Wednesday, March 14, 2018

आदमी अगर पाजामा है तो औरत पेटीकोट

आदमी अगर पाजामा है तो औरत पेटीकोट। और यह बात मैं आदमी और औरत, दोनों को हाजिर नाजिर मानकर कह रहा हूं। यह मजाक नहीं है, बल्कि उतना ही बड़ा सत्य है, जितना बड़ा पाजामा होता है, या फिर पेटीकोट। जिस तरह से पुरुष कभी भी पैंट से बाहर आकर पाजामा बन जाता है, उसी तरह से औरत भी पेटीकोट बन जाती है। बाहर आने की बात इसलिए गोल कर रहा हूं कि किसी के मन में शील-अश्लील लड्डू न फूटने लगें। आदमी को पाजामा कहने की हिम्मत हर किसी में होती है और जिसमें नहीं होती, उसमें आदमी पाजामा पहनकर पैदा कर देता है। औरत को पेटीकोट कहने की हिम्मत किसी में नहीं होती, मगर जिस तरह से महात्मा गांधी ने चौरीचौरा के बाद असहयोग आंदोलन स्थगित करने की हिम्मत दिखाई थी, उसी तरह से मैं भी आज औरत को पेटीकोट कहने की हिम्मत दिखा रहा हूं। पेटीकोट नहीं दिखा रहा हूं, वो मेरे पास नहीं है। पाजामा है, और हिम्मत भी। जिस किसी ने देखना या देखनी हो, आए और छूकर देख ले।
रात रिक्शा किनारे-किनारे चला जा रहा था कि एक औरत पीछे से हॉर्न बजाने लगी। यह भी नहीं कि एक-दो बार बजाकर चुप हो जाए और कम से कम रिक्शे के किनारे होने तक वेट कर ले। औरत थी कि लगातार हॉर्न बजाती ही जा रही थी। मैंने रिक्शेवाले को डांटकर तुरंत रिक्शा किनारे कराया तो उसी तरह से हॉर्न बजाते हुए औरत आगे निकली। आगे स्पीडब्रेकर था। मैंने रिक्शेवाले से कहा- देखना, अभी ये स्पीडब्रेकर देखकर भी हॉर्न बजाएगी। और सचमुच उसने स्पीडब्रेकर देखकर हॉर्न बजा ही दिया। रिक्शेवाला खिलखिलाने लगा। मैंने कहा- बेटे, अभी कोई आदमी इस तरह से करता तो तुम उसे क्या कहते? वह बोला- पागल कहता। मैंने पूछा- पाजामा न कहते? खी-खी करते हुए वह बोला- पाजामा तो जरूर कहता और दो चार होते तो नाड़ा भी खींच देते। मैंने कहा- बेटे, इस औरत को रोककर पेटीकोट कहकर दिखाओ। हीही करते वह बोला- कहने का तो बहुत जोर से मन हो रहा है, मगर कह दिया तो मेरा पाजामा फाड़ दिया जाएगा।
आगे पहुंचा तो पीछे से चार चार आदमी हॉर्न बजाने लगे। बजाते हुए वह कार की सीट पर से ही उछल-उछलकर देख रहे थे कि आगे जाने का रास्ता आगे है या पीछे तो नहीं छोड़ आए? मुझे चार-चार पाजामे दिखे। मैंने फिर रिक्शेवाले को चढ़ाया- अबे, पेटीकोट नहीं बोला था, अब पाजामा तो बोल दे। रिक्शावाला जोश में आ गया। चारों जब ओवरटेक करके निकलने को हुए तो उसमें से वह दो से बोलने को पा गया- अबे आदमी हो या पाजामा? उधर जिसने पाजामा सुना, वह मुंह से नाड़ा निकालता हुआ भागा। भागा इसलिए क्योंकि भागने के अलावा और कोई चारा न था। रात मैं इस बात का प्रत्यक्ष गवाह बना कि पुरुष जब पाजामा पहनकर भागते हैं तो उनमें मुंह में नाड़ा होता है, जो बाहर निकलता रहता है। वैसे बाज दफे मैंने यह नाड़ा पेटीकोट से भी निकलता देखा है।
आदमी का पाजामा मैचिंग हो या न हो, औरत का पेटीकोट जरूर मैचिंग होता है। आदमी जब पाजामा बनता है तो वह मिसमैचिंग नाड़े दिखाता है। किसी की सिलाई में गहरी मैल जमी होती है तो फुंदे साफ होते हैं, तो किसी के फुंदे दातून की तरह कूंचे होते हैं और सिलाई उधड़ी होती है। औरत जब पेटीकोट बनती है तो कसम से बता रहा हूं, न मैं पेटीकोट देखता हूं और न ही उसका नाड़ा। मानता हूं कि मैं बहुत कुछ देखता हूं, लेकिन मैं यह कभी नहीं मानूंगा कि मैंने पेटीकोट देखा है। गीता पर हाथ रखवाएंगे, तो भी नहीं मानूंगा। हां, आकांक्षा या श्वेता पर हाथ रखवाएंगे तो मान जाउंगा। लेकिन तब भी इतना ही मानूंगा कि कोट देखा है- पेटी और नाड़ा नहीं देखा। पूरी बात मनवाने के लिए सविता को सामने लाना पड़ेगा और मेरे कान में फुसफुसाना पड़ेगा कि- अबे भाभी हैं भाभी!
खैर, यह तो मजाक की बात हुई। असल बात तो यह है कि हम आदमी को तो पाजामा कह देते हैं, औरत को पेटीकोट क्यों नहीं कहते? इसका जवाब भी मुझे एक रिक्शेवाले ने दिया। उसने मुझे बताया कि आदमी को कितनी भी गाली दो, उसके पाजामे का नाड़ा भी खोल दो, वह रहेगा पाजामा ही। मगर औरत को कितना भी पेटीकोट बोलो, नाड़ा खोलो या न खोलो, या नाड़े की ओर देखो ही मत, फिर भी वह रहेगी औरत ही। कह सकते हैं कि पुरुष हमेशा पाजामा बना रहता है, मगर स्त्री कभी-कभार ही पेटीकोट बनती है। फिर भी बनती तो है। और चूंकि वह बनती है, इसलिए दुनिया में एक अज्ञात जगह पर बैठकर मैं लिखता हूं कि आदमी अगर पाजामा है तो औरत पेटीकोट। 

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