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Sunday, October 2, 2022

वैष्णव की नई फिसलन

वैष्णव का होटल चल निकला था। शहर भर में धूम थी। बाहर से जो भी आता, स्टेशन पर ही उसे होटल का शानदार विज्ञापन दिखता। विज्ञापन तो और भी थे, लेकिन वैष्णव के होटल जितना बड़ा विज्ञापन और कोई नहीं था। फिर बत्ती भी उसी विज्ञापन पर जलती। वैष्णव ने बिजली विभाग से मिलकर जुगाड़ गांठ रखा था कि किसी और के बोर्ड पर बत्ती जले, तो तुरंत उसे नोटिस पहुंचा दिया जाए। 

वैष्णव ने सारे सवालों को उठने से पहले ही समाप्त कर दिया था। वह खुश था। पहले प्रभु की आरती में कड़वे तेल की बत्ती जलाता था, अब देसी घी की बत्तियां जल रही थीं। सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन होटल का मुख्य रसोइया भाग गया। 

ऐसा नहीं था कि वैष्णव उसे अच्छी तनख्वाह नहीं दे रहा था। मगर रसोइए को प्रेम हो गया था और वैष्णव उसे छुट्टी नहीं दे रहा था। छुट्टी के अलावा वैष्णव ने उसे ढेरों कसमें दीं, मगर जिन्होंने प्रेम किया है, वे जानते हैं कि प्रेम तो प्रेम ही होता है। चींटी की तरह प्रेमियों के भी पर निकल आते हैं। 

यह भीषण आपदा थी, जिसके बारे में प्रभु ने वैष्णव को सपने में भी नहीं बताया था। वैष्णव ने प्रभु को उलाहना दी। माथा प्रभु की चौखट से टेक दिया। प्रभु ने सुन ली। वैष्णव आकर गल्ले पर बैठा तो देखा कि रसाइयों की कतार लगी है। सभी रसोइयों की विधिपूर्वक परीक्षा हुई। सबने एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन बनाकर दिखाए। 

मगर एक रसोइया था, जिसने कुछ भी बनाकर नहीं दिखाया। बल्कि वह परीक्षा देने वाले रसोइयों की लाइन में भी खड़ा नहीं हुआ। वह फूड इंस्पेक्टर का भतीजा था और लाइसेंस कमिश्नर का साला भी। वैष्णव ने उससे पूछा, ‘क्या बनाते हो?’ रसोइया बोला, ‘मैं किसी भी तरह का लाइसेंस बनाता हूं।’ 

वैष्णव संतुष्ट हुआ। फिर उसने पूछा, ‘और अगर किसी ग्राहक को तुम्हारा लाइसेंस पसंद न आया तो?’ रसोइया बोला, ‘सीएमओ मेरे चाचा लगते हैं, ग्राहक का इलाज हो जाएगा।’ और अगर तुमको भर्ती करने पर बाकियों ने शोर मचाया तो? वैष्णव ने पूछा। ‘लेबर कमिश्नर मेरे जीजा हैं।’ 

यह सुनते ही वैष्णव ने बाकी रसोइयों को यह बोलकर वापस किया कि परिणाम रजिस्टर्ड डाक से आपके घर भेज दिए जाएंगे, और उस रसोइए को रख लिया। जब बाकी रसोइयों को इसका पता चला तो उन्होंने हंगामा कर दिया, धरने पर बैठ गए। कहने लगे कि हमारी योग्यता प्रमाणित है, फिर भी हमें नहीं रखा गया। 

वैष्णव डर गया। फिर से प्रभु के पास पहुंचा। प्रभु ने पूछा, ‘तुम वैष्णव हो?’ हां प्रभु। ‘फिर तुम झूठ कैसे बोल सकते हो?’ वैष्णव की बत्ती जल गई। उसने तुरंत बयान जारी किया कि नियुक्ति पूरे पारदर्शी तरीके से हुई है। प्रभु के अलावा हम और किसी की भी सिफारिश नहीं मानते। 

बात प्रभु की थी। सारे असंतुष्ट वापस चले गए। फिर वैष्णव ने होटल के बगल एक जमीन खरीद ली, और सीएमओ की मदद से उस पर तुरंत एक अस्पताल बनवा लिया। अब वैष्णव लाइसेंसी खाने के साथ लाइसेंसी इलाज भी करने लगा।

Sunday, December 25, 2016

नए साल की प्रार्थनाएं

जो मुझसे नफरत करते हैं, वह और भी सुंदर होते जाएं।
जो मुझे नापसंद करते हैं, उनका काम कम खाने से भी चल जाए।
जो मुझे शूली पे टांगना चाहते हैं, उन्‍हें रोजगार मि‍ले।
जो मुझे दुख देते हैं, सुख उनकी कदमबोसी करे।
जि‍नकी आंखों में मुझे देख आग उतरती है, गर्मी का मौसम उन्‍हें कम सताए।
जो मुझे नहीं जानते, उन्‍हें नया जानवर पालने को मि‍ले।
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प्रेमि‍काएं धोखा देती रहें। मैं धोखे खाता रहूं।
पड़ोसी आग लगाते रहें। मैं बेपरवाह जलता रहूं।
दर्द बना रहे। कि‍सी को पता भी न चले।
बांध टूट पड़ें। पानी में मैं तैरता हुआ बहूं।
बाप से बेटा दूर रहे। पहचान और धुंधली होती जाए।
यादें नाचती रहें। उनके हाथों में पैने हथि‍यार हों।
धागे उलझे रहें। सुई खो जाए।
घर की तरह मैं बाहर भी फटे कपड़े पहनूं।
अदालतें चलें तो सिर्फ मेरा चलना बंद करने को।
कचेहरी खुले तो सिर्फ मुझे लगाने को।
कोई दि‍खे तो सिर्फ मुझे दि‍खाने को।
सबके घर के बाहर नए चबूतरे बनें, गर्मी की शाम उनपर पानी छि‍ड़का जाए।
नए साल में प्रार्थनाएं बंद हों।

Saturday, May 14, 2016

ललेखक दर्शन-1


कोई भी लेखक हो सकता है। लेखक होने के लि‍ए बस ल पर ए की मात्रा लगाकर ख़ाक में से बड़े आ का डंडा नि‍काल देना होता है, उसके बाद तो कोई भी लेखक हो सकता है। बल्‍कि वो सभी लोग लेखक हैं जो ल का प्रयोग करना जानते हैं। ल ही है जो लेखक पैदा करता है, खड़ा करता है, चलाता है और ल ही है जो लेखक को छाप देता है। ल की खोज भी करने की जरूरत नहीं बल्‍कि अगर इसके नज़रि‍ए से देखा जाए तो ऐसे ऐसे ढंके छुपे लेखक भी सामने आ जाएंगे जि‍नके बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता।

इस तरह से ल खाने वाला, ल देने वाला, ल लेने वाला, ल सोचने वाला, ल पहनने वाला, ल बनाने वाला... सभी लेखक हैं और सभी ल वालों का मूलभूत अधि‍कार है कि वो लेखक ही बने रहें। जो लोग भी लेखक का वि‍रोध करते हैं, असल में उनका वि‍रोध ल से ही रहता है, ख़ाक को तो वो अपने ख्‍़यालों से खासा दूर रखते हैं। लेखक का वि‍रोध ल के खि‍लाफ हो रही साज़ि‍श है। इस साजि‍श को सभी लेखक ल पर रखते हैं।

ये ल का ही कमाल है कि तमाम आलोचनाएं भी लेखक को क्‍या मजाल ल बराबर भी हि‍ला पाई हों। ल से लेखक लि‍ख रहा है, ल से लेखक दि‍ख रहा है और वो ल ही है जि‍ससे लेखक बि‍क भी रहा है। लेखक नहीं होता था तो भी ल होता था, लेखक नहीं भी होगा तो ल होता रहेगा। जो आलोचक ल को नहीं समझ पाए, वही लेखक की आलोचना कर सकते हैं।

जब जब मैं ल पर नज़र डालता हूं, मुझे अपना पूरा शहर लेखक दि‍खने लगता है। मैं चाहता था कि मैं लि‍खूं कि पूरा शहर लेखक लि‍खने लगता है लेकि‍न शहर के डर से मैं दि‍खने की ही बात कर रहा हूं। वैसे भी वो लेखक क्‍या लेखक जो दि‍खे ही न। ठठरइया से लेकर सआदतगंज तक मुझे लेखकों की भीड़ दि‍खाई देती है। और तो और, कचेहरी में जज भी मुझे जि‍स नज़र से देखता है, मुझे उसके लेखक होने में यकीन बढ़ता जाता है।

कभी सोचा है कि दि‍ल्‍ली में जि‍तने लेखक दि‍खते हैं, उतने नोएडा, गाजि‍याबाद या फ़ैज़ाबाद में भी क्‍यों नहीं दि‍खते? दरअसल दि‍ल्‍ली के पास अपने नाम में ही दो-दो ल हैं। हर वो शहर जो अपने नाम में ल लि‍ए होगा, लेखकों से भरपूर होगा, ऐसा मेरा दावा है। ल कि‍तना क्रांति‍कारी है, इसका अंदाजा लगाना कि‍सके लि‍ए मुश्‍कि‍ल है?
(जारी)