Sunday, May 6, 2007

कौसर की अजन्मी बेटी के नाम

अंशु मालवीय
मैं नही जानता कि अंशु कौन हैं , पता लगाने की सोची लेकिन मेरे फोन मे बैलेंस ही नही था . लेकिन इसे पढने के बाद...मुझे "हिंदू" शब्द गाली लगने लगा है, आख़िर किस तरह मैं इसे अपने से नोच कर फेंकू...किस तरह से.... और "हिंदू" गाली लगने लगा ही नही है , महसूस हो रह है कि मैं खुद एक गाली ही हूँ....


सब कुछ ठीक था अम्मा
तेरे खाए अचार की तरह
तेरी चखी हुई मिटटी
अक्सर पन्हुचते थे मेरे पास..... ।
सूरज तेरी कोख से छ्न कर
मुझतक आता था।

मैं बहुत खुश थी अम्मा !
मुझे लेनी थी जल्दी ही
अपने हिस्से की सांस
मुझे लगनी थी
अपने हिस्से की भूख
मुझे देखनी थी
अपने हिस्से की धूप।

मैं बहुत खुश थी अम्मा !
अब्बू की हथेली की छाया
तेरी पेट पर देखी थी मैंने
मुझे उनका चेहरा देखना था
मुझे अपने हिस्से के अब्बू देखने थे
मुझे अपने हिस्से की दुनिया देखनी थी।
मैं बहुत खुश थी अम्मा !

एक दिन मैं घबरायी.... बिछ्ली
जैसे मछली--
तेरी कोख के पानी मे
पानी मे किस चीज़ की छाया थी अनजानी ....
मुझे लगा
तू चल नही घिसट रही है
मुझे चोट लग रही थी अम्मा !
फिर जाने क्या हुआ
मैं तेरी कोख के
गुनगुने मुलायम अँधेरे से निकल कर
चटक धूप
फिर.....
चटक आंगन में पहुंच गयी।

वो बहुत बड़ा आपरेशन था अम्मा!

अपनी उन आंखो से
जो कभी नही खुली
मैंने देखा
बडे बडे डॉक्टर तुझ पर झुके हुए थे
उनके हाथ मे तीन मुँह वाले
बडे बडे नश्तर थे अम्मा....
वे मुझे देख चीखे अम्मा !
चीखे किसलिये अम्मा--
क्या खुश हुए थे मुझे देखकर!

बाहर निकलते ही
आग के खिलौने दिए उन्होने अम्मा...
फिर तो मैं खेल मे ऐसा बिसरी
कि तुझे देखा ही नही--
तूने अन्तिम हिचकी से सोहर गाई होगी अम्मा !

मैं कभी नही जन्मी अम्मा
और इसी तरह कभी नही मरी
अस्पताल मे रंगीन पानी मे रखे हुए
अजन्मे बच्चों की तरह
मैं अमर हो गाई अम्मा!
लेकिन यहाँ रंगीन पानी नही
चुभती हुई आग है!
मुझे कब तक जलना होगा ..... अम्मा !

( कौसर बानो की बस्ती पर २८ फ़रवरी २००२ को हमला हुआ था। वह गर्भवती थी। हत्यारों ने उसका पेट चीरकर गर्भस्थ शिशु को आग के हवाले कर दिया था। इस कविता मे उस शिशु को लडकी माना गया है , कुछ अन्य संकेतों के लिए )

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