Friday, December 11, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 15

उन ढलानों की याद जि‍नपर हम कभी फि‍सले, उन मैदानों की भूल जि‍न पर हमने चलने की कोशि‍श की और उस पानी की महक जि‍नमें हमने कभी तैरना चाहा, सब मि‍लाकर तुम्‍हे मि‍टटी की वो महक कर देते हैं जो हर बूंद पर बरबस नाक में घुस ही जाती है। बरसात की वो बूंद जो सि‍मटी पड़ी है, तुम्‍हारे बहने पर बहती दि‍खती काइयों की तरह अपार में हि‍लती तो दि‍खती है। वही तो अपार होता है जि‍सके बीच गति है। जि‍सके बीच समग्र समयांतर है जो खुद के फासलों को खाते चबाते है। तुम्‍हारी गति की शांति मैं कैसे महसूस करूं जबकि मैं पानी के बाहर बैठ तुमको ताकता हूं। तुम्‍हारी शांत क्‍लांत अवस्‍थाओं को मैं कैसे महसूस करूं जबकि मैं उन सबसे बाहर हूं।
आदमी झूठ बोलना चाहता था। आदमी अपने आस पास की तरह होना चाहता था। आदमी पत्‍थरों को देख पत्‍थर तो पानी को देख पानी होना चाहता था। आधारभूत समस्‍या उसके खुद आदमी हो जाने की थी। भूत की समस्‍या उसके आदमी का अंत कर देने की थी और जो कुछ भी नहीं था, वो एकमात्र वो आदि था जि‍सके बीच का एक भी सि‍रा आदमी के हाथ न आ पाया था।
ये बीच का सि‍रा ही तो है जो बीच में हाथ आ जाए तो आदि और अंत दोनों ही सध जाते हैं। सधने के लि‍ए जो होना होता है औरत बखूबी जानती थी। सध पाने के लि‍ए कि‍तना औरत होना होता है, आदमी ने भी सब का सब शुरू से ही पढ़ रखा था। सधी सीधी रेखा पर औरत चलती चली जाती थी और प्रस्‍थान बिंदु पर हि‍लता आदमी उसे जाता देख उसका औरत होना सीखने की व्‍यर्थ कोशि‍श करता रहता। आदमी सुस्‍थि‍र हि‍लन में स्‍वयं को गति‍मान समझ गुनगुनाता था। औरत सधी गति से सीधे चलती जाती थी।

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