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Sunday, February 16, 2020

शकरकंदी की कड़वाहट

मेरा एक दोस्त अक्सर कहता है कि लोग अच्छे नहीं होते, तो मैं कहता हूं कि लोग तो अव्वल अच्छे ही होते हैं, वक्त या हालात बुरे होते हैं। इस पर वह तुनककर अपनी उस पड़ोसी की बातें बताने लगता है, जिसे उसने आज तक किसी से सीधे मुंह या जरा सी मुलायमियत से बात करते नहीं देखा। मैं उसे समझाता हूं कि इसके पीछे उस पड़ोसी के वक्त का मुंह शायद हमेशा टेढ़ा रहता होगा या उसके हालात इतने कठोर होते होंगे। लेकिन वह नहीं माना। एक दिन वह मुझे अपने घर ले गया और अपनी उस पड़ोसन की निगरानी पर बैठा दिया। मैंने देखा कि उसकी पड़ोसन का मुंह कामवाली से लेकर मां-भाई के साथ भी टेढ़ा ही था। थी तो वह ठीक-ठाक घर की। देखने में गदराई शकरकंदी सी, लेकिन शकरकंदी जैसी अनाकर्षक तो नहीं थी। उसकी मां की आवाज तनिक तेज तो थी, लेकिन उसमें भी एक दिल्ली वाली पंजाबी शाइस्तगी तो थी ही।
फिर क्या वजह रही होगी कि इतनी सुंदर पड़ोसन का वक्त इस कदर टेढ़ा हो चुका था? मैंने दोस्त से पड़ोसन के बारे में कुछ पूछताछ की। वह पैंतीस पार थी, सुंदर थी। हंसे तो गोया फूल झड़ें। हालांकि मेरे दोस्त को मुझे दिखने वे फूल अब भी मेरी भूल ही लगते हैं और ज्यों ही मैं कभी भी उसकी हंसी में फूल देखता हूं, झट से वह हमेशा यही बोलता है, 'आई ऑब्जेक्ट मीलॉर्ड!' उस वक्त भी उसने यही जारी रखा। फूल दर फूल गिरते ऑब्जेक्शन से जब मैं परेशान हो गया तो मैंने दोस्त से पूछा, 'शादी हो गई है इसकी?' दोस्त बोला, 'नहीं हुई।' अब समस्या का एक सिरा तो मेरी गिरफ्त में था। इस सिरे पर अपनी गिरफ्त मजबूत करने के लिए मैंने फिर पूछा, 'कोई ब्वॉयफ्रेंड? किसी इश्क की कोई कहानी? या सिरे न चढ़ पाई किसी मोहब्बत की कोई दास्तां?' दोस्त बोला, 'पांच साल तो हो गए मुझे इस इलाके में रहते हुए, अभी तक तो ऐसी कोई चीज दिखी नहीं।'
फिर मैंने पूछा, 'क्या वह निपट अकेली है?' दोस्त ने जवाब दिया, 'लगता तो ऐसा ही है, जभी तो जब भी खिड़की पर आती है, खाती हुई आती है या खाते-खाते वापस चली जाती है।' इस जवाब पर मैं भड़क गया। मैंने कहा, 'खाने का अकेलेपन से क्या रिश्ता?' अरस्तू से सुकरात की देह में विचरते हुए दोस्त बोला, 'अकेला आदमी अक्सर किसी न किसी छोर पर ही रहता है। इस तरफ, या उस तरफ। उसके मन में बीच का रास्ता कहां होता है? फिर उसकी कोई ऐसी मजबूरी भी तो नहीं होती कि वह बीच का रास्ता अख्तियार करे ही करे।' उसके यह कहते ही मुझे याद आया कि मेरे दो मालिकों (जिनके यहां मैं कभी नौकरी करता था) ने कहा था कि साथ बहुत जरूरी होता है। एक बार जब मैं निपट अकेली महिलाओं से रूबरू था तो वहां भी मुझे ऐसी ही झल्लाहट दिखी थी। मैंने दोस्त से कहा, 'उसे समझाओ, अकेली न रहे।' अब तो दोस्त बिदक गया, बोला, 'अकेले के गले में समझाइश की घंटी बांधने की हिम्मत तुममें हो तो हो, मुझमें नहीं है।' 

Saturday, February 15, 2020

डाटा से प्यार, डाटा से सेक्स और डाटा से बच्चे!

मुझे वो टिंडर पर मिली थी, या मैं उसे टिंडर पर मिला, यह तो ठीक से याद नहीं, लेकिन मैच हो गया था। झारखंड की थी, अनारक्षित वर्ग की और साढ़े तीन शादियां कर चुकी थी। साढ़े तीन यूं कि आखिरी में बात मंगनी के बाद टूट गई थी, लेकिन मिलना-मिलाना हो चुका था। हमारी बातें आगे बढ़ने लगीं तो पहले तो उसने धीमे से मुझे यह बताया कि उसके पापा मोदी जी के खिलाफ एक बात नहीं सुनते और अगर कोई कह दे तो उसको ऐसी-ऐसी सुनाते हैं कि पानी पनाह मांगे। मैंने उससे कहा, ‘तो क्या हुआ। मेरे घर में भी कुछ बीजेपी वाले हैं, कुछ कांग्रेस वाले हैं, सपा-बसपा वाले भी हैं और खुद मैं कम्यूनिस्ट हूं।’ तो वह बोली कि उसके यहां भी कुछ यही हाल है, उसका भाई कांग्रेसी है, भाभी को आम आदमी पार्टी अच्छी लगती है और मां इधर-उधर डोलती रहती हैं, और जो भी जोर से बोल दे, उसी की तरफ हो जाती हैं। मैंने उससे पूछा, ‘और तुम? तुम क्या हो’? वह बोली, ‘मैं तो वर्कोहलिक हूं। काम पसंद करती हूं। जो भी काम करता है, उसे पसंद करती हूं।’

यह सुनकर मेरे मन में लड्डू फूटा। आज के जमाने में जब लोग काम से ज्यादा नाम पसंद करते हों, ऐसे लोग मिलने मुश्किल होते हैं। कुछ दिन तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। फिर उसने धीमे-धीमे स्कूलों के बारे में फेक इन्फॉरमेशन मेरी ओर पुश करनी शुरू की। जैसे पहली तो यही कि अब देखो, सारे स्कूलों में पढ़ाई हो रही है। सारे टीचर्स स्कूलों में वक्त पर पहुंच रहे हैं और क्लासेस ले रहे हैं। लगातार आती इन फर्जी खबरों से जब मैं पक गया तो एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘आखिरी बार तुमने किस स्कूल का दौरा किया था?’ कहने लगी, ‘दौरा तो नहीं किया था, लेकिन उसका एक रिश्तेदार मध्य प्रदेश के स्कूल में पढ़ाता है, वही हमेशा सरकार से इस बात को लेकर हमेशा परेशान रहता है कि टाइम पर स्कूल पहुंचना है।’ मैंने उससे पूछा, ‘उसकी बीएलओ में ड्यूटी लगती है?’ वह बोली, ‘ये तो न पूछो, रोज ही जाने कहां कहां ड्यूटी लगती रहती है।’ मैंने फिर पूछा, ‘फिर वह स्कूल कब जाता है‌?’ इस पर वह थोड़ी नाराज हो गई और बोली, ये सब फालतू की बात है, वक्त पर तो स्कूल आना ही पड़ेगा।

फिर कुछ दिन बाद वह मुझसे सरकारी दफ्तरों की बेहतरी की बात बताने लगी। वहां भी आने-जाने के वक्त की पाबंदी की बात। मैंने पूछा, ‘अधिकारियों के दफ्तर वक्त पर आने जाने से क्या सारे काम वक्त पर होने लगे?’ वह बोली, ‘और क्या।’ मैंने पूछा, तुम अपनी जीएसटी कैसे फाइल करती हो तो बोली कि उसने इस काम के लिए एजेंट कर रखा है। मैंने पूछा कि अगर अधिकारी या सरकारी कर्मचारी अपने काम के इतने ही पाबंद हैं तो बीच में दलाल क्यों लगाया? क्या दलाल पूरा काम ईमानदारी से कराता है? छूटते ही वह बोली, ‘तुम मोदी विरोधी हो।’ पहले तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि मैं इस गलीच सिस्टम का विरोधी हूं, लेकिन वो तो समझने का नाम ही न ले। फिर मैंने उससे पूछा, ‘तुम मोदी समर्थक हो?’ इस बार वह खुलकर बोली, ‘हां। और मोदी जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।’ मैंने पूछा, ‘क्या अच्छा काम कर रहे हैं?’ बोली, ‘नोटबंदी करके काले धन की कमर तोड़ दी।’ मैंने कहा, ‘लेकिन सारा पैसा तो रिजर्व बैंक वापस आ गया।’ इस पर वह बोली, ‘इतना अंधा विरोध तो न करो।’ मैंने कहा, ‘ये मैं नहीं, रिजर्व बैंक का डाटा कह रहा है। ’तो कहती है, ‘जाओ, उसी डाटा से प्यार करो, उसी से सेक्स करो और उसी से बच्चे पैदा करना।’

Monday, December 21, 2015

एक पति‍त वि‍वाह के फुटकर नोट्स- 2

वैसे भी वि‍वाह का नाम सुनते ही मन में बीस तरह की बेचैनियां शुरू हो जाती हैं कि भूले से भी अगर कि‍सी को न्‍योतना भूल गए तो चार गांव चालीस कि‍स्‍सा बनाएगा और गाएगा। वि‍वाह पूरा एक देश होता है जि‍से आज तक कि‍सने संभाला हुआ है, ये पता ही नहीं चलता और ये बनता जाता है।

पति‍त वि‍वाह से पूर्व होने वाले इस पाठ में प्रसाद की पंजीरी की जगह पंपलेट बंटवाऊं। साथ में दो चार गाय बैल कुत्‍ता बि‍ल्‍ली भी रखे रहूं कि जि‍सकी नहीं हुई है या कति‍पय कारणों से जि‍नकी न हो पा रही है, मन न मसोसें, मन होने पर पूरे मनोयोग से इन्‍हीं की पीठ सहला लि‍या करें, कोई नहीं देखेगा।

जि‍तने कवि हैं, उन सबकी पूर्व और अपूर्व, दोनों तरह की प्रेमि‍काओं का आना अनि‍वार्य कर दूं और श्रोताओं की पहली पंक्‍ति में उन्‍हीं को बैठाऊं। मेकअप का सारा सामान पति‍त वि‍वाह में पूर्णतया फ्री ही रहेगा, जि‍तना मर्जी उतना करें, कोई नहीं टोकेगा। जो टोकेगा, उसे उसी वि‍वाह में पुरुषवि‍रोधी करार दि‍या जाएगा।

गंगा-गोमती तट पर इस वि‍वाह को घटि‍त होने की सारी संभावनाओं को इतना पति‍त कर दूं कि सरयूतीरे के अलावा कोई दूसरा ऑप्‍शन रह ही न जाए। वहां भी पंडों को तैनात कर दूं कि एक भी कवि या कहानीकार बगैर बछि‍या की पूंछ पकड़े न पुल पार कर पाए न सड़क और न घाट। हर घाट पर खाट लगाकर नावों पर वो नंगा नाच कराऊं कि मेरे घरवाले आने वाले सैकड़ों साल तक मुझे अपना मानने से ही मना कर दें।

शेखर की जीवनी की जि‍तनी मरी दबी इच्‍छाएं आकांक्षाएं रही होंगी, जि‍तने भी शेखर इस वि‍वाह में आएं, सारी की सारी ऐसी पूरी करूं कि पूरा फैजाबाद देखे और कहे कि ठीक ही कि‍या कि इसे फैजाबाद का न होने दि‍या। हो जाता तो आज यही कालि‍ख पूरे शहर पर मल रहा होता।

उदय जी, आपको तो आना ही आना है। सारे महंतों से आपका सम्‍मान उसी शादी में समारोह के साथ करना है।

(एक पति‍त वि‍वाह के फुटकर नोट्स- 2) 

एक पति‍त वि‍वाह के फुटकर नोट्स- 1

अकवि का पतित वि‍वाह है तो ऐसा हो कि सुप्रीम कोर्ट तक बि‍लबि‍ला उठे और मार हथौड़ा हवनकुंड को इतना चौड़ा कर दे, जि‍समें से हिंदी साहि‍त्‍य की सारी सेवाकातर संस्‍थाएं नाच नाच के नि‍कलें।

अगर वो पंडि‍त है तो मैं एक बैनर भी बनवाने जा रहा हूं जि‍सपर लि‍खा होगा ''पंडि‍त की शादी है, हमारी नंगई का प्‍लीज़ कहीं कि‍सी तरफ से कतई बुरा न मानें।'' दो पंडि‍तों को इसी ठंड में डि‍जायनर धोती और जनेऊ पहनाकर बैनकर पकड़ाकर बारात में सबसे आगे चलाउंगा। धोती भी ऐसी धोती होगी कि भगाया गया कवि अंपनी लंगोट देखकर शर्मा जाएगा कि उनकी लंगोट पर वो डि‍जाइन बनाना उसे पुराने वाले घर में पहले काहे नहीं सूझा। एक तरफ तुलसीदास की चौपाइयां लि‍खाउंगा तो दूसरी तरफ काम के सत्‍तावन सूत्र। अड़सठ जि‍न्‍हें लि‍खना था वो लि‍खते रहें मेरी बला से।

अकवि का पति‍त वि‍वाह है तो कार्ड की जगह खाली डि‍ब्‍बा भेज दूंगा कि जब जब इसे बजाया जाएगा, वि‍द्यामाई की कसम, इसमें से मेरे देस की धरती नागि‍न डांस करते सोना उगलते हुए ही नि‍कलेगी। अगर नि‍कली वो चांदी फांदी उगलते हुए तो मार चप्‍पल मुंह लाल कर दूंगा कि इस कंगाली में सोना हीरा न सही मोती ही उगल सकती रही या नहीं।

देश के सेवाकातरों को समझना चाहि‍ए कि वैवाहि‍क गर्मी ही उनके साहि‍त्‍य को वो नई दि‍शा दे सकती है, जि‍सकी दरकार उनको अपने हर कि‍ए और पड़े से है। बारात में कवि‍यों का अलग स्‍टाल होगा और कहानीकारों का अलग। एक वि‍वाह समारोह में कम से कम बीस मंच दि‍ए जाएंगे और ऐसा करके मैं मर चुकी हिंदी साहि‍त्‍य की सरस धारा को एक बार फि‍र से खोदकर नि‍कालने की तुच्‍छ कोशि‍श करूंगा।

शेखर का वैसे भी मेरे जीवन में सुख से लेशमात्र भी संबंध नहीं रहा तो उनको भी अलग से चि‍ट्ठी लि‍ख रहा हूं कि बहुत सही गुरु, तुम तो हमसे बहुत तेज नि‍कले कि हम तो नि‍कलते नि‍कलते रह गए और तुम नि‍कल लि‍ए अपना साजो सामान लेकर। वैसे जब तुम नहीं नि‍कले थे तो भी नि‍कले नि‍कले ही लगते थे।

रही बात न्‍योते वाला झोला रजि‍स्‍टर संभालने की तो हमको शशि‍भूषण पे पूरा भरोसा है। संभाल तो वो खुद को भी नहीं पाते जब तीन चार गटागट अंदर चले जाते हैं और इसी भरोसे और डकैती के सुवि‍चार के चलते न्‍योता संभालने का काम पूरी तरह से शशि भैया ही करेंगे।

जब सब लुटा रहे हैं तो कोई लूटने वाला भी होना चाहि‍ए, ये सुवि‍चार मन में बैठाकर मैं हर कवि की जेब काटने की इसी वि‍वाह में करूंगा और ये पूरी तरह से वि‍वाह को पति‍त बनाने के लि‍ए सम्‍यक मन से कि‍या गया सत्‍कर्म ही माना जाएगा, इसके लि‍ए सभी साहि‍त्‍यकार आइपीसी में परि‍वर्तन करने की समवेत मांगपत्र जारी करेंगे, मांग न पूरी होने पर सब इस बार पुरस्‍कार वापसी अभि‍यान की तर्ज पर वापस कि‍ए गए पुरस्‍कार वापस मागेंगे।

मेरा भरसक प्रयास है कि समस्‍त वैवाहि‍क कार्यक्रम सुपति‍त हो और इस कार्यक्रम में शामि‍ल होने के लि‍ए देश के कोने अतरे से आने वाले साहि‍त्‍यकार और पत्रकार जब यहां से जाएं तो उनके सामने सिर्फ और सिर्फ पतन की राह हो, बहुत दि‍न हो गए जतन की राह पर चलते चलते।

ओम जी, सुन रहे हैं न आप। आपको जरूर आना है। पतनशीलता पर डि‍बेट है।

(एक पति‍त वि‍वाह के फुटकर नोट्स- 1)