कुछ देर आज़ादी
श्रुति मिश्र
अभी परसों ही इलाहाबाद से आई हूँ। मेरे भांजे का जन्मदिन था वहाँ। चिलचिलाती गरमी मे हम (यानी मैं और मेरे ये) किसी तरह इलाहाबाद पंहुचे तो सारे भाई बहनों को देख जीं जुडा गया। इनकी नौकरी के कारण समय की कमी थी , सो बहनों से बतियाने का कोई भी मौका मैं छोड़ना नही चाहती थी। यहाँ तक कि अगर एक गुसलखाने मे होती तो दूसरी उससे गुसलखाने के दरवाज़े पर खडी होकर बतियाये जा रही थी। शाम को जन्मदिन मनाया जाने वाला था। भइया बाहर खडे होकर भुन भुना रहे थे कि ये लोग तो बहुत टाइम् वेस्ट करती हैं। पता नही का इत्ती देर से गिटिर पिटिर किये जा रही हैं।
अब ये क्या बात हुई ? इत्ते दिन बाद मिले हैं तो क्या बतियायें भी ना ? एक तो वैसे ही टाइम् कम और उसपे भी कईयों लोगों की चुगली तो छूटी ही जा रही थी। जल्दी जल्दी मे कब शाम हो गयी , पता ही नही चला। नहाने धोने के बाद अब बारी थी सबके तैयार होने की। सो हम तीनो बहने एक कमरे मे आकर तैयार होने लगे। पहले तो दौर चला "तुम क्या पहनोगी " का और सबमें अपनी अपनी साड़ियों गहनों को दिखने की होड़ लग गई ।
"हाय दीदी ! तुम्हारा बुन्दा तो बड़ा सुन्दर है। " "अरे तेरी साडी का पल्लू तो बड़ा अच्छा है रे ! कहॉ से ली ? "
मेरी मितु दी की नज़र बड़ी खराब है। वो कैसे ? बचपन से आज तक मुझे किसी ने सुन्दर नही कहा सिंवाय उनके। इसीलिये उनकी नज़र मे नुक्स है।
खैर, देखने दिखाने के बारी आई उनको पहनने की । पहन वहन के तैयार हुए तो मुझसे बेध्यानी मे बिंदी गिर गई या मैंने लगाई नही , बड़ी दीदी ने टोक दिया, "तू तो बिना बिंदी बड़ी अच्छी दिखती है। " मैं बोली, " इनका (मेरे ये) भी यही ख़याल है। ये कम्युनिस्ट हैं , कहते हैं कि जो मरजी वो पहनो , इनके लिए तो इंदी -बिंदी , अंगल मंगल सूत्र का कुछ मतलब ही नही। " दीदी की आंखें कटोरा। बोलीं , "सच्ची !! ये कम्युनिस्ट ऐसे होते हैं ? वैसे तो हमे भी ये बिंदी टिकुली लगना बड़ा खराब लगता है, लेकिन इन्हें पसंद है तो पहनते हैं। अच्छा चल एक काम करते हैं, आज कम्युनिस्ट ही क्यों ना बन जाया जाय। कुछ देर तो आज़ादी मिलेगी। " यह कहकर दीदी ने अपनी बिंदी भी उतार दी। लेकिन जब उनकी सास ने टोका कि का रे , बिंदी काहे नाही पहनी है , तो दीदी चुपचाप अन्दर गयी और बिंदी पहन ली।








4 आपकी बात:
दरअसल ये बिंदी , गहने वग़ैरह मर्द के सामंती दिमाग़ की ही उपज है ये सब पहले के स्त्री प्रधान समाज के लिए पुरुष प्रधान समाज की प्रतिक्रिया है जो हज़ारों साल से पुरुष प्रधान समाज मे रह रही स्त्री को नाज़ुक , कोमल और पता नही क्या क्या कह कर दबाने का ही प्रयास है ये मंगल सूत्र और सिंदूर स्त्री के लिए एक तरह की बेदी का काम करता है मेरा सवाल है कि अगर स्त्रियों के लिए मंगल सूत्र और सिंदूर है तो फिर पुरुषों के लिए क्या है ? है उनके पास कोई सबूत कि वो शादी शुदा हैं ?
बहुत अच्छा वृतांत है। अलग अलग घरों में बिछड़ गईं बहनों की अपने पुराने घर में हुई बातचीत अच्छई लगी। बिंदी पहनने और न पहनने के बीच की झिझक भी
पढ़ कर बड़ा अच्छा लगा।
यदि पुरुष अपने अहम् को त्याग कर आप के पति के विचारों का मूल्य समझ पाएं तो हजारों वर्षों में मानसिक गुलामी में जकड़ी हुई नारी को कुछ राहत मिल जाएगी।
कम्युनिज़्म या किसी अन्य इज़्म से इसका संबंध नहीं है, यह तो मनुष्य के अपने सोचने की परिधि की सीमा की बात है।
बिना बताए, बिना अपराध के, केवल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए, प्रजापालन के नाम पर बेचारी निरापराध सीता को बीहड़ जंगल में छोड़ दिया गया। नारी के लिए इससे बड़ी विडम्बना कौन सी होगी! कौन सी गुलामी होगी?
पढ़ कर बड़ा अच्छा लगा।
यदि पुरुष अपने अहम् को त्याग कर आप के पति के विचारों का मूल्य समझ पाएं तो हजारों वर्षों में मानसिक गुलामी में जकड़ी हुई नारी को कुछ राहत मिल जाएगी।
कम्युनिज़्म या किसी अन्य इज़्म से इसका संबंध नहीं है, यह तो मनुष्य के अपने सोचने की परिधि की सीमा की बात है।
बिना बताए, बिना अपराध के, केवल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए, प्रजापालन के नाम पर बेचारी निरापराध सीता को बीहड़ जंगल में छोड़ दिया गया। नारी के लिए इससे बड़ी विडम्बना कौन सी होगी! कौन सी गुलामी होगी?
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