यूपी के नारंगियों की पैट गीली कर देते हैं ये जज साहब, चाहे वे नेता हों, या अफसर
यूपी में है संभल। वही संभल, जहां नागपुरी संतरे का गदाधारी सीओ मुसलमानों को गदा दिखाता धमकाता घूमता था। इसी संभल का डीएम है राजेंद्र पैसिया और एसएसपी है केके बिश्नोई। मामला ये हुआ कि इन दोनों को या तो सपना आया, या किसी नागपुरी संतरे ने ऑर्डर दिया कि वहां की एक मस्जिद में मुसलमान रमजान की नमाज शांति से न पढ़ पाएं। फिर क्या था, दोनों ने मिलकर ऑर्डर निकाला कि खबरदार अगर 20 से ज्यादा मुसलमानों ने वहां पर नमाज पढ़ी। तानाशाही फरमान के विरोध में मुनजिर खान इलाहाबाद हाई कोर्ट चले गए। अब इसे पैसिया और बिश्नोई की बदकिस्मती कहें या कायदा-कानून के शासन की किस्मत, मामला जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच में सुनवाई के लिए चला गया। अब दोनों माननीय जजों की बेंच ने जो कहा, उसके बाद तो कायदे से इन दोनों को इस्तीफा ही दे देना चाहिए था, मगर क्या पता, शायद इनकी चमड़ी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जितनी ही मोटी हो चुकी हो।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एकदम साफ साफ कहा कि अगर तुम दोनों ने कायदा-कानून न संभल पा रहा हो तो इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? चलो, इस्तीफा न सही, अपना ट्रांसफर ही मांग लो। 27 फरवरी को दिए अपने ऑर्डर में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने कमेंट किया कि अगर एसपी और डीएम कानून-व्यवस्था की समस्या की आशंका जताते हैं और महज इसलिए नमाजियों को सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफा दे देना चाहिए या तबादला ले लेना चाहिए, अगर वे कानून के शासन को लागू करने में असमर्थ हैं. ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य के वकील ने कहा है कि कानून-व्यवस्था की कथित स्थिति के कारण नमाजियों की संख्या को सीमित करने वाला ऐसा ऑर्डर पारित किया गया है. हम राज्य के वकील द्वारा रखे गए इस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं. यह राज्य का कर्तव्य है कि वह हर परिस्थिति में कानून का शासन सुनिश्चित करे. अदालत ने आगे कहा, यह राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक समुदाय अपने निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा/इबादत कर सके और जैसा कि अदालत ने पहले भी माना है, यदि वह एक निजी संपत्ति है, तो राज्य से किसी अनुमति के बिना पूजा/इबादत की जा सके.
ये तो खैर एक मामला हुआ। दूसरा मामला भी सुन लीजिए। इसी यूपी के बरेली में कुछ लोग अपने घर में नमाज पढ़ रहे थे। यहां का डीएम है अविनाश सिंह और एसएसपी है अनुराग आर्य। इन लोगों ने अपने घर में नमाज पढ़ने के आरोप में 12 लोगों को हिरासत में ले लिया, जो बाद में जमानत पर छूट गए। मामला फिर गया जस्टिस अतुल श्रीधरन की कोर्ट में। जज साहब ने दोनों को जबरदस्त फटकार लगाई, नमाजियों की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात करने का ऑर्डर दिया और अब 23 मार्च को दोनों को अपनी कोर्ट में तलब किया है। पहुंचें ये दोनों जस्टिस अतुल श्रीधरन की कोर्ट में, वहां इनकी कायदे से नजर उतारी जाएगी। कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट किया है इन दोनों ने क्योंकि जनवरी में ही हाईकोर्ट ने मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ के एक और केस में फैसला सुनाया था कि उत्तर प्रदेश में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी में धार्मिक प्रार्थना सभा करने के लिए राज्य की इजाज़त की ज़रूरत नहीं है। इससे पहले फरवरी में ही जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एक और नागपुरी संतरे के बुलडोजर की हवा निकाल दी थी और कहा था कि बेटे, अब अगर बुलडोजर चलाया तो समझ लो, तुम लोगों की खैर नहीं।
अब चलिए जानते हैं कि इन नागपुरी संतरों ने एक ईमानदार जज के साथ क्या क्या करने की कोशिश नहीं की। कोशिशें तो खैर अब भी जारी ही हैं। जैसा कि पिछले विडियो में बताया था कि मौजूदा सीजेआई यानी चीफ जमीन डीलर ऑफ इंडिया हाई कोर्ट के जजों के ट्रांसफर का नया रूल निकाला है। रूल ये कि वो रिलेटेड हाई कोर्ट में अपना पद संभालने से दो महीने पहले पहुंच जाएंगे। यह रूल सीजेआई सूर्यकांत ने कॉलेजियम की मीटिंग करके बनाया है। इसके तहत पहला ट्रांसफर जस्टिस लीसा गिल का हुआ है, लेकिन इस पॉलिसी के आने के बावजूद जस्टिस एसए धर्माधिकारी को महज एक दिन के नोटिस पर मध्य प्रदेश से ट्रांसफर करके मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। इससे रिलेटेड खबरें आप में से अधिकतर ने देख या पढ़ रखी होंगी। आमतौर पर ये एक आम बात है। किसी को किसी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया जाए, भला इसमें क्या खास बात। ये सब तो राजकाज है। लेकिन इस राजकाज की तह में एक ऐसा कलंक लगा है, एक ऐसी कालिख लगी है, जिसे अगर आप लोग जानेंगे तो पता चलेगा कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम न्याय नहीं, अन्याय का कॉलेजियम है, और पूरी तरह से कॉम्प्रोमाइज्ड है। ये पूरी विडियो आप देखेंगे तो सोचेंगे कि कहीं चीफ जमीन डीलर ऑफ इंडिया की भी तो कोई एपस्टीन फाइल कहीं किसी ने दबा तो नहीं रखी है?
जैसा कि पहले बताया कि जस्टिस एसए धर्माधिकारी इसी महीने महज एक दिन के नोटिस के बाद मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बन चुके हैं। जस्टिस धर्माधिकारी को 7 अप्रैल 2016 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का एडिशनल जज बनाया गया था। ठीक उसी दिन जस्टिस अतुल श्रीधरन भी एडिशनल जज बनाए गए थे। बाद में दोनों जजों को 17 मार्च 2018 को उसी अदालत में परमानेंट जज के तौर पर तैनाती मिली। जब दो जजों की तैनाती की तारीख़ एक जैसी होती है, तो सीनियरिटी बार में शुरुआती दाख़िले की तारीख़ के हिसाब से तय की जाती है। यह बात उनकी मूल हाई कोर्ट में जारी हुए अपॉइंटमेंट वारंट में नामों की तरतीब से भी साफ़ होती है। इस पैमाने के मुताबिक जस्टिस श्रीधरन, जस्टिस धर्माधिकारी से सीनियर हैं। यहीं से सारा खेल शुरू होता है। दरअसल, कोलेजियम के क़रारनामे में यह नहीं बताया गया कि सीनियर होने के बावजूद जस्टिस श्रीधरन को मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफ़ारिश क्यों नहीं की गई। अभी इतना ही नहीं, अभी उस साजिश की भी सुनिए, जो जस्टिस अतुल श्रीधरन के साथ मोदी ने की।
कॉलेजियम की यह ख़ामोशी तब और भी साजिश लगने लगती है, जब हम जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रैक रिकॉर्ड देखते हैं। एक ऐसा जज, जो सिर्फ कानून की मानता है, कानून का इस्तेकबाल करता है। जब जस्टिस श्रीधरन जम्मू और कश्मीर में थे, तब उन्होंने बार-बार पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत की गई प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द किया। बल्कि एक बार तो उन्होंने एक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पर निजी तौर पर जुर्माना भी लगाया, क्योंकि उनके मुताबिक़ वह हुक्म ग़ैर-मुनासिब था। मोदी सरकार जिस तरह से अपनी हर गलती के पीछे अपना पिछवाड़ा नेशनल सिक्योरिटी के पीछे छुपाती आई है, इसे भी उन्होंने आड़े हाथ लिया था। उन्होंने कहा था कि आप जजों को इस तरह से साइकोलॉजिकली डरा नहीं सकते। हर चीज में नेशनल सिक्योरिटी घुसेड़नी ठीक नहीं है।
जैसा कि पहले बताया कि एमपी हाई कोर्ट में जस्टिस श्रीधरन का तबादला मार्च 2025 में हुआ था। इस हाईकोर्ट में वो पूरे सात महीने रहे। उन्होंने अपने 7 महीने के कार्यकाल में कई अहम फैसले दिए हैं, जिसमें से भाजपा सरकार के बेहूदा और भारतीय सेना की बेइज्जती करने वाले मंत्री विजय शाह के खिलाफ 24 घंटे में एफआईआर दर्ज करना था। फिर दमोह में ओबीसी वर्ग के लड़के से पैर धुलवा कर पानी पीने को मजबूर करने वालों पर NSA की कार्रवाई करने के भी ऑर्डर जस्टिस श्रीधरन ने दिए। साथ ही ग्वालियर हाई कोर्ट के जज ने जिला अदालत के जज पर जिस तरह का गंदा कमेंट किया था, उसे भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भेजने का ऑर्डर दिया था। इसके बाद तो शुरू हुआ जस्टिस श्रीधरन की सुप्रीम सजा का दौर। आखिर खाने छुपाने पर सुओ मोटो तक जाने वालों को ये बर्दाश्त कहां होना था।
इसके बाद तो कॉलेजियम में जस्टिस श्रीधरन का जस्टिस मुरलीधर वाला हाल बनाकर रखा है। इसके बाद जस्टिस श्रीधरन के तबादलों का सिलसिला शुरू हुआ। अगस्त 2025 में कोलेजियम ने उन्हें मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ भेजने की सिफ़ारिश की, जहाँ वह हाई कोर्ट कोलेजियम का हिस्सा बने रहते। लेकिन दो महीनों के अंदर ही मोदी को चुल्ल उठी और उसने इस पर दोबारा ग़ौर करने को कहा। कोलेजियम ने भी मोदी को कहा, जी हुजूर, जैसा आप बजा फरमाएं। और फिर उनको छत्तीसगढ़ की जगह इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया, जहाँ सीनियरिटी में उनका नंबर सातवाँ है और वह पूरी तरह कोलेजियम से बाहर बैठते हैं।
इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के कुछ एक जज, जिनकी रीढ़ अभी भी सीधी है, उन्होंने आवाज उठाई। सबसे पहले तो खुद तब सीजेआई रहे जस्टिस बीआर गवई बोले। विरोध में नहीं बोले, लेकिन जी हुजूरी का ये सारा मामला उन्होंने ही खोल दिया, ताकि जो कुछ जानना समझना हो, जनता अच्छे से जान समझ ले। उन्होंने बताया कि जस्टिस श्रीधरन के ट्रांसफर के लिए और उनके करियर में पलीता लगाने के लिए मोदी ने ही कहा था। बीते साल 25 अगस्त को कोलेजियम ने जस्टिस श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने का फैसला किया था. इसके बाद सरकार की तरफ से कहा गया कि कोलेजियम अपने फैसले पर फिर से विचार करे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने अपना फैसला वापस ले लिया. अब जस्टिस श्रीधरन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया जाता तो वह वहां दूसरे सबसे सीनियर जज होते. लेकिन, इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी सीनियरिटी सातवें नंबर पर है.
कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने कहा कि इससे ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ को लेकर चिंता पैदा होती है. सीजेएआर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बयान में इस बात का कोई कारण नहीं बताया गया है कि सरकार ने पुनर्विचार का अनुरोध क्यों किया और कॉलेजियम को सरकार की मांगों पर सहमत होने और अपने निर्णय बदलने के लिए किस बात ने प्रेरित किया.’ सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने जस्टिस श्रीधरन का नाम लिए बिना कहा कि जजों के ट्रांसफर-पोस्टिंग में कार्यपालिका का दखल नहीं होना चाहिए. क्या किसी जज का सिर्फ इसलिए दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर हो जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के लिए कुछ मुश्किल ऑर्डर पास किए थे? बता दें कि पिछले साल भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर किया था. जस्टिस भुइयां ने सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जज के तबादले को 'न्यायपालिका की आजादी में दखल' करार दिया. बड़ी बात ये कि कॉलेजियम ने इस अन्याय के पीछे की एक भी वजह अभी तक नहीं बताई है।
वाज़ेह कर देना चाहिए कि सीनियरिटी को दरकिनार करना अपने आप में कोई ग़ैर-मामूली बात नहीं है। कोलेजियम हमेशा सिर्फ़ सीनियरिटी के अलावा दूसरे पैमानों - जैसे बर्ताव, मिज़ाज और मुनासिबियत - को भी देखते हुए अपना इख़्तियार इस्तेमाल करता रहा है। मुमकिन है कि जस्टिस धर्माधिकारी वाक़ई मद्रास हाई कोर्ट की क़ियादत के लिए सही शख़्स हों। इस चुनाव के पीछे ठोस वजहें भी हो सकती हैं। लेकिन जब वजहें सामने नहीं रखी जातीं, तो हर शख़्स - बार, मुक़द्दमे लड़ने वाले लोग और आम अवाम - अपने-अपने हिसाब लगाने लगते हैं। इस मामले में कहानी कुछ जानी-पहचानी सी लगती है; एक ऐसा जज जिसका रिकॉर्ड आज़ादाना रवैये का रहा है, उसे बार-बार इधर-उधर भेजा गया, कोलेजियम से बाहर रखा गया, और तरक़्क़ी के मौक़े पर नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जबकि ज़िम्मेदार इदारे ने इसके लिए कोई वज़ाहत पेश नहीं की।

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