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Tuesday, June 5, 2007

महानगर का चूल्हा

संदीप कुमार


जिस गांव की मिट्टी ने

पाला-पोसा

पढ़ाया-लिखाया

वहां के लिए नाकाबिल निकला

इस अनजान महानगर ने

दो टके की नौकरी क्या दी

सारा दिन खून जलाना पड़ता है

तब जाकर चूल्हा जल पाता है

दो जून की रोटी

नसीब हो पाती है।

Wednesday, May 23, 2007

पेठिया में पारो

संदीप कुमार

(संदीप पिछले कुछ दिनों से पेठिया-गाथा कहे-सुनाए जा रहे हैं। इस बार फिर से अपनी किशोरावस्था में जाकर पेठिया के रुमानी पहलू को याद कर रहे हैं।)

ये तो अब तक आप लोग जान ही गए होंगे कि मेरे घर के आगे पेठिया (साप्ताहिक बाजार) लगता है। पेठिया के कारण मुझे एक नई पहचान भी मिली हुई है। जब भी मेरे हमनामों के बीच मेरी चर्चा होती है तो लोग डिफरेंस करने के लिए कहते हैं कि पेठिया वाला संदीप...एक तरह से नेठा नाम हो गया है मेरा ये। (जिसे आप लोग निक नेम कहते हैं, उसे हमारे इलाके में नेठा नाम कहा जाता है) पर पेठिया का पड़ोसी होने की मेरी क्वालिटी से कई लोग रश्क भी करते हैं। रश्क करने वालों में अधिकतर रसिक मिजाज किसिम के लोग होते हैं। ये लोग सोचते हैं कि पेठिया का बगलगीर होने का इसे ये फायदा होता होगा कि वो गुरुवार के दिन (इसी दिन पेठिया लगता है हमारे यहां) छत से, खिड़की से और घर के बाहर निकलकर आराम से बेरोक-टोक आने-जाने वाली लड़कियों को निहार सकता है। ऐसे लोग तो यहां तक सोचते कि काश, हमारे घर के बगल में भी पेठिया लगता तो हमारी भी रज-गज (चलती) रहती।

दरअसल ये रसिक मिजाजी लोग बहुत बड़े अंख-सेंकवन थे। हफ्ते में पेठिया का इंतजार ही इसीलिए करते थे ताकि छौंडियन (सभ्य समाज में जिसे अब माल कहा जाने लगा है!) को देखने का मौका मिल जाए। सात-सात कोस के तकरीबन पचासों गांव के लोग पेठिया में जुटते हैं। कोई कुछ खरीदने तो कुछ लोग बेचने। पर बहुत लोग जिनमें अधिकतर लौंडे-लपाड़े होते हैं वो बस यूं ही घूमने-फिरने और मोल-भाव करने पहुंचते। (दिल्ली में ही आकर सुना कि इसे विंडो शॉपिंग कहते हैं) ये शोहदे किस्म के लोग ग्रुप में होते और मेरे घर के बरामदे में आ धमकते। अखबार उठाते और उसके हर पन्ने को अलग-अलग निकाल कर चार-पांच दोस्त बांटकर पढ़ने का नाटक करते। दरअसल हाथ में अखबार होता था और निगाहें सामने से पेठिया जाने वाली लड़की पर होता। जैसे ही इन लौंडों को कोई लड़की जंच जाती, ये लुंडी-सुतरी करने निकल पड़ते। (मतलब लाइन मारने निकल पड़ते) अखबार को जैसे-तैसे वहीं फेंक ये लोग लड़की के पीछे लपक पड़ते।

जहां-जहां जिस-जिस दुकान में लड़की जाती पीछे-पीछे ये भी हो लेते। हालांकि छेड़हर टाइप के लोग (जिसे सिविल सोसायटी में फ्लर्टबाज कहते हैं) पेठिया में सब्जी या सामान वगैरह बेचने आने वाली लड़कियों-औरतों पर भी निगाहें फेरते। जिन दुकानों में औरतों के लिए स्टेशनरी और श्रृंगार वगैरह की चीजें बेची जातीं, उसके आसपास ऐसे शोहदे खूब मंडराते। पेठिया के इन अस्थाई दुकानों की खास बात ये थी कि ये एक रस्सी में महिलाओं के अंदरुनी कपड़ों को लटकाकर रखते। (विंडो-डिस्पले की जगह इसे रोप-डिस्पले कह लीजिए) रंग-बिरंगे बालिश्त भर के इन कपड़ों को देखकर शोहदे खूब चुटकी लेते। पर खरीदने वाली औरतें आसपास लौंडों को देखकर इन चीजों को उलट-पुलटकर देखने या मोल-भाव करने से सकुचातीं। कई बार दुकानदार इन लौंडों को दबी जुबान से झिड़की भी देता लेकिन इनकी ग्रुपबाजी को देखकर वो सहम भी जाता।

हालांकि कोई भी लड़की अकेले पेठिया नहीं आती थी, उसके साथ मां नहीं भी हो तो चाची-भौजी टाइप की कोई-न-कोई औरत होती ही थी और नहीं तो कम-से-कम छोटा भाई या बहन तो जरूर ही होता। सो लौंडे एक सम्मानजनक दूरी बनाकर चलते थे। (इसे किप डिस्टेंस कहा जाता था और यह टर्म लोगों की जुबान पर इसलिए चढ़ा हुआ था क्योंकि पेठिया जीटी रोड के किनारे लगता था और वहां से गुजरने वाली ट्रकों-लौरियों के पीछे कीप डिस्टेंस लिखा होता था) पेठिया में ऐसे लौंडों के कई ग्रुप दिख जाते। कई बार दो-तीन ग्रुप तो आपस में ही टकरा जाते। विकट स्थिति तब होती जब एक ग्रुप को यह पता चलता कि दूसरे गांव के लौंडे उनके इलाके की लड़की के पीछे पड़े हुए हैं। हैंडल विद केयर को ये लोग फॉलो करते थे। दूसरे गांव की लड़कियों पर नजर रखते थे तो अपने इलाके वाली लड़कियों पर कोई निगाहें न डाले, इसका भी ध्यान रखते। कई दफे इसी चक्कर में बीच पेठिया मार-धाड़ भी हो जाया करती थी।

सबसे बड़ी बात ये कि पेठिया आई कोई लड़की अगर एक बार भी पीछे मुड़कर इन लोगों को देख लेती थी तो ये समझते बैतरणी पार हो गए। हालांकि बाद में आपस में ये इसलिए भी बहस किया करते थे कि उसने मुझे देखा। (मतलब लाइन दी) बस यूं ही हवा में कई लड़के देवदास बने फिरते। ये बिना जाने कि वो उसकी पारो है या नहीं। पेठिया में आने वाले वीकली देवदासों की तादाद कुछ कम नहीं थी। मुझे नहीं मालूम कि वीकली देवदासों की तरह वीकली पारो भी होती हैं या नहीं जो इसीलिए पेठिया आती हों कि उन्हें भी आंखें सेंकने का मौका मिल जाए।

Thursday, May 3, 2007

पेठिया का पावर

संदीप कुमार
पेठिया ऎसी चीज़ ही है कि जल्दी भूलती ही नही। और ये ना भूलना शायद हमारे अन्दर बची हुई इमानदारी को भी काफी सच्चाई से बाहर निकालता है , एक नयी दुनिया बनाता है , जिसके आस पास पेठिया है , उसमे टहलने वाले लोग हैं, चंद सामान रख कर कुछ बेचने वाले दूकानदार हैं और इन सब के बीच विचरते संदीप हैं । देखते हैं इस बार संदीप पर पेठिया ने कौन सा रंग चढाया है।

मैंने तो आप सबों को बताया ही था कि पेठिया का पड़ोसी हूं मैं। मेरे घर के सामने ही पेठिया (पेठिया माने साप्ताहिक हाट...बार-बार हिन्ट नहीं दूंगा... इसे रट लीजिए, बूझे) लगता-सजता है। हफ्ता में एक दिन ही सही लेकिन उस दिन (यानी गुरूवार को) अपने भाव कम नहीं होते। उस दिन पूरे पावर में रहता था मैं। ये उन दिनों की बात है जब मैं स्कूल में था। पिछले दशक से जबसे पढ़ने-लिखने (!) के बहाने घर से बाहर रहा और आज जब अपनी (कु)काबिलियत की वजह से टीवी के पर्दे के पीछे से मीडियाकारिता (पत्रकारिता नहीं जनाब) कर रहा हूं तो वो दिन बहुत याद आते हैं। दिहाड़ी के चक्कर में नोएडा-इंदिरापुरम अप-डाउन करते-करते चिर कुंवारा होते हुए भी यूं तो अपना कस्बा बगोदर और घर-परिवार बहुत याद तो नहीं आता पर जैसे ही गुरूवार का दिन आता है मुझे किसी की याद आए न आए, पेठिया की याद जरूर सताने लगती है।
अरे, वो भी क्या दिन थे जनाब। अपनी तो रज-गज (पूरी चलती) ही थी मानो। पेठिया में किरासन तेल (आपलोग इसे शायद घासलेट कहते हैं न...जब पहली बार मैंने किरासन तेल के लिए ये नाम सुना था, तो काफी हंसा था, आखिर तेल भी क्या घास पर लेट सकता है..) बिकता था। हफ्ते में एक दिन के लिए। किरासन की बड़ी किल्लत थी। राशन-कार्ड पर जो तीन-चार लीटर तेल महीने में मिलता था, उससे तीस दिन ढिबरी जलना मुश्किल था। सो बिना राशन-कार्ड पर मिलने वाले किरासन लेने के लिए पचीसियों गांव के लोग पेठिया के दिन कई कोस दूर से उमड़े चले आते थे। लाइन लगती थी लंबी-सी। लोग तो बुधवार की रात से ही मोबिल का पांच लीटर वाला डब्बा या कनस्तर लाइन में लगा देते थे। रात में लोग मेरे ही बरामदे में सोते और तीन-चार बजे सुबह पेठियाटांड़ में जम जाते। इतनी जुगत करने पर गुरूवार (पेठिया के दिन) की सुबह लोग किरासन तेल का ड्रम खत्म होने से पहले एक-दो लीटर पा पाते थे। लेकिन मुझे किरासन के लिए इस तरह की कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती थी। तेल बेचने वाला डीलर मेरे दरवाजे पर ही मोटरसाइकिल लगाता था और इसकी एवज में बिना किसी मेहनत के मुझे चार लीटर किरासन मिल जाता था। हालांकि कीमत मैं चुकाता था पर किरासन मिल जाना ही अपने-आप में बहुत बड़ी बात थी नहीं तो पॉकेट में गड्डियां रहते हुए भी किरासन तेल नहीं मिल पाता था, जनाब।
साथ ही जो लोग दूर गांवों से पेठिया आते थे उनमें से अधिकतर लोग मेरे दरवाजे पर ही साइकिल लगाते। और ये मेरी मर्जी होती कि किसकी साइकिल यहां लगे और किसकी नहीं। और जो साइकिल भाया उसे चलाने का पूरा सुख भी उठाता। सीधी हैंडिल वाली रेंजर साइकिल अपने मोहल्ले में सबसे पहले मैंने ही चलाई थी। ये साइकिल एक गांव का लड़का लेकर आया था जिसकी हाल ही में शादी हुई थी और स्कूल जाने के लिए उस दूल्हे राजा को ससुराल वालों ने ये साइकिल और एक चमचमाती टाइटन घड़ी, संतोष कंपनी का रेडियो दिया था। बंदा हाईस्कूल में मुझसे सीनियर था पर पेठिया के बगल वाला होने के कारण मेरे हर नखरे सहता था। पेठिया के दिन उसे अपनी साइकिल मेरे दरवाजे पर लगाना जो होता था।
इसी तरह कई लोगों को झोला की भी जरूरत होती तो मेरे पास ही आते। एक बार उस मास्टर साहब को कटहल बहुत भा गया जो बच्चों को मारने-पीटने को लेकर बेहद बदनाम थे। कभी-कभी मुझे भी कनेठिया देते थे। पर मास्टर साहब कटहल लेकर कैसे जाएं, झोला तो था नहीं। उन्हें मेरी याद आई और मां की नजरों से बचाकर उन्हें झोला दे भी दिया। हालांकि आज तक वो झोला उस मास्टर साहब ने नहीं लौटाया पर क्या मजाल कि उस दिन के बाद कभी स्कूल में मुझे नजर उठाकर भी देखें। ऐसे मेरी मां को हमेशा मुझपर ही शक होता रहा कि मैंने उनका वो कढ़ाई किया हुआ झोला कहीं इधर-उधर कर दिया जो उन्होंने अपनी शादी के पहले ढिबरी की रोशनी में आंखें फोड़-फोड़कर बनाया था और उसपर लिखा था स्वागतम। (सच इसलिए बोल दिया क्यूंकि...मेरी मां इस कन्फेशन को नहीं पढ़ पाएगी...)
पेठिया के बगल वाला होने पर एक अदना-सा बच्चा भी पावरफुल हो जाता है। मुझे नहीं पता कि बगोदर में आजकल मेरी वो जगह किसने हासिल की है। शायद पड़ोसी का कोई बच्चा आजकल पूरे पावर में हो। मेरे जमाने में तो साइकिल ही हाथ लग पाता था। हो सकता है उसे बाइक उड़ाने का मौका मिल जाता हो।
इसे भी अब को-इंसीडेंट ही कहें कि मेरे कस्बे बगोदर में भी गुरूवार को ही पेठिया लगता है तो आज जिस इंदिरापुरम में मेरी भाड़े की रिहाइश है, वहां भी गुरूवार को ही पेठिया (अब यहां के लोग तो इसे बाजार ही कहते हैं, कहते रहे, मुझे क्या, मैं तो पेठिया ही कहूंगा) लगता है। पर यहां इंदिरापुरम में वो पावर कहां जो बगोदर में था, बॉस।

Friday, April 27, 2007

पेठिया की पैठ

संदीप कुमार
संदीप वही हैं जिन्होंने पहली बार ‘महानगर की दीवार’ नाम की कविता-टाइप एक चीज के साथ ‘बाजार’ में दस्तक दिया था। गांव से महानगर आने की कसक को कविता के रूप में संदीप ने तब उड़ेला था। पर अब बाजार के बहाने अपने कस्बे के पेठिया को याद कर फिर से तरोताजा हो रहे हैं संदीप।
पने झारखंड के गिरिडीह जिले में साप्ताहिक बाजार को पेठिया कहते हैं। और हटिया भी कहते हैं। (ऐसे राजधानी रांची के करीब हटिया नाम से एक जगह भी है पर इसके नामकरण के पीछे क्या वजह है, मुझे नहीं पता।) मजे की बात ये कि बगोदर कस्बे के मेरे घर के सामने ही पेठिया लगता है। मोटा-मोटी थूकन दूरी पर है मेरे घर से पेठियाटांड़। (थूकन दूरी माने नहीं बूझे...यानि थूक दो तो थक्का वहां तक पहुंच जाए वाली दूरी।) पेठिया लगता है गुरूवार को। हालांकि आज तक मैं ये नहीं समझ पाया कि गुरूवार को इतने नामों से क्यों पुकारा जाता है। वीरवार, जुमेरात, बृहश्पतिवार....। बृहशपतिवार को थोड़ा छोटा करने के चक्कर में हमारे यहां लोग इसे बीफे भी कह जाते हैं। पर हमारे इलाके में इस दिन को एक और नाम दे दिया गया है। और मेरा दावा है कि यह नाम बगोदर से बाहर वालों को शायद ही पता हो। और उस दिन का नाम है पेठिया। यानि हफ्ते के दिन होते हैं...सोमवार (सोमार), मंगलवार (मंगर), बुधवार (बुध), पेठिया, शुक्रवार (शुकर), शनिवार (शनिचर), रविवार (एतवार)। हमारे इलाके कभी आओ तो आपको जानकर हैरत होगी कि अधिकतर लोग बुधवार के बाद वाले और शुक्रवार के पहले वाले दिन को न तो गुरूवार कहते हैं, न वीरवार (ये नाम तो खुद मैं दिल्ली में ही जाना) और न ही बृहश्पतिवार...सीधे पेठिया कहते हैं। कौन दिन है भइया- के जवाब में आपको पेठिया का नाम सुनने को मिलेगा। पेठिया का मतलब गुरूवार और गुरूवार का मतलब पेठिया है हमारे बगोदर के लिए। पेठिया कुछ इस कदर इस कस्बे के लोगों के दिल-दिमाग में बस गया है कि वो इससे हटकर सोच ही नहीं सकते। इसी का असर है कि यहां के लोग गुरूवार नाम के दिन को ही भूला-बिसरा दिए हैं। हालत ये है कि आसपास के इलाकों में भी जिस दिन पेठिया लगता है उस दिन को वहां के लोग भी पेठिया के दिन से ही जानते हैं। जैसे बगल के सरिया कस्बे में लोग पेठिया के दिन का मतलब बुधवार से समझते हैं क्योंकि वहां बुधवार को साप्ताहिक हाट लगता है। और सबसे मजे की बात देखिए कि इन साप्ताहिक हाटों में जो लोग सामान बेचने का काम करते हैं उनके लिए हफ्ते के दिन तो कुछ और ही तरीके का होता है। जैसे साप्ताहिक हाट में दुकान सजाने वाले अगर दो दुकानदार आपस में मिलेंगे तो कहेंगे आज सरिया है...कल बगोदर। यानि आज बुधवार है...कल गुरूवार। बुधवार माने सरिया और गुरूवार मतलब बगोदर। कुछ इस कदर है पेठिया का पराक्रम कि हम देहात वाले तो दिन और कमोबेश दुनिया भी भूल-भाल गए हैं। (...क्योंकि पेठिया ही हमारी दुनिया होती है...इसी दिन हफ्ते भर की तरकारी-खरीददारी सब जो हो जाती है...)

Tuesday, April 24, 2007

महानगर की दीवार

संदीप कुमार

हजारीबाग से बी ए करने के बाद अपने कस्बे बगोदर (झारखण्ड) से नीम हकीम पत्रकारिता शुरू कर दी। लेकिन नुस्खे झोला छाप नही थे। फिर सोचा कि कहीँ से इसकी डिग्री ले ली जाय नही तो क्या पता कब कहॉ कोई छापा मार दे और लाइसेंस कैंसिल हो जाये। सो आ गए दिल्ली। और सीधे आई आई एम् सी । उसके बाद ठिकाना बना अपना मुम्बई जहाँ स्टार न्यूज़ में कुछ दिन कलम घिसाई की। इन दिनों नोयडा के स्टार न्यूज़ के दफ्तर मे पाए जाते हैं और बकौल संदीप " उसी से खिचड़ी-चोखा का जुगाड़ हो रहा है" । बजार के लिए इन्होने अपनी एक कविता भेजी है , जो किसी भी नॉर्मल आदमी की एब्नोर्मल बनाने की प्रक्रिया को काफी आसानी से व्यक्त करती है।



गाँव से जब आया था
"सॉरी थैंक्स" के आगे

कुछ नही जानता था

मेरी एक दोस्त कहती थी

तेरे पास तमीज नही

बात करने की

सलीका नही

उठने बैठने का

असर उसकी सोहबत की

या फिर हवा इस महानगर की

मालूम नही

पर अब गाहे बगाहे

मुँह से निकलता है-

शिट या फक

मेरी दोस्त हंसती है

उसके गाल में गढ्ढे पड़ते हैं

और कहती है

गंवार ! कुछ सीख रहा है

आज आलम यह है कि

जब अकेले में भी छिंकता हूँ

तो "सॉरी" कहता हूँ

क्योंकी सुना है कि

महानगरों की दीवारो की भी

आंखें होती हैं

वो पहचान लेती हैं

कि ये गाँव का गंवार है ।