Wednesday, May 23, 2007

पेठिया में पारो

संदीप कुमार

(संदीप पिछले कुछ दिनों से पेठिया-गाथा कहे-सुनाए जा रहे हैं। इस बार फिर से अपनी किशोरावस्था में जाकर पेठिया के रुमानी पहलू को याद कर रहे हैं।)

ये तो अब तक आप लोग जान ही गए होंगे कि मेरे घर के आगे पेठिया (साप्ताहिक बाजार) लगता है। पेठिया के कारण मुझे एक नई पहचान भी मिली हुई है। जब भी मेरे हमनामों के बीच मेरी चर्चा होती है तो लोग डिफरेंस करने के लिए कहते हैं कि पेठिया वाला संदीप...एक तरह से नेठा नाम हो गया है मेरा ये। (जिसे आप लोग निक नेम कहते हैं, उसे हमारे इलाके में नेठा नाम कहा जाता है) पर पेठिया का पड़ोसी होने की मेरी क्वालिटी से कई लोग रश्क भी करते हैं। रश्क करने वालों में अधिकतर रसिक मिजाज किसिम के लोग होते हैं। ये लोग सोचते हैं कि पेठिया का बगलगीर होने का इसे ये फायदा होता होगा कि वो गुरुवार के दिन (इसी दिन पेठिया लगता है हमारे यहां) छत से, खिड़की से और घर के बाहर निकलकर आराम से बेरोक-टोक आने-जाने वाली लड़कियों को निहार सकता है। ऐसे लोग तो यहां तक सोचते कि काश, हमारे घर के बगल में भी पेठिया लगता तो हमारी भी रज-गज (चलती) रहती।

दरअसल ये रसिक मिजाजी लोग बहुत बड़े अंख-सेंकवन थे। हफ्ते में पेठिया का इंतजार ही इसीलिए करते थे ताकि छौंडियन (सभ्य समाज में जिसे अब माल कहा जाने लगा है!) को देखने का मौका मिल जाए। सात-सात कोस के तकरीबन पचासों गांव के लोग पेठिया में जुटते हैं। कोई कुछ खरीदने तो कुछ लोग बेचने। पर बहुत लोग जिनमें अधिकतर लौंडे-लपाड़े होते हैं वो बस यूं ही घूमने-फिरने और मोल-भाव करने पहुंचते। (दिल्ली में ही आकर सुना कि इसे विंडो शॉपिंग कहते हैं) ये शोहदे किस्म के लोग ग्रुप में होते और मेरे घर के बरामदे में आ धमकते। अखबार उठाते और उसके हर पन्ने को अलग-अलग निकाल कर चार-पांच दोस्त बांटकर पढ़ने का नाटक करते। दरअसल हाथ में अखबार होता था और निगाहें सामने से पेठिया जाने वाली लड़की पर होता। जैसे ही इन लौंडों को कोई लड़की जंच जाती, ये लुंडी-सुतरी करने निकल पड़ते। (मतलब लाइन मारने निकल पड़ते) अखबार को जैसे-तैसे वहीं फेंक ये लोग लड़की के पीछे लपक पड़ते।

जहां-जहां जिस-जिस दुकान में लड़की जाती पीछे-पीछे ये भी हो लेते। हालांकि छेड़हर टाइप के लोग (जिसे सिविल सोसायटी में फ्लर्टबाज कहते हैं) पेठिया में सब्जी या सामान वगैरह बेचने आने वाली लड़कियों-औरतों पर भी निगाहें फेरते। जिन दुकानों में औरतों के लिए स्टेशनरी और श्रृंगार वगैरह की चीजें बेची जातीं, उसके आसपास ऐसे शोहदे खूब मंडराते। पेठिया के इन अस्थाई दुकानों की खास बात ये थी कि ये एक रस्सी में महिलाओं के अंदरुनी कपड़ों को लटकाकर रखते। (विंडो-डिस्पले की जगह इसे रोप-डिस्पले कह लीजिए) रंग-बिरंगे बालिश्त भर के इन कपड़ों को देखकर शोहदे खूब चुटकी लेते। पर खरीदने वाली औरतें आसपास लौंडों को देखकर इन चीजों को उलट-पुलटकर देखने या मोल-भाव करने से सकुचातीं। कई बार दुकानदार इन लौंडों को दबी जुबान से झिड़की भी देता लेकिन इनकी ग्रुपबाजी को देखकर वो सहम भी जाता।

हालांकि कोई भी लड़की अकेले पेठिया नहीं आती थी, उसके साथ मां नहीं भी हो तो चाची-भौजी टाइप की कोई-न-कोई औरत होती ही थी और नहीं तो कम-से-कम छोटा भाई या बहन तो जरूर ही होता। सो लौंडे एक सम्मानजनक दूरी बनाकर चलते थे। (इसे किप डिस्टेंस कहा जाता था और यह टर्म लोगों की जुबान पर इसलिए चढ़ा हुआ था क्योंकि पेठिया जीटी रोड के किनारे लगता था और वहां से गुजरने वाली ट्रकों-लौरियों के पीछे कीप डिस्टेंस लिखा होता था) पेठिया में ऐसे लौंडों के कई ग्रुप दिख जाते। कई बार दो-तीन ग्रुप तो आपस में ही टकरा जाते। विकट स्थिति तब होती जब एक ग्रुप को यह पता चलता कि दूसरे गांव के लौंडे उनके इलाके की लड़की के पीछे पड़े हुए हैं। हैंडल विद केयर को ये लोग फॉलो करते थे। दूसरे गांव की लड़कियों पर नजर रखते थे तो अपने इलाके वाली लड़कियों पर कोई निगाहें न डाले, इसका भी ध्यान रखते। कई दफे इसी चक्कर में बीच पेठिया मार-धाड़ भी हो जाया करती थी।

सबसे बड़ी बात ये कि पेठिया आई कोई लड़की अगर एक बार भी पीछे मुड़कर इन लोगों को देख लेती थी तो ये समझते बैतरणी पार हो गए। हालांकि बाद में आपस में ये इसलिए भी बहस किया करते थे कि उसने मुझे देखा। (मतलब लाइन दी) बस यूं ही हवा में कई लड़के देवदास बने फिरते। ये बिना जाने कि वो उसकी पारो है या नहीं। पेठिया में आने वाले वीकली देवदासों की तादाद कुछ कम नहीं थी। मुझे नहीं मालूम कि वीकली देवदासों की तरह वीकली पारो भी होती हैं या नहीं जो इसीलिए पेठिया आती हों कि उन्हें भी आंखें सेंकने का मौका मिल जाए।

3 comments:

विशेष said...

मुझे पूरा यकीन है कि आपके ब्‍लाग के बारे में आपके घरवालों को मालूम नहीं होगा.

वैसे अच्‍छा लिखा है आपने.

रंजू said...

hi sandeep ...aap ke likhne mein baandh paane waali baat nahi aa paa rahi hai ,,kuch interesting bataaye ..kyuki jo subject aapne chuna hai woh bahut hi badha hai ...isko kuch intersting bana ke likhenge toh jayda accha lagega padhne mein ....ladki ki baajaye kuch aisi baate jo city life mein ab dekhne mein kam nazar aati ho ..i hope ki aap samjaj rahe honge ..mujhe aapke next bazaar ka wait rahega .....

अनूप शुक्ल said...

सही है लिखते रहिये किस्से।