Tuesday, February 20, 2018

समेट लो अपना अपना आलता


याद में कौंधते बियाबानों को भूल जाएं। सांस में आता महुआ बिसरा दें। कान की लौ चुंभलाती गर्म हवाओं को फूंक मारकर उड़ा दें, तो भी बड़ी देर तक सुख का धुंआ धीमे-धीमे निकलता रहता है, बहता रहता है। एक फिल्म है जो चलती रहती है। संगीत है जो बजता रहता है। कागज है, जो उड़ता रहता है। हवा है, जो बहती रहती है। और पैर हैं जो ठहरते रहते हैं। सुख की चौखट किस चौखट है, किस देहरी है, किस दुआरे है, किस किनारे है? है भी या कौंधते बियाबानों में किसी पीपल के पीछे छुपी है जिन्हें पत्तियों के पीछे से चटकती धूप में मैं नहीं देख पाता? दिखता नहीं है, दिखते की उम्मीद भी नहीं। फिर भी कैसी है ये मेड़, जिसपर गिरते-रपटते चला जा रहा हूं? कहां हैं मेरे धान के खेत?
उस दिन तिवारी जी चुनौटी में रखे दो बुंदे दिखा रहे थे। काली माई के थान पर बैठकर पूरे गांव को सुना रहे थे कि दुनिया में अगर कहीं सुख है तो चुनौटी में है और चुनौटी में रखे दो बुंदों में है। मन तो हुआ कि वहीं दोनों बुंदे छीनकर उसकी सुर्ती बना दें, मगर तेवराइन का ख्याल आ गया जो आते जाते गर्म नजरें फेंका करती हैं। ऐसे ही आता है सुख जो नजरों से सहलाकर फिर अपनी चौखट के उस पार जाकर मुंह पर पल्लू लपेट लेता है। दिखता है, छुप जाता है। छुपकर और भी छुप जाता है।
याद से थोड़ा सा काजल निकालूं? एक टिकुली? आलता? पिछली बार आलता लगाया था। आईसीयू की उजली चादरें गुलाबी हो गई थीं। भागी-भागी नर्स आई और बोली- पैरों से तो रंग निकल रहे हैं। ऑक्सीजन मास्क निकालकर बोला- सुख निकल रहा है सखी। देखकर बताओ- पूरा तो निकल गया ना? बोलती है- थोड़ा बाकी है। नाखून बड़े हो गए हैं।
चैत आने वाला है। कहां है तुम्हारी चुनरी? तेवराइन, तुम भी अपनी धोती लाओ। अभी मेरे पैरों में थोड़ा सा सुख लगा हुआ है। पैतानों पर मसलते-मसलते किनारे तो कोरे हो गए, पोरों में अभी भी रंग बचे हैं। लो, रंग लो अपनी चुनरी। भिगो लो अपनी धोती। इससे पहले कि नदी पार करते-करते सब धुल जाए, समेट लो अपना अपना आलता।

मिलेगा तो देखेंगे- 22

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