3 महीने, 510 केस और 508 ज़मानत
पिछले महीने यानी फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में ज़मानत देने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया की जमकर आलोचना की थी। अब एक इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि अक्टूबर से लेकर दिसंबर 2025 के बीच जस्टिस भाटिया की सरपरस्ती वाली सिंगल जज बेंच ने दहेज से जुड़े कत्ल के 510 मामले सुने थे, जिनमें से 508 केस में उन्होंने मुल्ज़िम को ज़मानत मंज़ूर की। इसी दरमियान इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने गुरुवार को एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसमें दूसरी बातों के साथ जस्टिस पंकज भाटिया के रोस्टर में तब्दीली की गई है। आने वाली 23 मार्च से लागू होने जा रहे नए नोटिफिकेशन वाले रोस्टर के तहत जस्टिस भाटिया अब सिविल मामलों की सुनवाई करेंगे।
बता दें कि यह तब्दीली जस्टिस भाटिया के उस हुक्म के कुछ ही दिनों बाद आई है, जिसमें उन्होंने चीफ़ जस्टिस से दरख्वास्त की थी कि आगे उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों का रोस्टर न दिया जाए। जब सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में उनके एक ज़मानत ऑर्डर को “बेहद हैरान करने वाला और मायूस करने वाला” बताया, बस उसी के चार दिन बाद की उन्होंने ये अपील की थी। बीती फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस पंकज भाटिया की उस हरकत पर सवाल उठाए थे, जिनमें वो दहेज हत्या से जुड़े मामलों में लगातार ज़मानत देते जा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को जुर्म की किस्म, सजा की सख्ती, मुल्ज़िम और मरने वाले के रिश्ते, वारदात की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था। अब इंडियन एक्सप्रेस की एक इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि पिछले साल 2025 के आख़िरी तीन महीनों में जिस बेंच की सरपरस्ती जस्टिस पंकज भाटिया कर रहे थे, उसने दहेज हत्या के लगभग तमाम मामलों में मुल्ज़िमों को ज़मानत दी है।
अख़बार की इन्वेस्टिगेशन बताती है कि तीन महीने यानी अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया की सरपरस्ती वाली सिंगल जज बेंच ने दहेज से जुड़े कत्ल के 510 मामलों में से 508 में ज़मानत दी। इसका मतलब है कि उन्होंने कुल मामलों के तक़रीबन 99.6 फ़ीसद में ज़मानत मंज़ूर की। अभी इतना ही नहीं, अभी और सुनिए कि इस खास इन्वेस्टिगेशन में निकला क्या। जो बड़ी बात सामने आई, वो ये कि इन ऑर्डरों की ज़बान और बनावट भी लगभग एक जैसी देखी गई। ज़्यादातर मामलों में ज़मानत के लिए 20-20 हज़ार रुपये के दो ज़मानतदारों के साथ निजी बॉन्ड देने का हुक्म दिया गया। अलग-अलग हालात में मौत होने के बावजूद ऑर्डरों की ज़बान और दलील काफ़ी हद तक एक जैसी थीं। अखबार ने तो ऐसा कोई शक जाहिर नहीं किया, लेकिन इस पूरे वाकिए को जानने समझने के बाद एक सवाल ये भी उठता है कि कहीं एआई यानी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस की तो मदद नहीं ली जा रही थी?
क़ाबिले-ग़ौर है कि 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही ज़मानत ऑर्डर को रद्द करते हुए सख़्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऑर्डर पढ़कर समझ ही नहीं आता कि हाईकोर्ट आखिर क्या कहना चाहता है और इतने संगीन जुर्म में मुल्ज़िम को ज़मानत देने की बुनियाद क्या थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ज़िम की ज़मानत रद्द करते हुए उसे सरेंडर करने का हुक्म दिया।
क़ाबिले-ग़ौर है कि जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की, वह श्रावस्ती जिले की 28 साल की सुषमा देवी की मौत से जुड़ा था। शादी के दो महीने से भी कम वक्त बाद उनका शव ससुराल के बरामदे में मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह गला दबाना बताई गई थी। सुषमा के वालिद का कहना था कि शादी के वक्त उन्होंने 3.5 लाख रुपये नकद दिए थे, लेकिन बाद में ससुराल वालों ने कार की मांग शुरू कर दी थी। इस मामले में सत्र अदालत ने पहले ही ज़मानत देने से इंकार कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने ज़मानत मंज़ूर कर ली।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हुक्म में कहा कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को जुर्म की किस्म, सजा की सख्ती, मुल्ज़िम और मरहूमा के रिश्ते, वाक़िए की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के तीन महीने के अंदर हुई मौत के मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत ख़ास क़ानूनी प्रावधान लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस सख़्त टिप्पणी के कुछ ही दिनों बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से दरख्वास्त की कि उन्हें अब ज़मानत से जुड़े मामलों की ज़िम्मेदारी न दी जाए। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर बहुत “मायूस करने वाला और हौसला गिराने वाला असर” पड़ा है।
अख़बार ने इन मामलों पर जस्टिस भाटिया से प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजे गए सवालों के भी जवाब नहीं मिले।
ज़मानत ऑर्डर में एक जैसी बातों का दोहराव
अख़बार के मुताबिक, जिन 510 मामलों का तजज़िया किया गया, उनमें सब पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज हत्या) या भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 और दहेज निषेध क़ानून की धारा 3 और 4 के तहत इल्ज़ाम लगाए गए थे।
इन मामलों में ज़्यादातर मुल्ज़िम शौहर, सास-ससुर और दूसरे रिश्तेदार थे। कुल मुल्ज़िमों में 362 शौहर, 68 सास और 63 ससुर शामिल थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक 340 मामलों में मौत की वजह फांसी बताई गई, 27 मामलों में ज़हर, 16 में गला दबाना, 11 में जलने से मौत, जबकि कुछ मामलों में सिर पर चोट, दम घुटना या डूबने से मौत दर्ज हुई। छह मामलों में मरहूमा औरतें हामिला भी थीं।
ज़्यादातर मामलों में ज़मानत देते वक्त अदालत ने यह कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साफ सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि मौत से ठीक पहले औरत को दहेज के लिए परेशान किया गया था। यही दलील करीब 253 ऑर्डरों में दोहराई गई।
हालांकि, 510 में से दो मामलों में ज़मानत नहीं दी गई। पहले मामले में औरत के जिस्म का करीब 90 फ़ीसद हिस्सा जल गया था और उसने अपने वालिद को हमले की जानकारी दी थी। वहीं दूसरे मामले में मुल्ज़िम शौहर पर बीवी को गोली मारने का इल्ज़ाम था।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद न्यायिक फैसलों के तरीक़े और संगीन जुर्मों में ज़मानत देने के पैमानों को लेकर बहस तेज़ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी ने भी इस पूरे मामले को और चर्चा के मरकज़ में ला दिया है।
अपने ज़्यादातर ऑर्डरों में जस्टिस भाटिया ने लिखा है कि उन्होंने “दरख्वास्त देने वाले के वकील, एजीए (अतिरिक्त सरकारी वकील) की बात सुनी और रिकॉर्ड का जायज़ा लिया।” इसके बाद उन्होंने आगे एफआईआर नंबर, लगाई गई धाराएं, जेल में रहने की मियाद, दरख्वास्त देने वाले के आपराधिक रिकॉर्ड का ज़िक्र और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला दिया है।
इसके बाद ज़मानत के लिए दलीलें दी गईं और आखिर में ज़मानत की शर्तें दर्ज की गईं।
बता दें कि 253 ऑर्डरों में “मौत से ठीक पहले” परेशान किए जाने का इशारा देने वाले रिकॉर्ड में “कुछ भी नहीं” होने का ज़िक्र किया गया। इसके अलावा जस्टिस भाटिया ने ज़मानत देते वक्त “दरख्वास्त देने वाले के खिलाफ खास सबूत नहीं होने” और “कोई खास इल्ज़ाम नहीं” होने का हवाला दिया है।
एक ऑर्डर (जो दूसरे ऑर्डरों की तरह ही है, बस इसमें कुछ बातें बदली गई हैं) में लिखा गया है, “पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गौर करते हुए और दरख्वास्त देने वाले के खिलाफ कोई सबूत न होने की वजह से, जिससे यह इशारा मिले कि पीड़िता को मौत से ठीक पहले दहेज के लिए किसी तरह की जिस्मानी या ज़हनी तकलीफ दी गई थी। साथ ही इस बात को ध्यान में रखते हुए कि दरख्वास्त देने वाले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह 30.05.2025 से जेल में बंद है, मेरा मानना है कि दरख्वास्त देने वाला ज़मानत पर रिहा होने का हकदार है। लिहाज़ा, ज़मानत की दरख्वास्त मंज़ूर की जाती है।”
सभी 510 मामलों में आख़िरी हिदायतें लगभग एक जैसी हैं। ज़मानत ऑर्डर में कहा गया है कि मुल्ज़िम को “मुताल्लिक अदालत की तसल्ली के मुताबिक 20,000 रुपये के दो ज़मानती के साथ निजी बॉन्ड देने पर” रिहा किया जा रहा है।
इसके बाद यह शर्त भी रखी गई है कि दरख्वास्त देने वाला सुनवाई में हाज़िर रहे, कोई वैसा ही जुर्म न करे और सीधे या घुमा-फिराकर गवाहों को बहकाए या धमकाए नहीं।
.jpeg)
No comments:
Post a Comment