Friday, April 27, 2007

पेठिया की पैठ

संदीप कुमार
संदीप वही हैं जिन्होंने पहली बार ‘महानगर की दीवार’ नाम की कविता-टाइप एक चीज के साथ ‘बाजार’ में दस्तक दिया था। गांव से महानगर आने की कसक को कविता के रूप में संदीप ने तब उड़ेला था। पर अब बाजार के बहाने अपने कस्बे के पेठिया को याद कर फिर से तरोताजा हो रहे हैं संदीप।
पने झारखंड के गिरिडीह जिले में साप्ताहिक बाजार को पेठिया कहते हैं। और हटिया भी कहते हैं। (ऐसे राजधानी रांची के करीब हटिया नाम से एक जगह भी है पर इसके नामकरण के पीछे क्या वजह है, मुझे नहीं पता।) मजे की बात ये कि बगोदर कस्बे के मेरे घर के सामने ही पेठिया लगता है। मोटा-मोटी थूकन दूरी पर है मेरे घर से पेठियाटांड़। (थूकन दूरी माने नहीं बूझे...यानि थूक दो तो थक्का वहां तक पहुंच जाए वाली दूरी।) पेठिया लगता है गुरूवार को। हालांकि आज तक मैं ये नहीं समझ पाया कि गुरूवार को इतने नामों से क्यों पुकारा जाता है। वीरवार, जुमेरात, बृहश्पतिवार....। बृहशपतिवार को थोड़ा छोटा करने के चक्कर में हमारे यहां लोग इसे बीफे भी कह जाते हैं। पर हमारे इलाके में इस दिन को एक और नाम दे दिया गया है। और मेरा दावा है कि यह नाम बगोदर से बाहर वालों को शायद ही पता हो। और उस दिन का नाम है पेठिया। यानि हफ्ते के दिन होते हैं...सोमवार (सोमार), मंगलवार (मंगर), बुधवार (बुध), पेठिया, शुक्रवार (शुकर), शनिवार (शनिचर), रविवार (एतवार)। हमारे इलाके कभी आओ तो आपको जानकर हैरत होगी कि अधिकतर लोग बुधवार के बाद वाले और शुक्रवार के पहले वाले दिन को न तो गुरूवार कहते हैं, न वीरवार (ये नाम तो खुद मैं दिल्ली में ही जाना) और न ही बृहश्पतिवार...सीधे पेठिया कहते हैं। कौन दिन है भइया- के जवाब में आपको पेठिया का नाम सुनने को मिलेगा। पेठिया का मतलब गुरूवार और गुरूवार का मतलब पेठिया है हमारे बगोदर के लिए। पेठिया कुछ इस कदर इस कस्बे के लोगों के दिल-दिमाग में बस गया है कि वो इससे हटकर सोच ही नहीं सकते। इसी का असर है कि यहां के लोग गुरूवार नाम के दिन को ही भूला-बिसरा दिए हैं। हालत ये है कि आसपास के इलाकों में भी जिस दिन पेठिया लगता है उस दिन को वहां के लोग भी पेठिया के दिन से ही जानते हैं। जैसे बगल के सरिया कस्बे में लोग पेठिया के दिन का मतलब बुधवार से समझते हैं क्योंकि वहां बुधवार को साप्ताहिक हाट लगता है। और सबसे मजे की बात देखिए कि इन साप्ताहिक हाटों में जो लोग सामान बेचने का काम करते हैं उनके लिए हफ्ते के दिन तो कुछ और ही तरीके का होता है। जैसे साप्ताहिक हाट में दुकान सजाने वाले अगर दो दुकानदार आपस में मिलेंगे तो कहेंगे आज सरिया है...कल बगोदर। यानि आज बुधवार है...कल गुरूवार। बुधवार माने सरिया और गुरूवार मतलब बगोदर। कुछ इस कदर है पेठिया का पराक्रम कि हम देहात वाले तो दिन और कमोबेश दुनिया भी भूल-भाल गए हैं। (...क्योंकि पेठिया ही हमारी दुनिया होती है...इसी दिन हफ्ते भर की तरकारी-खरीददारी सब जो हो जाती है...)

5 comments:

rinku said...

बृहश्पतिवार को पेठिया कहते है जान कर अच्छा लगा....:D

अफ़लातून said...

बहुत सुन्दर आलेख । पेठ मराठी में भी साप्ताहिक हाट/बाजार को कहते हैं,पुणे में शनिवारी पेठ है । वीरवार (बीफै के लिए) होशंगाबाद में भी चलता है । खड़ी बोली से अलग भी एक व्यापक तारतम्य है ।

रंजु said...

गावं की याद दिला दी आपके इस लेख ने ..पर नीचे वाला चित्र देखा तो वापस अपने शहर में आ गये :)अब तो यही अपना हाट बाज़ार है ..:)

अभय तिवारी said...

बहुत अच्छा लिखा है भाई संदीप ने.. और लिखो ऐसे ही..

ravish said...

बहुत अच्छा लिखा है । पेठिया । वाह ।