Wednesday, June 27, 2012

आओ बारिश....आओ ना...

बारिश... आओ ना। देखो इतने मन से बिसमिल्‍ला बाबू मिश्रा मेल की मल्‍हार सुना रहे हैं। तीन ताल की थपकियां देकर तुम्‍हें रिझा रहे हैं और तुम हो कि... आंचल से गाल सहलाकर भाग जाती हो। कल रात तो तुम तीन चार बार आई लेकिन आकर चली क्‍यों गई। न दर ठंडा हुआ न दीवार। न मन भीगा न तन। अब बहुत हुआ, और न तरसाओ। आओ बारिश.. आओ ना, हमें गले लगाओ ना।

पता है बारिश, तुम्‍हारे पीछे क्‍या क्‍या हो रहा है। नहीं, तुम्‍हें कुछ भी नहीं पता। बडे तो हैं ही, बच्‍चे भी तरह तरह के टोटके कर रहे हैं। लोगों से गर्मी के मारे खाना नहीं खाया जा रहा है। बच्‍चे बीमार हो रहे हैं तो आमिर खान कह रहे हैं कि मां के दूध में जहर है। बारिश, तुम्‍हीं बताओ, हम सब क्‍या जहर पीकर बडे हुए हैं। पर तुम नहीं बताओगी बारिश। क्‍योंकि तुम आओगी ही नहीं तो बताओगी क्‍या। आमिर ने कह दिया और अब माएं दूध कैसे पिलाएं।

पता है, आमीन से अमन बना और अमन से राग यमन बना। पहले पता होता तो शायद पूरी दुनिया को और पास पडोसियों को भी ये राग सुना देता। मकान मालिक के बच्‍चों को भी। बारिश....वो बच्‍चे नहीं है, लडके हैं लेकिन सारे राग उनके सामने फेल हो जाते हैं। मालकौंस से लेकर खमाज तक सुना दिया, पर उन्‍हें शोर ही समझ में आता है। बारिश...अब तो तुम्‍हारे शोर की सख्‍त जरूरत है। चाहो तो उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान और उस्‍ताद विलायत खान की राग यमन पर जुगलबंदी सुन लो, पर अब आ भी जाओ।


Sunday, June 24, 2012

आह राग...वाह राग

फोटो- बिना बताए अजदक से साभार। 
ट्रेन में चलते, अलसाए, उबे तो खिडकी के सहारे कुछ देर टिककर बैठे। पैदल चलते तो सिर्फ जमीन देखते कि कैसे सडक की जुडी बजरियां जल्‍दी जल्‍दी गुजर रही हैं। कंधे पर झोला भी नहीं कि कुछ इतिहासबोध ही होता। पैर में टूटी चप्‍पल भी नहीं कि थोडा सा रूमानी हो जाते। करना क्‍या चाहते हैं, पता नहीं। जाना कहां, जाने से पहले क्‍यों सोचना। कन्‍फयूजन भी नहीं कि सारी मढैया उसी पर लादकर अपना झट से किनारे हो लेते। रिक्‍शे वाले से पहाडगंज जाने का किराया तो पूछते हैं, पर तेल महंगा हो गया है, ये भी सोचते हैं। घर आने पर चाबी मेज पर फेंकते ही एक बार फिर से वही किराएदारी शुरू हो जाती है, जो हमने सांस से जोडी थी। उफनाए उबलते अंडे को देखकर हूक उठती कि कौन है जो इतना उफना रहा है। कौन है जो पागल हुआ जा रहा है। किसके लिए पागल। क्‍यों दिमाग की छन्‍नी हर चीज को इतनी बारीकी से छानने में लगी है। हर चीज को स्‍वीकार अस्‍वीकार करने से पहले ही उसे किनारे वाले कोने में या दुछत्‍ती पर फेंक देने का मन करता है। जाहिर है, जरूरत है राग की। चीजों को एक सिरे से बांधने की।

ये तो पता था कि लयबद्ध ताल-चाल ही राग है। पर कभी सोचा नहीं, अराजकता से प्रेम जो रहा। पर पास गए तो पता चला कि यह तो हमसे भी ज्‍यादा अराजक है। कभी विलंबित ताल पर चलता है तो कभी छपताल पर। कभी सितार की उठान रोएं खडे करने लगती है तो कभी बिस्मिल्‍ला बाबू रुला जाते हैं। कभी तीन ताल की बंदिश पर समुद्र पार किसी टापू पर खुद को अकेले खडा पाते हैं तो कभी अलाप से उतरते उतरे झाले में फंसकर सरयू की गहराई में उसी तरह गुप्‍त हो जाते हैं, जैसे बचपन में बाबू से भगवान राम के गुप्‍त होने की बात सुनी थी। पता नहीं भगवान राम के गुप्‍त होने के वक्‍त गुप्‍तारघाट पर कौन सा राग बज रहा होगा। मृदंग के मामले में तो अयोध्‍या काफी पागल रही है। पागलदास थे वहां।

नंद समुद्र को पार न पायो... गिरिजा देवी ने गाया है, राग मालकौंस में। सुनेंगे तो यही मन करेगा कि न तो नंद समुद्र के पार जाएं और न ही आप। क्‍या रखा है समुद्र के पार, ये तो पता नहीं है, बहरहाल तीन ताल की इस बंदिश ने कुछ ऐसा बांधा है कि सोच रहा हूं कि अब शेव कराना शुरू कर दूं। साथ में बचपन में सुनी सारंगी, तानपुरा और तबले की स्निग्‍ध थापें। ताजा कर देती हैं। और कहीं से यह सुनते सुनते चरनजीत सिंह के सिंथेसाइजर पर दस तालों से डिस्‍को मिलाकर सुन लिया... अगर उपर वाला है कहीं पर, जो कि मेरा मानना है कि नहीं है, फिर तो वही मालिक है। आंख बंद करके बस सुनते जाएं...सुनते जाएं। बाकी इस दुनिया में रखा क्‍या है। अपनी दुनिया से निकलने के लिए जब भी कानों से हेडफोन निकाला तो मकान मालिक के जाट लडकों की चिल्‍लाने की आवाज। नहीं तो गली में बच्‍चों के लिए पिपिहिरी बेचने वाले की पिपिहिरी की आवाज। सडक पर निकले तो स्‍पीड ब्रेकर देखकर हॉर्न बजाते लोग या फिर दफ़तर पहुंचे तो बॉस की रेलम पेल। 

किसी तरह से बच बचाकर आए, फिर से चाबी का छल्‍ला मेज की तरफ उछाला और लगे अंडा उबलते देखने को। लेकिन इस बार सीन थोडा अलग था। अंडा तो विलंबित ख्‍याल में जा चुका था... और मन, वो तो अपनी दुनिया में फिर से पहुंच गया। तुरंत मन को आराम देना हो तो देबू चौधरी और प्रतीक चौधरी की एक साथ की सितार पर जुगलबंदी सुनी जा सकती है। तबले की गहरी थाप से जो शुरूआत होती है, लगता है कि कहीं पानी में घुसे गहरे बैठे हों और धीमे धीमे बाहर आ रहे हों। आलाप, जोड और मसीतखानी से तीन ताल में लयबद्ध यह संगीत कम लगता है.....कलाकार से सिर जोडकर अपनी बात कहना ज्‍यादा लगता है। हम कुछ कहते नहीं पर सबकुछ कह जाते हैं। हम रोते नहीं पर आंसू हैं कि.... 

कोई बात नहीं, अब तो पानी से उपर आ गए। जाहिर है कि शोर आपको जीने नहीं देगा और ये सारे पंडित मरने नहीं देंगे। इनसे बचने का कोई उपाय नहीं। शोर से छनकर कहीं न कहीं ये सारी चीजें मन में गहरे पैवस्‍त होनी ही हैं, आज नहीं तो कल। कई लोग आज कहते हैं कि आह राग.... पर सुनने के बाद कहेंगे वाह राग। 


Thursday, March 1, 2012

साहस -2


कोई तीस साल पहले बसंत के दिनों में जब अपूर्वा का जन्म हुआ तो घर में खिचड़ी बनी थी। कठोर सर्दी के दिन खत्म हो रहे थे और हवा में तैरता गुलाबीपन अपूर्वा की मां के गालों से झलक रहा था। जन्म देने के बाद पीले पड़े चेहरे के साथ जब अपूर्वा की मां ने उसे देखा तो अनजाने में ही अपूर्वा नाम निकल गया। बस जन्म के दो घंटे बाद ही नाम अपूर्वा पड़ गया जो सात साल बाद से ही अपूर्वा को सख्त नापसंद आने लगा। उसने कई बार अपनी मां से पूछा भी कि मेरा नाम इतना कठिन यों रखा कि लोग बुलाने में भी झिझकें? कोई आसान सा नाम नहीं मिल पा रहा था? अब उसकी पत्रकार मां को आसान नाम सूझा नहीं और न ही अपूर्वा के इस आसान से सवाल का कोई जवाब। तीस सालों से एक नाम ढो रही अपूर्वा की जिंदगी फिसलती चली गई। हां, दो बार संभालने की कोशिश तो की, पर संभली नहीं। एक बार बीस साल की उम्र में तो एक बार छब्बीस साल की उम्र में। लय क्या होती है, ये गाने गाकर भी अपूर्वा नहीं जान पाई। कभी कभी अपूर्वा को लगता है कि उसे शराब पीनी चाहिए, साथ में सिगरेट भी...
आज खाना क्या बनाना है? काम वाली बाई ने पूछा।
कुछ भी बना दो..अच्छा ऐसा करो कि आलू मटर की सब्जी और ज्यादा सा चावल ही बना दो। सजी में टमाटर जरूर डाल देना। थोडा सा खांसते हुए अपूर्वा ने काम वाली बाई को बताया। एक बार फिर से फेसबुक पर अपना स्टेटस चेक करने में लग गई। कोई कमेंट नहीं। शुक्र है। आज किसी ने उसे नहीं देखा। कितनी अजीब चीज होती है ये कि हम चाहते हैं कि सब हमें देखें लेकिन कोई हमें देख न ले। कहीं से छू न ले। उस दिन जब आकाश ने उसे छुआ था...
छह साल पहले दतर में काम करते हुए एक दिन आकाश ने अचानक उससे पूछ लिया कि उसका नाम अपूर्वा क्यो? बस, यहीं से अपूर्वा को लगने लगा कि शायद आकाश उसे इस सवाल का जवाब दे सके कि उसका नाम अपूर्वा क्यो है। वो न चाहते हुए उसके पास जाने लगी। उससे बातें करने लगी। बातें बढ़ीं तो घर तक पहुंच गईं। अपूर्वा के अकेले कमरे में एक आकाश सजने लगा। तारे टिमटिमाए तो पेट में बवाल मच गया। अपूर्वा ने ये बात आकाश को बताई। आकाश ने उसे दो हजार रुपये दिए और प्यार से उसके माथे पर आई लटें उलझाते हुए बताने लगा कि उसे चंडीगढ़ में बीस हजार ज्यादा तन्ख्वाह पर नौकरी मिल रही है। क्या करे? ये सही वक्त नहीं है। आखिरकार अपूर्वा डाक्टर के पास गई और दो दिन काम वाली बाई से खिचड़ी और सूप बनवाकर पिया। आकाश चला गया। तारे टिमटिमाना बंद हो गए। स्याह काली रातें अल्प्राजोलम के सहारे गुजरने लगीं। ये दवाइयां भी कितनी अजीब चीज होती हैं। हमें जरूरत पर मिल जाती हैं लेकिन खत्म कर देती हैं।
प्वाइंट फ़ाइव की तीन गोल अल्प्रॉक्स ली और सोचने लगी। आखिर मुझे क्यो आकाश से प्यार हुआ? नहीं नहीं....ये प्यार नहीं था। ये तो जरूरत थी, प्यार होने जैसी किसी अनुभूति की। उस वक्त मेरी देह जल रही थी। मुझे छुअन की असीम इच्छा थी। ये मायने नहीं रखता था कि कौन छू रहा है, पर ये भी देखना होता था कि कम से कम वो गोरा हो या फ़िर स्मार्ट हो, या फ़िर किसी अच्छे खान्दान का दिखता हो। तुम सोचना बंद यों नहीं कर देती हो... उस दिन आकाश ने कहा था। मुझे लगा कि वो सही कह रहा है। सारी समस्याएं यहीं से पैदा होती हैं। सोच से...विचारों से। अगर हम सोचना बंद कर दें तो एक झटके में सारी समस्याओं से बाहर आ जाएंगे। या यों सोचना कि समस्याएं खत्म हुई हैं या नहीं। समस्याओं को छोड़ना ज्यादा इपॉर्टेंट है या उन्हें सॉल्व करना?

Monday, January 16, 2012

हम देखेंगे.

उन दिनों

जब जमीन से उठती सफेदी
कर देगी तर आसमान,
और ढँक जायेगा पीला सूरज
जमीन की उसी सफेदी से,
हम देखेंगे.

उन दिनों
जब घने लहरिया पेड़ों से
उड़ जाएँगी बौराई चिड़ियाँ
काटेंगी, चीरेंगी, बनायेंगी रास्ता
असमान मे छाई सफ़ेद धरती मे
हम देखंगे

उन दिनों
जब असमान से बरसता लोहा
पत्तों को कर देगा हरा
जमीन पे फूटेंगी गेंहू की कोपलें
बिरवे लेंगे मदमस्त अंगडाई
हम देखेंगे

उन दिनों
जब सारे बच्चे होने अपने पिताओं की गोद मे
माएं ओखली मे कूटेंगी बरसते लोहे की धार
पिसेगा पिसान और जलेंगे चूल्हे
हम देखेंगे

तब तक साथी, हम चलेंगे
चलते रहेंगे, करते रहेंगे तलाश
हमें पता है-जरूर मिलेंगे वो दिन
भले ही मिले वो उन दिनों
हम देखेंगे

Friday, January 13, 2012

मन न रंगायो...


सेना के जवानों को सामाजिक होने से रोका गया है। सही भी है। अगर सेना के जवान सामाजिक हो गए तो समाज की वह सारी गंदगी सेना की गंदगी में मिलकर एक नई तरह की जुगलबंदी कायम करेगी। इस जुगलबंदी का कारण और निवारण हमारे दिल्ली-मुंबई में बैठे सुपर एटीकेटधारी समाजशास्त्री खोज पाएंगे या नहीं, अलबत्ता चैनल के स्टूडियो के बाहर निकलकर यह जरूर कहेंगे कि भई, जवानों को सेक्स की जरूरत तो है ही।

बहरहाल, खबर यह है कि सेना के जवानों पर फेसबुक और ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर अपना एकाउंट बनाने पर रोक लगा दी गई है। इसके लिए बाकायदा एक सर्कुलर भी जारी किया गया है। सेना के शीर्ष अधिकारियों, जहां पर गर्म गोश्त की पहुंच है, जैसा कि पिछले कुछ एक स्टिंग ऑपरेशन में साबित भी हुआ है, उन्होंने ही यह सर्कुलर जारी किया है। मेरे लिखने का मकसद सेना के जवान, जवानों की मनोवैज्ञानिकता, शीर्ष अधिकारियों में फैला भ्रष्टाचार, कुचार आदि नहीं है। दरअसल इस समाचार में छपे एक शद ने मेरा ध्यान खींचा। यह था हनीट्रैप्स। हनीट्रैप्स वह होते हैं, जिनकी या तो फेक आईडी होती है और वह लड़की बनकर लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। और जो लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं, उनसे ये हनीट्रैप्स वह सारी चीजें कराते हैं जो हनीट्रैप की तरफ आकर्षित होने वाले मन ही मन करना तो चाहते थे, पर भारतीय समाज की परम भारतीय जकड़न में फंसकर नहीं कर पा रहे थे। जरूरी नहीं कि हनीट्रैप्स पुरुष ही हों, यह महिला भी हो सकती हैं। जरूरी नहीं कि ये हनीट्रैप हमेशा किसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर ही मिलें। यह असल जिंदगी में आमने सामने भी मिल सकते हैं, आपके घर के बगल वाली गली में भी मिल सकते हैं और यहां तक कि ये वो भी हो सकते हैं जिन्हें आप समझते हैं कि आप उन्हें तहे दिल से चाहते हैं। वह ट्रैप करते हैं और बड़े ही प्यार भरी स्टाइल से ट्रैप करते हैं। आप उनसे जिंदगी भर साथ निभाने का वादा ले सकते हैं, उनसे आप हर कदम पर साथ चलने का मजबूत इरादा बाकायदा लिखित में ले सकते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में आप जो ले रहे हैं, वह सिर्फ आप ही समझ रहे हैं कि आप ले रहे हैं। हनीट्रैप दे रहा है या नहीं, ये उसपर निर्भर है कि वह कितना ईमानदार है। सेना ने रोक लगाई है तो जाहिर है कि जो हनीट्रैप है, वो ईमानदार नहीं है। वैसे ये हनीट्रैप अपना शरीर भी आपके हवाले कर सकते हैं जिसकी दुनिया में चंद सिकों की कीमत होती है, माफ करें यदि पूरी तरह से प्रैटिकल होकर या सीधे सीधे कहें तो बनिया बनकर सोचें तो।
अभी कहीं पढ़ा था कि मारना जुर्म है तो पैदा करना यों नहीं? सही बात है, पैदा करना जुर्म यों नहीं है? मुझे लगता है कि पैदा करना भी जुर्म ही है। क्योंकि यहां से एक मोलभाव की शुरुआत होती है। हनीट्रैप मोलभाव तो करता ही है, भारतीय सामाजिक जकड़न तो उससे भी ज्यादा मोलभाव करने लगती है। हत्या के साथ कम से कम यह बात तो साफ हो जाती है कि हत्या हुई और किसी ने हत्या की। भले उसे सजा आज मिलेगी या कल या फिर वह सजा मिलने से बच जाएगा, पर रहेगा तो वह हत्यारा ही। अपनी ही नजर में रहेगा पर रहेगा। पर पैदा करने के बाद का दंभ उस हत्या से कहां बचाता है जो मोलभाव से हर रोज, हर पल होती है।
हनीट्रैप यही करता है। वह आपसे प्रेम करता है, आपको अपने पाश में जकड़ता है और उसके बाद शुरू होता है मोलभाव। सेना की खुफिया जानकारियों से लेकर आपके अंतरमन की खुफिया जानकारियों तक का मोलभाव। जिंदगी का मोलभाव, जीने का मोलभाव और जो कुछ भी आपके पास है, उन सभी चीजों का मोलभाव। कीमत है भावनाएं, जो दर्शाई तो जाती हैं, लेकिन वह कितनी सच हैं या कितनी झूठ, यह कोई पता नहीं लगा सकता है सिवाय हनीट्रैप के।
पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू पाश ने कहा था
प्यार करना
और लड़ सकना
जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है
धूप की तरह धरती पर फैल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
चारों दिशाओं में गूंज जाना
जीने का यही सलीका होता है मेरी दोस्त
प्यार करना और जीना उन्हें कभी न आएगा
जिन्हें जिंदगी ने बनिए बना दिया।
पर हनीट्रैप का पाश से रत्ती भर का मतलब नहीं है। उसे न तो धूप बनना है और न ही बारूद। उसे प्यार तो करना है पर कितना करना है और कब करना है, यह उसे पता है। बनिया भरी जिंदगी से बचने के लिए हनीट्रैप्स से बचना जरूरी है। सेना के शीर्ष अधिकारी सुपरमॉडलों के साथ अभिसाररत होते हुए भी यह सच्चाई जानते हैं कि जीवन में एक सीधी रेखा का होना बहुत जरूरी है। बीच का रास्ता नहीं होता। इसलिए सेना के जवान हनीट्रैप्स से बचें। चाहे वह असल जिंदगी में मिलें या फिर इंटरनेट की आभासी दुनिया में मिलें। हनीट्रैप्स से बचें। अब आप सोचिए, हनीट्रैप्स कहीं आपके आसपास तो नहीं?