या जाए कि यदि‍ आप हमारे साथ नहीं हैं तो आपका हाल फि‍र से वही कि‍या जाएगा, जो दो साल पहले कि‍या गया था। दो साल पहले भाजपा और योगी आदि‍त्‍यनाथ के गुर्गों द्वारा भड़काए गए दंगे में कई मुस्‍लि‍म भाइयों की जान गई थी और दर्जनों मुस्‍लि‍म भाइयों को अपनी रोजी रोटी से हाथ धोना पड़ा था।

इस रैली का रि‍जल्‍ट देखें (मतदान के दि‍न की प्‍वाइंट्स से बातचीत पर आधारि‍त)
1- मुस्‍लि‍मों ने खुलकर सांप्रदायि‍कता के वि‍रोध में मतदान कि‍या।
2- हिंदुओं ने खुलकर सांप्रदायि‍कता के पक्ष में मतदान कि‍या।
3- गंगा जमुनी तहजीब को मानने वालों ने भी खुलकर सांप्रदायि‍कता के वि‍रोध में मतदान कि‍या।

अब एक बार फि‍र से फैजाबाद की फि‍जां में जहर घुल चुका है जो सिर्फ और सिर्फ जीआईसी के मैदान में हिंदुत्‍व की हुंकार भरने से हुआ। आने वाले दि‍न वाकई मुश्‍कि‍ल भरे हैं, फि‍र भी, मुझे अपने शहर की गंगा जमुनी तहजीब पर भरोसा तो है, पर इस भरोसे में मोदीवादी हिंदुत्‍व के वीर्यवान आताताई दीमक लगाने की पुरजोर कोशि‍श कर रहे हैं।

आज मोदी बनारस के बेनि‍याबाग में सभा न होने देने को लेकर सांप्रदायि‍कता का जो नंगा नाच बनारस में कर रहे हैं, गनीमत है कि वो लाख कोशि‍श करने के बाद भी फैजाबाद में न हो पाया। पर ये गनीमत कब तक रहेगी, कुछ नहीं कहा जा सकता। बनारस में तो दंगा कराने की पूरी कोशि‍शें चल रही हैं।

Monday, October 28, 2013

संकट मन में लि‍ए भेड़ चरते देख रहे हैं

टेलमार्क वाया नॉर्थ कैरोलि‍ना. देखि‍ए, कांसेप्‍ट आधा चुराया हुआ है, इसलि‍ए शब्‍द भी चुराए हुए ही होंगे। इसलि‍ए पहले से ही बता दे रहे हैं कि इस चोरी चकारी में हमारा बड़ा यकीन है। अब ये दूसरी बात है कि चटनी सोका की तरह एक नया म्‍यूजि‍क जन्‍म ले ले, तो सबकुछ ओरि‍जनल ही बन जाएगा। बहरहाल, डि‍स्‍क्‍लेमर अभी से लगा दे रहे हैं कि जबसे मोदी जी खुद को खुदै प्रधानमंत्री घोषि‍त कर दि‍ए हैं, ऊ साउथ इंडि‍या मा बैइठे बाबाजी सिर्फ जाने की बात कहे और हम तो बाकायदा आ भी गए। यहां पर, नॉर्वे में हम फि‍लहाल रह रहे हैं और कुछ भेड़ खरीद लि‍ए हैं। चिंता न करें, हम कि‍सी पाउलो कोएलो से प्रेरि‍त होकर न भेड़ खरीदे हैं और न ही हम उन भेड़ों को रेगि‍स्‍तान के कि‍सी व्‍यापारी के हवाले करने जा रहे हैं। हालांकि सपने अभी भी आते हैं और सुबह उठते ही धुंधले हो जाते हैं।

हम पहले तो कैरोलि‍ना ही आए। वहां हमें फहीम मि‍ले। फहीम मि‍यां अफगानि‍स्‍तान के हैं और वहां पर उनका ऑडि‍यो कैसेट का बि‍न्‍नि‍स था। तालि‍बानि‍यों ने संगीत पर पाबंदी लगा दी और पहुंच गए फहीम की दुकान पर। वहां पर फहीम अपने चचा के लड़के मजकूर के साथ बैठके रात का बना कलेवा तोड़ रहे थे। तालि‍बानि‍यों ने कलेवा तो करने न दि‍या, उल्‍टे दुकान में आग लगाकर दोनों को बांधकर अपने साथ ले गए। कई महीनों तक अफगानि‍स्‍तान की नामालूम से पहाड़ी में इन दोनों से तब तक पत्‍थर तुड़वाए गए, जब तक कि दोनों ने आइंदा जिंदगी में संगीत को कान से न लगाने की कसम खा ली। धीमे धीमे कि‍सी तरह से दोनों ने वि‍श्‍वास जीता और एक दि‍न मौका मि‍ला तो उड़नछू होने की कोशि‍श की। फहीम तो कि‍सी तरह से नि‍कल आए, लेकि‍न मजकूर मि‍यां अभी भी वहीं कंधार की कि‍सी पहाड़ी पर दस्‍तखत कर रहे हैं।

पहाड़ि‍यों से नि‍कलकर फहीम मि‍यां कि‍सी तरह से काबुल पहुंचे। वहां उन्‍हें असद मि‍ला जो लोगों से पैसे लेकर उन्‍हें नॉर्वे भेज देता था। तालि‍बानि‍यों के यहां से भागते वक्‍त फहीम ने वहां जमा डॉलरों पर एक लंबा हाथ भी मारा था। असद ने 20 हजार डॉलर लि‍ए और उन्‍हें सड़क मार्ग से पहले तो अफगानि‍स्‍तान से नि‍काला। उसके
बाद कि‍सी तरह से उनका फर्जी पासपोर्ट बनवाया और एक वीजा उनके हाथ में थमा दि‍या। वहां से फहीम मि‍यां समुद्र के रास्‍ते इंडोनेशि‍या होते हुए नॉर्वे तक पहुंचे। न न, कि‍सी जहाज से नहीं बल्‍कि मछुआरों वाली डोंगी में बैठकर। सबूत के तौर पर फहीम मि‍यां हमसे ये वाली फोटो लगाने को बोले थे। इसमें से दाहि‍ने से तीसरे वाले हैं अपने फहीम भाई।

यहां आने पर फहीम भाई ने 32 भेड़ें खरीदीं और उनके लि‍ए एक चारागाह और रखने के लि‍ए बाड़ा। लकड़ि‍यों का एक घर भी बनवाया जि‍समें पांच खि‍ड़कि‍यां हैं। पांच खि‍ड़कि‍यों की दास्‍तान अलग है तो वो फि‍र कभी। फि‍र कभी मने, हम और फहीम जि‍स कि‍सी दि‍न कबाब वबाब खाने बैठे तो उसका भी जि‍क्र हो जाएगा। ये सारा ताम झाम फहीम ने टेलमार्क में फैलाया। कैरोलि‍ना तो वो अक्‍सर ऊन व्‍यापारि‍यों से सौदेबाजी करने के लि‍ए जाते रहते हैं। वहीं उन्‍होंने हमें बताया कि कैरोलि‍ना थोड़ा महंगा है, अगर टेलमार्क चलकर रहा जाए तो वहां धंधे पानी का भी कुछ इंतजाम हो सकता है और रहने का भी मामला सस्‍ता ही है।

और हम टेलमार्क पहुंच गए।

टेलमार्क की पहाड़ि‍यां काफी घनी हैं। बुरांश और देवदार से भरी हुई। यहां हमारी आसपास के लोगों से दोस्‍ती भी हो गई है। हमने भेड़ें भी खरीद ली हैं और उन्‍हें रोज सुबह फहीम की ही भेड़ों के साथ चरने के लि‍ए भेज देते हैं। दि‍न में कई बार खि‍ड़की पर बैठते हैं और अक्‍सर तब बैठते हैं जब फेसबुक पर आकर अपना मन खि‍न्‍न कर लेते हैं। फेसबुक की दुनि‍या नॉर्वे की दुनि‍या से अलग है। यहां फेसबुक की तरह खि‍ल्‍ल खि‍ल्‍ल क्रांति को खि‍लौना बनाने वाले लोग न के बराबर हैं। अपना सामंती दोष भाषा के माध्‍यम से नि‍कालकर ज्‍योतिबा को तू तुम कहने वाले लोग भी नहीं हैं। यहां तो बड़े तमीजदार और सलीकेदार लोग हैं। फहीम की बीवी सालेहा कभी बुर्का नहीं करती और अगर उसके सामने कि‍सी ने अपशब्‍द कहा तो वो अपशब्‍द नहीं कहती, पर 911 पर डायल करके बता देती है कि फलां ने अपशब्‍द कहा। इसलि‍ए उसे अपशब्‍द कहने की कोई हि‍म्‍मत नहीं करता। सोचता हूं कि अगर ज्‍योति‍बा होते तो अपशब्‍द कहने वालों को क्‍या कहते?