Tuesday, December 29, 2015

मिलेगा तो देखेंगे - 16

आने के अपने रंग थे और जाने के अपने रंग। अपने आप में यूनीक। अपने आप में ही घुलते जाते। दुनि‍या थी कि स्‍थि‍र हुई जाती थी, आदमी था कि सपनों के सत्‍तर रंगों पर बि‍छलाता तैरता जाता था। सांस तो थी लेकि‍न उसे लेने की जरूरत नहीं थी। औरत सामने वलय में केंद्रि‍त खड़ी थी पर उसे भी देखने की जरूरत नहीं थी। समय के उस हि‍स्‍से का सारा चेतन जड़ गया था। पेड़ों के पत्‍तों ने गि‍रने के लि‍ए पतझड़ का इंतजार करना बंद कर दि‍या था। नदी बहने से पहले बनाई जाने लगी थी। पक्षी उड़ने के पहले उकेरे जाने लगे थे। घड़ि‍यां थीं कि गल गल कर गि‍री जाती थीं और बार बार इसी टपकनवस्‍था में कि‍सी पेड़ से या गि‍रि‍जे के पेंडलुम से लटकी नजर आती थीं। सि‍तारे रात पर जो रेखा खींचते थे कि दस साल पहले का पीला चांद दोनों हथेलि‍यों में लेकर भी अपनी वो खुरदुराहट और गड्ढे जि‍स बेकदरी से छुपाता था, उसका कहीं कोई चि‍त्र उन सि‍तारों ने बनाने से ही मना कर दि‍या। आदमी था कि बार बार उड़ने की बात करता था और बार बार अपने उसी गड्ढे में गि‍रा पड़ा रहता था, जो उसे पैताने पर पैर मसल मसलकर बेवक्‍त जगाता रहता था। 

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