Tuesday, April 24, 2007

महानगर की दीवार

संदीप कुमार

हजारीबाग से बी ए करने के बाद अपने कस्बे बगोदर (झारखण्ड) से नीम हकीम पत्रकारिता शुरू कर दी। लेकिन नुस्खे झोला छाप नही थे। फिर सोचा कि कहीँ से इसकी डिग्री ले ली जाय नही तो क्या पता कब कहॉ कोई छापा मार दे और लाइसेंस कैंसिल हो जाये। सो आ गए दिल्ली। और सीधे आई आई एम् सी । उसके बाद ठिकाना बना अपना मुम्बई जहाँ स्टार न्यूज़ में कुछ दिन कलम घिसाई की। इन दिनों नोयडा के स्टार न्यूज़ के दफ्तर मे पाए जाते हैं और बकौल संदीप " उसी से खिचड़ी-चोखा का जुगाड़ हो रहा है" । बजार के लिए इन्होने अपनी एक कविता भेजी है , जो किसी भी नॉर्मल आदमी की एब्नोर्मल बनाने की प्रक्रिया को काफी आसानी से व्यक्त करती है।



गाँव से जब आया था
"सॉरी थैंक्स" के आगे

कुछ नही जानता था

मेरी एक दोस्त कहती थी

तेरे पास तमीज नही

बात करने की

सलीका नही

उठने बैठने का

असर उसकी सोहबत की

या फिर हवा इस महानगर की

मालूम नही

पर अब गाहे बगाहे

मुँह से निकलता है-

शिट या फक

मेरी दोस्त हंसती है

उसके गाल में गढ्ढे पड़ते हैं

और कहती है

गंवार ! कुछ सीख रहा है

आज आलम यह है कि

जब अकेले में भी छिंकता हूँ

तो "सॉरी" कहता हूँ

क्योंकी सुना है कि

महानगरों की दीवारो की भी

आंखें होती हैं

वो पहचान लेती हैं

कि ये गाँव का गंवार है ।

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