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Friday, January 3, 2020

सबसे मीठी तो बेहद गुस्सैल भी है उर्दू: संजीव सराफ

उर्दू पर दिल्ली में होने वाला सालाना जलसा जश्न-ए-रेख्ता पिछले दिनों भारी भीड़ के साथ संपन्न हुआ। एक भाषा को लेकर इतने सारे लोगों की मोहब्बत देखकर एकबारगी किसी को भी ताज्जुब हो सकता है। उर्दू की रगें झनझनाने का श्रेय संजीव सराफ को जाता है। उर्दू की मशहूर वेबसाइट रेख्ता डॉट ओआरजी इन्हीं की है और संजीव खुद भी उर्दू के जुनूनी पाठक हैं। पैदाइश नागपुर की है और पढ़ाई-लिखाई मुंबई, ग्वालियर और आईआईटी खड़गपुर की। फैमिली बिजनेस के बाद खुद का बिजनेस किया। पांच-छह मुल्कों में प्लांट्स हैं। सात साल पहले अपने जुनून के लिए सारे काम-धंधे से अलग हो गए। जुनून थी उर्दू, जिसकी महक पिछले दिनों दिल्ली सहित दुनिया भर में फिर से फैली। मैंने संजीव सराफ से बात की। पढ़िये प्रमुख अंश :

वेबसाइट रेख्ता की शुरूआत के बारे में बताएं?
अपने रोज-रोज के काम से उकता गया था। शांति मिल ही नहीं रही थी। शौक कहिए या अपनी रूह के लिए कहिए, मैंने उर्दू में शायरी और दूसरी चीजें पढ़नी-लिखनी शुरू कीं। तब लगा कि मुझ जैसे करोड़ों होंगे जो उर्दू पढ़ना चाहते हैं पर एक्सेस नहीं कर सकते। इसीलिए रेख्ता शुरू की। शुरू में लगभग पचास-एक शायरों के कलाम देवनागरी और रोमन में पेश किए। पर साल भर में उसमें पर लग गए। आज उसमें साढ़े चार हजार शायरों के कलाम हैं, चालीस हजार गजलें हैं, आठ हजार नगमे हैं। ऑडियो-वीडियो, डिक्शनरी के अलावा और भी बहुत कुछ है।

आपने नायाब किताबों को डिजिटली सेफ करने का भी काम किया है। इसके बारे में बताएं।
हम वेबसाइट के लिए कलाम खोज रहे थे, लेकिन उनकी अवेलिबिलिटी नहीं थी। कुछ किताबें लाइब्रेरी में थीं, कुछ लोगों के पर्सनल कलेक्शन में। मेरा मानना था कि धूल, दीमक, पानी या आग में ये सब बरबाद हो जाएंगी। तो हमने बड़े-छोटे पैमाने पर किताबों को स्कैन करके डिजिटली प्रिजर्व करना शुरू किया। फिर देखा कि किताबों की तादाद बहुत ज्यादा थी। तब हमारे पास सिर्फ एक मशीन थी। अब 17 शहरों में हमारी तीस मशीनें लगी हैं। अब तक हमने एक लाख किताबें डिजिटली प्रिजर्व की हैं।

ऐसी कितनी किताबें रहीं जो लगभग खत्म हो चुकी थीं, जिनकी दूसरी कॉपियां नहीं थीं? उनके बारे में बताइए।
ये कहना तो बहुत मुश्किल है। किताबें कहां-कहां हैं, ये किसी को अंदाजा नहीं है। जखीरा इतना बड़ा है, कि कहना मुश्किल है कि कितनी छपीं और कितनी बची हुई हैं? लेकिन नायाब किताबें तो बहुत हैं। सन 1700 से 1800 में छपी किताबें हैं। सन 1860 के बाद मुंशी नवल किशोर ने काफी किताबें छापी थीं, उसमें से भी काफी हैं।

पिछले दिनों दिल्ली में हुए जश्न-ए-रेख्ता में तकरीबन दो लाख लोग आए। यह दिल्ली का सबसे बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम हो चुका है। लेकिन बजरिए रेख्ता वेबसाइट, आप इस जुबान का ज्यादा बड़ा फैलाव देख पा रहे हैं। इसके बारे में बताइए।
ये तो जबान का कमाल है साहब, हम तो सिर्फ अरेंजमेंट करते हैं। इतनी मीठी जुबान दुनिया में कोई है ही नहीं। इसके जरिए ढेरों आर्ट फॉर्म्स बने हैं। गजल सिंगिंग, सूफी सिंगिंग, कव्वाली हो या ड्रामा या दास्तानगोई, इतने आर्ट फॉर्म्स किसी और जुबान में जल्दी नहीं मिलते। दुनिया के डेढ़-पौने दो सौ मुल्कों से रेख्ता वेबसाइट के दो करोड़ यूनीक यूजर्स हैं। जहां-जहां हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग बसे हैं, उनको रेख्ता के अलावा और कहीं भी इतना कंटेंट नहीं मिलता। 40 हजार लोगों ने तो उर्दू सीखने के लिए हमारी वेबसाइट जॉइन की है।

उर्दू क्या सिर्फ शायरी की जुबान है? शेर-ओ-शायरी के अलावा उर्दू को आप कहां देखते हैं?
ये गलत इलजाम है। शायरी की भाषा तो है ही, लेकिन इतनी खूबसूरत जुबान है कि इसमें आप कोई भी गुफ्तगू करें, लगता है कि शायरी कर रहे हैं। ये इजहार का जरिया है। हमारे इंडिपेंडेंट मूवमेंट के पहले से ही इंकलाबी शायरी हुई है। इंकलाब-जिंदाबाद हसरत मोहानी ने लिखा। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है, बिस्मिल अजीमाबादी ने लिखा। शायरी हर जगह इस्तेमाल हुई है। ये बोलचाल जुबान थी। ब्रिटिश ने थोड़ा पर्सनलाइज करके इसे मुसलमानों के लिए कर दिया और थोड़ा संस्कृटाइज करके हिंदुओं के लिए। फिर लिट्रेचर और बोलचाल की जुबान अलग भी होती है। जितना तंज-ओ-मजाह उर्दू में है, मेरे ख्याल से शायद अंग्रेजी के अलावा कहीं नहीं है। सोशल कॉन्टेस्ट में भी खूब लिखा गया है। मंटो की शॉर्ट स्टोरीज हों या इस्मत चुगताई की हों! ऑटोबायोग्राफीज हैं। वैसे ये बेहद गुस्सैल जुबान है, लेकिन ज्यादातर लोग शायरी या नगमे सुनते हैं तो उनके दिमाग में इसका इंप्रेशन वैसा ही है।

शायरी का पाठकों की उम्र से कुछ रिश्ता है? लोग किन शायरों को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं?
लोगों की पसंद होती है। पहले कहते थे कि जब तक कॉलेज में हो, साहिर लुधियानवी को पढ़ो, और बाद में भूल जाओ। साहिर को यों कि वो थोड़े रिवोल्यूशनरी प्रोग्रेसिव मूवमेंट के थे, थोड़ा इश्क भी किया था। लेकिन मैं मानता हूं कि उसी उम्र में रीडर को गालिब भी पसंद आएंगे और वह अर्थ भी अलग लेगा। वही शेर वह बाद में पढ़ेगा तो दूसरा ही मतलब समझ में आएगा। बात कैफियत की है जो बदलती रहती है और उसी हिसाब से अर्थ और शायर भी।

आप के पास उर्दू को देखने की तकनीकी नजर है। आप इस पर लगातार काम भी कर रहे हैं। इस नजर से बताइये कि उर्दू आज से दस साल पहले कहां थी, अब कहां है और आज से दस साल बाद इसे आप कहां देख रहे हैं?
जब हमने शुरू किया था, तब सुनते थे कि उर्दू जुबान पस्त है, मर रही है या कोमा में आ गई है, वगैरह-वगैरह। लेकिन रेख्ता की सक्सेस के बाद अब आप देखेंगे कि इसी तर्ज पर सैकड़ों जश्न होने लगे हैं। सबका नाम जश्न से ही शुरू हो रहा है। दरअसल पब्लिक कॉन्शस हुई और जबरदस्त चेंज आया है। अब ये जुबान मेनस्ट्रीम में आ गई है। अब आपको ये सुनने में नहीं आएगा कि उर्दू मर रही है।

अगर हिंदी से उर्दू निकाल दें तो क्या बचेगा?
सुबह-शाम मुंह से नहीं निकलेगा। प्रात:काल या संध्याकाल यूज करेंगे। या प्यार इश्क मोहब्बत न बोलकर प्रेम या फिर ऐसा ही कोई लफ्ज यूज करेंगे। हिंदी सिनेमा से निकाल के बताइए उर्दू, फिर क्या बचेगा? दूध में से चीनी निकाल दीजिए, फिर क्या बचा? कर लीजिए कोशिश। हमारी बोलचाल हिंदुस्तानी है। उर्दू-हिंदी का ग्रामर एक है। जो निकालना चाहें, निकाल दें, कर लें कोशिश।   

Wednesday, May 1, 2019

खड़ाऊं चुराकर भागे थे राम, किस मुंह से लड़ेंगे मोदी से चुनाव?

प्रेम प्रकाश जी पेशे से पत्रकार हैं। गाजीपुर के हैं, लेकिन इन दिनों बनारस में हैं और रंग में हैं। बीजेपी से बनारस की सांसदी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मुकाबले में बीएसएफ के तेज बहादुर यादव थे। तब तक तो कुछ नहीं हुआ, जब तक कि तेज बहादुर अकेले थे, लेकिन जैसे समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपनी ओर से उम्मीदवार बनाया, चुनाव आयोग ने उनके सामने कठिन शर्त रख दी और उनकी उम्मीदवारी कैंसिल कर दी। हालांकि इस बीच सेना सेना मोदी मोदी भजने वाले भक्तों का सेना के प्रति आलाप प्रलाप में बदल चुका था। सो प्रेम जी के दिमाग में अचानक प्रकाश हुआ और उसने हम सबको अंधेरे से उस उजाले में खड़ा कर दिया, जहां प्रभु राम हैं। फर्क यही है कि प्रभु राम आज के वक्त में हैं। प्रेम जी ने बेहद शानदार लिखा है। आगे पढ़िए उनकी लिखाई- 

मान लीजिए, अगर पता चले कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम स्वयं महीयसी सीता माता के साथ अकस्मात काशी पधारे और सीधे कलेक्ट्रेट जाकर महामना मोदी जी के खिलाफ पर्चा भर आये, तो क्या सोचते हैं, फेसबुकिया भक्तों की दीवारें कैसे फटेंगी!!

भक्त1- जय श्री राम की ऐसी तैसी, बताइये हम इनका भव्य मंदिर बनवाने में लगे हैं और इनको चुनाव लड़ने की पड़ी है। अरे देशभक्त होते तो टाट में पड़े रहते, लेकिन इनको तो अब संसद की एसी चाहिए। चुनाव लड़ने वाली कौमें क्रांति नही करती। तब क्यो नही लड़े, जब बाप ने देशनिकाला दे दिया था? कौन बाप निकालता है अपने लड़के को ऐसे भरी जवानी में? नाकारा रहे होंगे तभी तो।

भक्त2-पूरे रविवंश में ऐसा कपूत नही हुआ कोई। प्राण जाय पर वचन न जाई वाली परम्परा का तेल निकाल कर रख दिया। माँ बाप ने इनको अकेले वनवास दिया था तो बीवी को भी साथ ले गए। वनवास था कि वनविहार? याद रखियेगा, भाई को भी भाई नही, नौकर बनाकर ले गए थे।

भक्त3- अरे बीवी छोड़नी ही थी तो मोदी जी की तरह छोड़ते, बेचारे धोबी के कंधे पर रखकर बन्दूक चला दी। नाहक बदनाम किया बेचारे गरीब को। यही है, यही है सामंती मानसिकता, साफ पता चलता है कि दलित और पिछड़ा विरोधी आदमी थे। जिस बीवी को छोड़ने के लिए बेचारे धोबी को बदनाम कर दिया, उसी बीवी के लिए ब्राह्मण रावण को मारा बताइये। ये जाति द्रोही आदमी है, इनका तो पर्चा खारिज कर देना चाहिए।

भक्त4- रोज 30 बाण मारते थे। दस सिर और बीस भुजाएं काटते थे। वो सब फिर से उग आता था। देश का धन बरबाद करते रहे, वो तो मोदी जी ने कान में असली राज बताया कि इसकी नाभि में अमृत है। तब जा के 31वाँ बाण नाभि में मारा। तब जा के अमृत सूखा था, लेकिन बिकाऊ मीडिया ये सब नही बताएगा आपको।

भक्त5- मियां बीवी ने मिलकर बेचारे लक्ष्मण को तो मरवा ही डाला था। सोने के मृग वाला इतिहास वामी इतिहासकारों का लिखा इतिहास है। असली इतिहास पढ़िए तो पता चलेगा, मारीच से मिल के लक्ष्मण को मारने का पूरा प्लान था। लक्ष्मण तो समझ भी गए थे पर त्रिया चरित्र भी तो कोई चीज़ होती है।

बीजेपी आईटी सेल- बेकार का, बाप के पैसे पर राज करने का सपना देखने वाला जानकर जब बाप ने देशनिकाला दिया तो हजरत राजसिंहासन का रत्नजड़ित खड़ाऊं चुरा ले गए।भागते भूत की लँगोटी भली। वो तो भरत की पारखी नज़र ने ताड़ लिया और पूरे लाव लश्कर के साथ वो कीमती और ऐतिहासिक खड़ाऊं ले आने वन आये। आप असली इतिहास पढ़ के देखिए, भरत इनको मनाने नही आये थे। वही रत्नजड़ित खड़ाऊं लेने आये थे और पूरे समय वही मांगते रहे, अंत मे लेकर ही माने।

ये है इतिहास इन तथाकथित सूर्यवंशियों का। चुपचाप वही टाट में पड़े रहते तो भव्य क्या, मोदी जी दिव्य मंदिर बनवा देते। लेकिन ये तो देशद्रोही निकले। अब रहिये वहीं।

Wednesday, April 11, 2018

यही अंत है...

जल्दी से कुछ लिख लें। जल्दी से कुछ कह दें। जल्दी से किसी को देख लें। जल्दी से कहीं छुप जाएं। जल्दी से कहीं भाग जाएं। जल्दी से कहीं चढ़ जाएं। जल्दी से कहीं उतर जाएं। जल्दी-जल्दी-जल्दी।
यहां से जाना, वहां से आना, वहां बैठना, कहीं और जाकर ठहर जाना, फूल देखना, पत्ती चुनना, हवा रोकना, पानी भरना। सब जल्दी-जल्दी-जल्दी-जल्दी।
ये खा लो, वो पहन लो, उससे मिल लो, वहां बात कर लो, वहां बोल दो, वहां चुप रहो, यहां से दूर रहो, वहां के पास रहो, उससे बोलो, उससे न बोलो, बैठे रहो, खड़े रहो, लेटे रहो। रहो-रहो-रहो। जल्दी में रहो।
धीमे-धीमे आती है बेचैनी। धीमे-धीमे चढ़ता है पारा। धीमे-धीमे उतरता है पानी। धीमे-धीमे चलती हैं आंखें। धीमे-धीमे आती है आवाज। धीमे-धीमे निकलती है बात। धीमे-धीमे पकता है सपना उधार का।
धीमी सी एक बात है- रह कर करेंगे क्या? कर के भी करेंगे क्या? करना क्यों है? क्यों ही क्यों है? जीवन ने मेरे से कभी न पूछा, मैं पूछने वाला कौन हूं?
चुप की बारात है, रोज घोड़े लेकर घेरती है। लकड़ी की मेज है, रोज सामने खड़ी रहती है। खूंटी पर टंगी शर्ट है, हवा चलने पर हिलती है। फिर मन का क्या करूं बुच्चन? सड़ रहे मन का क्या करूं बुच्चन?
एक बच्चा है, जो दूर है। एक दूर है, जो अभी बच्चा है। रुका हुआ पानी है। रुकी हुई कहानी है। लात मार-मारकर जिसे बढ़ाते हैं और पाते हैं कि वो तो हमसे भी पीछे चली गई है।
एक देह है, जो हद के पार कहीं दिखती है। एक आंख है, जिसके हाथ नहीं हैं। एक कमरा है, दीवारों से भरा हुआ। एक रसोई है, जिसमें न आटा है न आलू।
मन चंट है, फिर भी दीवार नहीं तोड़ पाता। पांव में चक्कर है जो पैताने पर मसल देता हूं। दांतों से आज मैं धुंआ पीसता हूं बुच्चन। यही अंत है। है न?

रात किसी बरसात से बाहर

Sunday, November 6, 2016

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं और इसी आलम में वो सड़क पर उतरकर धुंए का विरोध कर रहे हैं। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता! मैं जो जानता हूं, वो ये कि मेरे अंदर भरा धुंआ बहुत जल्द मुझे सड़क पर ला पटकेगा। धुंआ नहीं पटकेगा तो मैं खुद को ही सड़क पर पटक दूंगा।

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं, लेकिन सड़कों पर भी नहीं उतर सकते। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता!

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

Saturday, August 27, 2016

हम लोगों के घरों में सोना नहीं मिलता

दोनों लड़ रहे थे। दोनों डर रहे थे। दोनों एक दूसरे से दूर भाग जाना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर एक दूसरे को खत्म कर देना चाह रहे थे। दोनों विरोधी थे। दोनों चिपके हुए थे। एक के हाथ में दूसरे का बाल था तो दूसरे ने पहले का हाथ उमेठ रखा था। एक दूसरे से दूर होने के इच्छुक दोनों इस डर से दूर नहीं हो पा रहे थे कि उनमें से कोई एक लौटकर पास आ गया तो? इसी तो के चक्कर में दोनों उलझे हुए थे। तो का चक्कर तो कंगना के साथ भी चिपकाया गया था, तो?

इसी बीच एक कवि ऐलान करता था कि वह बहुत नहीं है। उसके पहले वह कह चुका था कि वह कहीं नहीं है और उसके कई साल पहले वह कह चुका था कि वह नहीं है। हालांकि ज्यादा नहीं तो कुछ एक लोग, जिनने उसकी इकलौती किताब पढ़ी थी, वो जानते थे कि कवि अक्सर उस खिड़की से झांकते होता रहता है जो उसके किसी एक बनबिगड़े घर के बाहर खुलती थी। बस कवि कमरे में नहीं होता।

एक कमरा है। एक न होने लायक कमरा है। आमतौर पर कमरे में चार दीवारें होती हैं, लेकिन उस कमरे में छह दीवारें हैं। कमरे को अपने कमरे होने के बारे में कोई भ्रम नहीं है। कवि को है, लड़नेवाले को है, हो सकता है कंगना को भी हो। हो तो हो। तो?

मैं सोना तलाश रहा हूं। नींद मेरी जेबों में ही नहीं, बुश्शर्ट के कॉलरों और कफों में भी भरी है। नदी नहाने गए लड़कों की जेब में तलाशी लेता हूं तो उसमें आलपिन मिलती है। एक की जेब में पांच पैसा मिलता है लेकिन सोना नहीं मिलता। हम लोगों के घरों में सोना नहीं मिलता। किसी के यहां मिलता भी है तो बक्से में, न कि जेब में। लेकिन मुझे वाकई नहीं पता, इसलिए मैं जेब ही टटोलता हूं।

दुनिया भरी भरी है सर। मैं भी भरा भरा हूं। मजे मजे में मजाज ने नोंच-नाच के मजा ले लिया। डाक्टर साहब ने कुल्हड़ रखवाकर उसपर लिंटर डलवा लिया। रामू के कैंप से भागकर लोग टाटशाह मस्जिद की छत पर बैठकर अपनी शामें खाली करने लगे। नेताजी ने धांसू बयान दे दिया। मनोज श्रीवास्तव सभासद की पत्नी सभासदी जीत गईं। इंडिया मार्का पंप पर नेतानी का सिर फूट गया। साइकैट्रिस्ट के सामने बैठी लड़की ने सबकुछ खाली कर दिया।

ऊपर से नीचे तक सब झूठ है। भरोसा रखें। नहीं है? तो?

डिस्क्लेमर: मैं टीवी नहीं देखता।

Friday, August 19, 2016

मोदीजी के हाथ में क्‍या है? जेब में क्‍या है?

रक्षाबंधन के दि‍न कामवाली के नाम पत्र (मोदीजी के नाम नहीं) 

खाना बनाने का ढाई हजार ले रही हो तो दि‍ल लगाने का कि‍तना मांगोगी? भूल जा रही हो कि‍ मैं कहां कहां के दलि‍द्रों की जमीन पर खड़ा हूं? हम कि‍स्‍मतवाले लोग थोड़े हैं या आईफोन वाले थोड़ी हैं? आइफोन के बारे में हम बाते करते हैं और मोटो जी से काम चलाते हैं। घर में राहुल सांकृत्‍यायन की कि‍ताब होती है लेकि‍न तकि‍ए के नीचे होती है। पता नहीं राहुल सांकृत्‍यायन ने दि‍ल लगाने का कि‍तना पैसा लि‍या होगा? कितनी बार लिया होगा? तिब्बत की कठोर पहाड़ियों पर उन्हें कौन पैसा देता होगा?  क्या दलि‍तों के पास भी आइफोन होते हैं? कन्‍हैया कुमार के पास कौन सा फोन है? क्‍या अब समय नहीं आ गया है कि‍ दलि‍तों और कन्‍हैया कुमार के पास जो फोन हैं उसकी वास्‍तवि‍कता समाज के सामने रखी जाए? ऊना से लेकर अहमदाबाद तक जो सि‍पाही जोशीले नारे लगाते हुए दौड़ रहे थे, उनकी छाति‍यों में कि‍स फोन का जोर था? लौटानी जो लोग उनपे पत्‍थर फेंक रहे थे, क्‍या वो जोर एप्‍पल ने दि‍या या सैमसंग ने? नोकि‍या तो नहीं न दि‍या होगा, वो तो आउटडेटेड ठहरा। या सारा जोर एप्‍पल से नहीं, मि‍ल्‍क पीकर आया था? आपने मि‍ल्‍क देखी है? आइफोन पे देखी है? क्‍या भारतीय वामपंथ को एक सि‍रे से दूसरे सि‍रे तक आइफोन के सवाल पर साफ साफ स्‍टैंड लेने का वक्‍त नहीं आ गया है? वाजि‍ब सवालों पर तो जल्दी स्टैंड नहीं लेते या बेचारगी की हालत है। राखी में जो सारी बहनें उमड़ उमड़ के इमोजी भेज भेज के फेसबुक को गंधाई हुई हैं, आज वक्‍त आ गया है कि‍ इस जोर वाले फोन की सच्‍चाई को सामने रखें। वो हरामी (प्रेम से कह रहा हूं, ये गाली नहीं, मौहब्‍बत है) कौन सा प्‍लेटफॉर्म है जो सबसे ज्‍यादा हवा फैला रहा है? क्‍या वह ढाई हजार रुपल्ली हैं, क्‍या वह फि‍फ्टी-फि‍फ्टी से आ रहा है या वो मेरे मन के बुढ़ापे की पैंसठ वाली संख्‍या को पार कर चुका है? पंद्रह लाख जैसी बातें तो मैं सपने में भी नहीं सोचता। हम कहां खड़े हैं? हरी सर आप बताइये, आप कि‍नके साथ खड़े हो? मेरे साथ खड़े होते तो कम से कम अपने पैसों के लि‍ए आपके कान में फुसफुसा तो सकता था, दूसरे के लि‍ए चि‍कोटी भी काट सकता था। मोदीजी के हाथ में क्‍या है? जेब में क्‍या है? बंडी वाली जेब में क्‍या छुपा रखा है? मोदीजी आप जवाब न दें, मेरे कान में तो फुसफुसा सकते हैं? एसएमएस करने में तो घंटा आपका कुछ जाता नहीं है। आइए हम साथ साथ कश्‍मीर की अवाम को बताएं कि‍ हमारे दि‍लों में जो जोर है वो कि‍स प्‍लेटफार्म पर भरा जा रहा है। पाकि‍स्‍तान न सही, कश्‍मीर को तो आज शांति‍ की जरूरत है या नहीं? फेसबुक तो बंद कराते ही रहते हैं, कभी फायरिंग भी तो बंद कराइये। दि‍ल से दो चार बिंदी बढ़ा के ही बोलि‍ए, प्लीज बोलिए। रक्षा के बंधन का दि‍न है आज। माना कि‍ आपने अपनी पत्‍नी को अपना नहीं बनाया, अपनी बहनों को तो अपना बनाओगे? अच्‍छे और बुरे दोनों सेंस में। बुरा वाला तो रोज बनाते ही रहते हो, अच्‍छा वाला आज तो बनाओ। ये प्‍लेटफार्म का सवाल एक दि‍न क्‍या, आज ही मेरी जान लेके रहेगा। मोदी तुम कहां हो? मुझे पता है कहीं नहीं हो। बहनों तुम कहां हो? तुम भी नहीं हो। ये देश कहीं है? मेरा आइफोन कहीं है? ये दि‍न आज कहीं भी है या सीधी हवा है?

Saturday, January 16, 2016

दरवाज़े, आओ तुमको चश्‍मा पहना दें

गौरी, आओ तुमको रंगोली बना दें। फूल, आओ तुमपे गेंदा चढ़ा दें। चि‍रैया आओ तुमको उड़ा दें। लड़की, आओ तुमको वो सबकुछ बना दें जो तुम नहीं हो। दन्‍न से दुनि‍या को बता दें कि तुम अड़की हो। जो तुम हो, वो सात कोस दूर के कुंए में डालके देर तक नि‍हार के कन्‍फरम कर लें कि कायदे से कुंए में तुम्‍हरा होना धंसा या नहीं। कहीं से कोनो उंगली बाल नि‍कलके दि‍ख तो नहीं रहा।

बाबा, आओ तुमको बजा दें। डीजे, आओ तुमको बाबू बना दें। जोकर, आओ तुमको जोंक चि‍पका दें। दांत, आओ तुमको चि‍यार दें। बाल, आओ तुमको खैनी बना दें। भगत, आओ तुमको चढ़ा दें। पुलि‍स, आओ तुमको बहका दें। कोरट, आओ तुमको बि‍गेर कत्‍थे का पान खि‍ला दें। तुम सबको एक थूकदान दे दें, सब इकठ्ठा हो जाओ तो संसद में साजि‍श करके पहुंचा दें।

पड़ोसी, आओ पैजामा पहना दें। अड़ोसी, आओ तुमको नाड़ा थमा दें। दरवाज़े, आओ तुमको चश्‍मा पहना दें। खि‍ड़कि‍यों, आओ तुम्‍हरी आंख टेस्‍ट करा दें। दीवारों, आओ तुमको पहि‍या लगा दें। पत्‍थर, आओ तुमको पंख लगा दें। तुम सबको बांस की वो खांची दें, जि‍समें कैसे भी सब अपना सामान लेकर अमा जाओ, गि‍रा दें सूखे तालाब में, बन आंगन खटि‍या नीचे समा जाओ।

गाली दो गुणगान करूंगा
सुबे दोपहर शाम करूंगा
काम मेरा है गाली खाना
श्रद्धा से मैं काम करूंगा।

Wednesday, March 5, 2014

हम चले पतंग उड़ाने

मैडम, जैसे आपका मलमल का लाल (फि‍क्‍स नहीं है, मने आप अपनी पसंद का भी रंग चूज कर सकती हैं।) दुपट्टा उड़ता जाता है, वैसे ही हमारी पतंग भी उड़ती है। आपके दुपट्टे की तरह हमारी पतंग का भी रंग फि‍क्‍स नहीं है। बल्‍कि‍ हम तो ये भी शर्त लगाने के लि‍ए तैयार हैं कि हमारी पतंग में कि‍सी भी देश के दुपट्टे, स्‍कार्फ, बुर्के से ज्‍यादा रंग हैं। कि‍तनी तो रंगीन है हमारी पतंग...ठीक  उतनी ही जि‍तना कि उड़ना होता है, जि‍तना कि उड़ते हुए को थामना होता है। याद है मैडम...एक बार आपने कहा था कि यू ड्राइव मी क्रेजी। हम उसी वक्‍त समझ गए थे कि आपका मन पतंग हो रहा है, पर जींस दूसरे से कंट्रोल कि‍ए जाने के हैं तो पतंग ही हो रहा है, गौरया का नहीं। सेल्‍फ ड्राइव का मोड नहीं बन पाया ना आपका। बहरहाल, आप कीजि‍ए सेल्‍फ ड्राइव मोड में आने  की प्रैक्‍टिस औ हम चले पतंग उड़ाने


अब देखि‍ए ना, हमारे पास एक नहीं, बल्‍कि दो दो पतंगें हैं। एक बड़ी त दूजी छोटी। मजे की बात तो ये कि दोनों बड़ी तेज उड़ती हैं। कोई कि‍सी से मजाल कि राई रत्‍ती कम हो जाएं। एक पुरानी उड़ाका, न जाने आसमान में कि‍तनी पतंगें काट के आई है त दूजी नई उड़ाका जि‍सके तो ठीक से कन्‍ने भी न बंधे। एक मि‍नट, जरा बड़ी वाली उतार लें, कैसी तो लंफ लंफ के नाच रही है आसमान में कि दूसरी वाली सही से टि‍क भी नहीं पा रही है। अब दूसरी वाली का कन्‍ना वन्‍ना ठीक से बांध लें तो दोनों को उड़ाएंगे। हां, सही सुन रही हैं मैडम, दोनों को उड़ाएंगे। आखि‍र दो दो हाथ हैं न हमारे। यकीन मानि‍ए, हम इंसाफ में यकीन रखते हैं तो एक को जि‍तना ऊंचा ले जाएंगे, हम वादा करते हैं कि दूसरी भी उतनी ही ऊंची उड़ेगी।

हम कन्‍ना बांध दि‍ए हैं कायदे से छोटी वाली पतंग का। अब देखते हैं कि कैसे बड़की पतंग इससे ज्‍यादा हरहराती है। 

Monday, February 24, 2014

एक तकनीकी प्रेम पत्र


तुम अभी पांच मि‍नट पहले ऑनलाइन हुई थी ना। हम देखे थे तुम्‍हरी एफबी पे हरी तो जीचैट पे लाल बत्‍ती जल रही थी। और तुम जीचैट का स्‍टेटस भी तो चेंज की थी। क्‍या तो था कि‍.. तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान
झूठ जाना और पता नहीं क्‍या दाना पाना। यहां तो हैशटैग बनाने में लगी पड़ी है औ तुम हो कि शायरी दर शायरी टेले रहती हो। र्इमानदारी से बताना, इतनी शायरि‍यां तुम लोग पढ़ती गढ़ती कहां से हो जी। औ ये जो आजकर फोटो दर फोटो टेले रहने का फैशन चला है...हम कि‍तना इंतजार करते हैं तुम्‍हारी अगली फोटो का... कि काजनी कहां से खिंचा के दन्‍न से हमें दि‍क्‍क कर दो। फोटो-शायरी-कवि‍ता-फोटो-शायरी-टैग...। अरे कभी हमें भी तो टैग कर दि‍या करो.. ;) कि‍तना तो इंतजार कि‍या करते हैं... बैठे-बैठे चैटलि‍स्‍ट में तुम्‍हारा नाम ताका करते हैं.. कि अभी दन्‍न से हमरी विंडो पे चमत्‍कार होगा और हम अनि‍ल कपूर त तुम अमृता सिंह बनके प्‍यार बि‍ना चैन कहां रे गा रहे होंगे...और तुम हो कि टैगे नहीं करती हो। कौनो बात नहीं...डि‍यर... एक दि‍न तुम हमरी फ्रेंडलि‍स्‍ट के बाहर आकर साक्षात हमरे अमर चैट प्रेम का गवाह बनोगी, ई हमका पता है। हमरा पुराना रेकॉर्ड गवाह है। देखो... अभी त तुम्‍हरी हरी लाल दूनौ बत्‍ती जली हुई है। हमरी प्रि‍यतमा... एक स्‍माइली ही भेज दो...केतना दि‍न से तो तुम्‍हरी पेंडिंग लि‍स्‍ट में लटक रहे हैं।

अच्‍छा सुनो, हमने तुम्‍हारी फ्रेंडलि‍स्‍ट में ज्‍यादा कमेंट और लाइक करने वालों को फ्रेंड रि‍क्‍वेस्‍ट भेज दी है। बहुत जल्‍द तुम्‍हारी लाइकिंग में इजाफा होगा। देखना...लाइक के चक्‍कर में हमको लाइक करना न भूल जाना... हम वही हैं जो तुम्‍हरी हरी बत्‍ती जलता देख मैसेज आने का इंतजार कि‍या करते हैं। तुम्‍हरा स्‍टेटस कभी लाइक त कभी चुपके से बि‍गेर लाइक कि‍ए नि‍कल लि‍या करते हैं। औ बीच बीच में ई वाला गाना भी सुन लि‍या करत हैं-- वो जो हममें तुममें जो करार था...तुम्‍हें याद हो के ना याद हो...। कब आओगी जी तुम... तुम्‍हरा नीला, हरा, नारंगी औ केतना त केतना सूट देखे एक ठो मेला मा... उफ्फ...


आज ही के बात सुनो, केतना त नि‍हारते रहे थे तुम्‍हरे स्‍टेटस पर... का गजबे शायरी टेली थी तुम...एकदम दि‍ल के आरपार हो गई। हमका त लगा कि‍ सीधे हमहीं से बति‍याय रही हो... औ हम आंख औ मुंह फाड़े केजरीवाल बने तुम्‍हरा दांत देख रहे हों। ...प्रि‍ये...एक बार त अपनी हरी बत्‍ती के परसाद के टरेन इधर भी रवाना कर दो...

तुम्‍हरा एकतरफा चैटर 

Saturday, April 13, 2013

पुराने झोले से नि‍कलीं बासी लाइनें




ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आवे..
1
जहर भरे खुद को ले जाऊं मैं कहां,
हर तरफ तो तू ही तू दिखाई देता है।

2
मुझे यकीन है तेरे फिर से आने का,
तेरे बिना मेरी तन्हाई अकेली है।

3
तूने फिर किया है साथ देने का वादा,
मैँ फिर से तेरा यकीन करता हूं।

4
कौन कहता है कि गुजरा वक्त नही आता,
यारों आज फिर मैं अकेला हूं।

5
मेरा होना मुश्किल की दो बूंदे ही तो हैं,
फिर मेरे जिबह की राहें इतनी मुश्किल क्यों हैं।

6
ख्यालों में बोलो कि कोई सुन न ले,
ख्वाहिशें तुम्हारी बड़ी बेहिसाब हैँ।

7
रम मिटाए गम,
बेहिसाब पियो रम।

8
प्रेम गले का खूंटा है
जिसने भी दिल लूटा है
सबसे बड़ा वो झूठा है ।

9
मुस्लमां न हुए तो कैसे आएगा,
हुनर तेरी आंखों मे झांकने का।
मुस्लमां हो भी गए तो क्या हुआ,
तेरी आंखे तो कुछ और ही चाहती हैं।

10
मेरे न होने पे ताज्जुब न करना दोस्तों,
इस गली से पहले भी कई गुजरे हैं।

11
मैनें देखा है तुम्हें उमस भरी दोपहरों में,
बासबब बातों पे तुम मन उतारा करते थे,
यूं हंस के गले मिलते थे तुम हमसे,
और तंगहाली में हम हंसी संवारा करते थे।

12
साल दर साल जो बनते रहे अनजान हमसे,
टूटे रास्ते तो मुड़कर पीछे देखते हैं..

13
मतलबी लोगों ने फिर निशाना साधा है,
क्या पता, इस बार क्‍या लूटने का इरादा है।

14
सुना है कि तूने खामोश रहना सीखा है,
कहीं ये तेरे प्यार सा इक धोखा है?

15
जो अपनी दुश्वारियां रखीं उसके सामने,
वो लगा मेरी रूबाइयों की दाद देने।

16
सारी रात बह गई, अकेला दिन थम गया, तुमने तो आने को कहा था, पीठ पे टिक के लंबी सांस भी तो ली थी. . इसे उधार मानूं या दान. ? सूद चुकाऊं या असल या फिर दोनोँ . . .? कितना तो अच्छा होता कि सांसों को मेरी पीठ पर देने से पहले ही बातें साफ हो जातीं। अब उन सांसों को वापस कैसे करूं . . ?

17
उनके चंद रोज के फरेब पे हुआ आशिक मैं,
वो थे कि सालों सूद ही वसूलते रहे।

18
शराबियों में होते हैं कुछ खास शराबी,
वो पीने से पहले ही महक जाते हैं।
प्याले मे मय न हो पानी ही सही ,
गिलास भरा देखकर ही चहक जाते हैँ।

19
धूप का इक टुकड़ा अब मेरे घर भी आता है,
भरी दुपहरी रहता है, शाम तलक खो जाता है।

Saturday, March 9, 2013

भाग री ऐ सरकार


भाग री ऐ सरकार 



भाग री ऐ सरकार 
कि आती है फौजे बेकार 
कर देगी तुझको लाचार 
कबीरा सारा रा रा 

पकड़ी हाथ नहीं तलवार 
कर दी कलम की पैनी धार 
होगी पंचर तेरी कार 
कबीरा सारा रा रा 

पंजा पकड़े है गद्दार 
कमल बि‍छाए लाश हजार 
साइकि‍ल पर है गुंडा सवार 
हाथी भटके बारम्‍बार 
कबीरा सारा रा रा 

छीने खेत और घर बार 
बनाए लाखों बेरोजगार 
कैसे कर लें तुमसे प्‍यार 
कबीरा सारा रा रा 

आने वाला है त्‍योहार 
कालि‍ख मलेंगे अबकी बार 
मारें पटक के सौ सौ बार 
कबीरा सारा रा रा... 
कबीरा सारा रा रा... 
कबीरा सारा रा रा....

कलंदर की मौत


कलंदर की मौत 

कल रात कलंदर के घर से
गाने की आवाज नहीं आई
और न ही आई देर रात
बटुली में लड़कर खनखनाती कलछुल की आवाज,
सारी रात बस टीवी पर चलने वाले डायलॉग
ही सुनाई देते रहे।

सुबह भी यही लगा कि
कलंदर के घर टीवी ही चल रहा होगा
पर डायलॉग कुछ बदले से लगे
दरअसल डायलॉग फुसफुसाहट में बदल चुके थे
टीवी बंद हो चुका था
कलंदर भी।

जि‍तने मुंह उतनी बातें
जि‍तनी मात्राएं उतनी कहानि‍यां
चलने लगी थीं कलंदर के दरवाजे पर
और जो नहीं चलीं,
वो आइंदा दि‍नों के लि‍ए
पलने लगी थीं लोगों के पेट में।

कलंदर की मौत का पता चलने के ठीक दो घंटे बाद
कलंदर की कहानि‍यां उसका दरवाजा छोड़कर
मेहता, मि‍श्रा, गुप्‍ता और बंसल जी की
नाश्‍ते की प्‍लेट में अचार का
जायका बढ़ा रही थीं।

कलंदर जिंदा था तो रात में गाना सुनाता था
कलंदर मर गया तो अचार की लज्‍जत लाता है।

Tuesday, June 17, 2008

कहीं मेरा नाम ...

क्या होते होंगे अनगढ़ कविता के मायने? क्या वो अपना संवाद नही कर पाती होगी? लेकिन क्या किसी कविता का संवाद करना इतना जरूरी है? आख़िर निकलती है वो ख़ुद से, किसी से संवाद करने की खातिर तो नही ही। बहरहाल, चुप से पड़े लोगों की खातिर ये कविता...

सिगरेट के धुंए से
फुसफुसाती हुई
शराब के एक घूँट से
चीरती हुई
हवा के झोंके मे से
धूल को काटती हुई
चिपचिपाते पसीने से
कभी कभी
निकलती है
एक कविता,
चित्र से, नाटक से, कविता से
निकलते अहसास
बिकते अहसास
और....
मजबूरियां,
क्या कहीं मेरा नाम तो नही लेतीं ?

Tuesday, June 5, 2007

महानगर का चूल्हा

संदीप कुमार


जिस गांव की मिट्टी ने

पाला-पोसा

पढ़ाया-लिखाया

वहां के लिए नाकाबिल निकला

इस अनजान महानगर ने

दो टके की नौकरी क्या दी

सारा दिन खून जलाना पड़ता है

तब जाकर चूल्हा जल पाता है

दो जून की रोटी

नसीब हो पाती है।

Sunday, May 6, 2007

कौसर की अजन्मी बेटी के नाम

अंशु मालवीय
मैं नही जानता कि अंशु कौन हैं , पता लगाने की सोची लेकिन मेरे फोन मे बैलेंस ही नही था . लेकिन इसे पढने के बाद...मुझे "हिंदू" शब्द गाली लगने लगा है, आख़िर किस तरह मैं इसे अपने से नोच कर फेंकू...किस तरह से.... और "हिंदू" गाली लगने लगा ही नही है , महसूस हो रह है कि मैं खुद एक गाली ही हूँ....


सब कुछ ठीक था अम्मा
तेरे खाए अचार की तरह
तेरी चखी हुई मिटटी
अक्सर पन्हुचते थे मेरे पास..... ।
सूरज तेरी कोख से छ्न कर
मुझतक आता था।

मैं बहुत खुश थी अम्मा !
मुझे लेनी थी जल्दी ही
अपने हिस्से की सांस
मुझे लगनी थी
अपने हिस्से की भूख
मुझे देखनी थी
अपने हिस्से की धूप।

मैं बहुत खुश थी अम्मा !
अब्बू की हथेली की छाया
तेरी पेट पर देखी थी मैंने
मुझे उनका चेहरा देखना था
मुझे अपने हिस्से के अब्बू देखने थे
मुझे अपने हिस्से की दुनिया देखनी थी।
मैं बहुत खुश थी अम्मा !

एक दिन मैं घबरायी.... बिछ्ली
जैसे मछली--
तेरी कोख के पानी मे
पानी मे किस चीज़ की छाया थी अनजानी ....
मुझे लगा
तू चल नही घिसट रही है
मुझे चोट लग रही थी अम्मा !
फिर जाने क्या हुआ
मैं तेरी कोख के
गुनगुने मुलायम अँधेरे से निकल कर
चटक धूप
फिर.....
चटक आंगन में पहुंच गयी।

वो बहुत बड़ा आपरेशन था अम्मा!

अपनी उन आंखो से
जो कभी नही खुली
मैंने देखा
बडे बडे डॉक्टर तुझ पर झुके हुए थे
उनके हाथ मे तीन मुँह वाले
बडे बडे नश्तर थे अम्मा....
वे मुझे देख चीखे अम्मा !
चीखे किसलिये अम्मा--
क्या खुश हुए थे मुझे देखकर!

बाहर निकलते ही
आग के खिलौने दिए उन्होने अम्मा...
फिर तो मैं खेल मे ऐसा बिसरी
कि तुझे देखा ही नही--
तूने अन्तिम हिचकी से सोहर गाई होगी अम्मा !

मैं कभी नही जन्मी अम्मा
और इसी तरह कभी नही मरी
अस्पताल मे रंगीन पानी मे रखे हुए
अजन्मे बच्चों की तरह
मैं अमर हो गाई अम्मा!
लेकिन यहाँ रंगीन पानी नही
चुभती हुई आग है!
मुझे कब तक जलना होगा ..... अम्मा !

( कौसर बानो की बस्ती पर २८ फ़रवरी २००२ को हमला हुआ था। वह गर्भवती थी। हत्यारों ने उसका पेट चीरकर गर्भस्थ शिशु को आग के हवाले कर दिया था। इस कविता मे उस शिशु को लडकी माना गया है , कुछ अन्य संकेतों के लिए )

Tuesday, April 24, 2007

महानगर की दीवार

संदीप कुमार

हजारीबाग से बी ए करने के बाद अपने कस्बे बगोदर (झारखण्ड) से नीम हकीम पत्रकारिता शुरू कर दी। लेकिन नुस्खे झोला छाप नही थे। फिर सोचा कि कहीँ से इसकी डिग्री ले ली जाय नही तो क्या पता कब कहॉ कोई छापा मार दे और लाइसेंस कैंसिल हो जाये। सो आ गए दिल्ली। और सीधे आई आई एम् सी । उसके बाद ठिकाना बना अपना मुम्बई जहाँ स्टार न्यूज़ में कुछ दिन कलम घिसाई की। इन दिनों नोयडा के स्टार न्यूज़ के दफ्तर मे पाए जाते हैं और बकौल संदीप " उसी से खिचड़ी-चोखा का जुगाड़ हो रहा है" । बजार के लिए इन्होने अपनी एक कविता भेजी है , जो किसी भी नॉर्मल आदमी की एब्नोर्मल बनाने की प्रक्रिया को काफी आसानी से व्यक्त करती है।



गाँव से जब आया था
"सॉरी थैंक्स" के आगे

कुछ नही जानता था

मेरी एक दोस्त कहती थी

तेरे पास तमीज नही

बात करने की

सलीका नही

उठने बैठने का

असर उसकी सोहबत की

या फिर हवा इस महानगर की

मालूम नही

पर अब गाहे बगाहे

मुँह से निकलता है-

शिट या फक

मेरी दोस्त हंसती है

उसके गाल में गढ्ढे पड़ते हैं

और कहती है

गंवार ! कुछ सीख रहा है

आज आलम यह है कि

जब अकेले में भी छिंकता हूँ

तो "सॉरी" कहता हूँ

क्योंकी सुना है कि

महानगरों की दीवारो की भी

आंखें होती हैं

वो पहचान लेती हैं

कि ये गाँव का गंवार है ।

Sunday, April 15, 2007

मुठ्ठी भर रेत

मुठ्ठी भर रेत
मुठ्ठी मे उठाई
देखा
तो रेत नज़र भी आई
मिलाया उसमे थोड़ा सीमेंट
और
एक नींव बनाई
फिर पता चला
कि अभी तो और है ज़रूरत
कई सारी मुठ्ठीयों की
और फिर से
मुठ्ठी भर रेत
मुठ्ठी मे उठाई