Thursday, February 26, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-1

पूरी रात अंधेरा बरस रहा है, लेकि‍न क्‍या मजाल जो उठकर आदमी खि‍ड़की की चिटखनी खोल दे या बि‍जली का बल्‍ब दबाकर उजाला फैलाकर उस उजाले के फैलाव में मन को तनि‍क भी समेट ले। अंधेरा बरस बरस के पूरे कमरे को तर करता जा रहा है और आदमी है कि मन की मायूसि‍यों से उतनी ही बदतमीजी से चि‍पका हुआ है, जि‍तना कि वो औरत कभी उसे जबरदस्‍ती घसीटकर खुद से इतनी जोर से चि‍पकाती थी कि आदमी को ही डर लगने लगता था कि वो जिंदा रहेगा या इसी पल अल्‍ला मियां का दरवाजा खटखटा रहा होगा। उठकर बैठना या बैठकर खड़ा होना या खड़ा होकर चल देना आदमी के लि‍ए इतना मुश्‍कि‍ल कभी नहीं रहा, जि‍तना कि इस बरसते में ख्‍वाबों को कालि‍ख से बचाना लगा। क्‍या था आखि‍र, एक मुर्दा मन ही तो, जो न तो दफन था और न ही अपनी कब्र से बाहर था। चौकोर कमरे में बनी खुली कब्र में एक छत का बस भ्रम था जो उसपर लटके पंखे की तरह खराब हो होकर बार बार बस यही दि‍लासा देना चाहता था कि पंखा चलेगा और एक दि‍न जरूर चलेगा। ...और पंखे को नहीं ही चलना था जि‍सका कारण भी उतना ही साधारण था, जि‍तना अंधेरे का बेवजह बरसते जाना या जि‍तना मन के मरघि‍ल्‍ले पि‍ल्‍ले का कि‍सी गाड़ी के नीचे आकर कुचलकर मर जाना। फि‍र भी, सवाल ये नहीं कि जिंदा कौन रहना चाहता था, सवाल ये है कि मरना कौन चाहता था। लगातार बरसता अंधेरा या उजाले के फैलाव की प्राचीन इच्‍छा या मरघि‍ल्‍ला मन, जो बार बार आशा की नजर से उस अनजान चेहरे की तरफ बार बार यूं ही देखता था और बार बार दुत्‍कारे जाने के बावजूद दो घड़ी आसमान की तरफ देखने के बाद फि‍र उसी चेहरे की तरफ देखने लगता था।
(जारी...)

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