Sunday, August 12, 2007

ये बुर्जुवा सरकार कब समझेगी ?

प्रदीप सिंह
सरकार कपडे उतार कर नाच रही है -
पहला भाग यहाँ पढ़ें
पहली ध्यान देने की बात यह है कि बडे उद्योगों मे एक रोजगार पैदा करने के लिए जहाँ तकरीबन एक करोड़ रुपये लगते हैं वहीं छोटे उद्योग मे दस लाख और हथकरघा उद्योग तो सिर्फ लाख दो लाख से ही शुरू हो जाता है। इस सबकी तुलना मे सिंचित जमीन मे नाम मात्र के निवेश से ही बड़ी संख्या मे रोजगार पैदा किया जा सकते हैं। लेकिन सरकार का ध्यान तो परमाणु समझौता - हथियारों की खरीद मे लगा हुआ है , इस तरफ नही। या फिर उद्योगों की तरफ जिसके लिए वो किसानो का पेट सर हाथ पैर सब कुछ काटने के लिए नई नई नीतियाँ बनाने मे लगी है। बडे उद्योग जहाँ छोटे उद्योगों को खाकर लघु और कुटीर उद्योग से बने रोजगार के अवसरों को ख़त्म कर रहे हैं , वहीं कृषि जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा भी इन उद्योगों को दिया जा रहा है । जो भी किसान इसमे आनाकानी कर रहा है उसे जान से मार डाला जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र के परंपरागत व्यवसाय बडे उद्योगों की वजह से नष्ट हो रहे हैं। सरकार इस पैतृक एवम ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को बचने के लिए कुछ कर तो रही नही है उल्टे उस जर्जर हो चुकी पीठ पर खर्चे का और ज्यादा बोझ लादने के लिए तैयार बैठी है।
लघु और कुटीर उद्योगों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि कुछ विशिष्ट वस्तुओं के उत्पादन का कार्य इन्हें ही दिया जाय। लघु एवम कुटीर उद्योगों से जिन उत्पादों का निर्माण संभव है उनसे बडे उद्योगों को वंचित किया जाय। आज पंखे और टोकरियाँ बनाने के क्षेत्र मे बड़ी बड़ी कम्पनियाँ लग गई हैं । अब तक बांस की टोकरियों एवम पंखे और ग्रामीण क्षेत्रों की अन्य जरूरतों का सामान गाँव मे ही बनाने वाले लोग थे , लेकिन अब ये सामान बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गिरफ्त मे है। मिटटी के बरतन बनाने वाले कुम्हार बेकार बैठे हैं। क्यों ? क्योंकि इसकी जगह अब प्लास्टिक ने ले ली है । ये मिटटी के कुल्हडों से सस्ता भी पड़ रहा है। प्लास्टिक से होने वाले ख़तरे का अनुमान तो सबको है लेकिन फिर भी सब कबूतर बने हुए हैं।
एक अनुमान के अनुसार सन २०२० तक भारत की जनसँख्या डेढ़ अरब तक पहुच जायेगी। उस हालत मे तकरीबन पचास करोड़ बेरोजगार हमारे देश मे होंगे। इससे अधिक भी हो सकते हैं लेकिन कम होने के आसार नज़र नही आते। और इस संख्या मे आधे से ज्यादा बेरोजगार होंगे युवक । अभी क्या है कि सरकार की ओर से औधोगिक क्रान्ति का सब्ज़ बाग़ दिखाया जा रहा है । शेयर बाज़ार के भावों से उन्नति का बखान किया जा रहा है। आवारा पूँजी के दम पर अंतरिक्ष मे छलांग लगाने के सपने देखे और दिखाए जा रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री और उनके अफसर बडे बडे दावे कर रहे हैं। मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि आगामी पांच वर्षों मे नौ करोड़ रोजगार पैदा होंगे। इसी तरह का दावा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी किया था कि प्रत्येक वर्ष एक करोड़ रोजगार के अवसरों को उनकी सरकार बनाएगी । उस सरकार का क्या हश्र हुआ ये किसी से छिपा नही है। सरकारें अगर वस्तु स्थिति का आकलन करके कोई दूरगामी नीति नही बनाएँगी तो यह समस्या विस्फोटक रुप अख्तियार कर लेगी । भारत खेती किसानी का देश है। दिल्ली नही है भारत। यहाँ की संस्कृति खेती पर ही निर्भर है। सीमित पूँजी वाला भारत बेरोजगारी की समस्या का हल केवल कृषि के विकास से ही कर सकता है। हमने एक बंगलौर तो बना लिया है लेकिन हमारी खेती अभी भी मानसून पर निर्भर है। न तो पर्याप्त सिंचाई की व्यवस्था है और न ही खाद , बीज एवम फसलों का उचित मूल्य। अखिर ये बुर्जुवा सरकार कब ये समझेगी कि विकास नीचे से ऊपर की तरफ चलता है न कि ऊपर से नीचे की तरफ।
(अभी तो ये शुरुआत है ...)

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