Thursday, June 14, 2007

नारद , मोदी जहर और तानाशाही

प्रदीप सिंह
भाषा के पहरेदार एवम नैतिकता के दरोगा जिस (शब्द) को लेकर भाषा के संयम की दुहाई दे रहे हैं वे शायद यह भूल रहे हैं कि सिर्फ संयमित भाषा का प्रयोग ही सब कुछ नही है , संयमित भाषा के साथ साथ संयमित विचार एवम राजनैतिक दर्शन भी होना चाहिऐ। राहुल के द्वारा प्रयोग किये गए शब्दों की भर्त्सना करने के पहले शब्दों की पवित्रता की दुहाई देने वाले यह क्यो भूल जाते हैं कि इसका संदर्भ क्या था ? असगर वजाहत की कहानी "शाह आलम का कैम्प" किसी साहित्यकार के मन की कल्पना या चंचल मन की उड़ान भर नही है। यह गुजरात मे हुए नरसंहार के बाद अपने ही देश मे शरणार्थी शिविर मे रह रहे मुस्लिमों की करुण दास्तान है , जो शत प्रतिशत तथ्यों पर आधारित है । उस नरसंहार के बाद गुजरात का मुसलमान अपने घरों को छोड़कर शरणार्थी शिविर मे रहने को विवश कर दिया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उस राहत ? शिविर मे जाने की हिम्मत नही जुटा पाये। और वह प्रधानमंत्री जो शायद सारे देशवासियों का प्रधानमंत्री अपने को नही समझता था , इस नरसंहार के आरोपी मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करने की नसीहत देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लिया। गुजरात मे राज्य प्रायोजित नरसंहार हिंदुस्तान के दामन का वह बदनुमा दाग है जिसे भुलाना या मिटाना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है । वैसे गुजरात की मोदी सरकार ने वली दक्कनी (उर्दू के प्रसिद्ध शायर ) की मजार से लेकर आम मुसलमानो की झोपड़ी तक मिटने मे कोई कोर कसर बाक़ी नही रखा। अब आप लोग साहित्य की तमाम विधाओं जिसमे उस प्रायोजित नरसंहार का उल्लेख है , उसको भी मिटाना चाहते हैं। असगर वजाहत के तथ्यपरक लेखन पर वैचारिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर सतही टिप्पणी करते हैं , यह आपकी साहित्य के प्रति समझ ,अनुराग और आपके वैचारिक स्तर को बखूबी दर्शाता है ? और हर क्षण मर्यादा और संयम की बात करते हैं। भाषा का संयम कोई अमूर्त धारणा नही है , यह सामाजिक और आर्थिक अंतर्संबंधों से ही तय होती है। भाषा का संयम ही सब कुछ नही है , संयम और पवित्रता तो हर क्षेत्र मे जरूरी होता है। वैसे आप लोग जिस विचार एवं राजनैतिक दर्शन को मानने वाले लगते हैं , उसमे किसी को भी देशद्रोही , म्लेच्छ , संस्कारहीन और संयमहीन कह देना छोटी बात है आपका यह विचार भाषा, जीवन और राजनीति पर भी लागू होती है। गुजरात जो आपके सांस्कृतिक और राजनैतिक आन्दोलन की प्रयोगशाला है , उसमे न सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह है बल्कि मोदी के कुकर्मों का विरोध करने वाले के लिए भी क्या कोई जगह बची है ? भले ही वह हिंदुत्व ब्रिगेड का संभावनाशील कार्यकर्त्ता हो । नारद पर इससे पहले भी (संयमित) भाषा मे एक धर्म और विचार को मानने वालों के खिलाफ जो कुछ लिखा गया , क्या उसकी अनदेखी नही की गई ? यह कहॉ का संयम है ? भावावेश मे कहे गए कुछ शब्दों पर (जिसका तार्किक आधार एवं कारण मौजूद था ) आसमान सर पर उठा लेने वाले उस समय कहॉ थे ? क्या संयमित भाषा मे किसी को आतंकवादी , देशद्रोही या तरह तरह की उपमाओं से नवाजा जाना गाली नही है ? तो फिर क्यों नही ऐसे शब्द के साथ साथ ऐसे विचार प्रस्तुत करने वालों के खिलाफ कार्रवाही की गई ? क्या इसमे भेद भाव का आभास नही होता है ? क्या किसी को ऎसी सरकार के खिलाफ लिखने या बोलने का अधिकार नही है जो अपने ही जनता के ख़ून मे नहाई हो ? क्या इक्कीसवीं सदी मे इस बात पर बहस नही होनी चाहिऐ कि कोई जाति या धर्म आतंकवादी ना होता है और ना ही पैदा करता है। आतंकवादी हमारी सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था पैदा करती है , पालती पोसती है और अपने हित मे उसका उपयोग करती है। यह अलग बात है कि जिन कभी बोतल से निकल भागता है तब उसे पकड़ने के लिए बेगुनाहों का ख़ून करना और उसका राजनैतिक दर्शन तैयार करना मोदी (मानसिकता )जैसे लोगों का नारा हो जाता है । असगर वजाहत की कहानी को ब्लोग पर प्रकाशित करने का मकसद सिर्फ उसी राजनैतिक दर्शन पर बहस कराने का था जिस दर्शन के कारण गुजरात की हज़ारों जिदगियों को कहानी बनना पड़ा। क्या उस कहानी पर ऎसी संवेदनहीन टिप्पणी और उसके बाद मर्यादा और संयम पर बहस नारद की प्रबुद्ध सलाहकार समिति को शोभा देती है ? क्या इन सब चीजों पर सार्थक बहस की जरूरत नही है ? लेकिन आप लोग हर बहस को विवाद मे बदल देने के आदी हो गए हैं। आप तो सत्ता की अमानवीयता का प्रतिरोध करने वाली हर ताकत के खिलाफ जुगलबंदी करते नज़र आ रहे हैं। कही कही आप भी हर समस्या का हल गुजराती मॉडल पर करना चाहते हैं आपके निर्णय से यह लग रह है कि आप ऎसी बहसों को विवाद मे बदल देने के लिए ही बैठे हैं। किसी भी अपराधी को उसके अवैधानिक कार्यों या अपराध पूर्ण कृत्यों के लिए अभियुक्त को सजा देने से पहले बचाव का पूरा मौका दिया जाता है। यदि हम यह भी मान लें कि संदर्भ चाहे जो रहा हो , टिप्पणी चाहे जो रही हो , उसपर टिप्पणी की भाषा गलत थी जो नारद के मर्यादा के अनुकूल नही थी तो क्या आपने बजार को नारद से हटाने के पहले राहुल को अपने बचाव पक्ष को प्रस्तुत करने का मौका दिया ? यदि नही तो यह सीधे सीधे आपकी तानाशाही की मोदी मानसिकता को दर्शाती है और आप किसी व्यक्ति या ब्लॉग के बारे मे कोई भी धारणा बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। रही बात नारद की तो यह तो आपके सलाहकार समिति की मरजी पर निर्भर है। किसी भी तथ्यपरक लेखन , तार्किक बहस या जनपक्षीय लेखन पर ऎसी टिप्पणी करके उसके उपयोगिता को कम नही किया जा सकता। भावनात्मक उत्तेजना मे कहे गए कुछ शब्दों पर इतना बवाल और धमाल पहली बार देखा गया है। कुछ शब्दों से इतना ऐतराज़ और परहेज करने वालों से हमारा विनम्र निवेदन है कि समाज मे नफरत फ़ैलाने वाले और दंगो की आग मे झोंकने वालो से भी इतनी ही नफरत करें।

9 comments:

irfan said...

बात ठीक कही गयी है और इसे बार बार कहे जाने की ज़रूरत है. कुछ लोग ब्लॉग को सैर सपाटे का अड्डा बनाने और सहमतियों का कोरस गाने का मंच बनाना चाहते हैं. पक्षधरता और सुसंगतता को राजनीतिक अखाडेबाज़ी का नाम देकर उसका उपहास करना कोई नयी बात नहीं है. इस मामले में अविनाश और मित्रों की पहलक़दमियों को ध्यान में रखा जाना चाहिये. राहुल अगर यह सोचते हैं कि नारद मुनि के चरणों में शीश नवाकर टैक्टिकली अपने मक़्सद में कामयाब हो जाएंगे, तो ये एक भूल साबित होगी क्योंकि 'नारद'नाम में ही पक्षधरता का एक तत्व छुपा हुआ है. सोचिये कि आपने अपने ब्लॉग का नाम 'ओम नमः शिवाय' अल्ला-हो-अकबर, सत्यम शिवम सुंदरम , वक्रतुंड महाकाय या 'धत तेरे की' तो नहीं रखा. अगर कल को आप खुद एक एग्रीगेटर की भूमिका में उतरें तो आप क्या नाम रखेंगे? क्या यह विषयांतर है या बचकाना बचाव?

अरुणिमा said...

्बेचा है ईमान धरम सब, तुमने बीच बजरिया में
अब जो बचे हुए सपने हैं उनको क्या नीलाम करोगे ????

अविनाश said...

बहुत सही कहा है प्रदीप जी ने। हम नारद से जुड़े ब्‍लॉगरों को इसे समझना चाहिए।

अफ़लातून said...

प्रदीप जी ने उचित विचार प्रकट किए हैं । इन विचारों से सहमत चिट्ठेकार खुद के चिट्ठे पर 'प्रतिबन्धित चिट्ठे' की कड़ी जोड़ें तथा इसकी घोषणा भी करें । सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित रखने वाली तारीख २६ जून निकट है । 'दु:शासन पर्व ' लागू किए जाने के दिन हम ऐसी कार्रवाइयों के खिलाफ लड़ने के अपने संकल्प को मजबूत करें ।

Nasiruddin said...

प्रदीप भाई, यही हम कहना चाह रहे हैं तो सब लट्ठ लेकर पीछे पडे हैं। जिस बात का सारे फसाने में जिक्र न था वो बात उन्‍हें बहुत नागवार गुजरी है। बाजार के बहाने ये लोग उन सारे लोगों का मुंह बंद करवाना चाह रहे हैं, जो लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष इनके विचारों के हामी नहीं हैं। आप इनका कोरस गान देखिये तो पता चल जायेगा। किसी को खुलेआम देख लेने की धमकी देना, भारतीय दंड संहिता में अपराध है पर नारद के शब्द कोश में नहीं। किसी को नाम देखकर बम फोडक कहना, मानहानि का बायस है लेकिन इन्हें ये भावनाओं का प्रस्फुटन लगता है। ये सहिष्‍णु होने का दावा करते हैं, कहां है सहिष्णुता। हां, जरा इन्हें ये भी बताते रहें कि ये हिन्दू और हिन्दुत्व में फर्क है। जानना है तो किसी और नहीं सावरकर को पढ लें। अफलातुन जी की सलाह पर अमल करते हुए, बाजार का लिंक डाल रहा हूँ।

AK said...

Irfan ji,
narad nam me paksdharta chupa hua hai... aur bazar me (har cheej bech dene ki saajish). detail batane ki jaroorat nahi ki bazar kin siddhanton par chalta hai.
besak aap tathon ke dwara kuch bhi sabit karen lekin bachpane mein na utarain warna bade se bade secular ka nam bhi sampradayik ho jayaga

aur pradeep ji bhavnatak aabeg me koi kuch bhi kah dega to koi kuch kar bhi to sakta hai.
koi aabeg me apsabd kah deta hai to koi aabeg me godhara kar deta hai koi Gujrat.
sir galat hamesa galat hai bachaw me aaweg ya bhawana ko beech me nahi lana cahiya.
(baharhal maine jo likha aapke aapsi muddon se uska koi sabandh nahi tha. ye sirf aapke jo tark mujhe thik nahi lage unka jawab tha)
main blog par kuch behtar muddon ke bare me logon ke bihar padhne aata hoon lekin in aapsi muddon me ulajhana blog se pathkon ko usi tarah door kar dega jis tarah hindustan ke voteron ko yahan ke chunav se.

agar likha pasand na ho to maf karange.lekin ye mere vichar the.

bhupen said...

achchha likha hai prdeep.

दास कबीर said...

"अगर कल को आप खुद एक एग्रीगेटर की भूमिका में उतरें तो आप क्या नाम रखेंगे?"
शायद इरफान भाई को अज के नये एग्रीगेटरों के नाम पता चल गये होंगे.

Priyankar said...

प्रदीप जी से पूरी-पूरी सहमति है .

और इरफ़ान भाई की इस बात से भी नाइत्तफ़ाकी नहीं है कि "कुछ लोग ब्लॉग को सैर सपाटे का अड्डा बनाने और सहमतियों का कोरस गाने का मंच बनाना चाहते हैं".

पर उनकी ग्रंथि दूसरी है . वे संतुलन की हद लांघ कर एक सांस्कृतिक शून्य में हवाबाज़ी करते हुए 'नारद' नाम में ही पक्षधरता का तत्व ढूंढ लेते हैं . उनके जैसे धर्मनिरपेक्ष किसी धार्मिक-सांस्कृतिक निर्वात में ही सुखी रह पाएंगे . ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष 'ग' से गणेश पढाने की बजाय 'ग' से गधा पढाने की वकालत करते दिखते हैं और साम्प्रदायिक शक्तियों को वह 'लीवरेज' उपलब्ध कराते हैं जिससे तोगडिया-सिंघल जैसों को बकवास करने का मौका मिलता है और मोदी को सत्ता में आने में मदद मिलती है .

पता नहीं इरफ़ान मियां यह कब समझेंगे कि साम्प्रदायिकता नाम में नहीं, नीयत में होती है . वे धर्मनिरपेक्षता की अपनी निजी समझ की निराली अदाएं अपने लाजवाब 'विट' के साथ जब-तब दिखाते रहते हैं और उन्हें दूसरा कुछ कहे तो देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर खतरा मंडराने लगता है .