Sunday, April 15, 2007

ये तालिबानी नही तो और क्या हैं?

कहते हैं प्रेम का मतलब सिर्फ प्रेम ही होता है और कुछ नही । लेकिन भोपाल मे ससुरे संघियों -बजरंगियों ने इसका मतलब धर्म से जोड़ दिया है। भोपालय में नही बल्कि सभी जगह इनका असंवैधानिक हस्तक्षेप जारी रहता है। अब तो आगे से चढ्ढी पहनने के लिए भी इनसे पूछना होगा कि वी आई पी वाली पहने या पटरे वाली । प्रेम पे फतवे जारी कर रहे हैं। और अगर अभी इनसे कहो कि भैये , तनिक ये बताओ कि जब नोयडा के बाझेडा ख़ुर्द में किसानो के ऊपर गोली लाठी बरसाई जा रही थी तब ये कहा थे ? विदर्भ मे किसान मरते हैं तो ससुरे ऐसे ग़ायब होते हैं जैसे गधे के सर से सींग। लेकिन जैसे ही वैलेन ताईन बाबा का दिन आता है, इनकी सींग पता नही कहॉ से निकल आती है, और वो भी पूरे जोश के साथ।या फिर यु पी मे चुनाव आता है तो इन्हें मेरी अयोध्या, जो इनकी तो कभी भी नही रही , वहाँ आकर उत्पात मचाने लगते हैं।बंदरों से भी गए गुजरे हैं । ना तो खुद चैन से जियेंगे और ना ही किसी और को सुकून लेने देंगे। कहते हैं कि हम देश चलाएँगे। कौन सा देश चलाएँगे ये ? एक ऐसा देश जहाँ लोग अपनी मरजी से प्रेम ना कर सकें ? एक ऐसा देश जहाँ लोग अपनी मरजी से शादी ना कर सके ? इनको तो उसी त्रिशूल से (जो ये लोग बाटते हैं ) कोंच कोंच कर इनके भाई तालिबानियों के आश्रम मे भेज दें तब मजा आये। जाएँ वही, पहने बुरका और पहनाये बुरका।

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