Monday, June 4, 2007

ब्लॉग - ज्ञान की दुनिया का एक टापू ?

प्रदीप सिंह
प्रदीप जी अक्सर ब्लोग वगैरह पढ़ते रहते हैं , कभी कभी टिपिया भी देते हैंनारद पर भी जाते रहतेहैंकुल मिलाकर ब्लोग्लैंड पर इनकी उपस्थिति दर्ज़ होती रहती हैअभी यु ही बैठ बैठे मैंने इनसे पूछा कि ब्लोग्गिंग की दुनिया आपको कैसी लगती है? उन्होने जो जवाब दिया , वह दे रहा हूँ

एक पक्षी होता है , उसकी आदत होती है कि जब वो सोता है तो उस समय अपनी दोनो टाँगे ऊपर करके ही सोता हैउसे हमेशा ये डर लगा रहता है कि अभी आसमान गिर पड़ेगा तो वह अपनी टांगो से उसे थाम लेगाऔर उसके सोते समय आयी उस विपदा से अपने को बचा लेगाऔर वो सृष्टि का एकमात्र जीवित पक्षी होगाइस बात को आप भी बखूबी जानते हैं कि आसमान तो नही गिरेगा , फिर भी उसकी सूझ बूझ की दाद देनी पडेगीविचारों एवम सामाजिक दायित्व के क्षेत्र में यही भ्रम हमारे ब्लोग के क्रांतिकारी साथी भी पाल लिए हैंऐसे लोगों का ये मानना है , तकनिकी विकास के इस आधुनिक रुप से वो वैचारिक क्रान्ति और सामाजिक बदलाव ला देंगेजिस काम को ग्रास रूट लेवल पर काम करते हुए सैकड़ों लोग नही कर पाए , वे ब्लोग के माध्यम से यह बदलाव ला देंगेवह चीज़ जिसकी पंहुच सिर्फ मेट्रो पोलिटन शहरों के कुछ अत्याधुनिक पत्रकारों तक हैक्या आपने ये सोच कि ब्लोग की पहुच कितने और किन लोगो तक है ? वैसे तो किसी भी क्षेत्र या माध्यम मे काम करते हुए इमानदारी और समाज के प्रति अपने कर्तव्य को नही भूलना चाहिऐ , इस आधार पर ब्लोग की दुनिया मे भी इमानदारी और सामाजिक सरोकारों से जुडे हुए मुद्दे उठाने वाले तारीफ के काबिल हैं किन्तु इसी को सामाजिक बदलाव का सबसे शसक्त माध्यम मानने वालों से मैं घोर असहमति दर्ज़ करता हूँसाहित्य , कला , विज्ञानं एवम तकनीक की समस्त विधाये और अविष्कार मानव जीवन के बेहतरी के लिए हैसबका अन्तिम उद्देश्य मानव जीवन को कल्याणकारी बनाना है। "कला कला के लिए" या "साहित्य स्वान्तः सुखाय के लिए " की बहस सैकडो वर्ष पुरानी हो गयीलंबे वाद विवाद प्रतिवाद एवम संवाद के बाद जो निष्कर्ष निकला , वह यही है सामाजिक हित ही सर्वोपरि हैएक लेख लिखने के बाद अपने दोस्तो से कमेन्ट भेजने का आग्रह , कमेन्ट पाने के चक्कर मे ढ़ेर सारे छोटे छोटे कमेन्ट दूसरे ब्लोगों पर करना जिनकी कोई सार्थकता नही है ,कहॉ की इमानदारी है ? यह लेखक और पाठक दोनो की बेईमानी हैसार्थक बहस या सार्थक लेखन के लिए कमेन्ट को प्रायोजित नही करना पड़तायानी कि लाल गुदङी मे नही छिपताहाँथ पाँव बहार निकल ही आते हैंसार्थक बहस, जायज माँग और उत्कृष्ट लेखन लाख दबाने के बावजूद ऊपर ही जाता हैलेखन में प्रगतिशील , धर्म निरपेक्ष और आधुनिक सोच से लैस लोग क्या जीवन में भी उतने ही प्रतिबद्ध हैं ? मुझे शक हैइस शक का आधार हो सकता है पूरी तरह सत्य हो लेकिन कुछ पहलू तो एकदम साफ हैंकुछ लोग अपने को वामपंथी और दक्षिण पंथी बुद्धिजीवी स्थापित करने का माध्यम ब्लोग को बना लिया हैअच्छा तो ये होता कि ब्लोग के माध्यम से समाज और देश में फैली हुई तमाम बुराइयों अथवा ऐसे लोगों की आवाज़ को जो मुख्य धारा की मीडिया में जगह नही पाती , उसपर बहस किया जाता और सिर्फ बहस ही नही , सार्थक पहल और हल की तरफ बढ़ा जाताधर्म निरपेक्षता , हिंदुत्व , समाजवाद , हिंदू मुस्लिम विरोध , अल्पसंख्यक वाद , बहुसंख्यक वाद पर मुख्य धारा की मिडिया और राजनितिक पार्टियों के स्थाई जुमले हैंजिसे शायद ही कोई राजनितिक पार्टी हल करना चाहती हैब्लोग का उपयोग करने वाले निश्चित ही शिक्षित ,सम्पन्न और समझदार हैंक्या वे इसके आगे की नही सोच सकते ? कुछ नया करने का

Post a Comment