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Saturday, September 21, 2019

अमीनाबाद का ऐतिहासिक इंडियन बुक डिपो

हिमांशु वाजपेयी। माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पासआउट। जबान ऐसी कि पुरानी दिल्ली की भारी भरकम तमीजदार उर्दू बोलने वाली खवातीनें भी मुंह में तीन बीड़े पान दबा लें, एक दाहिने, एक बाएं तो एक बीच में- ताकि न अलिफ से लेकर जेड तक कुछ भी न निकल पाए। होता तो अलिफ से काफ तक है लेकिन यहां पर जेड पाकिस्तान वाले मरहूम उस्ताद मोइन अख्तर साहब की जबान से लिया गया है जिसे शब्द दिए थे मशहूर सहाफी अनवर मकसूद साहब ने। इनकी मिठास भरी जबान का मुलायजा फरमाएं...

लखनऊ शहर के सबसे सबसे ख़ास मक़ामात में से एक ये है। हज़ारों किताबों से रौशन एक सादा दयार । 1933 में शुरू हुआ अमीनाबाद का इंडियन बुक डिपो। पढ़ने लिखने में दिलचस्पी रखने वाले बेश्तर लोगों ने यहां की ज़ियारत ज़रूर की होगी। जिन्होंने नहीं की उन्हें ज़रूर करनी चाहिए। बग़ैर इसके उनकी तालीम-ओ-तरबियत अधूरी ही रहेगी। यहां आकर लगता है कि ये जगह आसमान की गर्दिश से आज़ाद है। वक़्त इस पर सितम नहीं ढाता। लगातार नए होते इस शहर में अभी कुछ जगहों पर पुरानेपन का हुस्न महफूज़ है। इन्डियन बुक डिपो उन्ही में से एक है। इसीलिए जब मुझसे कोई पूछता है कि लखनऊ में देखने लायक़ जगहें कौन सी हैं ? तो मैं इमामबाड़े, रेजीडेंसी, चौक, हजरतगंज के साथ इंडियन बुक डिपो का नाम भी ज़रूर लेता हूं।
लखनऊ में हिंदी किताबों के मामले में ये जगह अपना सानी नहीं रखती। यूनिवर्सल कपूरथला भी मेरी पसंदीदा जगह है, मगर इंडियन बुक डिपो अब शहर की धरोहर और शान बन चुका है। मैं हमेशा कहता हूं कि इसी शहर के राम आडवाणी साहब और उनकी किताबों की दुकान पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ख़ूब ख़ूब लिखा है। आडवाणी साहब का ख़ुलूस, प्रतिष्ठा और लियाक़त का अपनी जगह पूरा एहतराम है, मगर उन पर मीडिया के मेहरबां होने की दो बड़ी वजह और रहीं। पहली- उनकी दुकान हजरतगंज में थी, अमीनाबाद चौक या नक्खास में नहीं। दूसरी- उनकी दुकान अंग्रेज़ी किताबों की दुकान थी। अगर सच्चाई और इंसाफ के साथ बात लिखी जाए तो शहर की एक भी किताब की दुकान इंडियन बुक डिपो के आस-पास नहीं होगी। मगर मुझे इस अद्भुत जगह पर लोग उस तरह नहीं लिखते।
1933 में भाषा एवम साहित्य के विलक्षण विद्वान ओंकार सहाय ने इसकी स्थापना की और इसे शुरू से ही एक वक़ार अता किया। हिंदी साहित्य जगत में लखनऊ को जितना अमृतलाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा आदि से पहचाना गया उतना ही इंडियन बुक डिपो से भी। शुरू होने के दौर से बाद तक का शायद ही कोई बड़ा हिंदी लेखक हो जो लखनऊ से गुज़रा हो और यहां न आया हो। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तो इस जगह की स्थायी ज़ीनत थे। सरस्वती के यशस्वी संपादक पद्मभूषण श्रीनारायण चतुर्वेदी जी इंडियन बुक डिपो के सबसे बड़े मुरीदों में थे। नगर जी, यशपाल, भगवती बाबू, मुद्रा राक्षस, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, जैनेन्द्र, धर्मवीर भारती, आदि तमाम नाम हैं जो यहां नियम से आते रहे।
ओंकार सहाय जी को जितना उबूर भाषा एवं साहित्य पर था, वैसा ही प्रिंटिंग, पब्लिशिंग और किताबों के बिज़नेस पर भी। उनके बाद इस दुकान को उनके सुपुत्र सुशील जी ने लंबे वक़्त तक कामयाबी के साथ संभाला। किताबों और इसके व्यवसाय से जुड़ी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारियों के भंडार थे सुशील जी। लखनऊ में हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उनकी अपनी मुस्तनद राय थी। पढ़ने लिखने में एक मेयार और तहज़ीब के क़ायल वो हमेशा रहे और उनके यहां आने वाले लोगों को भी उनके ज़रिए ये मेयार अता होता रहा।
सुशील जी के बाद अब काफ़ी सालों से ये जगह चित्रलेखा आंटी संभाल रही हैं। चित्रलेखा आंटी पर तो एक संस्मरण कभी मैं अलग से विस्तार में लिखूंगा। 70 साल की उम्र में भी इतनी ऐक्टिव, इतनी अनुशासित, इतनी मेहनती, इतनी रौबीली, इतनी गरिमामयी, इतनी सुंदर, इतनी ज़हीन, इतनी पढ़ी लिखी, इतनी आत्मीय, इतनी साफगो... उनके जैसी महिलाएं हमने ज़िन्दगी में बहुत कम देखी हैं। इतनी बड़ी जगह कई साल से चित्रलेखा आंटी अकेले दम पर पूरे जाहो जलाल के साथ संभाल रही हैं। बल्कि अब इस जगह की सारी ख़ूबसूरती, सारा नूर सारी ज़ीनत उन्ही से है।
हमारे यहां लखनऊ में अख़बार वालों को कला-संस्कृति की दुनिया मे फ़र्ज़ी हीरो गढ़ने का रोग है। दो दिन कोई शख़्स किसी 'इवेंट' में नज़र आया तो उसे संस्कृतिकर्मी और तीन इवेंट किसी ने करवा दिए तो वो लखनवी तहज़ीब का उद्धारक बना दिया जाता है। ऐसे में   असली लोगों तक पहुंच पाने की तौफ़ीक़ ही किसे है। इस पर स्टोरी कौन करेगा कि 7000 किताबों वाले इस विशाल प्रतिष्ठान को चित्रलेखा जी किस कमाल के साथ संभालती आयी हैं और संभाल रही हैं। ना जाने कितनी पीढ़ियों को उन्होंने पढ़ने लिखने का शऊर दिया है। मेरे जैसे कितने बच्चों को उन्होंने कितना ज्ञान अता किया है। दुकान में आने वाले हर इंसान से, भले भी वो एक भी किताब न ख़रीदे या 1000 किताब ख़रीद ले, चित्रलेखा आंटी बराबरी के साथ बात करती हैं। किताबों के बारे में ग्राहक से बात करना, उसके कंटेंट का विश्लेषण करना, उसकी रुचि समझना, उसे उसके मिज़ाज, ज़रूरत और बजट के हिसाब से किताब उपलब्ध करवाना ये चित्रलेखा आंटी की अपनी पहचान है।
ऐसा ही हर जगह होना चाहिये मगर ऐसा होता कहीं नहीं है। अब तो किताब की दुकानों में भी मॉल कल्चर आ गया है। किताब उठाओ, बिल कटाओ और चलते बनो। बात करने की ज़रूरत नहीं है। बात करोगे भी किससे क्योंकि किताब की दुकान का जो मालिक है या जो किताब उठाने निकालने वाला सहयोगी है या जो काउंटर पे बैठा है, वो ख़ुद ही नहीं पढ़ता। चित्रलेखा आंटी, यूनिवर्सल कपूरथला के सुरेश पाल जी और न्यू रॉयल बुक कंपनी के फुरकान बेग साहब ज़रूर अपवाद हैं। अख़बार में काला संस्कृति कवर करने वाले इसलिए भी इंडियन बुक डिपो पर नहीं लिखते क्योंकि उन्हें स्टोरी के लिए ऐसे लोग चाहिए होते हैं जो मीडिया वालों से मरऊब होते हों, उनके स्टोरी एंगिल में अपने आपको किसी भी तरह ग़लत सही बोल कर फिट कर लें और उन्हें इंस्टेंट कोट देने के लिए उप्लब्ध रहें।
चित्रलेखा आंटी में इनमें से एक भी खूबी नहीं है, उन्हें छपास और पीआर का रोग नहीं है, वो ग़लत-बयानी नहीं करेंगी आपका एंगिल गया तेल लेने, अगर आप रिसर्च करके नहीं आएंगे तो वो आपको फौरन आईना दिखा देंगी और सबसे बड़ी चीज़ कि इडियॉटिक बातों उन्हें बर्दाश्त नहीं होंगी। यही वजह है कि इडियट्स उनके पास जाते घबराते हैं। कुछ लोग को मैंने कहते सुना कि वो डांटती बहुत हैं। मैं इन लोग से कहता हूं कि उस डांट की गहराई में उतरो वहां आत्मीयता, स्नेह और अधिकार का एक अपार ख़ज़ाना छिपा है, जो सतह से नहीं दिखने वाला। घर के बुज़ुर्गों से समझो कभी इस डांट का मर्म। कितनी एनर्जी लगती है, इस तरह हर ग्राहक से विस्तार में बात करने से, जबकि तय नहीं है कि ग्राहक किताब लेगा या नहीं मगर फिर भी चित्रलेखा जी अपनी रविश नहीं छोड़तीं।
डिस्काउंट वाली बात भी बेकार की है।  रेस्टोरेंट में 500 का खाना खाओगे 700 देके आओगे डिस्काउंट नहीं मांगोगे, 150 की फ़िल्म 50 के पॉपकॉर्न के साथ 500 की हो जाती है, वहां डिस्काउंट नहीं मांगोगे मगर किताब की दुकान में डिस्काउंट मौलिक अधिकार है। जबकि अगर किसी किताब का सस्ता एडिशन अगर उपलब्ध है तो चित्रलेखा जी कभी महँगा वाला नहीं देतीं। कभी पुराने एडिशन के दाम चिप्पी लगाकर नहीं बढ़ातीं। जो किताब पूरे हिंदुस्तान में नहीं मिलेगी वो ढूंढकर ला देती हैं, जो प्रकाशन अब बंद हो चुके या बंद होने की कगार पर हैं, उनकी भी किताबें यहां मिल जाएंगी।
आप अपनी जहानत या अध्ययन से उन्हें प्रभावित कीजिये वो बड़े स्नेह से आपको एक किताब गिफ्ट कर देंगी। फिर भी डिस्काउंट तो इज़्ज़त का सवाल है ना। पोस्ट ज़ियादा लंबी हो रही है। पर मौज़ू ही ऐसा है कि तूल लाज़िम है। कहना सिर्फ ये था कि लखनऊ वालों, इंडियन बुक डिपो की ताज़ीम करो, इस धरोहर का एहतराम करो। अगली बार जब अमीनाबाद जाइए तो यहां ज़रूर जाइए, और पत्रकार भाइयों और उनकी बहनों, यहां बहुत सी स्टोरीज़ दफ़न हैं उनको निकाल लाइए।
शुक्रिया।
- हिमांशु वाजपेयी

Wednesday, May 1, 2019

खड़ाऊं चुराकर भागे थे राम, किस मुंह से लड़ेंगे मोदी से चुनाव?

प्रेम प्रकाश जी पेशे से पत्रकार हैं। गाजीपुर के हैं, लेकिन इन दिनों बनारस में हैं और रंग में हैं। बीजेपी से बनारस की सांसदी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मुकाबले में बीएसएफ के तेज बहादुर यादव थे। तब तक तो कुछ नहीं हुआ, जब तक कि तेज बहादुर अकेले थे, लेकिन जैसे समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपनी ओर से उम्मीदवार बनाया, चुनाव आयोग ने उनके सामने कठिन शर्त रख दी और उनकी उम्मीदवारी कैंसिल कर दी। हालांकि इस बीच सेना सेना मोदी मोदी भजने वाले भक्तों का सेना के प्रति आलाप प्रलाप में बदल चुका था। सो प्रेम जी के दिमाग में अचानक प्रकाश हुआ और उसने हम सबको अंधेरे से उस उजाले में खड़ा कर दिया, जहां प्रभु राम हैं। फर्क यही है कि प्रभु राम आज के वक्त में हैं। प्रेम जी ने बेहद शानदार लिखा है। आगे पढ़िए उनकी लिखाई- 

मान लीजिए, अगर पता चले कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम स्वयं महीयसी सीता माता के साथ अकस्मात काशी पधारे और सीधे कलेक्ट्रेट जाकर महामना मोदी जी के खिलाफ पर्चा भर आये, तो क्या सोचते हैं, फेसबुकिया भक्तों की दीवारें कैसे फटेंगी!!

भक्त1- जय श्री राम की ऐसी तैसी, बताइये हम इनका भव्य मंदिर बनवाने में लगे हैं और इनको चुनाव लड़ने की पड़ी है। अरे देशभक्त होते तो टाट में पड़े रहते, लेकिन इनको तो अब संसद की एसी चाहिए। चुनाव लड़ने वाली कौमें क्रांति नही करती। तब क्यो नही लड़े, जब बाप ने देशनिकाला दे दिया था? कौन बाप निकालता है अपने लड़के को ऐसे भरी जवानी में? नाकारा रहे होंगे तभी तो।

भक्त2-पूरे रविवंश में ऐसा कपूत नही हुआ कोई। प्राण जाय पर वचन न जाई वाली परम्परा का तेल निकाल कर रख दिया। माँ बाप ने इनको अकेले वनवास दिया था तो बीवी को भी साथ ले गए। वनवास था कि वनविहार? याद रखियेगा, भाई को भी भाई नही, नौकर बनाकर ले गए थे।

भक्त3- अरे बीवी छोड़नी ही थी तो मोदी जी की तरह छोड़ते, बेचारे धोबी के कंधे पर रखकर बन्दूक चला दी। नाहक बदनाम किया बेचारे गरीब को। यही है, यही है सामंती मानसिकता, साफ पता चलता है कि दलित और पिछड़ा विरोधी आदमी थे। जिस बीवी को छोड़ने के लिए बेचारे धोबी को बदनाम कर दिया, उसी बीवी के लिए ब्राह्मण रावण को मारा बताइये। ये जाति द्रोही आदमी है, इनका तो पर्चा खारिज कर देना चाहिए।

भक्त4- रोज 30 बाण मारते थे। दस सिर और बीस भुजाएं काटते थे। वो सब फिर से उग आता था। देश का धन बरबाद करते रहे, वो तो मोदी जी ने कान में असली राज बताया कि इसकी नाभि में अमृत है। तब जा के 31वाँ बाण नाभि में मारा। तब जा के अमृत सूखा था, लेकिन बिकाऊ मीडिया ये सब नही बताएगा आपको।

भक्त5- मियां बीवी ने मिलकर बेचारे लक्ष्मण को तो मरवा ही डाला था। सोने के मृग वाला इतिहास वामी इतिहासकारों का लिखा इतिहास है। असली इतिहास पढ़िए तो पता चलेगा, मारीच से मिल के लक्ष्मण को मारने का पूरा प्लान था। लक्ष्मण तो समझ भी गए थे पर त्रिया चरित्र भी तो कोई चीज़ होती है।

बीजेपी आईटी सेल- बेकार का, बाप के पैसे पर राज करने का सपना देखने वाला जानकर जब बाप ने देशनिकाला दिया तो हजरत राजसिंहासन का रत्नजड़ित खड़ाऊं चुरा ले गए।भागते भूत की लँगोटी भली। वो तो भरत की पारखी नज़र ने ताड़ लिया और पूरे लाव लश्कर के साथ वो कीमती और ऐतिहासिक खड़ाऊं ले आने वन आये। आप असली इतिहास पढ़ के देखिए, भरत इनको मनाने नही आये थे। वही रत्नजड़ित खड़ाऊं लेने आये थे और पूरे समय वही मांगते रहे, अंत मे लेकर ही माने।

ये है इतिहास इन तथाकथित सूर्यवंशियों का। चुपचाप वही टाट में पड़े रहते तो भव्य क्या, मोदी जी दिव्य मंदिर बनवा देते। लेकिन ये तो देशद्रोही निकले। अब रहिये वहीं।

Tuesday, April 16, 2019

पतझड़ से पहले और बाद की एक बकवास



सबसे पहले शहतूत छोड़ता है अपनी पत्तियां 
और लगभग एक साथ ही हो जाता है नंगा 
डालें, टहनियां सब की सब नंगी 
हवा चलती है तो सर्र से गुजर जाती है 
एक भी टहनी नहीं हिलती शहतूत की 
फिर आती है बारी नीम की 
शहतूत के बाद नीम को नंगा होते देखना 
इतना आसान नहीं है 
वो एक साथ नंगा भी नहीं होता 
धीमे-धीमे मरता है नीम 
और रोज हमें पता चलता है कि 
नीम कितनी तकलीफ में है 
जैसे कि ट्रॉमा सेंटर में बेहोश पड़ा कोई मरीज 
जिसकी रुक-रुक कर सांस चलती है 
जैसे सड़क पर हुआ कोई एक्सीडेंट 
जिसमें भीड़ तो होती है, बस जान नहीं होती 
एक हिस्सा छोड़ने के बाद 
दूसरा हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं होता नीम
लेकिन मौसम उसे नंगा करके ही छोड़ता है। 
जब शहतूत पकने लगती है 
और नीम में आते हैं नए फूल 
तो चलाचली की बेला में होता है बेल 
चार छह बच गए सूखे बेल लटकाए यह पेड़ 
हर हरे के बीच ठूंठ सा खड़ा रहता है 
जैसे कोई बूढ़ा जर्जर खेलता हो बच्चों के साथ 
जैसे समुद्र मे कोई तालाब सा हो 
या फिर बहती नदी के बगल ठहरा हुआ हरा पानी
फिर एक दिन बूंदे बरसती हैं
और बढ़ता है नदी में पानी 
और ले जाता है अपने साथ 
नीम, शहतूत और बेल को भी। 

Wednesday, February 28, 2018

اصلی جادو

کچھ سال پہلے ایودھیا مے ایک شاید کبھی نہ بننے والی فلم کے لئے آڈیشن لے رہا تھا .کلا کی گرمی مے ابلتے لوگو کی کتار
لگی تھی ، پر ہم ٹھنڈے ہوتے جا رہے تھے.بات یہ تھی کی گانے والے سارے کے سارے لوگ کسی نہ کسی کی نکل کر رہے تھے.اپنی نکلی آواز سے وہ ایک مشهور صوفی سنگر کے اسپس پہچنے کی ناکام کوشش کر رہے تھے.یہ نقل ہمارے خواب پر تیزاب ڈال رہی تھی.ہمنے تین چار روز تک آڈیشن لیا .مگر مجال کی ایک بھی سچچی آواز ہم تک پہچی ہو.اس آڈیشن مے کم سے کم دو درجن لوگوں نے گیا مگر ایک بھی آواز ہمرے کانو تک نہ پہچی .

تنگ آکر ہمنے کیمرے کے لینس پر دھککن لگا دیا.ہمی کوئی امید نہیں تھی کی نکل کا جو دھککن گویا بننے کے نے خواہشمندو نے اپنی آواز پر لگا رکھا ہے.اسمے ہمی کوئی مدد مل پیگی.پھر کی دنو تک ان گویوں کا فون آتا رہا.می سمجھتا رہا کی نکل سے کچھ نہیں ہونے والا.ابھی ابھی کچھ دن پہلے فیض احمد فیض کی گزل "دونو جہاں تیری موحبّت مے ہار کے"کے لئے پھر آواز دھندھنی شرو کی.اسمے دو رہے نہیں کی فیض کو چاہنے والے جتنے اپنے معلق مے ہیں اتنے دوسروں ملقوں مے نہیں.لیکن بات جب آواز کی ای تو می اپنے ملک سے ہار گیا.کوئی مہدی حسن بنتا ہے تو کوئی گلام الی .ایک عہدہ کو چھوڈ دن تو اس معاملے مے بھی یہاں کے ناکلچیوں نے ناک کٹوا رکھی ہے -

ہارکر می سیدھا پاکستان پہچا جہاں ایک بینڈ اندھیرے کمرے مے فیض کو اسی حد تک گنتی ہی آواز ملی.جسکے اسپس کوئی موہبّت گلزار ہوتی دیکھتی.آواز شاید سندھ کی تھی اور لہجہ حمد کا تھا.اس آواز کی موحبّت مے می کچھ یوں مبتلا ہوا کی اب تک اسے خود سے چپکے ہوئے ہوں.نہ صرف خود سے بلکی اپنے یہاں کی گلاب باڈی سے بھی اسے چپکا دیا ہے.بگیر کی ساز کے آتی اس آواز کے اپر مہینے ایودھیا فیزآباد کی تصویریں چسپ کے اور وایا انٹرنیٹ اسے واپس پاکستان پہنچا دیا.ایبتآباد کی لبنا اور کراچی کی نور بیگم ان باکس مے اتر این .انکا چپکایا سرقه لال رنگ کا دل میرے ان باکس مے ہمیشہ محفظ رہیگا .فیصلباد مے ان مولوی سحاب کی دوا بھی جو ہماری گلاب باڈی دیکھ برباس نکل پڑی ہوگی "الله تال آپکو ہر نظربد سے محفظ رکھے "یہ اصل آواز کا جادو تھا جو نکل کرنے والے ناکالچی نہیں سمجھیںگے .

Translation- Hafeez Kidwai
Published in Navbharat Times- India

Tuesday, February 7, 2017

नवयुग में निसपच्छता के पराठे (सिर्फ सहाफि‍यों के लि‍ए)

निसपच्छता नामक एक चीज होती है। यह नामक भी होती है और मानक भी होती है। जो लोग इसे नामक मानते हैं वो इसे नमक की तरह लेते हैं। जो लोग इसे मानक मानते हैं वो इसे मन में बसा लेते हैं। निसपच्छता स्वच्छता की अम्मा भी होती है। अगर कोई निसपच्छ नाली में भी पड़ा होगा, तो भी वह साफ माना जाएगा क्योंकि वो निसपच्छ है। निसपच्छ है इसलिए स्वच्छ है। जो लोग निसपच्छ नहीं होते, वो स्वस्थ नहीं होते। अस्वस्थ लोगों के मन में अस्वस्थ दिमाग का वास होता है। अस्वथ दिमाग में स्वच्छ निसपच्छता नहीं रह सकती क्योंकि वहां पहले से ही पक्षधरता के कीड़े बिलबिला रहे होते हैं। निसपच्छता के लिए दिमाग को धोकर स्वच्छ बनाना होता है। उसके बाद उसमें निसपच्छता भरनी होती है। यह कार्य हमें मंगल, गुरु और शनि की शामों में अगरबत्ती जलाकर करना होता है। सोम, बुध और शुक्र को हम निसपच्छता का स्वच्छता के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इतवार को निसपच्छता की छुट्टी होती है तो वह संडास नहीं जाती।

हमें अपने मन में निसपच्छ रहना चाहिए। फैसला करते हुए हमें अपने मन की नहीं सुननी चाहिए। हमें अपने दिमाग की सुननी चाहिए। मन में निसपच्छता पक्षधारी हो जाती है। इसलिए उसे दिमाग में शिफ्ट कर देना चाहिए। इसके लिए अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स की मदद लेने में कुछ भी मायूब बात नहीं। निसपच्छ लोगों को चाहिए कि वह अपनी अपनी कुर्सी से उतरकर सावधान खड़े हो जाएं। हिलना डुलना पूरी तरह से मना है क्योंकि इससे किसी एक पक्ष की तरफ गिरने का खतरा है। गिरने पर निसपच्छता टूट जाती है और गंदी भी हो जाती है। वैसे बाद में इसे फेवीक्विक लगाकर जोड़ भी सकते हैं और नए निसपच्छ बनने वालों को सहाफत डे पर गिफ्ट दे सकते हैं। निसपच्छता को आप बाहर से नहीं सीख सकते। इसे आपको अपने अंदर उगाना होता है। यह दिमाग पर उगने वाला आत्मा का हरा पेड़ है जिसकी पत्ती उसी के सिर पर निकली नजर आती है, जो वाकई निसपच्छ होता है।

जब व्यक्ति वाकई निसपच्छ होता है तो वह अपने मन को बराबर के सत्तर-सत्तर खानों में बांटकर उसमें मोजे रख देता है। यह सारे मोजे वक्त आने पर निसपच्छ रहते हुए सभी पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिए जाते हैं। इससे सब खुश हो जाते हैं और निसपच्छता का भी धंधा चलता रहता है। निसपच्छ दिमाग को याद रहना चाहिए कि निसपच्छता का धंधा होता है, न कि धंधे में निसपच्छता। उसे धंधे की पक्षधारिता का सम्मान करते हुए पूरी तरह से निसपच्छ पराठे ही खाने चाहिए, वह भी पत्तागोभी भरे हुए। याद रखिए, अगर आप निसपच्छ रहेंगे तो सब आपसे प्रेम करेंगे, लेकिन अगर आप पक्षधारी होंगे तो कुछ ही आपसे प्रेम करेंगे। धंधा सबके प्यार से चलता है, कुछ के प्यार से नहीं।

Monday, September 19, 2016

कल्पनाकृत मन का अमृत संसार

मैं और मेरी दिलासा के साथ मेरे बाहरी
जो बाहर रहने लगा, वो बाहरी हो गया। कितने बाहर रहने लगा, कितना बाहर रहने लगा, क्यूं बाहर रहने लगा, बाहर की क्यूं रहता रहेगा, इन सारे सवालों के जवाब की तो दूर की बात, कोई इन सवालों के बारे में भी नहीं सोचता। मैं फैजाबाद में नहीं रहता। मैं बाहरी हूं। मैं दिल्ली में रहता हूं। मैं बाहरी हूं। मैं न्यूयॉर्क में भी रहने लगूंगा, तो भी बाहरी ही होउंगा, मैं फैजाबाद में भी रहने लगूंगा, तो भी बाहर से ही आया कहलाउंगा। मैं हर तरफ से बाहरी हो चुका हूं। मेरे जैसे कितने लोग बाहरी हो चुके हैं। हम बाहरी लोगों का कोई देश नहीं, कोई शहर नहीं, कोई मोहल्ला नहीं। हम कुछ भी करके मर जाएंगे तो भी कोई गली भी हमारी न होगी।

बाहरी हूं, हर बार फैजाबाद बाहर बाहर ही होकर आ जाता हूं। क्या नामीबिया में भी लोग मुझे बाहरी समझेंगे? हां, वहां के लोग भी मुझे बाहरी ही समझेंगे। वो कौन लोग हैं जो मुझे और मेरे जैसों को बाहरी समझते हैं? वो कौन सा अंदर है, जिसमें वो घुसकर लोगों को बाहरी बनाते रहते हैं? क्या वो कल्पनाकृत मन का वो अमृत संसार है जिसे मैं न बना पाया? क्या वो संबंधों का वो व्यापार है जिसे मैं न कर पाया? या फिर घर के अंदर होने वाले वो सारे व्यभिचार हैं, जिनके बारे में मुझे विचार तक न आया? मैं बाहरी हूं और इस हूं में शमशेर के वो सारे हूं अपनी लय के साथ उसी तरह से जुड़े हैं, जैसे मेरा बाहरी होना। शमशेर को किसने पढ़ा है? क्यूं पढ़ा है?


मेरे मोबाइल के सारे नंबर बाहरी हैं और उनमें एक भी नंबर मेरा नहीं है। मैं खुद अपने बाहर बाहर रहता हूं, अपने अंदर अभी मैं ठीक ठीक घुस नहीं पाया। अपने अंदर सबकुछ होते हुए भी सबकुछ बाहर ही होता है। तापमान से हमारा संपर्क बाहरी है। बरसात की बूंदें तो और भी बाहरी हैं। सूरज तो हमारा है ही नहीं। दुनिया कैसे बढ़ती अगर बाहरी न होते?

मैं जानता हूं कि मैं खुद को दिलासा दे रहा हूं। लेकिन यही एक चीज है जो मैं खुद को देता रह सकता हूं। मेरी दिलासाएं मुझसे बाहर नहीं, वो बाहरी नहीं।

Friday, February 12, 2016

इंतजारी हूं, जारी नहीं..

रायता मैं क्‍या बि‍खेरूंगा, मैं खुद में ही इतना बि‍खरा हुआ रायता हूं कि समेटता हूं और फि‍र फि‍र फैल जाता हूं। घबरा जाता हूं लोगों को देखकर और इधर उधर छुपने की कोशि‍श मेरे फैलने को और बि‍खेरती जाती है। सोचता हूं कि इतना फैला दूं इस दुनि‍या में कि अगले दो ढाई सौ सालों तक लोग बस मेरी फैली हुई फि‍सलन को समेटने में सुसहि‍ष्‍णुता से जोर लगा दें, फि‍र भी मेरा फैला हुआ मैं समेट न पाएं। आप कहेंगे कि मैं नकल कर रहा हूं, लेकि‍न असल में मैं क्‍या कर रहा हूं, ठीक ठीक मुझे भी नहीं पता। अच्‍छा होगा कि आप ही कोई बयान जारी कर दें सर ताकि मैं कहीं से तो जारी हो सकूं। अभी जहां हूं, वहां तो सिर्फ फैल ही रहा हूं, जारी नहीं हो पा रहा।

रोज घर से दस गांठ बांधकर चलता हूं और कहीं पहुंचने से पहले ही रास्‍ते में उन्‍हें गुम कर बैठता हूं। कौन कौन सी गांठ कहां कहां से फि‍सल रही है, कौन सी कहां नि‍कल रही है, ईमानदारी से बता रहा हूं, मुझे नहीं पता। पता चल भी नहीं पाता क्‍योंकि फैलना महसूसना इन्‍कार करना है और मैं वाकई फैल रहा हूं। रायता हूं या नहीं, ये भी मुझे ठीक-ठीक नहीं पता, जो पता है वो बस फैलना है। आप लोग घबराते रहि‍ए, अपना लोटा थारी छुपाते रहि‍ए लेकि‍न यकीन भी कि‍ए रहि‍ए मुझपर कि मैं फैल रहा हूं, झूठ बोल रहा हूं।

अब तो जो कुछ भी याद है, वो मेरी फैली हुई फि‍सलन है जहां तक कुछ पहुंचता भी है तो फि‍सलकर फि‍र दूर चला जाता है। बट यू डोंट वरी, यू कैरी ऑन वि‍द स्‍टीफेन किंग। ही इज रि‍यली द किंग ऑफ हॉट एंड सोर रायता यू नो। नो यू डोंट नो। इवेन आइ डोंट नो माईसेल्‍फ एंड आइ डोंट हैव एनी काइंड ऑफ शेल्‍फ। और ये सारी अंग्रेजी भी मुझे समेट नहीं पाती है, ये जानते हुए भी मैं इसे बोलते हुए खुद पर एक डॉट लगाता हूं।

गुनगुनाता हूं वहां कौन है तेरा और खुद को समझाता हूं मुसाफि‍र जाएगा कहां। तेज़ाब वाली माधुरी दीक्षि‍त को मैं सपने में भी नहीं देखता और जिस-जि‍स ने मेरे पैसे मारे हैं, अपनी दाहि‍नी जेब में उनके नाम की लि‍स्‍ट को हर दस मि‍नट बाद उंगली से टहोक लेता हूं। स्‍टीव जॉब्‍स को आज ही मैनें अपने ठेंगे पर रखा है और मार्क जकरबर्ग को ठेठ फ़ैज़ाबादी में तौल के बि‍खेरा है। मिट्टी का नमक मैनें नहीं चखा है और न ही मैनें कोई मरे हुए कवि‍यों का संगठन बनाया है। सुख की तलाश में मैं लौटे हुए घायल को भी देख लेता हूं और एनएसडी में खुश हो होकर जीशान की फोटो के सामने उसकी प्रशंसा भी कर देता हूं।

फि‍र भी, मैं फैल रहा हूं। इंतजारी हूं, जारी नहीं।   

Saturday, January 30, 2016

2- काले होठों वाली स्‍त्रि‍यां

- तस्‍वीर में ऐसी ही काली कुपोषि‍त काया वाली बच्‍ची है
जि‍सके पैरों में चांदी की पायल सर्दी की हलकी धुंध में भी चमक रही है
और एक काले होंठों वाला व्‍यक्‍ति उन्‍हें गोलकर फूस में आग जलाने का प्रयत्‍न कर रहा है।
बक्‍सर में जो समोसे खाने को मि‍ले, उनमें आलू के साथ साथ काले चने भी मि‍ले थे। साथ में टमाटर लहसुन और हरी मिर्च की सि‍ल पर पीसी चटनी थी। जि‍स स्‍त्री ने इसे बनाया, उसका रंग सांवला और होंठ काले थे। जौनपुर में जो समोसा खाया, उसके साथ तलकर नमक से लपेटी हरी मिर्च भी मि‍ली, जि‍से मेरे बगल अपने पति के साथ खड़ी स्‍त्री नहीं खा पा रही थी। उसके होंठ भी काले थे जि‍नपर मिर्च से उतरे नमक के महीन दाने शाम की धूप में चमक रहे थे। मोहनि‍यां से पटना तक के दो सौ कि‍लोमीटर के रास्‍ते में मुझे एक भी स्‍त्री ऐसी नहीं दि‍खी, जो कवि‍यों की कुकल्‍पना के मुताबि‍क हो। अब अगर कोई कवि गुलाबी होंठों को केंद्र में रखकर कोई कवि‍ता कहेगा या कह चुका होगा तो मैं उसे कवि‍ता मानने से इन्‍कार करता हूं और उस कवि की समूची कल्‍पना के आगे सर्वकाल के लि‍ए कु शब्‍द स्‍थापि‍त करता हूं।

नहीं हैं गुलाबी होंठों वाली स्‍त्रि‍यां अपने यहां। होंगी तो कहीं एयर कंडि‍शनर या ब्‍लोअर की छांव तले होंगी जि‍नतक भोजपुर बक्‍सर की नंगी उधड़ी सड़क पर भागते हुए मैं नहीं पहुंच सका। जहां भी पहुंचा, फि‍र चाहे वो कमाली बेगम की मज़ार हो या कौआ डोल या राजगीर की खुरदुरी पहाड़ि‍यां, सर्दियों से सूखे काले होंठ और कुपोषि‍त काया वाली स्‍त्रि‍यों को कंडे पाथते या पुआल धरते पाया। बि‍हार में अभी कई जगहों पर गेहूं बोया नहीं गया है नहीं तो खेतों में उनके जीवि‍त कंकाल काले होंठों के पीछे से मोती चमकाते दि‍खाई देते।

वही स्‍त्रि‍यां
राजगि‍र के उड़न खटोलों में भी वही स्‍त्रि‍यां थीं जो दोनों हाथ के अंगूठों को मुट्ठी में भींचकर अभी ठीक ठीक सैलानी बनना सीख रही थीं। मुंह और आंख, दोनों फाड़कर वो हि‍लते हुए वहां की पहाड़ि‍यों को ऐसे देख रही थीं, जैसे आंखों से ही सारी तस्‍वीरें उतार लेना चाह रही हों। कैमरा क्‍या होता है, काले होंठ वाली उन स्‍त्रि‍यों के लि‍ए कल्‍पना मात्र था, हालांकि सैलानी बनने की ज़ि‍द में उन सबने चोटी पर पहुंचकर वहां 34 रुपये की एक फोटो खींचने वाले तस्‍वीरकार से तस्‍वीर जरूर उतरवाई। लौटते वक्‍त सभी के हाथ में मोती पि‍रोती पन्‍नी मढ़ी एक एक तस्‍वीर थी।

Vishva Shanti Stupa, Rajgir
हालांकि मैं भी अभी सीख ही रहा हूं कि ठीक-ठीक सैलानी कैसे बना जाता है और अफ़सोस से कहता हूं कि मेरी अब तक की सभी यात्राएं मुझे पूरी तरह से सैलानी नहीं बना पाई हैं। हो सकता है कि पांच-सात हजार कि‍लोमीटर चल लेने के बाद मुझमें बंगालि‍यों की तरह इसका कोई हुनर डेवलप हो जाए, फि‍र भी उसमें अभी काफी वक्‍त है और तब तक मैं अधूरा सैलानी, भ्रमि‍त यात्री ही बना रहूंगा, ये तय है। कहते हैं कि बंगाली सबसे अच्‍छे सैलानी होते हैं। हालांकि मेरी ही नामाराशि के एक भाईसाब मि‍थकतोड़ इति‍हास बन चुके हैं, मैं उनका सवा ग्‍यारह भी पा जाऊं तो धन्‍य होऊं। गुलाबी होंठ, गुलाबी आंखें, गुलाबी बदन और जो कुछ भी श्रृंगार के झूठे मानक मुझे आज तक बताए गए, वो कहीं नहीं मि‍ले, इसलि‍ए इस बात का मैं दावा करता हूं कि अपने यहां श्रृंगार के झूठे मानक गढ़े गए हैं। श्रृंगार के असली मानक काली कुपोषि‍त काया में दमकते मोती और पूरे चांद की चमक लि‍ए वो आंखें ही हो सकती हैं जि‍नमें से बातें गि‍रती हैं। इस सौंदर्य की मैं तस्‍वीर उतारना चाहता था लेकि‍न पूरे रास्‍ते मुझे ऐसी कोई भी स्‍त्री मेरी कल्‍पनाजनि‍त मुस्‍कान लि‍ए  नहीं मि‍ली। मुझे तस्‍वीर न उतार पाने और स्‍त्रि‍यों के न हंस पाने पर भी अफ़सोस है।  

1- कौन देता है रास्‍ता


-मोहनि‍यां से पाटलि‍पुत्र जाते गड्ढों की एक छवि।
अब ये पुराने जमाने की बात हो चली कि जब बुलेट चले तो दुनि‍या रास्‍ता दे। दुनि‍या में कोई रास्‍ता नहीं देता और न ही देने को तैयार है। बुलेट क्‍या, कार लेकर भी चलि‍एगा तो सड़क पर बैठा कुत्‍ता भी बगैर हौंकाए नहीं हटता, आदमी तो उससे भी ज्‍यादा जि‍द्दी ठैरा। ये बात जि‍तनी जल्‍दी समझ में आ जाए, उतना अच्‍छा। और फि‍र रास्‍ता कोई देगा कैसे। रास्‍ता होगा तब ना देगा। होबे नहीं करेगा तो क्‍या घंटा देगा। जो कुछ भी रास्‍ता होता है वो होने से कहीं ज्‍यादा गड्ढा होता है, तालाब होता है जि‍सके कि‍नारे से हर कोई बस कैसे भी करके नि‍कल जाना चाहता है। सैकड़ों कि‍लोमीटर गड्ढों और तालाब के कि‍नारे कि‍नारे नि‍कलते जब मन मांझी होने लगता है तो पता चलता है कि कि‍तनी भी हि‍म्‍मत बटोर लें, मन ही मन कि‍तने भी पत्‍थर काट लें, गड्ढे में चलना, उसमें पड़े रहना ही हम सबकी नि‍यति बन चुकी है। फि‍र चाहे हम ऊपी में हों या बि‍हार में, अंतत: हम रास्‍तों में बने गड्ढों में ही होते हैं।

वही... 
रास्‍ता कैसे लि‍या जाता है, उससे ज्‍यादा कैसे सामने वाले को एकदम नहीं दि‍या जाता है, ये हम बनारस में अच्‍छी तरह से सीख सकते हैं। थोड़ा बहुत इसका असर पता नहीं कैसे मेरठ वालों पर पड़ा है, लेकि‍न पूरा पड़ने से रह गया है, इसलि‍ए अभी भी मेरठ में दस मि‍नट की ड्राइव में हम दो मि‍नट इधर उधर देख सकते हैं। बनारस में दस मि‍नट गाड़ी चलाएंगे तो पंद्रह मि‍नट सिर्फ सामने से रास्‍ता छीनने को लपलपाते लोगों से ही नि‍पटने में लगेगा। कहने को तो सब लाल बत्‍ती देखकर रुक जाते हैं लेकि‍न बत्‍ती जब हरी होती है तो वो सामने से आते ट्रक को भी नाली कि‍नारे नि‍कलने पर मजबूर कर दें। पटना और मेरठ में रास्‍ता ले लेने वालों में उन्‍नीस बीस का ही फर्क है, फि‍र भी जबरदस्‍ती आपका रास्‍ता छीनकर जि‍स कद़र बनारसी लाज़वाब करते हैं, वो या तो अपना सि‍र पीटने पर मज़बूर करता है या उनका। उनका तो पीट नहीं पाएंगे क्‍योंकि पीटने और पाटने में उन्‍हें ज्‍यादा यकीन है (बनारस से लेकर पुस्‍तक मेले में वो लोगों को इसकी धमकी भी देते रैते हैं।) तो बेहतर यही होगा कि मेरी तरह अपना माथा पीटें और बगैर कि‍सी से पि‍टे घर सुरक्षि‍त वापस लौटने का यकीन कर अपने हाथ पैर टो लीजि‍ए कि सबकुछ सुरक्षि‍त तो है या रास्‍ते के कि‍सी गड्ढे में कुछ गि‍रा तो नहीं आए।

वही... 
वैसे मोहनि‍यां से पटना वाले रास्‍ते पर लोग खूब पास देते हैं। खुद कि‍नारे कि‍नारे जुगत लड़ाकर चलते रहते हैं और पास मांगि‍ए तो झट आगे जाने के लि‍ए हाथ दि‍खा देते हैं। आगे जाने के लि‍ए जो चीज सामने होती है वो घुटने भर जि‍तने बड़े गड्ढे होते हैं। चाहे रोहतास हो, बक्‍सर, भोजपुर या आरा ही हो, यहां के लोग चाहते ही नहीं कि कोई उनके यहां सही सलामत पहुंच जाए। अगर पहुंच जाता है तो खुशी मनाकर चार लोगों से जरूर गाते होंगे कि अरे, ई त एकदमे सुरच्‍छि‍त पहुंच गइली हो। मुझे कोई ताज्‍जुब नहीं होगा अगर सालों से गड्ढे में चलते गि‍रते सुरक्षि‍त घर पहुंचते इन जि‍लों के लोगों ने इसपर कोई लोकगीत भी बना लि‍या हो क्‍योंकि जो भी लोक है, वो गड्ढे में है और जो गड्ढे हैं, एक बार गि‍रकर देखि‍ए, हर लोक का दर्शन होने की सुनि‍श्‍चि‍त गारंटी है।

कइलीं गढ़इयन का पार
अइलीं रमेसर के सार
लवनी फटफटि‍या औ कार
उखड़ा नाहीं एक्‍को बार
चना जोर गरम।

Sunday, November 16, 2014

हम पुरुषों का स्‍पेस

हम पुरुषों का भी एक स्‍पेस होता है। पता नहीं महि‍लाएं इस स्‍पेस के बारे में कि‍तना समझती होंगी और कि‍तने पुरुष इसे स्‍वीकार करते हुए भी अस्‍वीकार करना चाहेंगे, पर हकीकत यही है कि हम पुरुषों का भी एक स्‍पेस होता है। हम उस स्‍पेस में अपने दोस्‍तों के साथ कभी गा रहे होते हैं या दूसरे के रोने पर जरा सा स्‍त्रैण होकर उसके सि‍र को अपना कंधा और पीठ को हथेलि‍यों की गर्माहट दे रहे होते हैं। उस स्‍पेस में हम साथ साथ नशा करके एक साथ जोर का ठहाका लगा रहे होते हैं और ठहाकों में मगन हमें इस बात का भी ध्‍यान नहीं रहता कि अगल बगल के लोग हमें अजीब नजरों से देख पागल सा कुछ समझ रहे होते हैं। उस स्‍पेस में कभी कभी रात यूं चुटकी में गुजर जाती है कि दि‍न का होना ही अखरने लगता है। वहां हम पहाड़ों के तीखे मोड़ों पर एक दूसरे के पीछे बाइक लेकर भाग रहे होते हैं या मैदानों में कार के डैशबोर्ड पर पैर टि‍काए कुछ गुनगुना रहे होते हैं। ये इस दीन दुनि‍या से थोड़ा दूर होता है, पर इतना दूर भी नहीं कि दो बोतल बि‍यर के साथ एक पनीर टि‍क्‍का 20 मि‍नट में न मि‍ल सके। हम थोड़े से स्‍वार्थी होते हैं, थोड़े से लालची होते हैं और थोड़े से नकलची भी। थोड़ी देर के लि‍ए अकल का इस्‍तेमाल मुल्‍तवी करके हर कि‍सी के बारे में एकदम पुरुषों की तरह बात करते हैं, हर कि‍सी को एकदम पुरुषों की तरह बरतते हैं। असल में इस स्‍पेस के खत्‍म होने तक हम सब बेतरतीब नशे में सरोबार होते हैं। शायद इसलि‍ए कि एक बार फि‍र से हमें अपने स्‍पेस के खत्‍म होने के दुख के साथ उस सुख भरे समय के वापस लौटने का इंतजार करना होता है। जो फि‍र पता नहीं कब मि‍लता है, पर मि‍लता है कभी कभी।

और जब फि‍र से ये स्‍पेस मि‍लता है तो हम जल्‍दी जल्‍दी पहले तो नए ट्रैक सुनाने लगते हैं, अपनी नई पुरानी गर्लफ्रेंड्स के कि‍स्‍से तो जैसे कि हमारी जबान पर होते हैं। ठीक है, कई लोग शादीशुदा होते हैं पर दुनि‍या ऐसे नहीं न चलती आई है ना। एक जीवन में हर पुरुष के हर कि‍सी से संबंध होते हैं और हर संबंध अपनी अलग तरह की व्‍याख्‍याएं लि‍ए रहते हैं। हम एक दूसरे के साथ शेयर करके एक तरह से खुद को पापमुक्‍त करने की दि‍लासा सा दे रहे होते हैं। पता नहीं कितनी पापमुक्‍ति कराते हैं हम इस स्‍पेस में, कभी गि‍नती न हो पाएगी। पहले पैग में तीन तो दूसरे में पांच और पांचवे में हर सि‍प पर चि‍यर्स करते हैं, ठहाका लगाते हैं, थोड़ी सी अश्‍लील बातें भी करते हैं। और थोड़ी देर बाद अश्‍लील बातें ही करते हैं। फि‍र हम तरह तरह के लोगों की बुराइयां करते हैं और उन्‍हें जमकर गालि‍यां देते हैं, ये भूलकर कि हम उजाले में नारीवाद की बातें करते हैं या उसका वि‍रोध करने वालों का वि‍रोध करते हैं। हमारा ये स्‍पेस या फि‍र स्‍पेस का नशा हमें बहुत ही सुवि‍धाजनक और स्‍वार्थी मोड में ले आता है, जो कि ईमानदारी से, हर कोई होना चाहता है। इस स्‍पेस में हम पकोड़े से लेकर आधी जली सि‍गरेट तक की कसम खाकर और नि‍भाकर भी दि‍खाते हैं। हर जगह आराम से खुजा सकते हैं और जहां हाथ न पहुंच रहा हो, वहां खुजाने को भी कह सकते हैं।

इस स्‍पेस में हम दुनि‍या की सभी वर्जित चीजें करने के लि‍ए पूरी तरह से स्‍वतंत्र होते हैं। हमें पता है कि लोगबाग हमारे इस स्‍पेस  से जलते भुनते और कुढ़ते हैं, पर हमारी ये जगह हमें उनपर भी हंसने ठहाका लगाने पर मजबूर कर देती है, जो ऐसा करते हैं। कुछ लोगों के जीवन में ये स्‍पेस मंगलवार को भी आता है तो कुछ लोग इसे हर गुरुवार में तलाशते हैं। हमें पता होता है कि हम इस स्‍पेस की एक बड़ी कीमत चुकाएंगे, इस पाप को हम ही भुगतेंगे, फि‍र भी चूंकि बेसि‍कली हम सब पापी ही हैं, तो हम पाप करते हैं। हमें पता होता है कि जीवन में ये स्‍पेस न हर मंगलवार आना होता है और न हर गुरुवार। फि‍र भी हम दि‍न का इंतजार करते हैं। हम हर दि‍न अपने उसी स्‍पेस के इंतजार में सि‍गरेट के धुंए के छल्‍ले उड़ा रहे होते हैं, या मेरी तरह पान खा रहे होते हैं। पापी स्‍पेस का इंतजार, पाप करने के लि‍ए। 

Monday, November 3, 2014

रोज थोड़ा सा और लंगड़े हो जाते हैं

कभी कभी सोचता हूं कि आदमी अपनी पूरी जिंदगी में कि‍तनी बार मरता होगा। पानी नहीं है तो प्‍यास से मर जाता होगा, हवा नहीं है तो सांस से मर जाता होगा। जमीन तो जमीन, लोगबाग आसमान में भी जाकर मर जाते होंगे। फि‍र भी, एक अदद जिंदगी अपनी ही कि‍तनी मौतों की जि‍म्‍मेवार होती होगी, इसका हि‍साब लगाना जरा टेढ़ा काम है। सुख की तकलीफदेह पड़ताल में लगे हम लोग रोज ही तो मरते हैं। सुख मि‍ले ना मि‍ले, तकलीफ जरूर मि‍लती है। वास्‍तवि‍क मौत की पीड़ा से दूर हम उसे ही रोज का मरन समझकर खुद को घसीटते रहते हैं, रोज अपनी टांग का एक हि‍स्‍सा काटकर कम कर देते हैं और रोज थोड़ा सा और लंगड़े हो जाते हैं। और फि‍र जब कोई कहता है कि सलीम लंगड़े पर मत रो, तो बेसाख्‍ता हंसी नि‍कल ही जाती है। हम मरते हुए भी हंसते हैं और हंसते हुए भी मर रहे होते हैं। मरते मरते हमें मोबाइल फोन याद आने लगता है, उसके कीपैड पर उंगलि‍यां तो फि‍राते हैं, पर असल में समझ नहीं पाते कि अपनी मौत के वक्‍त हम अपने सबसे पास कि‍से देखना चाहते हैं। दरअसल हम तय न करने की स्‍टेज में हमेशा होते हैं। तय न करने देना खुद को थोड़ा सा और ढीला छोड़ना है, मरने से पहले एक जरा सा आराम करना है, एक लंबी सांस होता है ये तय न करना। सांस नि‍कली और दम छोड़ा। हर सांस के बाद की मृत्‍यु और हर सांस से पहले का जीवन हमें एक ऐसे कुंए में बैठाए रखता है, जहां बस हम ही हम होते हैं। और फि‍र हम कि‍तना भी तय कर लें, कि‍तना भी प्रेम कर लें, कि‍तनी भी घृणा कर लें, कि‍तने भी दुखी हो लें, कि‍तना भी रो लें, कुंए में अकेले पड़े हम खुद को अंतत: जिंदा ही पाते हैं। शायद कि‍सी के पास जवाब हो कि क्‍या सांस चलने का नाम ही जीवन है। शायद कोई ये बता दे कि मुक्‍ति कहां है और इसी एक शायद का जवाब पाने के लि‍ए कहां कहां नहीं भटकते। ज्‍यादा परेशान होते हैं तो कि‍सी मन वाले से बात करके दि‍लासा देते हैं कि हम बोल रहे हैं, हमसे आवाज नि‍कल रही है, हम जिंदा हैं। और ज्‍यादा परेशान हुए तो मनपसंद जगह पर जाकर फि‍र एक बार दि‍लासा देते हैं कि वो पेड़ सुंदर है, पहाड़ सजीव है और फूल महकता है, इसलि‍ए हम जिंदा हैं। पर क्‍या वाकई हमारी दि‍लासा हमको लगती है। क्‍या वाकई दि‍लासा नाम की कोई चीज होती है। क्‍या वाकई जीवन नाम की कोई चीज हम जीते हैं...

महानगरों की दीवारों के बीच कैद हुए हम अपनी टूटी चप्‍पल और जूते के छेद को नि‍हारते हुए बस गुमसुम जिंदगी काटने को जि‍स तरह से अभि‍शप्‍त हैं, वो शाप रोज होने वाली मौतों से भी नहीं टूटता। दीवारें हैं कि चारों तरफ से खि‍सकती हुई खुद को खुद में चुनने के लि‍ए आगे भी नहीं बढ़तीं, उनके आगे बढ़ने के लि‍ए नशे की दरकार होती है। और फि‍र नशे के बाद वही दीवारें काटने को दौड़ती हैं, लहूलुहान कर देती हैं जहां इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो लाल हैं या सफेद या क्रीम कलर की। फर्श धुली हो या गंदी हो, कांच की जो कि‍रचें रोज ब रोज चुभती हैं, उनसे नि‍जात पाने के लि‍ए उन्‍हें चुनचुन कर हटाने की जद्दोजहद कि‍तना घायल कर जाती है, इसे समझने में पूरी एक जिंदगी नि‍कल जाती है और हमें उन्‍हें न समझने के लि‍ए, न सोच पाने के लि‍ए कि‍तने केमि‍कल अपने अंदर डालने होते हैं कि पूरी जिंदगी ही केमि‍कल का लोचा बन जाती है। सुंदरता के सुख को पाने के लि‍ए हम रोज कि‍तने धोखे देने के लि‍ए तैयार रहते हैं, कि‍तने धोखों के जाले अपने दि‍माग में बनाते हैं, इसका कोई पार ही नहीं है। कोई हंसता है, कोई ठठाकर हंसता है, कोई पार्क जाकर हंसता है, कोई यमुना कि‍नारे जाकर हंसता है, बस यही नहीं समझ में आता कि हम हंस रहे हैं या चि‍ल्‍ला रहे हैं। वैसे हंसी आती है तब, जब पता चलता है कि हम अपनी रोज की मौतों से उतना परेशान नहीं होते हैं, जि‍तना दूसरे की लंगड़ी चाल देखकर खुश होते हैं। अजीब हैं हम लोग.. एकदम अजीब। 

Tuesday, July 22, 2014

अंडरलाइन उदासी

फोटो- गार्जियन के लि‍ए एटकिंस भाई साब
आखि‍रीबार वो कब उदास हुआ होगा। अचानक ही ये सवाल उसके जेहन में कौंधा और चूंकि सवाल बावस्‍ता था तो जवाब खोजने की कोशि‍शें शुरू होनी भी लाजमी थीं। पर उदासी से जुड़ा ये सवाल उदास करने की बजाय परेशान ज्‍यादा कर रहा था क्‍योंकि डॉक्‍टर की दी गई गोलि‍यों को लगातार दि‍न में दो बार दो साल तक खाने के बाद उसे कई सारी चीजें भूल गई थीं। दि‍माग की हार्ड डि‍स्‍क से एक तरह से इरेज सी हो गई थीं। फि‍र भी सवाल मुंह बाए सामने खड़ा था और खुद से ही जवाब की दरकार कि‍ए जा रहा था।

कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। इस सवाल का जवाब खोजने में उसने कामवाली को चार बार डांटा और पांचवी बार दोबारा आने से मना कर दि‍या। उदासी का ये सवाल उसे चि‍ड़चि‍ड़ा कर रहा था पर बता के ही नहीं दे रहा था कि कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। क्‍यों नहीं उसने अपनी आखि‍री उदासी को अंडरलाइन करके कि‍सी वर्डफाइल में सेव कर रखा था। बोल्‍ड इटैलि‍क भी कर देता तो भी शायद काम चल जाता। पर दवाइयों का जो असर था, उनकी वजह से उसे वर्ड की वो फाइलें ही याद नहीं रह गई थीं जि‍नमें उसने अपनी उदासि‍यों को, अपनी खुशि‍यों को या अपनी कि‍सी भी चीज को अंडरलाइन कि‍या था। मतलब जवाब सामने तो था, पर जवाब सामने रखी कि‍न चीजों में था, ये याद नहीं। गनीमत रही कि सवाल उसे याद रहा।

आखि‍री बार की उदासी को पता लगाने के लि‍ए वो बाकायदा बाजार गया और लाला बैजनाथ की मूढ़ी संग प्‍याज की पकौड़ी जबरदस्‍ती उस लाल वाली चटनी के साथ खाई जो जबान पर आते ही जैसे कारबाइड की गैस बनाती थीं। सोचा कारबाइड से उसे कुछ याद आए। कारबाइड के साथ उसकी खुशी का पुराना रि‍श्‍ता रहा था। चाहे वो दि‍वाली हो या आम या केले का मौसम... कारबाइड उसके लि‍ए हमेशा खुशी लेकर आया था और तब तक उसने भोपाल की त्रासदि‍यां नहीं सुनी थीं, देखने की तो बात दूर की रही। बहरहाल, खुश होने की गैस मि‍लने के बावजूद मुसीबत बढ़ती जा रही थी क्‍योंकि उदासि‍यों की याद के जवाब के लि‍ए कमबख्‍त को ए बी या सी या डी का ऑप्‍शन भी नहीं दे रहा था जि‍ससे कि कम से कम तुक्‍का तो भि‍ड़ाया जा सकता था और वो उस तुक्‍के से संतुष्‍ट भी हो जाता क्‍योंकि कोई भी, सि‍वाय उसके, उस तुक्‍के को गलत नहीं ठहरा सकता था। जाहि‍र है कि ऑप्‍शन नहीं थे इसलि‍ए अब तक उसके पास कोई जवाब नहीं था।

ऐसा नहीं है कि सबकुछ एकसाथ गायब हुआ हो। हो ये रहा था कि एक लाइन याद आती थी फि‍र उसके दो दि‍न या चार महीने के बाद की लाइनें याद आती थीं। दि‍माग में गोले फूट रहे थे तो जीभ पर कभी गोले तो कभी कांटे उगने से परेशान वो बैठे बैठे उठ जाता था तो खड़े खड़े बैठना भी पड़ रहा था। सोचा कि कि‍सी को फोन करे, पर नहीं। सोचा कि शायद फेसबुक के टाइमलाइन पर हो, पर नहीं। सोचा कि शायद ब्‍लॉग में हो पर वहां भी नहीं। ऑरकुट तो पहले ही खत्‍म हो चुका था। उदासी की तलाश थी कि खाए जा रही थी, सि‍र धुने जा रही थी।

अचानक बत्‍ती जली। आखि‍रकार वो ये क्‍यों याद करना चाहता था कि वो आखि‍री बार कब उदास हुआ था। सवाल फि‍र से शुरू हो गए। जीभ पर गोले और कांटे फि‍र से बनने लगे। इस पर तो उंगलि‍यों में झनझनाहट भी हो रही थी। उसने तुरंत अपने साइकैट्रि‍स्‍ट को फोन लगाया। बताया कि एक बार फि‍र से उदास होना चाहता हूं। साइकैट्रि‍स्‍ट हंसा, तुरंत उसने दो दवाइयां नोट कराईं और बोला, ज्‍यादा उदास होने की जरूरत नहीं। अब वो नए तरीके से उदास होने लगा। उसने अभी तक वो दवाइयां नहीं खरीदी थीं। उसके पास उदासी की सबसे बड़ी वजह थी कि वो एक बार फि‍र से उदास होना चाहता था। साथ ही उसके पास अपने लि‍ए एक अच्‍छी खबर भी थी कि उसे उदासि‍यां याद नहीं आ रही थीं। 

Tuesday, May 20, 2014

एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश

सुबह-सुबह कबूतर की गुटरगूं और तेज चलती हवा के साथ आई चमकीली चटीली धूप से जबरदस्‍ती आंख मूंदे रह पाना मुमकि‍न न लगा तो मैं बि‍स्‍तर पर उठकर बैठ गया। आंखें मलीं लेकि‍न उनमें आधी रात के बाद आई नींद का अधूरापन तारी था तो मैनें उठकर अपने बड़े वाले बक्‍से पर रखी रूमाल ले ली। आलमारी घर में एक भी नहीं है इसलि‍ए दान में मि‍ले बक्‍से को ही आलमारी बनाना पड़ रहा है। पता नहीं कैसा तो मेरा मकान मालि‍क है कि कमरे में पूरी चार दीवारें एक छत एक खि‍ड़की और यहां तक कि एक दरवाजा भी लगा दि‍या, लेकि‍न एक अदद आलमारी, जि‍सके बगैर कमरे में रहने वाला अधूरा रहता है, बनवाने की उसे बि‍लकुल भी नहीं सूझी। बक्‍से से रूमाल लेकर मैं फि‍र से बि‍स्‍तर पर आकर बैठ गया और मैनें उस रूमाल से अपनी आंखों से बार बार नि‍कलने वाले आंसू पोंछे। नहीं, मैं रो नहीं रहा था, नींद बजोरी मुझे रुला रही थी। मैनें एक बार रूमाल से अपने आंसू पोंछे तो कुछ देर बाद फि‍र से नि‍कलने लगे तो फि‍र से पोंछे। तीसरी बार आंसू थोड़ी देर में नि‍कले इसलि‍ए थोड़ी देर बाद पोंछे। इस झाड़ू पोंछे के चक्‍कर से नि‍कलने के बाद मैनें दूर रसोई की खि‍ड़की पर रखे च्‍वनप्राश के डि‍ब्‍बे को देखना शुरू कि‍या। थोड़ी देर बाद उसे फि‍र से देखा और उसके थोड़ी देर बाद फि‍र से देखा। इसके बाद मैं अपने बि‍स्‍तर से उठा और खड़ा हो गया और रूमाल वहीं पर छोड़ दी। इस बार मैनें कुछ तय कर लि‍या था। मैं आहि‍स्‍ते आहि‍स्‍ते चला और कमरे से बाहर नि‍कल गया। कमरे से बाहर नि‍कलने के बाद मैनें खुद को अपने आंगन में पाया। आंगन में भी मुझे चलना ही था क्‍योंकि कमरे से तो मैं कुछ तय करके चला था ना। इसके बाद मैं अपनी रसोई के दरवाजे से होता हुआ उसके अंदर पहुंचा और खि‍ड़की के सामने आकर एक बार फि‍र से च्‍यवनप्राश का डि‍ब्‍बा देखा। मैनें एक चम्‍मच लि‍या और डि‍ब्‍बे का ढक्‍कन खोला। मैनें चम्‍मच उसमें डाला और भर चम्‍मच च्‍यवनप्राश नि‍काला। इसके बाद मैनें एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश खाया।

कुल मि‍लाकर मैनें आज सुबह उठकर एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश खाया। बस बात इतनी सी ही है।

(हो गई ना दि‍माग की दही... कसम से मेरी भी होती है।)

गनीमत थी कि खटि‍या में पाया था

अबसे मैं बनि‍यान पहनूंगा तो उसके पहनने का तरीका लि‍खूंगा। ये भी लि‍खूंगा कि‍ बनि‍यान पहनने के बाद मैनें बुधवार को लाल रंग की चड्ढी पहनी थी जि‍समें नाड़े की जगह इलास्‍टि‍क लगी थी। ये भी कि‍ इलास्‍टि‍क थोड़ी टाइट थी इसलि‍ए कमर पर रेघारी पड़ गई थी। ये भी कि‍ सुबह कामवाली दाल भात पका के तो गई लेकि‍न दाल में इतना पानी भर गई कि दो बार पानी पसाना पड़ा। हालांकि‍ कोई सुंदर प्‍लेट कटोरी नहीं है मेरे पास, हॉस्‍टल की चुराई तीन थालि‍यां हैं जि‍नमें चार खाने हैं और खाना सज भी नहीं सकता, फि‍र भी मैं अपने बेढंगे ढंग के खाने को जि‍स पचास रुपये के दो सौ ग्राम वाले अचार के साथ खाउंगा तो उसकी फोटो पोस्‍ट करके दो की जगह तीन बार पानी पसाने की बात भले ही झुट्ठे लि‍खूंगा, पर लि‍खूंगा जरूर। चैनल पर रबीस बाबू अगर छींके भी तो उन्‍हें भी बकअप रबीस, का गजब कर गुजरे... भरे स्‍टूडि‍यों में छींक मारे... तुम सच में अलग हो रबीस, ये भी लि‍खूंगा। मैं लि‍खूंगा कि जब मैं घर लौटकर आया तो अरगनी पर टांगी दो तौलि‍या एक चड्डी में से चड्ढी उड़कर खटि‍या के पाए से उलझी पड़ी थी। वो तो गनीमत रही कि‍ खटि‍या में पाया था नहीं तो उड़कर का जनी कहां चली जाती। इकलौती नहीं है फि‍र भी जि‍तनी पुरानी चड्ढि‍यां हैं, सबको करीने से लगाकर फोटो लूंगा और मेरी बात का यकीन मानि‍ए, मैं बड़ा ही मार्मिक लि‍खूंगा कि यही तो वो सामान था... खैर। मैं लि‍खूंगा और अब से हर चीज लि‍खूंगा। आपके दि‍माग का दही होता रहे तो क्‍या, वैसे भी गर्मी का सीजन है, दही की लस्‍सी सबको चाहि‍ए होती है भई....

Wednesday, March 5, 2014

हम चले पतंग उड़ाने

मैडम, जैसे आपका मलमल का लाल (फि‍क्‍स नहीं है, मने आप अपनी पसंद का भी रंग चूज कर सकती हैं।) दुपट्टा उड़ता जाता है, वैसे ही हमारी पतंग भी उड़ती है। आपके दुपट्टे की तरह हमारी पतंग का भी रंग फि‍क्‍स नहीं है। बल्‍कि‍ हम तो ये भी शर्त लगाने के लि‍ए तैयार हैं कि हमारी पतंग में कि‍सी भी देश के दुपट्टे, स्‍कार्फ, बुर्के से ज्‍यादा रंग हैं। कि‍तनी तो रंगीन है हमारी पतंग...ठीक  उतनी ही जि‍तना कि उड़ना होता है, जि‍तना कि उड़ते हुए को थामना होता है। याद है मैडम...एक बार आपने कहा था कि यू ड्राइव मी क्रेजी। हम उसी वक्‍त समझ गए थे कि आपका मन पतंग हो रहा है, पर जींस दूसरे से कंट्रोल कि‍ए जाने के हैं तो पतंग ही हो रहा है, गौरया का नहीं। सेल्‍फ ड्राइव का मोड नहीं बन पाया ना आपका। बहरहाल, आप कीजि‍ए सेल्‍फ ड्राइव मोड में आने  की प्रैक्‍टिस औ हम चले पतंग उड़ाने


अब देखि‍ए ना, हमारे पास एक नहीं, बल्‍कि दो दो पतंगें हैं। एक बड़ी त दूजी छोटी। मजे की बात तो ये कि दोनों बड़ी तेज उड़ती हैं। कोई कि‍सी से मजाल कि राई रत्‍ती कम हो जाएं। एक पुरानी उड़ाका, न जाने आसमान में कि‍तनी पतंगें काट के आई है त दूजी नई उड़ाका जि‍सके तो ठीक से कन्‍ने भी न बंधे। एक मि‍नट, जरा बड़ी वाली उतार लें, कैसी तो लंफ लंफ के नाच रही है आसमान में कि दूसरी वाली सही से टि‍क भी नहीं पा रही है। अब दूसरी वाली का कन्‍ना वन्‍ना ठीक से बांध लें तो दोनों को उड़ाएंगे। हां, सही सुन रही हैं मैडम, दोनों को उड़ाएंगे। आखि‍र दो दो हाथ हैं न हमारे। यकीन मानि‍ए, हम इंसाफ में यकीन रखते हैं तो एक को जि‍तना ऊंचा ले जाएंगे, हम वादा करते हैं कि दूसरी भी उतनी ही ऊंची उड़ेगी।

हम कन्‍ना बांध दि‍ए हैं कायदे से छोटी वाली पतंग का। अब देखते हैं कि कैसे बड़की पतंग इससे ज्‍यादा हरहराती है। 

Tuesday, October 23, 2012

सोचने से बंद करने के सलीकों पर...


1
सोचता हूं..
न सोचूं तुम्‍हें,
न सोचूं किसी और को,
न सोचूं खुद को,
न सोचूं न हो कोई सोच, पर...
सोचता हूं
2
सोचता हूं
न सोचूं उस भीड़ को,
न सोचूं उस लोहे को,
न सोचूं उस पीतल को,
न सोचूं, पर ये सोच..
सोचने पर मजबूर करती है..
3
सोचता हूं
न सोचूं उन रास्‍तों को
जो वापस आने में करते हैं मदद
न सोचूं उन तरीकों को..
जो करते हैं नॉर्थ और साउथ पोल का काम
और ये सारे पोल मिलकर..
सोच को जोड़ते रहते हैं, मुसलसल.. 
मुझे नहीं पता कि अमित को ये फोटो कहां से मिली, पर उनके साधू कलेक्‍शन देखने लायक हैं। 
4
सोचता हूं
गाल दबाकर उन न सोचने के तरीकों पर
कि न सोचूं सोचने से बंद करने के सलीकों पर
पर क्‍या करें..इस सोच का
न जाने क्‍या क्‍या
सोचता हूं..
5
वैसे तो सोच को होना चाहिए 
लंबा, मुसलसल और... 
सोचने पर, 
पर फिर भी इससे इतर 
सोचता हूं, 
कि क्‍यों सोचता हूं। 

Sunday, July 22, 2012

मुझे भाग जाना था उस दिन...


उस दिन
अगर मैं भाग जाता
तो शायद बच जाता
या फिर
अपने पीछे छूटे लालच को
अपने आगे खडे लालच से
टकराने देता
तो भी बच जाता।

भागने की कसक
बाकी है अभी भी
और शायद इसीलिए
भूत से भाग रहा हूं,
भविष्‍य से भाग रहा हूं
वर्तमान में हूं।

वर्तमान भी स्थिर नहीं
भागना जारी है
मुसलसल
हर किसी से
हर चीज से
क्‍योंकि भागते भागते
पता चला है कि
भगोडे ही सबसे तेज भागते हैं
सबसे आगे जाते हैं।

जबसे पता चला भगोडों के बारे में
भागने की अदम्‍य इच्‍छा के बावजूद
मेरे कदम उठने का नाम ही नहीं ले रहे
जैसे स्थिर है वर्तमान,
वैसे ही जड हो चुके हैं कदम।

अब मैं
पीछे देख सकता हूं
आगे भी देख सकता हूं
पर खुद को खो चुका हूं क्‍योंकि
खुद को देख ही नहीं पा रहा हूं मैं। 

Saturday, December 10, 2011

कहानी

घर से निकलते वक्त उसने सोचा नहीं कि जाना कहां है, बस एक झोंक में निकल गया। इतना जरूर सोचा कि बस जाना है, चले जाना है। कूकर की सीटी बज रही थी। शायद आलू उबालने को डाले होंगे। रोज रोज उबला हुआ आलू ही तो मिलता है। तंग आ गया है वो। पर किससे? उबले हुए आलू से या उबल रही जिंदगी से? या फिर जाना कहां है, इस सवाल से? इतने सारे सवाल, पर जवाब एक भी नहीं सूझ रहा था। शायद इसीलिए उसने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि जाना कहां है।
चमन नाम है इसका। नाम पर मत जाइये, नाम में या रखा है? बाबा शेकेस्पियर भी कह गए थे। कहावत भी है आंख के अंधे नाम नयनसुख। बहरहाल चमन की जिंदगी में फूल कम और झड़ रहे पत्ते ज्यादा मिले। कभी किसी नाम से तो कभी किसी नाम से। अब इतने सारे नाम एक साथ तो याद नहीं रखे जा सकते। एक एक करके ही याद आते हैं। जिंदगी भी या चीज है... एक एक करके जीते हैं, एक साथ नहीं जी सकते, एक बार में नहीं जी सकते। टूटती जुड़ती बिखरती सिमटती जिंदगी।
बाइक में किक लगाई, एक्सीलेटर लेना शुरू किया। घूं घूं करके इंजन बार बार बंद हो रहा था। किसी तरह स्टार्ट की और निकल पड़ा। शहर, शहर की सड़कें और शहर की गलियां। एक भी तो उसे नहीं पहचानतीं। लोग भी उसे बगैर देखे निकल रहे हैं। लड़कियों को वो देख रहा है पर उसे लड़कियां नहीं देख रहीं। सपाट चेहरा, चेहरे पर कोई भाव नहीं। भाव होता तो शायद लोग देखते। पर अभी वह पागलपन तक नहीं पहुंचा। भाव तो पागलों के चेहरे पर आते हैं, कभी हंसने के तो कभी रोने के। कभी ठहाका लगाकर हंसने के तो कभी बुक्का फाड़कर रोने के। वह सोचने लगा कि यों न वह भी ऐसा ही करे। बेवजह हंसने लगे, बेवजह रोने लगे। या पागल भी चीजें बेवजह करते होंगे? उस दिन साइकैट्रिस्ट के साथ होने वाले बात उसे याद आने लगी। लोग पागल क्यों होते हैं? दरअसल कोई भी एक चीज जब असहनीय हो जाती है, तो सारी चीजें असहनीय होने लगती हैं। पर दिमाग में हिट लगातार उसी एक चीज का रहता है। मानसिक संतुलन खोने के लिए जरूरी नहीं है कि वही हिट हो, असहनीय चीजों के बंडल में से कोई भी एक हिट मानसिक असंतुलन बिगाड़ देती है। पागल जो हंसता है या रोता है, वह उन्हीं असहनीय चीजों पर हंसता या रोता है। उसे कभी लगता है कि उसका कुछ बिगड़ गया तो कभी लगता है कि सबकुछ बिगड़ गया। यानि कि पागल इमानदार होता है, भावनाओं के प्रति। काश वह भी पागल होता, कम से कम अपनी भावनाओं के प्रति तो ईमानदार होता।
गंज बाजार में तगड़ा जाम लगा था। दिमाग में भी लगा था। पीछे से रिशे वाले बढ़ो बढ़ो चिल्ला रहे थे तो आगे वाले हवा में बढ़ने का इशारा कर रहे थे। दुकानें थीं कि देखने को ही नहीं मिल रही थीं। कम से कम दुकानों पर सजे सामान को भावनाएं दी जा सकती हैं। योंकि पता होता है कि उनमें कोई भावनाएं नहीं होतीं। उनसे किसी तरह की भावनाओं की अपेक्षा भी नहीं होती। कितने ईमानदार होते हैं दुकानों पर सजे सामान। वह एक जैकेट देख रहा था। जैकेट का कॉलर छोटा था जो उसे पसंद तो था, पर मजबूरी थी कि छोटा कॉलर ठंड कैसे बचाएगा। जैकेट के ऊपर वाली जेब भी पसंद नहीं आ रही थी। सो चमन ने जैकेट देखनी बंद कर दी। वो बेल्ट देखने लगा। जबसे कासगंज से आया है, उसकी बेल्ट नहीं मिली। वजन गिर गया तो पैंट भी सरकने लगी। उसे बेल्ट चाहिए। लेकिन अगर पैंट थोड़ी बहुत सरक भी जाती है तो कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ऐसी ही सरकती उठती जिंदगी भी तो चल ही रही है। और ये तो फैशन बन चुका है। सरकती पैंट पहनना और जब जिंदगी ज्यादा सरक जाए तो धीमे से उठा लेना।
बेल्ट की बेवजह तलाश में गंज बाजार से निकलकर लालकुर्ती पहुंचा। आह, यहां तो काफी सामान हैं। इतने सारे सामानों में एक बेल्ट कैसे तलाश की जाए। इसी भीड़ में तो वो भी खो गया है। खुद को तलाश कर रहा है एक बेवजह बेल्ट की तरह। वैसे बेल्ट तो काफी सारी थीं, पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो कौन सी ले। आखिरकार उसने जूते देखने शुरू कर दिए। उसे लग रहा था कि ये सारे जूते एक साथ उसे पड़ रहे हैं। दर्द हो रहा था पर कहां कहां, ये पता नहीं चल पा रहा था। जूते देखते हुए उसे लगा कि अब वो दर्द से उल्टी कर देगा। अचानक उसे डर लगने लगा। जूतों से, बेल्ट से और दुकानदारों से। तुरंत उसने बाइक को रेस दी और किसी सूनसान जगह की तलाश करने लगा। वैसे ये भी अच्छी तलाश है। जगहें सूनसान कभी हुई हैं क्या ? जब खुद के अंदर इतना शोरगुल हो तो कैसे कोई भी जगह सूनसान हो सकती है। आवाजों से उसे दिक्कत हो रही थी। अपनी भी आवाज उसे बहुत बुरी लगने लगी। सोचना भी बुरा लगने लगा, यहां तक कि ये भी सोचना कि वह सोच ही यों रहा है और सोच है ही क्यों ? विचार आते ही क्यों हैं...यही तो सबसे बड़े दुश्मन हैं मेरे। विचार अगर विध्वसं करते हैं तो क्यों न विचारों को छोड़कर शारीरिक विध्वंस किया जाए। पर विध्वंस हो भी किसका? खुद उसका? या किसी और का?
गाड़ी की स्पीड बीस पचीस से ज्यादा नहीं थी। वह करना भी नहीं चाह रहा था। वह परेशान सोच से था पर ये नहीं सोच पा रहा था कि गाड़ी की स्पीड तेज करने से सोच पर बे्रक लगती है। वह ब्रेक नहीं लगाना चाह रहा था। उसे रुकना अच्छा नहीं लग रहा था। चलते जाना, बस बेवजह चलते जाना ही उसकी समझ में आ रहा था। पर ये सोच नहीं थी। ये उसे अच्छा लगने लगा। बेवजह चलने पर सोच रुक रुक कर साथ दे रही थी। विचार खत्म हो रहे थे, पल भर को ही सही, पर खत्म तो हो रहे थे। गाड़ी कहां जा रही थी, इसे लेकर वह कुछ भी नहीं सोच रहा था। बेध्यानी में अचानक गाड़ी घर पहुंच गई। उबले आलू की सजी बन गई होगी...उसने सोचा।

Sunday, October 9, 2011

रंग धर्म

इसकी शुरुआत ही नहीं है। न ही इसका कोई अंत है। हालांकि इस कस्टमायिज किया जा सकता है सभ्यता या असभ्यता की शुरुआत से। रंग हमेशा से हैं और हमेशा रहेंगे। जब ब्रह्मांड में पानी नहीं था, हवा नहीं थी और जीवन नहीं था, तब रंग थे। अमीबा बना और उसके बाद क्रमिक विकास के सिलसिले में मछली और मनुष्य बना। लेकिन रंग बना नहीं। वह तो पहले से ही मौजूद था। रंगों का प्रयोग कहां नहीं होता। अभी जो आप पढ़ रहे हैं, रंग न होते तो या ये पढ़ पाते? रंग अनंत हैं, निराकार हैं। बड़ी अजीब बात है कि हमने इन अनंत रंगों को हरा, पीला, नीला, काला सफेद और पता नहीं या या नाम दे रखे हैं, और आकारों में ढालते रहते हैं।
अनंत को कैद करने की हमेशा से ही मानव इच्छा रही है। कुछ लोगों ने निराकार को निराकार रूप में ही आकार देने की कोशिश की तो कुछ लोगों ने इस निराकार को आकार दिया। जिन्होंने निराकार को निराकार रूप में स्वीकार किया, उन्हें रंगों से कुछ खास मतलब नहीं था। मतलब तो सिर्फ इतना ही था कि जो चीजें उन्हें दिखाई देने वाली हैं, उन्हें साफ दिखाई दें। जिस रंग में दिखाई दे रही हों, उस रंग का नाम उन्हें पता हो। जिन लोगों ने एक आकार बनाया, मूर्ति पूजा की, उन्हें रंगों से विशेष लगाव था। उन्हें पता था कि रंग किस कदर मनुष्य से न सिर्फ जुड़े हैं, बल्कि स्वयं मनुष्य भी एक रंग ही है। मानव सभ्यता ने इन रंगों को तहस नहस करके रख दिया। एक काला तो एक सफेद, एक लाल तो एक पीला, एक भूरा तो एक ... रंगों ने मानव जाति का विभाजन नहीं किया, रंगों से समूची मानव प्रजाति विभाजित कर दी गई।
विभाजन तो हुआ पर व्यवस्था नहीं बन पाई। व्यवस्था बनाने के लिए, जाहिर है कि हर किसी को एक पहचान की जरूरत हुई। अब तक जो रंग मनुष्य की पहचान बने थे, और जिनके आधार पर विभाजन किया गया था, वह गौड़ हो गए और किन्हीं दूसरे रंगों ने पहचान ले ली। यह रंग खतरनाक हो चुके थे। रंगों को धर्म से जोड़ा जा चुका था। ईसाई थे तो वह किन्हीं दूसरे रंगों का इस्तेमाल करते, बौद्ध दूसरे, मुसलमान किसी और रंग का तो हिंदू और पारसी किसी दूसरे रंग का। मानव रंग के विभाजन के साथ ही धर्म रंग और जाति रंग भी विभाजित होना शुरू हो गए। किसी ने सफेद अपनाया तो किसी ने हरा। किसी ने कत्थई अपनाया तो किसी ने केसरिया। रंगों के मानव स्वभाव से जुड़े होने की वजह से प्रेम और नफरत भी शुरू हो गई। अपने रंग से प्रेम और दूसरे रंग से नफरत। रंग की यह मानसिकता सिखाई गई और इसे रंग ने नहीं सिखाया। इसे मनुष्य ने ही अपने वंशजों को सिखाया। यह प्रकृति का सबसे बड़ा विध्वंस था। इसका खामियाजा मनुष्य को भुगतना ही था और मनुष्य भुगत रहा है। मनुष्य सोच रहा है कि वह रंगों का नाश कर रहा है सिर्फ इसलिए क्योंकि हरा उसका रंग नहीं है या कत्थई से उसे वो गर्माहट नहीं मिली है। या सच में ऐसा हो रहा है? या सच में रंग खत्म हो रहे हैं? रंग तो अपने धर्म पर कायम हैं और उन्होंने ब्रह्मांड की शुरुआत से अब तक खुद को नहीं बदला है। अगर कुछ बदला है और बदल रहा है तो वह मनुष्य ही है। रंगों की आपस में कोई लड़ाई नहीं है और न ही लड़ाई करना उनका धर्म है? तो फिर लड़ाई करना किसका धर्म है? कौन सा धर्म लड़ाई करना सिखाता है?

Tuesday, August 23, 2011

ख़ज़ाना हमारा है ...

प्राचीन भारत से लेकर अब तक हमारी व्यवस्था कृषि व कुटीर उद्योग आधारित रही है। हमारे खेतों में उगने वाले खाद्यान्न और खुदरा व्यापार की चेन ने हमें विश्व में एक अलग तरह की अर्थव्यवस्था दी है। इसी अर्थव्यवस्था के चलते हमने विश्र्वव्यापी मंदी से मुकाबला किया और सफल भी रहे। इस अर्थव्यवस्था से देश की आधी आबादी जो गांवों में बसी है व बीस करोड़ की शहरी आबादी का गुजर बसर होता है। जिस बचत से मंदी से बचने के दावे किए जा रहे थे, वह इसी आबादी की डाकघरों व बैंकों के बचत खातों की धनराशि थी। इस बात पर हमने तो डंका पीटा कि बच गए लेकिन उसे संभालकर रखने की बात अब सिरे से ही गायब हो चुकी है। हालांकि विदेशियों की पूरी नजर इस बचत की धनराशि पर है। खतरनाक बात तो यह है कि अंग्रेजों के जमाने की तरह किसी एक ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर इस खजाने पर नहीं है बल्कि अमेरिका सहित कई देशों की नजर में यह खजाना किसी कुबेर के खजाने से कम नहीं है। आखिर अस्सी करोड़ लोगों ने अगर सौ रुपया महीना भी बचाया होगा तो सोचा जा सकता है कि यह रकम महीने में या साल भर में कितनी होगी।
विदेशी पूंजीपति किसान व खुदरा व्यापारी का सैकड़ों साल पुराना रिश्ता तोड़ देना चाहते हैं। वह इस चेन को तोड़कर सीधे किसान या व्यापारिक भाषा में उपभोक्ता तक पहुंचना चाहते हैं। इस उपभोक्ता को वह सब कुछ बेचा जाएगा, जिसकी उसे जरूरत भी न हो। जब उपभोक्ता की सारी बचत समाप्त हो जाएगी तो उसे उधार भी दिया जाएगा। यह सब बचत के खजाने को लूटने के लिए किया जा रहा है और इसमें पूरी साजिश है। दरअसल सबसे ज्यादा विदेशी निवेश संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से होने के करार हो रहे हैं। लेकिन इसी अमेरिका का विदेश व्यापार घाटा दुनिया में सबसे ज्यादा है। कहीं से कपड़ा तो कहीं से जूता, कहीं से चाय कॉफी तो कहीं से डॉटर इंजीनियर उनके लिए जा तो रहे हैं लेकिन उनके यहां पैदा नहीं हो रहे। निर्यात कम व आयात ज्यादा होने की वजह से अमेरिका पर दुनिया में सबसे ज्यादा कर्ज है, जिसे उतारने के लिए उसकी कंपनियों की नजर, जाहिर है हमारे इस खजाने पर है। यह तभी संभव है जब देशी व्यापारियों का अस्तित्व खत्म कर दिया जाए। और ऐसा हो भी रहा है, केंद्र सरकार एक के बाद एक बेतुके कानून बनाए जा रही है। केंद्र की कांग्रेस सरकार के इस बारे में अमेरिका से समझौते भी हो चुके हैं। अमेरिकी कंपनी वालमार्ट का ही उदाहरण लें। वालमार्ट जैसी कंपनी के भारत में खुदरा व्यापार की अनुमति देना न सिर्फ देश के स्थानीय बाजारों को खत्म करने की, बल्कि भारत की रीढ़ बनी बचत व्यवस्था को भी लूट की सरकारी छूट देने की अनुमति देना है।
विदेशी कंपनी को खुदरा व्यापार की अनुमति देने व स्थानीय बाजार को खत्म करने से महंगाई और बढ़ेगी। हमारा खजाना तो खाली होगा ही, हम अमेरिका की तरह कर्ज के तले दबे नजर आएंगे। और ऐसा शुरू भी हो गया है। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने महंगाई से निपटने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। न तो लोगों को दाल में कोई राहत मिली और न ही प्याज में। यह सब व्यापारियों व व्यापार के लिए बनाए गए बेतुके कानूनों का भी नतीजा हो सकता है। बढ़ते टैस ने ही नहीं, उस टैस को चुकाने तक की प्रक्रिया ने व्यापारी की कमर तोड़कर रख दी है। सवाल पैदा होता है कि हम दुनिया भर की विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए मुक्त व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं, सेज-स्पेशल इकोनॉमिक जोन बना रहे हैं, लेकिन हमारे अपने ही देश के व्यापारी एक राज्य से दूसरे राज्य तक मुक्त व्यापार नहीं कर सकते। टैस के अलावा रास्ते में होने वाली लूट खसोट अलग से जोड़ी जा सकती है। यहां तक कि अगर किसान अपनी खेती से मिला उत्पादन यदि मंडियों में लाता है तो सड़क पर आने से लेकर मंडी की पर्ची कटाने तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। सरकार की तरफ से संरक्षण प्राप्त सट्‌टा बाजार इस महंगाई में घी का काम कर रहा है। इसे रोकने के लिए कांग्रेस की केंद्र सरकार कुछ भी नहीं कर रही है। सरकार यदि कुछ कर रही है तो यह कि विदेशी कंपनी की मांग पर एक के बाद एक विधेयक पारित कर कानून में संशोधन किया जाता है। अगर देश के नागरिक साधारण सी भी कोई मांग कर दें तो सरकार को सांप सूंघ जाता है और बयानबाजियां शुरू हो जाती हैं।
उार प्रदेश में तो और भी बुरे हालात हैं। यहां पर न तो महंगाई कम करने की मांग की जा सकती है और न ही रोजगार देने की। भ्रष्टाचार के चलते कत्ल दर कत्ल होते चले जा रहे हैं। जिस तरह से विधायक स्वयं अपराध के दलदल में फंसे हैं और प्रदेश सरकार उन्हें निकालने के लिए अदालत में मुकदमा वापस लेने के आवेदन करती जा रही है, आने वाला समय या होगा, इसकी परिकल्पना करना कोई मुश्किल काम नहीं है। दरअसल विनिमय के सभी सिद्धांत बदल चुके हैं। अब विनिमय मात्र वस्तुओं के लेनदेन तक सीमित नहीं रह गया है। अधिकारों से लेकर कानून तक विनिमय ने हर वस्तु को बिकाऊ बना दिया है। ऐसे में अगर महंगाई बढ़ती है तो कोई अचरज की बात नहीं है बल्कि लाजमी है।