Saturday, April 21, 2007

जाओ !! तैर के आओ ।

खैर , किसी तरह रास्ता कटा और हम लोग नयाघाट पंहुचे। क्या हुजूम था वहाँ लोगों का। जबर्दस्त !! जिधर देखो सर ही सर। हमने तय किया कि पहले नदी में नहा लिया जाय। क्योंकि नदी और उसका पानी देख मुझे बिल्कुल भी रहा नही जा रहा था। हमने अपने कपडे उतारे और नदी की तरफ बढ़े। पहले पतारू घुसा। घुसते ही उसके मुँह से माँ की एक भद्दी सी गाली निकली और उसने अपना हाथ नदी के अन्दर कही डाला । जब हाथ बहार निकला तो उसके हाथ मे गणेश की एक मूर्ती थी जिसकी सूंड की जगह लोहे की पतली सी एक सींक दिखाई दे रही थी। हम समझ गए । दरअसल वह सींक पतारू के पैरों मे घुस गयी थी। और वह चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था , ' साले!! माँ..... । यही जगह मिलती है इनको मूर्तियों को फेंकने के लिए। ' गरियाते हुए वह बहार निकला और अपना पैर पकड़कर बैठ गया। उसके पैर से ख़ून निकल रहा था। बोला , अब मैं आगे कैसे चलूँगा? मैं बोला तू यहीं बैठ और आसपास का नज़ारा ले। थोड़ी देर मे दर्द ठीक हो जाएगा। तुझे नदी मे बचा कर पैर रखने थे। सीधे तैरना शुरू कर देना था। वो बोला ठीक है , तुम लोग जाओ , तैर कर आओ। मैं यही बैठकर सबके कपडे देख रहा हूँ। सो मैंने और कल्लू ने उसे कपड़ों के पास छोड़कर नदी में एक लंबी छलांग लगाईं और तैरते हुए तकरीबन तीन चार सौ मीटर आगे निकल गए। वहाँ से देखते हैं तो पतारू जी महाराज ध्यानमग्न हुए नदी मे खडे हैं और सिर्फ उनका सर ही दिखाई दे रहा था। हमने समझ लिया कि माजरा क्या है। तेजी से तैरते हुए हम वापस आये और तीनो सर जोडे वही देखने लगे जो थोड़ी देर पहले पतारू देख रहा था। ये एक गोरी चिट्टी लडकी थी जिसने कपडे तो पहने हुए थे लेकिन अन्दर के कपडे नही पहने हुए थे। हम उसे डुबकी लगाते देख रहे थे। तभी मुझे लगा कि कोई देख तो नही रहा है हमे ॥ सो अपना सर नचाया और चारों तरफ देखा। कोई नही देख रहा था। सब उसी को देख रहे थे और कईयों के तो मुँह भी खुल गए थे।

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