Tuesday, May 20, 2014

एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश

सुबह-सुबह कबूतर की गुटरगूं और तेज चलती हवा के साथ आई चमकीली चटीली धूप से जबरदस्‍ती आंख मूंदे रह पाना मुमकि‍न न लगा तो मैं बि‍स्‍तर पर उठकर बैठ गया। आंखें मलीं लेकि‍न उनमें आधी रात के बाद आई नींद का अधूरापन तारी था तो मैनें उठकर अपने बड़े वाले बक्‍से पर रखी रूमाल ले ली। आलमारी घर में एक भी नहीं है इसलि‍ए दान में मि‍ले बक्‍से को ही आलमारी बनाना पड़ रहा है। पता नहीं कैसा तो मेरा मकान मालि‍क है कि कमरे में पूरी चार दीवारें एक छत एक खि‍ड़की और यहां तक कि एक दरवाजा भी लगा दि‍या, लेकि‍न एक अदद आलमारी, जि‍सके बगैर कमरे में रहने वाला अधूरा रहता है, बनवाने की उसे बि‍लकुल भी नहीं सूझी। बक्‍से से रूमाल लेकर मैं फि‍र से बि‍स्‍तर पर आकर बैठ गया और मैनें उस रूमाल से अपनी आंखों से बार बार नि‍कलने वाले आंसू पोंछे। नहीं, मैं रो नहीं रहा था, नींद बजोरी मुझे रुला रही थी। मैनें एक बार रूमाल से अपने आंसू पोंछे तो कुछ देर बाद फि‍र से नि‍कलने लगे तो फि‍र से पोंछे। तीसरी बार आंसू थोड़ी देर में नि‍कले इसलि‍ए थोड़ी देर बाद पोंछे। इस झाड़ू पोंछे के चक्‍कर से नि‍कलने के बाद मैनें दूर रसोई की खि‍ड़की पर रखे च्‍वनप्राश के डि‍ब्‍बे को देखना शुरू कि‍या। थोड़ी देर बाद उसे फि‍र से देखा और उसके थोड़ी देर बाद फि‍र से देखा। इसके बाद मैं अपने बि‍स्‍तर से उठा और खड़ा हो गया और रूमाल वहीं पर छोड़ दी। इस बार मैनें कुछ तय कर लि‍या था। मैं आहि‍स्‍ते आहि‍स्‍ते चला और कमरे से बाहर नि‍कल गया। कमरे से बाहर नि‍कलने के बाद मैनें खुद को अपने आंगन में पाया। आंगन में भी मुझे चलना ही था क्‍योंकि कमरे से तो मैं कुछ तय करके चला था ना। इसके बाद मैं अपनी रसोई के दरवाजे से होता हुआ उसके अंदर पहुंचा और खि‍ड़की के सामने आकर एक बार फि‍र से च्‍यवनप्राश का डि‍ब्‍बा देखा। मैनें एक चम्‍मच लि‍या और डि‍ब्‍बे का ढक्‍कन खोला। मैनें चम्‍मच उसमें डाला और भर चम्‍मच च्‍यवनप्राश नि‍काला। इसके बाद मैनें एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश खाया।

कुल मि‍लाकर मैनें आज सुबह उठकर एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश खाया। बस बात इतनी सी ही है।

(हो गई ना दि‍माग की दही... कसम से मेरी भी होती है।)

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