Tuesday, May 15, 2007

शूद्रों के बुद्ध और ब्राह्मणों के राक्षस

संघ,सुदर्शन और साम्प्रदायिकता -२
एक सवाल है कि हिंदू शब्द को क्या समझा जाय ? आख़िर हिंदू क्या है और कैसे बन गया ? हिंदू शब्द के बारे मे कुछ कहने से पहले या स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यह शब्द इस्लाम के भारत मे आने से पहले के किसी ग्रंथ या शास्त्र में नही मिलता। दरअसल यह शब्द अरबी लोगों ने भारत के लोगों को पुकारने के लिए प्रयोग किया क्योंकि भारत का यह इलाका हिंद भी कहलाता था। यानी कि हिंदू और हिंदुत्व की जो भी अवधारणा है, वह पूरी की पूरी विदेशी लोगों द्वारा बनाईं और दीं गई है। और इसी विदेशी अवधारणा का सहारा संघ ने लिया और इसे कहा कि सभी तो हिंदू हैं। वह भी जिनके वंशज बाहर से आये हैं।
आर्य भी तो बाहर से आये थे !!
हिंदू और आर्य , ये दो शब्द संघ की शाखाओं मे धड़ल्ले से प्रयोग किये जाते हैं। अब दूसरे शब् , जिसे आर्य कहते हैं और जिसे कथित हिंदुत्व के कथित ठेकेदार कहते हैं हम आर्य हैं और इस देश के मूल निवासी हैं। आर्यों का मूल निवास स्थान कभी भी भारत नही रहा। वो बाहर से आये। लोकमान्य तिलक ने अपनी किताब आर्कटिक होम ऑफ़ दी वेदाज में बताया है कि आर्यों का मूल निवास स्थान आर्कटिक था। हालांकि काफी सारे लोग इससे सहमत नही हैं तो भी इस बात से तो सहमत हैं ही कि आर्यों का मूल निवास स्थान भारत नही था। यहाँ तक कि हड़प्पा और सिंधु सभ्यता की खोज करने वाले राखालदास बनर्जी और माधोस्वरूप वत्स जैसे लोगों ने भी आर्यों की संस्कृति को हड़प्पा और सिंधु से अलग बताया है। यानी कि आर्य सिंधु सभ्यता के नही थे। अब न तो हिंदू रहे सिंधु के और ना ही आर्य रहे आर्यव्रत के। पता नही सुदर्शन का क्या होगा ?

अब थोडा सा अबाउट टर्न लेते हैं और आते हैं बुद्ध की तरफ। बुध्धम शरणं गच्छामी। हमारे कई सारे मित्रों ने विरोध किया कि बुद्ध को मत बांटो। और भी कई बातें कही थी लेकिन उनका जिक्र यहाँ बेमानी है। उन सबके जवाब मैं देने की कोशिश कर रहा हूँ।
तो प्रिय मित्रों। बौद्ध तो कभी हिंदू थे ही नही। और यहाँ एक बात और साफ हो जानी चाहिऐ कि बौद्धों से पहले कोई हिंदू शब्द या हिंदू धर्म था। इसके बारे मे मैंने पहले ही साफ कर दिया है। बौद्ध धर्म हिंदू धर्म के अन्तर्गत नही आता , इस बात को समझने से पहले हमे वर्ण व्यवस्था का वह समाज जो बुद्ध के पहले था, उसे समझना जरूरी है। बुद्ध के आने से पहले पूरा समाज चार वर्णों मे बटा हुआ था और दुर्भाग्य से आज भी बटा ही हुआ है, कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नही आ गया है। पहला ब्रह्मण , दूसरा क्षत्रिय तीसरा वैश्य और चौथा शूद्र। इन सारे वर्णों के कार्य विभाजन को तो आप अभी भी समझते ही होंगे। इनमे से दो वर्ण , यानी कि वैश्य और शूद्रों कि स्थिति का अध्ययन करने पर पता चलता है कि शूद्रों और वैश्यों की स्थिति बहुत खराब थी लेकिन उनमे से भी शूद्रों की स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब थी। इनकी जनसँख्या सबसे ज्यादा थी फिर भी समाज की सबसे ज्यादा प्रताड़ना इन्होने ही झेली। शाशक वर्ग जो कि क्षत्रिय और ब्राह्मण थे , उनके लिए ये जानवर ही थे। इस वर्ण विभाजित समाज में बुद्ध ने एक नया धर्म दिया जिसका मुख्य आधार ही समानता थी। यह उस वर्ण विभाजित समाज के मुखियाओं के विरुद्ध एक विद्रोह था। ये उस समय की क्रान्ति थी। जिसने पूरा समाज ही उलट डाला। ये वही धार्मिक क्रान्ति थी जिसकी बात बाबा साहेब अम्बेडकर करते हैं। और जिसकी आवश्यकता क्रान्ति के पूर्व की धार्मिक क्रान्ति के रुप मे बताते हैं। उस समय की क्रान्ति के लिए माहौल तैयार किया वर्ण व्यवस्था ने , जिससे कि लोग बुरी तरह से उब चुके थे। एक बात और साफ हो जाय कि शूद्र हिंदू नही थे बल्कि उनका तो कोई धर्म ही नही था। वो तो जानवर माने जाते थे।

जारी है ....

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