Sunday, April 15, 2007

हिंदू होने के फायदे


मिलेट्री वाले मैदान मे पतंगो की बाजी हो रही थी । जबरदस्त । एक से एक पतंगबाज पता नही कहॉ कहॉ से आये हुए थे। इसी बीच मांझा लूटने वालों मे भी जबरदस्त बाजी हो रही थी कि कौन ज्यादा से ज्यादा लूट ले जाये। मैं, पतारू,कल्लू, घम्मड़,तबरेज़ ,अगम और पिंटू अपनी तेज़ नजर से मंझे का उतार चढ़ाव देख रहे थे। कल्लू और पतारू ने अब तक सबसे ज्यादा मंझा लूट लिया था। कल्लू मैदान से एकदम सटी हुई झोपडियों में रहता था जिसे हम लोग तकिया कहते थे क्योंकि सारे मुसलमान वही रहते थे । कल्लू अक्सर मंझा लूटता रहता था। पतारू भी उसी के साथ रहता था। इसलिये उसके पास भी ज्यादा मंझा था। पतारू और कल्लू स्कूल नही जाते थे । पतारू का तो स्कूल मे नाम लिखा था लेकिन कल्लू का नही। घम्मड़ और तबरेज़ का नाम भी स्कूल मे नही लिखा था। ये भी एक कारण था उनके ज्यादा मंझे लूटने का। मैं बड़ा निराश। मेरे पास बस ३ तिकल्ला मंझा और २ तिकल्ले सद्दी ही हो पायी थी। मैंने पतारू से कहा कि कुछ मुझे भी दे दे लेकिन उसने मना कर दिया। कल्लू से कहा तो उसने काफी ना नुकुर करते हुए आख़िर मुझे १ बड़ा तिकल्ला लाल वाला मंझा दे दिया। मैं बड़ा खुश। सीना फुलाते घर पंहुचा। घर पर अली हुसैन की अम्मा और मेरी अम्मा सर जोडे बैठी हुई थी। अली हुसैन भी उसी झोपड़ी मे रहता था जिसमे कल्लू रहता था। दरअसल अली हुसैन कल्लू का चाचा था। उन्हें फुसफुसाते देख मैंने बाबू से पूछा कि क्या बात है ? उन्होने ने बताया कि अली के अब्बा और अम्मी हज जाने वाले हैं। पूरा मुहल्ला पैसा देगा । चन्दा इकट्ठा होगा तब ये लोग जायेंगे । मैंने पूछा क्यों ? क्या इनके पास पैसा नही है ? तो बाबु ने बताया कि ये लोग बहुत गरीब हैं। अली अभी कुछ खास काम करता नही और अली के बडे भाई ने अभी अभी तो दर्जी का काम शुरू किया है। मैंने कहा, अच्छा , तभी कल्लू , तबरेज़ और घम्मड़ स्कूल नही जाते । मैंने देखा, अम्मा ने अली की अम्मा को पचास रुपये दिए। मैंने फिर बाबु से पूछा कि हज का किराया कितना होगा ? बाबू ने बताया, यही कोई १५- २० हज़ार रुपये। मैंने उनसे पूछा कि फिर ये लोग कैसे जायेंगे? बाबू ने कहा कि होगा कोई जुगाड़ । और जब उसके घर से बुलावा आता है तो आदमी किसी ना किसी तरह से जुगाड़ कर ही लेता है । मुझे नही समझ मे आया। मैंने फिर पूछा , कैसे? बाबू ने बताया , इन्हें मुसलमान होने के नाते हज जाने कि और भगवान कि पूजा करने मे छूट मिल जाती है । वहीँ से कोई जुगाड़ करेंगी अली हुसैन की अम्मा। मैंने कहा कि हम लोग तो हिंदु हैं । हमे कोई ऎसी छूट क्यों नही मिलती ? बाबु ने बताया कि मिलती है , लेकिन वो अलग तरीके से मिलती है । तभी तो देखो , अयोध्या मे इतने लोग मजे लूट रहे हैं । इनमे सरकारी भी होती है और ग़ैर सरकारी भी । सरकारी ऐसे , कि हर साल हमारे देश से जितने भी लोग हज जाते हैं , उससे कहीँ ज्यादा खर्च हमारी सरकार का होता है हमारे मंदिरों कि सुरक्षा मे। जैसे अगर कुम्भ हो तो उसमे बहुत साड़ी गाडियां चलायी जाती हैं जिसमे शायद ही कोई टिकट लेकर चलता हो , या फिर जैसे अपनी अयोध्या में राम नवमी का मेला लगता है , उसमे सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं । और जन्म भूमि को ही देख लो। सरकार के पास बजट नही है लेकिन महीने का पता नही कितना करोड़ रुपये सिर्फ उन जवानों को तनख्वाह देने मे ही खर्च हो जाता है जो उसके आस पास मटर गश्ती करते रहते हैं ।
जारी है .....

1 comment:

ravish said...

आपकी ये कहानी बिना मोहल्लानुमा बहसों की कड़वाहट के समझ पैदा कर रही है । अच्छे संस्मरण है आपके । बहुत पसंद आई ।
रवीश कुमार
कस्बा से