Wednesday, April 18, 2007

सब कुछ साझा

के पी सिंह

योध्या का एक अर्थ "जिसे युद्घ में ना जीता जा सके" भी बताया जता है। इस धर्म नगरी का अब तक का इतिहास इस अर्थ को सही सिद्ध करता आया है। युद्घ तो युद्घ , अयोध्या के प्रेम में भी वह विजयनी ताकत है कि इससे खिंचा जो भी यहाँ आया, इसके पाश में बंधा और यही का होकर रह गया। छूटने की याद तक नही आयी उसे।
जानते हैं क्यों ? दरअसल अयोध्या के स्वाभाव में ना तो ऐसा ठहराव है कि सदियों पर सदियाँ बीतती जाएँ और वह वक्त के साथ कदम से कदम मिलाने के बजाय उसके किसी एक सिरे को पकड़कर बैठी रहे और न ऎसी कर्कशता कि लोग पास आते भी डरें। इसके निकट धर्म जड़ता का नही अँधेरे से प्रकाश की ओर चलने और सत्य के लिए कोई भी मार्ग बंद न करने का पर्याय रहा है। मतों और मतान्तरों के लिए यहाँ जितनी गुन्जायिश है, शायद ही कहीँ और हो। आज भी, अयोध्या को सीमाओं मे क़ैद करने की कुछ लोगों की अह्निर्ष कोशिशों के बावजूद इसकी यह तस्वीर न तो बदली है न धुंधली पडी है,न ही इसके प्रति प्रेम के सोते सूखे हैं।
यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में जब राम जन्म भूमि - बाबरी मस्जिद विवाद को तूल देकर न सिर्फ अयोध्या बल्कि समूचे देश के सुख और सौमनस्य को चोट पंहुचाकर तमाम तरह के उधेलन पैदा किये जा रहे थे, अयोध्या-फैजाबाद के लोग एक मुस्लिम शायर की जुबानी उसकी यह पंक्तियाँ सुन और गुन रहे थे,"तुम कहो,कहते अगर रामजन्मभूमि है। भाई ये पाक जमीं हमने भी तो चूमी है। " क्या अर्थ हुआ इसका? यही न,कि क्या हुआ जो हमारी पूजा पध्यतियाँ अलग अलग हैं,कोई मंदिर में जाता है और कोई मस्जिद में, इस भूमि की पवित्रता को लेकर हमारी एक ही राय है। दोनो के लिए यह इबादत की ही जगह है। फिर इबादत को लेकर झगडे क्यों ?
(जारी...)

1 comment:

कुमार आशीष said...

तुम कहो,कहते अगर रामजन्मभूमि है। भाई ये पाक जमीं हमने भी तो चूमी है।
बहुत उम्‍मीदों को समेटे हुए है यह शेर।