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Wednesday, April 18, 2018

सिंधु घाटी की सभ्यता और नौ सौ साल लंबा सूखा

लेह-लद्दाख की त्सो-मोरीरी झील में पांच हजार साल पुरानी मिट्टी की तहों के जरिये मॉनसून पैटर्न्स का अध्ययन करने के बाद आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने सिंधु घाटी सभ्यता के खत्म होने का विचित्र कारण बताया है। उनका कहना है कि लगभग 4350 साल पहले सिंधु घाटी में नौ सौ साल लंबा सूखा पड़ा था।
ताज्जुब की बात है कि नौ सौ तो क्या, सौ-पचास साल लंबे सूखे का भी कोई जिक्र हमें किसी वेद-पुराण में नहीं मिलता। लेह-लद्दाख की झील में मौजूद मॉनसून के निशान बताते हैं कि इतनी लंबी अवधि तक उत्तर-पश्चिम हिमालय में बारिश न के बराबर हुई और इसके चलते पंजाब की जो नदियां पानी से भरी रहती थीं, वे सब सूख गईं। सिंधु घाटी की सभ्यता कभी इन्हीं नदियों से गुलजार रही होगी।
मॉनसून की इस स्थायी बेरुखी के चलते सिंधु घाटी में बसे लोग पूरब की गंगा घाटी में और दक्षिण दिशा की ओर चले गए। आईआईटी खड़गपुर के भूविज्ञान और भूभौतिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने पाया कि नौ सौ साल लंबा यह सूखा लगभग 2,350 ईसा पूर्व से शुरू होकर 1,450 ईसा पूर्व तक चला।
दुख की इतनी लंबी अवधि की कोई थाह व्यास और वाल्मीकि जैसे हमारे महाकवि भी नहीं लगा पाए, जिनकी लिखाई भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में समादृत है। बताया जाता है कि महाभारत में जिस समय का जिक्र है, वह 3100 से 1200 ईसा पूर्व का है, पर इतने असहनीय सूखे का कोई जिक्र महाभारत में भी नहीं मिलता है। 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक अस्तित्व में रहे वैदिक काल की किसी ऋचा में भी इसकी कोई भनक नहीं मिलती है।
वैज्ञानिकों की यह रिसर्च बीसवीं सदी में पेश की गई उस धारणा को भी सीधी चुनौती देती है कि 3300 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक चली सिंधु सभ्यता का पराभव किसी दो सौ साल लंबे सूखे से हुआ था। जाहिर है, आईआईटी खड़गपुर के इस शोध को कड़ी कसौटियों पर परखा जाएगा। मसलन, यह सवाल भी उठेगा कि इतने लंबे सूखे के निशान दक्षिण-पश्चिम एशिया के बाकी भूगोल में क्यों नहीं दर्ज किए जा सके? एक बात तो तय है कि इतिहास की नवीनतम खोजें भूविज्ञान, भूभौतिकी, जेनेटिक्स और कंप्यूटर मॉडलिंग के दायरों से आ रही हैं। भारत जैसे इतिहासग्रस्त समाज में इन खोजों को ज्यादा तवज्जो मिलनी चाहिए।

Thursday, March 15, 2018

सृष्टि से बाहर कुछ नहीं, स्रष्टा कैसे होगा?

क्या स्टीफन हॉकिंग (जन्म 8 जनवरी 1942, मृत्यु 14 मार्च 2018) हमारे दौर के आइंस्टाइन थे? नहीं। अच्छा होगा कि उनके फर्क को हम उनके व्यक्तित्वों से ज्यादा उनके दौरों के बीच सीमित करके देखें। आइंस्टाइन का दौर प्रयोगों के दौरान हुए ब्रेकथ्रू को समझने के क्रम में सृष्टि को देखने का नया नजरिया विकसित करने का था, जबकि स्टीफन हॉकिंग का दौर प्रयोगों के ठहराव से उपजे भौतिकी के सबसे बड़े और लंबे कन्फ्यूजन का था। वह स्थिति पिछले कुछ वर्षों में बदलनी शुरू हो गई है।

खासकर यूरोपीय संघ के साझा प्रयासों से अभी सूक्ष्म और विराट, दोनों स्तरों के निश्चयात्मक प्रेक्षण आने शुरू हो गए हैं। जिन वैज्ञानिकों के पास इन प्रेक्षणों की व्याख्या करते हुए सृष्टि के ज्यादा गहरे नियम खोजने का दम होगा, उन्हें अगले दौर के आइंस्टाइन जैसा दर्जा हासिल होगा। लेकिन स्टीफन हॉकिंग का अपना अलग क्लास है और सैद्धांतिक भौतिकशास्त्रियों में ज्यादातर अल्बर्ट आइंस्टाइन बनने का सपना देखेंगे तो कुछेक स्टीफन हॉकिंग भी जरूर बनना चाहेंगे।


एक धारणा स्टीफन हॉकिंग को वैज्ञानिक के बजाय विज्ञान प्रचारक के रूप में देखने की भी है, जो बिल्कुल गलत है। 1966 में गणितज्ञ रॉजर पेनरोज के साथ मिलकर ब्लैक होलों पर अपने गणितीय काम की शुरुआत करने से लेकर 1990 दशक के मध्य तक स्टीफन हॉकिंग गणित और मूलभूत भौतिकी की संधि पर गंभीरतम काम में जुटे रहे। इसके बीच में उनकी ऑल-टाइम बेस्टसेलर ‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ भी आई, जिसकी कुछ धारणाओं पर वे हाल तक आगे-पीछे होते रहे। लेकिन उन्हें ब्लैक होलों को लेकर खोजे गए उनके चार नियमों के लिए जाना जाएगा, जिनके बाद में कुछ सीमावर्ती अपवाद भी उन्होंने खोजे।

उनके काम के साथ एक बहुत अच्छी और एक बहुत बुरी बात जुड़ी है। अच्छी बात यह कि ब्लैक होल ऐसी चीज है, जहां भौतिकी के दोनों मूलभूत सिद्धांत थिअरी ऑफ रिलेटिविटी (सापेक्षिकता सिद्धांत) और क्वांटम मेकेनिक्स एक ही दायरे में काम करते हैं। बाकी दुनिया के लिए पहले का रिश्ता विराट से और दूसरे का सूक्ष्म से है। बुरी बात यह कि ब्लैक होलों का सीधा प्रेक्षण लगभग असंभव है, लिहाजा उनसे जुड़े किसी सिद्धांत को सही या गलत साबित करने का कोई तरीका नहीं है। लेकिन सूक्ष्म और विराट, दोनों ही स्तरों के प्रेक्षणों की रफ्तार इक्कीसवीं सदी में इतनी तेज हो गई है कि अटकलबाजी अब ज्यादा देर टिकती नहीं।

स्टीफन हॉकिंग का दावा था कि हिग्स बोसॉन (गॉड पार्टिकल) कभी खोजा नहीं जा सकेगा। पीटर हिग्स ने कण भौतिकी के अपने मॉडल के साथ यह प्रस्थापना 1964 में दी थी, जब अपनी असाध्य बीमारी की शिनाख्त के बाद स्टीफन हॉकिंग एक गंभीर अध्येता के रूप में फंडामेंटल फिजिक्स के दायरे में घुसे ही थे। हिग्स ने 1990 के दशक में किए गए हॉकिंग के इस दावे के खिलाफ अपनी तीखी प्रतिक्रिया में कहा था कि इस वैज्ञानिक को इसके काम की तुलना में बहुत ज्यादा तवज्जो मिलती है।

बाद में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के एक प्रयोग में हिग्स बोसॉन को खोज लिया गया तो हॉकिंग की काफी किरकिरी हुई। हालांकि हॉकिंग ने इस खोज के लिए हिग्स को बधाई दी और कहा कि उन्हें तत्काल नोबेल प्राइज दिया जाना चाहिए, जो अगले साल 2013 में उन्हें मिल भी गया।


आइंस्टाइन के साथ हॉकिंग की तुलना पर वापस लौटें तो हॉकिंग आजीवन आइंस्टाइन के फील्ड इक्वेशंस को ही नई-नई शर्तों के साथ हल करते रहे, जो कि ज्यादातर भौतिकशास्त्रियों का स्थायी काम है। उनकी मान्यताओं के बीच टकराव सृष्टि के प्रारंभ बिंदु को लेकर निकाले गए निष्कर्षों को लेकर था।

आइंस्टाइन की समझ में इस मुकाम पर किसी स्रष्टा की गुंजाइश बनी रहती थी, जबकि हॉकिंग के यहां वह सिरे से खारिज हो जाती थी। हॉकिंग ने साबित किया कि जिस सिंगुलरिटी से सृष्टि का प्रारंभ होता है, उसके गणित में कोई बाहरी बिंदु होता ही नहीं। ऐसे में स्रष्टा के होने की न कोई जगह बचती है, न जरूरत।

इसके अलावा अपनी किताबों में हॉकिंग ने आइंस्टाइन की सामाजिक-राजनीतिक धारणाओं की तीखी आलोचना भी की है, जिसका बतौर वैज्ञानिक उतना ज्यादा मायने नहीं है। आइंस्टाइन जब विज्ञान से दर्शन के दायरे में निकलते थे तो वहां उनकी मुलाकात घोर धार्मिक लोगों से भी होती थी। हॉकिंग के लिए दर्शन विज्ञान के भीतर ही था और बाहर निकल कर अवैज्ञानिक सोच के साथ बिरादराना कायम करने की इच्छा उनमें कभी नहीं देखी गई।

By- Chandrabhushan

Sunday, August 12, 2012

कृष्ण जन्माष्टमी पर निकाली शोभा यात्रा



जन्‍माष्‍टमी हमारे यहां भी मनाई गई। यात्रा सात्रा निकाली गई, लोग नाचे गाए, परसाद खाके निकल लिए। फोटूगाफर फोटू ले आए औ का जनी कौन खबर लिख दिया। ओरिजनल स्क्रिप्‍ट देखिए, एका सुधारना है अभी...


श्री कृष्ण जन्माष्टमी शोभा यात्रा कमेटी द्वारा 18 वीं वासुदेव श्री कृष्ण भगवान की शोभा यात्रा यादव पंचायती धर्मशाला से शुरू हुआ। जो महानगर के दुर्ग मंदिर, कोर्ट रोड, गुरहïट्टी, गंज बाजार, कोतवाली होते हुए शिव मंदिर बाला की सराय में आकर समाप्त हो गयी।
झांकी में भगवान कृष्णा का जन्म, बासुदेव द्वारा भगवान कृष्ण को यमुना नदी पार करते हुए दिखाया गया था। इसके अलावा करन अजुर्न का युद्ध, महाकाली का अखाड़ा, राजस्थानीय डांडिया, शेष नाग पर राधा कृष्ण सवार आदि झांकियां थी।
झांकी का उद्घाटन पार्षद मंजू यादव ने फीता काट कर किया। रास्ते में झांकी का यादव युवा संघ, शिव बेड़ा समिति, नव युवक कांवड़ बेडा समिति, चित्रांश महासभा द्वारा स्वागत किया गया। शोभा यात्रा को सफल बनाने में ओम प्रकाश यादव, हेमंत यादव, ओम प्रकाश, योगेंद्र यादव, जय प्रकाश यादव, योगेश, राजेश, तुलसी राम यादव, महेश चंद्र, केसरी प्रसाद, सीता राम, प्रेम नाथ यादव, विक्की यादव, संजय यादव आदि मौजूद थे।

Monday, August 17, 2009

मेरे बहाने पत्रकारिता की मर्यादा पर आत्ममंथन हो- -जरनैल सिंह-

भड़ास फॉर मीडिया से साभार....
सर्वाधिकार भड़ास फॉर मीडिया

मैंने पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन किया था। इसकी मुझे सजा भी मिल गई। मुझे सजा से कोई ऐतराज नहीं है। सजा कितनी होनी चाहिए थी, ये जरूर बहस का विषय हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जो अखबार रिपोर्टर को खुद दलाली करने पर मजबूर करते हैं, पैसा लेकर उम्मीदवारों को चुनाव हराते और जिताते हैं, ईमानदारी से पत्रकारिता करने की सजा देते हैं, नेताओं के दबाव में निर्दोष पत्रकार की नौकरी लेते हैं या दंडित करते हैं, खबरों को सही परिप्रेक्ष्य से हटा कर जानबूझ कर पक्षपाती एंगल देते हैं, पैसे लेकर माफियाओं और अपराधियों को दूध का धुला साबित करते हैं, क्या वह पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन करने में मुझसे बड़े गुनाहगार नहीं है? मेरा तरीका गलत था लेकिन मुद्दा हजारों-लाखों मजबूर दंगा पीड़ितों की आह को आवाज देना था। मैंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई, वह भी 25 साल के इंतजार के बाद। जो अखबार व पत्रकार सिर्फ स्वार्थ के आधार पर पत्रकारिता की मर्यादा को जूतों तले रौद रहे हैं, क्या वह पत्रकारिता की मर्यादा की बात करने के काबिल हैं?

सोचना होगा कि आज कलम की ताकत कम क्यों होती जा रही है? मीडिया की विश्वसनीयता कटघरे में क्यों है? आखिर वह काम जो कलम को करना चाहिए था, वह जूते से कैसे संभव हुआ? अन्याय के खिलाफ विरोध के अप्रत्याशित तरीके अपनाने को लोग क्यों मजबूर हो रहे हैं? आखिर कलम व अखबार उनके उत्पीड़न को स्वर क्यों नही दे पा रहा है? अगर कुछ लिख भी रहे हैं तो उसका प्रभाव क्यों कम हो गया है? ये घटनाएं कलम की घटती विश्वसनीयता, जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने की प्रवृत्ति का ही परिणाम तो नहीं है?

Thursday, August 9, 2007

अभी और कितनी मंहगी होगी खेती बाड़ी ?

किसानो से वसूला जाएगा सिचाई का खर्चा
मदन जैडा
देश के अन्नदाता की दुश्वारियाँ बढ़ने वाली हैं। खाद,बीज और अन्य जरूरतों के लिए , लिए गए कर्ज़ का जाल , मंडी और मौसम की मार के बाद अब सरकार भी किसान की जेब से पैसा निकलने की तयारी मे है। पहले ही घाटे का सौदा साबित हो रही खेती बाड़ी अब और मंहगी होने वाली है। योजना आयोग की योजना है कि सिंचाई परियोजनाओं के संचालन और रख रखाव की लागत किसानो स वसूल की जाय।
इस बारे मे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निर्देश पर शरद पवार के नेतृत्व मे बनी राष्ट्रिय विकास परिषद की उप समिति की सिफारिशों को आयोग अन्तिम रुप देने मे जुटा है। आयोग सूत्रों का कहना है कि कई दक्षिणी राज्यों ने सैधान्तिक तौर पर सहमति व्यक्त कर दी है लेकिन उत्तरी राज्यों -उत्तर प्रदेश , पंजाब , हरियाणा अदि ने भारी विरोध किया है। बहरहाल , इसी महीने संभावित एन डी सी बैठक मे इस मुद्दे पर विचार किये जाने की सम्भावना है। ११ वीं योजना के दौरान एक करोड़ दस लाख हेक्टेयर असिंचित भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस मद मे १,३७,५०० करोड़ रुपये खर्च होंगे। केंद्र चाहता है कि एक बार योजना बना देने के बाद सरकार को योजनाओं के संचालन और रख रखाव पर किये जाने वाले खर्चे से मुक्ति मिल जाय। पहले से चल रही सिंचाई परियोजनाओं के संचालन और रख रखाव पर सालाना १५-२० हज़ार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। यदि पुरानी योजनाओं पर ही सरकार इतना खर्च करती रहेगी तो नई योजनायें कैसे शुरू हो पाएँगी। इसलिये योजनाओं का खर्च किसानो की जेब काटकर निकला जाएगा। जो खाका आयोग ने तैयार किया है उसके अनुसार सिंचाई परियोजनाओं की लगत पांच साल के भीतर वसूल की जाय। इसके लिए किसानो को सिंचाई के पानी का हज़ारों रुपये प्रतिमाह शुल्क देना पड़ेगा । ज़्यादातर राज्यों मे सिंचाई सुविधा किसानो को निः शुल्क हासिल है। कुछ राज्यों मे बहुत मामूली शुल्क लिया जाता है। आयोग कमेटी के इस सिफारिश पर सहमत है कि शुल्क तय करने का अधिकार राज्यों को दिया जाय ताकी वह अपने हिसाब से निर्धारण कर सकें।

Tuesday, July 17, 2007

मेले और झमेले के बीच फंसी हिंदी

क्या हमारी भाषा साहित्य के बजाय सत्ता की मुखापेक्षी है ?
मंगलेश डबराल
न्यूयार्क मे आठवा विश्व हिंदी सम्मेलन कुछ ठोस या नया किये बग़ैर लगभग घटनाहीन तरीके से सम्पन्न हो
गया। इस आयोजन के सिलसिले मे असमंजस ,अफरातफरी और खींचतान का जो माहौल था ,उसे देखते हुए यह उम्मीद भी नही थी कि आठवें सम्मेलन मे ऐसा कोई काम होगा जो पिछले सात सम्मेलनों से अलग , नया और स्मरणीय हो। सम्मेलन के अंत मे रखे गए प्रस्तावों मे भी कोई नया मुद्दा नही उभरा। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प भी शायद आठवीं बार दोहराया गया होगा और जहाँ तक नागरी लिपि का एक सर्वमान्य-सर्वसुलभ यूनीकोड बनाने की बात है , तो यह जरूरी माँग लंबे समय से उठाई जाती रही है। लेकिन हिंदी फाँट के मानकीकरण मे किसी हिंदी सेवी संस्था की वास्तविक रूचि ना होने के कारन इस भाषा मे तरह तरह के फाँट चल रहे हैं और एक दूसरे के लिए पेचीदगियाँ पैदा कर रहे हैं। कुल मिलाकर इस सम्मेलन की उपलब्धि यह थी कि उदघाटन के मौक़े पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने एक मिनट हिंदी मे भाषण करके वहाँ एकत्र लोगों को 'चमत्कृत' और 'गदगद' कर दिया। उन्होने 'नमस्ते' किया, हालचाल पूछे और कहा कि 'मैंने दिल्ली दूतावास मे रहते हुए हिंदी सीखी है,पर यह मुझे अच्छी तरह से नही आती' और 'मेरा दामाद हिंदी जानता है' । यह महासचिव का शिष्टाचरण था ,जिसका सिर्फ एक प्रतीकात्मक महत्त्व है। कई वर्ष पहले अटलबिहारी वाजपेयी ने भी संयुक्त राष्ट्र मे अचानक हिंदी मे अनुप्रास-अलंकारमय भाषण करके ऎसी ही प्रतीकात्मकता का परिचय दिया था,जिसकी चर्चा कट्टर हिंदी-हिंदूवादी आज भी किया करते हैं। हमारे प्राण ऐसे ही प्रतीकों मे बसते हैं और असली मुद्दे अपनी जगह ठहरे , अनसुलझे या सड़ते-गलते रहते हैं।

शायद ऎसी ही प्रतीकात्मकता की आलोचना मे प्रसिद्ध कवि और समाज चिन्तक रघुवीर सहाय ने अपनी एक कविता मे कहा था : 'भारत मे हर संकट एक गाय है / रास्ते मे गोबर कर देता है विचार।' विश्व मे हिंदी भाषा -भाषियों की संख्या ७० से ८० करोड़ के बीच बताई जाती है। हालांकि वास्तविकता मे उसे पढने लिखने और बोलने वाले ४५ करोड़ से अधिक नही हैं। इसी तरह विश्व हिंदी सम्मेलन के समय यह कहा जाता है कि हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने के रास्ते मे एक कदम और बढ़ा चुकी है। हालांकि वास्तविकता यह है कि उसने ऐसा कोई कदम आगे नही बढाया है, क्योंकि किसी भाषा के संयुक्त राष्ट्र मे शामिल होने की प्रक्रिया बिल्कुल अलग है,जिसके लिए सदस्य देशों को काफी धन देना पड़ता है और उसके सचिवालय की तामझाम जुटाना पड़ता है। न्यूयार्क मे अगर साल के ३६५ दिन भी विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किये जाये , तब भी यह काम नही हो सकता क्योंकि इसे सिर्फ भारत सरकार कर सकती है।

विश्व हिंदी सम्मेलन के क्षेत्र पर अब तक ऎसी शक्तियों का वर्चस्व रहा है , जो हिंदीवाद को हिंदूवाद का ही विस्तार मानती हैं और हिंदी के वैश्विक मंचों पर अपने अधिकार को जन्मजात समझती हैं। यही वजह है कि पिछले सातों सम्मेलनों को एक अर्ध धार्मिक और अर्ध राजनितिक कथ्य के साथ आयोजित किया गया। लंदन मे हुए छठे सम्मेलन के बारे मे यह सुना गया कि वहाँ आमंत्रित लेखको को लक्ष्मीनारायण मंदिर की परिक्रमा के लिए भी ले जाया गया और सूरीनाम मे हुए सातवे सम्मेलन मे कमलेश्वर जैसे वरिष्ठ और सम्मानित लेखकों को काफी अपमानजनक परिस्थिति मे रहना पड़ा था। इन सम्मेलनों के केंद्र मे ऎसी हिंदी रही है, जो साहित्य के बजाय सत्ता-राजनीति की मुखापेक्षी है, देश की दूसरी भाषाओं पर सरकार के माध्यम से अपना वर्चस्व कायम करना चाहती है या जिसे सुखी सम्पन्न अंग्रेजी की छोटी और कुछ गरीब बहन बनकर रहना स्वीकार है। इस हिंदी की अंतर्वस्तु प्रगतिशील होना तो दूर , आधुनिक सेकुलर और लोकतांत्रिक भी नही है , क्योंकि वह भक्तिकाल के सगुण और निर्गुण नाम के दो पैरों पर खडी नागरी प्रचारिणी सभा छाप हिंदी है , जो भारतेंदु युग और छायावाद से आगे के साहित्य को साहित्य नही मानती। हिंदूवादी हिंदी शक्तियों के अतिरिक्त विश्व हिंदी मंचो पर सरकारी हिंदी तंत्र की भी ताक़तवर उपलब्धि है , जिसके पास राजभाषा नाम का अस्त्र है। इस बार के सम्मेलन मे सम्मानित किये गए हिंदी 'विद्वानो' की सूची से सरकार के हिंदी ज्ञान को समझा जा सकता है। सम्मान पाने वाले १७ लोगो मे से सिर्फ चार-पांच व्यक्ति ऐसे हैं , जिनके हिंदी भाषा और साहित्य मे कुछ योगदान से लोग परिचित है , शेष 'विद्वान ' राजनितिक कारणों से ही सम्मानित किये जाते हैं । हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकारों की एक लंबी सूची तैयार की जा सकती है जिन्हे किसी विश्व हिंदी सम्मेलन मे सम्मानित नही किया गया। इस बार के सम्मानीय लोगों मे सबसे प्रमुख केदारनाथ सिंह थे , लेकिन वह विदेश मंत्रालय के व्यवहार से इतने आहत हुए कि उन्होने न जाना ही उचित समझा। पिछले दो सम्मेलनों के कुछ साम्प्रदायिक स्वरूप से जो लेखक क्षुब्ध थे , इस बार उन्हें अपेक्षा थी कि कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार इसे एक सेकुलर और लोकतांत्रिक हिंदी का मंच बनाएगी , लेकिन उन्हें भी निराश होना पड़ा। अब तक के सभी विश्व हिंदी सम्मेलनों मे साहित्य और साहित्यकार सबसे अधिक उपेक्षित रहे हैं , जबकि साहित्य ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जिस पर हिंदी कुछ गर्व कर सकती है। ज्ञान के दूसरे क्षेत्रों मे हिंदी की दरअसल कोई उपलब्धि नही है। उसमे दर्शन , विज्ञानं , समाजशास्त्र , पर्यावरण , इतिहास संबंधी मौलिक और गम्भीर लेखन बहुत कम हुआ है , इसलिये उसकी सारी बौद्धिक संपदा साहित्यिक ही है । लेकिन विचित्र यह है कि हिंदी लेखक की भूमिका विश्व मंचो पर नगण्य ही रहती है। क्या इसका कारण यह है कि ऐसे मंचो की बागडोर जिन नई पुरानी संस्थाओं के हाथ मे है , उनके लिए हिंदी संघर्ष की नही , सत्ता और ताकत की भाषा है ? विश्व विजय की थोथी आकांक्षा रखने वाले हिंदी के इस स्वरूप पर कवि रघुवीर सहाय करीब २५ वर्ष पहले ही गम्भीर हताशा व्यक्त कर चुके थे। 'लोग भूल गए हैं' शीर्षक की कविता मे उन्होने कहा था ,
हिंदी का प्रश्न अब हिंदी का प्रश्न नही रह गया है / हम हार चुके हैं...../ हिंदी के मलिक जो हैं गुलाम हैं / उनके गुलाम हैं जो वे आजाद नही / हिंदी है मलिक की/ तब आज़ादी के लिए लड़ने की भाषा फिर क्या होगी/ हिंदी की माँग/ अब दलालों की अपने दास मालिकों से/ एक माँग है/ बेहतर बर्ताव की/ अधिकार की नही.....

रघुवीर सहाय की यह कविता विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे सैर सपाटों और विजयी भावों पर एल स्थाई टिपण्णी की तरह पढी जा सकती है।

साभार: अमर उजाला

Thursday, July 12, 2007

मैं विचारों से समझौता नही कर सकती !!

साम्प्र्दयिकों के साथ मंच कैसे शेयर करूं : महाश्वेता देवी
कृपाशंकर चौबे
विख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ने कहा कि विश्व हिंदी सम्मेलन मे उनके नही जाने के ठोस कारण हैं । उन्होने कहा " केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से मेरे पास फोन आया था जिसमे बताया गया था कि न्यूयार्क मे १३ जुलाई से हो रहे तीन दिनी आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन मे कई अन्य दूसरे लेखकों के साथ मुझे सम्मानित करने का फैसला किया गया है। लेकिन जब मैंने पाया कि सम्मानित होने वालों मे कतिपय साम्प्रदायिक दृष्टिकोण वाले लेखक भी हैं तो तत्क्षण मैंने मना कर दिया।" महाश्वेता ने कहा," उनके साथ मैं सम्मान कैसे ग्रहण कर सकती हूँ जिनके साथ मेरा वैचारिक विरोध है। वैसे भी कोई सम्मान मुझे स्पर्श नही करता ।"
बुजुर्ग लेखिका ने कहा,"चुंकि मंत्रालय से पहली ही बातचीत मे मैंने न्यूयार्क जाने से मना कर दिया था , इसलिये आमंत्रण पत्र भी नही आया। अब मुझे पता चला है कि समालोचक नामवर सिंह , कवि केदारनाथ सिंह , अशोक वाजपेयी , मंगलेश डबराल और कथाकार राजेंद्र यादव ने भी विश्व हिंदी सम्मेलन मे भाग नही लेने का फैसला किया है। इससे स्पष्ट होता है कि मेरा फैसला सही था।" महाश्वेता देवी ने कहा,"विश्व हिंदी सम्मेलन मे मेरे नही जाने का कोई दूसरा अर्थ नही निकला जाना चाहिऐ।"
उन्होने कहा,"हिंदी के प्रति मेरे मन मे अगाध श्रद्धा है। मैं मानती हूँ कि हिंदी मे छप कर ही मैं राष्ट्रिय लेखिका हुई। लेकिन इसीलिये मैं अपने विचारों से कोई समझौता नही कर सकती। धर्मनिरपेक्षता मेरे लिए बड़ा मूल्य है और ग़ैर धर्मनिरपेक्ष लोगों के साथ मैं मच नही शेयर कर सकती। वैसे भी साम्राज्यवाद के प्रतीक अमेरिका मे इस उम्र मे जाने का क्या मतलब ? हमने अमेरिका और बुश का चेहरा इराक़ से लेकर अफगानिस्तान मे ख़ूब देखा है। नए सिरे से अब क्या देखना बाक़ी है ?"

साभार: हिंदुस्तान

Monday, May 21, 2007

हिंदुत्व का यह चेहरा

हिंदू धर्म में भी कभी कभी कट्टरता को बढावा देने वाली घटनाएं घटती हैं,जैसी कि महज दो दिन पहले केरल के एक मंदिर मे देखी गयी। केंद्रीय मंत्री व्यालार रवि अपने बेटे और नवजात पोते के साथ मंदिर मे दर्शन के लिए गए थे। उनके लौटने के बाद मंदिर प्रबंधन ने परिसर को धोकर पवित्र किया। इस वरिष्ठ राजनेता के साथ ऐसा सुलूक पहली बार नही हुआ है। कुछ वर्ष पहले गुरुवायुर मंदि मे अपने बेटे की शादी का समारोह आयोजित करने के बाद भी प्रबंधन ने मंदिर को शुद्ध किया था। लेकिन तब व्यालार रवि की इसाई पत्नी साथ थी, हालांकि तब भी उस कृत्य का समर्थन नही किया जा सकता था। पर इस बार तो उनकी पत्नी साथ नही थी। मंदिर प्रबंधन के इस व्यवहार ने इस परिवार को ही नही, उदार सोच रखने वाले दूसरे लोगो को भी क्षुब्ध किया है। जो हिंदू धर्म अन्य मतावलंबियों के प्रति उदारता के लिए प्रसिद्ध रह है , उस धर्म मे आख़िर ये क्या हो रहा है ? पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन ने महात्मा गांधी को दलितों के साथ और विनोबा भावे को मुस्लिमों के साथ प्रवेश करने से रोका था । और तो और , प्रबंधन ने एक समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को मंदिर मे प्रवेश नही करने दिया क्योंकि उन्होने पारसी से शादी की थी। लेकिन आज के दौर मे कुछ दशक पहले जैसी कट्टरता को आख़िर क्या कहेंगे ? आख़िर इसी दौर मे कुछ मंदिरों के दरवाज़े निचली जातियों के लिए खुले भी हैं। इसके पक्ष मे कई जगह सामाजिक आन्दोलन हुए हैं। लेकिन इसका दूसरा उदास करने वाला पक्ष यह है कि गुरुवायुर मंदिर के दरवाज़े येसुदास जैसे भक्त गायकों के लिए आज भी बंद हैं। व्यालार रवि को इसाई से शादी करने का दंश बार बार मंदिर मे झेलना पड़ता है। धार्मिक कट्टरता मे पंजाब इसी तरह गर्क हो जता है कि म्यान से तलवारें निकल जाती हैं।

अमर उजाला से साभार