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Tuesday, July 1, 2025

ग्वालियर में बनी इस सुरंग को कैसे देखें?

 मेरे कुछ एक मित्र आलोचक को आलूचक कहते हैं। ऐसा वे इसलिए कहते हैं क्योंकि आलोचक नाम की संस्था का हाल अब कुछ आलू की चाट की तरह है। फिर चाहे आलूचक हिंदी साहित्य में हों, या राजनीति में। अब जैसे इसी मीम को जिसने बनाया, अगर उसका दिमाग पढ़ें तो उसे सिर्फ सड़कें दिख रही हैं, बल्कि नहीं भी दिख रही हैं। ऐसे ही सड़क पर बना गड्ढा दिख रहा है, मगर सड़क के नीचे की सुरंग नहीं दिख रही है। आलोचक का काम है गहरे से गहरे देखना, जैसा कि इन दिनों हिंदी साहित्य के गैंगेस्टर्स दो कमरों में गहरे से गहरे घुसकर देख रहे हैं। जबकि हिंदी साहित्य के वे गैंगेस्टर्स, जो आलूचक हैं, वे बस दरवाजे पर बिना दस्तक दिए लौट आ रहे हैं, और अपने पड़ोसी से पूछ रहे हैं कि- अरे मगर हुआ क्या था? बहरहाल, हम हिंदी साहित्य के इन गैंगेस्टरों पर बात नहीं कर रहे हैं, हम तो बस एक सुरंग की बात कर रहे हैं। एक सुरंग, जो आकाशीय चमत्कार से हमारे सामने आई। यह ईश्वर की कृपा है, जो वह हमें यह लीला दिखा रहे हैं। 


आलूचक इसे सड़क में बना गड्ढा मानता है, लेकिन आलोचक इसे सुरंग मानते हैं। और आप जरा सुरंग के किनारों को देखिए। यह बिल्कुल नई सुरंग है। और सुंरग जब भी बनती है, तो जाहिर है कि उसमें सिर्फ दो सवालों के उत्तर होते हैं। सुरंग आ कहां से रही है, और सुरंग जा कहां को रही है। सीमित सूचनाओं के प्रतिमानी पुरुषों का ऐसा मानना है कि यह सुरंग सीजफायर के बाद इमरजेंसी में सरेंडर करने के लिए बनाई है। ऐसी अपुष्ट खबरें भी हैं कि सुरंग का नक्शा बक्से में बंद करके परिधानमंत्री निवास में मोर की रक्षा में रखा गया है। कोई पूछ सकता है कि परिधानमंत्री तो दिल्ली में, सुरंग ग्वालियर में ही क्यों? गुजरात में क्यों नहीं? ऐसे सवाल नादान ही पूछ सकते हैं। इतिहास के गंभीर अध्येता के उंगली दिल्ली से गुजरात कभी नहीं उठेगी। उसकी उंगली ग्वालियर की ओर ही उठेगी। ग्वालियर का सरेंडर का अपना सुनहरा अतीत रहा है। एक पूरी परंपरा रही है, जो गदर से लेकर अब तक दिल्ली आती-जाती रही है। 

आलूचकों की दिक्कत यह होती है कि वे सही समय पर सही इतिहास नहीं याद कर सकते। पहले कुछ याद भी रखते थे, मगर अब हमारी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के कोर्स ज्यादा याद रखते हैं। मसलन, इन दिनों हिंदी साहित्य के गैंगेस्टरों के बीच एक से बढ़कर एक सूचनाएं फर्राटा भर रही हैं, जिनकी सत्यता का प्रमाण स्वयं उसका लेखक है। हिंदी साहित्य के इन लेखकों से क्या ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि हम जीवन में उस सुरंग के बारे में जानें, जो पहले अपनी रियासत, और अब हमारे मुल्क के सरेंडर के लिए बनाई गई है? इस सुरंग को ध्यान से देखेंगे तो आपको दो जोड़ी कदमों के निशान भी दिखेंगे। यानी यह सुरंग न सिर्फ नई है, बल्कि यह हाल ही में प्रयोग में भी लाई गई है। आलोचक ने इस सुरंग को सेटेलाइट से भी देखा। यह सैटेलाइट से भी सुरंग ही दिखती है, गड्ढा नहीं दिखती। बड़ी बात यह कि नासा के सुरंग खोजी सैटेलाइट ने भी इसे सैटलाइट पर मार्क कर रखा है, जिसका नंबर है- SM014IN56. इतने सारे सबूतों को ध्यान में रखते हुए आलोचक आलूचकों से प्रार्थना करता है कि वे इस तस्वीर को वैसे ना देखें, जैसा इस मीम को बनाने वाला दिखाना चाह रहा है। इसे नासा की नजर से देखें।

Monday, October 14, 2024

संसार का पहला लॉन- कैसे लॉन हमारे दिमाग, फिर घर में घुसे

 मकान बनवाते वक्त मकान के सामने की सजावट के लिए सबसे आसान उपाय अगर आज किसी के दिमाग में आता है तो वो लॉन है। घर के सामने चाहे चार हाथ का लॉन ही क्यों न हो, लेकिन हो। कई घरों में मैंने 2X4 फीट के भी लॉन देखे हैं। और तो और, अब तो लॉन के मारे लोग भले मल्टिस्टोरी इमारतों में रहते हों, अपनी बाल्कनी में ही प्लास्टिक की घास लगवाकर उसे लॉन लुक देने की कोशिश करने लगे हैं। मेरे एक परिचित ने तो अपनी लगभग पूरी छत पर ही लॉन बना रखा है, क्योंकि उनका घर तीन मंजिला इमारत पर है, जिसमें वो सबसे ऊपरी मंजिल पर रहते हैं। लॉन किस तरह से हमारे दिमाग में उगा है, इसके बारे में युवाल नोआ हरारी कुछ काम की बातें बताते हैं।

चैंबर्ड कैसल का लॉन- संसार का पहला लॉन
अपनी किताब होमो डेयस में युवाल नोआ हरारी वो कहते हैं कि पाषाण युग के शिकारी-संग्रहकर्ता अपनी कन्दराओं के प्रवेश द्वार पर घास की खेती नहीं करते थे। ऐसा कोई चारागाह नहीं था, जो एथेनियाई एक्रोपोलिस, रोमन कैपिटोल, यरुशलम के यहूदी देवस्थल या बीजिंग के निषिद्ध नगर आने वाले आगन्तुकों का स्वागत करता। निजी आवासों और सार्वजनिक इमारतों के प्रवेश- द्वार पर लॉन विकसित करने का विचार मध्य युग में फ़्रांसीसियों तथा अंग्रेज़ कुलीनों के क़िलों में जन्मा था। शुरुआती आधुनिक युग में इस आदत ने गहरी जड़ें जमाईं, और यह अभिजात वर्ग की ख़ास पहचान बन गई।

सुव्यवस्थित लॉन ज़मीन की और ढेर सारे काम की मांग करते थे, ख़ासतौर से उससे पहले के दिनों में, जब घास काटने की मशीनें और पानी का छिड़काव करने वाले स्वचालित उपकरण नहीं हुआ करते थे। बदले में, वे कोई मूल्यवान चीज़ नहीं उपजाते थे। आप उन पर जानवरों तक को नहीं चरा सकते थे, क्योंकि वे घास को खाते और उसको रौंद देते। ग़रीब किसान लॉनों पर अपनी क़ीमती ज़मीन और वक़्त बर्बाद नहीं कर सकते थे। इसलिए सामन्ती क़िलों के प्रवेश-द्वार पर विशुद्ध घास के मैदान प्रतिष्ठा के ऐसे प्रतीक हुआ करते थे, जिनकी नक़ल कोई नहीं कर सकता था। वह आने-जाने वालों के सामने पूरी दबंगई के साथ यह दावा करता था : 'मैं इतना धनवान और ताक़तवर हूं, और मेरे पास खेत जोतने वाले इतने दास हैं कि मैं इस हरियाले वैभव को जुटाने में सहज समर्थ हूं'। लॉन जितना ही बड़ा और स्वच्छ होता था, उतना ही वह राजवंश शक्तिशाली होता था। अगर आप किसी ड्यूक के घर जाते और उसके लॉन को बुरी हालत में देखते, तो आप समझ जाते कि वह ड्यूक मुश्किल हालात से गुज़र रहा है।

यह बेशक़ीमती लॉन अक्सर महत्त्वपूर्ण उत्सवों और सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजनों का स्थल हुआ करता था, बाक़ी सारे समय दूसरे लोगों के लिए सख्त रूप से प्रतिबन्धित होता था। आज दिन तक, असंख्य महलों, सरकारी इमारतों और सार्वजनिक स्थलों पर लगे साइनबोर्ड लोगों को 'घास से दूर रहने की' सख्त हिदायत देते हैं। मेरे पूर्व ऑक्सफ़ोर्ड कॉलेज में समूचा अहाता विशाल, आकर्षक लॉन से निर्मित हुआ करता था, जिस पर हमें साल में सिर्फ़ एक दिन चलने या बैठने की इजाज़त हुआ करती थी। अन्य दिनों में बेचारे उस छात्र की शामत आ जाती थी, जिसने घास के उस पवित्र मैदान को अपने पैरों से गन्दा कर दिया होता था।

शाही महलों और सामन्ती क़िलों ने लॉनों को प्रभुत्व के प्रतीक में बदल दिया। जब परवर्ती आधुनिक काल में राजाओं को राजगद्दी से हटा दिया गया और सामन्तों के सिर क़लम कर दिए गए, तो नए राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री लॉन रखने लगे। संसदें, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति भवन और अन्य सार्वजनिक इमारतें स्वच्छ हरी पत्तियों की अनेक कतारों में उत्तरोत्तर अपनी शक्ति की उद्घोषणा करती गईं। इसी के साथ-साथ लॉनों ने खेलों की दुनिया को भी जीत लिया। हज़ारों सालों से मनुष्य बर्फ से लेकर रेगिस्तान तक हर तरह के कल्पनीय मैदानों में खेलते आ रहे थे, लेकिन पिछली दो सदियों में वास्तविक महत्त्वपूर्ण खेल, जैसे कि फुटबॉल और टेनिस घास के मैदानों में खेले जाते रहे हैं। बशर्ते, ज़ाहिर है, आपके पास पैसा हो। रियो डि जनेरियो के फ़ावेलाओं (झुग्गियों) में ब्राजीलीय फुटबॉल की भावी पीढ़ी रेत और मिट्टी पर कामचलाऊ गेदों से खेल रही है, लेकिन समृद्ध उपनगरों में रईसों के बेटे उत्तम तरीक़े से तैयार लॉनों का आनन्द लेते हैं 1

इस तरह मनुष्यों ने लॉन को राजनैतिक शक्ति, सामाजिक हैसियत और आर्थिक समृद्धि से जोड़ लिया। आश्चर्य की बात नहीं कि उन्नीसवीं सदी में उभरते हुए बूर्चा वर्ग ने पूरे उत्साह के साथ लॉन को अपनाया। शुरू में अपने निजी आवासों पर इस तरह की विलासिता सिर्फ़ बैंककर्मियों, वकीलों और उद्योगपतियों के बूते की ही बात हुआ करती थी, लेकिन जब औद्योगिक क्रान्ति ने मध्य वर्ग का विस्तार किया और घास काटने की मशीनों तथा पानी के छिड़काव के स्वचालित उपकरणों को जन्म दिया, तो लाखों परिवार अचानक घरेलू लॉनों का रख-रखाव करने में समर्थ हो गए। अमेरिकी उपनगरों में स्वच्छ और सुव्यवस्थित लॉन रईस आदमी की विलासिता से मध्यवर्ग की ज़रूरत में बदल गए।

यह तब हुआ, जब उपनगरीय गिरजाघरों की पूजन-पद्धति में एक नए अनुष्ठान का योग हुआ। गिरजाघर में इतवार की सुबह की उपासना के बाद बहुत सारे लोग समर्पित भाव से अपने लॉनों की घास काटने छांटने लगे। सड़कों पर चलते हुए आप तत्काल किसी भी परिवार के लॉन के आकार और ख़ासियत से उस परिवार की समृद्धि और हैसियत का निश्चय कर सकते थे। जॉनेस परिवार किसी मुसीबत में फंसा है, इस बात को जानने का उनके घर के सामने के हिस्से के उपेक्षित पड़े लॉन से ज़्यादा पक्का संकेत और कुछ नहीं हो सकता। संयुक्त राज्य अमेरिका में घास आज मक्का और गेहूं के बाद सबसे व्यापक फ़सल है, और लॉन उद्योग (पौधे, खाद, घास काटने की मशीनें, पानी छिड़कने के उपकरण, माली) सालाना अरबों डॉलर का व्यापार करता है।

लॉन पूरी तरह से यूरोपीय या अमेरिकी जुनून नहीं रहा। जिन लोगों ने कभी वैली का भ्रमण नहीं किया, वे भी संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति का लुआख़ भाषण सुनने वाइट हाउस के लॉन में जाते हैं, हरे स्टेडियमों में महत्त्वपूर्ण फुटबॉल खेल खेले जाते हैं, और घास को काटने छांटने की बारी किसकी है, इस बात को लेकर होमर तथा बार्ट सिम्पसन आपस में झगड़ते हैं। सारी दुनिया के लोग लॉनों को सत्ता, पैसे और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। इसलिए लॉन दूर-दूर तक और हर तरफ़ फैल चुके हैं, और मुस्लिम दुनिया का दिल जीतने की तैयारी में हैं। क़तर का नया-नया स्थापित म्यूज़ियम ऑफ़ इस्लामिक आर्ट ऐसे भव्य लॉनों से घिरा हुआ है, जो हारून अल-रशीद के बग़दाद से ज़्यादा लुई चौदहवें के वर्साइल की याद दिलाते हैं। इनका आकल्पन और निर्माण एक अमेरिकी कम्पनी द्वारा किया गया था, और उनकी 100,000 वर्ग गज़ में फैली घास अरब के रेगिस्तान के बीचोंबीच - हरी बनी रहने के लिए ताज़ा पानी की अतिविशाल मात्रा की मांग करती है। इस बीच, दोहा और दुबई के उपनगरों में मध्यवर्गीय परिवार अपने लॉनों पर गर्व करने लगे हैं। अगर वहां सफ़ेद चोगे और काले हिजाब दिखाई न देते होते, तो आप आसानी-से ऐसा सोच सकते थे कि आप मध्य पूर्व की बजाय मध्यपश्चिम में कहीं पर हैं।

लॉन का यह संक्षिप्त इतिहास पढ़ चुकने के बाद, अब आप जब अपने सपनों का मकान तैयार करने की योजना बना रहे होंगे, तब आप मुमकिन है कि सामने के परिसर में लॉन बनाने के बारे में दो बार सोचें। बेशक, आप अभी भी यह करने के लिए स्वतन्त्र हैं, लेकिन आप उस सांस्कृतिक बोझ को झटककर अलग करने के लिए भी स्वतन्त्र हैं, जो यूरोपीय सामन्तों, पूंजीपति मुग़लों और सिम्प्सनों ने आपको वसीयत में दिया है। 

Friday, December 20, 2019

एनआरसी करने के लिए सीएए लाए हैं: कन्नन गोपीनाथन

अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर आईएएस ऑफिसर कन्नन गोपीनाथन ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद से वे देश भर में घूम-घूमकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अपनी बात कहते रहे। इसी बीच नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) आ गया। केंद्र के कई नेताओं ने इसे एनआरसी के साथ जोड़कर लागू करने की बात कही। अब कन्नन देश भर में घूम-घूमकर सीएए और एनआरसी पर जागरूकता सभाएं कर रहे हैं। मैंने उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

अपने बारे में बताइए।
मैं 12वीं तक केरल में पढ़ा। कोट्टयम का रहने वाला हूं। इसके बाद मैंने रांची के बिरला इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की। इसके बाद मैं नोएडा आ गया और नौकरी करने लगा। नोएडा में रहने के दौरान मैं सेक्टर 16 की झुग्गी में बच्चों को पढ़ाता था। कुछ दिन बाद में नोएडा के ही अट्टा मार्केट में भी बच्चों को पढ़ाने लगा। वहां का हाल देखकर समझ में आया कि सिस्टम के अंदर रहकर काम करना होगा- तब कुछ सही होगा, इसलिए मैंने आईएएस का एग्जाम पास किया। 2012 बैच में आईएएस बना, फिर मिजोरम में डीएम रहा, दादरा-नगर हवेली में भी कलेक्टर के साथ-साथ वहां के कई विभागों में कमिश्नर रहा। वहां डिस्कॉम कॉरपोरेशन था जो लगातार लॉस में जा रहा था, उसे एक-डेढ़ साल में प्रॉफिट में ले आया। जम्मू-कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 हटाया गया तो वहां पर प्रशासन ने लोगों की आवाज दबाई। अब भी दबा ही रही है। समस्या 370 हटाने या लगाने से नहीं, बल्कि आवाज दबाने से उपजी। फिर मुझे लगा कि ये सही बात नहीं है और कम से कम मैं लोगों की आवाज दबाने के लिए तो आईएएस में नहीं आया। इसलिए मैंने रिजाइन कर दिया। हालांकि सरकार ने अभी तक मेरा इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है।

इस्तीफा देने के बाद आप क्या कर रहे हैं?
रिजाइन करने के बाद मैंने ठीक से तय नहीं किया था कि किस ओर जाना था। इसी बीच कुछ जगहों पर टॉक के लिए बुलाया। इसी सिलसिले में एक बार चेन्नई गया। वहां एक टॉक में मैं 'बोलने की आजादी' विषय पर बोल रहा था कि बीच में एक लड़की ने मुझे टोक दिया। नॉर्थ ईस्ट की उस 23 साल की लड़की का कहना था कि बोलने की आजादी उसकी समझ से बाहर है क्योंकि अभी तो उसे यही डर है कि वो इस देश में रह पाएगी या नहीं। उसका दादा आईएमए में था और वो कोई सन 1951 का डॉक्यूमेंट खोज रही थी जो उसे मिल नहीं रहा था। उस शो में खड़ी होकर वह रो रही थी और मैं निरुत्तर था। मैंने खुद से यही पूछा तो पता चला कि पेपर्स तो मेरे पास भी पूरे नहीं। बीस साल से ज्यादा पुराने कागज तो मेरे पास भी नहीं है। फिर मैं मुंबई आया और दोस्तों से इस पर चर्चा की, मामले को ठीक से समझा। तब से मैं लोगों को बता रहा हूं कि कैब और एनआरसी किस तरह से हम सभी लोगों के लिए नुकसानदेह हैं।

अब तक आप कहां कहां जा चुके हैं और आगे का क्या प्रोग्राम है?
आगे का तो मैंने नहीं सोचा, लेकिन बिहार के कई जिलों में जा चुका हूं। सीएए और एनआरसी का खौफ देखना हो तो बिहार का दौरा करिए। वहां इस वक्त आधार कार्ड सेंटरों में वही नोटबंदी वाली भीड़ दिख रही है। रात के दो-दो बजे तक आधार कार्ड सेंटरों में लाइन लगी है। लोग अपना आधार कार्ड दुरुस्त करा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई जिलों में मैं लोगों को इसके नुकसान बता चुका हूं। महाराष्ट्र और साउथ में तो लगातार बोल ही रहा हूं। इसके बारे में अभी बहुत जागरुकता फैलानी होगी।

लोगों की क्या प्रतिक्रिया है?
लोग बहुत डरे हुए हैं। सबसे ज्यादा तो गरीब मुसलमान और दलित-आदिवासी डरे हुए हैं। वजह यह कि भारत में किसी के भी कागजात या तो पूरे नहीं हैं और अगर पूरे हैं भी तो उनमें कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी छूटी हुई है। यही वजह है कि बिहार में आधी-आधी रात तक लाइनें लगी हैं। लोगों को लगता है कि आधार करेक्शन से काम हो जाएगा। इससे पता चलता है कि लोगों में कितना ज्यादा डर का माहौल है। वॉट्सएप के मुस्लिम ग्रुप में इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा ट्रेंड में है- डॉक्यमेंट्स कैसे पूरे करें? उनको पता है कि कागजात नहीं होंगे तो ये सीधे डिटेंशन सेंटर भेजेंगे। सबने देखा कि पिछले दिनों कैसे केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को डिटेंशन सेंटर बनाने का लेटर भेजा है।

सीएए और एनआरसी को अलग-अलग देखें या एक साथ?
सीएए इसलिए आया क्योंकि एनआरसी करना चाहते हैं। वरना सीएए नहीं आता। असम में एनआरसी हुआ तो सबसे ज्यादा हिंदू ही डिटेंशन सेंटर पहुंच गए। कागज तो हिंदुओं के पास भी नहीं हैं। ये चीज राजनीतिक रूप से इनके खिलाफ जाती है। हालांकि सरकार उनको वापस लेने के लिए वहां नोटिफिकेशन जारी कर रही थी, लेकिन अब वह इसके लिए कैब ले आई है। एनआरसी और सीएए- दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, सीएए का अकेले कोई खास मतलब नहीं है।

किसे किसे यह प्रभावित कर रहा है और कैसे?
अगर आपके पास करेक्ट डॉक्यूमेंट्स नहीं है तो यह आपको भी प्रभावित करेगा। मुझे लगता है कि सरकार नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के जरिए इसकी शुरुआत करेगी। सरकारी आदमी घर आएगा और हमारे कागजात चेक करेगा। वहां पर अगर कोई कमी हुई तो असम की ही तरह हमारे नाम के आगे संदिग्ध का निशान लग जाएगा और फिर हमें यह साबित करना होगा कि हम यहां के नागरिक हैं या नहीं हैं। पहले यह सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे, लेकिन अब यह उल्टा हो गया है। अब हम सबको साबित करना होगा कि हम भारत के नागरिक हैं या नहीं। कागजात तो बहुत कम लोगों के पूरे हैं, ऐसे में सीन साफ है। जो सबसे गरीब हैं, वो इसे भुगतेंगे। जो बाहर काम कर रहे हैं, यानी जितने कामगार हैं, उन्हें इससे दिक्कत होगी। हर साल देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ और सूखे से प्रभावित होता है, वहां विस्थापन नियमित चलता है, वो भुगतेंगे। आदिवासियों के पास तो कोई कागज ही नहीं होता।

डॉक्यूमेंट्स बनवाने में भ्रष्टाचार सबसे आम शिकायत है। क्या इससे भ्रष्टाचार भी बढ़ सकता है?
बिलकुल। अब जिसका शासन-सत्ता में कनेक्शन नहीं है, जिनका भ्रष्टाचार से कनेक्शन नहीं है, वो इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली में ऐसे हजारों लोग आपको मिल जाएंगे जो सड़क पर रहते हैं, वो कहां जाएंगे। फिर जनता को तो कैसे भी सर्वाइव करना है, वह कैसे भी करके कोशिश करेगी।

आईएएस लॉबी में इसे लेकर क्या कुछ प्रतिक्रिया है?
मुझे आईएएस लॉबी इसे लेकर क्या कर रही है, ये नहीं पता। हम सब इंडीविजुअल्स हैं। ऐसे तो कई सारे हैं जिन्हें लगता है कि इस मुद्दे को अभी छोड़ देना चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोई लॉबी है। अधिकतर तो यही सोचते हैं कि मनपसंद पोस्ट मिल जाए या मनपसंद जगह ट्रांसफर हो जाए। मुझे तो लगता है कि जिस संविधान पर हाथ रखकर इन्होंने शपथ ली है, आधे भी उसका अर्थ ठीक से नहीं जानते होंगे।

अब तो बिल पास हो गया तो अब क्या करें?
बिल तो शुरुआत है। जब संसद फेल होती है तो जनता शुरू होती है। हमें संविधान ने यह अधिकार दिया है कि हम शांतिपूर्वक सभा कर सकते हैं और प्रदर्शन कर सकते हैं। हम यह अधिकार भूल चुके हैं। इसे हमें इस्तेमाल करना होगा, अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे? सरकार हमारी नागरिकता पर सवाल उठा रही है तो हम सरकार ने अब नहीं पूछेंगे तो कब पूछेंगे? नोटबंदी में हमारा पैसा तीन महीने बाद वापस किया, ऐसे ही हमारी नागरिकता ले ली जा रही है जो कब वापस होगी, नहीं पता। 

Friday, August 15, 2014

Letter to the mike of Red Fort: लालकि‍ले के माइक को पत्र

प्रि‍य लालकि‍ले के माइक,

 आज तुम्‍हें देखा। कि‍तने दुबले हो गए हो तुम। एकदम मेरे देश की तरह कुपोषणग्रस्‍त। हो सकता है तकनीक ने तुम्‍हें ऐसा बना दि‍या हो, वैसे भी तकनीक हम लोगों में से 30 फीसद लोगों को कुपोषणग्रस्‍त बना ही चुकी है। चाहे वो दि‍मागी कुपोषण ही रहा हो जि‍सने आज तुम्‍हारी ये हालत कर दी। आज तुम अपने पूरे कुनबे के साथ लालकि‍ले पर दि‍खे तो लगा कि चलो, कि‍सी के तो 2020 तक जिंदा रहने की उम्‍मीद है, भले ही वो तुम हो। वैसे तो हमारे प्रधानमंत्री महोदय के भक्‍तगण गली गली हर बैठकी में यह कहते देखे-सुने जा सकते हैं कि 2020 तक वो ''हिंदुस्‍तान'' से कि‍सी एक नस्‍ल को संपूर्ण रूप से मि‍टा देने वाले हैं। उम्‍मीद थी कि आज बरास्‍ते तुम उस योजना का भी खुलासा वो भगवान कर देते, जि‍ससे कि यह सारी घोषणाएं उनके भक्‍तगण कर रहे हैं, लगातार करते जा रहे हैं। 

माइक, कि‍तनी अच्‍छी बात है (डोंट मांइड माइकजी प्‍लीज) कि तुम बोल नहीं सकते। बोल सकते होते तो आज कम से कम हमें उस लफ्फाजी से तो नि‍जात मि‍लती जो बुद्ध की भूमि नेपाल बता रही थी। पता नहीं क्‍यों मेरे मन के तार बार बार इस बात से जुड़ रहे हैं कि जो बुद्ध को मानते हैं, उनका देश नेपाल होने का फतवा बहुत जल्‍द आने वाला है। अल्‍लाह को मानने वालों का फतवा तो नरेंद्र मोदी के कारिंदे कई बार दे ही चुके हैं कि उनका देश पाकि‍स्‍तान/बांग्‍लादेश है। मेरे सामने से इति‍हास का वह मंजर हूबहू गुजर रहा है जब दक्षि‍ण भारत के रामानंद संप्रदाय के लोगों ने बौद्ध धर्म को मानने वालों को उत्‍तर भारत से काफी दूर खदेड़ दि‍या था। माना कि उस वक्‍त भारत वारत का कोई अस्‍ति‍त्‍व नहीं था, पर बात क्षेत्र के मौजूदा भौगोलि‍क पहचान की है। यानि कि अगर बार बार बुद्ध की भूमि नेपाल बोली जा रही है, तो मैं से लंबी अवधि की साजि‍श (लांग टर्म कांस्‍पि‍रेसी) मान सकता हूं। माइक, सच्‍ची कहता हुं, तुम उस वक्‍त थोड़ा सा तो खराब हुए होते। मगर ये तकनीक मुई जो है ना, ये तुम्‍हारा खून चूसकर ही मानेगी, ठीक वैसे ही, जैसे कि देश के 35 साल के लोगों का चूस रही है। उन्‍हें कुपोषि‍त बना रही है।

तुम्‍हें प्रि‍य लि‍खना मेरी कोई मजबूरी नहीं है, सिर्फ इसलि‍ए तुम्‍हें प्रि‍य लि‍खा क्‍योंकि तुम्‍हें प्रि‍य न लि‍खने का मेरे पास कोई ठोस कारण नहीं था और आमतौर पर मैं चीजों को प्रेम के साथ ही शुरू करना चाहता हूं, शुरू करता भी हूं। और प्रेम करना भी चाहि‍ए। मैनें सुना माइक कि तुमने भी सुना कि महि‍लाओं की घटती संख्‍या पर तुम्‍हारे मुंह में अपनी आवाज ठूंसने वाला पि‍तृसत्‍तात्‍मक फासि‍स्‍ट चिंति‍त था। मुझे इस चिंता ने और भी चिंता में डाल दि‍या है क्‍योंकि मैं जानता हूं कि संघ की सनातनी पि‍तृसत्‍ता कैसे काम करती है। इसी तरह से मां बेटि‍यों बहुओं बेटों में उलझाकर कि‍स तरह से ब्‍लैकमेल करती है महि‍लाओं को, यह समझना कोई मुश्‍कि‍ल काम नहीं है। चिंता ने चिंता जताई पर हि‍स्‍सा देने से पूरी तरह निश्‍चिंत रही। अगर आज बजरि‍ए तुम, मुझे यह सुनने को मि‍लता कि देश की आधी आबादी को उसका हक मि‍लेगा और वो जीरो टॉलरेंस के लेवल पर मि‍लेगा तो शायद मेरी चिंता को और चिंता नहीं होती पर चूंकि चिंता ये नहीं थी, इसलि‍ए हो रही है। एक तरफ महि‍लाओं के प्रेम के खि‍लाफ आरएसएस और भाजपा अभि‍यान चलाती हैं, खाप पंचायत का समर्थन करती हैं, लव जि‍हाद जैसे फर्जी नारे देकर दंगे कराए जाते हैं जि‍समें कि‍तनी महि‍लाओं की अस्‍मत लूट जाती है और दूसरी तरफ उनकी रक्षा की जो लफ्फाजी की जाती है... तुम फि‍र से क्‍यूं नहीं खराब हो गए थे माइक। क्‍या तुम्‍हें उस वक्‍त जसोदा बेन की भी याद न आई।

माइक, तुमको तब भी खराब होना था, जब आतंकवादि‍यों और माओवादि‍यों को एक तराजू में तौला जा रहा था और उनके द्वारा की जाने वाली हत्‍याएं निर्दोषों की हत्‍याएं कही जा रही थीं। क्‍या महेंद्र कर्मा निर्दोष थे। ठीक है, मैं मानता हूं कि कानून व्‍यवस्‍था का शासन होना चाहि‍ए, पर क्‍या सिर्फ एकपक्षीय। क्‍या सिर्फ 35 वर्ष के टैलेंटेड युवाओं की ही बात होनी चाहि‍ए, क्‍या सिर्फ मेड इन इंडि‍या की ही बात होनी चाहि‍ए। कि‍तना बड़ा तबका तो ऐसा है जो अनप्रोफेशनल है। पर तुम्‍हारे मुंह में बोलने वाले को शायद यह नहीं पता क्‍योंकि वह जहां से आए हैं, उसकी खि‍ड़की फेसबुक और ट्वि‍टर पर भी खुलती है। और यहां से अगर वो हमें इति‍हास बताती है तो सिर्फ वैदि‍क काल का इति‍हास बताती है। वैदि‍क काल में भी वह बड़े चूजी हैं। अब काल की बात चली है तो काश तुम बताते कि तुम कि‍स काल से आए हो। कहीं चुनाव के ठीक पहले वाले उस काल के नहीं जब बड़े बड़े प्‍लास्‍टि‍क के लालकि‍ले बनाए जाते थे?

वैसे कहने को तो बहुत कुछ मन कर रहा है माइक अंकल, पर चूंकि साहेब ने तुम्‍हारे एक बच्‍चे का सि‍र वहीं मौके पर ही कलम कर दि‍या था तो मैं समझ सकता हूं कि तुम गमजदा होगे। इसलि‍ए चलते चलते उन लोगों के लि‍ए कबीर का ये एक दोहा कहे जा रहा हूं जो लोग अब गुस्‍से में लाल पीले होंगे-
''यह कलि‍युग आयो अबै, साधु न मानै कोय।
कामी क्रोधी मसखरा, ति‍नकी पूजा होय।।''

तुम्‍हारा तो कभी नहीं
खाद भंडार वाला राहुल 

Thursday, August 14, 2014

Letter to Red Fort: लालकि‍ले को एक पत्र

प्रि‍य लालकि‍ला, 

इससे पहले कि तुम कल 15 अगस्‍त को भगवा कि‍ला बनकर एक फासि‍स्‍ट सरकार के नुमाइंदे को अपनी छत पर चढ़कर वि‍कास के चाचा बनने की इजाजत दो, आज स्‍वतंत्रता दि‍वस पर मैं तुमसे चंद बातें करना चाहता हूं। आज ही ये बातें इसलि‍ए कर लेना चाहता हूं, क्‍योंकि कल के बाद मुझे तुमसे कोई खास उम्‍मीद नहीं रहेगी। अपने इति‍हास के चलते तुम मुझे प्रि‍य जरूर रहोगे, लेकि‍न इस प्रेम में कसूरवार मेरी अतीतजीवी होने की आकांक्षा का ही है, यकीन मानो, इसमें तुम्‍हारा जरा सा भी दोष नहीं है। 

लालकि‍ले, पि‍छले दस सालों में मैं सैकड़ों बार तुम्‍हारे सामने से गुजरा। हमेशा तुम्‍हें वहीं खड़ा पाया, जहां कि तुम पि‍छले कई सौ सालों से खड़े हो। पर आज शाम पता नहीं क्‍यों ऐसा लग रहा है कि जैसे कल तुम पहले जैसे नहीं रहोगे। जैसा कि मैनें अपनी चि‍ट्ठी की शुरुआत में ही कहा, तुम भगवा होने जा रहे हो। इस भगवे का तुम्‍हारे ऊपर लहराने वाले ति‍रंगे वाले भगवे से भी कोई खास मतलब नहीं है। इस भगवे का तुम्‍हारे सामने के मंदि‍र और गुरुद्वारे से भी कोई खास मतलब नहीं है। इस भगवे का अगर कि‍सी से कुछ मतलब है तो उन लफंगों से जो हाहा हूती करके कल तुम्‍हारे सीने पर मूंग दलने आ रहे हैं। 

तो क्‍या मैं ये सोचूं लालकि‍ला, कि कल से मेरे मन में तुम्‍हारे लि‍ए इज्‍जत कम होने जा रही है। क्‍या मैं ये समझूं कि कल से मैं अगर तुम्‍हारे सामने से गुजरा तो तुम भरभराकर मेरे ऊपर गि‍र भी सकते हो। पता नहीं क्‍यों मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि मेरे अंदर चचा बहादुर शाह का कोई अंश आ गया है और मैं पता नहीं कि‍तनी दूर से तुम्‍हें देख रहा हूं और अपने मन को बार बार बेचैनी से मल रहा हूं। मुझे तुमसे प्रेम था लालकि‍ले, अब भी है, पर जब तुम कल भगवा हो जाओगे, तो... तो का तो कोई जवाब ही नहीं होता। 

मुझे पता है लालकि‍ला कि कल तुम्‍हारी छत से वि‍कास का तूफान चलेगा। अब ये दीगर बात है कि लालकि‍ला से चलकर ये तूफान चावड़ी बाजार या मीना बाजार में ही कहीं गुम हो जाएगा। कल एक बार फि‍र से तुम्‍हारी छत से अच्‍छे दि‍न का हवाई लॉलीपाप दि‍खाया जाएगा। कल एक बार फि‍र से देश को समझाया जाएगा कि देश के वि‍कास के लि‍ए देश को बेचना जरूरी है, न कि देश के सभी लोगों को एक साथ लेकर चलना या उनके लि‍ए कैसा भी या कहीं भी रोजगार उपलब्‍ध कराना, या उसके मौके देना। कल एक बार फि‍र से तुम्‍हारी छत से एक अदृश्‍य पतंग उड़ाई जाएगी जो या तो वि‍कास के पप्‍पा को दि‍खेगी या फि‍र उनके भी पप्‍पा अंकल ओबामा को। 

एक वक्‍त था लालकि‍ले, जब तुम अपनी सेना देखते थे। पर अब कल से एक बि‍की हुई सेना, भले ही आधी बि‍की हुई, पर बि‍की हुई सेना देखोगे। क्‍या मुझे तुमपर तरस खाना चाहि‍ए या तुम्‍हारे लि‍ए दुख में आंसू बहाने चाहि‍ए। बोलो लालकि‍ला। पर तुम क्‍या बोलोगे। तुम्‍हारी बोलती तो तभी बंद हो गई थी, जब तुम्‍हारी छत पर अवैध कब्‍जे के लि‍ए देश में जगह जगह प्‍लास्‍टि‍क के लालकि‍ले बना दि‍ए गए और उसपर चढ़कर तुमपर चढ़ने की बद्तमीज हुंकार भरी गई। आज स्‍वतंत्रता दि‍वस की पूर्वसंध्‍या पर मैं तुम्‍हें बात देना चाहता हूं लालकि‍ला कि कल से तुम आधे बि‍के हुए होगे। कोई आश्‍चर्य नहीं कि अगले साल तुम पूरे बि‍क जाओ। मुझे तुमसे सहानभूति है लालकि‍ला। मैं अकेला हूं और अकेले बैठकर तुम्‍हारी एक एक ईंट भगवा होते देख रहा हूं, एक एक महराब बि‍कते देख रहा हूं। 

तुम्‍हारा पुराना आशि‍क 
बीज भंडार वाले राहुल 

Saturday, March 15, 2014

यहां जानें कैसे ब्राह्म्‍णों ने कि‍या था होलि‍का का गैंगरेप

जरा ठंडे दि‍माग से बगैर उत्‍तेजि‍त हुए इसे सोचने की कोशि‍श करें।
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1- हि‍रण्‍य कश्‍यप। एक दलि‍त/बौद्ध राजा। यानि कि ब्राह्म्‍णों का परम शत्रु।

2- प्रह्लाद। ब्राह्म्‍णों द्वारा फुसलाया गया बच्‍चा। एक बौद्ध बच्‍चे से सनातन धर्म की पूजा कराया जाना।

3- होलि‍का। प्रह्लाद से प्रेम करने वाली और बौद्ध धर्म में पूरी आस्‍था रखने वाली एक सुंदर दलि‍त महि‍ला।

4- होली। एक उत्‍तर आधुनि‍क त्‍योहार। लूट-खसोट, नशा-पत्‍ती, चोरी और लंपटई पर आधारि‍त। गले लगकर कालि‍ख पोतने की प्रथा।

अब जैसा कि मैं देख पा रहा हूं कि क्‍यों ब्राह्म्‍णों ने होलि‍का का बलात्‍कार करके उसे जला दि‍या और क्‍यों हि‍रण्‍यकश्‍यप की हत्‍या कर दी, मेरे सभी दलि‍त भाई भी चीजों को साफ साफ समझ रहे होंगे।

पि‍छले कई वर्षों से चली आ रही ब्राह्म्‍णवादी कहानी का तार्किक खंडन इस तरह से है। इस कहानी का तार्किक खंडन ही हो सकता है क्‍योंकि ये सिर्फ कहानी ही है, सच नहीं।

महत्‍वाकांक्षी होना कोई पाप नहीं। सभी होते हैं, हि‍रण्‍यकश्‍यप भी थे। अपने राज्‍य और बौद्ध धर्म का वि‍स्‍तार कर रहे थे। जहां तक वि‍भि‍न्‍न ग्रंथों में उसकी प्रजा की बात मि‍लती है, तो प्रजा पूरी तरह से अपने राजा के साथ थी। हो भी क्‍यों न, राजा ने पूरी सतर्कता के साथ ब्राह्म्‍णों को अपना काला खेल खेलने से रोक जो रखा था। महि‍लाओं का तो इतना सम्‍मान था कि कोई भी महि‍ला आधी रात को राज्‍य में कहीं भी जा सकती थी। ऐसे में ब्राह्म्‍णों ने सोची समझी रणनीति से प्रह्लाद को अपने चंगुल में लि‍या। उसे सनातनी देवताओं की महि‍मामय कहानी सुनाई गई। अबोध बालक के अबोध मन पर ब्राह्म्‍णों का काला जादू चल गया। जब यह खबर राजा हि‍रण्‍यकश्‍यप को हुई तो पहले उन्‍होंने अबोध बालक को समझाने की कोशि‍श की पर पथभ्रष्‍ट होते देख घर से नि‍काल दि‍या। घर से नि‍काले जाने के बाद प्रह्लाद उन्‍हीं लंपट ब्राह्म्‍णों की मंडली में बैठने लगा और उनके साथ नशा करने लगा। हालांकि बुआ होलि‍का का प्रेम अपने भतीजे के लि‍ए यथावत बना रहा और वह गाहे बगाहे छुप कर उसे भोजन और धन देती रही। उस रात पूरे चांद की रात थी। होलि‍का ने बौद्ध धर्म की एक वि‍शेष पूजा की थी जि‍समें श्‍वेत वस्‍त्र धारण करते हैं। अयोध्‍या के भंते करुणाशील बताते हैं कि उनके अध्‍ययन में पता चला कि होलि‍का बहुत ही सुंदर थी और उस रात श्‍वेत वस्‍त्रों में तो वह अप्‍सरा लग रही थी। हि‍रण्‍यकश्‍यप से छुपकर उस चांदनी की काली रात प्रह्लाद को भोजन देने गई। प्रह्लाद अपनी नशेड़ी ब्राह्म्‍ण मंडली के साथ नशे में लीन था। जब उसी ब्राह्म्‍ण मंडली ने इतनी सुंदर युवती को आते देखा, तो सभी लोगों ने होलि‍का के साथ दुराचार कि‍या। अपराध घटि‍त होने के बाद जब उन्‍हें अपराध की गंभीरता का पता चला तो आनन फानन में आसपास के मकानों से जलाने लायक सामान चोरी कि‍या गया। उसी रात होलि‍का को जला दि‍या गया और कहानी बनाई गई कि होलि‍का तो हि‍रण्‍यकश्‍यप के कहने पर प्रह्लाद को जलाने आई थी और उसके पास आग से बचने वाला शॉल था। इसके बाद पूरी सोची समझी नीति से एक ऐसे उत्‍सव का आयोजन कि‍या, जि‍समें दुश्‍मन को रंग लगाकर गले मि‍लने का प्रस्‍ताव रखा गया। ये दुश्‍मन वही सारे बौद्ध और दलि‍त थे, जि‍नके राजा को मारने की साजि‍श के तहत यह उत्‍सव मनाया जा रहा था। जब यह मामला राजा हि‍रण्‍यकश्‍यप तक पहुंचा तो उन्‍होंने उस वक्‍त भी सदाशयता दि‍खाते हुए सभी को कुछ दंड देकर छोड़ दि‍या। आगे की कहानी साजि‍शों से भरी है और सभी जानते हैं कि कि‍स तरह धोखे से राजा हि‍रण्‍यकश्‍यप की हत्‍या ब्राह्म्‍णों ने कराई।


Thursday, October 31, 2013

झारखण्ड का आदिवासी इतिहास

- डॉ. रोज केरकेट्टा

झारखण्ड विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है। एक ओर यहां प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियां हैं तो दूसरी ओर अति आधुनिक जीवनदृष्टि भी। हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है। यहां सुरम्य घाटियां, झरने, नदियां और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएं हैं। रत्नगर्भा धरती है। और हैं सामूहिक एवं समन्वित संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी जीने वाले जनजातीय समुदाय। जीवंत गीतों, नृत्यों और अपार साहस व शौर्य की धरती है यह झारखण्ड। आदिवासी पहचान, संस्कृति और स्वतंत्रता के अंतहीन संघर्ष और अदम्य जिजीविषा का प्रतीक।

ऋगवैदिक काल में झारखण्ड कीकट प्रदेश के नाम से जाना जाता था। उस समय का आदिम समुदाय घुमन्तु था और शिकार, पशुपालन तथा जंगली कंद-मूल पर उसका जीवन निर्भर था। ये लोग कौन थे? कहीं बाहर से आए थे या यहीं के मूल निवासी थे, इस बारे में कहीं कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। झारखण्ड के आदिम निवासियों में जिनके पदचिन्ह सर्वाधिक स्पष्टता से दिखाई पड़ते हैं, वे हैं असुर।

झारखण्ड कुल 30 आदिवासी समुदायों का निवास स्थल है। ये हैं - असुर, मुण्डा, संताल, हो, खड़िया, उरांव, माल एवं सौरिया पहाड़िया, बिरहोर, बैगा, बंजारा, बेदिया, बिंझिया, बिरजिया, बाथूड़ी, भूमिज, चेरी, चीक बड़ाईक, गौड़, गोड़ाइत, करमाली, खरवार, किसान, कोरा, कौरवा, लोहरा, महली, शबर खड़िया, खौंड और परहिया। इनमें संतालों की संख्या सर्वाधिक है और ये भारत के सबसे बड़े आदिवासी समूहों में गिने जाते हैं। झारखण्ड का संताल परगना मुख्यतः इन्हीं से आबाद है जबकि रांची पठार के पूर्वी भाग में मुण्डाओं की बहुलता है। पश्चिम में उरांवों का। नेतरहाट का क्षेत्र असुरों का है तो निम्न पठारीय भागों के उत्तर में भुंइयां, बिरहोर, संताल; पूर्व में संताल, पहाड़िया और भुंइयां; दक्षिण में हो और पश्चिम में चेरो, खरवार,कोरवा आदि।

इतिहासकारों के अनुसार महाभारत काल में झारखण्ड मगध के अंतर्गत था और मगध जरासंध के आधिपत्य में था। अनुमान है कि जरासंध के वंशजों ने लगभग एक हजार सालों तक मगध में एकछत्र शासन किया। जरासंध शैव था और असुर उसकी जाति थी। के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं। झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। असुर मुख्यतः लोहा गलाने का व्यवसाय करते थे और असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी।

यह भी तथ्य है कि असुरों के समय में झारखण्ड के कुछ इलाकों में जैनियों का प्रभाव था। खासकर, हजारीबाग और मानभूम आदि इलाके में। पारसनाथ में जैन तीर्थ का होना तथा उस क्षेत्र में सराक जाति की उपस्थिति और उनके रीति-रिवाज इसके जीवंत साक्ष्य हैं। असुरकालीन समाज और सभ्यता के बारे में अब तक हुए अध्ययन कुछ सूत्र ही दे पाते हैं, विस्तृत परिचय नहीं। पर इतना तय है कि असुरों के समय में और उनके पहले भी झारखण्ड का इलाका निरापद नहीं था। हजारीबाग की इस्को गुफाओं में मिले प्रागैतिहासिक शैल चित्रों और वस्तुओं ने इस धारणा को और पुष्ट किया है। दामोदर नदी घाटी तथा समस्त झारखण्ड में पाये जाने वाले अनेक पुरातात्विक अवशेषों के वैज्ञानिक अध्ययन भविष्य में मानव जाति और सभ्यता के नितांत नये इतिहास का उद्घाटन कर सकते हैं।

नृजातीय रूप से झारखण्ड के तमाम आदिवासी समुदायों की पहचान - प्रोटो आस्ट्रेलाइड और द्रविड़, दो समूहों में की जाती है। उरांवों को छोड़कर जो कि द्रविड़ समूह के हैं, अधिकांश जनजातीय समुदाय प्रोटो आस्ट्रेलाइड समूह में आते हैं। झारखण्ड के गैर आदिवासी समुदाय जिन्हें कि यहां सदान कहा जाता है, आर्यन समूह के हैं। हालांकि वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव में आज अधिकांश सदान अपने आपको अनार्य कहलाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।

भाषायी वर्गीकरण के लिहाज से भाषाविद् झारखण्ड को तीन वर्गों में बांटते हैं। मुण्डा भाषा परिवार, द्रविड़ भाषा परिवार और आर्य भाषा परिवार। उरांव और पहाड़िया जनजातियों की भाषा ‘कुड़ुख’ द्रविड़ है जबकि सदानों की नागपुरी, सादरी, कुरमाली, खोरठा आदि आर्यन। मुण्डा, संताल, खड़िया, हो, बिरहोर आदि मुण्डा भाषा परिवार की भाषाएं बोलते हैं। रांची विश्वविद्यालय भारत का एकमात्र विश्वविद्यालय है जहां क्षेत्रीय एवं आदिवासी भाषाओं के अध्ययन एवं अध्ययापन की व्यवस्था एम. ए. स्तर पर है। फिलहाल झारखण्ड में मुण्डारी, संताली, हो, खड़िया, कुड़ुख, नागपुरी, पंच परगनिया, कुरमाली एवं खोरठा, 9 क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं।

600 ईसा पूर्व जब मुण्डा लोग झारखण्ड आए तो उनका सामना असुरों से हुआ। मुण्डाओं की लोकगाथा ‘सोसोबोंगा’ में उनके आगमन और असुरों से संघर्ष का विस्तार से वर्णन है। भारत के विख्यात मानवशास्त्री शरत चंद्र राय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मुण्डाज एण्ड देयर कंट्री’ में इसका समर्थन करते हैं। मुण्डा जब झारखण्ड आए तो उनकी एक शाखा संताल परगना की ओर गई। इन लोगों को आज हम संताल के नाम से जानते हैं जबकि दूसरी शाखा रांची की पश्चिमी घाटियों में उतरी। रांचीकी ओर आनेवाली शाखा मुण्डा कहलाई। ये मुण्डा लोग ही असुरों से भिड़े।

बाद में, इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1206 ई. में उरांव कर्नाटक की ओर से, नर्मदा के किनारे-किनारे विंध्य एवं सोन की घाटियों से होते हुए रोहतासगढ़ पहुंचे। जहां उन्होंने राज किया और फिर अपना राजपाट खोकर पराजित होने के पश्चात् रांची की ओर आए। तब उनका सामना मुण्डाओं से हुआ। उरांवों के आने के बाद मुण्डा लोग दक्षिण की ओर चले गए। यह इलाका आज का खूंटी क्षेत्र है जहां मुण्डाओं की बहुलता है।

असुर लोग कृषिजीवी नहीं थे और उस समय में झारखण्ड में कृषि प्रधान समाज की उपस्थिति के प्रमाण नहीं मिलते हैं। मुण्डा लोग जब यहां आए तब उन्होंने ही व्यवस्थित कृषि और जीवन-समाज पद्धति की मजबूत नींव डाली। मुण्डा लोग न सिर्फ कृषि कार्यों में कुशल थे बल्कि उनका सामाजिक संगठन और प्रशासन बेहद सुव्यवस्थित था। उनकी सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था गणतांत्रिक थी। गांव का मुखिया मुण्डा कहलाता था और कई गांव के मुण्डाओं का चुना हुआ प्रतिनिधि ‘मानकी’ होता था। वे सामुदायिक जीवन जीते थे और सामुहिकता उनकी प्राण-वायु थी।

पहली शताब्दी में यहां नागवंशियों का आधिपत्य हो गया। अनुमान है कि पहली ईश्वी के शुरूआती दिनों में नाग जाति जो कि जनमेजय के नाग यज्ञ के बाद से कांतिहीन जीवन जी रहे थे, ने अपनी खोयी शक्ति वापस पा ली थी और समूचे मध्यदेश पर इनका प्रभुत्व स्थापित हो गया था। इसी नाग जाति के वंशज फणिमुकुट राय ने 19 वर्ष की अवस्था में 83 ईश्वी में यहां नागवंशी शासन की नींव डाली। सुतियाम्बे उनकी पहली राजधानी थी और मुण्डाओं के गणतंत्र का आखिरी सर्वोच्च केन्द्र।

नागवंशी शासन के बाद समूचे झारखण्ड में आर्य संस्कृति-सभ्यता का विस्तार हुआ। इस विस्तार ने आदिवासी एवं सदान, दोनों ही संस्कृतियों के सम्मिलन में युगांतकारी भूमिका निभायी। सांस्कृतिक सम्मिलन से झारखण्ड में ‘सहिया’ संस्कृति का विकास हुआ जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों के आगमन तक दोनों के संबंध सौहार्द्रपूर्ण बने रहे। सामुदायिक और सामूहिक संस्कृति व जीवनशैली अविच्छिन्न रूप से गतिमान रहा। नागवंशियों का राजतंत्र और आदिवासियों की पारंपरिक गणतांत्रिक परंपरा की समानान्तर धाराएं बिना एक दूसरे को काटे अथवा बाधित किये चलती रही।

इसे छिन्न-भिन्न किया अंग्रेजी राज ने। जिसको यहां के आदिवासी और सदानों ने अपने तीव्र प्रतिरोधों से स्वतंत्रता प्राप्ति तक लगातार चुनौती दी। सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, बाबा तिलका मांझी, बिरसा मुण्डा, जतरा टाना भगत, बुधु भगत, तेलंगा खड़िया, शेख भिखारी जैसे अनेक झारखण्डी नायकों ने। इन्होंने भारत के अंग्रेजी राज में स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए हुए झारखण्डी जनता के जनविद्रोहों को संगठित, संचालित एवं उसका साहसी नेतृत्व किया। अपनी शहादतें दी।

झारखण्ड मूलतः आदिवासी जीवन-दर्शन के मूल सिद्धांतों सह-अस्तित्व, सामुदायिकता, सामूहिकता और सहभागी संस्कृति के विरासत का केन्द्र है। जीवन के उल्लास और इंसानियत के विभिन्न रंगों को यहां के गीतों, नृत्यों, पर्व-त्यौहारों व लोक कलाओं में सहज देखा व अनुभव किया जा सकता है। करमा, सरहुल, मागे, बन्दई मुख्य सामाजिक पर्व हैं। स्वर्णरेखा, कोयलकारो, दामोदर और शंख नदियां जीवनरेखा हैं तो हुण्डरू, दसोंग, हिरनी, पंचघाघ आदि जलप्रपात यहां की प्रकृति, वनस्पति और जीवन की स्थायी धड़कन।

(असुरनेशन.इन से साभार)

Wednesday, July 18, 2012

काका ने कैंसर की पीड़ा साझा की थी मुमताज से



राजेश खन्ना के निधन की खबर मिलने पर उनके साथ दस सुपरहिट फिल्‍में देने वाली अदाकारा मुमताज खासी भावुक हो उठीं। मुमताज ने कहा है कि दूसरों के साथ बहुत ज्यादा नहीं घुलने-मिलने वाले काका उनके बेहद करीब थे। फिल्मी पर्दे की सबसे हिट जोड़ी के तौर पर दोनों ने आपकी कसम, रोटी, अपना देश, सच्चा झूठा समेत दस सुपरहिट फिल्में दीं। 
अपने परिवार के साथ लंदन में रह रही मुमताज ने बताया कि उन्हें इस बात का संतोष है कि वह पिछले महीने उनसे मिली थीं। उस दौरान दोनों ने कैंसर से अपनी-अपनी लड़ाई की बात की। हालांकि खन्ना के परिवार ने कभी उनकी बीमारी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।
स्तन कैंसर से अपनी लड़ाई जीतने वाली मुमताज ने कहा, "उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं बहुत मजबूत हूं और वह जानते थे कि कीमोथेरेपी के दौरान मैं किस पीड़ा से गुजरी थी। उनके लिए ऑर्डर किए गए  बहुत सारे व्यंजनों के बारे में मजाक करने पर उन्होंने कहा था कि उन्हें भूख महसूस नहीं होती। उस दिन सभी ने खाया, लेकिन काका ने नहीं।"
मुमताज ने बताया कि बीमारी की हालत में भी राजेश जिंदादिल थे। मजाक करना, ठहाके लगाकर हंसना उनकी आदत थी जो उस समय भी कायम थी। मुमताज कहती हैं कि उनके लिए यह गर्व की बात है कि जिन फिल्मों में उन्होंने साथ काम किया वे सभी सुपरहिट रहीं। राजेश के साथ मेरी कई यादें हैं। रोटी फिल्म की शूटिंग के दौरान बर्फ में मुझे उठाकर चलना उनके लिए कठिन काम था। उस एक सप्ताह के दौरान जब भी हम शूटिंग करते मैं उनसे   मजाक करती थी कि अब आपको 100 किलोग्राम का वजन उठाना होगा और वह कहते थे कि नहीं इतनी भी भारी नहीं हो। पर मुझे मालूम है मैं कभी भी दुबली नहीं थी। पिछले हफ्ते दारा सिंह की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान बॉलीवुड के कई दिग्गजों ने दुनिया छोड़ दी। राजेश के करोड़ों चाहने वालों के लिए यह एक मुश्किल समय है। नियति पर किसी का कोई वश नहीं है। राजेश के जाने से मैं बेहद दुखी हूं.....देखी जमाने की यारी बिछड़े सभी बारी-बारी.....।

प्रेस ट्रस्‍ट आफ इंडिया से साभार....

Saturday, July 7, 2012

असुरक्षात्मक मौन का दौर


एक लंबी ख़ामोशी । घनघोर चुप। सन्नाटे की इस लकीर को थोड़ी बहुत तोड़ती-छेड़ती कुछ एक घटनात्मक ख़बरें । नक्सलियों  ने पुलिसवालों को मार दिया या पुलिस वालों ने  नक्सलियों  को मार दिया। प्रणब, पानी, नदी बरसात तक सिमटी, मैली कुचली भारतीय पत्रकारिता। सुबह सोकर उठने से लेकर प्लान बनाने की सोच तक सिमटी पत्रकारिता। शाम को सीट पर पहुंचकर विज्ञप्तियां निपटाने की पत्रकारिता। कुछ लोग कहते हैं कि यह पत्रकारिता का संक्रमण काल है। मुझे तो इस बाबूगिरी में किसी ओर से ऐसी छटपटाहट नजर नहीं आ रही है। संक्रमण काल की छटपटाहट, कुछ कर गुजर जाने की चाहत अगर थोड़ी बहुत कहीं नजर आती भी है तो इंटरनेट पर। असहमतियों का स्वागत है।

भारत में, जितना मैनें देखा है, किसी भी माध्यम को आसानी से हजम नहीं किया जाता। और अगर हजम हो भी गया तो कहा जाता है कि अरे, ये तो पहले से ही हमारे पेट में था। हमने तो बस इसे देखा नहीं था। लोकपाल की मांग तो चल रही है, पर क्या  हम ईमानदारी से सूचना का अधिकार अधिनियम हजम कर पाए हैं? हालांकि जब हजम कर लेंगे तो कई लोग शर्तिया यही कहेंगे कि हमें तो पता था कि ऐसा होकर रहेगा। लेकिन अब से हजम करने के वक्फे में कितने लोग तबाह हुए, बरबाद हुए, जेल गए, परिवार छूटा, दोस्त बिछड़े, क्या ये भी आसानी से हजम हो जाएगा?

काफी कुछ यही हालत इस समय हमारे देश में इंटरनेट की है। हिंदी ब्लागिंग के शुरुआती दौर से मैं इसके साथ रहा हूं। सिंगल ब्लॉग से मल्टीपल यूजर्स ब्लाग  और फिर उसी ब्लाग से एक छोटी मोटी न्यूज, आर्टिकल, व्यूज वेबसाइट्‌स बनती देखी हैं। कुछ साथी ऐसे भी रहे जिन्होंने  ब्लागिंग  जारी रखते हुए लीक से हटकर चलना पसंद नहीं किया और वह दुनियावी रूप से आज सुखी हैं। पर जिन्होंने विश्र्व के साथ कंधे से कंधा मिलाया, इमानदार न्यूज़ और वियुज  छापेवह मानसिक रूप से सुखी तो हैं, पर दुनियावी रूप से दुखी हैं।

खबरों के जिस ब्लास्ट को हम ईवनिंगर समझकर ज्यादा महत्व नहीं देते थे, इन वेबसाइट्‌स ने देश विदेश में उनका महत्व बढ़ाया और हम कहने पर मजबूर हुए कि हां...खबर तो है। इन्होंने न सिर्फ बड़ी खबरें ब्रेक कीं, पत्रकारिता के मानदंडों पर तकरीबन खरा उतरते हुए सच की सड़क बनाई। पर इस सड़क को बनाने में कई खेत रहे और आज भी लगातार परेशान किए जा रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इनके सबसे बड़े दुश्मन हम पत्रकार ही हैं। दरअसल हम अब पत्रकार कम, बाबू ज्यादा बन गए हैं। हममें गहरी असुरक्षा घर कर गई है। नौकरी न रही तो जाएंगे कहां?

ये दौर इसी असुरक्षात्मक मौन का है। वो दौर तो गया जब झोला लटका के, चप्पल चटका के दो की तीन चाय में देश के प्रधानमंत्री के तीन अलग अलग घोटालों को छापने की बात होती थी। अब तो हमारा तीसरी प्याली के दोस्त को प्रधानमंत्री का चपरासी किसी झूठे मुकदमे में फंसाकर बंद करा दे, हममें से किसी के मुंह से बोल नहीं निकलने वाले। आखिरकार प्रधानमंत्री का चपरासी जो है। बाबू जो हैं...डरेंगे तो चपरासी से ही। वो दौर कहां रहा जब पत्रकार खबर के लिए संपादक या मालिक से भिड़ जाते थे। वो तो अब यादों में ही हैं। वैसे कई लोगों को कहते सुना है कि याद वही आता है, जो भूल जाता है।

Friday, November 6, 2009

आज मे बीतता हुआ कल- प्रभाष जोशी

उन्हें युगपुरुष कहना कोई अतिशयोक्ति नही होगी। एक बार उन्होंने ही कहा था कि अखबार कल का इतिहास बनाता है। बीते हुए कल का। उनकी ये बात कोई नई नही है। अखबार का चरित्र ही कुछ ऐसा है। लेकिन अखबार का एक और चरित्र होता है। एक अनोखा रूप, रंग, भाषा, संवाद शैली और निष्पक्षता। ये अखबार का सम्पादक बनाता है। ये काम प्रभाष जी ने किया और क्या खूब किया। उन्होंने नई दुनिया मे काम किया, मध्य प्रदेश के एक और अखबार मे काम किया लेकिन उनकी सारी यादें जनसत्ता मे ही सिमट कर रह जाती है। जनसत्ता से इतर जो यादे हैं, वो एक ऐसे अभिवावक की, जिसपर भरोसा रहा, हमेशा भरोसा रहा कि जब भी किसी पत्रकार के साथ कुछ हुआ या होगा, वो साथ रहेंगे। शारीरिक रूप से नही तो कलम से, माइक से या किसी भी तरह से। उनके रहने से डर नही लगता था। उनके चले जाने के बाद अब यह डर एक आत्मविश्वास मे बदलने लगा है कि वो ऐसा कर सकते थे तो हम क्यों नही। लेकिन ये आत्मविश्वास भी बगैर उनके खोखला है, सूना है। वो कल थे जो हमेशा आज के साथ बीतते थे। आने वाले कल मे भी उनका ही साया रहता था और साथ मे इंतज़ार- कि कल क्या होगा। पिछले दस से ज्यादा सालों मे, जबसे मैंने उन्हें पढ़ना-गुनना शुरू किया, हमेशा मन मे यही उत्कंठा रहती थी, न जाने कब मैं इस शख्स से मिल पाउँगा। उनके घर के इतने पास रहते हुए भी मैं कभी मिलने नही जा पाया। और शायद यही कारण है कि उनकी मौत की ख़बर सुनकर भी मैं जान बूझकर उनके घर नही गया। मुझसे ये सबकुछ बिल्कुल भी बर्दाश्त नही हो रहा था। क्योंकि ख़ुद उनका कहा आज बेमानी साबित हो रहा है। उनकी मौत पूरी तरह से बेमानी है। जो नही होनी चाहिए थी। लेकिन मौत को जस्टिफाई नही किया जा सकता। ये बात मैं जानता हूँ। फ़िर ये मन मानने को तैयार क्यों नही होता कि वो आज बीते हुए कल हो गए हैं। नही.....ऐसा नही हो सकता। गुरूजी हमेशा हैं और रहेंगे। जैसे पिछले दस सालों से मेरे साथ हैं, वैसे ही आगे भी रहेंगे.....

Friday, July 31, 2009

और पीछे जाता समय

अयोध्या से लौटते हुए ऐसा नही लगा की पीछे कुछ छोड़े जा रहा हूँ। यही लगा की पीछा छूटा। दरअसल लगातार हिंदुत्व की राजनीती का शिकार बनी अयोध्या का अब कोई नामलेवा नही रह गया है। हर तरफ़ एक भयाक्रांत अव्यवस्था का ही बोलबाला दिखा। एक भय हमेशा संगीनों के साए मे रहने का, एक अव्यवस्था जो सरकारों से लेकर प्रशासनिक अधिकारीयों की बदौलत फैली रहती है। बाकी जो कुछ बचता है, वह लोगो की आदतें पूरी कर देती हैं। विकास के नाम पर एक ईंट भी नही लगी दिखाई दी, अलबत्ता ये जरूर सुनने को मिला की अगर किसी ने यहाँ का विकास करना चाहा तो जानबूझकर उसे दरकिनार कर दिया गया।
ये तकरीबन नौ दस साल पहले की बात है। अयोध्या मे कोरिया से एक प्रतिनिधिमंडल आया। ये लोग कोरिया के करक वंश से थे और बताते थे की काफ़ी समय पहले अयोध्या के राजवंश की एक राजकुमारी समुद्र यात्रा करके कोरिया पहुची। वहा उसने राजा से शादी की और उस राजा से उसे आठ बच्चे हुए। उनमे से सात तो बौध भिक्षु बन गए और बाकि बचे एक बच्चे से आज कोरिया मे करक वंश के लोग मौजूद हैं। ये लोग अपने नाम के आगे या पीछे किम लगते हैं। बहरहाल, इन लोगो का कहना था की अयोध्या उनकी ननिहाल है और वह अपनी ननिहाल को सुंदर और विकसित देखना कहते हैं। इसके लिए इन्होने विकास का एक प्रस्ताव भी रखा। इस प्रस्ताव पर जब बात आगे बढ़ी तो सन २००० से २००२ के बीच मे उत्तर प्रदेश सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल कोरिया भी गया। इसमे तत्कालिन पर्यटन मंत्री कोकब भी शामिल थे। इसके बाद एक और प्रतिनिधिमंडल गया और दूसरे दौर के वार्ता शुरू हुई। दूसरे दौर की वार्ता मे तय हुआ की कोरियन प्रतिनिधिमंडल एक प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजे। प्रस्ताव भेजा गया। उस समय केन्द्र मे भाजपा की सरकार थी । माननीय कथित लौह पुरूष अडवाणी गृहमंत्री हुआ करते थे। अयोध्या के ही कुछ लोगो ने बताया की उन्होंने कोरियन प्रतिनिधिमंडल को अयोध्या मे विकास कराने की अनुमति नही दी।
ये तो हुई वक्त की बात। अब थोड़ा सा वक्त के और पीछे चलते हैं। श्री लंकाई और वर्मा के कुछ ग्रंथो मे मिलता है की भगवन बुध साल मे कुछ समय अयोध्या मे काटा करते थे। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिला जब जन्म भूमि की खुदाई के दौरान बुध कालीन भांड और अन्य बर्तन, मूर्तियाँ मिलने लगी। हिंदुत्व की सारी राजनीति इसमे मिलकर गायब होने जा रही थी। ऊपर से अगर केन्द्र की भाजपा सरकार कोरियन प्रतिनिधिमंडल का प्रस्ताव स्वीकार कर लेती तो इस बात पर पक्की मुहर लग जाती की अयोध्या का इतिहास न तो हिन्दुओं से सम्बंधित है और न ही मुस्लिम समुदाय से। हिंदू मुस्लिम की राजनीति चलती रहे, उसका लौह पुरूष ने लोहा लाट तरीका निकला। अयोध्या को विकास की दौड़ मे पीछे कर देने का। तभी अयोध्या से लौटते वक्त कुछ ऐसा नही लग रहा की कुछ पीछे छोड़ आए।

Saturday, September 29, 2007

हवा में रहेगी, मेरे ख्याल की बिजली : भगत सिंह और आज का भारत

दखलवाले मित्र चंद्रिका ने हमें यह आलेख बहुत पहले भेजा था. हमने सोचा था कि इसे 28 को पोस्ट किया जायेगा. पर पटना में बारिश ने इस तरह के रंग दिखाये कि दिन-दिन भर या तो बिजली गायब रही याइंटरनेट कनेक्शन ठीक से काम नहीं कर पाया. इसलिए इसमें देर हुई. फिर भी, चंद्रिका ने जो सवाल उठाये हैं, वे मौजूं हैं और हमें उन पर सोचने की ज़रूरत है.

चंद्रिका
हर बार की तरह इस बार भी 28 सितंबर को भगत सिंह का जन्म दिवस मनाया जायेगा. स्कूलों में बच्चे भगत सिंह की तरह हैट पहन कर आयेंगे, जिस पर लिखा रहेगा 'आइ मिस यू भगत सिंह,! उनकी प्रतिमा के बगल में लाल झंडे टांग कर नेता चिल्लाते हुए बतायेंगे कि भगत सिंह ने संसद में बम क्यों फोड़ा, दूसरे दिन कुछ और सेज परियोजनाओं की मंजूरी पर हस्ताक्षर किये जायेगें. विचार-गोष्ठी में यह बताया जायेगा कि भगत सिंह आम जनता की आजादी चाहते थे, कुछ लोगों को नक्सली होने के आरोप में गिरफ्तार किया जायेगा, अखबारों में छपेगा कि भगत सिंह, छुआछूत, धर्म, जाति की संकीर्णता को दूर करना चाहते थे, नीचे के कालम में किसी दलित को मंदिर में घुसने के कारण पीट-पीट कर मार डालने की खबर रहेगी. जन्म दिवस मनाने के बाद भगत सिंह की प्रतिमा को किसी कमरे में रख दिया जायेगा और गांधी के जन्म दिवस की तैयारी शुरू कर दी जायेगी. यह एक परंपरा रही है.

दुनिया के सामने भगत सिंह का जो चेहरा जाने-अनजाने में रखा गया है वह किसी जुनूनी व मतवाले देशभक्त का है. भगत सिंह के विचार, उनके दर्शन को लोगों से दूर रखा गया पर वक्त ने देश को उस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां भगत सिंह के विचार और प्रासंगिक होते दिख रहे है. जिस आम जन की बात भगत सिंह करते थे वह मंहगाई, गरीबी, भूख से पीड़ित होकर अपने को हाशिये पर महसूस कर रहा है. वह देश में बनाये गये कानूनों, नियमों की पक्षधरता को देखते हुए उनके प्रतिरोध में खड़ा हो रहा है.
देश को अंगरेजी सत्ता से मुक्त होने के 60 साल बाद भी देश का आम जन उस आजादी को नहीं महसूस कर पर रहा है, जो भगत सिंह, पेरियार, आंबेडकर का सपना था. आज वे स्थितियां, जिनका भगत सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय आकलन किया था, लोगों के सामने हैं. आंदोलन के चरित्र को देखते हुए भगत सिंह ने कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्व में जो आजादी की लडाई लड़ी जा रही है, उसका लक्ष्य व्यापक जन का इस्तेमाल करके देशी धनिक वर्ग के लिए सत्ता हासिल करना है. यही कारण था कि देश का धनिक वर्ग गांधी के साथ था. उसे पता था कि जब तक देश को अंगरेज़ी सत्ता से मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक बाजार में उसका सिक्का जम नहीं सकेगा. आखिरकार हुआ भी वही, जिसे भगत सिंह गोरे अंगरेजों से मुक्ति व काले अंगरेजों के शासन की बात करते थे. आज आम आदमी इस शासन तंत्र में अपनी भागीदादी महसूस नहीं कर रहा है. उसके लिए आज भी अंगरेजों द्वारा दमन के लिए बने नियम-कानून नाम बदल कर या उसी स्थिति में लागू किये जा रहे हैं. आजादी के 60 वर्ष बाद सरकार को एफ़्स्पा, पोटा, राज्य जन सुरक्षा अधिनियम जैसे दमन कानूनों की जरूरत पड़ रही है, क्योंकि जन प्रतिरोध का उभार लगातार बढ़ रहा है.
आजादी के बाद कई मामलों में स्थितियां ओर भी विद्रूप हुई हैं. जहां 42 में केरल के वायनाड जिले में इक्का-दुक्का किसानों की मौतें होती थीं, वहां आज स्थिति यह है कि देश के विभिन्न राज्यों में हजारों हजार की संख्या में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. आज भी देश में कालाहांडी जैसी जगह है, बल्कि काला हांडी से एक कदम ऊपर देश की एक बड़ी आबादी है, जो जीवन की मूलभूत जरूरतों से जूझ रही है. जो इसलिए भी जिंदा रखी गयी है ताकि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये वह सस्ते में श्रम को बेच सके. इसके बावजूद आज एक बड़े युवा वर्ग के लिए करने को काम नहीं है. इस कारण वह किसी भी तरह का अपराध करने को तैयार है. भारत एक बड़ी युवा संख्या की विकल्पहीन दुनिया है.
ऐसी स्थिति में यह बात सच साबित होती है कि भगत सिंह जिस आजादी की तीमारदारी करते थे वह आजादी देश को नही मिल पायी है. भगत सिंह देश, दुनिया को लेकर एक मुकम्मल समाज बनाने का सपना देखते थे, जिसमें वे अंतिम आदमी को आगे नहीं लाना चाहते थे, बल्कि सबको बराबरी पर लाना चाहते थे. जहां जाति, धर्म, भाषा के आधार पर समाज का विभाजन न हो. वे शोषण व लूट-खसोट पर टिके समाज को खत्म करना चाहते थे, वे किसी प्रकार के भेदभाव को खारिज करते थे. उनका मानना था कि दुनिया में अधिकांश बुराइयों की जड़ निजी संपत्ति है. इस संपत्ति को शोषण व भ्रष्टाचार के जरिये जुटाया जाता है, जिसकी सुरक्षा के लिए शासन की जरूरत पड़ती है. यानी निजी संपत्ति के ही कारण समाज में शासन की जरूरत पड़ती है.
एक लंबे अरसे तक भगत सिंह को आतंकी की नजर से देखा जाता रहा, जिसको भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ विचार-विमर्श करते हुए कहा कि मैं आतंकी नहीं हूं. आंतकी वे होते हैं, जिनके पास समस्या के समाधान की क्रांतिकारी चेतना नहीं होती. क्रांतिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति ही आतंकवाद है, पर क्रांतिकारी चेतना को हिंसा से कतई नहीं जोड़ा जाना चाहिए, हिंसा का प्रयोग विशेष परिस्थिति में ही करना जायज है, वरना किसी जन आंदोलन का मुख्य हथियार अहिंसा ही होनी चाहिए. हिंसा-अहिंसा से किसी व्यक्ति को आतंकी नही माना जा सकता. हमें उसकी नीयत को पहचानना होगा, क्योंकि यदि रावण का सीताहरण आतंक था तो क्या राम का रावण वध भी आतंक माना जाये? अपने अल्पकालिक जीवन के दौरान भगत सिंह ने कई विषयों पर लिखा, पढ़ा व सोचा समझा, और यह कहते गये कि-
हवा में रहेगी, मेरे ख्याल की बिजली.
ये मुस्ते खाक है फानी रहे, रहे न रहे...

Saturday, September 1, 2007

कटरा बी आर्ज़ू और आज का लोकतंत्र

टरा बी आर्ज़ू जब पहली बार मैंने पढ़ना शुरू किया था तो यह मुझे साधारण से मुहल्ले की कहानी लगी थी-जैसा हर मुहल्ला होता है. राही साहब की पाठकों से सीधे एक रिश्ता बना लेने और अपने पाठ के बारे में एक विश्वसनीयता कायम कर लेने की खासियत के चलते मुझे उनके उपन्यास बेहद प्रिय रहे. इस उपन्यास के साथ भी यही हुआ. जैसे ही थोडा़ आगे बढे़, पाया कि हम एक कुचक्र के गवाह बनने जा रहे हैं-जो हमारे सामने कई दशकों से रचा जा रहा है. अंततः वह कुचक्र इमरजेंसी के रूप में हमारे सामने आया.

कटरा बी आर्ज़ू शायद पहला हिंदी उपन्यास है जो देश की संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र के बारे में भ्रमों को इतनी स्पष्टता से दूर करता है. अब भी अनेक लोग मिल जायेंगे, जो यह विश्वास करते हैं कि संसद के होते हुए, न्यायपालिका के होते हुए और फिर मीडिया के होते हुए हम पर फ़ासिज़्म थोपा नहीं जा सकता. मगर इमरजेंसी और कुछ नहीं थी सिवाय फ़ासिज़्म के. उन काले दिनों के बारे में बहुत कुछ कहा-लिखा जा चुका है. आपातकाल संसद के ज़रिये ही लगाया गया था. और तब न तो मीडिया और न न्यायपालिका की कुछ खास कर पाये थे.
आज भी वैसे ही हालात हैं. बल्कि उससे बदतर. और अब तो आपातकाल की भी कोई ज़रूरत नहीं रही. संसद चलती रहती है, अदालतों में रोज़ इजलास बैठती है, अखबार हैं, चैनल हैं और गुज़रात में हज़ारों अल्पसंख्यकों को कत्लेआम से नहीं बचाया जा सका, आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से खदेडा़ जा रहा है और कोई उनकी नहीं सुनता, नर्मदा घाटी के हज़ारों परिवारों को उनके घरों से खदे़ड़ दिया गया है, उनके लिए पुनर्वास की कोई व्यवस्था किये बगैर उनके घर डुबा दिये गये हैं. विरोधियों के लिए जेलें और पुलिस की गोलियां हैं, दमन के तमाम उपाय हैं. क्या आपतकाल में इससे अलग कुछ होता है?
और ऐसे में याद आता है ज़र्मनी का अतीत. हिटलर भी संसद के ज़रिये ही सत्ता में आया था. तो संसद ऐसी चीज़ नहीं है कि उससे आश्वस्त हुआ जाये, और अदालतें, और मीडिया...

और ऐसे में राही मासूम रज़ा के कटरा बी आर्ज़ू की याद आती है... जो हमें बताता है कि सपने कैसे कुचल दिये जाते हैं, और लोगों के मुंह से रोटियां कैसे छीन ली जाती हैं, और यह कि एक जनविरोधी व्यवस्था कभी लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहक नहीं हो सकती, भले ही वह लोकतंत्र के स्थूल उपादानों जैसे संसद, संविधान आदि को बने रहने दे. राही का यह उपन्यास इमरजेंसी के बहाने देश को मिली आज़ादी के छद्म को भी उजागर करता है.

Sunday, August 12, 2007

कौन बनाता है आतंकवादी ?

शाहनवाज़ आलम
शाहनवाज़ का यह लेख बजार के शुरूआती दौर मे पोस्ट किया गया थामुम्बई दंगो को ध्यान मे रखते हुए यह आज और ज्यादा प्रासंगिक हो गया हैइसलिये इसे फिर से प्रकाशित कर रहा हू क्योंकि जिन्होंने इसे नही पढा था और जिन्होंने पढा था , उनके लिए ये एक अच्छा मुद्दा साबित हो सकता है

न्यायालय द्वारा किसी जघन्य अपराधी को सज़ा सुनाए जाने के बाद उसकी कही गयी बातों को अमूमन नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है . आमतौर पर एसे मे अपराधी भी ख़ुद को बेक़सूर ही कहता है लेकिन 1993 के मुंब्ई बम धमाकों के एक प्रमुख आरोपी अब्दुल ग़नी तुर्क ने अपना जुर्म और सज़ा दोनो क़बूल करते हुए विशेष टाडा न्यायालय के सामने जो बाते कही उसे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता मे आस्था रखने वाला कोई भी आदमी नज़रअंदाज़ नही कर सकता . तुर्क , जिसके द्वारा रखे गए बमों से उन धमाको मे मारे गाये कुल 273 लोगों मे से 113 लोग हताहत हुए थे , ने सज़ा सुनने के बाद कहा कि वो क़ानून व्यवस्था मे आस्था रखने वाला व्यक्ति था और गुज़र बसर के लिए टैक्सी चलाता था . लेकिन 1992 के बाबरी ध्वंस और उसके बाद हुए दंगो मे मारे गए उसके समुदाय के लोगो तथा सांप्रदायिक पुलिस द्वारा क़ी गयी ज़्यादतियों के कारण वह बहुत हताश और क्रोधित था . उसने अपना जुर्म स्वीकार करते हुए कहा क़ी अगर क़ानून उसे सज़ा देता है तो श्री कृष्ण आयोग द्वारा दंगो मे दोषी पाए गाये लोगों को भी सज़ा मिलनी चाहिए . तुर्क क़ी इन बातों को नज़रअंदाज़ करना इसलिए ख़तरनाक है क्योकि ये हमारे पूरे तंत्र और उसकी खोखली धर्मनिरपेक्षता पर सवालिया निशान खड़ा करती है तो वही इसकी पृष्टभूमि मे एक बिना किसी अपराधिक रिकॉर्ड वाले साधारण नागरिक के एक ख़तरनाक आतंकवादी बनने क़ी पूरी प्रक्रिया को भी दर्शाती है . जिसके केंद्र मे अपने देश मे किसी इस्लामी सत्ता क़ी स्थापना या शरिया क़ानून लागू करवाने जैसी जेहादी मंशा नही बल्कि न्याय न मिल पाने के कारण उपजी मायूसी है. बहरहाल , बात करते हैं उस श्री कृष्ण आयोग की जिसे दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के मुंब्ई दंगो तथा बम विस्फोटों की जाँच के लिए नियुक्त किया गया था . जिससे इन हादसों मे मारे गये लोगों के परिजन ने न्याय मिलने की उम्मीद की थी और जिसके पूरे न होने के कारण तुर्क जैसे कई और आतंकवाद के रास्ते पर भटकने के लिए मजबूर हुए. 6 दिसंबर,1992 को बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद मुंब्ई में भड़के सांप्रदायिक दंगो में, जिनमे सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ 900 लोग मारे गये थे, जिनमे 575 मुस्लिम ,275 हिंदू और 45 अज्ञात धर्म (ये वो लोग थे जिनकी लाशों के कमर के निचले हिस्से ग़ायब थे या सड़ चुके थे जिसके कारण हमारी धर्मनिरपेक्ष पुलिस उनके धर्मों का पता नही लगा पाई) व 5 अन्य धर्मों के लोग थे . इसकी जाँच के लिए तत्कालीन नरसिंहा राव सरकार ने 25 जनवरी 1993 को एक आयोग नियुक्त किया, जिसके कार्य क्षेत्र मे मुंब्ई बम धमाकों को भी बाद मे जोड़ दिया गया . आयोग ने 16 फ़रवरी 1998 को महाराष्ट्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी . श्री कृष्ण आयोग की ये रिपोर्ट आज तक दंगो पर नियुक्त किए गये तमाम आयोगों की अपेक्षा ज़्यादा गंभीर और तटस्थ थी , विश्लेसन मे भी और सुझावों मे भी . उसकी गंभीरता का अंदाज़ सिर्फ़ इससे लग जाता है की विभिन्न राजनैतिक व धार्मिक संगठनों की बातें तो सुनी ही गयीं , मुंब्ई के टाटा इन्चिट्युट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के विशेषज्ञों की एक समिति भी दंगो के पीछे के सामाजिक व आर्थिक कारणो की जाँच के लिए नियुक्त की । तो वंही पुलिस व्यवस्था का, जिसका सांप्रदायिक रुझान इन दंगो मे खुलकर दिखा पर अध्ययन करने की ज़िम्मेदारी सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महासंचालक के.एफ़.रुसतमज़ी व महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक डी.रामचनद्रन को सौंपी . ज़ाहिर था कि ऐसी गंभीर जाँच से मुख्यधारा कि तमाम पार्टियों का चरित्र खुलकर जनता के सामने आ जाता . इसलिए इस आयोग के गठन के समय से ही इसे कई तरह से बाधित करने कि कोशिश सरकारें करने लगी नरसिंहा राव कि कांग्रेस सरकार,जिस पर न्यायमूर्ति श्री कृष्ण आयोग ने रिपोर्ट मे कई जगह तल्ख़ टिप्पड़ी की है , ने 23 जनवरी 1996 को इस जाँच मे अधिक समय लग जाने का बहाना बनाकर आयोग को समेट दिया . सरकार कि ओर से यह तर्क दिया गया कि आयोग की रिपोर्ट के कारण दंगो के पुराने ज़ख़्म हरे हो जाएँगे . आम जनता मे इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया हुई . कई संगठन इस निर्णय के विरुढ़ अदालत मे भी गाये . अंत मे जन दबाव के कारण इन दंगो मे प्रमुख भूमिका निभाने वाली भाजपा की 13 दिनो वाली सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को 28 मई 1996 को आयोग कि पुनर्स्थापना करनी पड़ी . लेकिन जैसे जैसे आयोग अपने निष्कर्षों कि ओर बड़ रहा था , वैसे वैसे इसे लेकर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों मे खलबली मचने लगी . हद तो तब हो गयी , जब बिना रिपोर्ट पढ़े ही शिवसेना - भाजपा गठबंधन सरकार ने इसे हिंदू विरोधी और मुस्लिम समर्थक घोषित करते हुए मानने से इनकार कर दिया . विपक्षी कॉंग्रेस भी रस्म अदायगी मे थोड़ा ही हो हल्ला मचाकर शांत हो गयी . आख़िर क्या था इस रिपोर्ट मे कि पक्ष-विपक्ष ने अपने तमाम दलगत विभेदों को मिटाकार इस रिपोर्ट को दबा जाने कि साझा कोशिशें की और अंततः इसमे वे सफल भी हुए . 700 पृष्ठों तथा दो हिस्सों मे विभाजित श्री कृष्ण आयोग कि रिपोर्ट ने 1992-93 के दंगो के लिए मुख्य रूप से शिवसेना-भाजपा को ज़िम्मेदार माना है . रिपोर्ट के पहले खंड के पृष्ठ 21 पर ठाकरे का उल्लेख किया है कि "8 जनवरी,1993 से शिवसेना और शिव सैनिकों ने मुसलमानों के जान माल पर संगठित हमले किए . एक शक्तिशाली सेनापति की तरह इन हमलों का नेतृत्व शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने किया. उनके मार्गदर्शन मे शाखा प्रमुखों से लेकर शिवसेना नेताओं तक , सभी ने दंगो मे भाग लिया." इसी तरह इस दंगो के समय शासन कर रही सुधाकर राव नाइक की कॉंग्रेस सरकार की दंगो को रोकने मे अक्षमता तथा पार्टी के अंदर इस मुद्दे पर नेताओं द्वारा एक दूसरे से पुराना हिसाब चुकाने की अवसरवादिता को भी रिपोर्ट ने बेनक़ाब किया है . श्री कृष्ण आयोग कि रिपोर्ट के दूसरे खंड के पेज 161 पर सुधाकर राव नाइक का बयान दर्ज है तो पेज 164 व 167 पर शरद पवार की गवाही है . ये दोनो बयान काफ़ी मुखर हैं . नाइक ने अपनी गवाही मे, शरद पवार जो उस समय केंद्र मे रक्षा मंत्री थे , पर दंगो को नियंत्रित करने मे सहयोग नही करने का आरोप लगाया है तो वंही शरद पवार ने अपने बयान मे नाइक के आरोपों का खंडन का उनके उपर ही अक्षमता का आरोप लगाया है . इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि कॉंग्रेसियों ने अपनी दलगत प्रतिस्पर्धा के लिए इस महत्वपूर्ण जाँच आयोग का उपयोग किस तरह किया . आयोग के समक्ष " दंगों को नियंत्रित करने के लिए सेना क्यू नही बुलाई गयी ? " के जवाब मे सुधाकर राव द्वारा दिया गया बयान हमारे तंत्र के संचालन कि ज़िम्मेदारी संभालने वाले लोगो कि योग्यता व क्षमता का भंडाफोड़ करता है न्यायमूर्ति ने पेज 164 पर दर्ज किया है कि " सेना की टुकड़ी को आदेश कौन देगा , इस बारे मे मुख्यमंत्री अनभिग्य थे ." दंगो के समय सुधाकर राव नाइक से वरिष्ठ नागरिकों के एक शिष्ट मंडल ने मुलाक़ात की और पुलिस पर मुसलमानों के विरुढ़ पक्षपातपूर्ण रवैये की शिकायत की तथा शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को गिरफ़्तार करने की माँग की . लेकिन सरकार ने न तो पुलिस को फटकारा और ना ही ठाकरे या शिवसैनिकों पर कोई कार्यवाही करने का निर्णय लिया . जिसका कारण उन्होने आयोग के समक्ष " राजनीतिक" बताया . इन दंगों मे पुलिस की संदिग्ध भूमिका की जाँच पर आयोग ने अपनी रिपोर्ट का बड़ा हिस्सा ख़र्च किया और पाया की पुलिस की सांप्रदायिक मनोवृत्ति के कारण ही दंगो को नियंत्रित नही किया जा सका . तत्कालीन अपर पुलिस आयुक्त वी एन देशमुख की इस बात को आयोग ने स्वीकार किया है की " मुसलमानों के विरुद्द पुलिस वालों के मान मे एक गाँठ थी जो उनके व्यवहार मे दिखी " (पेज 12) पुलिस ने इन दंगो में कैसी भूमिका निभाई इसकी कुछ बानगी रिपोर्ट मे देखी जा सकती है " 9 जन वरी को माहिम मे रात 9 बजे शिवसेना नगर सेवक मिलिंद वैद्य के नेतृत्व मे हिंदुओं ने मुस्लिम बस्ती पर हमला किया . पुलिस हवलदार संजय गावदे भी हाथ मे तलवार लेकर इस हमले मे शामिल हो गाये " (पेज 14) तुर्क द्वारा न्यायलय में कही गयी बातों पर तो आयोग जैसे मुहर लगाता है . दंगो और बम विस्फोटों के परस्पर संबंधों को स्वीकार करते हुए आयोग कहता है की " बाबरी मस्जिद के ढहने और दिसंबर 1992 , जन वरी 1993 मे हुए दंगो का कारण मुंबई मे सांप्रदायिक फूट पड़ गयी , जिसके कारण मुसलमानों के मान मे असुरक्षा और क्रोध की भावना उपजी . राज्य सरकार और पुलिस उनकी निगाह मे दोषी थी . इन दोनो ने उनके हितों की रक्षा करने के बदले सांप्रदायिक दंगों का नेतृत्व करने वाले लोगों से हाथ मिलाया , ऐसा मुस्लिमों को पक्का विश्वास था . इन मुस्लिमों का उपयोग राष्ट्र विरोधी शक्तियों द्वारा किया गया . पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई एस आई की मदद से उन लोगों ने क्रोधित मुस्लिमों को भड़का कर प्रतिशोध के लिए प्रेरित किया . दुबई के कुख्यात तस्कर दाउद इब्राहिम की मदद से एक बड़ा षडयंत्र रचा गया , जिसके अनुसार हिंदू बाहुल्य क्षेत्रों मे बम विस्फोट किए गये . जिनके लिए दंगों मे सताए गये मुस्लिम युवकों का इस्तेमाल किया गया . (प्रथम खंड , पेज 43 ) श्री कृष्ण आयोग के इन तथ्यों के आलोक मे देखा जाए तो स्पष्ट है की कुछ लोगों को कठोर से कठोर सज़ा देने पर भी आतंकवाद की समस्या हल नही होनी है . उल्टे अपने समुदाय मे तुर्क जैसे लोगों की छवि एक " शहीद " की ही बनेगी , जिसने न्याय न मिलने के कारण आतंक का रास्ता अपनाया . दरअसल हमारे देश के "मुस्लिम आतंकवाद" का किसी वैश्विक जेहादी मिशन से उतना संबंध नही है जितना कि हमारी अंदरूनी राजनीति से . जिसके केंद्र मे अपने ही देश मे न्याय न मिलने के कारण उपजी उपेक्षा बोध और आक्रोश है . लेकिन "सांप्रदायिक इंजीनियरिंग " पर ही पल बढ़ रही राजनीतिक पार्टियाँ इन उपेक्षितों के न्याय के दायरे मे लाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगी , इसकी उम्मीद भी किसे है ?

Tuesday, July 31, 2007

ग्लोबल होती दुनिया में प्रेमचंद का यथार्थ

आज जब हम प्रेमचंद को याद करते हैं तो हमें यह भी याद करना चाहिए कि उन्होंने हमें किन हथियारों से लैस किया. जब देश को गांधी का आंदोलन एक अंधेरी गुफ़ा में ले जा रहा था, जहां समझौतों और दलालियों का एक अंतहीन सिलसिला था और जब लुटेरों की एक फ़ौज बन रही थी, प्रेमचंद ने समय रहते अपनी रचनाओं से हमें उनके प्रति सचेत किया. आज के दौर में भी हम उन हथियारों की ज़रूरत शिद्दत से महसूस करते हैं. कथाकार शैवाल का आलेख.

ग्लोबल होती दुनिया में प्रेमचंद का यथार्थ

शैवाल
सृजन में व्याख्या सन्निहित नहीं होती. सृजन मनुष्य और समुदाय के बीच का सेतुबंध है. रचना पाठ के जरिये हम तक पहुंचती है. हर काल में उसके पाठ से अलग अर्थ की प्राप्ति होती है. समाज काल और रचना-तीनों के अंतर्संबंध हैं. इसी कारण ग्लोबल विलेज में प्रेमचंद की रचनाओं का पुनर्पाठ आवश्यक है. उसकी अलग उपादेयता दिखेगी. उपादेयता इस संदर्भ में कि मनुष्य और समुदाय का अस्तित्व कैसे बचे आखिर.
मैं एक कथा कहना चाहूंगा. तब शायद यह प्रसंग ज्यादा खुले. क्योंकि हम बेहद नाजुक दौर से गुजर रहे है. यह ऐसा पड़ाव है, जहां एक व्यक्ति जीवित बचता है तो समुदाय का दूसरा हिस्सा मर जाता है. यहां सपने बचते हैं तो आदमी की कीमत मर जाती है. परंपरा और नैतिक मूल्यों के शवदाह केंद्र में अपने सपने को फलता-फूलता देख कर हम खुश नहीं हो सकते. होते हैं तो हम कब्रिस्तान के उस मुलाजिम की तरह हैं जो मुर्दों की आमद पर खुश होता है. हम आदमी की तरह बच पायें, ऐसे कातिल दौर में, तो समझें-जिंदगी जीने का यह तरीका ही कला है. कला वाकई समुदायजीवी जीवन जीने की पद्धति है. पर हम मानते नहीं. हम तो मानते हैं कि कला बैठे-ठाले लोगों का कार्य व्यापार है. जो कार्य व्यापार बाजार में बिकता नहीं या बिकने को तैयार नहीं होता, वह सब कुछ भद्रजनों की दृष्टि में कला है. तंत्र भद्रजनों के इशारे पर चलता है. तो होता या? कला हाशिये पर चली गयी या डाल दी गयी. यह अलग-सा सवाल है कि कला को हाशिये पर डाल कर या समुदाय बोध से अलग होकर अपने वजूद को हम बचा सकते हैं. आज के विध्वंसक दौर का यह सब से बड़ा प्रश्न है. निश्चय ही यह भूमंडलीकरण की पैदाईश है.

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कथा कहता हूं. रेड इंडियन लोगों की बस्ती थी एक. वहां के निवासी खाली वक्त में छोटी-छोटी टोकरियां बनाते थे, उन्हें रंगते थे. टोकरी खूबसूरत हो जाती थी. एक चॉकलेट कंपनी के अधिकारी ने वहां की टोकरियां देखीं. उसके मन ने कहा-इन टोकरियों में चॉकलेट रख कर बेचा जाये तो बिक्री बढ़ जायेगी. उसकी दृष्टि में बाजार की मांग थी. वह बस्ती में पहुंचा. वहां के बुजुर्ग से मिला. पूछा- एक टोकरी का दाम कितना लोगे?
बुजुर्ग ने कहा- दो रुपये. अधिकारी चला गया. पर एक सप्ताह बाद फिर आया. पूछा- 10 टोकरियां चाहिए, दाम क्या होगा? बुजुर्ग ने बताया, अरे वही दो रुपये. अधिकारी चला गया. दो दिन बाद फिर आया. पूछा- मुझे 10 हजार टोकरियां चाहिए. अब दाम तय करो. बुजुर्ग चिंता में पड़ गया. बोला- सोचना होगा. तुम एक सप्ताह बाद आओ. अधिकारी नियत वक्त पर आया. बुजुर्ग ने छूटते ही कहा- बात-विचार कर लिया बस्ती के लोगों से. एक टोकरी का दाम 10 रुपये होगा.
अधिकारी अवाक रह गया. खीझ कर बोला- पागल हुए हो. दाम बढ़ा रहे हो. मांग बढ़ने पर दाम घटना चाहिए, बाजार का नियम है. बुजुर्ग ने कहा, पागल तो तुम बना रहे हो हमें. हमें 10 हजार टोकरियां बनाने के लिए अपनी खेती-बारी सब को छोड़ना होगा. तो इसका दाम कहां जुड़ेगा?
आज के दौर में जब लाखों किसान आत्महत्या कर रहे हैं, केंद्र सरकार की नीतियां गांव को दरकिनार कर रही हैं, सेज ग्राम के निवासी निरंतर विद्रोह कर रहे हैं, हमें प्रेमचंद इस रेड इंडियन समुदाय के वृद्ध सदस्य की तरह दिखते हैं. इनकी रचनाओं में वर्णित समुदाय के संकेतवत निर्णय प्रभावी दिखते हैं. उनमें भारतीय ग्रामीण समाज की दस्तावेजी पहचान सन्निहित है. उस पहचान के आधार पर हमें अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी, चाहे वह नीतियों की प्राथमिकता हो या सामाजिक व्यवहार की या आर्थिक मसलों की. वस्तुत: यथार्थ से बहुत आगे तक का रास्ता तय करता है इन रचनाओं का यथार्थ. सच्चाई यही है कि जब आप यथार्थ को पाते हैं, एक निजी संदर्भ से गुजरते हैं और यथार्थ का स्वरूप इसीलिए संकुल होता है. लेकिन जब आप यथार्थ को देने की प्रक्रिया में होते हैं, लोक आपकी निजता में समाहित होता है और इसी कारण रचना यथार्थ से बड़ी हो जाती है. और उसकी संघर्ष यात्रा आगे के दिनों में भी जारी रह पाती है क्योंकि आदमी, उसके जीवन और जीवन संघर्ष के बीच पैदा हुई एक संपूर्ण रचना- पुन: लोक जीवन और लोक संघर्ष में समाहित हो जाती है. प्रेमचंद की रचनाएं इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं.
पर इन रचनाओं का ग्लोबल प्रक्षेपण हम नहीं कर पा रहे हैं. क्यों? प्रेमचंद जयंती पर यह सवाल अपने आप से करना वाजिब होगा. हैरी पॉटर की एक करोड़ प्रतियां एक दिन में बिकती हैं. नौ सौ रुपये की किताब की प्रतियों की अग्रिम बुकिंग होती है. इसमें सिर्फ जादुई कारनामे हैं. तो क्या विशुद्ध अयथार्थ और बाजार के करिश्मे के आगे सामाजिक यथार्थ हार रहा है? क्यों हमारे बच्चे पांच-दस रुपयेवाले पंचफूल को खरीद कर पढ़ने को आतुर नहीं दिखते.
जवाब न्यूयार्क के विश्व हिंदी सम्मेलन में मिल जाता है. चीन के हिंदी विद्वान छियांग छिंग कुई यह स्वीकारते हैं कि हिंदी बहुत पहले अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी है, लेकिन विडंबना यह है कि भारत में हिंदी को लेकर वह आग्रह नहीं है जो होना चाहिए. हम छाती ठोंक कर कभी यह नहीं कहते कि प्रेमचंद हिंदी के पर्याय हैं. हम गर्व के साथ विदेशी भाषा-भाषियों के सम्मुख यह नहीं कह पाते कि तुम्हारे पास पूंजी है, बाजार है, सुविधाएं हैं, सुख है पर हमारे पास प्रेमचंद हैं.

पेंटिंग : वीर मुंशी

Tuesday, July 17, 2007

मेले और झमेले के बीच फंसी हिंदी

क्या हमारी भाषा साहित्य के बजाय सत्ता की मुखापेक्षी है ?
मंगलेश डबराल
न्यूयार्क मे आठवा विश्व हिंदी सम्मेलन कुछ ठोस या नया किये बग़ैर लगभग घटनाहीन तरीके से सम्पन्न हो
गया। इस आयोजन के सिलसिले मे असमंजस ,अफरातफरी और खींचतान का जो माहौल था ,उसे देखते हुए यह उम्मीद भी नही थी कि आठवें सम्मेलन मे ऐसा कोई काम होगा जो पिछले सात सम्मेलनों से अलग , नया और स्मरणीय हो। सम्मेलन के अंत मे रखे गए प्रस्तावों मे भी कोई नया मुद्दा नही उभरा। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प भी शायद आठवीं बार दोहराया गया होगा और जहाँ तक नागरी लिपि का एक सर्वमान्य-सर्वसुलभ यूनीकोड बनाने की बात है , तो यह जरूरी माँग लंबे समय से उठाई जाती रही है। लेकिन हिंदी फाँट के मानकीकरण मे किसी हिंदी सेवी संस्था की वास्तविक रूचि ना होने के कारन इस भाषा मे तरह तरह के फाँट चल रहे हैं और एक दूसरे के लिए पेचीदगियाँ पैदा कर रहे हैं। कुल मिलाकर इस सम्मेलन की उपलब्धि यह थी कि उदघाटन के मौक़े पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने एक मिनट हिंदी मे भाषण करके वहाँ एकत्र लोगों को 'चमत्कृत' और 'गदगद' कर दिया। उन्होने 'नमस्ते' किया, हालचाल पूछे और कहा कि 'मैंने दिल्ली दूतावास मे रहते हुए हिंदी सीखी है,पर यह मुझे अच्छी तरह से नही आती' और 'मेरा दामाद हिंदी जानता है' । यह महासचिव का शिष्टाचरण था ,जिसका सिर्फ एक प्रतीकात्मक महत्त्व है। कई वर्ष पहले अटलबिहारी वाजपेयी ने भी संयुक्त राष्ट्र मे अचानक हिंदी मे अनुप्रास-अलंकारमय भाषण करके ऎसी ही प्रतीकात्मकता का परिचय दिया था,जिसकी चर्चा कट्टर हिंदी-हिंदूवादी आज भी किया करते हैं। हमारे प्राण ऐसे ही प्रतीकों मे बसते हैं और असली मुद्दे अपनी जगह ठहरे , अनसुलझे या सड़ते-गलते रहते हैं।

शायद ऎसी ही प्रतीकात्मकता की आलोचना मे प्रसिद्ध कवि और समाज चिन्तक रघुवीर सहाय ने अपनी एक कविता मे कहा था : 'भारत मे हर संकट एक गाय है / रास्ते मे गोबर कर देता है विचार।' विश्व मे हिंदी भाषा -भाषियों की संख्या ७० से ८० करोड़ के बीच बताई जाती है। हालांकि वास्तविकता मे उसे पढने लिखने और बोलने वाले ४५ करोड़ से अधिक नही हैं। इसी तरह विश्व हिंदी सम्मेलन के समय यह कहा जाता है कि हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने के रास्ते मे एक कदम और बढ़ा चुकी है। हालांकि वास्तविकता यह है कि उसने ऐसा कोई कदम आगे नही बढाया है, क्योंकि किसी भाषा के संयुक्त राष्ट्र मे शामिल होने की प्रक्रिया बिल्कुल अलग है,जिसके लिए सदस्य देशों को काफी धन देना पड़ता है और उसके सचिवालय की तामझाम जुटाना पड़ता है। न्यूयार्क मे अगर साल के ३६५ दिन भी विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किये जाये , तब भी यह काम नही हो सकता क्योंकि इसे सिर्फ भारत सरकार कर सकती है।

विश्व हिंदी सम्मेलन के क्षेत्र पर अब तक ऎसी शक्तियों का वर्चस्व रहा है , जो हिंदीवाद को हिंदूवाद का ही विस्तार मानती हैं और हिंदी के वैश्विक मंचों पर अपने अधिकार को जन्मजात समझती हैं। यही वजह है कि पिछले सातों सम्मेलनों को एक अर्ध धार्मिक और अर्ध राजनितिक कथ्य के साथ आयोजित किया गया। लंदन मे हुए छठे सम्मेलन के बारे मे यह सुना गया कि वहाँ आमंत्रित लेखको को लक्ष्मीनारायण मंदिर की परिक्रमा के लिए भी ले जाया गया और सूरीनाम मे हुए सातवे सम्मेलन मे कमलेश्वर जैसे वरिष्ठ और सम्मानित लेखकों को काफी अपमानजनक परिस्थिति मे रहना पड़ा था। इन सम्मेलनों के केंद्र मे ऎसी हिंदी रही है, जो साहित्य के बजाय सत्ता-राजनीति की मुखापेक्षी है, देश की दूसरी भाषाओं पर सरकार के माध्यम से अपना वर्चस्व कायम करना चाहती है या जिसे सुखी सम्पन्न अंग्रेजी की छोटी और कुछ गरीब बहन बनकर रहना स्वीकार है। इस हिंदी की अंतर्वस्तु प्रगतिशील होना तो दूर , आधुनिक सेकुलर और लोकतांत्रिक भी नही है , क्योंकि वह भक्तिकाल के सगुण और निर्गुण नाम के दो पैरों पर खडी नागरी प्रचारिणी सभा छाप हिंदी है , जो भारतेंदु युग और छायावाद से आगे के साहित्य को साहित्य नही मानती। हिंदूवादी हिंदी शक्तियों के अतिरिक्त विश्व हिंदी मंचो पर सरकारी हिंदी तंत्र की भी ताक़तवर उपलब्धि है , जिसके पास राजभाषा नाम का अस्त्र है। इस बार के सम्मेलन मे सम्मानित किये गए हिंदी 'विद्वानो' की सूची से सरकार के हिंदी ज्ञान को समझा जा सकता है। सम्मान पाने वाले १७ लोगो मे से सिर्फ चार-पांच व्यक्ति ऐसे हैं , जिनके हिंदी भाषा और साहित्य मे कुछ योगदान से लोग परिचित है , शेष 'विद्वान ' राजनितिक कारणों से ही सम्मानित किये जाते हैं । हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकारों की एक लंबी सूची तैयार की जा सकती है जिन्हे किसी विश्व हिंदी सम्मेलन मे सम्मानित नही किया गया। इस बार के सम्मानीय लोगों मे सबसे प्रमुख केदारनाथ सिंह थे , लेकिन वह विदेश मंत्रालय के व्यवहार से इतने आहत हुए कि उन्होने न जाना ही उचित समझा। पिछले दो सम्मेलनों के कुछ साम्प्रदायिक स्वरूप से जो लेखक क्षुब्ध थे , इस बार उन्हें अपेक्षा थी कि कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार इसे एक सेकुलर और लोकतांत्रिक हिंदी का मंच बनाएगी , लेकिन उन्हें भी निराश होना पड़ा। अब तक के सभी विश्व हिंदी सम्मेलनों मे साहित्य और साहित्यकार सबसे अधिक उपेक्षित रहे हैं , जबकि साहित्य ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जिस पर हिंदी कुछ गर्व कर सकती है। ज्ञान के दूसरे क्षेत्रों मे हिंदी की दरअसल कोई उपलब्धि नही है। उसमे दर्शन , विज्ञानं , समाजशास्त्र , पर्यावरण , इतिहास संबंधी मौलिक और गम्भीर लेखन बहुत कम हुआ है , इसलिये उसकी सारी बौद्धिक संपदा साहित्यिक ही है । लेकिन विचित्र यह है कि हिंदी लेखक की भूमिका विश्व मंचो पर नगण्य ही रहती है। क्या इसका कारण यह है कि ऐसे मंचो की बागडोर जिन नई पुरानी संस्थाओं के हाथ मे है , उनके लिए हिंदी संघर्ष की नही , सत्ता और ताकत की भाषा है ? विश्व विजय की थोथी आकांक्षा रखने वाले हिंदी के इस स्वरूप पर कवि रघुवीर सहाय करीब २५ वर्ष पहले ही गम्भीर हताशा व्यक्त कर चुके थे। 'लोग भूल गए हैं' शीर्षक की कविता मे उन्होने कहा था ,
हिंदी का प्रश्न अब हिंदी का प्रश्न नही रह गया है / हम हार चुके हैं...../ हिंदी के मलिक जो हैं गुलाम हैं / उनके गुलाम हैं जो वे आजाद नही / हिंदी है मलिक की/ तब आज़ादी के लिए लड़ने की भाषा फिर क्या होगी/ हिंदी की माँग/ अब दलालों की अपने दास मालिकों से/ एक माँग है/ बेहतर बर्ताव की/ अधिकार की नही.....

रघुवीर सहाय की यह कविता विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे सैर सपाटों और विजयी भावों पर एल स्थाई टिपण्णी की तरह पढी जा सकती है।

साभार: अमर उजाला