Sunday, July 19, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 14

फि‍र वही। फि‍र से वही सपना। बदलता भी नहीं, रुकता, संभलता या थोड़ी दूर कहीं टहलता भी नहीं। आता है तो आता रहता है, बार बार। एक ही वक्‍त में कई खि‍ड़कि‍यां, कई रोशनदानों से सीधा घुसा चला आता। साथ में इतना उजाला लाता कि गहरी नींद में भी नींद खुल जाए। आदमी परेशान था। हर रोज बगैर कि‍सी इजाजत या मुरव्‍वत के ये सपना उसे लगातार आता जा रहा था। एक ही चीज बार बार दि‍खती थी। हर बार नींद तोड़कर जाती थी। कि‍सी तरह का नशा हो, थकान हो, मरन हो लेकि‍न सपना था कि पीछा ही नहीं छोड़ता था। बार बार इसका आना अभी तक आदत नहीं बन पाया था। वैसे आदमी इसके आने के हरएक रास्‍ते से पूरी तरह वाकि‍फ था। हर रात तीन से चार बार ये आता और आदमी पैर पर पैर मसलते हुए करवट बदलते हुए आधी नींद तक पहुंचता और फि‍र परेशान होकर आधी बची नींद भी पैताने से धीरे से मसल देता। असल में मसल तो सपना रहा था। नींद को या आदमी को, ये भी आदमी अच्‍छी तरह से जानता था। 

सपना असल में सपना ही था। सबकुछ उसमें उड़ता था। घास, पत्‍ति‍यां, कपड़े, दुपट्टे, रूमाल, टोपि‍यां, आवाजें, झंडे, कुर्सियां, कंप्‍यूटर, माउस, ब्राउजर, बाल, खुशबू, उजाला, धूप... सबकुछ उड़ता था और आकर आदमी के चेहरे पर दस्‍तक देता रहता, अक्‍सर तो थपेड़े लगाता रहता। हर दस्‍तक पर वही बेचैनी, हर थप्‍पड़ पर वही बेहोशी और हर अंधेरे में वही खुशबू। एक आवाज सुनाई देती जो 'हूं' से ज्‍यादा न होती, पर होती तो दो तीन बार होती। कभी उड़ान ज्‍यादा गहरी होती तो कभी आवाज भारी होती जाती। कभी बाल चेहरे पर आए पसीने से चि‍पक जाते तो कभी उड़कर खुशबू फैलाते। सपने की वो खुशबू आदमी को नींद के उसी ढलान पर लाती, जहां से वो न फि‍सलना चाहकर भी फि‍सलकर गि‍र पड़ता। हर बार वही आवाज, हर बार वही दस्‍तक, हर बार वही बेचैनी और बेहोशी, हर बार वही खुशबू। आदमी जानता था कि खुशबुएं कैसे बदलती हैं, दस्‍तकों की आवाज कैसे कम होती है, बेचैनी और बेहोशी कैसे खपती हैं और... और सपने कैसे बदलते हैं। 

आदमी कि‍तना कुछ तो जानता है जो औरत बताती रहती थी। न जाने क्‍या क्‍या... वो बातें उसके सपने में नहीं आतीं।

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