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Tuesday, October 23, 2012

सोचने से बंद करने के सलीकों पर...


1
सोचता हूं..
न सोचूं तुम्‍हें,
न सोचूं किसी और को,
न सोचूं खुद को,
न सोचूं न हो कोई सोच, पर...
सोचता हूं
2
सोचता हूं
न सोचूं उस भीड़ को,
न सोचूं उस लोहे को,
न सोचूं उस पीतल को,
न सोचूं, पर ये सोच..
सोचने पर मजबूर करती है..
3
सोचता हूं
न सोचूं उन रास्‍तों को
जो वापस आने में करते हैं मदद
न सोचूं उन तरीकों को..
जो करते हैं नॉर्थ और साउथ पोल का काम
और ये सारे पोल मिलकर..
सोच को जोड़ते रहते हैं, मुसलसल.. 
मुझे नहीं पता कि अमित को ये फोटो कहां से मिली, पर उनके साधू कलेक्‍शन देखने लायक हैं। 
4
सोचता हूं
गाल दबाकर उन न सोचने के तरीकों पर
कि न सोचूं सोचने से बंद करने के सलीकों पर
पर क्‍या करें..इस सोच का
न जाने क्‍या क्‍या
सोचता हूं..
5
वैसे तो सोच को होना चाहिए 
लंबा, मुसलसल और... 
सोचने पर, 
पर फिर भी इससे इतर 
सोचता हूं, 
कि क्‍यों सोचता हूं। 

Saturday, July 7, 2007

कौन सी 'रचनात्मकता' हमारे पास है ?

समय की कमी के चलते जिस दिन यू जी की पहली पोस्ट चढाई थी , उसके दो तीन दिन बाद तक अगली पोस्ट नही चढा पायालेकिन इस बार एक साथ दो प्रश्न और उनके उत्तर दे रहा हूँ
प्रकृति मे जो परिवर्तन होते रहते हैं , लगता है कि उनके पीछे कोई खास योजना या प्रयोजन हैआपका क्या ख्याल है ?
मुझे बिल्कुल भी नही लगता कि वहाँ कोई योजना या प्रयोजन है। एक प्रक्रिया चल रही है। जरूरी नही कि मैं इसे विकास की प्रक्रिया कहूँ। जब यह प्रक्रिया धीमी होने लगती है तो क्रान्ति हो जाती है। प्रकृति कुछ चीजों को साथ लाना चाहती है। और सिर्फ नए सृजन के लिए फिर से नए सिरे से शुरुआत करती है। यही एक मात्र वास्तविक सृजनात्मकता या रचनात्मकता है। प्रकृति किसी 'मॉडल' बने बनाए आदर्श या पूर्व प्रसंग को इस्तेमाल नही करती है। इसलिये उसका कला से अपने आप कोई संबंध नही होता।

आपका मतलब है कि कलाकारों ,कवियों, संगीतज्ञों, और मूर्तिकारों की रचनात्मकता मे कोई रचनात्मकता नही है ?
आप कला को कौशल और कारीगरी से ऊपर क्यों मानना चाहते हैं? कलाकार की कलाकृति अगर बाज़ार मे नही बिकती तो उसका धंधा भी बंद हो जाता है। इन तमाम कलात्मक विश्वासों के लिए मात्र बाज़ार जिम्मेदार है। कलाकार सिर्फ कारीगर है- दूसरे कारीगरों की तरह। अपने आपको व्यक्त करने के लिए वह उसी औजार का इस्तेमाल करता है। मानव की सारी रचनात्मकता, एन्द्रिकता और काम भावना से उत्पन्न होती है। मैं एन्द्रिकता और काम भावना के विरुद्ध नही हूँ। सारी कला एक प्रकार की हर्ष-क्रिया है। हर्ष भी सायास। उसके लिए कोशिश करनी होती है। आप ऐसा नही कर सकते तो उस सौन्दर्य और कला यदि आप कृति के बारे , मे प्रश्न करने लगते हैं तो। यदि आप कृति के बारे मे प्रश्न करने लगते हैं तो कलाकार अपने आप को उंचा समझने लगते हैं। वे समझते हैं कि कलात्मकता को समझने की अभिरुचि ही आपमें नही है। अब वे आपको यह सुझाव देते हैं कि आप किसी विद्यालय या इन्स्टीट्यूट मे जाकर उसकी कला की परख की शिक्षा ग्रहण करें। किसी तथाकथित महान कवि की कविता में अगर आपको कोई आनंद नही मिलता तो वे आपको जबरदस्ती इस बात की शिक्षा देंगे कि आप उस कविता का आनंद लें । शिक्षा -संस्थाएं यही सब करती हैं। वे हमे सिखाती रहती हैं कि सौन्दर्य को कैसे ग्रहण करें, संगीत को कैसे समझें , चित्रकारी की कद्र किस प्रकार करें , इत्यादि । इस बीच आपके भरोसे वे अपनी जीविका चलाते रहते हैं। कलाकारों को यह सोचना बहुत अच्छा लगता है कि वे रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। 'रचनात्मक कला' या 'रचनात्मक चिन्तन' , क्या वे कोई मौलिक अभिनव या स्वतंत्र कार्य कर रहे हैं ? बिल्कुल नही। इस अर्थ मे उनमे कोई रचनात्मकता नही है। कलाकार क्या करते हैं ? यहाँ से कुछ उठाते हैं , वहाँ से कुछ उठाते हैं , फिर उसे जोड़कर साथ रख देते हैं और सोचते हैं कि उन्होने किसी महान कृति की रचना कर ली है। किंतु सत्य यह है कि पहले से ही विद्यमान किसी न किसी चीज़ की वे नक़ल कर रहे होते हैं। कौन सी 'रचनात्मकता' हमारे पास है ? नक़ल,शैली, बस और कुछ नही। हममे से हर एक की अपनी शैली होती है। शैली इस बात पर निर्भर करती है कि हमने किस विद्यालय में शिक्षा पाई है , कौन सी भाषा हमे पढ़ाई गई है , कौन सी पुस्तकें हमने पढी हैं , कौन सी परीक्षाएं हमने उत्तीर्ण की हैं । फिर इसी चौखटे के अंदर हमारी अपनी शैली का निर्माण होता है। शैली और तकनीक पर पूर्णधिकार प्राप्त करना ही कलात्मक गतिविधि है। आपको आर्श्चय होगा कि निकट भविष्य मे कम्प्यूटर चित्रकारी करेंगे, संगीत की रचना करेंगे और यह चित्रकारी उन तमाम रचनाओं से कहीँ श्रेष्ठ होगी , जिन्हे दुनिया के सभी चित्रकारो और संगीत कारों ने आज तक जन्म दिया है । हमारे जीवन काल मे शायद यह स्थिति न आये , मगर आएगी जरूर। आप कम्प्यूटर से भिन्न नही हैं। हम इसे मानने के लिए तैयार नही हैं, क्योंकि हमे समझाया गया है कि हम मात्र यन्त्र नही हैं। हमारे अंदर कुछ और है। लेकिन आपको यह स्थिति स्वीकार करनी होगी और मान लेना होगा कि हम यन्त्र मात्र हैं। शिक्षा और तकनीक के मध्यम से हमने जिस बुद्धि का विकास किया है , वह प्रकृति के सामने कही ठहर नही सकती। उन्हें (रचनात्मक कार्यों को ) जो महत्त्व अब तक दिया गया है, वह मात्र इसलिये कि उन्हें आध्यात्मिक, कलात्मक और बौद्धिक मूल्यों की अभिव्यक्ति माना गया है। आत्माभिव्यक्ति की चालना एक प्रकार के नाड़ी रोग का परिणाम है। मानव जाति के आध्यात्मिक गुरुओं पर भी यही बात लागू होती है। प्रत्यक्ष संवेदनात्मक अनुभूति नाम की कोई चीज़ नही है। कला के सभी रुप मात्र एन्द्रिकता की अभिव्यक्ति हैं और कुछ नही है।

देर से आने वालो के लिए .... यू जी के बारे मे यहाँ देखे रचनात्मकता नाम की कोई चीज़ नही है।, यहाँ भी देखें .....इसे चट्काएं ....

Tuesday, July 3, 2007

रचनात्मकता नाम की कोई चीज़ नही है।

एक आदमी , जिसने पहली बार ज्ञान और बोध को अस्तित्व की न्यूरो बायोलोजिकल अवस्था के रुप मे देखाजिसने कहा कि इसका धार्मिक , मनोवैज्ञानिक या रहस्यवादी आशयों से कोई संबंध नही हैयह एक बिकुल नयी अवधारणा है , "प्रबुध्धता" जैसी चीज़ के प्रति वास्तव मे एक बिल्कुल नया रवैया हैगम्भीर और पवित्र मानी जानेवाली चीजो के प्रति , धर्म के प्रति और विशेष रुप से प्रबुध्धता की सारी अवधारणा के प्रति यू जी का पूरा ज्ञान उस व्यक्ति से बेहतर नही है जो आत्म वंचना मे जिंदा रहता हैलेकिन वास्तविक ज्ञान और बोध की तलाश करने वालों के लिए यू जी के तमाम कथन बहुत ही महत्वपूर्ण हैंयू जी तो व्याख्यान देते थे और ही उन्होने कोई किताब लिखीवे जोर देकर कहते थे "यदि आप परम ज्ञान की खोज मे मेरे पास आये हैं तो आप गलत आदमी के पास गए हैं। " यू जी और अन्य लोगों के बीच समय समय पर जो वार्ता लाप हुए उन्हें रिकॉर्ड कर लिया गयाया प्रश्नोत्तर और आगे आने वाले प्रश्नोत्तर इसी वार्ता के आधार पर लिखे गए हैं
सृजनशीलता या रचनात्मकता विषय पर काफी कुछ कहा जा चुका हैआप इस संदर्भ मे क्या कहना चाहेंगे ?
रचनात्मकता नाम की कोई चीज़ नही है। लोग पहले से ही विद्यमान इस या उस चीज़ की नक़ल करने की कोशिश करते हैं। रचनात्मकता तो उस समय मानी जायेगी जब आप किसी को आदर्श या "मॉडल" के रुप मे इस्तेमाल नही करते। यह भी जरूरी है कि आपकी भावी कृतियों के लिए आपकी यह पूर्व कृति खुद "मॉडल" न बन जाय। बस, बात यहीं ख़त्म हो जाती है। यदि आप दो व्यक्तियों के चेहरों या दो पत्तों के तरफ देखें तो पाएंगे कि कोई भी दो चहरे या दो पत्ते एक ही तरह के नही दिखाई देते।

यू जी - यू जी कृष्णमूर्ति