Sunday, 15 April, 2007

लड़की हूँ ना

रंजना भाटिया

रंजना कहती है कि लोग बस प्यार भरी कविताएँ ही पढ़ना चाहते हैं , उन्हे ये कविताएँ अच्छी ही नही लगती इस लिए वो ऐसे कविताएँ अपने ब्लॉग मे डालती ही नही , बहर हाल ये कविता उसने मुझे कल भेजी , शायद इसलिए क्योंकि मैने कहा था कि किसी मुद्दे पे लिखो , लेकिन मुझे भी लगता है कि लोगों के पास मुद्दे के नाम पर बस धर्म वग़ैरह ही रह गया है , बाक़ी तो जैसे भुला दिए गये हैं , लेकिन ये भी एक मुद्दा है , जिसे भुलाया नही जा सकता , और ये हमारी सबसे बड़ी बदक़िस्मती है कि इसे मिटाया भी नही जा रहा है , आज रंजना बजार मे खड़ी हैं और चिल्ला के कह रही हैं कि हे महा मर्दों , बेटी हुई तो क्या हुआ ?
गर्भ गुहा के भीतर एक ज़िंदगी मुस्कुराई,
नन्हे नन्हे हाथ पवन पसारे..........
और नन्हे होठों से फिर मुस्कुराई,
सोचने लगी की मैं बाहर कब आउंगी,
जिसके अंदर मैं रहती हूँ
उसको कब" माँ कह कर बूलाउंगी,
कुछ बड़ी होकर
उसके सुख -दुख की साथी बन जाउंगी..
कभी "पिता" के कंधो पर झूमूंगी
कभी "दादा" की बाहों में झूल जाउंगी
अपनी नन्ही नन्ही बातो से सबका मन बहलाउंगी.......
नानी मुझसे कहानी कहेगी, दादी लोरी सुनाएगी,
बुआ, मौसी तो मुझपे जैसे बलहारी जाएँगी......
बेटी हूँ तो क्या हुआ काम वो कर जाउंगी,
पर ये क्या सुन कर मेरा नन्हा हृदय कपकपाया,
मा का हृदय कठोर हुआ कैसे,
एक पिता ये फ़ैसला कैसे कर पाया,
"लड़की "हूँ ना इस लिए जन्म लेने से पहले ही
नन्हा फूल मुरझाया

3 आपकी बात:

yogesh samdarshi said...

सुंदर अभीव्यक्ति है.
बधाई!

yogesh samdarshi said...

सुंदर अभीव्यक्ति है.
बधाई!

SHUAIB said...

अच्छा लिखा है