Friday, August 26, 2016

फूटा मोदीजी का हवाई गुब्‍बारा, जुमले हुए एक्‍सपायर

महेंद्र मि‍श्र 
इन्हें न विकास से लेना-देना है और न मेडल से। इन्हें युद्ध चाहिए। इसीलिए जो आज तक किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले से नहीं किया। उसको इन्होंने कर दिखाया। वो है बलूचिस्तान के अलवगाववादियों का खुला समर्थन। पीएम साहब ने इस मौके पर न ओलंपिक का जिक्र किया और न ही मेडल का। एक अरब 30 करोड़ आबादी और एक भी मेडल नहीं। यह बात पीएम साहब को परेशान नहीं करती। चलिए देश के दूसरे हिस्सों में दूसरी नकारी सरकारें थीं। लेकिन गुजरात में तो 20 सालों से आप हैं। कम से कम एक खिलाड़ी पैदा कर दिए होते। एक मेडल वहां से आ जाता। इस पर आप क्या बोलेंगे? अब पूरा गुजरात बोल रहा है। विकास का बुलबुला फूट गया। न वहां दलितों को सम्मान मिला। न ही पटेलों को रोजी-रोटी। गुजरात और कुछ नहीं अदानियों-अंबानियों के जमीन लूट का माडल है। अब यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है। विकास के नाम पर इनके पास जुमले हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री होंगे जो लाल किले की प्राचीर से झूठ बोले होंगे। और झूठे आंकड़े दिए होंगे। और वह भी झूठ तुरंत पकड़ लिया गया। जैसे ही गन्ना किसानों के 99 फीसदी बकाए के अदायगी की उन्होंने बात कही मुजफ्फरनगर शामली के किसान सच्चाई बताने टीवी पर आ गए। दिल्ली के पड़ोस में 70 सालों बाद बिजली पहुंचाने का दावा भी झूठा निकला। प्रधानमंत्री लाल किले से गांव वासियों के अपने भाषण को टीवी पर देखने का ऐलान कर रहे थे। लेकिन कुछ देर बाद ग्रामीण खड़े खंभे दिखाते पाए गए। जहां आज भी तार नहीं पहुंचा। बिजली की तो बात ही दूर है। पीएम के भाषण में देश की दो बुनियादी चीजें स्वास्थ्य और शिक्षा नदारद थीं। इन पर एक लफ्ज नहीं। हां मोदी साहब ने लाल किले से लेड बल्ब जरूर बांटे। लेकिन इन्हें नहीं पता कि अज्ञानता के अंधकार को बल्ब की रोशनी नहीं भर सकती है।

आजकल असामाजिक तत्व भी काफी सभ्य हो गए हैं। जिसको पीटना होता है उसका नाम चिल्लाकर नहीं लेते हैं। यहां तो दो देशों के बीच का मसला है। वह भी विदेश नीति जैसा संवेदनशील क्षेत्र। जिसमें सारे फैसले कूटनीतिक तरीके से लिए जाते हैं। दाहिना हाथ क्या कर रहा है वह बांये को भी पता नहीं होता। सारे काम संकेतों में होते हैं। उस मसले को पीएम साहब लाल किले की प्राचीर से हल करना चाहते हैं। वह भी ऐलानिया तरीके से। गिलगिट और पीओके एकबारगी तो समझा जा सकता है। हालांकि उनको लेकर भी तमाम तरह के सवाल हैं। मसलन क्या मोदी साहब ने अटल के समय के संघर्षविराम के समझौते को खारिज कर दिया है? या फिर नियंत्रण रेखा को अमान्य करार दे दिया है? शिमला समझौते को कूड़ेदान में फेंक दिया है? या यूएन समझौते को ठेंगा दिखा दिए? चलिए मैं इन सब पर कुछ नहीं पूछता। लेकिन बलूचिस्तान का आपने किस बिना पर जिक्र किया? 1 अरब 30 करोड़ के देश को आपने एक मिनट में बौना कर दिया। ऐसा करके देश को आपने पाकिस्तान से भी नीचे गिरा दिया। पाकिस्तान तो हमारे कश्मीर के मसले पर जब बोलता है तो हम उसे अंदरूनी मामलों में दखल करार देते हैं। लेकिन आपने तो सचमुच में उसके अंदरूनी मामलों में दखल दिया है। क्या इसके बाद अब पाकिस्तान को घेरने का कोई नैतिक आधार बचेगा?

प्रधानमंत्री का लाल किला का पूरा भाषण बता रहा था कि वह हताशा में हैं। दो सालों के बाद अब भक्त भी सवाल खड़े करने लगे हैं। हवाई गुब्बारे की भी सीमा होती है। जुमलों की भी मियाद होती है। ऐसे में अब किसी बड़े राग की जरूरत थी। गुजरात के विकास का गुब्बारा फूटने के बाद कुछ बचा नहीं था। गाय और गोबर ने ऊपर से मिट्टी पलीद कर दी। मजबूरी बश एक बयान क्या दिया अपने ही मधुमक्खी की तरफ घेर लिए। ऐसे में मोदी साहब को एक अदद गोधरा चाहिए। बलूचिस्तान के तौर पर उन्होंने कल उसका बीज बो दिया। अब धीरे-धीरे युद्ध का फल तैयार होगा। दरअसल इसकी जितनी मोदी जी को जरूरत है उतनी ही नवाज शरीफ साहब को भी। पाक के अंदरूनी आतंकवाद ने नवाज का गला पकड़ लिया है। ऐसे में अब शराफत से काम नहीं चलता दिख रहा है। लिहाजा सभी घरेलू समस्याओं से जनता का ध्यान बंटाने के लिए उन्हें भी एक युद्ध की दरकार है। यही चीज दोनों बिरयानी भाइयों को एक कर देती है। अनायास नहीं मोदी से पहले ही पाकिस्तान में युद्ध का राग शुरू हो गया है। लेकिन इससे मिलेगा क्या? सब लोग जानते हैं युद्ध इतना आसान नहीं है। और अगर होगा भी तो उससे परमाणु युद्ध का खतरा है। लिहाजा चाहकर भी एक सीमा से ज्यादा आप पड़ोसी को नहीं दबा सकते। इस कड़ी में अगर पाकिस्तान को कमजोर भी किए तो एक बार फिर वहां सेना या फिर मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो जाएंगी। जिसका पूरा खामियाजा भारत को भुगतना पड़ेगा। पड़ोस अगर अशांत रहेगा तो आप भी चैन की नींद नहीं ले पाएंगे। यह बात किसी भी युद्धोन्मादी को समझना चाहिए। हां अगर युद्ध ही मकसद है। और जनता से कुछ लेना-देना नहीं। मोदी जी को किसी भी कीमत पर एक गोधरा चाहिए। तब बात अलग है।

कश्मीर जल रहा है। लेकिन पूरे डेढ़ घंटे के भाषण में कश्मीर शब्द तीन बार आया भी तो वह पीओके के संदर्भ में। क्या कश्मीर की समस्या अब नहीं रही? या फिर इसको हल करने की जरूरत नहीं रही? इसको भुलाने के लिए अब बलूचिस्तान का बुलबुला खड़ा किया जा रहा है। दरअसल मोदी साहब को अब सारी समस्याओं का एक ही इलाज दिख रहा है। वह है युद्ध। क्योंकि वो अब हर तरफ से घिर चुके हैं। गुजरात के दलित हों या कि महंगाई, कश्मीर हो या कि विकास। सभी मोर्चों पर सरकार हांफ रही है। विपक्ष से ज्यादा अपनों ने अब उनका जीना दूभर कर दिया है। हताशा में अब पीएम को ‘पोलिटिकल मैनेजमेंट’ का एक ही रास्ता सूझ रहा है। लेकिन युद्ध किसी चीज का समाधान नहीं होता है। वह कम करने की जगह समस्याएं बढ़ाता है।

कोई भी मुल्क अपने पड़ोसियों को दुश्मन बनाकर महाशक्ति नहीं बन सकता है। अमेरिका और इंग्लैंड इसके उदाहरण हैं। आप पाकिस्तान से, चीन से, नेपाल से सबसे लड़कर महाशक्ति बन जाएंगे। यह संभव नहीं है। कल को बांग्लादेश और श्रीलंका को भी नाराज करने की तैयारी चल रही है। वहीं बगल में आपका पड़ोसी चीन है। पाकिस्तान मजबूती से उसके साथ है। नेपाल उसके और करीब गया है। बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका और मालद्वीव तक में वह पैठ बनाने की कोशिश में है। आप एक से युद्ध करेंगे तो दूसरे पड़ोसी भयभीत होंगे या आपसे प्यार करेंगे? चीन के साथ उनके जाने की जो प्रक्रिया है वह और तेज हो जाएगी। प्रधानमंत्री जी जनता भी अब मूर्ख नहीं रही। वह सब देख रही है। युद्ध तो कारगिल का भी हुआ। क्या उसके बाद अटल जी की सरकार बन पायी? इसलिए इस उन्माद से बचिए। और देश को खांई में मत ढकेलिए। एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी आपको मिली है। उसको समझिए।

बहरहाल कल प्रधानमंत्री जितनी जनता को सामने संबोधित कर रहे थे उससे ज्यादा भीड़ उनके घर में उनके खिलाफ जुटी हुई थी । जिस गुजरात ने प्रधानमंत्री को चोटी पर पहुंचाया था। वही अब उनके विरोध का माडल बन गया है। यह सिलसिला जारी रहा तो बीजेपी के पराभव और नई शक्तियों के उभार की गति एक एकसमान होगी।

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