Saturday, August 27, 2016

हम लोगों के घरों में सोना नहीं मिलता

दोनों लड़ रहे थे। दोनों डर रहे थे। दोनों एक दूसरे से दूर भाग जाना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर एक दूसरे को खत्म कर देना चाह रहे थे। दोनों विरोधी थे। दोनों चिपके हुए थे। एक के हाथ में दूसरे का बाल था तो दूसरे ने पहले का हाथ उमेठ रखा था। एक दूसरे से दूर होने के इच्छुक दोनों इस डर से दूर नहीं हो पा रहे थे कि उनमें से कोई एक लौटकर पास आ गया तो? इसी तो के चक्कर में दोनों उलझे हुए थे। तो का चक्कर तो कंगना के साथ भी चिपकाया गया था, तो?

इसी बीच एक कवि ऐलान करता था कि वह बहुत नहीं है। उसके पहले वह कह चुका था कि वह कहीं नहीं है और उसके कई साल पहले वह कह चुका था कि वह नहीं है। हालांकि ज्यादा नहीं तो कुछ एक लोग, जिनने उसकी इकलौती किताब पढ़ी थी, वो जानते थे कि कवि अक्सर उस खिड़की से झांकते होता रहता है जो उसके किसी एक बनबिगड़े घर के बाहर खुलती थी। बस कवि कमरे में नहीं होता।

एक कमरा है। एक न होने लायक कमरा है। आमतौर पर कमरे में चार दीवारें होती हैं, लेकिन उस कमरे में छह दीवारें हैं। कमरे को अपने कमरे होने के बारे में कोई भ्रम नहीं है। कवि को है, लड़नेवाले को है, हो सकता है कंगना को भी हो। हो तो हो। तो?

मैं सोना तलाश रहा हूं। नींद मेरी जेबों में ही नहीं, बुश्शर्ट के कॉलरों और कफों में भी भरी है। नदी नहाने गए लड़कों की जेब में तलाशी लेता हूं तो उसमें आलपिन मिलती है। एक की जेब में पांच पैसा मिलता है लेकिन सोना नहीं मिलता। हम लोगों के घरों में सोना नहीं मिलता। किसी के यहां मिलता भी है तो बक्से में, न कि जेब में। लेकिन मुझे वाकई नहीं पता, इसलिए मैं जेब ही टटोलता हूं।

दुनिया भरी भरी है सर। मैं भी भरा भरा हूं। मजे मजे में मजाज ने नोंच-नाच के मजा ले लिया। डाक्टर साहब ने कुल्हड़ रखवाकर उसपर लिंटर डलवा लिया। रामू के कैंप से भागकर लोग टाटशाह मस्जिद की छत पर बैठकर अपनी शामें खाली करने लगे। नेताजी ने धांसू बयान दे दिया। मनोज श्रीवास्तव सभासद की पत्नी सभासदी जीत गईं। इंडिया मार्का पंप पर नेतानी का सिर फूट गया। साइकैट्रिस्ट के सामने बैठी लड़की ने सबकुछ खाली कर दिया।

ऊपर से नीचे तक सब झूठ है। भरोसा रखें। नहीं है? तो?

डिस्क्लेमर: मैं टीवी नहीं देखता।

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