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Wednesday, September 25, 2024

ये सांप है या प्रकृति का वरदान?


ये प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर के पास पानी में तैरता आया पनडुब्बी सांप है (पानी में बैरियर वाली)। इलाहाबाद निवासी रवींद्र मिश्रा ने इसे एक जीव विज्ञानी ग्रुप पर शेयर किया है। जीव विज्ञानी इसे चेकर्ड कीलबैक के नाम से बुलाते हैं। लेकिन हम लोग इसे पनडुब्बी कहते थे। इस तस्वीर में इसका सफेद हिस्सा बहुत साफ दिख रहा है और इसपर बने चेक भी एकदम साफ दिख रहे हैं। गांव-गिरांव के तालाबों में यह अक्सर काले या स्लेटी रंग का दिखता है और पानी के बाहर इसकी गरदन बस एकाध फुट ही दिखती है।
हम लोग इसे पनडुब्बी सांप इसलिए कहते थे कि जैसे ही यह हमें आता देख, झट से डुबकी मार दे। अक्सर यह तालाब में कछुए की तरह भी सिर निकाले तैरता दिखता था, लेकिन कछुए की बहुत ही गंदी नकल करता था, तो हम लोग पकड़ पा जाते थे कि पनडुब्बी ही है। वैसे यह तालाब में ही नहीं रहता था। यह पानी से भरे धान के खेतों में भी दिखता था। चूंकि धान के खेत उथले होते हैं तो वहां यह कछुए की तरह ही तैरता था। कभी-कभार हममें से कुछ दोस्त इसकी कछुए वाली चालबाजी में गच्चा भी खा गए, और उन्होंने इसे कछुआ समझकर पकड़ने की कोशिश की। बदले में मिला एक तेज वार। पनडुब्बी काफी कटखन्ना होता है, तुरंत काटता है। बस गनीमत यही होती है कि इसमें जहर नहीं होता और गांव-जुआर के लोग यह बखूबी जानते हैं। माना जाता है कि उनके लार में थोड़ा सा जहर होता है, क्योंकि काटने पर अक्सर खुजली होती है और थोड़ी सूजन होती है।

वैसे तो दुनिया में तरह-तरह के सांप पाए जाते हैं, पानी में रहने वाले भी। समुद्री पानी में जितने भी तरह के सांप पाए जाते हैं, लगभग सभी जहरीले होते हैं। कई तो इतने कि घंटे भर में अगर इलाज ना मिला तो जान निकलने में देर नहीं लगती। लेकिन पनडुब्बी धरती नाम के गोले में बस इसी ओर मिलता है। इसी ओर भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में। थोड़ा बहुत यह जावा, सुमात्रा, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, दक्षिणी चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में भी पाया जाता है, लेकिन थोड़ा बहुत ही।
पनडुब्बी घासफूस नहीं खाता, और वैसे भी कोई सांप घासफूस नहीं खाता। सापों की देह की बुनावट ही कुछ ऐसी है कि उन्हें हाई प्रोटीन आहार चाहिए होता है। तो अपने कीलबैक महाराज मछलियों और मेंढक का सेवन करते हैं, चर्बी सहित। साहब बेहतरीन तैराक हैं और हमला करने में मगरमच्छ की कॉपी करते हैं, मतलब धीमे धीमे चुपचाप आना और अचानक झपट्टा मारना। लेकिन जब इस पर हमला होता है तो यह अपने शरीर को चपटा कर लेता है और फुफकारने जैसी आवाज़ें निकालता है ताकि दुश्मन को डराया जा सके। इसके चपटे शरीर के कारण यह बड़ा और खतरनाक दिखाई देता है, जिससे दुश्मन डर कर पीछे हट जाए। लेकिन अगर कोई इसे अच्छे से जानता हो तो वह शायद ना डरे।
और अगर कोई इससे ना डरे तो ये बेचारा खुद डर जाता है। फिर यह तेजी से भागने की कोशिश करेता है और आमतौर पर पानी में कूद जाता है, जहां यह आसानी से तैर सकता है और शिकारियों से बच सकता है। यह एक नंबर का नाटकबाज होता है और अपने आप को बड़ा दिखाने, फुफकारने और छिपने का प्रयास करता है ताकि खतरे से बच सके। इसमें कोई बेजा बात नहीं है। इंसान भी तो यही करता है, चाहे वो किसी का भी नुकसान ना कर पाए।
चेकर्ड कीलबैक के इवोल्यूशन पर केंद्रित कोई विस्तृत शोध नहीं है। यानी यह सांप कैसे बना, इसकी देह पर चेक्स कैसे बने, इसने पानी में रहना कैसे शुरू किया, इसने चपटा होना कैसे डिवेलप किया- इस तरह की बातों के सीधे-सीधे कोई जवाब हमारे सामने नहीं हैं। अगर किसी को इन सवालों के जवाब चाहिए, तो शायद पूरी एक उम्र लगानी होगी और वो हम भारतीयों के पास है नहीं। हम तो अभी तक कुत्तों को नहीं समझ पाए हैं, सांप तो बहुत दूर की चीज है। भले ये सांप-सपेरों का देश कहा जाता हो दुनिया भर में, लेकिन सांपों को लेकर हमारे यहां किसी भी लेवल की जागरूकता नहीं है।

ये सब तो बतकुच्चन है, असल बात ये है कि एक दूसरा रास्ता है जो कीलबैक चिचा के इवोल्यूशन से जुड़े कुछ मिलते जुलते जवाब दे सकता है। कीलबैक न सिर्फ तालाब के पानी या धान के खेतों में घुलमिल जाता है, बल्कि आप इसे ध्यान से देखेंगे और इससे मुलाकात और मुकालात करने वाले अच्छे से जानते हैं कि ये झाड़-झंखाड़ और घास में भी छुपे हुए होते हैं। ऐसे में हमें चलना होगा सांपों के छलावरण और प्राकृतिक चयन पर हुए शोधों की तरफ, जो इस सांप के इवोल्यूशन की समझ को बेहतर बनाते हैं।
इन अध्ययनों में से एक थोड़ा ध्यान खींचता है और सवाल के सबसे पास पहुंचता है। इसके मुताबिब सांपों का रंग और पैटर्न का कनेक्शन उनकी प्रजनन सफलता के साथ भी है। जिन सांपों के पास बेहतर छलावरण होता है, वे न केवल शिकारियों से बचने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे बेहतर तरीके से शिकार भी कर पाते हैं। यह उन्हें अधिक समय तक जीवित रहने और प्रजनन करने का अवसर देता है, जिससे उनके अनुकूल जीन पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार, चेकर्ड कीलबैक जैसे सांपों का चेक पैटर्न केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता को भी बढ़ाता है​।
चेकर्ड कीलबैक में कई गोल दांत होते हैं, जो फिसलन वाली मछलियों को पकड़ने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, लेकिन आसानी से खून बहने का कारण बन सकते हैं। यह बताता है कि इसका इवोल्यूशन धरती से पानी की ओर भी हो सकता है। वैसे भी सांपों की इवोल्यूशन थ्योरी यह भी इशारा करती ही है कि सांपों के पूर्वज टेट्रापोड्स (चार पैरों वाले सरीसृप) थे, जो जमीन पर चलते थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि सांपों के पूर्वज स्क्वामेट्स (Squamates) नामक सरीसृप वर्ग से थे, जिनमें छिपकलियां और सांप दोनों शामिल हैं। सांपों का विकास समुद्री और जमीन दोनों प्रकार के जीवन से जुड़ा रहा है, और वे धीरे-धीरे अपने चार अंगों को खोते गए और एक लंबा, बिना अंग वाला शरीर विकसित किया।
सांपों के विकास को समझने के लिए कई फॉसिल्स (जीवाश्म) का अध्ययन किया गया है। सबसे पुराने सांपों के फॉसिल्स में अंगों के अवशेष पाए गए हैं, जो बताते हैं कि उनके पूर्वज चार पैरों वाले जीव थे। यह भी देखा गया है कि सांपों का विकास छिपकलियों के समान हुआ है, जिनसे वे अपने शरीर के अंग खोकर अलग हुए। समय के साथ कुछ सांपों ने समुद्र और जलाशयों में जीवन के लिए खुद को अनुकूलित किया, जबकि अन्य ने जमीन पर रहना पसंद किया।
जैसे-जैसे उनके पर्यावरण के अनुसार सांपों की आदतें बदलती गईं, उनके शरीर में भी बदलाव आते गए। जमीन पर रहने वाले सांपों ने अपनी त्वचा के रंग और पैटर्न को इस तरह विकसित किया, जिससे वे अपने परिवेश में छिप सकें और शिकारियों से बच सकें। वहीं पानी में रहने वाले सांपों ने लाखों वर्षों के इवोल्यूशन के दौरान तैरने की क्षमता को विकसित किया। इस अनुकूलन ने उन्हें जल निकायों में शिकार करने और शिकारियों से बचने में मदद की।

भारत में चेकर्ड कीलबैक (Xenochrophis piscator) तो है ही, ओलिव कीलबैक (Atretium schistosum) भी है जो नदियों, तालाबों और झीलों के पास पाया जाता है। इसका आहार मुख्य रूप से जलीय जीव होते हैं, और यह तैरने में कुशल होता है। डार्क-बेलीड मार्श स्नेक (Gerarda prevostiana) भी मिलता है जो मुख्य रूप से पश्चिमी घाट और भारत के तटीय क्षेत्रों में रहता है। यह जलीय शिकारियों से बचने और कीचड़ भरे इलाकों में तैरने में सक्षम होता है। एशियाई वाटर स्नेक (Homalopsis buccata) भी है जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में ताजे पानी के स्रोतों के पास पाया जाता है। यह धीमी गति से बहने वाली नदियों और तालाबों में मछलियों और अन्य छोटे जलीय जीवों का शिकार करता है। फॉरस्टेन्स कैट स्नेक (Boiga forsteni) भी है जो तैरने में सक्षम तो होता ही है, पेड़ों पर चढ़ने में माहिर होता है। यह सांप पानी में भोजन की तलाश में उतर सकता है।
मैं जानता हूं, मगर चलते चलते बस एक आखिरी सवाल। पनडुब्बी इस संसार में है क्यों? चेकर्ड कीलबैक हमारे साथ रह क्यों रह रहा है? दरअसल चेकर्ड कीलबैक सांप प्रकृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके व्यवहार और शिकार संबंधी आदतें इसे पारिस्थितिकी तंत्र का एक आवश्यक हिस्सा बनाती हैं। यह मुख्य रूप से मछलियों, मेंढकों, और छोटे जल जीवों का शिकार करता है। यह इन प्रजातियों की आबादी को नियंत्रित करता है, जिससे पानी के निकायों में शिकार-शृंखला संतुलित रहती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य प्रजातियों को भी जीवित रहने का मौका मिलता है।
इसके बिना, इन प्रजातियों की आबादी अनियंत्रित रूप से बढ़ सकती है, जिससे जल निकायों की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है​। चेकर्ड कीलबैक छोटे जल जनित कीड़ों और उनके लार्वा को खाता है, जो कृषि क्षेत्रों में एक तरह के कीट होते हैं। यह सांप इन कीटों की संख्या कम करता है, जिससे फसलों को नुकसान कम होता है और कीटनाशकों पर निर्भरता घटती है। इस प्रकार, यह सांप प्राकृतिक कीट नियंत्रण के रूप में कार्य करता है और हमारी धान की पैदावार बढ़ाता है। आगे से अगर आप चावल का एक कौर भरें तो एक बार कीलबैक यानी पनडुब्बी चिचा का भी शुक्रिया अदा करें।

सबसे बड़ी बात यह कि सबसे ज्यादा कुर्बानियां भी पनडुब्बी के ही हिस्से में आई हैं। यह सांप न केवल शिकार करता है, बल्कि खुद भी बड़े पक्षियों और अन्य शिकारियों के लिए भोजन का स्रोत है। चील हो, बगुला हो या फिर मगरमच्छ या घड़ियाल ही क्यों न हो, सबको इसका स्वाद पसंद है। यह चक्र है जो कि पारिस्थितिक तंत्र की विविधता को बनाए रखने में मदद करता है, क्योंकि यह अन्य शिकारियों के लिए भोजन के रूप में काम करता है, जिससे उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक संतुलन बना रहता है​।
अंत में, यह हमारा सफाईकर्मी भी है क्योंकि यह वहां भी रहता है, जहां पानी के निकाय होते हैं। यह पानी में रहने वाले छोटे मृत या बीमार जीवों को खाकर पानी को साफ रखने में मदद करता है। इसके परिणामस्वरूप, जलाशयों की स्वास्थ्यवर्धक स्थिति बनी रहती है और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल पर्यावरण सुनिश्चित होता है​। मेरे ख्याल से इतना प्रकृति की इस महान पनडुब्बी को सलाम करने के लिए काफी होगा।

Sunday, October 2, 2022

वैष्णव की नई फिसलन

वैष्णव का होटल चल निकला था। शहर भर में धूम थी। बाहर से जो भी आता, स्टेशन पर ही उसे होटल का शानदार विज्ञापन दिखता। विज्ञापन तो और भी थे, लेकिन वैष्णव के होटल जितना बड़ा विज्ञापन और कोई नहीं था। फिर बत्ती भी उसी विज्ञापन पर जलती। वैष्णव ने बिजली विभाग से मिलकर जुगाड़ गांठ रखा था कि किसी और के बोर्ड पर बत्ती जले, तो तुरंत उसे नोटिस पहुंचा दिया जाए। 

वैष्णव ने सारे सवालों को उठने से पहले ही समाप्त कर दिया था। वह खुश था। पहले प्रभु की आरती में कड़वे तेल की बत्ती जलाता था, अब देसी घी की बत्तियां जल रही थीं। सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन होटल का मुख्य रसोइया भाग गया। 

ऐसा नहीं था कि वैष्णव उसे अच्छी तनख्वाह नहीं दे रहा था। मगर रसोइए को प्रेम हो गया था और वैष्णव उसे छुट्टी नहीं दे रहा था। छुट्टी के अलावा वैष्णव ने उसे ढेरों कसमें दीं, मगर जिन्होंने प्रेम किया है, वे जानते हैं कि प्रेम तो प्रेम ही होता है। चींटी की तरह प्रेमियों के भी पर निकल आते हैं। 

यह भीषण आपदा थी, जिसके बारे में प्रभु ने वैष्णव को सपने में भी नहीं बताया था। वैष्णव ने प्रभु को उलाहना दी। माथा प्रभु की चौखट से टेक दिया। प्रभु ने सुन ली। वैष्णव आकर गल्ले पर बैठा तो देखा कि रसाइयों की कतार लगी है। सभी रसोइयों की विधिपूर्वक परीक्षा हुई। सबने एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन बनाकर दिखाए। 

मगर एक रसोइया था, जिसने कुछ भी बनाकर नहीं दिखाया। बल्कि वह परीक्षा देने वाले रसोइयों की लाइन में भी खड़ा नहीं हुआ। वह फूड इंस्पेक्टर का भतीजा था और लाइसेंस कमिश्नर का साला भी। वैष्णव ने उससे पूछा, ‘क्या बनाते हो?’ रसोइया बोला, ‘मैं किसी भी तरह का लाइसेंस बनाता हूं।’ 

वैष्णव संतुष्ट हुआ। फिर उसने पूछा, ‘और अगर किसी ग्राहक को तुम्हारा लाइसेंस पसंद न आया तो?’ रसोइया बोला, ‘सीएमओ मेरे चाचा लगते हैं, ग्राहक का इलाज हो जाएगा।’ और अगर तुमको भर्ती करने पर बाकियों ने शोर मचाया तो? वैष्णव ने पूछा। ‘लेबर कमिश्नर मेरे जीजा हैं।’ 

यह सुनते ही वैष्णव ने बाकी रसोइयों को यह बोलकर वापस किया कि परिणाम रजिस्टर्ड डाक से आपके घर भेज दिए जाएंगे, और उस रसोइए को रख लिया। जब बाकी रसोइयों को इसका पता चला तो उन्होंने हंगामा कर दिया, धरने पर बैठ गए। कहने लगे कि हमारी योग्यता प्रमाणित है, फिर भी हमें नहीं रखा गया। 

वैष्णव डर गया। फिर से प्रभु के पास पहुंचा। प्रभु ने पूछा, ‘तुम वैष्णव हो?’ हां प्रभु। ‘फिर तुम झूठ कैसे बोल सकते हो?’ वैष्णव की बत्ती जल गई। उसने तुरंत बयान जारी किया कि नियुक्ति पूरे पारदर्शी तरीके से हुई है। प्रभु के अलावा हम और किसी की भी सिफारिश नहीं मानते। 

बात प्रभु की थी। सारे असंतुष्ट वापस चले गए। फिर वैष्णव ने होटल के बगल एक जमीन खरीद ली, और सीएमओ की मदद से उस पर तुरंत एक अस्पताल बनवा लिया। अब वैष्णव लाइसेंसी खाने के साथ लाइसेंसी इलाज भी करने लगा।

Thursday, March 8, 2018

मैं महुआ बीनता हूं, आपको भी महुआ मिले

यह मेरी सफलता नहीं है। यह बिक चुकी भारतीय पत्रकारिता की असफलता है। लोगों को ताकत चाहिए। ताकत इन्फॉरमेशन से मिलती है, जो इंडियन मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म नहीं दे पा रहा है। इंटरनेट ने ताकत चाहने वालों के सामने खुला खेत खोल दिया है। लोग ताकत ले रहे हैं, खेत जोत रहे हैं। लोग एक लाख घंटे से ज्यादा की ताकत पी चुके, वह भी तीन महीने में। तीन महीने पहले मैं मेनस्ट्रीम मीडिया से बुरी तरह से ऊब गया। टीवी तो वैसे भी नहीं देखता, लेकिन अखबार और इंटरनेट पर दिखते यलो जर्नलिज्म से मन खट्टा हो गया। तय किया कि सबकुछ असांजे की ही तर्ज पर करूंगा। खुद से वादा किया कि जो जैसा है, वैसा ही सामने रखना है, बगैर किसी ड्रामा के। किसी ने पूछा कि तुम बोलते हो या मशीन? उसके सवाल में मुझे मेरा जवाब मिल गया। असांजे गुरु, क्या सिखा दिया बे तुमने? जीवन में कभी वीडियो नहीं बनाई थी। प्रिंट का हूं, कैसे बनाता और क्यों ही बनाता? फिर दस दिन तक वीडियो बनाने वालों का पीछा करता रहा कि कुछ सिखा दें, मगर मुझे सिखाना उन्हें अपनी नौकरी का संकट लगा। फिर दुनिया के पास गया। बोला कि सिखाओ, और दुनिया ने वीडियो बनाना सिखा दिया। दुनिया है ना, सब सिखा देती है। मुझे पता है कि मैं वाहियात वीडियो बनाता हूं। उसमें कला कहीं नहीं होती। कला करनी भी नहीं है मैंने। सूचनाओं में कला होनी भी नहीं चाहिए, उनके अर्थ बदल जाते हैं। सूचनाएं कला करने में स्वयं सक्षम हैं, बशर्ते कोई दे तो सही। कोई बताए तो सही। अगर कहूं कि मैं सूचनाएं देता हूं तो यह पूरी तरह से गलत और झूठ होगा। मैं सिर्फ मैनेजर हूं, कलेक्टर हूं इन्फॉरमेशन का। सूचनाएं हमारे सामने ही होती हैं, बस हम फर्क नहीं कर पाते। सामने की सारी सूचनाएं इसी दुनिया से इकट्ठा करता हूं और इसी को दे देता हूं। जो है, वह सबका है, सबके लिए है। मैं महुआ बीनता हूं। नाक में महुआ बसा है। आपको भी महुआ मिले, मिलता रहे, इसी खुशबू के साथ-

सवा लाख से एक लड़ाऊँ 
चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ 

तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ

MORE POWER TO YOU..
MORE RISING TO YOU..

Saturday, January 16, 2016

नई कि‍ताब डि‍स्‍कवरी ऑफ सेल्‍फ

मुहल्‍ले के बुजुर्ग जि‍स तरह से तौबाओं को तड़ातड़ तोड़ रहे थे, आखि‍रकार पि‍छले बुधवार को भाई को शर्म आ ही गई। कि‍स तरफ से आई और आकर अभी तक गई या नहीं, भाई ने इस बारे में कुछ भी बताने से साफ इन्‍कार तो कर दि‍या अलबत्‍ता ये जरूर बताया कि अब वो अपने घर में बकरी और भेड़ पालने लगा है। आते जाते रस्‍ते में मि‍लने वाली आवारा गाय और बैल पर हाथ फेरते फेरते भाई को ये क्रांति‍कारी आइडि‍या आया कि इंसान न सही तो कोई बात नहीं, सहलाया तो भेड़ और बकरी को भी जा सकता है। अब न तो अंग्रेज रहे, न यशपाल और न वो लखनऊ कि भेड़ बकरी को सहलाने पर अंग्रेज खुद कि‍सी एंग्‍लो इंडि‍यन की औलाद को पकड़ ले जाएं।


अब हालात कुछ इस तरह से हैं कि मुहल्‍ले के तमाम बुजुर्ग अपनी तोड़ी हुई तौबाओं की गदराई कमर में हाथ डालकर मेले में अपने रोज ठेलने का कि‍स्‍सा बयां करते सुने देखे और पकड़े जा सकते हैं। उन्‍हें ऐसा करते देख भाई भी कभी बकरी का कान पकड़के सहलाता है तो कभी घर के चबूतरे पर बैठकर भेड़ों के बालों में हाथ फेरता है। भाई ने ये भी बताया कि सुख का सिर्फ एक ही अर्थ होता है जि‍से सुख ही कहते हैं। उसके आने का भी वही एक प्राचीन रास्‍ता है फि‍र चाहे को तौबा तोड़े या भेड़ बकरी बि‍ल्‍ली सहलाए।

अपने सुख की सर्वकालजयी कथा के लि‍ए भाई ने अब तय कर लि‍या है कि अंदी बंदी नंदी की जगह अब वह अपने लि‍ए अपनी नई कि‍ताब डि‍स्‍कवरी ऑफ सेल्‍फ लि‍खने जा रहा है। इसके आठ खंडों में प्रकाशन के लि‍ए भाई की वाणी प्रकाशन वालों से बात हो गई है। भाई ने ये भी दावा कि‍या है कि इसके देखने मात्र से प्राणी के जीवन में दुख भरी चि‍ड़चि‍ड़ी वासनाओं की शुरुआत हो जाएगी। वाणी वालों ने न छापी तो वो अपना खुद का प्रकाशन गि‍रोह खोल लेगा। वैसे भी जि‍न अश्‍कों को बहना ना आया, उनने प्रकाशन गि‍रोह बना लि‍या।

इसी जोश में भाई ने हाल फि‍लहाल फि‍र से तौबा तोड़ने वाले एक बुजुर्ग कवि से इसका जि‍क्र कर दि‍या तो कवि ने कहा कि वो तो कम से कम 16 खंडों में अपनी कवि‍ताएं छपवाएगा। इससे कम में वह कि‍सी भी कीमत पर राजी नहीं होगा फि‍र भले ही उसकी तोड़ी हुई तौबा मचलकर कि‍सी सदन लश्‍यप के हाथ जाकर लग जाए। क्‍या जुल्‍फ क्‍या जुगल, कवि‍ताओं व कामनाओं का मुग़ल बनने से बुजुर्ग कवि को भाई भी नहीं रोक पाएगा, ऐसा भाई का वि‍श्‍वास है और ऐसा ही भाई ने मुझे बताया।

भाई खुश है। अब उसके पास एक भेड़ है, एक बकरी है, जि‍न्‍हें रात में वो कमरे के अंदर बांधने का दावा करता है कि पहाड़ों में ठंड बहुत होती है।

मैं खुश हूं। मेरे पास भी एक बि‍ल्‍ली है। मैं उसे रात या दि‍न, कभी भी नहीं बांधता।

(नोट: बुजुर्ग शब्‍द भाई ने प्रयोग कि‍या है। इससे कि‍सी को दुख हो तो मैं भाई की तरफ से क्षमाप्रार्थी हूं।)

Monday, January 16, 2012

हम देखेंगे.

उन दिनों

जब जमीन से उठती सफेदी
कर देगी तर आसमान,
और ढँक जायेगा पीला सूरज
जमीन की उसी सफेदी से,
हम देखेंगे.

उन दिनों
जब घने लहरिया पेड़ों से
उड़ जाएँगी बौराई चिड़ियाँ
काटेंगी, चीरेंगी, बनायेंगी रास्ता
असमान मे छाई सफ़ेद धरती मे
हम देखंगे

उन दिनों
जब असमान से बरसता लोहा
पत्तों को कर देगा हरा
जमीन पे फूटेंगी गेंहू की कोपलें
बिरवे लेंगे मदमस्त अंगडाई
हम देखेंगे

उन दिनों
जब सारे बच्चे होने अपने पिताओं की गोद मे
माएं ओखली मे कूटेंगी बरसते लोहे की धार
पिसेगा पिसान और जलेंगे चूल्हे
हम देखेंगे

तब तक साथी, हम चलेंगे
चलते रहेंगे, करते रहेंगे तलाश
हमें पता है-जरूर मिलेंगे वो दिन
भले ही मिले वो उन दिनों
हम देखेंगे

Friday, December 23, 2011

साहस

फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करते ही लगातार कमेंट आने शुरू हो गए थे। कोई कुछ कह रहा था तो कोई कुछ। इसी बीच किसी ने प्रोफाइल पर एक फोटो भी टैग कर दिया था। फोटो था कि किसी थाली में एक बच्ची रोटी से ढंककर रखी हुई थी। उधर वॉल पर लोग लगातार पोस्ट पर पोस्ट किए जा रहे थे मानो बरसात के बाद की हरी घास उगने से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। कमेंट की कोपलें भले ही न फूट रही हों पर पोस्ट के पोस्ट हरे होकर लहलहा रहे थे। टि्‌वटर का भी काफी कुछ यही हाल था लेकिन इन सबके बीच चाय की खत्म हो गई पाी की चिंता सता रही थी। अब चाय की पाी खत्म होने की चिंता तो फेसबुक पर पोस्ट तो की नहीं जा सकती थी। कुछ चाय की तलब तो कुछ लिखने की मजबूरी और काफी कुछ अकेलेपन ने अपूर्वा को बाजार की तरफ धकेल ही दिया। कम से कम बाजार में भीडङ्ग तो मिलेगी। लोग दिखेंगे, लोगों के चेहरे दिखेंगे। जाड़ों में बोरोलीन की चिपचिपाहट से भरे चेहरों में कुछ तलाश शायद खत्म हो। या कुछ तलाशने की कोशिश ही की जाए। अब ये तलाश कोई दो सलाई लेकर स्वेटर बुनना तो है नहीं कि दो सलाइयां एक दूसरे से भिड़ाते रहे और दिन भर में एक आस्तीन तो बुनकर रख ही दी। गाना भी याद आ रहा था...मेरा कुछ सामान...तुहारे पास पड़ा है, मेरा सामान लौटा दो....खैर बाजार में भीड़ तो ज्यादा नहीं थी लेकिन रोशनी भरपूर थी। दुकानदार ने चाय की पाी का पैकेट देते वक्त हौले से हाथ सहला दिया। अपूर्वा कुछ नहीं बोली। भला लगा या बुरा, इसका भी チयाल नहीं आया। पैसे दिए तो पैसे लेते वक्त भी उंगलियां जानबूझकर सहला दीं। अपूर्वा को महसूस तो हुआ सहलाना पर भावना महसूस नहीं हुई। दरअसल अकेलेपन में अपूर्वा की छुअन कुछ मर सी चुकी थी। मकान मालकिन बुलाती रह जातीं, पर वो बगैर जवाब दिए ही सरपट सीढ़ी चढ़ती चली जाती।

चाय की पाी तो घर में आ चुकी थी पर चाय पीने की इच्छा सूख चुकी थी...बिलकुल उसी चाय की सूखी हुई पाी की तरह। हिप पर कुछ मांस ज्यादा हो रहा है, शीशा देखते समय अपूर्वा ने सोचा। लेकिन हो भी तो या? करना या है? किसे दिखाना है? फिर ये सोचना ही यों कि हिप पर कुछ मांस ज्यादा हो रहा है। शीशा देखा, मुंह धुला और लैपटॉप लेकर फिर से बिस्तर में घुस गई। ये जितने भी लड़के फेसबुक या टि्‌वटर पर हैं, सब साल भर के ही साथी होते हैं। साल भर बाद या तो लड़के मुझसे बोर हो जाते हैं या फिर मैं इन लड़कों से बोर हो जाती हूं। छुअन मर चुकी है तो या हुआ, अपना छुआ हुआ तो महसूस होता है। कंप्यूटर की घड़ी बता रही थी कि रात के पौने नौ हो चुके हैं। जैसे जैसे रात काली होती जाती है, छुअन की चाहत और उजली होकर भक से सामने आ जाती है। अब छोड़ो भी, जब तय कर लिया कि अकेले ही खड़े होना है तो अकेले ही खड़े होना है। इस बार फेसबुक नहीं खोलूंगी। अपूर्वा ने सोचा। जीमेल खोला तो फेसबुक पर आए ढेरों कमेंट मुंह बाए सामने रखे हुए थे। लेकिन एक भी वो कमेंट नहीं था, जिसकी अपूर्वा को तलाश थी। जो उसे कब्र से निकाल कर कब्रिस्तान की हरियाली दिखाए। कब्रिस्तान के पुराने दरチतों से फूटती ताजी कोपलों की लाली से जो रस टपकता है, उसका स्वाद दिलाए...कोई ऐसा कमेंट करने वाला मिला ही नहीं।
रात के साढ़े दस बज गए थे। अपनेपन के गहरे नशे में डूबी अपूर्वा को पता ही नहीं चल पा रहा था कि घड़ी आखिरकार इतनी तेजी से भाग कैसे रही है। ये अपनापन भी अजीब चीज है। हम जानते हैं कि हम हैं फिर भी हम मानने के लिए तैयार ही नहीं होते कि हम हैं। हम अपनी परिकल्पना बगैर किसी दूसरे के कर ही नहीं पाते। ठीक वैसे ही जैसे कि रेखागणित या बीज गणित। एक दूसरे के बराबर कैसे होगा। या एक दूसरे के बराबर किस सिद्धांत से होगा। स्टेटस तो अपूर्वा ने अपडेट नहीं किया, अलबाा उंगलियां फोड़ने में लग गई। एक उंगली फूटी तो दूसरी फोड़ी, दूसरी फोड़ी तो तीसरी फोड़ी....पर ये कैसे समझ में आएगा कि हम अकेले ही हैं। कैसे समझ में आएगा। भले ही सपने में देख ले कि रामलीला के सारे किरदार उसके साथ होली खेल रहे हैं। उसके सीने पर... उसके हिप्स पर रंग लगा रहे हैं...फिर भी वह छुअन महसूस ही नहीं कर पा रही है। या रामलीला के सारे किरदार झूठे हैं?
जारी....

Tuesday, January 26, 2010

दूध सी सफेदी ....

प्रचार ऐसा माध्यम है जो किसी भी समाज की मानसिकता को पकड़ने का सबसे आसान जरिया होता है। प्रचार के कई तरीके होते हैं, लेकिन प्रचार की सभ्यता का सबसे शशक्त माध्यम दृश्य श्रव्य यानि कि रुपहला पर्दा ही है- चाहे वो छोटा हो या बड़ा। ये सोचना आसान है कि परदे पर तैरती चीजों की परिकल्पना आसान रही होगी लेकिन उन परिकल्पनाओ मे या उनके द्वारा दिखाया क्या जाय, ये सोचना कदरन मुश्किल रहा होगा। जिसे देखना काफी आसान लगता है, और उससे भी ज्यादा आसान रिमोट से उसे बदल देना, उसके पीछे एक जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिकता जुडी हुई है। और इस काम मे डॉक्टर से लेकर इंजिनियर, कलाकार से लेकर अंतरिक्ष की टेक्नॉलोजी जुडी हुई है। इतना ही नहीं, इस काम मे वो सारे आर्थिक सामाजिक सर्वे, अध्ययन भी जुड़े हुए हैं, जो अपने को पूरा करके अपने बौद्धिकता का जबरदस्ती ढोल पिटते हैं। लेकिन उन ढोलों की आवाज से छनकर जो चीज बाहर आती है, वो देखने,समझने मे इतनी आसान होती है, कि उसकी एक एक मामूली सी चीज भी किसी प्रोडक्ट को अरबो रुपयों, डॉलरों का फायदा पहुचती है। इसका मतलब तो ये हुआ कि मानव जीवन के सारे क्रियाकलाप उसे आसान बनाने के लिए हैं, न कि उसे रास्ता दिखने के लिए। खैर, मैं ये मानता हू कि न तो कुछ आसान है और न ही कुछ मुश्किल-क्योकि ये एक प्रक्रिया मात्र है, जीवन की सतत प्रक्रिया। प्रचार विज्ञापनों के माध्यम से किया जाता है और विज्ञापन अमुक वस्तु की विशेषता बताते हुए उसे दर्शक को उसकी तरफ इतना आकर्षित करते हैं की दर्शक उसे खरीदने के लिए मजबूर हो जाये। ध्यान नहीं आता कि पहला सचल विज्ञापन क्या रहा होगा, लेकिन जबसे होश संभाला है, निरमा वाशिंग पावडर का विज्ञापन ही सबसे ज्यादा और पुराना याद आता है। पंच लाइन थी- दूध सी सफेदी, निरमा से आये, इसके साथ गृहणियों के हाथ और कपड़ो के रंग की भी चंद लाइने थी। मध्यम वर्ग की घरेलू मुश्किलात से निकला ये विज्ञापन आज भी सुपर हिट है, भले ही इसमें काम करने वाले लोग बदल गए हो। मजे की बात की पंच लाइन भी वही है। यही से इसी तरह के उत्पाद बनाने वाली दूसरी कम्पनियों ने भी भारतीय माध्यम वर्ग की इस मानसिकता को पकड़ा। गजब की बात तो ये की पिछले तीस सालों मे इस मानसिकता मे जरा सा भी परिवर्तन नहीं आया है। अभी भी तक़रीबन सारे कपडे धोने वाले विज्ञापनों मे हाथ और रंग की ही बात होती रही है। क्यों न इसका ये मतलब निकला जाय की उदारीकरण के तकरीबन डेढ़ दशक से ज्यादा बीतने के बाद भी अभी तक उस माध्यम वर्ग के पास, जिसके पास टी वी तो है, लेकिन वाशिंग मशीन नहीं आ पाई है। क्या वाशिंग पावडर के ये प्रचार अभी तक उस भारतीय निचले माध्यम वर्ग का आइना नहीं बन रहे, जिनके बारे मे सरकार कहती रहती है कि उदारीकरण का सबसे ज्यादा फायदा ये वर्ग उठा रहा है। कम से कम जब तक हाथो को ठीक रखने का दावा करने वाले विज्ञापन आ रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि सरकार के प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के दावों मे कोई दम है। अगर है, तो जो आय बढ़ी है, वो जा कहा रही है? बड़ा साधारण सा जवाब है की आय के साथ साथ महगाई भी बढ़ी है। तो ऐसे मे आय बढ़ने का मतलब क्या रह जाता है? क्या जेब मे कागज के कुछ नोटों का भर बढ़ जाना ही आय मे होने वाली बढ़ोत्तरी है? इसका मतलब तो ये हुआ, कि भारत का एक खास वर्ग आज भी वही जिंदगी गुजर रहा है, जो आज से तीस साल पहले गुजरता था। फर्क इतना आया है कि ब्लैक एंड व्हाईट टी वी कि जगह रंगीन और रिमोट वाले टी वी ने ले ली है। बाकी बदला क्या है पिछले तीस सालों मे? घरेलू महिलाएं आज भी हाथ से ही कपडा धो रही हैं, पावडर मे कपडा भिगो कर साबुन की बट्टी से शर्ट की कोलर रगड़ रही हैं। मजे की बात तो ये कि मॉस प्रोडक्शन के इस काम मे अभी तक प्रति व्यक्ति प्रोडक्शन अलग थलग पड़ा हुआ है। चाहे वो गाव का तालाब हो या शहर का बाथरूम। सब कुछ एक साथ हो रहा है, लेकिन सब कुछ अलग अलग भी हो रहा है। और ये बदलना काफी मुश्किल भी है। इसका सिर्फ एक ही तोड़ है-वाशिंग मशीन। लेकिन वो तो अभी सबके पास आती दिखाई नहीं डे रही है। तो ये मानकर चलें, कि जब तक दूध सी सफेदी का विज्ञापन आता रहेगा, भारतीय मध्यम वर्ग की तकदीर रत्ती भर नहीं बदलने वाली। हालाँकि कुछ लोग मेरे इस लिखे पर मुझे बुजुर्वा होने की बात कह सकते हैं।

Tuesday, August 4, 2009

डेली डायरी - एक नया ब्लॉग

डेली डायरी के नाम से आज से एक नया ब्लॉग शुरू कर रहा हूँ। ये ब्लॉग पत्रकारिता के उन रहस्यों को साफ़-साफ़ सामने लाने की कोशिश करेगा, जो रोज की दिनचर्या मे किसी एक पत्रकार के सामने आते हैं। मुश्किलें कम होंगी, इसकी आशा तो न के बराबर है, लेकिन कई नई और रोचक जानकारियाँ सामने आयेंगी इस बात की उम्मीद पूरी है। इसे ब्लॉग सूची मे दाल दिया है और यहाँ लिंक भी दे रहा हूँ। टाइम कम होने की वजह से चिठ्ठाजगत और ब्लोग्वानी से ये कुछ समय बाद ही जुड़ पायेगा। ये रहा लिंक--- डेली डायरी

Friday, July 31, 2009

मिल गया एक कनेक्शन

चंद लाइने हैं जो शायद ख़ुद को मुबारक बाद देने के लिए हैं, या फ़िर एक बीते हुए युग को याद करके उसे दोबारा वापस पाने की खुशी मे हैं.. मुझे एक इंटरनेट कनेक्शन मिल गया है, जाहिर है, अब ब्लॉग्गिंग फ़िर से शुरू हो सकती है, तकरीबन शुरू हो चुकी है। बजार खुल चुका है... देर है तो अभी दुकानों के लगने की। वैसे शनि बजार की मानिंद सुबह सुबह ही तख्ते गिरने शुरू हो गए हैं.... मिस्टर बजार .... मुबारक हो....